Monday, March 29, 2010

ये गड़करी की टीम नहीं, भागवत की हार है

उनसठ साल पहले श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने नेहरु मंत्रिमंडल से त्यागपत्र देकर एक राष्ट्रवादी राजनीतिक दल की स्थापना के लिये तत्कालीन सरसंघचालक गुरु गोलवरकर से कार्यकर्ता मांगे थे। तब आरएसएस ने उन कार्यकर्ताओं को श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ जाने की इजाजत दे दी जो राजनीतिक दल बनाने के पक्ष में थे। उसी के बाद 1951 में जनसंघ आसतित्व में आया। और जनसंघ के अध्यक्ष डॉ मुखर्जी बने। और उनसठ साल बाद संघ के राजनीतिक दल भाजपा के अध्यक्ष नीतिन गड़करी ने सरसंघचालक से पार्टी का संगठन संभालने या कहें मथने के लिये संघ से कार्यकर्ता मांगे और संघ ने तीन कार्यकर्ताओ पर हरी झंडी दिखा दी। रामलाल के साथ वी सतीश और सौदान सिंह । संघ के रास्ते ही मुरलीधर राव ने भी दस्तक दी। लेकिन मुरलीधर आरएसएस से ज्यादा स्वदेशी के झंडाबरदार दत्तोपंत ठेंगडी के प्रिय रहे हैं। मगर गडकरी ने देशी अर्थव्यवस्था का खासा पाठ ठेंगडी के जीवित रहते उनसे पढ़ा है तो मुरलीघर के प्रति सहोदर वाला भाव उनके भीतर है। असल में गड़करी की टीम यही तीन-चार की है। चूंकि गड़करी सिर्फ खाकी हाफ पैन्ट पहनने वाले संघी नहीं हैं। नागपुर में संघ के मोहल्ले में पले-बढ़े हैं। जहां हेडगेवार के भाषणों के कैसट और लघु पुस्तिका आज भी कई मौकों पर बांटी जाती है। और संगठन के बगैर पार्टी तो दूर देश भी नहीं बचता, यह पर्चा आज भी नागपुर के महाल में बतौर हेडगेवार भाषण के तौर पर मिल जायेगा। यह अलग बात है कि कागज में छपे हेडगेवार के विचार अब पुराने नागपुर शहर में ही किसी परचून की दुकान में पुलिन्दे में लिपटे भी मिल जायेंगे। जिसमें 1935 में पुणे में हेडगेवार के दिये उस तकरीर का भी हिस्सा मिलेगा, जिसमें कहा गया है,

" किसी भी राष्ट्र का सामर्थ्य उसके संगठन के आधार पर निर्मित होता है। बिखरा हुआ छिन्न-भिन्न समाज तो एक जमघट मात्र है। और जमघट में परस्पर कुछ न संबंघ रखने वाले लोग होते हैं जबकि संगठन में एक अनुशासन होता है। जमघट भूर-भूरी मिट्टी की तरह होता है और संगठन ठोस चट्टान की तरह। जो हथौड़े से भी नहीं टूटता। संघ का जन्म समाज को ही संगठन में ढाल कर संगठित , अभेघ और बलशाली बनाने के लिये हुआ है। " लेकिन समाज तो दूर आज की भाजपा को देखकर कोई भी कह सकता है कि यह जमघट है । जहा राष्ट्रवाद से लेकर सत्तावाद और समाजिक सरोकार से लेकर पूंजी की दरकार वाले लोगो का जमावड़ा है। तो क्या गड़करी ने भी हेडगेवार का यह पुलिन्दा पढ़ा और उसके बाद ही जमघट में तब्दील हो चुके भाजपा को संगठन में बांधने की सोची। या फिर सरसंघचालक मोहन भागवत ने हेडगेवार की तकरीर को गड़करी के कान में फूंका। हो जो भी लेकिन पहला संवाद यही निकलता है कि भाजपा जमघट में तब्दील हो चुकी है, जिसे संगठन में बांधना पहली जरुरत है। इसलिये संगठन बनाने का पूरा काम संघ के इन्हीं चार कार्यकर्ताओं को सौपा गया है। लेकिन गडकरी की टीम को देखकर एक दूसरा संवाद भी निकला कि भाजपा का संगठन बांधने की दिशा में गडकरी की टीम ही पहली नजर में संगठन की जगह जमघट हो गयी।

वैसे जमघट को मथना और संवारना भी संघ को आता है
, इसकी ट्रेनिग हेडगेवार और गुरु गोलवरकर के दौर की पहचान रही है। क्योंकि पहली बार जब हेडगेवार ने महाराष्ट्र से बाहर आरएसएस को फैलाना चाहा तो नौ लोगो की टीम बनायी और उन्हें ही संगठन मजबूत करने के लिये तैयार किया। जिन नौ को चुना गया और उन्हीं के भरोसे संघ के विस्तार का सपना हेडगेवार ने देखा। जरा उस टीम को देखिये। भाउराव देवरस को लखनउ भेजा,तो राजाभाउ पातुरकर को लाहौर भेजा। इसी तरह वसन्त राव ओक को दिल्ली, एकनाथ रानाडे को महारौशल, माधवराव मुले को कोंकण, दादाराव परमार्थ को दक्षिण में तथा नरहरि और बापूराव दिवाकर को बिहार भेजा। जबकि बाला साहेब देवरस को कोलकत्ता भेजा गया । 1931 में यह टीम तैयार की गयी थी । उस वक्त आरएसएस के स्वंयसेवकों की संख्या करीब तीन हजार थी। लेकिन पांच साल बाद यानी 1936 में स्वंयसेवकों की तादाद देश भर में तीस हजार पार कर चुकी थी।

कुछ ऐसा ही प्रयोग गोलवरकर ने किया और कुछ इसी तर्ज पर जनसंघ के विस्तार को पहला अंजाम
1952-53 में डा श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने दिया। संघ और जनसंघ से होते हुये भाजपा में यह सिलसिला कब तक चला और कब थमा यह कहना तो मुश्किल है लेकिन जिस टीम के आसरे संगठन बनाते हुये भाजपा को मथते हुये दस फिसदी वोट बैंक बढ़ाने का सपना जिस तरह गड़करी ने पाला है, वह पहली बार हुआ है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता। सिल्वर स्क्रीन का जादू सिल्वर स्क्रीन के जरीये ही रेंगता है इसका एहसास आज के गडकरी और मोहनराव भागवत को चाहे न हो और भाजपा की टीम में बडे पर्दे से लेकर छोटे पर्दे तक से जादू बिखेरने वालो को भी संगठन की पंगत में बैठा नये भारत का सपना जागते हुये देखने की हिम्मत चाहे दिखायी गयी हो लेकिन साठ साल पहले बतौर सरसंघचालक 44 साल के गुरु गोलवरकर को भी इसका एहसास था कि सिनेमायी पर्दा आखिरकार सिनेमायी ही होता है। इसलिये उस दौर में जब वी. शांताराम से लेकर गीतकार प्रदीप की मान्यता किसी भी स्वंयसेवक से ज्यादा की थी, तब भी गोलवरकर ने यही माना कि राष्ट्रवाद को जगाने के लिये समाज के कंघे से कंघा मिलाकर चलना होगा। जिसमें प्रदीप के गीत मन में उंमग तो भर सकते है लेकिन सिर्फ गीत या प्रदीप के जरीये हिन्दू राष्ट्रीयता का भाव जाग जायेगा, ऐसा संभव नहीं है। यानी संघ के हर संगठन में मजबूती भी उसी दौर में आयी जब संगठन की दिशा का नजरिया साफ रहा। चाहे वह खुद आरएसएस हो या उससे बना जनसंघ या फिर स्वदेशी से लेकर विश्वहिन्दू परिषद और भारतीय मजदूर संघ से लेकर वनवासी कल्याण केन्द्र या भारतीय किसान संघ । यहा तक की विद्या भारती भी उसी दौर में फैली जब प्राथमिक शिक्षा को लेकर संघ का नजरिया साफ रहा। 1998 में जब संघ के स्वयंसेवक ही सत्ता में आये अगर उससे ठीक पहले संघी शिक्षा के विस्तार को विघा भारती तले ही देखे तो किसी को भी आश्चर्य हो सकता है कि 1998 तक देश में 13 हजार शिक्षण संस्थाओं से 73 हजार आचार्य और 17 लाख से ज्यादा छात्र जुड़े थे।

लेकिन नजरिया डगमगाया तो शिक्षा देने और समाज को जोडने में लगे संगठन भी जमघट में तब्दील होते चले गये। और बीते बारह सालों में विद्या भारती से जुडे छात्रों की तादाद कम हो गयी । जो
15 लाख के करीब है। भाजपा को भी नयी टीम के जरीये मथने की तैयारी बिना नजरिये कैसे हो रही है। यह सरसंघचालक के दिल्ली की चौकड़ी को आईना दिखाने से लेकर गडकरी के गांव में कार्यकर्ताओ को भेजने और अंत्योदय कार्यक्रम के तहत आखिरी व्यक्ति तक पहुंचने के नारे से समझा जा सकता है। मोहनराव भागवत ने जिस दिल्ली की चौकडी को सीधे नकारा उसी की बी टीम गडकरी को बनानी पड़ी।

