Friday, February 12, 2016

सपने जगाती राजनीति का एक बरस

एक बरस केजरीवाल

मई 2014 में विकास का मंत्र नरेन्द्र मोदी ने फूंका तो पीएम बन गये । नौ महीने बाद स्वराज का मंत्र अरविन्द केजरीवाल के फूंका तो फरवरी 2015 में दिल्ली के सीएम बन गये । और नवंबर 2015 में सामाजिक न्याय का मंत्र लेकर नीतीश कुमार निकले तो बिहार की गद्दी से उन्हे कोई उखाड़ ना सका । तो देश के सामने तीनों मंत्र फेल है या फिर देश अब भी राजनीतिक विकल्प के लिये भटक रहा है । जाहिर है यह सवाल तब कही ज्यादा मौजूं हो चला है जब केजरीवाल की सत्ता के एक बरस पूरे हो रहे है । तो आंदोलन से संसदीय राजनीति को हिलाने वाले केजरीवाल की राजनीतिक सत्ता के एक बरस पूरे होने पर कई सवाल हर जहन में उठेंगे । जहन में उठेगा ठीक एक बरस पहले । इतिहास रचते हुये इतिहास बदलने की आहट समेटे जनादेश । जहन में उठेगा ताज उछालने और तख्त गिराने का जनादेश ।

भारत की राजनीति में विकल्प की आहट समेटे दिल्ली का जनादेश जिसने संकेत यही उभारे कि आने वाले वक्त में सत्ता सेवक होगी। सेवक सरोकार की सत्ता को महत्ता देंगे । और सरोकार उस स्वराज से उपजेगा जिसमें सत्ता और सडक के बीत वाकई जनपथ होगी । जिसपर चलते हुये आम आदमी आजादी की दूसरी लडाई को अंजाम देगा । पूंजी की सत्ता पर टिकी राजनीति बदलेगी । चुनाव लड़ने के तौर तरीके बदलेंगे । यह सपने दिल्ली ने जगाये । इन सपनों को अन्ना हजारे ने पंख दिये । तो अरविन्द केजरीवाल ने जनादेश के आसरे सत्ता की उड़ान भरी । लेकिन बरस भर पहले की यह आहट बरस भर में कहां कैसे और क्यों थम गई । बरस भर पहले का एहसास इंडिया की हथेली पर रेंगती राजनीति के तौर तरीको को बदलने वाला था । और बरस भर बाद का एहसास दिल्ली में सिमटे भारत की न्यूनतम जरुरतों को पूरा करने की ही जद्दोजहद में जा फंसा । बरस भर पहले का सियासी पाठ पूंजी में कैद नागरिकों के अधिकारो को दिलाने का था । तब नारा स्वाराज का था । और बरस भर बाद पूंजी ही सत्ता की जमीन बन गई । तो नारा एक साल बेमिसाल पर आ टिका । और बेमिसाल बनने की यात्रा में जिन फैसलों ने कंधा दिया उनमें योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण को पार्टी से निकालकर अपने चेहरे को बदलना भी था । पार्टी कैडर को प्रशासन चलाने में रोजगार देना भी था । खुद भ्रष्ट ना होने की एवज में
अपना ही वेतन बढ़ाना भी था । वोट बैंक को सत्ता तले महफूज कराना भी था । और -ईमानदार होने की अपनी परिभाषा तले गढ़ना भी था । जिससे अपने भ्रष्ट मंत्री ही कभी शहीद नजर आये तो कभी खुद के फैसले को ही ईमानदार करार देने पर फ्रक महसूस किया जा सके । और बरस भर में कही किसान, तो कही सिपाही ,तो कहीं मुस्लिम तो कहीं दलित के मुद्दों की ताप तले खुद को खड़ा कर विकल्प की राजनीति को वोट बैक तले दफन करने की सोच भी जागी । जिसने कभी ममता बनर्जी , तो कभी नीतिश कुमार का हाथ थामा तो कभी लालू यादव से गले मिलकर हाथों में हाथ थामने को झटका भी नहीं और परहेज से इंकार भी किया । यानी
बरस भर बाद यानी आज आम आदमी पार्टी उसी कतार में खड़ी नजर आ रही है जिसे बरस पूरा होने पर विज्ञापन बांटने है । इंटरव्यू से अपनी सफलता बतानी है । संपादकों को भोज देकर खुश करना है । तो क्या 10 फरवरी 2015 के जनादेश का फैसला अब सत्ता के रंग में रंग चुका है । या फिर केजरीवाल के कई निर्णयों ने उस संसदीय राजनीति को आईना दिखा दिया जो आवारा पूंजी के आसरे ही देश को चलाना महत्वपूर्ण मानती रही । क्योंकि मोहल्ला क्लीनिक का निर्माण सस्ते में पुल बनाकर उससे बचे धन से मुफ्त दवाईयां बांटना , 700 लीटर पानी मुफ्त देना ,400 यूनिट बिजली पर आधा बिल लेना, न्यूनतम मजदूरी दुगुना कर देना , लेबर लॉ का उल्लंघन की सजा बढ़ाकर पांच बरस जेल और 50 हजार तक कर देना , जनता की मांग पर बीआरटी कारिडोर तोड़ देना , पर्यावरण के लिये ग्रीन टैक्स लेना , स्कूल में एडमिशन पारदर्शी बनाने के लिये स्कूल प्रबंधन के रैकेट को तोड़ना ।

यानी पहले बरस के यह ऐसे निर्णय है जो वेलफेयर स्टेट की सोच को पुनर्जीवित करते है । यानी निजीकरण के दौर में जब यह सवाल बड़ा हो रहा है कि शिक्षा से लेकर हास्पिटल तक और पीने के पानी से लेकर रोजगार तक तो निजी हाथो में है तब कोई भी सरकार सिवाय पूंजी पर टिके सिस्टम को सुरक्षा देने या नीतिगत फैसलों से पूंजी लगाने वालो को मुनाफा कमाने के लिये माहौल तैयार कराने के अलावे और क्या कर क्या सकती है । सीधे समझे तो उपभोक्ताओं के लिये बेहतरीन बाजार के अलावे आर्थिक सुधार के अलावे दूसरी कोई सोच भी नहीं है । इसीलिये विकास शब्द भी पूंजी पर जा टिका है । और दिल्ली में भी जब किसी योजना को लेकर सवाल पूंजी का आया तो केजरीवाल फेल हो गये । क्योंकि वादे के बावजूद 20 कालेज खोलना और पूरे शहर में सीसीटीवी लगाने के लिये पूंजी चाहिये । और केजरीवाल पूंजी के जरीये विकास के मोर्चे पर फेल है तो सालभर बाद भी ना कॉलेज खुल पाये ना सीसीटीवी लग पाये । लेकिन न्यूनतम जरुरतों को पूरा करने के लिये विकास शब्द या उसके नाम पर पूंजी नहीं बल्कि सामाजिक जागरुकता चाहिये । और देश की राजनीतिक सत्ता अगर इसी मोर्चे पर फेल हो रही है । तो केजरीवाल इसी मोर्चे पर कांग्रेस या बीजेपी पर भारी लगते है । लेकिन समझना यह भी होगा कि दिल्ली सामाजिक सरोकार पर कम और रोजगार पाने वाले शहर की सोच पर ज्यादा टिकी है । यानी यहा किसी भी दूसरे राज्य सरीखा सामाजिक सरोकार नहीं है । जिसकी गांठों में फंसकर बीजेपी बिहार चुनाव गंवा देती है और दिल्ली में विकास की उस लकीर पर चलना चाहती है जो न्यूनमत का संघर्ष करने वालो के ऊपर खिंचा जाता हो । इसलिये बरस भर में भी कई केजरीवाल ने खुद को छोटा-आम आदमी ही बताया । लेकिन केजरीवाल के बरस भर की सियासत देश के लिये वैसी ही सोच है जैसे गुजरात माडल देश का मॉडल नहीं हो पाया । तो केजरीवाल की दिल्ली की समझ भी राष्ट्रीय नेता नहीं बना सकती । लेकिन नेता के ईमानदारी को लेकर बोल हर किसी को जंचते है । इसीलिये केजरीवाल बरस भर में दर्जनो बार यह कहने से नहीं हिचकते कि दिल्ली में भ्रष्टाचार नहीं होगा। लेकिन भ्रष्टाचार के आरोप लगने पर उसे कैसे अपने पल्ले से झाड़ना आना चाहिये यह हुनर जरुर बीते एक बरस में नजर भी आया । क्योंकि केजरीवाल के मंत्री तोमर फर्जी मार्कर्शीट में फंसे तो दूसरे मंत्री असीम अहमद पैसे के लेनदेन के स्टिंग में फंसे। और केजरीवाल ने दोनो मामलों में बड़े हुनर के साथ पल्ला झाडा । लेकिन इसी एक बरस में दो दाग ने बडी तीखी सियासत भी जगायी और सियासत को मरता हुआ भी देखा । मसलन बीते साल 22 अप्रैल को दौसा के किसान गजेन्द्र ने जंतर मंतर पर आम आदमी पार्टी की रैली के दौरान खुदकुशी की तो सवाल आम आदमी पार्टी के नेताओँ की संवेदनहीनता पर भी उठे
और 15 दिसंबर को अरविंद केजरीवाल के प्रधान सचिव राजेन्द्र कुमार के दफ्तर पर छापा पड़ा तो सवाल सीएम की साख पर भी उठे। और तोता बन चुके सीबीआई कैसे राजनीतिक सत्ता का हथियार है इसे भी सियासी ढाल बनाया गया । गजेन्द्र किसान को नहीं बचाया जा सका और फिर दिल्ली पुलिस और आम आदमी पार्टी के नेताओं के बीच जमकर आरोप-प्रत्यारोप का खेल हुआ। अब दिल्ली पुलिस ने आज आप नेता संजय सिंह, कुमार विश्वास, भगवंत मान और आशीष खेतान को जांच में हिस्सा लेने के लिए ठीक साल पूरा होने के वक्त ही तलब कर रही है । उधर, दिल्ली हाईकोर्ट ने सीबीआई को इस बात का अधिकार दे दिया है कि वह मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के प्रधान सचिव राजेंद्र कुमार के दफ्तर पर मारे गए छापे के दौरान जब्त दस्तावेजों को अपने पास रख सके। यानी हर मुद्दे का सियाकरण और हंगामा बरस भर दिल्ली को एक ऐसी पहचान भी दे गया, जहां दिल्ली सियासत के आगे देश की सियासत भी छोटी दिखायी दी । इसीलिये 70 सीटों में 67 जीत जीतने वाले केजरीवाल के 70 वादो की फेरहिस्त में कितने पूरे हुये कितने नहीं यह सवाल छोटा पड गया और यह सवाल बड़ा होता चला गया कि दिल्ली देश की सियासत में वाकई विकल्प है या हुडदंग । क्योंकि बरस भर
में आम आदमी पार्टी या कहे केजरीवाल वहीं चूके जिस जमीन पर खडे होकर वह राजनीति सत्ता के लिये कूदे . क्योंकि सत्ता पाने के बरस भर बाद भी स्वराज बिल पास हुआ नहीं और लोकपाल बिल पास होकर भी अटका हुआ है ।


