Tuesday, June 30, 2015

सत्ता का नया पाठ, राजनीति कीजिये नौकरी पाइए

75 के आंदोलन में छात्रों ने जेपी की पीछे खड़े होकर डिग्री गंवाई। नौकरी गंवाई। 89 के आंदोलन में वीपी के पीछे खड़े होकर छात्रों ने आरक्षण को डिग्री पर भारी पाया। सत्ता के गलियारे में जातिवाद की गूंज शुरु हुई। 2013 में सत्ता ने पहले अन्ना आंदोलन को हड़पा और फिर 2015 में सत्ता ने ही छात्रों को रोजगार का सियासी पाठ पढ़ाया। यानी पहली बार खुले तौर पर छात्रों को यह खुले संकेत दिये जा रहे है कि अगर वह राजनीतिक दलों से जुड़ते है तो सत्ता में आने के बाद छात्रो की डिग्री पर उनकी राजनीतिक सक्रियता भारी पड़ेगी। यानी जो छात्र राजनीति से दूर रहते है या सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान देते हुये अच्छे नंबरो के लिये दिन रात एक किये होते है आने वाले वक्त में उसका कोई महत्व बचेगा नहीं। यह सवाल इसलिये डराने लगा है क्योंकि इससे पहले यूपी में समाजवादी पार्टी की सत्ता तले यादवों के भर्ती के किस्से खूब रहे हैं। संयोग से इतनी बडी तादाद में खुले तौर पर जातीय आधार पर नौकरी बांटी गई कि भर्ती घोटाला शब्द ही यूपी की सत्ता के साथ जुड़ गया। मध्यप्रदेश में शिवराज चौहाण सरकार के दौर में व्यापम ने नौकरी को पूंजी से जोड़ दिया। करोडों के वारे-न्यारे के खेल इतने खुले तौर पर हुये कि जब पोटली खुलनी शुरु हुई तो राजनेता, नौकरशाह, बिजनेसमैन और दलालों की नैक्सस भी सामने आ गया। लेकिन ताजा मिसाल तो उन दो नेताओं की सत्ता से जा टिका है, जिन्होंने सत्ता के लिये भावनात्मक तौर पर वोटरों के दिल-दिमाग को छुआ। अर्से बाद इन दो नेताओं के गुस्से से भरे भाषणों को सुनकर वोटरों में यह एहसास जागा कि बदलाव की घड़ी अब उनके दरवाजे पर दस्तक दे ही देगी। क्योंकि एक तरफ नरेन्द्र मोदी का लुटियन्स की दिल्ली की रईसी पर सीधी चोट करना था तो दूसरी तरफ अरविन्द केजरीवाल का सामाजिक ढांचे को ही बदलने का प्रण था। मोदी के भाषणों ने छात्रो को इस हदतक प्रभावित किया कि 26 मई 2014 के तुरंत बाद ही एडमिशन से लेकर नौकरी पाने के हकदार छात्रों के सामने जैसे ही नंबर होने के बावजूद कही आरक्षण तो कही डोमिसाइल के चक्कर में एडमिशन ना हो पाने का संकट उभरा तो हर किसी ने पीएम मोदी को ही याद किया। कइयों ने पीएमओ के नाम मेल किये तो कईयो ने सोशल मीडिया का सहारा लिया। कुछ ऐसा ही नौकरी पाने का हकदार होने के बावजूद कही पैरवी तो कही राजनीतिक खेल की वजह से नौकरी ना मिल पाने वाले छात्रों ने भी अपने अपने तरीके से पीएम को ही याद किया।

