Tuesday, March 21, 2017

मोदी नहीं योगी मॉडल चाहिये ?

तो क्या इतिहास बीजेपी सत्ता को दोहरा रहा है या फिर एक नया इतिहास गढ़ा जा रहा है। दरअसल वाजपेयी आडवाणी की जोडी और मौजूदा वक्त में मोदी योगी की जोड़ी एक समान लकीर भी खींचती है, जिसमें एक सॉफ्ट तो दूसरा हार्ड । लेकिन वाजपेयी आडवाणी के दायरे को मोदी योगी की जोड़ी एक विस्तार भी देतीहै क्योंकि यूपी सरीखे राज्य का कोई प्रयोग केन्द्र सरकार को वैसे ही डिगा सकती है जैसे एक वक्त कल्याण सिंह ने पीवी नरसिंह राव को तो मोदी ने गुजरात सीएम रहते हुये वाजपेयी को डिगाया। और मोदी जब 2002 से आगे निकलते हुये दिल्ली पहुंच गये तो क्या पहली बार योगी के सामने भी ऐसा मौका आ खड़ा हुआ है, जहां गोरखपुर से लखनऊ और लकनऊ से दिल्ली का रास्ता भी तय हो सकता है। फिलहाल ये सवाल है । लेकिन इस सवाल के गर्त में तीन सवाल छुपे ही हुये हैं। मसलन पहला सवाल क्या मोदी की छवि योगी की छवि तले
बदल जायेगी। दूसरा, क्या मोदी की तर्ज पर योगी अपनी छवि बदलने के बदले विस्तार देंगे। तीसरा , यूपी 2019 के लिये दिल्ली का रास्ता बनायेगा या रोकेगा । ये सारे सवाल इसलिये क्योकि योगी के सीएम बनते ही राम मंदिर ,यूनिफॉर्म सिविल कोड और तीन तलाक़ के मुद्दे भी छोटे हो गये । यानी भारतीय राजनीति में जिन सवालो को लेकर सत्ता लुकाछिपी का खेल खेलती रही वह सवाल योगी की पारदर्शी राजनीति और छवि के आगे सिमट भी गयी । यानी चाहे अनचाहे हर वह प्रयोग जिससे मोदी सरकार पल्ला झाड़ सकती है और योगी सवालों को मुकाम तक पहुंचाकर खुद को ही बड़ा सवाल बनते चले जाते है । तो कौन सी छवि चुनावी लाभ पहुंचाती है जब एसिड टेस्ट इसी का होने लगेगा तब विपक्ष की राजनीति कहा मायने रखेगी। और 2019 में मोदी हो या 2022 तक योगी ही मोदी बन चुके हो इससे किसे फर्क पड़ेगा । क्योंकि कट्टर हिन्दुत्व की छवि मोदी तोड चुके है । कट्टर हिन्दुत्व की छवि योगी की बरकरार है । और संयोग से राम मंदिर निर्माण पर अदालत से बाहर सहमति का सुझाव देकर सुप्रीम कोर्ट ने मोदी-योगी की तरफ देश को देखने के लिये मजबूर तो कर ही दिया है ।

तो क्या इतिहास फिर खुद को दोहरायेगा । कभी मोदी के आसरे गुजरात को हिन्दुत्व के मॉडल के तौर पर एक वक्त देश ने देखा । और अब योगी के आसरे यूपी का हिन्दुत्व के नये मॉडल के तौर पर देखने का इंतजार देश कर रहा है । मोदी ने विकास की चादर ओढ ली है तो योगी अभी भी भगवा ओढ़े हुये हैं। और मोदी की तमाम सफलताओ का मॉडल विकास पर जा टिका है और इंतजार अब योगी मॉडल का हो रहा है। इसीलिये मोदी के ढाई बरस के दौर में जिस योगी को फ्रिंज एलीमेंट माना गया । संघ ने उसी फ्रिंज एलीमेंट पर सीएम का ठप्पा लगाकर साफ संकेत दे दिये कि हिन्दू एजेंडा दरकिनार हो वह उसे मंजूर नहीं । यानी संघ ने मोदी-योगी की जोडी से सपने तो यही संजोये है कि , " आर्थिक समृद्धि और दोहरे अंकों के विकास दर के साथ हिंदू युग का स्वर्णिम काल दिखायी दे । " और मोदी हिन्दू युग के स्वर्मिम काल के प्रतीक बनना नहीं चाहेंगे। लेकिन योगी इस प्रतीक को अपने तरीके से जिन्दा कर सकते है । क्योंकि चाहे अनचाहे राम मंदिर पर राजनीतिक निर्णय का वक्त आ गया है । और मोदी सरकार की खामोश पहल और फ्रिंज एलीमेंट से सीएम बने योगी क खुली पहल के बीच संघ परिवार महसूस कर रहा है कि मोदी मॉडल सत्ता के लिये चाहिये । लेकिन योगी मॉडल हिन्दु युग के स्वर्णिम काल के लिये चाहिये । क्योंकि याद कीजिये पिछले बरस 2 मार्च तो गोरखपुर के मंदिर में जब संतो की बैठक हुई । और इससे संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी भी शामिल हुये तो कहा गया, "1992 में 'ढांचा' तोड़ दिया गया। अब केंद्र में अपनी सरकार है। सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला हमारे पक्ष में आ जाए, तो भी प्रदेश में मुलायम या मायावती की सरकार रहते रामजन्मभूमि मंदिर नहीं बन पाएगा। इसके लिए हमें योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाना होगा" यानी ठीक एक बरस संघ ने राम मंदिर के लिये योगी आदित्यनाथ को सीएम बनाने पर सहमति दे दी थी । जबकि संघ बाखूबी जानता समझता है कि योगी आदित्यनाथ संघ के स्वयंसेवक कभी नहीं रहे । तो क्या योगी मॉडल आने वाले वक्त में हिन्दुत्व को लेकर हिन्दू महासभा का वही मॉडल है, जिसपर एक वक्त राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भी सहमति नहीं थी । या फिर सत्ता और मंदिर के बीच अभी भी जब मोदी फंसे हुये है तो योगी को आगे कर संघ परिवार ने तुरुप का पत्ता फेंका है। ये सवाल इसलिये क्योकि राम मंदिर का सवाल हिन्दू महासभा ने पहले उठाया । रक्षपीठ के पूर्व मंहत दिग्विजय नाथ ने 1949 में ही राम जन्मभूमि का सवाल उठाया । आरएसएस ने 1964 में वीएचपी के जरीये हिन्दुत्व के सवाल उठाने शुरु किये । और सच यही है कि जिस दौर में हिन्दू महासभा के सदस्य बकायदा भारतीय रामायण महासभा के बैनर तले राम मंदिर का सवाल उठा रहे थे तब संघ परिवार की सक्रियता उतनी तीखी नहीं थी जितनी हिन्दु महासभा की थी । और दिग्विजय नाथ के निधन के बाद उनके शिष्य और आदित्यनाथ के गुरु अवैद्यनाथ ने आंदोलन को आगे बढ़ाया। विश्व हिन्दू परिषद की 1989 धर्म संसद में अवैद्यनाथ के भाषण ने ही इस आंदोलन का आधार तैयार किया था। जिसके बाद महंत अवैद्यनाथ बीजेपी में शामिल हुये । और राम मंदिर आंदोलन में अवैद्यनाथ की भूमिका का अंदाजा लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट से लगाया जा सकता है। आयोग की रिपोर्ट कहती है , ‘पर्याप्त मात्रा में पुख्ता सबूत दर्ज किए गए हैं... कि उमा भारती, साध्वी ऋतंभरा, परमहंस रामचंद्र दास, आचार्य धर्मेंद्र देव, बीएल शर्मा, ... महंत अवैद्यनाथ आदि ने भड़काऊ भाषण दिए.’ । तो इन्हीं अवैधनाथ के शिष्य आदित्यनाथ की तरफ संत समाज राम मंदिर बनाने के लिए टकटकी लगाए देख रहा है।

यानी राम मंदिर को लेकर इतिहास के पन्नो में एक परीक्षा प्रधानमंत्री मोदी की भी है । क्योंकि इससे पहले अयोध्या में राम मंदिर को लेकर जो भी पहल हिन्दू महासभा से लेकर विहिप या संघ परिवार ने की । हर दौर में केन्द्र में सत्ता कांग्रेस की थी । यानी हिन्दू संगठनों के आंदोलन ने बीजेपी को राजनीतिक लाभ पहुंचाया । हिन्दू वोट बैक बीजेपी के लिये ध्रुवीकरण कर गया । लेकिन अब बीजेपी की सरकार के वक्त हिन्दू संगठनों को निर्णय लेना है । संघ को निर्णय लेना है । और बीजेपी को भी राजनीतिक नफे नुकसान को तौलना है । क्योंकि दोनों तरफ बीजेपी भी खड़ी है । और संघ को मोदी नहीं राम मंदिर के लिये योगी भा रहे हैं। और सवाल यही है कि मोदी मॉडल का वक्त पूरा हुआ। अब योगी मॉडल का इंतजार है ।