Monday, February 8, 2016

क्या पाकिस्तान सिर्फ टैरर ही नहीं फेल स्टेट भी है

अगर हेडली सही है तो पाकिस्तानी सत्ता के लिये लश्कर भारत के खिलाफ जेहाद का सबसे मजबूत ढाल भी है और विदेश कूटनीति का सबसे धारदार हथियार भी । अगर हेडली सही है तो पाकिस्तानी सेना की ट्रेनिंग , विदेश मंत्रालय की मदद और खुफिया एजेंसी आईएसआई के बनाये रास्ते ही भारत के खिलाफ पाकिस्तानी सिस्टम है । जिसके आसरे पाकिस्तानी सत्ता एक तरफ आतंक को कानूनी जामा पहनाता है यानी भारत के खिलाफ आतंकी संगठनों को बेखौफ बनाता है तो दूसरी तरफ आंतकवाद पर नकेल कसने के लिये भारत के साथ खडे होने की दुहाई देता है ।

याद कीजिये 20 जून 2001 में जनरल मुशर्ऱफ सत्ता पलट के बाद पाकिस्तान के सीईओ से होते हुये राष्ट्रपति बनते हैं । 13 दिसंबर 2001 को भारत की संसद पर लश्कर-जैश मिलकर हमला करते है । हमले के बाद प्रधानमंत्री वाजपेयी आर पार की लडाई का एलान करते हैं । और मुशर्ऱफ एक तरफ आतंकवादियों पर कार्रवाई का जिक्र करते है । लेकिन अगर हेडली सही है तो 2002 में लश्कर मुखिया हाफिज सईद पर कोई रोक नहीं लगी । क्योंकि पीओके के मुज्जफराबाद में हाफिज सईद की तकरीर सुनकर ही हेडली लश्कर का दीवाना होता है । यानी हाफिज सईद की खुली तकरीर पाकिस्तना में जारी रही । अगर ह  ली सही है तो पाकिस्तानी सत्ता ने ही हाफिज सईद को बचाने के लिये लशकर की जगह जमात-उल-दावा बनवाया । क्योकि जिस दौर में जमात बनती है उसी दौर में लश्कर के पीओके के ट्रनिंग कैप में हेडली ट्रेनिंग भी लेता है ।

अगर हेडली सही है भारत के खिलाफ पाकिसातनी सेना और आईएसआई के विंग के तौर पर ही लश्कर काम करता है । क्योंकि हेडली को लश्कर के साथ जो़डने से लेकर भारत में मुंबई हमले की बिसात बिछाने में पाकिसातनी सेना के रिटायर मेजर अब्दुर रहमान पाशा ,मेजर साबिर अली ,मेजर इकबाल सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं । अगर हेडली सही है तो पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय को भी पाकिस्तानी सत्ता हेडली के लिये काम पर लगाती है । क्योकि इसी दौर में अमेरिका में पाकिस्तानी एंबेसडर की नियुक्ती सेना के रिटायर फौजियों की होती है । 2004-06 में जनरल जहांगीर करामत तो , 2006-08 में मेजर जनरल महमूद अली दुर्रानी अंबेसडर बनते हैं । इसी वक्त दाउद गिलानी से डेविड कोलमैन हेडली का जन्म होता है। और फर्जी पासपोर्ट बनवाने से लेकर भारत भिजवाने के काम में पाकिस्तानी सत्ता का सिस्टम काम करता है । और इसी दौर में हेडली अमेरिका से भारत कई बार रेकी के लिये आता है । और महफू  लौटता है । अगर हेडली सही है तो फिर पाकिस्तान में मुशर्रफ के बाद भी चुनी हुई सरकार के लिये भी भारत के खिलाफ आतंकी हमला कूटनीति और रणनीति दोनो का हिस्सा था। क्योंकि मार्च 2008 में ही पीपीपी के युसुफ रजा गिलानी प्रधानमंत्री बनते है तो सितंबर में जरदारी राष्ट्रपति बनते है । और हेडली के मुताबिक सितंबर 2008 में भी लश्कर के आंतकवादी भारत में घुसने का प्रयास करते है ।

और अक्टूबर 2008 में भी समुद्र के रास्ते भारत में घुसना चाहते है । यानी 26 नवंबर 2008 को हमले
से पहले पाकिस्तानी सेना बार बार आतंकी हमले का प्रयास करवाती है । तो हमले के बाद पाकिसातन की सत्ता भारत के हर सबूत को खारिज कर देता है । तो सवाल यही है अगर हेडली सच बोल रहा है तो हेडली पाकिसतान का मुखौटा बना रहा । और अब अगर नवाज शरीफ कहते है कि हालात बदल गये है तो लगता यही है कि मुखौटा बदला है रणनीति या कूटनीति नहीं । क्योंकि याद कीजिये मुबंई हमलों के तुरंत बाद नवंबर 2008 में ही पाकिस्तान के सूचना मंत्री रहमान मलिक खुले तौर पर कहते है कि वह आतंक पर नकेल कस रहे है । भारत के सबूत बगैर अपनी जांच को तेज कर रहे है । कई गिरफ्तारियां भी की है . और आठ बरस बाद पठानकोट हमले के बाद पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता काजी खलीउल्लाह भी खुले तौर पर कहते है वह आतंक पर नकेल कस रहे हैं। सबूत के बगैर भी जैश के कैडर की घर पकड कर रहे है । जैश के तीन आंतकवादियो को गिरफ्तार भी किया है ।

यानी पाकिस्तान को लेकर भारत कैसे चक्रव्यूह में फंस रहा है यह डेविड कोलमैन हेडली की गवाही के बाद नये सिरे से पैदा हो रहा है । क्योंकि मुंबई पर हमला करने वाला फिदायिन कसाब जिन्दा पकड़ में आया । उसने लश्कर से ट्रनिंग लेने और लश्कर के कमांडर जकीउर्र रहमान लखवी का नाम लिया । मुंबई हमले के लिये रास्ता बनाने वाला डेविड कोलमैन हेडली ने गवाही में लश्कर की ट्रेनिंग और लश्कर के चीफ हाफिज सईद का नाम लिया । और हाफिज सईद फिलहाल पाकिस्तान में आजाद नागरिक है । लखवी को अदालत से जमानत
मिल चुकी है । यानी वह भी आजाद है । तो अगला सवाल यही है कि पाकिसान अगर पहले फिदायीन कसाब को अपना नहीं मानता । और अब हेडली के कबूलनामे को सच नहीं मानता । तो पाकिस्तन को लेकर भारत का रास्ता जाता किधर है । क्योकि हेडली से तो कल भी पूछताछ होनी है और तब अगर 26/11 के जरीये आतंकवाद पाकिस्तान की स्टेट पालेसी के तौर पर सामने आती है । तब भारत क्या करेगा। क्योंकि कश्मीर के जरीये आंतक को आजादी का संघर्ष एक वक्त मुशर्ऱफ ने भी कहा और याद किजिये तो पिछले दिनों नवाज शरीफ ने संयुक्त राष्ट्र में भी कहा । यानी कश्मीर नीति पाकिस्तान की स्टेट पालेसी है । और कश्मीर नीति का मतलब आंतकवादी संगठनो को पनाह देना है । यानी भारत पर होने वाले हर आतंकी हमलो से पाकिस्तानी सत्ता खुद को अलग बतायेगी । और आतंक का मुद्दा अंतर्राष्ट्रीय मंच पर उठाकर भारत को अपने साथ खड़े होने का दबाब बनाती है । यानी शिमला समझौते से लेकर लाहैौर घोषणापत्र और अब पठानकोट हमले के बाद जैश-ए मोहम्मद पर कार्रवाई का भरोसा । हर हालात में पाकिस्तान ने अगर आंतक पर नकेल कसने के लिये सिवाय खुद को आतंक से हटकर बताने के अलावे कुछ नहीं किया और डेविड कोलमैन हेडली अगर आंतकी संगठनो और पाकिसातन के हर पावर सेंट के तार को अपनी गवाही में जोड रहा है तो फिर अगला सवाल यह भी हो सकता है कि बातचीत कभी मुश्रऱफ से हुई या अब नवाज शरीफ से हो रही है । भारत के हाथ में आयेगा क्या । क्योकि हेडली की गवाही ने भारत के सामने दोहरा संकट पैदा किया है । पहला पाकिस्तान में चुनी हुई सरकार की राजनीतिक जरुरत आंतकी संगठन है । दूसरा आतंकी संगठन बेफिक्र ह  र अपने काम को अंजाम दे यह सत्ता की जरुरत है ।तो नया सवाल भारत के सामने यह नहीं है कि पाकिस्तान एक टैरर स्टेट है बल्कि नया सवाल यह है कि पाकिस्तान अगर एक फेल स्टेट है तो भारत क्या करें । और शायद मौजूदा वक्त में यही सबसे बडी चुनौती मोदी सरकार के सामने भी है ।