क्योंकि राजनीतिक सत्ता के भीतर के मवाद को निकालने की कसम मोदी ने पीएम पद के लिये चुनावी प्रचार के वक्त की थी। छात्रों को ऐसी ही आशा केजरीवाल से भी जागी। खासकर दिल्ली में पढने के लिये आने वाले छात्रो ने महसूस किया कि केजरीवाल पढे लिखे हैं । नौकरी छोड़कर नेता बने हैं। तो सत्ता मिलने के बाद दिल्ली में छात्रों को संकट से निजात मिलेगा। एडमिशन हो या पढाई के बाद नौकरी का सवाल दोनों दिशा में दिल्ली सरकार कदम जरुर उठायेगी। दोनों ही नेताओं को लेकर छात्रों में आस इस हद तक हुई कि प्रधानमंत्री मोदी के पद संभालते ही सारी मुश्किले छूमंतर हो जायेगी कुछ एसा ही 88 फीसदी नंबर पाने के बाद पूना में कहीं दाखिला ना होने पर य़श को लगा और उसने अगस्त-सितबंर 2014 में ही पीएमओ में मेल कर अपना गुस्सा निकाला। तो दिल्ली में जिस तरह राजस्थान छात्र को 92 फीसदी नेबर आने पर भी दिल्ली विश्वविघालय में नामांकन ना मिला उसने केजरीवाल और देश की शिक्षा मंत्री को मेल कर अपना गुस्सा निकला । मुश्किल गुस्सा निकालने भर की नहीं है । मुस्किल है कि राजनेताओं और राजनीति से गुस्से में आया युवा तबका ही तो 2011-12 में दिल्ली के जंतर-मंतर और रामलीला मैदान में जुटता था । और देखते देखते देश के शहर दर शहर में रामलीला मैदान ओऔर जंतर मंतर बनने लगे थे । जिससे पारंपरिक राजनीतिक सत्ता की चूले हिलेने लगी थी और उसी के बाद केजरीवाल हो या मोदी दोनों ने ही जनता के आक्रोष की इसी नब्ज को पकडा । पहली बार राजनीतिक भाषणो में बख्शा किसी को नहीं गया। मोदी ने गांधी परिवार से लेकर दामाद राबर्ट वाड्रा और किसान मजदूर से लेकर शिक्षा की खास्ता हालात पर जमकर अपनी जुबां से कोडे चलाये । अच्छा लगा । कोई नेता तो लग दिख रहा है । इसी तर्ज पर केजरीवाल ने भी बख्शा किसी को नहीं । जो भ्रष्ट थे । जो दागी
थे। जो मालामाल थे । जो लूट का नैक्सेस बनाये हुये देश को खोखला कर रहे थे। सभी को निशाने पर लिया । युवा साथ कड़े हुये क्योंकि यह जुबां बदलाव वाले थे । लेकिन सत्ता संभालने के साथ ही सच जिस खौफनाक तरीके से दस्तक देने लगा उसने उन्ही छात्रों-युवाओं के सामने अंधेरा कर दिया जो आस लगाये बैठे थो कि उनकी काबिलियत को तो मौका मिलेगा ही । सत्ता केजरीवाल के हाथ आई तो पहली नजर कैडर को ही नौकरी देने या दिल्ली सरकार में काम पर ल गाने की शिरी हुई। चूंकि केजरीवाल का कैडर पारंपरिक राजनीतिक कैडर से अलग था। आम आदमी पार्टी को संभालने वाले या तो केजरीवाल के एनजीओ के साथी है या फिर प्रोपेशनल्स की कतार जो राजनीति की मार तले बदलाव के लिये केजरीवाल में अपना अक्स देखने लगी।