Monday, March 20, 2017

धर्म से बड़ी कोई राजनीति नहीं...राजनीति से बड़ा कोई धर्म नहीं

"धर्म से बड़ी कोई राजनीति नहीं .....और राजनीति से बड़ा कोई धर्म नहीं" यूं ये बात तो लोहिया ने कही थी। और लोहिया का नाम जपकर समाजवाद के नाम पर सत्ता चलाने वालो को जब यूपी के जनादेश ने मटियामेट कर दिया। और पहली बार किसी धार्मिक स्थल का प्रमुख किसी राज्य का सीएम बना है तो ये सवाल उठना जायजा है कि क्या वाकई धर्म से बड़ी कोई राजनीति नहीं और राजनीति से बड़ा कोई धर्म नहीं। क्योंकि जो शख्स देश के सबसे बड़े सूबे यूपी का मुखिया बना है वह गोरक्ष पीठ से निकला है। शिव के अवतार महायोगी गुरु गोरक्षनाथ के नाम पर स्थापित मंदिर से निकला है। नाथ संप्रदाय का विश्वप्रसिद्द गोरक्षनाथ मंदिर से निकला है। जो हिंदू धर्म,दर्शन,अध्यात्म और साधना के लिये विभिन्न संप्रदायों और मत-मतांतरों में नाथ संप्रदाय का प्रमुख स्थान है । और हिन्दुओं के आस्था के इस प्रमुख केन्द्र यानी गोरक्ष पीठ के पीठाधीश्वर महतं आदित्यनाथ जब देश के सबसे
बडे सूबे यूपी के सीएम हो चुके हैं, तब इस पीठ की पीठाधीश्वर मंहत योगीनाथ को लेकर यही आवाज है, "संतो में राजनीतिज्ञ और राजनीतिज्ञो में संत आदित्यनाथ"।

तो क्या आस्था का ये केन्द्र अब राजनीति का भी केन्द्र बन चुका है। क्योकि अतीत के पन्नो को पलटे तो गोरक्षनाथ मंदिर हिन्दू महासभा का भी केन्द्र रहा और हिन्दु महासभा ने कांग्रेस से लेकर जनसंघ की राजनीति को भी एक वक्त हिन्दू राष्ट्रवाद के दायरे में दिशा दी । तो क्या योगी आदित्नाथ के जरीये हिन्दू राष्ट्रवाद की उस अधूरी लकीर को ही मौजूदा वक्त में पूरा करने का ख्वाब भी संजोया जा रहा है। या फिर अतीत की राजनीति के दायरे में योगी आदित्यनाथ को पऱखना भूल होगी। ये सवाल इसलिये क्योंकि 1921 में कांग्रेस के साथ हिन्दू महासभा राजनीति तौर पर जुड़ी। जो 16 बरस तक जारी रहा। आलम ये भी रहा कि मदन मोहन मालवीय एक ही वक्त कांग्रेस की अध्यक्षता करते हुये हिन्दू महासभा को भी संभालते नजर आये। फिर हिन्दू महासभा से निकले श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1951 में जनसंघ की  स्थापना की। तो क्या अतीत के इन पन्नों के आसरे योगी आदित्यनाथ को आने वाले वक्त में हिन्दू राष्ट्रवाद के दायरे में यूपी की सत्ता चलाते हुये देखा जायेगा । या फिर पहली बार सावरकर की हिन्दुसभा और हेडगेवार की  आरएसएस की दूरियां खत्म होगी । पहली बार संघ परिवार और बीजेपी की राजनीति की लकीर मिटेगी। पहली बार अयोध्या से आगे गोरखपुर की गोरक्ष पीठ हिन्दुत्व की प्रयोगशाला बनेगी। क्योकि कल तक गोरखनाथ मठ के महंत के तौर पर जाने जाने वाले सांसद योगी आदित्यनाथ अब मंदिर छोड बतौर सीएम लखनउ में मुख्यमंत्री निवास में रहेंगे। और 96 बरस से सक्रिय राजनीतिक तौर पर गोरखनाथ मठ की सियासी सत्ता की नींव सीएम हाउस में पड़ेगी। तो क्या यूपी महज जनादेश के आसरे एक नये सीएम आदित्यनाथ को देखेगा और बतौर सीएम आदित्यनाथ भी महज पारंपरिक गवर्नेस को संभालेंगे। जहां किसानों की कर्ज माफी से लेकर 24 घंटे बिजली का जिक्र होगा। जहां कानून व्यवस्था से लेकर रोजगार का जिक्र होगा य़ा फिर जहां गो हत्या पर पाबंदी से लेकर मंदिर निर्माण का जिक्र होगा। यकीनन जनादेश का आधार कुछ ऐसा हो सकता है लेकिन योगी आदित्यनाथ जिस छवि के आसरे राजनीति को साधते आये है और पहली बार संघ परिवार से लेकर प्रधानमंत्री मोदी ने योगी आदित्यनाथ की राजनीति को मान्यता दी है। तो आने वाले वक्त में तीन राजनीति के तीन तरीके उभरेंगे ही।

पहला, विकास शब्द को हिन्दू सांस्कृतिक लेप के साथ परोसा जायेगा। दूसरा, किसानी या गरीबी को मिटाने के लिये हिन्दुत्व जीवन पद्धति से जोड़ा जायेगा। त सरा, कानून व्यवस्था का दायरा पुरानी तुष्टिकरण की नीति को पलट देगा। कह सकते हैं यूपी को चलाने के लिये हर समुदाय के लिये जो राजनीतिक कटघरा मायावती या मुलायम ने यूपी में खड़ा किया, वह कटघरा योगी आदित्यनाथ के वक्त 180 डिग्री में उलटा दिखायी देगा। लेकिन योगी को सिर्फ महंत से सीएम बनते हुये देखने से पहले यह योगी की उस राजनीतिक ट्रेनिंग को समझना होगा जो गोरखनाथ मठ की पहचान रही। महज दिग्विजय ने 1949 में संघ के स्वयंसेवकों को गोरखनाथ मंदिर से बाहर भी किया। 1967 में हिन्दू महासभा के टिकट से महंत दिग्विजय ने चुनाव भी लड़ा। 1989 में महंत अवैधनाथ ने हिन्दू महासभा की टिकट पर चुनाव लड बीजेपी को भी हराया । यानी हिन्दुत्व या राम मंदिर के नाम पर जो लकीर संघ खींचता आया है उसे हिन्दू महासभा ने हमेशा बेहद कमजोर माना । और जब बीजेपी को इसका अहसास हुआ कि हिन्दू महासभा के मंहत अवैधनाथ को साथ लाये बगैर हिन्दुत्व के ठोल पीटे नहीं जा सकते । या राम मंदिर का सवाल आंदोलन में बदला नहीं जा सकता तो 1991 में मंहज अवैधनाथ को मान मनौवल कर बीजेपी के टिकट से गोरखपुर में लड़ाया गया । यानी हिन्दुत्व के सवाल पर संघ और हिन्दू महासभा के बीचे दूरियो का रुख ठीक उसी तरह रहा जैसे एक वक्त हिन्दू रक्षा के सवाल पर गुरुगोलवरकर और सावरकर से लेकर मंहत दिग्विजय तक में भिन्नता थी। विभाजन के दौर में जब देश दंगो में झुलस रहा था तब हिन्दु महासभा का संघ पर आरोप था कि वह कबड्डी खेलने में व्यस्त है । यानी हिन्दु रक्षा की जगह सेवा भाव में ही संघ रहा । इसी लिये जिस वक्त अयोध्या आंदोलन उग्र हुआ तब महंत अवैधनाथ बीजेपी के साथ आये। और आज भी योगी आदित्यनाथ ये मानते है कि राम मंदिर निर्माण को सत्ता ने टाला। लेकिन हिन्दुत्व की योगी आदित्यनाथ की शैली क्या प्रधानमंत्री मोदी के लिये राहत है । ये सवाल इसलिये बड़ा हो चला है क्योकि गोरखपुर में योगी आदित्यनाथ का राजनीतिक मॉडल उस दबंग राजनीति पर टिका है, जिस अंदाज को हिन्दू रक्षा के लिये एक वक्त सावरकर ने माना और यूपी में मंहज दिग्विजय ने अपनाया भी। यानी योगी के दौर में यूपी में कानून व्यवस्था की परिभाषा भी बदल जायेगी। क्योंकि जिस राजनीतिक मॉडल को योगी आदित्यनाथ ने गोरखपुर में अपनाया। उसका सच ये भी है कि हिन्दू संघर्ष वाहिनी का अपने इलाके में अलग खौफ है। गोरखपुर में सांस्कृतिक सवालों के जरीये वाहिनी की दंबगई के आगे कानून व्यवस्था मायने नही रखती। खुद योगी आदित्यनाथ ने गोऱखपुर के कई ऐतिहासिक मुहल्लों के नाम मुस्लिम विरोध के बीच बदलवा दिए। उर्दू बाजार हिन्दी बाजार बन गया। अलीनगर आर्यनगर हो गया। मियां बाजार मायाबाजार हो गया। यानी योगी का अपना एजेंडा रहा-और उस एजेंडे में कानून अभी बाधा नहीं बना।

और योगी की दबंगई ही उनका यूएसपी है,जो गोरखपुर में लोगों को उनका मुरीद भी बनाता रहा।यानी योगी की गोरखपुर की पहचान का अगर विस्तार बतौर सीएम यूपी में होगा तो दंबग जातियों को दब कर चलना होगा। हिन्दू रक्षा के लिये कानून व्यवस्था अब काम करती दिखेगी। दबंग राजनेताओ की राबिन हुड छवि खत्म होगी । और मुस्लिम दबंगई पर तो बहस बेमानी है। यानी योगी की राजनीतिक धारा की दबंगई खुद ब खुद कानूनी मान्यता पायेगी और सड़क पर दंबग राजनीति में नयापन दिखायी देगा। ये तय है । ऐसे में जो हिन्दुत्व या राम मंदिर के अक्स तले योगी को समझना चाहते है तो फिर याद किजिये साल भर पहले यानी 2 मार्च 2016 को गोरखनाथ मंदिर में भारतीय संत सभा की चिंतन बैठक हुई थी, जिसमें आरएसएस के बड़े नेताओं की मौजूदगी में संतों ने कहा था---"1992 में 'ढांचा' तोड़ दिया। अब केंद्र में अपनी सरकार है. सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला हमारे पक्ष में आ जाए, तो भी प्रदेश में मुलायम या मायावती की सरकार रहते रामजन्मभूमि मंदिर नहीं बन पाएगा। इसके लिए हमें योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाना होगा"