Friday, February 5, 2016

अब देश का कंधा नहीं सत्ता का धंधा देखें

दलित, किसान और अल्पसंख्यक । तीनों वोट बैक की ताकत भी और तीनों हाशिये पर पड़ा तबका भी । आजादी के बाद से ऐसा कोई बजट नहीं । ऐसी कोई पंचवर्षीय योजना नहीं , जिसमें इन तीनो तबके को आर्थिक मदद ना दी गई हो और सरकारी पैकेज देते वक्त इन्हे मुख्यधारा में शामिल करने का जिक्र ना हुआ हो । नेहरु को भी आखिरी दिनों [ 1963-64 ] में किसानों के बीच राजनीतिक रैली के लिये जाना पड़ा और लालबहादुर शास्त्री ने तो जय जवान के साथ जयकिसान का नारा लगाया। पटेल से लेकर मौलाना कलाम तक मुस्लिमों को हिन्दुस्तान से जोड़ते हुये उन्हे उनके हक को पूरा करने का वादा करते रहे । आंबेडकर से लेकर वीपी सिंह तक दलितो के हक के सवालों को उठाते रहे । साधते रहे । तो मौजूदा वक्त में प्रधानमंत्री मोदी अगर किसान रैली की तैयारी कर रहे हैं और राहुल गांधी दलित अधिवेशन करना चाह रहे है तो कई सवाल एक साथ निकल सकते है । पहला , क्या देश को देखने का नजरिया अभी भी जाति , धर्म या किसान-मजदूर में बंटा हुआ है । दूसरा , राजनीतिक मलहम में ऐसी कौन सी खासियत है जो सियासत को राहत देती है लेकिन समाज को घायल करती है । तीसरा, अगर हिन्दू राष्ट्र की सोच तले मुसलमान खुद को असुरक्षित मानता है तो फिर बढती विकास दर के बीच भी किसानो की खुदकुशी अगर बढ़ती है । गरीबो के हालात और बदतर होती जाती है । तो फिर यह सवाल क्यों नहीं उठ पाता कि सांप्रदायिकता हो या अर्थ नीति दोनो में ही अगर नागरिकों की ही जान जा रही है तो फिर सवाल हिन्दू-मुस्लिम या गरीब-बीपीएल में क्यों उलझा दिया जाता है ।

यानी अपराध है क्या और देश के विकास के लिये कौन सा मंत्र अपनाने की जरुरत है । इस पर संविधान कुछ नहीं कहता या फिर राजनीतिक सत्ता पाने के तौर तरीको ने संविधान को भी हड़प लिया है ।  क्योंकि जिस रास्ते पर मौजूदा राजनीति चल रही है अगर इसके असर को ही देख लें तो दलित उत्पीड़न के मामले बीते तीन बरस में ही पचास फिसदी बढ़ गये । 2012 में 33,655 मामले दलित उत्पीडन के थे । तो 2015 में यह आंकडा 50 हजार पार कर गया । किसानों की खुदकुशी में भी तेजी आ गई । सिर्फ 2015 में ही हर दो घंटे एक किसान देश में खुदकुशी करने लगा । करीब साढे चार हजार किसानो ने खुद को इसलिये मार लिया क्योंकि जिन माध्यमों से उन्होंने पैसा लेकर खेती की । वह पैसा लौटाने की स्थिति में वह नहीं थे । और कर्ज बढता जाता । कर्ज लौटाने की धमकी को सहने की ताकत उनमें थी नहीं तो खुदकुशी कर ली । खुदकुशी करने वाले बारह सौ किसानो ने ग्रामीण बैक से कर्ज लिया था । यानी साहूकारी या दूसरे निजी माध्यम उनके बीच नहीं थे । बल्कि खुद सरकार ही थी । उसी का तंत्र था । वही तंत्र जो बैंकों के जरीये कारपोरेट और बडी कंपनियों को करीब तेरह लाख करोड़ दे चुका है और वह आजतक लौटाया नहीं गया । और एनपीए की यह रकम लगातार बढ़ ही रही है।  इससे हटकर सरकार ही औद्योगिक संस्थानों या कारपोरेट सेक्टर को हर बरस अलग अलग टैक्स में ही तीन लाख करोड़ माफ कर देती है । लेकिन खेती और उससे जुडे संस्थानो पर दो लाख करोड़ की सब्सिडी सरकार को भारी लगती है । इसी तर्ज पर अलग दलित और मुस्लिमों के आर्थिक-सामाजिक हालात को परख लें तो हैरत होगी कि सांप्रदायिक हिंसा में 70 फिसदी मौत अगर इस तबके की हुई तो देश में दरिद्रता की वजह से होती मौतों में दलित आदिवासी और मुस्लिमों की तादाद 90 फिसदी के पार है । तो अगला सवाल कोई भी कर सकता है कि क्या हिन्दुस्तान का मतलब सिर्फ वहीं 12 से 20 फीसदी है जिसकी जेब में जीने के सामान खरीदने की ताकत है । जिसके पास पढने के लिये पूंजी है ।

जिसके पास इलाज के लिये हेल्थ कार्ड है । कह सकते है हालात तो यही है । क्योंकि मौजूदा वक्त में किसी राज्य के पास किसानों के लिये कोई नीति नहीं है । दलित उत्पीड़न रोकने की कोई सोच नहीं । हिन्दू-मुस्लिमों के सवाल को साप्रदायिक हिंसा के दायरे से बाहर देखने का नजरिया नहीं है । क्योंकि सत्ता पाना और सत्ता में टिके रहने का हुनर ही अगर गवर्नेंस है तो हर की हालत एक सरीखी है । चाहे वह सरकार कर्नाटक में कांग्रेस की हो या फिर गुजरात झारखंड, महाराष्ट्र,हरियाणा , छत्तीसगढ और मध्यप्रदेश में बीजेपी की । या फिर आंधप्रदेश में चन्द्रबाबू नायडू की या तेलगांना में केसीआर की । या फिर उडिसा में नवीन पटनायक की या यूपी में अखिलेश यादव । हर राज्य में सूखा है । आलम यह है कि देश के 676 जिले में ले 302 जिले सूखाग्रस्त है । और इनकी पहचान उस शाईनिग इंडिया की सोच से बिलकुल अलग है जो हर राज्य का सीएम राजधानी में बेठकर देखना चाहता है । बारिकी को समझे तो हर सीएम चकाचौंध खोजने के चक्कर में गांव और किसान को अंधेरे में ढकेल रहा है । यही वजह है कि न्यूनतम जरुरत पूरी करने के लिये बनाये गये कार्यक्रम मनरेगा और खाद्द सुरक्षा मौजूदा वक्त में इतना महत्वपूरण हो गया है कि सुप्रिम कोर्ट को भी कहना पड रही है कि इसे लागू क्यो नहीं
किया गया । मुश्किल इतनी भर नहीं है कि 2013-14 में जो कृर्षि विकास दर 3.7 फिसदी थी । वह 2014-15 में घटकर 1.1 फिसदी हो गई । मुश्किल यह है कि एक तरफ वित्त मंत्री देश की विकास दर 8 से 9 फिसदी तक पहुंचाने को बेहद आसान मान रहे है । तो दूसरी तरफ भारत सूखे की वजह से जमीन के नीचे पानी इतना कम हो गया है कि हैडपंप की बिक्री में 30 पिसदी की कमी आ गई है । टैक्टर की बिक्री में 20 फिसदी की कमी आ गई है 20 फिसदी किसान मजदूर का पलायन बढ गया है । जो किसान गांव में है वह हार्ट्रीकल्चर और पेड लगाने के काम से जा जुडे है । यानी काम वहा भी कम हो रहा है । दूसरी तरफ शहरो में मजदूरो के बढते बोझ ने उनकी मजदूरी को स्थिर कर दिया है । यानी न्यूनतम मजदूरी में कोई वृद्दि नहीं है । और हर राज्य सरकार का रुख भी उस इक्ननामी पर जा टिका है जो अपनी जमीन , अपने मानव संसाधन और अपने उत्पाद से दूर हो । यानी विदेशी निवेश के जरीये शहरी इन्फ्रास्ट्रक्चर की प्रथमिकता तले ही बेहाल भारत की यह तस्वीर उभर रही है । तो फिर गडबडी महज सिस्टम की नहीं है बल्कि सिस्टम को किस तंत्र के तहत चलाना है गड़बडी वहीं है । और सिस्टम का मतलब ही राजनीतिक सत्ता पाना हो जाये तो उस  नमूना पहले बिहार में नजर या अब असम में नजर  रहा है । बिहार से पहले दिल्ली चुनाव में केन्द्र के 39 मंत्रियो ने चुनावी रैली कर वोटरो को सरकार के करीब लाने की कोशिश की । फिर बिहार में 27 मंत्रियो ने चुनावी रैली कर बिहार में चुनाव जीतने में मशक्कत की । और अब असम चुनाव है तो प्रधानमंत्री मोदी 5 परवरी की रैली के बाद सात कैबिनेट मंत्रियो की रैली की तैयारी में असम है । सुषमा स्वराज , नीतिन गडकरी, धर्मेन्द्र प्रधान, निर्मला सीतारमण, नजमा हेपतुल्ला के अलावे बंगाल और असम के जो भी मोदी सरकार में मंत्रीन है सभी को चुनाव एलान से पहले जाकर असम में रैली करनी है । वादे करने है । यानी चुनाव होगें तो केन्द्रीय मंत्री भी पहुंचेगें लेकिन सरकारो के पास अगर कोई नीति ही नहीं है कि देश किस रास्ते जाना है तो एक दौर का असफल मनरेगा भी अन्हे सफल वगेगा और राजनीतिक जीत के लिये केन्र्य मंत्रियो का समूह ही उम्मीद जगायेगा । जाहिर में ऐसे में समाज के भीतर अंसतोष तो पनपेगा ।