और तीसरी कतार दिल्ली हरियाण के उम मुफलिसी में खोये छात्रों की है जो केजरीवाल के विस्तार के साथ अपना विस्तार भी देख रहे थे। तो उनके लिये किसी परिक्षा की तैयारी के सामान ही राजनीतिक संघर्ष करना। तो सीएम बनते ही सबसे पहले उसी कैडर को नौकरी पर लगाना प्राथमिकता बनी। दिल्ली में ही करीब दो से तीन हजार कैडर महीने की तयशुदा रकम पा कर दिल्ली सरकार की राजनीतिक नौकरी कर रहा है। यानी जो काम प्रोफेशनल्स के हाथ में होना चाहिये या जिस काम के लिये सत्ता को पढ़े लिके छात्रों के बीच समानता के साथ नौकरी दी जानी चाहिये उसमें प्राथमिकता या कहे समूचा रोजगार ही अपने कैडर में बांट दिया गया। जबकि दिल्ली का सच बेरोजगारी को लेकर कम डराने वाला नहीं है । दिल्ली में दो लाख से ज्यादा बेरोजगार ग्रेजुएट और पोस्ट-ग्रेजुएट हैं। औप पढ़े लिखे बेरोजगारो की तादाद तो 15 लाख के पार हैं। तो यह सवाल किसी भी जहन में आ सकता है कि सिर्फ अपने कैडर के काम के आसरे तो दिल्ली में राजनीति संघर्ष केजरीवाल ने खड़ा नहीं किया उसमे भ्रष्ट व्यवस्था की मार खाया युवा तबका भी होगा। तो उसका ख्याल कैन करेगा। या फिर सियासी आरक्षण तले अगर कैडर को ही सारी सुविधा मिलेगी तो फिर दूसरे नेता और पार्टी से केजरीवाल और आम आदमी पार्टी अलग कैसे हुई । यही सवाल नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद के हालात से समझा जा सकता है। देश के अलग अलग विश्वविद्यालयों औररिसर्च इस्टटीयूट में बीजेपी के छात्र संगठन अखिल बारतीय विघार्थी परिषद  में रहे छात्रों को प्रथमिकता मिलने लगी। मसलन हाल में एबीवीपी के तीस छात्रो को अलग अलग जगहो पर एडहोक तरीके से निटुक्त कर दिया गया । बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी में भी पांच एबीवीपी छात्रो को लेक्चरर की नौकरी मिल गई। इसके अलावे में झटके में केन्द्र में सरकार बीजेपी की बनी तो
संघ से जुडे तमाम इंसटीट्यूट को बजट से लेकर बाकी सुविधायें मानव संसाधन मंत्रालय से मिलने लगी। तो वहा भी संघ विचारधारा से जुडे छात्रों को रोजगार मिलने लगा। और नौकरी पाने के पायदान पर सबसे आगे खडा छात्र राजनीतिक कनेक्शन खोजने में भटकने लगा। जयपुर में तो बीजेपी का दफ्तर ही कैडर के रोजगार के लिये खुल गया। जो बीजेपी के साथ खड़ा है उसकी पर्ची पर रोर से लेकर उसके उम्मीदवार की ट्रांसफर पोस्टिग तक होने लगी। यानी छात्र हो या शिक्षक उसका राजनीतिकरण होना कितना जरुरी है यह केन्द्रीय विघालयों में गर्मी छुट्टियों के वक्त होने वाले ट्रांसफर-पोस्टिंग से भी समझा जा सकता है। हर शिक्षक को कम से कम दो या तीन बरस तो एक जगह गुजरना ही पता है। लेकिन बीजेपी के साथ जुड़े हैं। संघ के किसी स्वयंसेवक की चिट्टी है तो दो से तीम नहीने के भीतर ही इस बार मनमाफिक जगह पर ट्रांसफर कर दिया गया। बच्चों के एडमिशन का कोटा मानवसंसाधन मंत्रालय का साढे चार सौ छात्रो का है। लेकिन बीजेपी/संघ की सक्रियता का आलम यह है कि जून तक केन्द्रीय विद्यालयों को साढे चार हजार बच्चों के एडमिशन की पर्ची देश के हर स्कूल में जा चुकी है।