यानी भागवत ने भाजपा के भीतर एयरकंडीशन कमरे में बैठकर भ्रष्टाचार के दलदल में गोते लगाते हुये सत्ता की जोड़तोड़ करने के तौर तरीक को कैंसर की संज्ञा देते हुये एक वक्त अंगुली उठायी और गडकरी की टीम में उन्हीं के एंजेट प्रभावी हो गये। वही मनमोहन इक्नामिक्स जब गांव को खत्म कर शहर में तब्दील करने पर तुले है और विकास की इसी लकीर को जब भाजपा के सबसे उदीयमान नेता नरेन्द्र मोदी भी अपनाये हुये हैं तो फिर गडकरी के गाव या अंत्योदय का अर्थ क्या निकाला जाये। खासकर तब जब देश में अस्सी करोड़ लोग सरकार की नीतियों में भी फिट ना बैठ रहे हों। जहां गरीबी की रेखा से नीचे जीने वालो की तादाद में लगातार बढोत्तरी हो रही हो। जहां बिना सरकारी मदद के और बिना इन्फ्रस्ट्रक्चर के खेती पर टिके साठ करोड़ लोगों की रोटी पर ही सीधे हमला खेती की जमीन छिनकर विकास के नाम पर सरकार कर रही हो और वैसे में गडकरी की टीम के
75 फिसदी मनमोहनइकनामिक्स की ही देन हो तो यह सवाल कौन उठायेगा कि भाजपा का नजरिया है क्या । शिक्षा से लेकर आर्थिक मुद्दों और आदिवासी से लेकर किसान तक पर बिना साफगोई नीति के कैसे राष्ट्रीय राजनीतिक दल चलाया जा सकता है। और यह सवाल किससे किया जा सकता है कि आपकी नीति आप ही से जुडे उन तमाम संगठन की है क्या जो समाज के तकरीबन हर हिस्से में संगठन बना कर चला रहे हैं। और अगर सिर्फ आंकड़ों के आसरे गडकरी या भागवत दावा करे कि इतना बड़ा परिवार और किसी के पास नहीं है, तो सवाल उठेगा यह जमघट है संगठन नहीं। क्योकि किसान संघ की नरेन्द्र मोदी अपने राज्य में नहीं सुनते। वनवासी कल्याण आश्रम छत्तीसगढ में रमन सरकार की विकास नीति में फिट नहीं बैठता। हिन्दु जागरण मंच और विश्व हिन्दुपरिषद में टकराव है। स्वदेशी जागरण मंच भाजपा की आर्थिक नीति में फिट नहीं बैठता । लघु उघोग भारती को लेकर कोई राजनीतिक सहमति स्वंयसेवको की सत्ता के दौर में नहीं हुई । और जिस हिन्दुत्व को लेकर हेडगेवार ने आरएसएस की नींव डाली उसी को हर कोई अपनी सुविधानुसार परिभाषित करने में लगा है ।

1992 में विश्व हिन्दु परिषद का दिया नारा, गर्व से कहो हम हिन्दु है आज की भाजपा के लिये राजनीतिक सुसाइड का नारा हो गया है। संघ के भीतर बाहर कितना कुछ बदल चुका है इसका अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि 9 जून 1940 को हेडगेवार के अपने आखिरी भाषण में कहा था,-----"प्रतिज्ञा कर लो कि जब तक जीवित है,संघ कार्य को अपने जीवन का प्रधान कार्य मानेगे, हमारे जीवन में यह कहने का दुर्भाग्यशाली क्षण कभी ना आये कि मै भी संघ का स्वंयसेवक था ......। "सवाल है गडकरी की टीम के चमकते-दमकते चेहरे तो जानते तक नहीं कि आरएसएस है क्या और बुझे चेहरे छुपाते हैं कि वह संघ के स्वंयसेवक हैं। और जो ताल ठोंक कर कहते है कि संघ का कार्य जीवन का प्रधान कार्य है उनकी कोई राजनीतिक हैसियत पार्टी लीडर ही नहीं मानते। अब इस जमघट को संगठन में बांधना भी संघ की जरुरत है। इसलिय भाजपा की नयी टीम गड़करी की नही भागवत की हार है।

Saturday, March 27, 2010

एक अदद लोहिया की तलाश.......

यह सोचना वाकई मुश्किल होगा कि राम मनोहर लोहिया की कोई लीक अब के दौर की राजनीति में बची है। मुश्किल इसलिये क्योकि संसदीय व्यवस्था में सत्ता की राजनीति से जो भी समाजवादी- लोहियावादी दो-दो हाथ कर रहे हैं, वह लोहिया को अपनी राजनीतिक जरुरतों के मुताबिक परिभषित कर रहे हैं। हो सकता है कि तुरंत में महिला आरक्षण को लेकर लोकसभा के अंदर बाहर अपने तर्कों को रखते मुलायम-लालू-शरद यादव की तिकड़ी ज़ेहन में घूमने लगे और यह सवाल जेहन में आये कि लोहिया तो कभी भी महिला आरक्षण को लेकर उस तरह के सवाल खड़े नहीं करते जो यादव तिकडी ने कर दी।

मसलन लोहिया की राय समानता को लेकर बेहद साफ थी कि जब तक समाज में महिलाओं को बराबरी का अधिकार नहीं मिलता तब तक किसी भी हिस्से में समानता की बात सोचना रोमानी होगा । जो बात अब की राजनीति कर रही है, उसमें लोहियावादियों को फिट करना भी मूर्खता होगी। लोहिया समाज में महिलाओं की स्थिति पर साफ कहते थे कि झोपडी में महिला रहे या फिर पांच सितारा घर में- दोनो की स्थिति अपने अपने घेरे में एक सरीखी ही होगी। हर जगह महिला को भोजन तक सबसे आखिरी में ही करना होता है। पहले बड़े-बुजुर्ग, फिर बच्चे। और अगर कोई मेहमान आ गयातो फिर और आखिर में कोई भी महिला खाना खाती है। अधिकतर परिवारों में पूरा भोजन अंत में रहता भी नहीं है। और पानी पी कर ही पेट भरने नब्बे फीसदी महिलाओं की हकीकत है। शायद यही वह परिस्थितियां हैं, जहां लोहिया यह कहने से नहीं चूकते थे कि भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति दलित सरीखी है। इसलिये महिलाओ को जातियों में बांटना भी सही नहीं होगा। सत्ता से होड़ लेते अब के लोहियावादी अक्सर जातीय मजबूरी को लोहिया से जोड़ कर हर मुद्दे को जातीय परिधि में लाने से भी नहीं चूकते।

असल में लोहियावाद की अब की परिभाषा संसदीय चुनावी व्यवस्था में जा सिमटी है। इसलिये लोहिया को समझने के लिये पहले संसदीय खांचे को भी चुनौती देना सीखना होगा। लोहिया ने राज्य की उन परिस्तथतियों को भी चुनौती दी, जो चुनी हुई सरकारों के नाम पर कुछ भी करने को आमादा हो जाते हैं। लोहिया ने जब यह कहा कि
राज्य जब अपनी ताकत परदेसियों को नहीं दिखा पाता तब देसियो पर ही आजमाता है। तो इसका मतलब वह तमाम नीतियां थीं, जो आम आदमी के हक को दबाते हुये एक विशिष्ट तबके को लाभ पहुंचाने वाली होती। इसमें लोहिया की तीन आने की बहस अगर एक प्रतीक थी तो अर्थव्यवस्था को लेकर उठाये गये सवाल उस समाज व्यवस्था पर सवालिया निशान थे, जिसे उस दौर में कांग्रेस हर तबके के भीतर मथ रही थी और आज हर राजनीतिक दल की पहचान ही वही सोच बन गयी है।

अंग्रेजों से भारत को पूर्ण स्वतंत्रता कभी मिली नहीं। इसका मतलब प्रशासनिक और आर्थिक आजादी नहीं था। बल्कि अंग्रेजों की वह नीति थी जो उसके सामाज्यवादी शासन में कब्जे वाले देशों की कीमत लगाकार उसकी महत्ता को मान्यता देना था। यानी जिस देश से सबसे धन की उगाही करने में अंग्रेज सक्षम होते उस देश को अपनी महत्ता में सबसे उपर रखते । संयोग से शुरुआती दौर में कांग्रेस ने राजनीतिक पार्टी के भीतर और समाज के अलग अलग तबकों के भीतर इस समझ को लागू करना शुरु किया। इसलिये कांग्रेस के भीतर उसी की सत्ता हमेशा रही जो प्रभावी तबका रहा । और जातीय आधार पर विकास का सवाल जब कांग्रेस ने उठाया तो सत्ता से जुडा हर तबके का नुमाइन्दी करने वाला झटके में अपने ही तबके के बाहर विशिष्ट वर्ग में तब्दील हो गया। अहं के दौर में यह मलाईदार तबके के तौर पर अनुसूचित जाति-जनजाति से लेकर पिछड़े तबके और अल्पसंख्यक तबके में भी देखा जा सकता है। यानी पहले दौर में सत्ता पर काबिज वर्ग को अगर समाज से काटा गया तो दूसरी प्रक्रिया आर्थिक तौर पर उसी तरह शुरु हुई जैसा अंग्रेजों के दौर में हुआ था। अंग्रेज भारत की कीमत उसके खनिज संसाधनों के आधार पर लगाकर विकास की लकीर धन उगाही के लिये कर रहे थे और न्यू इकनॉमी यानी आर्थिक सुधार के दौर में कुछ इसी तर्ज पर विकास की लकीर खिंची जा रही है। लोहिया ने इस न्यू इकनॉमी का सवाल साठ के दशक में ही यह कह कर उठाया था कि ग्रामीण इलाके की जो कीमत शहर लगाता है अगर उसकी कोई कीमत गांववालों के लिये नहीं है तो राज्य की भूमिका होनी चाहिये कि वह बराबरी के हक में गांव और शहर दोनो की अर्थव्यवस्था लेकर आये।