Saturday, March 18, 2017

शाह को शह देकर योगी के आसरे संघ का राजनीतिक प्रयोग


ये बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को संघ की शह-मात है । ये नरेन्द्र मोदी की कट्टर हिन्दुत्व को शह-मात है । ये मुस्लिम तुष्टीकरण राजनीति में फंसी सेक्यूलर राजनीति को संघ की सियासी समझ की शह-मात है । ये मोदी का हिन्दुत्व राजनीति के एसिड टेस्ट का एलान है । ये संघ का भगवा के आसरे विकास करने के एसिट टेस्ट का एलान है । ये हिन्दुत्व सोच तले कांग्रेस को शह मात का खेल है, जिसमें जिसमें योगी आदित्यनाथ के जरीये विकास और करप्शन फ्री हालात पैदा कर चुनौती देने का एलान है कि विपक्ष खुद को हिन्दू विरोधी माने या फिर संघ के हिन्दुत्व को मान्यता दे। तो यूपी के नये सीएम के एलान के साथ कई थ्योरियों ने जन्म तो ले ही लिया है। और हर थ्योरी पहली बार उस पारंपरिक राजनीति से टकरा रही है, जिसे अभी तक प्रोफेशनल माना गया । लेकिन योगी आदित्यनाथ के जरीये राजनीतिक बदलाव की सोच पहली बार उसी राजनीति को शह मात दे गई जिसके दायरे में लगातार बीजेपी के कांग्रेसीकरण होने से संघ परेशान था । और संघ के भीतर सावरकर थ्योरी से हेडगेवार थ्योरी टकराने की आहट से बीजेपी परेशान रहती थी । तो जरा योगी आदित्यनाथ के जरीये इस सिलसिले को समझें कि आखिर बीजेपी अध्यक्ष ने ही सबसे पहले गवर्नेंस के नाम पर केन्द्रीय मंत्री मनोज सिन्हा के नाम पर मुहर लगायी। और संघ के पास सहमति के लिये मनोज सिन्हा का नाम भेजा। और ये मान कर भेजा कि संघ मनोज सिन्हा के नाम पर अपना मूक ठप्पा लगा देगा ।

क्योंकि संघ राजनीतिक फैसलों में दखल नहीं देता । लेकिन इस हकीकत को अमित शाह भी समझ नहीं पाये कि जिस तरह की सोशल इंजीनियरिंग का चुनावी प्रयोग यूपी में बीते तीन बरस के दौर में शामिल हुये बाहरी यानी दूसरे दलों से आये करीब सौ से ज्यादा नेताओं को बीजेपी का टिकट दिया गया । और यूपी के आठ प्रांत प्रचारकों से लेकर दो क्षेत्रवार प्रचारको की भी नहीं सुनी गई उसके बावजूद स्वयंसेवक यूपी में बीजेपी की जीत के लिये जुटा रहा तो उसके पीछे कही ना कही संघ और सरकार के बीच पुल का काम कर रहे संघ के कृष्ण गोपाल की ही सक्रियता रही, जिससे उन्होंने राजनीतिक तौर पर स्वयंसेवकों को मथा और चुनावी जीत के लिये जमीनी स्तर पर विहिप से लेकर साधु-संतों और स्वयंसेवकों को जीत के लिये गाव गांव में तैयार किया। ऐसे में मनोज सिन्हा के जरीये दिल्ली से यूपी को चलाने की जो सोच प्रोफनल्स राजनेताओं के तौर पर बीजेपी में जागी उस शह-मात के जरीये संघ ने योगी आदित्यनाथ का नाम सीधे रखकर साफ संकेत दे दिये सफलता संघ की सोच की है। और जनादेश जब संघ से निकले नेताओं की सोच में ढल रहा है तो फिर संकेत की राजनीति के आसरे आगे नहीं बढा जा सकता है ।

और यूपी के जो तीन सवाल कानून व्यवस्था, करप्शन और मुस्लिम तुष्टिकरण के आसरे चल रहे है, उसे हिन्दुत्व के बैनर तले ही साधना होगा । और अमित शाह के प्रस्ताव को संघ ने खारिज किया तो मोदी संघ के साथ इसलिये खड़े हो गये क्योंकि मंदिर से लेकर गौ हत्या और मुस्लिम तुष्टीकरण से लेकर असमान विकास की सोच को लेकर जो सवाल कभी विहिप तो कभी संघ के दूसरे संगठन या फिर सांसद के तौर पर साक्षी महाराज या मनोरंजन ज्योति उठाते रहे उनपर खुद ब खुद रोक आदित्यनाथ के आते ही लग जायेगी या फिर झटके में हिन्दुत्व के कटघरे से बाहर मोदी हर किसी को दिखायी देने लगेगें । और इसी के सामानांतर जब ये सवाल उठेगें कि मुस्लिम तो हिन्दु हो नही सकता लेकिन दलित या अन्य पिछड़ा तबका तो हिन्दु है तो फिर उसके पिछडेपन का इलाज कैसे होगा । तो विकास के दायरे में केशव प्रसाद मोर्य को डिप्टी सीएम बनाकर उसी राजनीति को हिन्दुत्व के आसरे साधा जायेगा जैसा राम मंदिऱ का शीला पूजन एक दलित से कराया गया था । यानी हिन्दुत्व के उग्र तेवर उंची नहीं पिछडी जातियों के जरीये उभारा जायेगा। और जो सवाल आरएसएस के भीतर सवारकर बनाम हेडगेवार के हिन्दुत्व को लेकर उग्र और मुलायम सोच तले बहस के तौर पर लगातार चलती रही उसपर भी विराम लगा जायेगा ।

क्योंकि योगी आदित्यनाथ की पहचान तो हिन्दु महासभा से जुडी रही है । और एक वक्त कट्टर हिन्दुत्व के आसरे ही योगी आदित्यनाथ ने बीजेपी की राजनीति को चुनौती अलग पार्टी बनाकर दी थी । और 50 के दशक में तो गोरखपुर  मंदिर तक नानाजी देशमुख को इसलिये छोड़ना पडा था क्योकि तब गोरखपुर मंदिर में हिन्दू महासभा के स्वामी दिग्विजय से वैचारिक टकराव हो गया था । और तभी से ये माना जाता रहा कि हिन्दुत्व को लेकर जो सोच सावरकर की रही उससे बचते बचाते हुये ही संघ ने खुद का विस्तार किया । लेकिन राम मंदिर का सवाल जब जब संघ के भीतर उठा तब तब उसके रास्ते को लेकर सावरकर गुट के निशाने पर बीजेपी भी आई । यानी मोदी की योगी आदित्यनाथ के नाम पर सहमति कही ना कही सरसंघचालक मोहन भागवत को भी शह मात है। और इन तमाम राजनीतिक धाराओं का सच ये भी है कि जिस तरह मोदी-संघ ने यूपी की राजनीति को जनादेश से लेकर विचार के तौर पर झटके में हजल दिया है । उसमें अगर कोई सामान्य तौर पर ये मान रहा है कि पिछड़ी जातियों की राजनीति या मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति में उभार आ जायेगा । तो फिलहाल कहा जा सकता है कि ये भूल होगी । लेकिन इतिहास के गर्त में क्या छुपा है और आने वाला वक्त कैसे यूपी को सियासी प्रयोगशाला बनाकर मथेगा । इसका इंतजार हर किसी को करना ही होगा । क्योंकि यूपी सिर्फ सबसे बड़ा सूबा भर नहीं है । बल्कि ये संघ की ऐसी प्रयोगशाला है जिसमें तपकर या तो देश की राजनीति बदलेगी या फिर हिन्दुत्व की राजनीति को मान्यता मिलेगी ।

Friday, March 17, 2017

मुस्लिम-दलित-किसान कैसे फिट होगा "सबका साथ सबका विकास" तले ?