वजह भी यही है कि न्यूनतम के लिये ही 2005 में नरेगा को समाज की भीतर शाकअब्जरवर माना गया । यानी किसान-मजदूर, दलित मजदूर, गरीबी में जिन्दगी गुजारने वाले अल्पसंख्यक तबके के भी   राजनीतिक सत्ता को लेकर अंसतोष ना पनपे इसके लिये नरेगा लाया गया था । जिसके पांच बरस पूरे हुये तो याद किजिये देश में राजनीतिक बहस क्या छिडी । बहस थी नरेगा से मनरेगा होने वाली स्कीम के फेल होने का । क्योकि मजदूरी बढी नहीं , किसानी सबसे ज्यादा प्रभावित हुई । मनरेगा रोजगार से किसी योजना को अमली जामा पहनाया नहीं गया । मनरेगा बजट की लूट हर स्तर पर हुई । फिर एक वक्त मनमोहन सिंह को भी समझ में नही आया था कि मनरेगा और फूड सिक्यूरिटी को लेकर वह बजट कहा से लायेगा । और मनरेगा को लेकर यह सवाल प्रदानमंत्री मोदी का भी सत्ता संभालते वक्त रहा । लेकिन जिस इक्नामी को मोदी सरकार अपनाये हुये है उसमें गांवों में अंसतोष ना पनपे इसके लिये मनरेगा मोदी सरकार के लिये भी शाकअब्जर्वर का काम करने लगी ।यानी असफल योजना के सामने खुद सफल ना हो तो इसके लिये योजनायें कैसे सफल हो जाती है इसका हर चेहरा नेहरु के दौर से लेकर अभी तक की योजनाओ तले समझा जा सकता है । क्योकि दलितो और आदिवासियों को मुख्यधारा से जोडने और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर बीते 68 बरस में 2450 से ज्यादा योजनाये बनायी गई । दस हजार से ज्यादा कार्यक्रमो का एलान किया गया । लेकिन   52 के पहले चुनाव और 2014 के चुनाव के बीच अंतर यही आया कि धीरे धीरे हर संस्था चाहे वह संवैधानिक संस्था हो या दबाब समूह के तौर पर काम करने वाली सामाजिक संस्था । हर संस्था राजनीतिक सत्ता की जद में आ गई । और राजनीति सत्ता के लिये ही दलित, आदिवासी, किसान , मुस्लिमों की पहचान बना दी गई ।

Saturday, January 23, 2016

संघ-सरकार के बीच अमित शाह फिर अध्यक्ष

जोश-हंगामा, खामोशी-सन्नाटा और उम्मीद । दिल्ली के 11 अशोक रोड पर मौजूद बीजेपी हेडक्वार्टर का यह ऐसा रंग है जो बीते दो बरस से भी कम वक्त में कुछ इस तरह बदलता हुआ नजर आया । जिसने मोदी की चमक तले अमित शाह की ताकत देखी । तो जोश-हंगामा दिखा । फिर सरकार की धूमिल होती चमक तले अमित शाह की अग्निपरीक्षा के वक्त खामोशी और सन्नाटा देखा । और अब एक उम्मीद के आसरे फिर से अमित शाह को ही प्रधानमंत्री मोदी का सबसे भरोसेमंद-जरुरतमंद अध्यक्ष के तौर पर नया कार्यकाल मिलते देखा । तो क्या सबसे बडी सफलता से जो उड़ान बीजेपी को भरनी चाहिये थी वह अमित शाह के दौर में जमीन पर आते आते एक बार फिर बीजेपी को उड़ान देने की उम्मीद में बीजेपी की लगाम उसी जोडी के हवाले कर दी गई है । जिसके आसरे बीजेपी ने 16 मई 2014 को इतिहास रचा था । इतिहास रचने के पीछे मनमोहन सिंह की सत्ता का वह काला दौर थाि जिससे जनता नाखुश थी । लेकिन अब इतिहास संभालने का दौर है जब सत्ता भी
है । सबसे बडा संगठन भी है । सबसे बडी तादाद में पार्टी सदस्य भी है । फिर भी उम्मीद की आस तले भविष्य की हार का भय है। क्योंकि जीत के दौर में चुनावी जीत ही अमित शाह ने पहचान बनायी । और हार के दौर में कौन सी पहचान के साथ अगले तीन बरस तक अमित शाह बीजेपी को हांकेंगे यह सबसे बड़ा सवाल है । क्योंकि अगले तीन बरस तक मोदी का मुखौटा पहन कर ना तो बीजेपी को हांका जा सकता है और ना ही मुखौटे को ढाल बनाकर निशाने पर आने से बचा जा सकता है । तो असल परिक्षा अमित शाह की शुरु हो रही है । जहा संगठन को मथना है । नीचे से उपर तक कार्यकर्ताओं को उसकी ताकत का एहसास करना है और ताकत भी देनी है। दिल्ली की डोर ढीली छोड़ कर क्षेत्रीय नेताओं को उभारना भी है ।

स्वयंसेवकों में आस भी जगानी है और अनुभवी प्रचारकों को उम्र के लिहाज से खारिज भी नहीं करना है । और पहली बार मोदी की ताकत का इस्तेमाल करने की जगह मोदी को सरकार चलाने में ताकत देना है । तो क्या 2015 में दिल्ली और बिहार चुनाव में हार के बाद क्या वाकई अमित शाह के पास कोई ऐसा मंत्र है जो 2016 में बंगाल, असम,तमिलनाडु,केरल तो 2017 में यूपी, पंजाब और गुजरात तक को बचा लें या जीत लें । यह मुश्किल काम इसलिये है क्योंकि देश में पहली बार गुजरात माडल की धूम गुजरात से दिल्ली के क्षितिज पर छाये नरेन्द्र मोदी और अमित शाह ने ही गुनगुनाये । और मोदी के दिल्ली पहुंचते ही गुजरात में ही गुजरात के पाटीदार समाज ने गुजरात माडल को जमीन सूंघा दी । फिर दिल्ली की नई राजनीति और बिहार की पारंपरिक राजनीति के आगे वही बीजेपी हारी ही नहीं बल्कि नतमस्तक दिखी जो वैकल्पिक सपनों के साथ 2014 में इतिहास रच कर जनता की इस उम्मीद को हवा दे चुकी थी कि जाति-धर्म से इतर विकास की राजनीति अब देश में फलेगी-फुलेगी । लेकिन गरीब-पिछडों को ताकत देने के बदले इनकी कमोजरी-बेबसी को ही चुनावी ताकत बनाने की कोशिश इस स्तर पर हुई कि देश को प्रधानमंत्री की जाति के आसरे बीजेपी की चुनावी रणनीति देखने समझने का मौका मिला । लेकिन मुश्किल जीत के इतिहास को सहेजने भर की नहीं है । मुश्किल तो यह है कि उत्तर भारत के राजनीतिक मिजाज की जटिलता और पूर्वी भारत की सासंकृतिक पहचान को भी सिर्फ संगठन के आसरे मथा जा सकता है । क्योंकि पहली बार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ र जनीतिक तौर पर सक्रिय होने में गर्व महसूस करने लगा है। पहली बार राजनीतिक सत्ता के करीब स्वयसेवकों में आने की होड़ है क्योंकि सारी ताकत राजनीतिक सत्ता में ही सिमट रही है । पहली बार जनसंघ के दौर से भारतीय राजनीतिक मिजाज के समझने वाले स्वयंसेवक हो या प्रचारक या फिर संघ से निकल कर बीजेपी में आ चुके नेताओं की कतार वह महत्वहीन माने जा रहे हैं। और अनुभवों ने ही जिस तरह राष्ट्रीय स्वयसेवक को विस्तार दिया अब वही संघ सत्ता की अनुकूलता तले अपना विस्तार देख रहा है । यानी सत्ता पर निर्भरता और सत्ता में बने रहने जद्दोजहद के दौर में अमित शाह को दोबारा बीजेपी अध्यक्ष बनाया जा रहा है तो वह अध्य़क्ष की कार्यकुशलता से ज्यादा प्रधानमंत्री मोदी से निकटता और मोदी की कार्यशौली को समझने का हुनर है । तो सवाल यह भी होगा कि क्या वाकई गुजरात से दिल्ली पहुंचकर मोदी से तालमेल बैठाकर पार्टी चलाने वाले सबसे हुनरमंद अब भी गुजरात से दिल्ली आये अमित शाह ही हैं । और संघ परिवार मौजूदा वक्त सत्ता, सरकार , संगठन , पार्टी हर किसी
के केन्द्र में प्रदानमंत्री मोदी को ही मान रहा है । यानी विचारों के तौर पर जो संघ परिवार जनता से सरोकार बैठाने के लिये सरकार पर बाहर से दबाब बनाता था वह भी वैचारिक तौर पर सत्ता को ही महत्वपूर्ण मान रहा है । तो अगला सवाल है कि क्या विदेशी पूंजी के निवेश के आसरे विकास की सोच । किसानो की जरुरतो को पूरा करने के लिये बीमा और राहत पैकेज । दुनिया में भारत को अंतरराष्ट्रीय बाजार के तौर पर बताने की समझ । संवैधानिक संस्थानों से लेकर न्यायपालिका और राज्यसभा तक की व्याख्या सत्तानुकूल करने की सोच । पड़ोसियों के साथ दूरगामी असर के बदले चौकाने वाले तात्कालिक निर्णय । और इन सबपर आरएसएस की खामोशी और बीजेपी की भी चुप्पी । यानी समाज के भीतर चैक-एंड-बैलेस ही नहीं बल्कि वह तमाम संगठन जो अलग अलग क्षेत्र में काम भी कर रहे है तो फिर उनके होने का मतलब क्या है । और मतलब है तो फिर क्या सत्ता में रहते हुये स्वयंसेवक के पैसले और संघ के स्वयंसेवक के तौर पर स्वदेशी जागरण मंच , किसान संघ, आदिवासी कल्याण संघ , भारतीय मजदूर संघ की सोच भी एक सरीखी मान ली गई या सत्ता बनी रहे इसलिये दबायी जा रही है ।