इसी के मद्देनजर संसद में नुमाइंदगी का सवाल भी हर तबके को लेकर राजनीतिक दलों के भीतर उन्होंने उठाया। अब के संदर्भ में अगर इन परिस्थितियो को देखे तो आरक्षण के जरीये नुमाइन्दगी का सवाल हर तबके को संसद से जोड़ने का उठाया जा सकता है। लेकिन संसद के भीतर के विशेषाधिकार जिस तरह से संसद और आम आदमी को झटके में अलग-थलग कर देते हैं, वैसे में नुमाइन्दगी सत्ता के लिये होती है ना कि तबकों को लेकर। फिर राज्य की भूमिका भी इस दौर में बदल चुकी है। लोहिया जिस दौर में गरीब-गुरबो का सवाल उठाकर सत्ता पर निशाना साधने से नहीं चूकते थे, उस वक्त समूचे देश की जनसंख्या करीब चालीस करोड़ थी, जिसमें से आधी आबादी गरीबी के रेखा से नीचे थी। वहीं आज करीब चालीस करोड गरीबी की रेखा से नीचे है और लोहिया के दौर में अगर देश की नीतियां महज पन्द्रह करोड़ लोगों के लिये थी तो आज भी विकास की समूची लीक महज पन्द्रह से बीस करोड़ से ज्यादा के लिये नहीं है।

लेकिन आज के दौर में करीब चालीस करोड़ लोगो की जिन्दगी इस त्रासदी में कट रही है कि वह आज नहीं तो कल बीपीएल परिवारो में शरिक हो ही जायेंगे । और करीब बीस से पच्चीस करोड़ इस भ्रम में आर्थिक सुधार से दो दो हाथ कर रहे हैं कि उनकी परिस्थितियां भी सत्ता प्रभावित तबके में समाहित हो जायेंगी। लेकिन इस दौर में राज्य की भूमिका कितनी क्रूर है और संसदीय व्यवस्था किस तरह लोकतंत्र के नाम पर कानूनी सैनिक शासन सरीखी व्यवस्था समाज पर लाद रही है। यह समझना जरुरी है। जिन गांव को विकास की लकीर से जोड़ने के लिये राज्य की नीतियां बनायी जा रही है, उन ग्रामीण परिस्थितियों में सबसे ज्यादा काम पुलिस या सेना ही कर रही है। और देश की पन्द्रह फीसदी जनसंख्या यानी करीब बीस करोड़ ग्रामीण आदिवासी और शहरी गरीबों की अपनी जमीन खत्म हो चुकी है। यानी जो खेती की जमीन पीढ़ियों से करोड़ों परिवारों को खाना खिलाती आ रही थी अब राज्य की नीतियो की वजह से वह चंद हाथों में मुनाफे की नीति के तहत जा चुकी है और राज्य इसपर गर्व कर रहा है कि उसके विकास की लकीर को बाजार से जोड़ कर देश की सीमा खत्म कर दी है।

यह पहली बाहर हो रहा है कि देश के भीतर हर वस्तु की कीमत लगायी जा रही है । खनिज-संसाधन से लेकर सभ्यता और संस्कृति भी खरीदने की तैयारी की जा रही है। अगर गौंड आदिवासी की जमीन पर उधोगपति सरकार से एनओसी लेकर पहुंचे है तो अगली खेप उन्हीं गौंड आदिवासियो की संस्कृति को अंतर्राष्ट्रीय बाजार में बेचने की होगी। संबंध से लेकर सरोकार में भी अगर मुनाफा और खरीद-फरोख्त देखी जा रही है तो समझना उसी संसदीय व्यवस्था को होगा, जिसपर लोहिया ने सीधा हमला किया था।

लोहिया का मानना था कि संसद अल्टीमेट नहीं हो सकता। और अल्टीमेट की व्यख्या कभी भी कानूनी दायरे में नहीं हो सकती। खासकर तब जब सवाल राज्य में रहने वाले लोगों का हो। लोहिया ने संसद को उस वक्त आईना दिखाया था जब देश में प्रति व्यक्ति आय नौ आने थी और संसद में चार फीसदी सांसद ही करोड़पति थे। और खुद प्रधानमंत्री नेहरु पर प्रतिदिन का खर्चा
25 हजार रुपये का था। संयोग से आज वह संसद देश को आईना दिखा रही है, जब संसद के भीतर साठ फिसदी सांसद करोड़पति हैं और सत्तर करोड से ज्यादा लोग बीस रुपये प्रतिदिन पर टिके हैं। जबकि प्रधानमंत्री कार्यालय का प्रतिदिन का खर्चा सिर्फ दो करोड़ से ज्यादा का है। और संयोग से लोहिया से लेकर समाजवाद का नारा लगाने दो दर्जन से ज्यादा सांसद और अनुसूचित जाति-जनजाति से लेकर पिछड़े और महिलाओं की नुमाइन्दगी के साथ साथ अल्पसंख्यक समुदाय की नुमाइन्दगी करने वाले भी संसद में मौजूद है और इनमें से नब्बे फीसदी करोड़पति हैं।

जबकि यह सभी जानते है कि लोहिया जब दिल्ली के विल्गटन हॉस्पीटल में भर्त्ती हुय़े थे तो उनका अपना कोई पता नहीं था और जब मरे तो उनका कोई बैंक एकाउंट तक नहीं था। यह दोनों चीजे अभी भी देश के सत्तर करोड़ लोगों के पास नहीं है । लेकिन उनकी बात कहने वाला कोई लोहिया नहीं है। जिससे मनमोहन सिंह भी घबराएं। जैसे नेहरु घबराया करते थे।

Thursday, March 25, 2010

नक्सलबाड़ी के वसंत (कानू सान्याल) की खुदकुशी

1970 में जब कानू सन्याल को गिरफ्तार किया गया तो वह फौजी पोशाक पहने हुये थे। और चालीस साल बाद नक्सलबाडी के हाथीघिसा गांव के झोपडीनुमा घर में जब उनका शव मिला तो शरीर पर सिर्फ लुंगी और गंजी थी। चालीस साल के इस दौर में कानू सन्याल वामपंथी धारा में मजदूर-किसान के हक को सपनों से तोड़ कर जमीनी सच बनाने की जद्दोजहद ही करते रहे। नये संगठन, नयी पार्टी , चुनावी दांव सब कुछ इसी दौर में कानू सन्याल ने किया। और इस दौर में जो नहीं किया वह 1970 से पहले का सच है। एक ऐसा सच जिसने सत्तर के दशक को मुक्ति-दशक बनाने का सपना खेत खलिहानों से लेकर कोलकत्ता के प्रेसीडेंसी कालेज के अहाते तक में पैदा कर दिया।

1964 में सीपीआई से टूट कर निकली सीपीएम को बनाने वालों में कानू सन्याल भी थे। और 1967 में वाम मोर्चा की सरकार जब पहली बार सत्ता में आयी तो सीपीएम के संशोधनवादी रुख के खिलाफ हथियारबंद क्रांति का सपना जगाने वाले भी कानू सन्याल ही थे। संयुक्त मोर्चा सरकार बनने के ठीक 18 वें दिन 18 मार्च 1967 को कानू सन्याल और जंगल संथाल की अगुवायी में सिलीगुडी परगना में किसान सम्मेलन हुआ। जमीन पर कब्जा करने और जमींदारों के विरोध का मुकाबला हथियारों से करने का ऐलान करते हुये कानू सन्याल ने किसानों को चेतावनी दी थी कि उनकी कार्रवाई का विरोध राज्य से लेकर केन्द्र सरकार तक करेगी। इसलिये लडाई लंबी है, जिसके लिये वह तैयार रहें।

दीर्घकालीन हथियाबंद संघर्ष के ऐलान के साथ ही हथबंदी को चकमा देने वाले झूठे रिकॉर्ड को जलाने और कर्ज के प्रोनोट नष्ट करने से शुरु हुए इस संघर्ष की चिंगारी तब भडकी, जब जमींदार ईश्वर टिर्की ने दीवानी से जमीन मिलने के बावजूद किसान बिगुल की पिटाई कर दी। कानू सन्याल ने विरोध में किसानों को एकजुट किया।
23 मई 1967 को नक्सलबाडी थाने के इस गांव में जमींदार की मदद के लिये पुलिस पहुंची तो तीर धनुष से लैस किसानों ने हमला कर दिया। दरोगा सोनम वांग्दी मारा गया। किसानों को सबक सिखाने के लिये 25 मई 1967 को जब पुलिस नक्सलबाडी इलाके में पहुंची तो हजारों हजार किसानों को देखते ही उसके होश फाख्ता हुये। लेकिन सबक सिखाना था तो गोलियां दागी गयीं। सात महिला और दो बच्चो समेत 10 लोगो की मौत ने नक्सलबाडी आंदोलन का बिगुल बजा दिया।