18 करोड़ मुस्लिम। 20 करोड़ दलित। खेती पर टिके 70 करोड़ लोग। और ऐसे में नारा सबका साथ सबका विकास। तो क्या प्रधानमंत्री मोदी के सामने सबसे बड़ी चुनौती मुस्लिम-दलित-गरीब-किसान-मजदूर को नई राजनीति से साधना है। या फिर मुख्यधारा में सभी को लाना है। जरा सिलसिलेवार तरीके से इस सिलसिले को परखें तो आजादी के साथ विभाजन की लकीर तले मुस्लिमों की ये तादाद हिन्दुस्तान का ऐसा सच है जिसके आसरे राजनीति इस हद तक पली बढ़ी कि सियासत के लिये मुस्लमान वजीर माना गया और सामाजिक-आर्थिक विपन्नता ने इसे प्या  बना दिया। लेकिन जो सवाल बीते 70 बरस में मुस्लिमों को लेकर सियासी तौर पर नहीं वह सवाल आज की तारीख में सबसे ज्वलंत है कि क्या मोदी राज में मुस्लिम खुद को बदलेंगे। या फिर मुस्लिम सियासी प्यादा बनना छोड़ अपनी पहचान को भी बदल लेंगे। ये सवाल इसलिये क्योंकि जब 1952 के पहले चुनाव से लेकर 2014 के लोकसभा चुनाव और 2017 के यूपी चुनाव तक में मुस्लिम को वोट बैक मान कर राजनीति अलग अलग धारा में बंटी। और जीत हार के बाद भी सवाल सिर्फ मुस्लिमों को लेकर ही खड़े किये जा रहे हैं। ऐसी आवाजें कई स्तर पर कई मुस्लिम नेताओं के जरीये यूपी चुनाव परिणाम के बाद सुनी जा सकती है। तो सवाल तीन हैं। पहला क्या मुस्लिम नेता के सरोकार आम मुस्लिम नागरिक से जुडे हुये नहीं है। दूसरा क्या नुमाइन्दी के नाम पर हमेशा मुस्लिम ठगे गये। तीसरा, क्या मुस्लिम समाज के भीतर की कसमसाहट अब मुस्लिम नेताओं से अलग रास्ता तलाश रही हैं। क्योंकि यूपी चुनाव का सच तो यही है कि बीजेपी बहुमत के साथ जीती। करीब 40 फीसदी वोट उसे मिले। लेकिन कोई मुस्लिम उसका उम्मीदवार नहीं था। और पहली बार यूपी विधानसभा में सबसे कम सिर्फ 24 विधायक मुस्लिम हैं। पिछली बार 69 मुस्लिम विधायक थे। यानी जो समाजवादी और मायावती मुस्लिमों को टिकट देकर खुद को मुस्लिमों की नुमाइन्दी का घेरा बना रही थी, मुस्लिमो ने उसी समाजवादी और मायावती के बढते दायरे को कटघरा करार दे दिया। असर इसी का हुआ कि सपा के 16 तो बीएसपी के 5 और कांग्रेस के 2 मुस्लिम उम्मीदवार विधायक बन पाये। तो इसके आगे के हालात ये भी है कि क्या चुनावी जीत हार के दायरे में ही मुस्लिम समाज को मुख्यधारा में लाने या ना ला पाने की सोच देश में विकसित हो चली है। क्योंकि ट्रिपल तलाक पर बीजेपी के विरोध के साथ मुस्लिम महिलायें वोट देने के लिये खडी हुई लेकिन ट्रिपल तलाक बरकरार है। वाजपेयी के दौर में मदरसों के आधुनिकीकरण के साथ मुस्लिम खड़े हुये लेकिन मदरसों के हालात जस के तस है। कांग्रेस के दौर में बुनकर से लेकर हज करने तक में बड़ी राहत दी गई। लेकिन दोनों सवाल आज भी जस के तस हैं। 

मुलायम-मायावती के दौर में मुस्लिमों को वजीफे से लेकर तमाम राहत दी गई। लेकिन रहमान कमेटी से लेकर कुंडु कमेटी और सच्चर कमेटी तक में मुस्लिम समाज के भीतर के सवालों ने एक आम मुस्लिम की जर्जर माली हालत को ही उभार दिया। तो फिर मौजूदा वक्त में प्रधानमंत्री मोदी के सामने भी ये सवाल है और मुस्लिम समाज के भीतर भी ये सवाल है कि अखिर मुख्यधारा से सरकार की नीतिया मुस्लिम समाज को जोड़ेगी या फिर मुस्लिम अपनी पहचान छोड जब एक आम नागरिक हो जायेगा तो वह मुख्यधारा से जुड़ेगा क्योंकि अगला सवाल दलितो का है। 20 करोड़ दलित का। और राजनीति ने दलित को एक ऐसे वोट बैक में तब्दील कर दिया,जहां ये सवाल गौण हो गया कि दलित मुख्यधारा में शामिल कब और कैसे होगा। यानी आंबेडकर से लेकर कांशीराम और मायावती तक के दौर में दलितो का ताकत देने के सवाल कांग्रेस की राजनीति से टकराता रहा। और कांग्रेस नेहरु से लेकर राहुल गांधी तक के दौर में दलितों के हक का सवाल दलितों के दलित पहचान के साथ जोड़े रही। तो क्या यूपी चुनाव के जनादेश ने पहली बार संकेत दिये कि दलित नेताओं की नुमाइन्दगी तले दलित खुद को ठगा हुआ मान रहा है। यानी दलित नेताओ के सरोकार दलितों के सामाजिक-आर्थिक उत्थान से जुडे नहीं तो दलितों ने रास्ता अलग पकडा यानी जो सवाल मुस्लिमो की पहचान को लेकर उठा कि मोदी को लेकर मुस्लिम बदलेगें उसी तर्ज पर दलित भी अब अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान छोड कर मोदी सरकार के साथ खडे होगें । 

लेकिन संकट वहीं है कि क्या चुनावी जीत -हार तले दलितों की मुशिकल हालात सुधरेंगे । या फिर दलितो के लिये नीतिया मुख्यधारा में शामिल करने के अनुकूल बनेगी यानी मोदी के सामने दोहरी चुनौती है। एक तरफ मुस्लिम अपनी राजनीतिक पहचान छोड़े दूसरी तरफ दलितों को सत्ता मुख्यधारा की पहचान दें। यानी सारे हालात बार बार सरकार की उन आर्थिक सामाजिक नीतियों की तरफ ले जाती है जो असमानता पर टिका है। और प्रधानमंत्री मोदी के सामने सबसे बडी चुनौती यही है कि वह कैसे असमान समाज के भीतर सबका साथ सबके विकास की अलघ जगाये। क्योंकि बीजेपी के अपने अंतर्विरोध हिन्दुत्व और हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना को भी जीते हैं। यानी जाति और धर्म से टकराती हुये संघ से लेकर बीजेपी भी नजर आती है। ऐसे में अगला सवाल तो देश की असमानता के बीच सबका साथ सबका विकास तले गरीब किसान मजदूर का है। क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषणों में अब बीजेपी के वो पारंपरिक मुद्दे नज़र नहीं आते, जिनके आसरे कभी बीजेपी ने अपनी पहचान गढ़ी थी। अलबत्ता गरीब-किसान-मजदूर-दलित-शोषित-वंचित की बात करते हुए मोदी खुद को लीक से अलग ऐसे राजनेता के रुप में पेश करने की कोशिश में हैं,जिसके लिए हाशिए पर पड़े शख्स की जिंदगी को संवारना ही पहला और आखिरी उद्देश्य है।लेकिन देश की विपन्नता सबका साथ सबका विकास की समानता पर सवाल खड़ा करती है । क्योंकि देश का सच यही है कि सिर्फ एक फीसदी रईसों के पास देश की 58 फीसदी संपत्ति है । और दलित-मुस्लिम-किसान जो 80 फिसदी है उसके पास 10 फिसदी संसाधन भी नहीं है। यानी अर्थव्यवस्था के उस खाके को देश ने कभी अपनाया ही नहीं जहा मानव संसाधन को महत्व दिया जाये । यानी जो मानव संसाधन चुनाव जीतने के लिये सबसे बडा हथियार है। वहीं मानव संसाधन विकास की लकीर खींचे जाते वक्त पगडंडी पर चलने को मजबूर हैं। और उसके लिये किसी सरकार के पास कोई नीति है ही नहीं। यानी देश के हाशिए पर पड़ा समाज आज भी मूलभूत की लड़़ाई लड़ रहा है, और सबका साथ सबका विकास आकर्षक नारा तो बन जाता है लेकिन जमीन पर इसे अमलीजामा कैसे पहनाया जाए-इसका रोड़मैप किसी सरकार के पास कभी नहीं दिखा।

Thursday, March 16, 2017

राजनीति राष्ट्रीय पर्व है, चुनावी जीत देश का सबसे बड़ा लक्ष्य

52 करोड़ युवा वोटर। 18 से 35 बरस का युवा । 18 बरस यानी जो बारहवीं पास कर चुका होगा। और जिसके सपने खुले आसमान में बेफिक्र उड़ान भर रहे होंगे । 25 बरस का युवा जिसकी आंखों में देश को नये तरीके से गढने के सपने होंगे । 30 बरस का युवा जो एक बेहतरीन देश चाहता होगा। और अपनी शिक्षा से देश को नये तरीके से गढने की सोच रहा होगा। 35 बरस का यानी जो नौकरी के लिये दर दर की ठोकरें खाते हुये हताश होगा। लेकिन सपने मरे नहीं होंगे। तो क्या 2019 का चुनाव सिर्फ आम चुनाव नहीं बल्कि बदलते हिन्दुस्तान की ऐसी तस्वीर होगी जिसके बाद देश नई करवट लेगा। हर हाथ में मोबाइल । हर दिमाग में सोशल मीडिया। सूचनाओं की तेजी। रियेक्ट करने में कहीं ज्यादा तेजी। कोई रोक टोक नहीं। और अपने सपनों के भारत को गढते हुये हालात बदलने की सोच। तो क्या 2019 के चुनाव को पकडने के लिये नेताओ को पारंपरिक राजनीति छोड़नी पड़ेगी। या फिर जिसतरह का जनादेश पहले दिल्ली और उसके बाद यूपी ने दिया है उसने पारंपरिक राजनीति करने वाली पार्टियो ही नही नेताओं को भी आईना दिखा दिया है कि वह बदल जाये । अन्यथा देश बदल रहा है ।