असल में यह सवाल देश के लिये इसलिये भी महत्वपूर्ण है क्योंकि संसदीय राजनीतिक व्यवस्था में राजनीतिक दलो की समझ व्यापक होना देश के ही हित में होता है । और बीजेपी के पास संघ परिवार सरीखा ऐसा अनूठा सामाजिक संगठन है जिसके स्वयंसेवक हर मुद्दे पर देश की नब्ज पकडे रहते है । लेकिन सभी एक ही लकीर पर एक ही बिन्दु के इर्द-गिर्द घुमड़ने लगे तो फिर रास्ता चाहे अनचाहे उस मूल को पकड़ेगा जिसके आसरे संघ परिवार बना । यानी हिन्दू राष्ट्र की सोच हर निर्णय के बाद डगमगाते हुये राजनीतिक सत्ता के लिये भी ढाल का काम करेगी और पार्टी के लिये भी हथियार बनेगी । और संघ परिवार सामाजिक सासंकृतिक संगठन होते हुये भी हमेशा राजनीतिक नजर आयेगा या बीजेपी राजनीतिक पार्टी होते हुये भी आरएसएस के राजनीतिक संगठन के तौर पर ही काम कर पायेगी । ध्यान दें तो हो यही रहा है । बीजेपी का अध्यक्ष अमित शाह को दोबारा बनाना चाहिये की नहीं इसपर जलगांव में 6 से 8 जनवरी तक संघ परिवार के प्रमुख स्वयंसेवक ही चिंतन करते है । चिंतन के बाद 17 जनवरी को सह सरकार्यवाह कृष्ण गोपाल प्रधानमंत्री मोदी को जानकारी देते है । उनकी राय लेते है । और प्रधानमंत्री की पूर्ण सहमति या इच्छा  मान कर 18 जनवरी को कृष्णगोपाल बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह से मिलते है , उन्हें खुशखबरी देते है । चुनौतियों का सामना करने में अमित शाह के साथ संघ परिवार भी खड़ा है , इसका भरोसा देते है ।फिर 19 जनवरी को अमित शाह से रुठे मुरली मनोहर जोशी
और लालकृष्ण आडवाणी से मिलते है । जोशी और आडवाणी की तंज भरी खामोशी को अनदेखा करते है । और अनुभवी पीढी को मोदी के सामने चुकी हुई पीढी करार दिये जाने पर संघ परिवार खामोशी बरतता है । और 20 जनवरी को 11 अशोक रोड पर यह सूचना चस्पा कर दी जाती है कि 24 जनवरी को सुबह 10 से दोपहर एक बजे तक अध्यक्ष पद के लिये नामांकन होगा । एक से डेढ बजे तक नाम वापस लेने और जांच का काम होगा । और
जरुरी हुआ तो 25 को चुनाव होगा । यानी समूची कवायद संघ परिवार के आसरे प्रधानमंत्री मोदी को केन्द्र में रखकर अगर बीजेपी अध्यक्ष की जरुरत समझी जाती है तो सवाल तीन है । क्या बीजेपी राजनीतिक दल नहीं बल्कि संघ परिवार का राजनीतिक संगठन मात्र है । क्या मौजूदा राजनीतिक शून्यता में संघ परिवार राजनीतिक हो रहा है ।

क्या राजनीतिक सत्ता ही सबकुछ हो चुकी है । यानी जिसके पास सत्ता तक पहुंचने या सत्ता पर बने रहने के मंत्र है वहीं सबसे ताकतवर हो चुका है । और उसी अनुकुल समूची कवायद मौजूदा राजनीतिक सच है । अगर हा तो फिर चुनाव जीतने के तरीके अपराध, भ्र्ष्ट्रचार और कालाधन के नैक्सस से कैसे जुडे है इसपर तो नब्बे के दशक में ही वोहरा कमेटी की रिपोर्ट अंगुली उठा चुकी है । यानी देश का रास्ता उसी चुनावी व्यवस्था पर टिक रहा है जिसे ना तो स्टेट्समैन चाहिये । ना ही सामाजिक समानता । ना ही राजनीतिक शुद्दीकरण । और ना ही हिन्दु राष्ट्र । उसे सिर्फ सत्ता चाहिये । और सत्ता की इसी सोच में एक तरफ संघ है तो दूसरी तरफ सरकार और बीच में अमित शाह दुनिया की सबसे बडे राजनीतिक दल के अध्यक्ष । जिनसे निकलेगा क्या इसके लिये 2019 तक इंतजार करना होगा ।

Wednesday, January 20, 2016

पत्रकारिता करते हुये भी पत्रकार बने रहने की चुनौती

पत्रकारिता मीडिया में तब्दील हो जाये। मीडिया माध्यम माना जाने लगे। माध्यम सत्ता का सबसे बेहतरीन हथियार हो जाये। तो मीडिया का उपयोग करेगा कौन और सत्ता से सौदेबाजी के लिये मीडिया का प्रयोग होगा कैसे? जाहिर है 2016 में बहुत ही पारदर्शिता के साथ यह चुनौती पत्रकारिता करने वालेमीडियाकर्मियों के सामने आने वाली है। चुनौती इसलिये नहीं क्योकि पत्रकारिता अपने आप में चुनौतीपूर्ण कार्य है । बल्कि चुनौती इसलिये क्योंकि राजनीतिक सत्ता खुद को राज्य मानने लगी है। संस्थानों के राजनीतिकरण को राज्य की जरुरत करार देने लगी है। चुनावी जीत को संविधान से उपर मानने लगी है। यानी पहली बार संविधान के दायरे में लोकतंत्र का गीत राजनीतिक सत्ता के लोकतंत्रिक राग के सामने बेमानी साबित हो रहा है। जाहिर है ऐसे में हर वह प्रभावी खिलाडी मीडिया को अपने अनुकूल बनाने की मशक्कत करने लगा है जिसे अपने दायरे में सत्ता का सुकून चाहिये। और सत्ता को जहा लगे कि वह कमजोर हो रही है तो मीडिया से नहीं बल्कि मीडिया को माध्यम की तरह संभाले प्रभावी खिलाडियो से ही सीधे सौदा हो जाये। कह सकते है कि सबकुछ इतना सरल नहीं है। और जो खतरे पत्रकारिता को लेकर लगातार बढ़ रहे है उसमें बहुत कुछ मीडिया मीडियाकर्मियों की अपनी समझ पर भी निर्भर करता है। लेकिन 2016 में यह सवाल और छोटा हो जायेगा कि पत्रकारिता की किस लिये जा रही है। जो रिपोर्ट छापी जा रही है उसका महत्व क्या है। इसकी बारीकी को समझे तो जैसे खनिज संपदा की लूट के लिये आदिवासियों के साथ शहर के संवाद ही खत्म कर दिये गये और विकास की परिभाषा यह कहकर गढ़ी गई कि इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाने के लिये खनिज संपदा से लेकर आदिवासियों तक की सफाई जरुरी है। उसके बाद खेती की जमीन को भी निगलने के लिये पहले स्पेशल इक्नामी जोन, उसके बाद इक्नामिक कारीडोर और स्मार्ट शहर से लेकर अब आदर्श गांव तक की सोच ही इस तरह पैदा की जा रही है जहां खेती की जमीन पर खडे होते कंक्रीट को ही आदर्श हालात मान लिया जाये। यानी देश की उस सोच को ही माध्यमो के जरिये बदल दिया जाये जो अपने अपने दायरे में सत्ता है तो फिर देश की परिभाषा भी राजनीतिक सत्ता के अनुकूल
गढने की कवायद आसानी से हो सकती है ।

और बहस की गुंजाइश ही नहीं बचती कि कोई रास्ता गांव का भी था । देश में आदिवासी भी रहते थे । रिपोर्ट शहरों के बढने पर तैयार होगी ना कि बढते शहरी गरीबों की वजहो को लेकर । यानी झटके में विकल्प की वह सोच ही मीडिया से गायब हो रही है जो सत्ता ही नहीं बल्कि संसद और विकास की नीतियो को लेकर कारपोरेट फार्मूले पर भी सवाल खड़ा करती रही है। इसमें और तेजी आ रही है क्योंकि बहुसंख्यक तबके के लिये नीति का मतलब नीति लागू कराने वालो की एक सोच हो चली है। ना कि जिनके लिये नीतियां बनायी जाती है उनकी कोई जरुरत या उनकी कोई सोच कोई मायने भी रखती हो। इतना ही नहीं राजनीतिक सत्ता जिस तरह हर संस्थान को अपनी गिरफ्त में ले रही है, उसका असर कैसे मीडिया के माध्यम में तब्दील होने पर हो रहा है उसका बेहतरीन उदाहरण बिहार चुनाव के परिणाम के बाद लालू यादव की राजनीतिक ताकत से बने नीतिश मंत्रिमंडल का चेहरा है। सवाल यह नहीं है कि कानून के जरीये राजनीतिक तौर पर खारिज लालू यादव उस सामाजिक समीकरण को जीवित कर देते है जो दिल्ली की सत्ता के विकास मॉडल को खारिज कर दें। बल्कि सवाल यह है कि जिस मॉडल को राजनीतिक सत्ता तले दिल्ली सही बताती है और 2014 का जनादेश किसी सपने की तरह पांरपरिक राजनीति को हाशिये पर ढकेल देता है वही मॉडल उसी बिहार में 2015 के जनादेश तले हाशिये पर चला जाता है और वहीं पारपरिक राजनीति फिर से ना बदलने वाली हकीकत की तरह सामने आ जाती है। और झटके में यह सवाल बडा हो जाता कि इस दौर में पत्रकारिता किस समझ को जी रही थी। या मीडिया की भूमिका रही क्या । यानी 2014-15 का पाठ तो यही निकला कि राजनीतिक सत्ता की जो दिशा होगी उसी हवा में मीडिया बहेगी। राजनीतिक सत्ता का सामाजिक मतलब चुनावी जीत-हार होगी। मीडिया का विश्लेषण भी उसी दिशा में होगा। यानी पत्रकारिता अगर 2015 में उन सवालो से बचती रही कि आखिर जो सीबीआई चार बरस तक अमित शाह को अपराधी मान कर फाइले तैयार करती रही तो फाइले मोदी की पीएम बनते ही बंद ही नहीं हुई बल्कि उसमें लिखा भी बदल गया ।