अगुवाई करते कानू सन्याल और जंगल संथाल के पीछे किसानों ने जब गीत गाना शुरु किया
, " ओ नक्सल, नक्सल, नक्सलबाडी की मां / तेरे सीने में खून झरे ला, ओ खून से जनम लेई / जंगल संथाल बंगाल के घर-घर मां " तो इसकी गूंज कोलकत्ता के राइटर्स बिल्डिंग में सुनायी दी। नक्सलबाडी से निकली इस चिंगारी ने ही पहली बार सीपीएम के भीतर भी दो धाराओं को पैदा कर दिया। बंगाल ही नहीं बिहार,उड़ीसा, उत्तर प्रदेश,तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल से लेकर कश्मीर तक में संसदीय वाम धारा के भीतर क्रांतिकारी समन्वय समिति बनने लगीं। घबरायी सीपीएम मे 20 जून को पोलित ब्यूरो की बैठक में नक्सलबाडी को मुठ्टीभर लोगों की कारगुजारी बताकर इसे रुझान मानने से साफ इंकार कर दिया। और चारु मजूमदार, सोरज दत्त, सौरेन बोस और परिमल दास गुप्ता से लेकर सुशील रायचौधरी को पार्टी से निकाल दिया। इस घटना के महज आठ दिनो बाद ही 28 जून को रेडियो पेइंचिंग ने नक्सलबाडी संघर्ष को समर्थन दे कर संसदीय वामधारा को नया झटका दे दिया। चीन के समर्थन ने नक्सलबाडी आंदोलन और कानू सन्याल को किस हद तक प्रभावित किया, इसके दो चेहरे चारु मजूमदार और कानू सन्याल के जरिये समझे जा सकते हैं।

चारु मजूमदार ने उस वक्त नारा लगाया-
चीन के चैयरमैन हमारे भी चैयरमैन--चीन का रास्ता हमारा भी रास्ता । वहीं कानू सन्याल इस दौर में छुपते छुपते सीमा पार कर चीन जा पहुंचे। और वहां न सिर्फ विचारधारात्मक सलाह मश्विरा किया बल्कि वानकिंग मिलिट्री अकादमी में फौजी ट्रेनिंग भी ली । इस ट्रेनिंग का ही असर था कि सितंबर 1968 में कानू सन्याल ने तराई रिपोर्ट के आधार पर जब नक्सलबाडी की समीक्षा की तो उसमें लिखा-एक मजबूत पार्टी संगठन की कमी,फौजी मामलों की जानकारी ना होना, भूमि सुधारों को लेकर औपचारिक रवैया अपनाना और संघर्ष को खेत खलिहानों से बाहर ना ले जाना नक्सलबाडी संघर्ष की बड़ी कमजोरी रही। प्रयोगशाला के तौर पर पार्वतीपुरम इलाका खासा सफल भी हुआ। कानू सन्याल का मानना था कि जिन क्षेत्र में आंदोलन हो रहा है उसकी अगुवाई भी वहीं के लोगो के हाथों में होनी चाहिये। जुलाई 1969 तक पार्वतीपुरम इलाके के 518 गांवों में 300 गांवों को अपने प्रभाव में लेने के बाद यहां 300 से 400 छापामार टुकडियां बनायीं गयीं। और इन्हे ट्रेनिंग देने में कानू सन्याल की फौजी ट्रेनिंग खासी काम भी आयी। इसी के बाद अतिवाम धारा तले बहुसंख्यक तबके को गोलबंद करने के लिये कानू सन्याल ने हर रणनीति का प्रयोग किया। नक्सलबाडी के खेतिहर संघर्ष को व्यापक कैनवास में ले जाने के लिये भूमि सुधार को लागू ना करा पाने के लिये संसदीय राजनीति के अंतर्विरोध को भी उभारा और भारत की कम्यूनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी-लेनिनवादी के गठन के लिये गांव-देहात की जगह कोलकत्ता चुना। नक्सलबाडी पर माओ के प्रेम से संगठन में बहस शुरु हुई तो संघर्ष कमजोर न हो इसीलिये पार्टी के गठन का दिन लेनिन की जन्मशताब्दी दिवस 22 अप्रैल 1969 चुना गया। और पार्टी की पहली काग्रेस जब भूमिगत तौर पर कोलकत्ता के बेहाला में 15-16 मई को हुई तो उसमें उस नयी पौध ने भी शिरकत की, जो अभी तक कालेज से नक्सलबाडी के तराई के संघर्ष के किस्सो को राइटर्स बिल्डिग के जरीये सुना करते थे।

इसी का असर हुआ कि सत्ता बंदूक की नली से निकलती है का नारा लगाते सैकड़ों छात्र भी नक्सलबाडी संघर्ष से जुड़ गये।
3 दिसंबर 1969 को ज्योति बसु ने ऐलान किया कि नक्सलवादियों को देखते ही गोली से उड़ा दिया जायेगा । ज्योति बसु तो नहीं लेकिन उसके बाद कांग्रेस की सरकार के सीएम सिद्दार्थ शंकर राय ने उन हजारों नवयुवकों को नक्सली करार देकर मारा जो प्रेसीडेन्सी कॉलेज से लेकर आईआईटी और मेडिकल की पढ़ाई छोड कर क्रांति का सपना संजोय गांव की तरफ बढ़े । बारासात,बरानगर,काशीपुर,डायमंड हार्बर,हावडा,कोन्नार और बेलेधाटा में सैकड़ों निहत्थो की हत्या जिस तरीके से हुई उससे समूचा बंगाल थर्रा उठा । 17 जुलाई 1972 को सरकार के युवा मंत्री सुब्रत मुखर्जी ने जब चारु मजूमदार से पूछा कि इतनी तादाद में नौजवान जान दे रहे हैं। आप उन्हें रोकते क्यों नहीं, तो चारु का जबाब था- जो हो रहा है, वही होता रहेगा। वे मेरे लिये नहीं क्रांति के आदर्शों के लिये जान दे रहे हैं। और यही सवाल जब पार्वतीपुरम मामले में गिरफ्तार किये गये कानू सन्याल से पूछा गया था तो कानू ने मैक्सिम गोर्की को याद करते हुये कहा था - जैसे ही पुरानी सत्ता उपर से सड़ती है तो वैसे ही नयी सत्ता दिमाग से उपजती है। और नौजवान नयी सत्ता का सपना लिये निकल रहे हैं । लेकिन 1977 में जेल से रिहायी के बाद बीते 33 साल में कानू सन्याल को कभी लगा नहीं कि कोई नयी सत्ता किसी के दिमाग में उपज रही है। इसलिये माओवादी संघर्ष को भी कानू सन्याल ने मान्यता नहीं दी और उनकी हिंसा को भी कभी भटकाव तो कभी आंतक का ही प्रतीक माना। लेकिन कानू सन्याल ने सिंगूर-नंदीग्राम के दौर में यह भी जरुर कहा कि कि राज्य अब कहीं ज्यादा क्रूर हो चुके हैं। हालाकि खुद इस दौर में कानू सन्याल राजनीतिक प्रयोग करते रहे और 2003 में जब रेड फ्लैग और यूनिटी के साथ मिलकर सीपीआई एमएल बना रहे थे तो बिहार के एक कामरेड साथी गीत भी गा रहे थे-- "जब तक मैं देख सकता हूं,/ मै तलाशता रहूंगा, / जब तक मै चल सकता हूं, / आगे बढता रहूंगा, / जब तक मै खड़ा रह सकूंगा / मै लड़ता रहूंगा । " लेकिन किसने सोचा था कि 23 मार्च 2010 को यह गीत भी खारिज हो जायेगा , जब दोपहर एक बजे खबर आयी कि कानू सन्याल ने फांसी लगाकर खुदकुशी कर ली।

Friday, March 19, 2010

खबरदार करते न्यूज चैनलों में खबर कहां है?

संसद के अंदर-बाहर महिला आरक्षण बिल को लेकर हंगामा था। तमाम न्यूज चैनलों में बहस चल रही थी कि आरक्षण बिल पास होगा या नहीं। रिपोर्टरों से लेकर विशेषज्ञ इस मुद्दे पर जूझ रहे थे। अचानक हिन्दी के तीन टॉपमोस्ट राष्ट्रीय न्यूज चैनलो के पर्दैं पर ब्रेकिंग न्यूज आयी-आनंदी को गोली लगी। आनंदी की हालत नाजुक। जगीरा को बचाने में लगी आनंदी को गोली। जा सकती है आनंदी की जान। लगातार आधे घंटे तक ब्रेकिंग न्यूज की ये पट्टियां चलती रहीं। आधे घंटे बाद इन्हीं तीन न्यूज चैनलों में से देश के अव्वल राष्ट्रीय न्यूज चैनल में ब्रेकिंग न्यूज के साथ ही पट्टी लिखी आने लगीं-टीआरपी के लिये बालिका वधू का खेल। इंटरटेनमेंट चैनलों में टीआरपी की जंग। आनंदी को गोली टीआरपी के लिये मारी गयी।

एक झटके में लगा कि महिला आरक्षण को लेकर खबरों की जो संवेदनशीलता हिन्दी न्यूज चैनलों में दिखायी जा रही थी, उसने अपनी टीआरपी के खेल में खबरों की जगह टीआरपी वाले इंटरटेनमेंट चैनलों के सीरियलो की टीआरपी को भी खुद से जोड़ने की नायाब पहल शुरु कर दी है। कुछ इसी तर्ज पर खबरों को कवर करने से लेकर दिखाने का खेल भी न्यूज चैनल खुल्लम खुल्ला अपनाने लगे हैं। कॉमनवेल्थ गेम्स की कवरेज को लेकर दिल्ली में ओलंपिक एसोसिएशन ने न्यूज चैनलों को आमंत्रित किया। कमोवेश हर न्यूज चैनल के संपादक स्तर के पत्रकार कैमरा टीम के साथ इस बैठक में नजर आये। सभी के पास कॉमनवेल्थ गेम्स के कवरेज को लेकर प्लानिंग थी। और सभी सीधे सुरेश कलमाडी से संवाद बनाने में लगे थे।