लेकिन युवा भारत के सपने पाले हिन्दुस्तान का ही एक दूसरा सच डराने वाला भी है। क्योंकि जो पढ़ रहे है । जो आगे बढने के सपने पाल रहे है । जो प्रोफशनल्स हैं। उनसे इतर युवा देश का एक सच ये भी है कि कि 52 करोड युवा वोटरों के बीच बड़ी लंबी लाइन युवा मजदूरों की होगी। युवा बेरोजगारों की होगी । युवा अशिक्षितों की होगी। 24 करोड़ युवा मनरेगा से कस्ट्रक्शन मजदूर और शारीरिक श्रम से जुड़ा होगा। 6 करोड रजिस्टर्ड बेरोजगार। तो 9 करोड रोजगार के लिये सडक पर होंगे। 11 करोड़ से ज्यादा युवा 5वीं पास भी नहीं होगा। तो क्या युवा भारत के सपने संजोये भारत को युवा चुनावी वोट से गढ़ता हुआ सिर्फ दिखायी देगा। और जिस बूढ़े हिन्दुस्तान को पीछे छोड युवा भारत आगे बढने के लिये बेताब होगा उसकी जमीन तले लाखों किसानों की खुदकुशी होगी। 30 करोड से ज्यादा बीपीएल होंगे। प्रदूषण से और इलाज बगैर मरते लाखों दूधमुंहें बच्चों के युवा पिता होंगे। ये सारे सवाल इसलिए क्योंकि राजनीतिक सत्ता पाने की होड देश में इस तरह मच चुकी है कि बाकि सारे संस्धान क्या करेंगे या क्या कर रहे है इसपर किसी की नजर है ही नहीं । और सत्ता के इशारे पर ही देश चले तो उसका एक सच ये भी ही कि 1977 में यूपी की 352 सीट पर जनता पार्टी ने 47.76 फिसदी वोट के साथ कब्जा किया था । लेकिन यूपी की तस्वीर और यूपी का युवा तब भी उसी राजनीति के रास्ते निकल पडा छा जहा देश को नये सीरे से गढने का सपना था । और 2017 में यूपी की 312 सीट पर बीजेपी ने 39.71 फिसदी वोट के साथ कब्जा किया है । और फिर युवाओ के सपनो को राजनीति के रंग में रंगने को सियासत तैयार है । तो आईये जरा इतिहास के इस चक्र को भी परख लें क्योंकि 43 बरस पहले का युवा आज सत्ता की डोर थामे हुये है। और बात युवाओं की ही हो रही है।

18 मार्च 1974 को छात्रों ने पटना में विधानसभा घेरकर संकेत दे दिये थे कि इंदिरा गांधी की सत्ता को डिगाने की ताकत युवा ही रखते है और उसके बाद जेपी ने संपूर्ण क्रांति का बिगुल फूंका था। और 43 बरस बाद 18 मार्च 2017 यानी परसो जब बीजेपी समूचे यूपी में जीत का दिन बूथ स्तर तक पर मनायेगी। तो संकेत यही निकलेंगे कि सत्ता में भागेदारी या परिवारत्न के लिये युवा को आंदोलन नही बूथ लेबल की राजनीति सीखनी होगी। तो क्या 43 बरस में छात्र या युवा की परिभाषा भी बदल गई है। क्योंकि याद कीजिये 18 मार्च 1974 । जब 50 हजार छात्रों ने ही पटना में विधानसभा घेर लिया तो राज्यपाल तक विधानसभा पहुंच नहीं पाये । यानी तब छात्र आंदोलन ने सडक से राजनीति गढी । और उसी आंदोलन से निकले चेहरे आज कहा कहा खडे है । नीतिश कुमार , रविशंकर प्रसाद , राजनाथ सिंह , रामविलास पासवान, लालू यादव सरीखे चेहरे 43 बरस पहले जेपी आंदलन से जुडे और ये चंद चेहरे मौजूदा वक्त में सत्ता के प्रतीक बन चुके हैं। ध्यान दीजिये ये चेहरे बिहार यूपी के ही है। यानी यूपी बिहार की राजनीति से निकले इन चेहरों के जरीये क्या युवा राजनीति को मौजूदा वक्त में हवा दी जा सकती है। और प्रधानमंत्री मोदी आज जब 2019 के चुनाव के लिये बारहवीं पास युवाओं को जोड़ने का जिक्र कर रहे है और दो दिन बाद 18 मार्च को यूपी में जीत का जश्न बीजेपी मनायेगी तो नया सवाल ये भी निकलेगा कि यूपी का युवा बूथ लेबल पर चुनावी राजनीति की निगरानी करेगा या फिर आंदोलन की राह पकडेगा । यानी सिर्फ चुनावी राजनीति को ही अगर देश का सच मान लें तो ये सवाल खडा हो सकता है कि युवाओ को राजनीति साथ लेकर आये । लेकिन जब सवाल युवाओ के हालातों से जुडेंगे तो फिर अगले दो बरस की बीजेपी की चुनौती को भी समझना होगा। क्योंकि शिक्षा संस्धानो को पढाई लायक बनाना होगा । यूनिवर्सिटी के स्तर को पटरी पर लाना होगा ।

करीब सवा करोड डिग्रीधारियो के लिये रोजगार पैदा करना होगा। सरकारी स्कूल को पढ़ाई लायक बनाना होगा , जहा तीन करोड बच्चे पढ़ते हैं । तो क्या वाकई युवाओ को साधने का राजनीतिक रास्ता इतना आसान है कि नेता छात्र से संपर्क साधे और जमीनी तौर पर यूपी की बदहाली बरकरार रहे । या फिर राजनीति ने जब सारे हालात चुनाव के जरीये सत्ता पाने और सत्ता बोगने पर टिका दिये है तो कही नये हालात एक नये छात्र आदोलन को तो देश में खडा नहीं कर देगें । क्योंकि याद किजिये जेएनयू , डीयू , हैदराबाद , पुणे फिल्म इस्टीयूट , जाधवपुर यूनिवर्सिटी , अलीगढ यूनिवर्सिटी में छात्र संघर्ष बीते दौ हरस के दौर में ही हुआ । और कमोवेश हर कैंपस म वही मुद्दे उठे जो राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करते । यानी सवाल दलित का हो या सवाल साप्रदायिकाता बनाम सेक्यूलरिज्म का । सवाल राष्ट्रवाद बनाम देशद्रोह का हो या फिर शिक्षा का ही हो । संघर्ष करते ये छात्र राजनीतिक दलों की विचारधारा तले बंटते हुये नजर आये । लेकिन छात्र इस सवाल को कभी राजनीतिक तौर उठा नहीं पाये कि सत्ता के लिये नेता राजनीतिक विचारधारा को छोड़ क्यों देते हैं। यानी उत्तराखंड हो या गोवा या मणिपुर । या फिर यूपी-पंजाब में भी ऐसे नेताओ की पेरहिस्त खासी लंबी है जो कल तक जिस राजनीतिक धारा के खिलाफ थे । चुनाव के वक्त या चुनाव के बाद सत्ता के लिये उसी दल के साथ आ खडे हुये । तो क्या छात्र इस सच को समझ नहीं पा रहे है । क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी जब अपने नेताओं को छात्रों से जोडने के लिये कह रहे हैं तो दो सवाल है । पहला छात्र भी राजनीति लाभ के लिये है । और दूसरा-कालेज में कदम रखते ही अब छात्रो को अपनी राजनीतिक पंसद साफ करनी होगी । यानी देश में हालात ऐसे है कि राजनीति ही सबकुछ है । क्योकि हर सरोकार को राजनीतिक लाभ में बदलने का जो पाठ संसदीय दल की बैठक में प्रादनमंत्री ने 16 मार्च को पढाया उसके संकेत साफ है अब राजनीति राष्ट्रीय पर्व है और चुनावी जीत देश का सबसे बडा लक्ष्य ।

Wednesday, March 15, 2017

जनादेश गढ़ रहा है सियासी लोकतंत्र को

10 करोड़ से ज्यादा बीजेपी सदस्य। 55 लाख 20 हजार स्वयंसेवक, देश भर में 56 हजार 859 शाखायें। 28 हजार 500 विद्यामंदिर। 2 लाख 20 हजार आचार्य। 48 लाख 59 हजार छात्र । 83 लाख 18 हजार 348 मजदूर बीएमएस के सदस्य। 589 प्रकाशन सदस्य । 4 हजार पूर्ण कालिक सदस्य । एक लाख पूर्वसैनिक परिषद । 6 लाख 85 हजार वीएचपी-बंजरंग दल के सदस्य । यानी देश में सामाजिक-सांगठनिक तौर पर आरएसएस के तमामा संगठन और बीजेपी का राजनीतिक विस्तार किस रुप में हो चुका है, उसका ये सिर्फ एक नजारा भर है। क्योंकि जब देश में राजनीतिक सत्ता के लिये सामाजिक सांगठनिक हुनर मायने रखता हो, तब कोई दूसरा राजनीतिक दल कैसे इस संघ -बीजेपी के इस विस्तार के आगे टिकेगा, ये अपने आप में सवाल है। क्योंकि राजनीतिक तौर पर इतने बडे विस्तार का ही असर है कि देश के 13 राज्यों में बीजेपी की अपने बूते सरकार है। 4 राज्यों में गठबंधन की सरकार है। और मौजूदा वक्त में सिर्फ बीजेपी के 1489 विधायक है तो संसद में 283 सांसद हैं। और ये सवाल हर जहन में घुमड़ सकता है कि संघ-बीजेपी का ये विस्तार देश के 17 राज्यो में जब अपनी पैठ जमा चुका है तो फिर आने वाले वक्त में कर्नाटक-तमिलनाडु और केरल यानी दक्षिण का दरवाजा कितने दिनों तक बीजेपी के लिये बंद रह सकता है।