और 2015 के बिहार जनादेश ने बाद पत्रकारिता इस सवाल पर भी खामोश हो गई कि आखिर वह कौन से सामाजिक समीकरण रहे जो विकास के नाम पर गरीबी को विस्तार भी देते रहे और सामाजिक न्याय का नारा लगाते हुये विकास को दरकिनार भी करते रहे । यह सवाल भी गौण हो गया कि गांव खेत में शिक्षा का नायाब प्रयोग 25 बरस पहले चरवाहा विघालय के नाम पर विधानसभा से निकला। 25 बरस बाद वही चरवाहा विघालय विधानसभा के भीतर नजर आने लगा। यहा सवाल यह उठ सकता है कि क्या राजनीतिक सत्ता के दायरे में ही मीडिया की महत्ता है । जाहिर है यह सवाल वाकई बडा है कि राजनीतिक सत्ता से इतर मीडिया कैसे काम करें । पत्रकारिता कैसी हो । क्योकि पत्रकारिता अगर देश के हर तबके को देख समझ रही है । यानी सत्ता के वोट बैंक से इतर विपक्ष की सोच को भी अगर आंक रही है तो यह सवाल व्यापक दायरे में देखा समझा जा सकता है कि क्या देश में हर सत्ता का दायरा अल्पसंख्यक सरीका ही है । राजनीतिक सत्ता के पक्ष में 50 फिसदी वोट नहीं है तो कारपोरेट पूंजी के मुनाफा बनाने के तौर तरीको के पक्ष में देश का बहुसंख्यक तबका नहीं है ।औघोगिक घरानो की जीने के अंदाज या उनके जरीये देश के संसाधनों के उपयोग से देश की नब्बे फिसदी आबादी का कोई वास्ता नहीं है। फिर ऐसा भी नहीं है कि संवैधानिक संस्थाओं के दायरे में देश के बहुसंख्यक तबके के हित साधे जा रहे हो । निचली अदालत से निकल कर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक तो देश का वही तबका पहुंच पाता है जिसकी आय देश की 80 फिसदी आबादी से उपर हो। स्वास्थय सेवा हो या शिक्षा देने के संस्थान। देश के 80 करोड वोटरो के लिये वह आज भी नहीं है । और इसी दायरे को अगर मीडिया घरानो में समेटा जाये तो उसके सरोकार भी देश के अस्सी फिसद आबादी से इतर ही नजर आयेंगे। यानी पहली बार लोकतंत्र का चौथा खम्भा भी लोकतंत्र के बाकि तीन खम्मो की कतार में उसी तरह खड़ा किया जा रहा है जिसमें लोकतंत्र का राग सत्ता की आवाज में सुनायी दे। और मीडिया लोकतंत्र के राग को सत्ता के दायरे से बाहर होकर कैसे सुन सकता है। पत्रकारिता राज्यसत्ता के प्रभाव से कैसे मुक्त हो सकती है । भारत जैसे देश को चलाने के लिये पूंजी से ज्यादा मानव संसाधन को तरजीह दी जानी चाहिये यह सवाल कैसे कोई रिपोर्ट उठा सकती है। जबकि खुद मीडिया घरानों का विकास पूंजी पर जा टिका है। और बतौर माध्यम अगर सत्ता अपना प्यादा मीडिया को बना रही है तो मीडिया घरानो के लिये भी पूंजी ही माध्यम को मजबूत बनाने का माध्यम बन चुका है । यानी 2014 के चुनाव के बाद से हर चुनाव ही कैसे सत्ता और लोकतंत्र का एसिड टेस्ट बनाया गया या बनाया जा रहा है उसे मीडिया क्या समझ नहीं पा रहा है। यकीनन पत्रकारिता उन हालातों को देख रही है कि कैसे सारी ताकत राजनीतिक सत्ता में सिमट रही है। लेकिन राजनीतिक सत्ता ही लोकतंत्र हो और वहीं पूंजी का माध्यम बन जाये तो फिर मीडिया के सामने कैसे चुनौती होगी इसे महसूस करना भी आने वाले बरसों में
मुश्किल होगा । मसलन सलमान खान की गाड़ी तले फुटपाथ पर सोये शख्स को किसने मारा । इसका जबाब हाईकोर्ट के फैसले में दिखायी नहीं देता बल्कि सलमान खान की रिहाई के जश्न में मीडिया को जाता है। क्योंकि सलमान खान के फैन्स ही फैसले के बाद जनता के किरदार में नजर आते हैं। यानी पहली बार मीडिया के सामने यह भी चुनौती उभर रही है कि सूचना तकनीक के माध्यम से बनते और व्यापक होते समाज को वह कैसे सही या गलत माने। मसलन एक वक्त इंदिरा गांधी ने कांग्रेस को अपनी जेबी पार्टी बनाने के लिये कांग्रेस के संगठन के बाहर से ही इतना दबाव बना दिया कि काग्रेस संगठन भी समझ नहीं पाया कि वह सही है या बाहर से दिरा के पक्ष में खड़ा होता समूह सही है । कमोवेश यही प्रयोग नरेन्द्र मोदी ने भी किया। बीजेपी संगठन के बाहर से मोदी फैन्स का दबाब ही कुछ ऐसा बना कि बीजेपी संगठन को भी सारे निर्णय मोदी के अनुकूल लेने पड़े। ध्यान दे तो पारंपरिक मीडिया भी कुछ इसी तर्ज पर सोशल मीडिया के दबाब में है। दादरी से लेकर मालदा की घटना को लेकर सोशल मीडिया के दबाब में यह सवाल भी खडे होने लगे कि जिम्मेदारी मुक्त सोशल मीडिया कही ज्यादा जिम्मेदार है। यानी समाचार पत्र या न्यूज चैनलों की पत्रकारिता संदेह के घेरे में आ गई। हर किसी पर राजनीतिक प्यादा बनकर काम करने का आरोप सोशल मीडिया में लगने लगा। यानी पहली बार पत्रकारों के
सामने चुनौती उस खुलेपन की सूचना को लेकर भी है, जो झटके में किसी भी पत्रकार, किसी भी मीडिया घराने या किसी भी रिपोर्ट को लेकर राजनीतिक सत्ता से जोड़ कर एक सामानांतर पत्रकारिता की लकीर खींच देती है । यानी पत्रकारिता करते हुये साख बनाने के संघर्ष पर साख पर बट्टा लगाने के
तरीकों से जूझना कही ज्यादा मुश्किल हो चला है । और इसकी बारिकी को समझने के लिये लौटना उसी राजनीतिक गलियारे में पड़ रहा है, जिसकी जरुरत ने ही मीडिया को माध्यम में तब्दील कर अपना हित साधना शुरु किया है । यानी पहली बार मीडिया के सामने तीन चुनौती बेहद साफ है। पहला , चुनावी राजनीति के
दबाब से मुक्त होना। दूसरा, पूंजी के दबाब से मुक्त होना। तीसरा, जन भागेदारी से मीडिया संस्थान को खडा करने की कोशिश करना। यानी यह तीन चुनौती मौजूदा पत्रकारिता के उस संकट को उभारती है, जिसमें मीडिया का घालमेल राजनीति और कारपोरेट पूंजी से कुछ इस तरह हो रहा है जिसमें
पत्रकार राजनीति करने लगा है। राजनेता पत्रकारीय मापदंडों को तय करने लगा है और पूंजी राजनीति और मीडिया दोनो का आधार बन चुकी है । वजह भी यही है कि मौजूदा मीडिया राजनेताओं और उघोगपतियों से इतर कुछ कार्य करता नजर नहीं
आता। और राजनीतिक सत्ता पाने के बाद मीडिया की जरुरत राजनेताओं के लिये किस रुप में रहती है यह इससे भी समझा जा सकता है कि पीएम बनने के बाद से नरेन्द्र मोदी ने कत्र कोई पत्रकार वार्ता नहीं की। नीतीश कुमार ने सीएम बनने के बाद किसी पत्रकार को कोई इंटरव्यू नहीं दिया। वसुधरा राजे
सिंधिया ने सीएम बनने के बाद से कोई प्रेस कान्फ्रेस नहीं की। केजरीवाल ने अपनी राजनीति को ही मीडिया के खिलाफ बनाकर जनता के पैसे पर एक न्यूज चैनल के खिलाफ उन्ही अखबारो पर पन्ने भर का विज्ञापन देने में कोताही नहीं बरती जिन अखबारों को वह कारपोरेट की काली कारतूत की उपज बताते रहे।
यानी मीडिया के अंतर्विरोध। राजनीति सत्ता की अपनी कमजोरी को ताकत में बदलने के लिये मीडिया का उपयोग। और कारपोरेट पूंजी का धंधे के लिये मीडिया का प्रयोग। इन हालातों को बदले के लिये कौन सा तरीका कैसे और किस रुप में उठाया जाये। यह समझ पैदा करनी होगी । अन्यथा पत्रकारीय विश्लेषण का दायरा 2016 में बंगाल-असम चुनाव की जीत हार पर टिकेगा। 2017 में यूपी
चुनाव को मोदी का सेमीफाइनल मान लिया जायेगा। और चुनावी जीत हार के दायरे में ही विदेशी निवेश या स्वदेशी पर चर्चा होगी। मंदिर तले हिन्दू राष्ट्र तो विकास तले आर्थिक सुधार पर बहस होगी। और देश के वह सवाल हाशिये पर चले जायेंगे जिसे चुनावी दौर में भावनाओ के उभार के लिये उठाये
तो जाते है लेकिन सत्ता में आने के बाद भुला दिये जाते हैं। शायद मीडिया के सामने सबसे बडी चुनौती यही है कि वह देश में राजनीतिक सत्ता की बिसात के तरीके बदल दें। क्योंकि तमाम मुद्दो के बीच देश के हर क्षेत्र में सवाल न्याय ना मिलने का हो चला है। और इंसाफ का सवाल देश के उस अस्सी
फिसद लोगों से जुड़ा है जिनके लिये इंसाफ का मतलब भी रोटी ही है । यानी हर दिन रोटी चाहिये तो हर क्षेत्र में इंसाफ भी चाहिये। हर पल चाहिये । हर दिन चाहिये । और यह सरोकार मीडियाकर्मियों के नहीं रहे । पत्रकार की द्दश्टी पत्रकारिता को तकनीक के आसरे मापने लगी है । इसलिये उसके जहन में
बदलती पत्रकारिता का मतलब 3 जी के बाद 4 जी आना भी हो सकता है । न्यूज चैनलो को अखबार सरीखा बनाना और समाचार पत्र को न्यूज चैनल से सरीखा बना देना भी हो सकता है । लगातार सोशल मीडिया पर खुलती अलग अलग न्यूज पोर्टल
भी हो सकते है । इंटरनेट की तेजी से सूचनाओ के जल्दी पहुंचने या पहुंचाने से भी हो सकता है । इंटरएक्टिविटी के जरीये दर्शक-पाठक के बीच संवाद में तेजी भी ला सकती है और इसे भी पत्रकारिता के नये आयाम से जोडा जा सकता है यह सोच भी पैदा होगी । लेकिन समझना यह भी होगा कि तकनीक पत्रकारिता नहीं
होती । सूचना की तेजी का मतलब मीडिया के सरोकार नहीं होते । और सरोकार या देश की जमीन से संवाद की कमी ने ही पत्रकारिता के माप-दंड बदलने शुरु किये । मनमोहन सिंह के दौर में बडी तादाद में पत्रकार कारपोरेट सेक्टर के लिये काम करने लगे। और उन्होंने भी माना कि जब मीडिया घराने ही कारपोरेट
के कब्जे में जा रहे हैं। या फिर पत्रकारिता का मतलब ही अलग मुनाफा साधना हो चला है तो सीधे कारपोरेट के हित साधने के लिये उसी से क्यों ना जुड़ जाया जाये। वहीं अब यानी मोदी के दौर में सोशल मीडिया की पत्रकारिता ही
महत्वपूर्ण बना दी गई। तो हर नेता को फेसबुक चलाने से लेकर सोशल मीडिया में छा जाने के लिये पत्रकारो की एक फौज चाहिये। सत्ता चलाने वाले हो या सत्ता पाने के लिये संघर्ष करने वाले नेता कमोवेश हर किसी की अपनी अपनी
सोशल साइट्स चल पड़ी हैं। और 2016 बीतते बीतते हर विधानसभा या लोकसभा क्षेत्र के लिहाज से नेता अपने काम को दिखाने बताने के लिये पोर्टल या साइट्स शुरु कर चुके होंगे। यानी एक तरफ पत्रकारिता का वह मिशन जो सत्ता
पर निगरानी रखते हुये देश के मुद्दों को सतह पर लाये। जिससे अपराध-भ्रष्टाचार या विकास के नाम पर खुद को लाभ पहुंचाने की सत्तधारियों की पहल के खिलाफ सामाजिक दबाब बनाया जा सके। वही दूसरी तरफ सत्ता के
अनुकुल , मुनाफा बनाने की सोच और विकास तले अपराध-भ्रष्ट्रचार को गौण मानकर सत्ताधारियो को देश करार देने की सोच । तो लकीर कही मोटी होगी तो कही इतनी महीन जिसे परखना भी पत्रकारिता हो जायेगी यह किसने सोचा होगा ।
शायद इसीलिये सबसे बडी चुनौती तो यही है मीडिया संस्थानों से जुडकर पत्रकारिता करते हुये भी पत्रकार रहा जाये।