वहीं माओवादियों के खिलाफ ग्रीन हंट शुरु होने के बाद पहली बार दिल्ली में सरकार के खिलाफ मोर्चाबंदी करते हुये कई लोग एकसाथ मंच पर आये। इसमें जानी मानी लेखिका और एक्टिविस्ट अरुंधति राय, पूर्व आईएएस और नक्सलियों के बीच काम कर रहे बी डी शर्मा से लेकर मेनस्ट्रीम पत्रिका के संपादक सुमित चक्रवर्ती समेत कई क्षेत्रों से जुड़े आधे दर्जन से ज्यादा लोगों ने दिल्ली के फॉरेन प्रेस क्लब में प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में बीबीसी,रायटर्स और सीएनएन जैसे अंतरराष्ट्रीय चैनल और एजेंसियों के पत्रकार मौजूद थे। लेकिन हिन्दी के टॉपमोस्ट पांच न्यूज चैनलों में से कोई पत्रकार वार्ता को कवर करने नहीं पहुंचा। जब देश के तीन सौ से ज्यादा जिलों को रेड कॉरिडोर में मान आंतरिक सुरक्षा का सवाल सरकार खड़ा कर रही है और आतंकवाद की तरह माओवाद को भी मान रही है तो भी किसी न्यूज चैनल के संपादक ने इस प्रेस कॉन्फ्रेंस को दिखाना जरुरी नहीं समझा । जबकि अगले दिन नॉर्थ ब्लॉक से निकलते गृह मंत्री पीं चिदंबरम की एक टिप्पणी, जिसे टेलीविजन की भाषा में बाइट कहा जाता है, को लेने के लिये करीब बीस न्यूज चैनलों के माईक-कैमरे सजे पड़े थे, जिसमें माओवादियों को लेकर बिहार-झारखंड की सरकार के ग्रीन-हंट ऑपरेशन को हरी झंडी देने की बात कही जा रही थी।

यह टीआरपी की अगली कडी है। जिसमें खबरों को कवर करना या ना करना भी सीधे धंधे से मुनाफा बनाना है। सुरेश कलमाडी आज की तारीख में किसी भी न्यूज चैनल के संपादक के लिये सबसे बड़े व्यक्ति हैं। क्योंकि कॉमनवेल्थ के प्रचार प्रसार में मीडिया के हिस्से में करीब पाच सौ करोड़ का विज्ञापन है। और इस पूंजी को पाने के लिये कोई भी न्यूज चैनल अब यह खबर नहीं दिखा सकता है कि कॉमनवेल्थ की तैयारी कमजोर है। य़ा फिर दिल्ली में यमुना की जमीन से लेकर कॉमनवेल्थ के लिये दिल्ली में हजारों हजार पेड़ काटे जा चुके हैं और सिलसिला लगातार जारी भी है। यमुना की जमीन पर जिस तरह कॉमनवेल्थ के लिये कंक्रीट का जंगल खडा किया गया है, उससे सौ साल में सबसे ज्यादा पर्यावरण गर्म होने की स्थिति दिल्ली की है। लेकिन अब मीडिया की नजर कॉमनवेल्थ के धंधे से मुनाफा बनाने की है तो पर्यावरण तो दूर की बात है, खिलाड़ियों की बदहाली से जुडी खबरें भी गायब हो चुकी हैं। यानी कॉमनवेल्थ में सोने के तमगे का जुगाड़ होगा कैसे और खिलाड़ी जिन्हें कॉमनवेल्थ में देश का नाम रोशन करना है, वह खुद कितने अंधेरे में हैं, इस पर भी कोई खबर दिखाना नहीं चाहता क्योंकि उसे डर है कि कहीं कॉमनवेल्थ के प्रचार-प्रसार का विज्ञापन उसकी झोली से ना खिसक जाये। साथ ही वह तमाम कॉरपोरेट कंपनियां, जिनका जुडाव कॉमनवेल्थ गेम्स से है उनको लेकर भी कमाल का प्रेम मीडिया ने दिखाना शुरु कर दिया है। क्योंकि निजी विज्ञापन भी करीब हजार करोड से ज्यादा का है, जिसका इंतजार मीडिया कर रहा है। मीडिया की पूरी नजर इस वक्त करोड़ों रुपए के इन विज्ञापनों पर ऐसी टिकी है कि उसे इसके अलावा कुछ दिखायी नहीं दे रहा।

ऐसे में सरकार और माओवाद के टकराव में देश के दो करोड़ से ज्यादा आदिवासी-ग्रामीणों का हाल कितना बदहाल है, इस पर देश के बुद्दिजिवियों को कोई न्यूज चैनल क्यों कवर करेगा। वहीं सरकार से करीबी धंधा करते न्यूज चैनलों को खबरनवीस भी माने रखगी तो फिर माओवाद हो या देश की कोई भी समस्या सिर्फ सरकार की परिभाषा के अलावे कुछ भी दिखाने का कोई मतलब है ही क्या। असल में खबर की जगह पूंजी का मुनाफा किस रुप में अपनाया जा चुका है, इसका एहसास हॉकी से लेकर आईपीएल के जरीये भी जाना जा सकता है। हॉकी को लेकर न्यूज चैनलों की बेरुखी तबतक रही जबतक प्रयोजक के तौर पर हीरो-होंडा और सेल सामने नहीं आये। जैसे ही विज्ञापनो का पैसा मीडिया में पंप हुआ और ओलंपिक एसोसिएशन ने पहल की तो तुरत-फुरत में राष्ट्रीय खेल को लेकर राष्ट्रीय भावना जाग गयी और औसतन प्रति दिन तीस से पच्चतर मिनट तक के कार्यक्रम हॉकी को लेकर दिखाये जाने लगे। जबकि उससे पहले डेढ़ मिनट से लेकर सात मिनट तक के प्रोग्राम ही न्यूज चैनलो पर चलते रहे थे। और उसमें भी आधे से ज्यादा हॉकी पर मंडराते आतंकवाद को लेकर रहते थे। आईपीएल को लेकर भी मीडिया की खुमारी तब टूटी जब उसके विज्ञापनो की बौछार हुई और विजुअल को दिखाने की इजाजत मिली।

जाहिर है खबरो को दिखाने के लिये सरकार से लाइसेंस ले कर खड़े हुये न्यूज चैनलो की समूची कतार ही जब खबरों को परिभाषित करने से पहले अपना मुनाफा और मुनाफे पर टिके धंधे को ही देख रही हो तब न्यूज को परिभाषित करने का तरीका भी बदलेगा और देश के हालात पर भी वही नजरिया सर्वमान्य करने की कोशिश होगी जो सरकार की नीति में फिट बैठे। ऐसे में अगर किसी न्यूज चैनल में किसी दुर्घटना या आतंकवादी हमला या फिर ब्लास्ट से इतर कोई भी खबर दिखायी दे जाये तो एक बार उसकी तह में जाकर जरुर देखना चाहिये क्योंकि बिना मुनाफे के कोई खबर खबर बन ही नहीं सकती। क्योकि अब सवाल है कि महिला आरक्षण बिल हो या आनंदी को गोली लगना या फिर महंगाई से त्रस्त देश के सत्तर करोड़ से ज्यादा लोगो का दर्द या कॉमनवेल्थ गेम्स को लेकर दिल्ली को रंगीन बनाने का खेल। न्यूज चैनलों के आईने में सभी ब्रेकिंग न्यूज हैं और सभी एक सरीखी खबर हैं। तो कौन माई का लाल कहेगा कि न्यूज चैनल खबर नहीं नाच-गाना दिखाते हैं ।

Monday, March 15, 2010

देश को संसद नहीं पूंजी चलायेगी

2004 में चंदौली में माओवादियो ने विस्फोट से एक ट्रक को उड़ा दिया था । उस वक्त उत्तर प्रदेश में चंदौली ,मिर्जापुर और सोनभद्र ही तीन जिले थे, जो माओवाद प्रभावित थे । लेकिन बीते छह साल में माओवाद प्रभावित जिलों की तादाद बढ़कर 30 पार कर गयी । यह अलग बात है कि चंदौली जैसी घटना दोबारा उत्तर प्रदेश में नहीं हुई । लेकिन माओवाद पर नकेल कसने के लिये सरकार ने इस दौर में करीब पचास हजार करोड़ रुपये खर्च किये । 2005-06 में विदर्भ के किसानों की खुदकुशी रोकने के लिये सरकार ने करीब पचास हजार करोड़ का पैकज दिया । लेकिन पैकेज के ऐलान के बाद भी हर साल विदर्भ के किसानों की खुदकुशी ना सिर्फ जारी रही बल्कि बढ़ गयी । हर महीने 57 की जगह 62 किसान आत्महत्या करने लगे । जो 2009 में बढ़कर हर महीने 67 तक जा पहुंची।