तो सवाल चार हैं। पहला, क्षेत्रीय दलों की मौजूदगी अर्थहीन हो चली है। दूसरा, हाशिये पर पडे बहुसंख्यक तबके में जातिगत राजनीति खत्म हो चली है। तीसरा,बहुसंख्यक गरीब तबका मुख्यधारा से जुड़ने की आकांक्षा पाल चुका है। चौथा, राज्यों को केन्द्र की सरकार के साथ खड़ा होना ही होगा। यानी जो राजनीति मंडल से निकली, जिस राजनीति को आंबेडकर ने जन्म दिया, जो आर्थिक सुधार 1991 में निकले। सभी की उम्र पूरी हो चुकी है और नये सीरे से देश को मथने के लिये मोदी-भागवत की जोड़ी  तैयार है। क्योंकि इनके सामने विजन सिर्फ अगले चुनाव यानी 2019 का नहीं बल्कि 2025 का है। जब आरएसएस के सौ बरस पूरे होंगे। और सौ बरस की उम्र होते होते संघ को लगने लगा है कि बीजेपी अब देश को केसरिया रंग में रंग  सकती है। क्योंकि पहली बार उस यूपी ने जनादेश से देश के उस सच को ही हाशिये पर ठकेल दिया जहां जाति समाज का सच देश की हकीकत मानी गई। और इसीलिये 18-19 मार्च को कोयबंटूर में संघ की प्रतिनिधि सभा में सिर्फ 5 राज्यों के चुनाव परिणाम के असर से ज्यादा 2025 को लेकर भी चर् होने वाली है। और इस खांचे में मुस्लिमों कैसे खुद ब खुद आयेंगे, इसकी रणनीति पर चर्चा होगी।

तो क्या वाकई संघ-बीजेपी के इस विस्तार के आगे हर तरह की राजनीति नतमस्तक है। या फिर 2017 ने कोई सीख विपक्ष की राजनीति को भी दे दी है। क्योंकि 2014 में मोदी लहर में बीजेपी को 31 फीसदी वोट मिले। और यूपी की सियासत को ही उलटने वाले जनादेश में बीजेपी को 39.7 फिसदी वोट मिले। यानी 2014 में 68 फिसदी वोट विपक्ष में बंटा हुआ था। और यूपी में अगर मायावती भी अखिलेश राहुल के साथ होती तो कहानी क्या कुछ और ही हो सकती थी। क्योंकि मायावती को मिले 22.2 फिसदी वोट सिवाय बीजेपी को जिताने के अलावे कोई काम कर नहीं पाये। लेकिन विपक्ष के वोट मिला दे तो करीब 50 फिसदी वोट हो जाते। तो क्या वाकई अब भी ये तर्क दिया जा सकता है कि जिस तरह कभी गैर इंदिरावाद का नारा लगाते हुये विपक्ष एकजुट हुआ और इंडिया इज
इंदिरा या इंडिया इज इंदिरा का शिगुफा धूल में मिला दिया। उसी तरह 2019 में मोदी इज इंडिया का लगता नारा भी धूल में मिल सकता है। या फिर जिस राजनीति को मोदी सियासी तौर पर गढ रहे है उसमें विपक्ष के सामने सिवाय राजनीतिक तौर तरीके बदलने के अलावे कोई दूसरा रास्ता बचता नहीं है । क्योंकि कांग्रेस ने मुस्लिम तुष्टीकरण का रास्ता पकड़ा। मंडलवाद-आंबेडरकरवाद ने जाति को बांटकर मुस्लिम को साथ जोडा । लेकिन दलित-पिछडे-मुस्लिमों की सामाजिक-आर्थिक हालात और बिगड़ी। तो क्या नये हालात में ये मान लिया जाये कि जैसे ही चुनावी राजनीति के केन्द्र में मोदी होंगे, वैसे ही वोट का ध्रुवीकरण मोदी के पक्ष में होगा। क्योंकि मोदी ने देश की उस नब्ज को पकड़ा, जिस नब्ज को राजनीतिक दलो ने सत्ता पाने के लिये वोट बैंक बनाया। तो ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि विपक्ष की वापसी तभी होगी जब मोदी से पैदा हुई उम्मीद टूट जाये। ध्यान दें तो कांग्रेस की राजनीति सियासी इंतजार पर ही टिकी है। और मायावती से लेकर अखिलेश तक उन चार सवालो का राजनीतिक रास्ता कोई नहीं पाये जिसे मोदी ने चुनावी भाषणों में हर जहन में पैदा दिया। पहला परिवारवाद, दूसरा जातिवाद, तीसरा भ्रष्टाचारवाद, चौथा तुष्टीकरण। विपक्ष कह सकता है बीजेपी भी इससे कहा मुक्त है लेकिन पहली बार समझना ये भी होगा कि मोदी ने अपने कद को बीजेपी से बड़ा किया है और सियासी राजनीति के केन्द्र में बीजेपी या संघ की राजनीतिक फिलास्फी नहीं बल्कि मोदी की राजनीतिक समझ है।

लेकिन दिल्ली और यूपी की सत्ता पर काबिज होने के बाद नया सवाल यही है कि क्या जनादेश की उम्मीदपर बीजेपी खरी उतरेगी या उतरने की चुनौती तले मोदी की राजनीति बीजेपी में भी घमासान को जन्म दे देगी । क्योंकि यूपी का सच यही है कि उसपर बीमारु राज्य का तमगा । और कमोवेश हर क्षेत्र में यूपी सबसे
पिछडा हुआ है । तो क्या मौजूदा वक्त में 22 करोड़ लोगों का राज्य सबसे बडी चुनौती के साथ मोदी के सामने है। और चुनौती पर पार मोदी पा सकते है इसीलिये उम्मीद कही बडी है या फिर इससे पहले के हालातों को मोदी जिस तरह सतह पर ले आये उसमें हर पुरानी सत्ता सिवाय स्तात पा कर रईसी करती दिखी इसीलिये जनता ने सत्ता पाने के पूरे खेल को ही बदल दिया। क्योंकि राज्य की विकास दर को ही देख लें तो अखिलेश के दौर में 4.9 फिसदी। तो मायावती के दौर में 5.4 फिसदी । और मुलायम के दौर में 3.6 पिसदी । यानी जिस दौर में तमाम बीमारु राज्यो की विकास दर 8 से 11 फिसदी के बीच रही तब यूपी सबसे पिछडा रहा । और खेती या उघोग के क्षेत्र में भी अगर बीते 15 बरस के दौर को परखे तो खेती की विकास दर मुलायम के वक्त 0.8 फिसदी, तो मायावती के वक्त 2.8 फिसदी और अखिलेश के वक्त 1.8 फिसदी । और उघोग के क्षेत्र में मुलायम के वक्त 9.7 फिसदी , मायावती के वक्त 3.1 फिसदी , अखिलेश के वक्त 1.3 फिसदी है। यानी चुनौती इतनी भर नहीं है कि यूपी के हालात को पटरी पर कैसे लाया जाये । इसके उलट यूपी को उम्मीद है कि करीब 8 करोड गरीबों की जिन्दगी कैसे सुधरेगी । जाहिर है हर नजर दिल्ली की तरफ टकटकी लगाये हुये है । क्योंकि एक तरफ देश में प्रति व्यक्ति आय 93231 रुपए है,जबकि यूपी में यह आंकड़ा महज 44197 रुपए है । देश की 16 फीसदी से ज्यादा आबादी होने के बावजूद यूपी का जीडीपी में योगदान महज 8 फीसदी है । दरअसल, सच यह है कि बीते 20 साल में यूपी का आर्थिक विकास किसी सरकार की प्राथमिकता में रहा ही नहीं। लेकिन मुद्दा सिर्फ आर्थिक विकास का नहीं है। ह्यूमन डवलपमेंट के हर पैमाने पर यूपी फिसड्ड़ी है। यानी गरीबों-दलितों-वंचितों की बात करने वाली हर सरकार ने अपनी सोशल इँजीनियरिंग में उन्हीं के आसरे सत्ता हासिल की-लेकिन गरीबों को मिला कुछ नहीं। आलम ये कि विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट कहती है कि यूपी के 44 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं । स्वास्थ्य पर प्रति व्यक्ति सार्वजनिक खर्च गोवा और मणिपुर जैसे राज्यों से भी कम है। शिशु मृत्यु दर देश के औसत से कहीं ज्यादा है । यानी किसी भी पैमाने पर यूपी की छवि विकासवादी सूबे की नहीं रही और इन हालातों में जब यूपी के जनादेश ने सियासत करने के तौर तरीके ही बदलने के संकेत दे दिये है तो भी जिन्हे जनता ने अपनी नुमाइन्दगी के लिये चुना है उनके चुनावी हफलनामे का सच यही है कि 402 में से 143 विधायकों का आपराधिक रिकॉर्ड है और इनमें 107 विधायकों पर तो गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं । और यूपी अब इंतजार कर रहा है कि उसका मुखिया कौन होगा यानी सीएम होगा कौन । और सीएम के लिये फार्मूले तीन है । पहला कोई कद्दावर जो यूपी का सीएम हो जाये । दूसरा यूपी का दायित्व कई लोगो में बांटा जाये। तीसरा, यूपी पूरी तरह पीएमओ के रिमोट से चले। इन तीन फार्मूलो के अपने अंतर्विरोध इतने है कि अभी नाम के एलान का इंतजार करना पडेगा ।

क्योंकि कोई कद्दावर नेता दायित्वो को बांटना नहीं चाहेगा । दायित्वों को बांटने का मतलब दो डिप्टी सीएम और रिमोट का मतलब पीएमओ में नीति आयोग की अगुवाई में तीन से पांच सचिव लगातार काम करें । यानी संघ और बीजेपी का सामाजिक राजनीतिक विस्तार चाहे देश को केसरिया रंग में रंगता दिखे लेकिन सच यही है कि लोकतंत्र का राग चुनावी जीत तले अकसर दब जाता है। और यूपी सरीखा जनादेश लोकतंत्र को नये तरीके से गढने के हालात भी पैदा कर देता है।

Tuesday, March 7, 2017

लोकतंत्र की गलियों में खुद को गढ़ते मोदी .....