Friday, January 8, 2016

भारत-पाकिस्तान के बीच एलओसी का सच


लश्कर-ए-तोएबा , जैश-ए मोहमम्द, हिजबुल मुज्जाहिद्दीन ,हरकत-उ मुज्जाहिद्दीन , पाकिसातन तालिबान और इस फेरहिस्त में 19 से ज्यादा और नाम । इन नामो से जुडे दफ्तर की संख्या 127 । जो कि पीओके में नहीं बल्कि कराची, मुल्तान, बहावलपुर, लाहौर और रावलपिडी तक में । जबकि ट्रेनिंग सेंटर मुज्जफराबाद और मीरपुर तक में । यानी पाकिस्तान के एक छोर से दूसरे छोर तक आंतकवादियो की मौजूदगी । भारत के लिये हर नाम आंतक का खौफ पैदा करने वाला लेकिन पाकिस्तान के लिये पाकिस्तान के भीतर आंतक के इन चेहरो
पर कोई बंदिश नहीं है । तो सबसे बडा सवाल यही है कि जिस आतंकवाद पर नकेल कसने के लिये भारत पाकिसातन से बार बार बातचीत करता है जब वहीं अपनी जमीन पर आतंक को आतंक नहीं मानता तो पठानकोट हमले के बाद ऐसा माहौल क्यो बनाया गया कि पाकिस्तान पहली बार पठानकोट के दोषियो के खिलाफ कारर्वाई कर रहा है ।

तो सवाल है कि पहली बार किसी आंतकी हमले को लेकर भारत ने यह दिखला दिया कि पाकिस्तान आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई करें नही तो उसका रुख कडा हो जायेगा । या फिर पठानकोट हमले को ही बातचीत का आधार बनाया जा रहा है । क्योकि मोदी सरकार भी इस सच को समझती है कि भारत के लिये जो आंतकी संगठन है वह पाकिस्तान की राज्यनीति का हिस्सा रहे है । और नवाज शरीफ सरकार भी इस सच को समझ रही है कि आंतकवाद उसके घर में सामाजिक-आर्थिक हालात की उपज भी है और सेना -आईएसआई की पालेसी का हिस्सा भी । तो फिर पठानकोट हमले पर कार्रवाई के साथ वह अपने दाग को छुपा सकती है ।क्योंकि सभी आंतकी संगठनो ने खुलकर कश्मीर को अपने जेहाद का हिस्सा भी बनाया हुआ है । और कश्मीर से हमले निकलकर अब पंजाब के मैदानी हिस्सो में पहुंचे है तो फिर पाकिसातन से बातचीत के दायरे में आंतकवाद और कश्मीर से आगे निकलना दोनो सत्ता की जरुरत बन चुकी है । तो सवाल है कि क्या पठानकोट हमले पर तुरंत कार्र्वाई दिखा कर आंतक से बचने का रास्ता भी पाकिस्तान को मिल रहा है । और दूसरी तरफ प्रधानमंत्री मोदी संवाद बनाकार संवाद तोडने से अब बचना चाहते है ।

खासकर लाहौर यात्रा के बाद । यानी करगिल के बाद से ही बातचीत के जो सवाल बार बार हर आंतकी हमले के बाद उलझ जाते थे उसमे पहली बार मौदी की लाहौर यात्रा और हफ्ते भर के भीतर ही पठानकोट हमले ने दोनो देशो को इस कश्मकश से उबार दिया कि हमलो को खारिज कर आगे बढा जाये तो आंतकी संगठनों के हमले
बेमानी साबित हो जायेगें । ध्यान दीजिये तो लगातार दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारो की बातचीत और नवाज शरीफ - मोदी की बातचीत संकेत यही दे रही है कि पठानकोट हमला सिर्फ बातचीत को बंद कराने के लिये किया गया । तो सवाल है कि लश्कर-ए-तोएबा हो या जैश -ए मोहम्मद या फिर कश्मीर से निकल कर पाकिसातन की जमीन पर पनाह लिये हुये सैय्यद सलाउद्दीन का संगठन हिजबुल मुजाहिद्दीन । इनका अतीत बताता है कि सत्ता की कमजोरी का लाभ आंतकवादी संगठनो को नहीं मिला बल्कि हर सत्ता ने अपनी कमजोरी को सौदेबाजी की ताकत में बदलने के लिये आंतकवादी संगठनो की पनाह ली । इसका बेहतरीन उदाहरण तो जैश-ए-मोहम्मद के अजहर मसूद ही है । जो पठानकोट हमले को लेकर कटघरे में है । लेकिन पाकिसातन के भीतर का सच यह है कि अजहर मसूद पर दिसबंर 2003 में मुशर्रफ पर हमला करने का दोषी माना । लेकिन मुशर्रफ की सरकार ही अजहर मसूद का कुछ नहीं बिगाड सकी । सिवाय इसके कि जनवरी 2002
में जब जैश पर प्रतिबंध लगा तो उसने अपना नाम बदल कर खुदम-उल-इस्लाम कर लिया । इतना ही नहीं अमेरिकी पत्रकार डेनियल पर्ल की हत्या के इल्जाम में भी अमेरिका ने अजहर मसूद को अपने कानून के तहत तलब किया । इंटरपोल ने मसूद की गिरफ्तरी पर जोर दिया । लेकिन इन सबसे इतर मसूद की खुली आवाजाही
कराची के बिनौरी मसजिद में भी रही और बहावलपुर में जैश के हेडक्वार्टर में भी रही । दिखावे के तौर पर जिस तरह लशकर को छोड जमात-उल-दावा को हाफिज सईद ने ढाल बनाया वैसे ही अजहर मसूद ने खुदम-उल -इस्लाम के साथ साथ जमायत-उल -अंसार और जमात-उल -फुरका या फिर हिजबुल तहरीर को भी ढाल बनाया
। यानी आतंकवाद को लेकर जो चिंता भारत जता रहा है या फिर मोदी सरकार पठानकोट हमले में ही पाकिस्तान की कार्रवाई को सीमित कर अपनी जीत दिखाने पर अडे है उसकी सबसे बडी त्रासदी तो यही है कि आंतकवाद की परिभाषा लाइन आफ कन्ट्रोल पार करते ही जब बदल जाती है तो सवाल संवाद का नहीं बल्कि
अतीत के उन रास्तो को भी टटोलना होगा । जो कभी इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान को तोड़कर बांग्लादेश बनाया , या फिर फिर वाजपेयी ने एलओसी पर एक लाख सैनिकों की तैनाती कर मुशर्रफ के गरुर को तोड़ा । इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि पाकिसातन में आतंक के पनपने की बडी वजह गरीबी-मुफलिसी है । और भारत
में आतंकवादियों की घुसपैठ की बडी वजह भ्रष्ट्रचार और आतंकवाद को लेकर राज्य-केन्द्र के बीच कोई तालमेल का ना होना है । एक तरफ पाकिस्तान की आंतकवाद पर तैयार रिपोर्ट ‘प्रोबिंग माइंडसेट आफ टेररइज्म’ के अनुसार करीब दो लाख परिवार आतंक की फैक्ट्री के हिस्से है । इनमें 90 फीसदी गरीब
परिवार है । इन नब्बे फिसद में में से 60 फिसद सीधे मस्जिदों से जुड़े हैं । आतंक का आधार इस्लाम से जोडा गया है । और इस्लाम के नाम पर इंसाफ का सवाल हिंसा से कहीं ज्यादा व्यापक और असरदार है । यानी आंतक या जेहाद के नाम पर हिंसा इस्लाम के इंसाफ के आगे कोई मायने नहीं रखता । फिर पाकिस्तान के
भीतर के सामाजिक ढांचे में उन लडकों या युवाओं का रौब उनके अपने गांव या समाज में बाकियों की तुलना में ज्यादा हो जाता है जो किसी आतंकी संगठन से जुड जाता है । लेकिन समझना यह भी होगा कि पाकिस्तान में आंतकवादी संगठन किसी को नहीं कहा जाता है । जैश-ए-मोहम्मद या लश्कर-ए-तोएबा तक कट्टरवादी
इस्लामिक संगठन माने जाते है । जाहिर है ऐसे में हालात घुम-फिरकर सवाल भारत के आंतरिक सुरक्षा को लेकर ही उठेगें । और बीजेपी तो इजरायल को ही सुरक्षा के लिहाज से आदर्श मानती रही है तो फिर उस दिशा में वह बढ़ क्यों नहीं पा रही है । क्या संघीय ढांचा भारत में रुकावट है जो एनसीटीसी पर सहमति नहीं बना पाता । या फिर आंतकवाद से निपटना सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी है । यानी नागरिकों की भूमिका सिर्फ चुनाव में सत्ता तय करने के बाद सिमट चुकी है । असल में भारत की मुश्किल यही है कि नागरिकों की कोई भूमिका सत्ता के दायरे में है ही नहीं । इसलिये सत्ता बदलने का सुकुन लोकतंत्र को जीना है और सत्ता के लिये वोट बैक बनना देश के लिये त्रासदी । इसलिये सच यही है कि भारत और पाकिस्तान कभी आपस में बात नहीं करते और
दोनों देशों की सत्ता कभी नहीं चाहती कि दोनो देशो की आवामों के बीच संवाद हो । बातचीत सत्ता करती है और बंधक आवाम बनती है । जिसकी पीठ पर सवारी कर सियासी बिसात बिछायी जाती है । और बातचीत के दायरे में आंतकवाद और कश्मीर का ही जिक्र कर उन भावनाओं को उभारा जाता है जिसके आसरे सत्ता को या तो
मजबूती मिलती है या फिर सत्ता पलटती है । फिर आंतकी घटनाओं के पन्नों को पलटे तो 1993 के मुबंई सिरियल ब्लास्ट के बाद पाकिस्तानी आतंकवाद की दस्तक 2000 में लालकिले पर हमले से होती है । और सच यह भी है कि जिस छोटे से दौर [ अप्रैल 1997-मार्च1998  ] में आई के गुजराल पीएम थे उस दौर में सबसे ज्यादा आवाजाही भारत और पाकिस्तान के नागरिकों की एक दूसरे के घर हुई । उस दौर में दोनो देशो के भीतर ना आईएसआई सक्रिय थी ना रां । तो कह सकते है कि गुजराल दोनो देशों के मिजाज से वाकिफ थे क्योकि ना सिर्फ उनका जन्म अविभाजित भारत के झेलम में हुआ और पढाई लाहौर में । बल्कि 1942 के राजनीतिक संघर्ष में जेल भी पाकिसातन की थी थी । लेकिन नये हालातो में गुजराल की सोच यह कहकर भी खारिज की जा सकती है कि  तब का दौर अलग था अब का दौर अलग है ।