कमोवेश इसी तरह के आंकडे हर उस सामाजिक क्षेत्र के हैं, जिसको विकास की धारा से जोड़ने के लिये सरकार बैचैन है। और करोड़ों रुपये का बजट हर साल उसी तरह हर क्षेत्र के लिये सरकार देती है, जैसे
2010-11 के बजट के जरिए प्रणव मुखर्जी ने सामाजिक क्षेत्र के विकास के लिये 1,37,634 करोड़ दे दिये। बजट के जरिए इस बार भी माओवादियों को जड़ से खत्म करने और किसानों को राहत दिलाने से लेकर खेती योग्य जमीन को बचाने के लिये सरकार ने करोड़ों रुपये बांटे है। करोड़ों रुपया बांटने के बावजूद अगले एक साल में माओवाद और तेजी से फैलेगा। किसान की खुदकुशी में इजाफा ही होगा और खेती योग्य जमीन खत्म होगी, औघोगिक विकास के नाम पर खेती की जमीन हथियाई जायेगी । यह सब देश का हर वह नागरिक, जिसकी जड़ें जरा सी भी गांव से जुड़ी हैं और पंचायत स्तर पर राजनीति करने वाला भी इस सच को तुरंत मान लेगा।

सवाल हो सकता है कि इसे मनमोहन सरकार क्यों नहीं समझ पा रही। असल में नया सवाल देश के सामने कहीं ज्यादा इसीलिये गंभीर है क्योकि हर समस्या का समाधान रुपये में देखा ही जा रहा है और सरकार ने आर्थिक सुधार के दायरे को ही कुछ इस तरह रचा है, जिसमें वही शख्स फिट बैठ सकता है, जिसके पास पूंजी हो। यानी पूंजीवादी चश्मा पहन कर सभी के लिये एक सरीखा वातावरण बनाने की समाजवादी सोच का राग सरकार अपनाये हुये है। मनमोहन सिंह के बाद प्रणव मुखर्जी भी इसी थ्योरी पर आ गये हैं कि पूंजी ना हो तो देश चल ही नहीं सकता। इसलिये पूंजी का जुगाड़ और फिर उसका बंदरबांट करके पिछड़े सामाजिक क्षेत्र में बांट कर विकसित होते इंडिया के साथ खड़ा करने की अद्भभुत सोच विकसित हो चुकी है।

अभी तक यही माना जाता था कि चूंकि भ्रष्टाचार नौकरशाही का मूलमंत्र है और राजनीति की इमारत इसी जमीन पर खड़ी है
, इसलिये सामाजिक क्षेत्र में जितनी पूंजी आंवटित की जाती है उतनी ही पंचायत स्तर के नेता से लेकर सांसद तक और बीडीओ से लेकर आईएस अफसर तक की जेब भरती है। ऐसे में सुशासन के नारे का मतलब खर्च की जा रही पूंजी से ज्यादा पूंजी का जुगाड़ बाजार से करने का होता है। लेकिन आर्थिक विकास का नये ढांचे में भ्रष्टाचार जैसा कोई शब्द है ही नहीं। क्योंकि नीतियो को लागू कराने से लेकर उसके परिणाम भी जब पूंजी के मुनाफे पर जा टिके हैं तो पूंजी का घपला भ्रष्टाचार नहीं कमीशन या बिचौलियो का हक बन जा रहा है। और इसमें यह मायने नहीं रहता कि देश का मतलब बाजार नहीं बाजार के लिये उत्पादन करने वाला माल होता। जो देश को मजबूत करता है। लेकिन अपनी उत्पादन प्रणाली को विकसित करने से ज्यादा जब मौजूद प्रणाली को भी मुनाफे के लिये दांव पर लगाया जा रहा हो और बाजार में उत्पादन से जुड़ना मूर्खता मानी जा रही हो तब क्या रास्ता बचता है। सिवाय इसके की पूंजी से पूंजी बनाने की सोच नीति का रुप ले लें । औघोगिक विकास के नाम पर देश का खनिज बेच कर लोगों को सरकारी मुआवजे और पैकेज पर टिकाना है या देश के खनिज को बेचने से ज्यादा खनिज के इस्तेमाल से लोगो का विकास करना है । सरकार पहला रास्ता चुन चुकी है।

नयी समझ में कौड़ियों के भाव पड़े खनिज की महत्ता तभी है जब वह अंतर्राष्ट्रीय बाजार से करोड़ों बना ले। उसका मुनाफा भी किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी को ही मिले। या फिर देश की ही कोई कंपनी खनिज संपदा बेच कर खुद को बहुराष्ट्रीय बना ले। देश में सरकार के पास सिर्फ कमीशन ही आये । विकास की समझ सिर्फ मुनाफा बनाने या कमाने भर की नहीं है बल्कि पूंजी के जरीये विकास की कोई भी लकीर खिंची जा सकती है
, संयोग से इसका एहसास भी भ्रष्टाचार से जा जुड़ा है। क्योंकि इसी दौर में विकास के अवरुद्ध होने की वजह पूंजी के बहाव में रुकावट को मान लिया गया। यानी जो बात कभी राजीव गांधी ने कही और अब राहुल गांधी गाहे-बगाहे कहते रहते हैं कि दिल्ली से चला रुपया गांव तक पहुंचते पहुंचते दस पैसे में तब्दील हो जाता है और इसे अगर ठीक कर दिया जाये तो देश के वारे-न्यारे हो सकते हैं।

संभवत विकास की समूची थ्योरी भी इसी दिशा लग चुकी है। जिसमें सरकार मान बैठी है कि जो रुपया दिल्ली से चले अगर वह रुपये की शक्ल में ही गांव तक पहुंचे तो गरीबी छू मंतर हो जायेगी। कूपन के जरीये खाद-बीज अगर पहली पहल है तो दूसरी पहल यूनिक पहचान पत्र के बनते ही हो जायेगी। तब सरकार को बजट में एक मुश्त क्षेत्र विशेष के लिये धन आंवटित नहीं करना पड़ेगा। बल्कि बजट में यही ऐलान होगा कि हर किसान को सालाना बीस या पच्चीस हजार रुपये सरकार दे देगी। पहचान पत्र होगा तो उनके बैकं खाते भी ग्रामीण बैंको में बन जायेंगे। यूं भी बजट में सरकार ने ऐलान कर ही दिया है कि हर दो सौ लोगों के गांव में एक बैंक होगा। चाहे अभी भी पांच सौ गांववालों के बीच स्कूल ना हो। फिर बैंक में निजी कंपनियों को भी आने की हरी झंडी दे दी गयी है । मनमोहन सिंह की आंखों से विकास के इस चेहरे को देखे तो दिल्ली से रुपयों को बांटा जायेगा और बांटी गयी रकम भी सामाजिक क्षेत्र से जुडे हर व्यक्ति के पास सीधे पहुंच जायेगी । और उस रुपये से किसान मजदूर से लेकर पिछड़ा-गरीब सभी झटके में उपभोक्ता की श्रेणी में आ जायेंगे। और इस सीधी पहल से एक रुपये में से
80-85 पैसे बिचौलिये वाली राजनीति-नौकरशाही के खाने का सिलसिला भी खत्म हो जायेगा। और इसी एवज में निजीकरण से पूंजी का जुगाड़ सरकार करेगी । यानी कितना सरल होगा गरीबी और दर्द पर मरहम लगाना। पूंजी पर टिके इस समाजवादी तंत्र का दूसरा हिस्सा भी संयोग से इसी बजट के दौरान उभरा है जो पूंजी से पूंजी बनाने के खेल को सार्वभौम मान्यता दे रहा है। आवारा पूंजी के जरीये शेयर बाजार से पूंजी बनाने का सिलसिला हो या देश के पिछड़े राज्यों में बहुउद्देशीय परियोजनाएं लाने का तमगा दिखा कर खनिज संसाधनो की लूट हो, इसे सरकार की नीतियों ने सर्वमान्य बना दिया है। नयी पहल पूंजी के जरीये बाजार को ही पूंजी में तब्दील करने की हो चली है। मसलन स्पेक्ट्रम बेचने से सरकार के बजट का घाटा पूरा हो जायेगा और वह मुनाफे में जा जायेगी। यह थ्योरी किसी भी अर्थशास्त्री को ठीक लगती है। कहा भी जा सकता है कि हर वह ऐसा चीज जो खुले बाजार के लिये खोली जाये और उससे सरकार को कमाई हो रही है तो वह बुरी क्या है।

लेकिन यही से सवाल देश का पैदा होता है। क्या इस देश में हर क्षेत्र से जुडा हर तबका इतना सक्षम है कि वह स्पेक्ट्रम से लेकर हिमालय तक की बोली लगने के दौरान अपनी उपस्थिति दर्ज करा सके । जाहिर है अंगुलियों पर गिने जा सकते है देश के महानतम पचास औघोगपति-व्यापारी जो कारपोरेट जगत के माहिर खिलाडी हैं और जिनके लिये देश की सीमा कोई मायने नहीं रखती। क्योंकि धंधा देश को नहीं बाजार और उससे जुडे मुनाफे को देखता है। और पूंजी से पूंजी बनाने के हर खेल में यही पचास खिलाड़ी सरकार से कांधा मिलाकर पूंजी को समाजवादी विकास से जोडने की नयी थ्योरी को परिभाषित कर रहे हैं। इसीलिये प्रणव मुखर्जी का बजट अगर सामाजिक क्षेत्र को विकास से जोड़ने के लिये करीब डेढ़ लाख करोड की पूंजी बांटता है तो इसी सामाजिक क्षेत्र से जुडी खेती और खनिज संपदा से लेकर औघोगिक विकास और कंक्रीट इन्फ्रास्ट्रक्चर का ऐसा ढांचा खड़ा करने का न्यौता भी दे रहा है, जहां लोगों से जुडे संसाधनों को अंतर्राष्ट्रीय बाजार में बेचकर दस लाख करोड़ से ज्यादा बनाये भी जा सकते हैं। और करीब दो करोड़ लोगों को जमीन से उजाड़कर मजदूर में तब्दील किया जा सकता है। और यही मजदूर चंद वर्षों बाद गरीब और फिर बीपीएल यानी गरीबी की रेखा से नीचे के परिवारो में शामिल हो जायेंगे । फिर यह सामाजिक मुद्दो के दायरे में आयेंगे और इनके विकास के लिये कभी बजट में पूंजी आंवटित किया जायेगा तो कभी पैकेज के जरीये राहत देकर सामाजवादी होने का राग अलापा जायेगा।