रामनगर की संकरी गली में पैदल ही जाते पीएम मोदी । इसी गली के आखिरी छोर पर पूर्व पीएम लाल बहादुर शास्त्री का घर । तो चुनाव बीच जिस तरह यूपी में बीजेपी का चेहरा बने प्रधानमंत्री मोदी लालबहादुर शास्त्री के घर पहुंचे । उसमे हर किसी को लगा जरुर कि ये पीएम मोदी नहीं बल्कि कांग्रेस की विरासत और सियासी जमीन को हथियाने पहुंचे बीजेपी के सबसे बडा प्रचारक हैं । तो क्या मोदी ने पहली बार देश की उस नब्ज को पकड़ा है जिस नब्ज को पकडने से पहले बीजेपी का कोई भी नेता सैकडों बार सोचता । या फिर मोदी ने
देश के उन आईकान को ही अब बीजेपी के साथ खडा करने की नई शुरुआत की है जो अभी तक कांग्रेस की पहचान रहे । या जिनकी पहचान हिन्दुइज्म से इतर रही । याद कीजिये स्वच्छता मिशन के जरीये पहले महात्मा गांधी को मोदी ने अपने साथ जोड़ा । फिर किसानों के आसरे लौह प्रतिमा का जिक्र कर सरदार पटेल को
साथ लिया । बाबा साबहेब की 125 जयंती पर संसद में बहस कराकर मोदी ने आंबेडकर को साधा । और अब लाल बहादुर शास्त्री के घर पहुंचकर साफ संकेत दिये कि लाल बहादुर शास्त्री कांग्रेस के नहीं देश के हैं।

यानी सिर्फ नेहरु परिवार को ही लगातार निसाने पर लेने वाले प्रधानमंत्री मोदी ने बेहद बारीक लकीर कांग्रेस के उन्हीं नेताओं को लेकर खींची जो देश की आईकान हैं । यानी बीजेपी के सामने ये संकट हमेशा से रहा है कि वह संघ, जनसंघ या बीजेपी के कौन से आईकॉन को राष्ट्रीय आईकान के तौर पर अपनाये जिससे राष्ट्रीय सहमति मिले । संघ को बनाने वाले हेगडेवार हो या हिन्दू महासभा बनाने वाले सावरकर या फिर जनसंघ बनाने वाले श्यामा प्रसाद मुखर्जी । या बीजेपी के पहले अध्यक्ष अटलबिहारी वाजपपेयी या आडवाणी । ध्यान दें
तो प्रधानमंत्री मोदी ने खुद कि लिये जो राजनीतिक लकीर खींची है वह राष्ट्रीय नेता के तौर पर अंतराष्ट्रीय छवि वाली है । और उस अक्स में हेगडेवार या सावरकर फिट बैठते नहीं । श्यामाप्रसाद मुखर्जी या दीन दयाल
उपाध्याय की भी परिधि देश के भीतर भर की है । और वाजपेयी बीजेपी के लिये पोस्टरों में चस्पा है तो आडवाणी जिन्हे खुद एक वक्त बीजेपी नेता लौह पुरुष कहते रहे वह मोदी के दौर में कितने कमजोर हो चुके हैं । इसका जिक्र जरुरी नहीं । यानी मोदी के सामने सवाल ये नहीं है कि लालबहादुर शास्त्री काग्रेस के नेता थे । और वह उनके घर जाकर काग्रेस से उन्हे छिन रहे है । या फिर माहात्मा गांधी या सरदार पटेल भी काग्रेस के ही थे ।और आंबेडकर तो उस हिन्दु राष्ट्र  थ्योरी के एकदम खिलाफ थे जिस पर संघ चला । दरअसल मोदी की राजनीतिक फिलासफी लगातार बीजेपी के लिये उस जमीन को बनाने या हथियाने की दिशा में जा रही है जिस राजनीति को कांग्रेसियों ने छेड़ दिया है । या कहे जिस दौर में काग्रेस सबसे कमजोर होकर मोदी को केन्द्र में रखकर राजनीति कर रही है । उसी राजनीति का लाभ उठाकर मोदी देश के उन आईकॉन को अपने साथ ले रहे है जो कभी संघ परिवार या जनसंघ या बीजेपी के थे ही नहीं । तो क्या यूपी चुनाव के जरीये मोदी चुनाव के तौर तरीकों को राष्ट्रपति प्रणाली की तरफ ले जा रहे है । क्योकि यूपी में मोदी प्रचार के लिये उतरे तो पिर अखिलेश का चेहरा हो या मायावती का या फिर राहुल गांधी का । सभी एक ही लकीर पर चल पडे । जिसमें आरोप प्रत्यारोप एक दूसरे पर था । मगर चेहरो के आसरे किसी ने यूपी के चुनाव मैदान में कूदे 4853 उम्मीदवारो को किसी ने नहीं देखा । तो क्या यूपी चुनाव ने संकेत दे दिये है कि देश धीरे धीरे संसदीय प्रणाली से इतर राष्ट्रपति प्ऱणाली की दिशा में जा रहा है । जहा पार्टी नहीं व्यक्ति महत्वपूर्ण होगा । और चाहे अनचाहे पीएम ने जिस अंदाज में चुनाव प्रचार किया । और जिस अंदाज में चेहरो की लडाई एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप तले फंसती उलझती गई उसमें ये किसी ने नहीं पूछा । और ना ही जानना चाहा कि 4853 उम्मीदवारों में हर तीसरे शख्स पर क्रिमिनल केस क्यों दर्ज हैं । 62 उम्मीदवारो पर हत्या का केस यानी धारा 302 दर्ज है । 148 उम्मीदवारो पर हत्या के प्रयास यानी धारा 307 दर्ज है । 34 उम्मीदवारो पर किडनैपिंग का आरोप है । 31 उम्मीदवारो पर रेप का आरोप । यूपी इलेक्शन वॉच और एडीआर की इस रिपोर्ट का मतलब फिर है कितना । क्योकि जिन चेहरो पर यूपी चुनाव जा सिमटा है और सारी बहस दलित--मुस्लिम के समीकरण यानी मायावती । अति पिछडा - उंची जाति के समीकरण यानी मोदी ।

यादव-मुस्लिम-पिछडी जाति समीकरण यानी अखिलेश-राहुल पर जा सिमटी है । तो ऐसे में ये सवाल भी कहा मायने रखते है कि मायवती के 40 पिसदी उम्मीदवार दागी है । अखिलेश के 37 फिसदी उम्मीदवार दागी है ।मोदी के 36 फिसदी उम्मीदवार दागी है । राहुल गांधी के 32 फिसदी उम्मीदवार दागी है । तो फिर महीने भर लंबा चुनाव प्रचार अब पूरी तरह जब थम चुका है तो क्या जनता के लिये सुकुन का वक्त है या फिर इस चुनाव के वक्त जो रोजगार था वह भी अब थम गया । क्योकि रैलियो से लेकर रोड शो का दौर खत्म हुआ । और औसतन हर बडी रैली का खर्चा 50 लाख रुपये से ज्यादा का रहा । 1457 करोडपति उम्मीदवार की बडी रैलियो का औसतन खर्चा तो एक करोड तक भी पहुंचा । 2790 उम्मीदवारो ने तो इनकम टैक्स रिटर्न की जानकारी भी नहीं दी । इनमें 218 करोडपति हैं । यानी लगातार जिन सवालो को पीएम से सीएम तक हर रैली में उठाते रहे । उन्ही
सवालो को पीएम से लेकर सीएम तक चुनाव जीतने के लिये उम्मीदवारो के दाग को ढोते रहे । तो सवाल है जनादेश कुछ भी हो लोकतंत्र हार रहा है और पहल बार हारते लोकतंत्र के केन्द्र में कौन खडा है ?

Thursday, March 2, 2017

आजादी के नारे तले देशद्रोही करार देने की मुनादी

आजादी और देशद्रोह। लेकिन आजाद होने के बाद किससे देशद्रोह । ये सवाल उठेगा जरुर । क्योंकि जो छात्र सड़क पर आजादी के नारे लगा रहे हैं, वे देश से नहीं करप्ट सिस्टम और करप्ट राजनीतिक व्यवस्था से आजादी चाहते हैं। और जो आजादी के शब्द में देशद्रोह की महक देख रहे हैं, वह सरकार के खिलाफ आजादी के नारे को बगावती तेवर मान रहे हैं। तो क्या वाकई देश में देशद्रोह को नये तरीके से परिभाषित करने की जरुरत आन पड़ी है। क्योंकि सच तो यही है कि सैडीशन लॉ यानि देशद्रोह कानून एक उपनिवेशीय कानून है जो ब्रितानी राज ने बनाया था. लेकिन भारतीय संविधान में उसे अपना लिया गया था. और भारतीय कानून संहिता के अनुच्छेद 124 A में देशद्रोह की परिभाषा दी गई है । जिसमें लिखा है कि , अगर कोई भी व्यक्ति सरकार-विरोधी सामग्री लिखता है या बोलता है या फिर ऐसी सामग्री का समर्थन भी करता है तो उसे आजीवन कारावास या तीन साल की सज़ा हो सकती है। तो जबतक दुनिया में ब्रिटेन ने राज किया । देशद्रोह कानून को अपनी संविधान से जोड़े रखा । लेकिन कभी किसी ब्रिटिश नागरिक को ब्रिटेन ने देशद्रोही नहीं करार दिया । और 2010 में ब्रिटेन ने साफ किया कि देशद्रोह कानून सिर्फ गैर ब्रिटिश नागरिकों के लिये है । अमेरिका में भी देशद्रोह कानून गैर अमेरिकी नागरिकों पर ही लगाया जाता है । लेकिन आजादी के बाद भी भारतीय संविधान में देशद्रोह कानून को जगह मिली । और अपने ही देश के नागरिको के खिलाफ देशद्रोह कानून लगाया जा सकता है ये भारत में कोई सवाल नहीं है बल्कि सवाल ये है कि -क्या कश्मीर की आजादी के नारे देशद्रोह माना जाये । क्या बस्तर की आजादी के नारे को देशद्रोह माना जाये । क्योंकि देशद्रोह कानून तो सिर्फ इतना ही कहता है कि सरकार कि खिलाफ कुछ भी लिखना -बोलना देशद्रोह है ।