Wednesday, January 6, 2016

संघ मान रहा है बीजेपी को परिपक्व नेतृत्व चाहिये ?

बीजेपी अधय्क्ष को लेकर जलगांव में मंथन

एक तरफ प्रधानमंत्री मोदी तो दूसरी तरफ लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी । और बीच में अमित शाह के अध्यक्ष पद की कुर्सी । जिस पर फैसले की घड़ी अब आ चुकी है और कल से जलगांव में दो दिनों तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कोर कमेटी इसी पर मंथन करेगी की अमित शाह को दोबारा बीजेपी का अध्यक्ष बनाया जाये कि नहीं। बैठक में संघ के मुखिया मोहन भागवत समेत भैयाजी जोशी, सुरेश सोनी , दत्तात्रेय होसबोले, कृष्ण गोपाल, सह कार्यवाहक विभाग्या और बौद्दिक प्रमुख स्वांत रंजन समेत दर्ज भर अधिकारी चिंतन मनन करेंगे। और चिंतन मनन सिर्फ इस बात को लेकर नहीं होगा कि अमित शाह का क्या किया जाये बल्कि मंथन इस बात को लेकर ज्यादा होगा कि जब केन्द्र में संघ के राजनीतिक संगठन बीजेपी की सरकार है । प्रधानमंत्री स्वयंसेवक है । तो फिर बीजेपी के चुनावी जीत के विस्तार पर दिल्ली और बिहार में ब्रेक क्यों लग गयी । और संघ के सैद्दांतिक मुद्दों से इतर मोदी सरकार निर्णय ले रही है और फिर चुनावी जीत नहीं मिल रही है तो यह रास्ता कब तक अपनाया जा सकता है । यानी अमित शाह को दोबारा बीजेपी अध्यक्ष बनाने के लिये जिस मंथन की तैयारी संघ परिवार कर रहा है उसमें यह कहा जरुर जा सकता है कि आखरी फैसला तो पीएम मोदी को ही लेना होगा लेकिन आडवाणी और जोशी की सहमति भी होनी चाहिये यह संघ भी मान रहा है। क्योंकि अमित शाह का विरोध आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी ,शांता कुमार और यशंवत सिन्हा ने बिहार
चुनाव परिमाम के बाद पत्र को लिख कर किया था । और जिम्मेदारी से बचने और पार्टी को तानाशाह के अंदाज में चलाने का आरोप मढा था। जाहिर है इसपर आजतक जबाब नहीं दिया गया । और संघ परिवार ने भी खामोशी ही बरती । यानी जो सवाल आडवाणी जोशी ने उठाये वह भी बीजेपी के पास पेंडिग पडे है । और आरएसएस यह कतई नहीं चाहेगा कि कोर कमेटी की बैठक में बीजेपी अधयक्ष को लेकर जो भी फैसला हो उसके बाद बीजेपी के भीतर से कोई आवाज विरोध की उठे ।

ऐसे में अगर अमित शाह पर संघ मुहर लगाता है तो यह हो सकता है कि जलगाव में फैसले के बाद खुद सरसंघचालक मोहन भागवत और भैयाजी जोशी दिल्ली आकर आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी की सहमति लें । क्योकि जानकारी के मुताबिक जलगांव बैठक से पहले संघ और सरकार के बीच तालमेल बैठाने का काम देख रहे कृषण गोपाल ने आडवाणी और जोशी से मुलाकात की थी । और दोनो ने पार्टी को परिपक्व हाथो में देने की वकालत की । यानी अमित शाह के नाम को लेकर दोनो का रुख नरम पड़ा नहीं था। यूं मोदी सरकार के नीतिगत फैसले और उसपर अमित शाह की खामोश मुहर ने भी बुजुर्ग और अनुभवी स्वयंसेवकों में अंसतोष पैदा किया है। मसलन कश्मीर में सरकार बीजेपी की भी है लेकिन धारा 370 जस का तस है। और माना जा रहा है मेहबूबा मुफ्ती के सीएम बनने के बाद धारा 370 को स्थायी भी बना दिया जायेगा। यानी बीजेपी श्यामाप्रसाद मुखर्जी की ही लाइन को भूल चुकी है । फिर स्वदेशी का नारा संघ परिवार से निकला लेकिन सरकार एफडीआई के रास्ते चल निकली है । किसान संध और आदिवासी कल्याण संघ सरकार के भूमि अधिग्रहण के रुख को लेकर नाराज है । जनसंघ के दौर से आदर्श गांव का जिक्र हुआ अब स्मार्ट सीटी का जिक्र हो रहा है । संघ को अंखड भारत पर सफाई देनी पड़ रही है और प्रदानमंत्री मोदी पाकिस्तान की पीएम को जन्मदिन की बधाई देने के लिये लाहौर जाकर देश को चौंका रहे हैं। यानी सवाल यह भी उठ रहे हैं कि क्या मोदी सरकार और बीजेपी के बीच राजनीतिक तालमेल नहीं है । संघ परिवार के सिद्दांत मोदी सरकार के दौर में बदल रहे है । या फिर सत्ता में आने के बाद से बीजेपी हो या संघ परिवार सभी की पहचान मोदी सरकार के निर्णयो पर आ टिकी है । यह ऐसे सवाल है जिसे लेकर पहली बार आरएसएस परेशान है । इसलिये जलगांव में संघ के कोर कमेटी की बैठक के
केन्द्र में वह सवाल है जिनके आसरे बीजेपी को परिपक्व नेतृत्व मिल सके या परिवपक्वता आ जाये। जनसंघ के दौर के नारे, एक निशान, एक विधान , एक प्रधान की सोच जाग सके। संघ की बुनियादी सोच को बीजेपी राजनीतिक तौर पर विस्तार दें । यानी मोदी के सत्ता में आने के बाद पहली बार संघ परिवार के भीतर इस बात को लेकर चिंता कही ज्यादा है कि राजनीतिक सफलता भर के लिये कहीं सामाजिक-आर्थिक जमीन पर से स्वयंसेवकों के पांव तो नहीं उखड़ रहे।

क्योंकि बीते हफ्ते ही इन्दौर में संघ की सभा हो या पुणे में संघ का समागम दोनो जगहों पर संघ के मुखिया ने सवाल सामाजिक मुद्दो के आसरे उठाये। तो सवाल यही है दिल्ली में अपनी सत्ता होने के बावजूद संघ अपने विस्तार के लिये अपने ही आधारो को अगर लगातार खंगाल रहा है तो फिर उसी के राजनीतिक संगठन बीजेपी को चुनावी जीत क्यो नहीं मिल पा रही है । और चुनाव में जीत अगर पार्टी सदस्य संख्या में बढोतरी या सांगठनिक ढांचे को दुरस्त करने के बाद भी नहीं मिल रही है तो क्या जिस परिपक्व नेतृत्व का सवाल आडवाणी जोशी उठा रहे हैं अब उस दिशा में बीजेपी को संघ ले जाना चाहेगा । यानी वैचारिक ताकत भी होनी चाहिये । जाहिर है संघ के कोर कमेटी की बैठक में इन सारे सवालो पर मंथन होगा । और माना जा रहा है कि 14 जनवरी को ही तमाम मशक्कत के बाद एलान होगा कि आखिर बीजेपी अध्यक्ष होगा कौन।