आर्थिक सुधार का यह दायरा यही नहीं रुक रहा। यह थ्योरी आज अगर आंतर्राष्ट्रीय बाजार से मुनाफा कमा रही है तो कल उसी अंतर्राष्ट्रीय बाजार के मुताबिक न्यूनतम जरुरत की वस्तुओं का मूल्य भी निर्धारित करेंगी। महंगाई को लेकर सरकार चीनी
, दाल और चावल को लेकर अगर आज यह कह रही है कि अंतर्ऱाष्ट्रीय बाजर में इनकी कीमतें बढ़ी इसीलिये उनके पास कोई रास्ता नहीं है। तो समझना यह भी होगा कि कल नमक, गेहूं से लेकर आलू और हरी मिर्च तक की कीमत पर भी यही तर्क आ सकते है कि अंतर्रष्ट्रीय बाजार में उनकी कीमतें बढ़ी हैं इसलिये मंहगाई को वह रोक नहीं सकते। हो सकता है उस दौर में भी सरकार की यही थ्योरी चले कि बजट में पूंजी बढ़ा दो। डेढ़ लाख करोड़ की जगह दस लाख करोड़ सामाजिक क्षेत्र में दे दो या फिर किसानों को पचास लाख करोड़ की जगह एक अरब करोड़ का पैकेज दे दिया जाये। आज तो संसद में मंहगाई को लेकर हंगामा बी मच रहा है। लेकिन उस दौर में संसद की बहस भी करोड़ों में बिना बहस बिक जायेगी। जो राजनीतिक दल जितना मजबूत होगा यानी जिसकी संख्या जितनी ज्यादा होगी वह पूंजी को लेकर उतनी ज्यादा सौदेबाजी करेगा। विकसित होते भारत में आर्थिक सुधार की यह धारा पानी के सामान हो चली है जो जगह मिलते ही हर सूखी जमीन को गीली कर देती है और इस जमीन की हद में आये हर भारतीय को या तो मजदूर बनाती है या फिर बीपीएल। क्योंकि आर्थिक सुधार ने खुल्लम-खुल्ला यह ऐलान तो कर ही दिया है कि देश की हर वस्तु की एक कीमत है, जिसे बेचा-खरीदा जा सकता है। जिसके पास पूंजी है वह खरीद लें और मुनाफे के लिये ज्यादा में बेच दे। सरकार का काम निगरानी का है, जिसमें वह सिर्फ यह देखेगी कि खरीद-फरोख्त के लिये बने नियमो को कोई बिना कमीशन तोड़े नहीं। और इस प्रक्रिया में सासंदों के फंड से लेकर विकास को लेकर बनने वाली नीतियों को अमली जामा पहनाने के लिये कारपोरेट जगत की सीधी पहल होगी क्योकि तब पूंजी के आसरे पूंजी बनाना ही राष्ट्रीय नीति हो जायेगी। क्योंकि आखिरकार देश को पूंजी ही चलायेगी, संसद नहीं ।

Tuesday, March 9, 2010

बिन माई-बाप के दो साल से टिकी इस हॉकी टीम को देखिए और समझिए !

मेजर ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम से बाहर निकलती भारतीय टीम के साथ कोई नहीं था । ना कोई अधिकारी। ना कोई सुरक्षाकर्मी। ना किसी न्यूज चैनल का कैमरा। यह वही टीम है जिसके लिये चंद मिनट पहले तक ध्यानचंद स्टेडियम के भीतर पन्द्रह हजार दर्शकों का, लगातार सत्तर मिनट तक की गूंज में सिर्फ एक ही शब्द सुनायी दे रहा था -इंडिया-इंडिया । वही टीम जिस खामोशी से ध्‍यानचंद स्टेडियम से बाहर निकल रही थी और लगभग चुरायी नजरों से स्टिक थामे हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद की प्रतिमा को जरूर देख रही थी। वही ध्यानचंद जिनकी हॉकी को हॉलैंड में तोड़ कर देखा गया था कि कहीं स्टिक में चुंबक तो नहीं है। वही ध्यानचंद, जिसने ना हारने वाले तानाशाह हिटलर की आंखो के सामने ना सिर्फ जर्मनी को 8-1 से रौंद डाला था, बल्कि जर्मनी में बड़े ओहदे के साथ रहने के हिटलर के खुले ऑफर को भी ठुकरा दिया था।


उसी शख्स के नाम पर बने नेशनल स्टेडियम में भारतीय हॉकी को दुबारा जगाने का सपना शायद देश ने अर्से बाद देखा और पाकिस्तान को हराने के बाद शायद भारतीय हॉकी टीम ने भी यही सपना देखा कि वह विश्व चैपियन बनने का दम-खम रखती है। हालांकि शास्त्रीय संगीत से रॉक के हंगामे की तरह हॉकी का समूचा खेल ही बदल गया। जिस दौर में ध्यानचंद खेलते थे जब हॉकी की कीमत
50 रूपये थी । आज वही हॉकी 12 हजार की हो चुकी है। तब लकड़ी की स्टिक होती थी और अब कार्बन की होती है। तब भारत के लिये गोल्ड मेडल कोई मायने नहीं रखता था, जरूरी यह होता था कि विरोधी टीम कोई गोल ना कर दे। वहीं अब समूचा खेल ही डिफेंस पर जा टिका है। कोशि‍श विरोधी का गोल बचाने की होती है। मिट्टी और घास के मैदान पर हुनर की जगह अब रबर के मैदान को गीला कर रफ्तार को मात देने के दम-खम में ही समूची हॉकी सिमट गयी है। लेकिन, बावजूद इसके पाकिस्तान को हराने के बाद जीत का सपना खिलाड़ि‍यों समेत समूचे हिन्दुस्तान ने देखा। मगर सपने देखना और सपनों में ही जीना कितना अलग और कितना खतरनाक है... हश्र सामने है। लेकिन, इसके लिये जिम्मेदार कौन है। जी, बडा सवाल यही है। और इसे समझने के लिये ध्यानचंद स्टे़डियम से बाहर निकलना होगा। दो साल से भारत के राष्ट्रीय खेल हॉकी को संभालने वाली आईएचएफ यानी इंडियन हॉकी फेडरेशन नहीं है।

आईएचएफ ठीक वैसे ही है जैसे क्रिकेट के लिये बीसीसीआई। दो साल पहले आईएचएफ के सचिव ज्योति कुमार कैमरे पर खिलाड़ि‍यों के चयन के लिये घूस लेते हुये पकड़े गये थे। और उसके बाद ही भारतीय ओलंपिक संघ ने आईएचएफ को भंग कर दिया था और केपीएस गिल का साम्राज्य खत्म हुआ था। लेकिन
, इन दो साल में आईएचएफ का चुनाव नहीं हुआ, क्योंकि इसमें घुसने के लिये राजनीति के धुरंधर खिलाड़ि‍यों से लेकर रईसों में ऐसी होड़ मची कि‍ मामला अदालत तक जा पहुंचा। चूंकि आईएचएफ के चुनाव में शिरकत करने के लिये किसी राज्य हॉकी एसोसि‍एशन का अधिकारी होना जरूरी है, तो अधिकारी बनने के लिये लाखों के वारे-न्यारे का खेल शुरू हुआ। मसलन, बंगाल हॉकी एसोसि‍एशन में सहारा के सर्वेसर्वा सुब्रत रॉय के भाई जयव्रत रॉय घुस गये, तो पंजाब हॉकी एसोसि‍एशन में सुखबीर सिंह बादल के बेटे घुस गये। पूर्व हॉकी खिलाड़ियों को इस दशा पर रोना भी आया और आक्रोश भी छलका, तो मामला अदालत तक पहुंचा। लेकिन इन दो वर्षों में भारतीय ओलंपिक एसोसि‍एशन ने एडहोक के तौर पर तत्कालिक व्यवस्था के तहत उत्तर प्रदेश के पूर्व सांसद असलम खान को कार्यभार सौंपकर उनके मातहत पांच खिलाड़ियों को नियुक्त किया। जिसमें अशोक ध्यानचंद, असलम शेरखान, धनराज पिल्लै, अजित पाल सिंह और जफर इकबाल थे। लेकिन आईएचएफ के चुनावों को लेकर जिस तरह राजनीति गरमायी और आईएचएफ पर कब्जा करने की राजनीतिक समझ ने पूर्व खिलाड़ियों को अंदर से इस कदर हिलाया कि एडहोक व्यवस्था के तहत नियुक्त पांचों खिलाड़ियों ने एक-एक कर अपना पिंड छुड़ाना ही सही समझा। और एकएक कर सभी ने इस्तीफा दे दिया।