तो देशद्रोह की जो व्याख्या अंग्रेजों ने भारत को गुलाम बनाते हुये की । क्या वही परिभाषा आजादी के बाद लोकतंत्र तले चुनी हुई सरकार भी परिभाषित कर सकती है । क्योंकि इस दायरे में तो -तमाम राजनीतिक दलों के सरकार विरोधी स्वर आ सकते है । लेखक-कवि-पत्रकारो का लेखन आ सकता है । यानी संविधान ही
आम नागरिक को एक तरफ अभिव्यक्ति की आजादी देता है और दूसरी तरफ सरकार विरोध को विद्रोह या कहे राजद्रोह करार देता है । तो फिर नया सवाल ये भी है कि क्या संविधान की शपथ लने के बाद कोई मंत्री इस तरह के वक्तव्य दे सकता है जैसा गृह राज्यमंत्री रिजीजू या हरियाणा के एक मंत्री ने दिया कि देश से बाहर निकाल देना चाहिये । तो मंत्री कानून बनाता है । कानून का पालन सिस्टम से करवाता है। लेकिन जब मंत्री ही नेता की तरह वक्तव्य देने लगे तो मान लिजिये देशद्रोह कानून को परखा जाना जरुरी है। क्योंकि याद कीजिये अंग्रेजों ने भी देशद्रोह कानून का इस्तेमाल महात्मा गांधी के खिलाफ किया था । 10 मार्च 1922 को ब्रिटिश अदालत ने महात्मा गांधी के खिलाफ देशद्रोह का इल्जाम लगाते हुये 6 बरस कैद की सजा दी थी । और देशद्रोह की वजह महात्मा गांधी का आजादी को लेकर ब्रिटिश सरकार के खिलाफ असहयोग आंदोलन शुरु करना था । लेकिन फरवरी 1922 को चौरी चौरा कांड ने आंदोलन को हिसंक बना दिया तो महात्मा गांधी ने ना सिर्फ असहयोग आंदोलन वापस लिया  बल्कि चौरी चौरा की जिम्मेदारी लेते हुये खुद ही अदालत से गुहार लगायी कि उन्हें सबसे सबसे कड़ी सजा दी जाये ।

तो क्या मौजूदा वक्त में आजादी के नारे तले राजद्रोह का सवाल उठाया जा सकता है । या फिर जिस लड़की ने बरस भर पहले प्लेकार्ड के जरीये अपने शहीद पिता के साये में युद्द का मूक विरोध किया । युद्द के इस मूक विरोध के तरीके को बरस भर बाद किसी दूसरी घटना से जोड़कर क्या देशद्रोह की व्याख्या तले गुलमेहर को भी लाया जा सकता है । या जेएनयू की दीवारो पर लगे इन पोस्टरों को देखकर कहा जा सकता है कि ये देशद्रोही छात्रों का अड्डा है । यानी एक तरफ देश की सबसे बेहतरीन यूनिवर्सिटी का तमगा जेएनयू के नाम । दूसरी तरफ दुनियाभर के आजाद ख्याल के साथ जुडने पर देशद्रोह । फिर याद कीजिये बिहार के एक गरीब परिवार से निकल कर जेएनयू में आजादी के नारे लगाता कन्हैया कुमार । और उस आवाज के आसरे मौजूदा वक्त में खामोश राजनीति या मूकदर्शक बने लेखक-पत्रकार-कवि-समाजसेवी या सभ्रांत नागरिको में जागता विरोध के स्वर का मतलब है क्या । तो क्या मौजूदा वक्त में सडक से उठते सवाल ही परेशानी का सबब है । क्योंकि प्रदानमंत्री मोदी ने जिस अंदाज में सत्ता से ही जनता के सवाल ये कहकर उठाये है कि उनसे पहले की तमाम राजनीतिक सत्ता ने देश को लूटा ही है । तो ये आवाज लूटियन्स की दिल्ली तक के लिये इतनी अलग है कि झटके में देश में राजनीतिक शून्यता आ गई है । या कहें प्रदानमंत्री मोदी के सामानांतर कोई नेता खडा दिखता नहीं । तो ऐसे में तीन सवाल है । पहला छात्र संघर्ष विपक्ष की राजनीति को सहला रहा है । दूसरा ,छात्र संघर्ष से सडक की राजनीति संसद की बहस पर भारी है । तीसरा छात्र संघर्ष कही राजनीतिक विक्लप की शक्ल ना लेंले इससे घबराहट भी है । तो क्या आजादी और देशद्रोह की बहस पहली बार देश की संसदीय राजनीति को ही आईना दिखाने को तैयार है । या फिर चुनावी राजनीति ने हर पालेटिकल पार्टी को सियासी तौर पर इतना बंधक बना लिया है कि राजनीतिक विफलता के साये में आजादी और देशद्रोह पर भी बहस कराने की तैयारी है । तो ऐसे में याद कीजिये दिनकर की कविता की चंद लाईन, हिल रहा है देश कुत्सा के जिन आघातों से / वे नाद तुम्हें ही नहीं सुनाई पडते है ? निर्माण के प्रहरियों ! तुम्हे ही चोरों के काले चेहरे क्या नहीं दिखाई पड़ते है ? तो राष्ट्रकवि दिनकर ने नेहरु की सत्ता को लेकर लिखा था । और कल्पना किजिये नेहरु के कहने पर बकायदा राज्यसभा में रेशमी नगर नाम की इस कविता का पाठ दिनकर ने किया ।

अब सवाल है कि मौजूदा वक्त में कोई कवि इस तरह लिखेगा तो क्या होगा । सोशल मीडिया से लेकर टीवी स्किक्रन पर ही नहीं बल्कि सरकार भी उसे देशद्रोह तो करार दे ही देगी । और लोकतंत्र के मंदिर यानी संसद का अपमान इसे माना जायेगा । तो क्या मौजूदा मामला सिर्फ सहिष्णुता या असहिष्णुता का है । या फिर एक ऐसी राजनीतिक शून्यता का जिसमें सत्ता का इशारा भर किसी को लाभ पहुंचाकर देशबक्ति का तमगा दे देता है या देशद्रोह करार देकर एक ऐसी चक्रव्यू में उलझा देता है जहा गुलमेहर सरीखी लडकी को दिल्ली छोड़ना पडा है । और उसकी मां से लेकर दादा तक की आंखो में खौफ के आसू रेंगते हैं कि कही कुछ गलत उनकी बेटी के साथ ना हो जाये । तो क्या देशद्रोह को लेकर जो आवाज हरियाणा के मंत्री तक उठा रहे है । वह संविधान से अनजान है या फिर सुप्रीम कोर्ट के फैसले तक की जानकारी उन्हे नहीं है । या फिर सोशल मीडिया को भी राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करना हर नेता-मंत्री सीख गया है । क्योकि बरस भर पहले ही तो सुप्रीम कोर्ट ने देशद्रोह की साफ व्याख्या की , "देशद्रोह की धाराएं तभी लगाई जा सकती हैं जब किसी अभियुक्त ने हिंसा करने के लिए लोगों को उकसाया हो या फिर जनजीवन प्रभावित करने की कोशिश की हो." सुप्रीम कोर्ट ने 1962 के केदारनाथ बनाम बिहार सरकार के मामले का हवाला दिया है और बकायदा कहा कि 'सेडिशन' यानी देशद्रोह के मामले की सुनवाई करने वाले निचली अदालतों के जजों और मजिस्ट्रेटों के साथ साथ पुलिस अधिकारियों को भी संविधान पीठ के फैसले के बारे में जानकारी रहनी चाहिए। तो फिर जेएनयू या डीयू के नारो के अक्स में ही सुप्रीम कोर्ट की देशद्रोह की व्याख्या कहा फिट बैठती है । और ये सवाल क्यों उठा कि देशद्रोह को लेकर नये कानून की बात सरकार सोचे । यानी मोदी सरकार के कैबिनेट स्तर के मंत्री वैक्या नायडू जब ये जानते है कि कानून मंत्रालय और गृह मंत्रालय को ही इसपर काम करना है और संयोग से दोनो ही मंत्री आज पूर्वी यूपी के चुनाव प्रचार में व्यस्त है । तो फिर इस सवाल को उठाने का मतलब है क्या । यानी कानून बनाने वाले मंत्री । सिस्टम को ठीक से चलाने की जिम्मेदारी लिये मंत्री की रुचि छात्रों के बयान और सोशल मीडिया के हंगामें तले देशभक्ति या देशद्रोह के दायरे में क्यों सिमट रही है । क्या ये सिर्फ जनता से जुडे मुद्दो से ध्यान हटाने के लिये है । वोटो का ध्रुवीकरण कर चुनाव पर असर डालने के लिये है । छात्रो के आसरे अपनी उपयोगिता बनाये रखने के लिये है । हो जो भी लेकिन राजनीतिक अंधेरा ही कैसे देश के लिये उजाला है । इसका खुला नजारा फिलहाल आजादी के नारे तले देशद्रोह करार दिये जाने की आवाज का है ।