तंग आकर असलम खान ने भी इस्‍तीफा दिया और उनके बाद हॉकी को देखने के लिये ए.के. मट्टू की नियुक्ति हुई
, जिन्होने खिलाड़ि‍यों को पैसे मिलने, ना मिलने की राजनीति के बीच इस्‍तीफा दे दिया। और फिलहाल हॉकी फेडरेशन को विद्या स्ट्रोक्स देख रही हैं। स्ट्रोक्स वही हैं जिनकी राजनीति को हिमाचल में कांग्रेस भी दूर से सलाम कहती है, लेकिन भारतीय खेल हॉकी को फिलहाल वही सलाम कर रही हैं। लेकिन, हॉकी की दुर्दशा यही नहीं रुकी। अगर हॉकी के पास क्रिकेट सरीखा बीसीसीआई नहीं था, तो खिलाड़ियों को चुनने का कोई पैमाना भी नही था। किक्रेट में रणजी के जरि‍ये हर राज्य से खिलाड़ी भारतीय टीम तक पहुंचते हैं, लेकिन बीते दो सालों में हॉकी को कोई मैच राज्य या राष्ट्रीय स्तर पर हुआ ही नहीं। रंगास्वामी टूर्नामेंट तक नहीं हुआ। यानी इन दो सालो में हॉकी को लेकर किसी स्तर पर कोई खेल देश में हुआ ही नहीं। यानी जो टीम दो साल पहले थी उसमें देश के किसी हिस्से से कोई नया खिलाड़ी नहीं जुड़ा। इसलिये जब शिवेन्द्र पर दो मैच का बैन लगा, तो विकल्प के तौर पर घायल दीपक ठाकुर को खिलाने के अलावा और कोई चारा नहीं रहा। और संदीप को सिर्फ पेनल्‍टी कॉर्नर एक्सपर्ट के तौर पर ही लगातार खिलाया जाता रहा, चाहे उनकी डिफेन्स में बार-बार सेंध लगी। यानी टीम, जो एक योजना के तहत तैयार होती है वह गायब हो गयी और मैदान पर हर खिलाड़ी अपना दम-खम दिखाता नजर आया। बोर्ड नहीं, मैच नहीं, तो टीम को संभाले कौन, इसके लिये कोच को ही सब कुछ मान लिया गया।

लेकिन इन्ही दो सालो में हॉकी टीम के कोच बनाने और हटाने का सिलसिला भी खिलाड़ियों की संख्या सरीखा ही हो गया। करीब बारह कोच इस दौर में बदल दिये गये। और दुर्दशा यही नहीं रुकी बल्कि वि‍श्व कप हॉकी के लिये जब कोच का सवाल उठा
, तो एथलेटिक्स की समझ रखने वाले सुरेश कलमाडी को यही समझया गया कि स्पेन के जोएश ब्रासा को कोच बनाया जा सकता है, क्योंकि उन्होंने स्पेन जैसी टीम को विश्व विजेता बनाया है। लाखों रुपये देकर ब्रासा को भारतीय हॉकी टीम का कोच भी बना दिया गया। लेकिन, ब्रासा की नियुक्ति के बाद पता चला कि वह पुरुष नहीं बल्कि महिला हॉकी टीम के कोच रहे हैं। निजी तौर पर स्पेन के दो पुरुष किलाडियो के कोच जरुर रहे है। शायद वजह भी यही रही कि स्पेन के ट्रम्प कार्ड पाबलो अमत को कवर करने के लिये कोई भारतीय खिलाड़ी मैदान में नहीं था। अब सवाल है कि हॉकी में कभी नं.-एक की टीम की रैकिग जब 12 है तो इस स्थिति के बावजूद भारत में विश्वकप का आयोजन क्यों हो रहा है। तो, इसका फैसला फेडरेशन ऑफ इंटरनेशनल हॉकी करता है। अगर मेजबानी का मामला अटक जाये तो एफआईएच के अध्यक्ष की सुनी जाती है। और संयोग से फेडरेशन के प्रेसिडेंट नेयाग्रे ने खासतौर पर इस बार हॉकी को भारत में कराने की पेशकश के पीछे यही तर्क दिया था कि ध्यानचंद का सुनहरा इतिहास भारत के साथ जुड़ा है और भारत में हॉकी जाग जाये तो हॉकी के भी वारे-न्यारे हो सकते हैं, इसलिये विश्वकप भारत में कराकर उस सुनहरे इतिहास को भी जगाने का मौका भारत को मिलेगा।

चूंकि विश्वकप हॉकी आफिशियल टूर्नामेंट है
, इसलिये इसमें शामिल होने वाली टीमों का खर्चा मेजबान को उठाना नहीं पड़ता है, जो भी टीम खेलती है उसे अपना धन खर्च करना पड़ता है यानी हवाई किराये से लेकर सेंकाई के बर्फ तक का खर्च हर देश को खुद ही उठाना पड़ता है। ऐसे में एफआईएच ने यह भी माना गया कि क्रिकेट के जरि‍ये विश्व बाजार बना भारत हॉकी के खिलाड़ि‍यों का भी जीर्णोद्धार हो सकता है। लेकिन, इंग्लैड से हारकर मेजर ध्यानचंद स्टेडियम के बाहर जिस तरह खमोशी के साथ चुरायी नजरो से हॉकी टीम के खिलाड़ी ध्यानचंद की प्रतिमा को देखते हुये बस में सवार हो रहे थे..... यही लगा कि इंडिया-इंडिया की गूंज करने वाला भारत कब समझेगा राष्ट्रीय खेल सिर्फ नारों और सपनों से नही बचता, इसके लिये देश को जुटना पड़ता है, ध्यानचंद संघर्ष के दौर में निकले थे। लेकिन, उनकी मौत एम्स के जनरल वार्ड में हुई और इलाज कर रहे डॉक्टर की उनकी मौत पर पहली टिप्पणी यही थी, हॉकी मर गया ।

Friday, March 5, 2010

मीडिया को कठघरे में रखती एक कविता, गौर कीजिए...

बंधु....जो हालत और हालात देश के हैं, वैसे में अक्सर हम जैसे बहुत कुछ कहना-लिखना चाहते हैं। लेकिन कभी चंद लाइने हमारे बहुत-कुछ कहे या लिखे से आगे की बात कह जाती हैं। कभी मेरी सहयोगी रही ऋचा साकले ने मुझे यह कविता भेजी...तो मुझे लगा यह तो हम सभी को पढ़नी चाहिये.......खासकर कलमगिरी करने वालों को....जरा पढ़ें फिर गौर करें।

उनवान- सहाफ़ी से (शीर्षक- पत्रकार से)

क़ौम की बेहतरी का छोड़ ख़याल, (देश की उन्नति का विचार छोड़ दे)

फिक्र-ए-तामीर-ए-मुल्क दिल से निकाल, (राष्ट्र निर्माण की चिन्ता छोड़ दे)

तेरा परचम है तेरा दस्त-ए-सवाल, (तेरे बैनर पर ही प्रश्न चिन्ह है)

बेज़मीरी का और क्या हो मआल (गिरने की क़ीमत क्या होनी चाहिए)

अब क़लम से इज़ारबंद ही डाल (अपनी लेखनी से बस नाड़े ही पिरो)

तंग कर दे ग़रीब पे ये ज़मीन, (निर्धनों पर अत्याचार में हाथ बंटा)

ख़म ही रख आस्तान-ए-ज़र पे जबीं, (धनपशुओं के आगे नमन करता रह)

ऐब का दौर है हुनर का नहीं, (ये समय बुराइयों का है योग्यता का नहीं)

आज हुस्न-ए-कमाल को है जवाल (तेरी यही योग्यता साबित करने का समय है)

अब क़लम से इज़ारबंद ही डाल

क्यों यहाँ सुब्ह-ए-नौ की बात चले, (किसलिए नई भोर की बात करोगे)

क्यों सितम की सियाह रात ढले, (क्यों तुम अत्याचार की रात की बात करोगे)

सब बराबर हैं आसमान के तले, (तुमने मान लिया है कि सब अच्छा है)

सबको रज़ाअत पसंद कह के टाल (सबको एडजस्ट करने वाला कहता रह)

अब क़लम से इज़ारबंद ही डाल

नाम से पेशतर लगाके अमीर, (अपने काम के बजाय अपनी औक़ात को धार दे)

हर मुसलमान को बना के फ़क़ीर, (हर ईमानदार को कमज़ोर बनाकर)

क़स्र-ओ-दीवान हो क़याम पज़ीर, (हर हाल में महल और पद हासिल कर ले)

और ख़ुत्बों में दे उमर की मिसाल (और सिर्फ़ बयान में ख़लीफ़ा उमर फ़ारूक़ की मिसाल दे)

अब क़लम से इज़ारबंद ही डाल

आदमीयत की हमनवाई में, (मानवता का साथ देने के ढोंग में)

तेरा हमसर नहीं ख़ुदाई में, (कोई तुझसा नहीं भगवान का दावा करने में)

बादशाहों की रहनुमाई में, (सत्ताधारियों के तलवे चाटने में)

रोज़ इस्लाम का जुलूस निकाल (रोज़ धर्म का नाटक रच)

अब कलम से इज़ारबंद ही डाल

लाख होंठों पे दम हमारा हो, (फिर भी बात अवाम की ही करना)

और दिल सुबह का सितारा हो, (ये दिखाना के जिस सुबह की तू बात करता है वो आएगी)

सामने मौत का नज़ारा हो, (सम्मुख मौत बंट रही हो तब भी)

लिख यही ठीक है मरीज़ का हाल (यही कहना मानवता सुरक्षित है)

अब कलम से इज़ारबंद ही डाल (अपनी लेखनी से बस नाड़े ही पिरो)

- हबीब जालिब, पाकिस्तान

(1928- 1993)