यानी छात्र सिर्फ पढलिखकर आगे बढना चाहे तो उसका राजनीतिक अज्ञान उसके सामने रोड़ा बनेगा। और अगर इस दिशा में बचे तो सामने कंपटिशन की परिक्षाओं में करोडों के वारे न्यारे करने वाला नैक्सस आकर खड़ा हो जायेगा। और असर इसी का है कि इस बार देशभर के साढे तेरह लाख से ज्यादा छात्रों के सामने यह सवाल खड़ा हो गया कि हर परीक्षा पेपर अगर लीक होगा तो फिर वे करेंगे क्या। क्योंकि सीबीएसई की
एआईपीएमटी की परीक्षा तो सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर फटाफट अगले हफ्ते कराया जा रहा है जिसमें साढे छह लाख छात्र परीक्षा देगें । लेकिन जरा कल्पना किजिये लेकिन एमयू की मेडिकल परीक्षा , इंजीनियरिंग परीक्षा ,
बीडीएस परीक्षा , यूपी की पीसीएस परीक्षा और पीएमटी परीक्षा  सभी तो इस बार रद्द होगई । क्योकि इसके पीछे का नैक्सेस बताता है कि जिनके पास पैसा है उनके लिये इन परिक्षाओ को पास करना कितना आसान बना दिया गया है । और हर रैकेट के तार उसी राजनीति से जा जुडते है जहा पैसो का लेन-देन नेताओं
के कद को बढा करता है और उसके बाद राजनीतिक सत्ता हासिल करने के लिये शिक्षा में सुधार या शिक्षा माफिया पर नकेल कसने के वादे कर पढने लिखने वाले छात्रो की भावनाओ को अपने साथ करने के लिये ईमानदार दिखने काराजनीतिक प्रहसन खुले आम होता है। क्योंकि किसी सत्ता के पास ना तो शिक्षा का और ना ही समाज को आगे ले जाने का कोई ब्लू प्रिंट है। सिवाय पूंजी बनाने और ज्यादा से ज्यादा उपभोक्ता पैदा कर देश को बाजार में बदलने की सोच हर सत्ता के पास के जरुर है । और असर इसी का है कि बढती
बेरोजगारी के बीच मलाईदार नौकरी का रास्ता जहा धंधे या कहे येन –केन प्रकारेण से हो जाये ओऔर वरदहस्त सत्ता का ही रहे तो फिर छात्रो का भविष्य ही नहीं बल्कि देश का भविष्य भी माफिया रैकेट में फंस रहा है इससे
इंकार कौन कैसे करेगा ।

Friday, June 26, 2015

सत्ता की ताकत तले ढहते संस्थान

याद कीजिये तो एक वक्त सीबीआई, सीवीसी और सीएजी सरीखे संवैधानिक संस्थानों की साख को लेकर आवाज उठी थी। वह दौर मनमोहन सिंह का था और आवाज उठाने वाले बीजेपी के वही नेता थे जो आज सत्ता में हैं। और अब प्रधानमंत्री मोदी की सत्ता के आगे नतमस्तक होते तमाम संस्थानों की साख को लेकर कांग्रेस
समेत समूचा विपक्ष ही सवाल उठा रहा है। तो क्या आपातकाल के चालीस बरस बाद संस्थानों के ढहने और राजनीतिक सत्ता की आकूत ताकत के आगे लोकतंत्र की परिभाषा भी बदल रही है। यानी आपातकाल के चालीस बरस बाद यह सवाल बड़ा होने लगा है कि देश में राजनीतिक सत्ता की अकूत ताकत के आगे क्यों कोई संस्था काम कर नहीं सकती या फिर राजनीतिक सत्ता में लोकतंत्र के हर पाये को मान लिया जा रहा है। क्योंकि इसी दौर में भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को लेकर संसद की स्टैंन्डिग कमेटी बेमानी साबित की जानी लगी। राज्य सभा की जरुरत को लेकर सवाल उठने लगे। और ऊपरी सदन को सरकार के कामकाज में बाधा माना जाने लगा।

न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर सत्ता ने सवाल उठाये। कोलेजियम के जरीये न्यायपालिका की पारदर्शिता देखी जाने लगी। कारपोरेट पूंजी के आसरे हर संस्थान को विकास से जोड़कर एक नई परिभाषा तय की जाने लगी। कामगार यूनियनें बेमानी करार दे दी गई या माहौल ही ऐसा बना दिया गया है जहां विकास के रास्ते में यूनियन का कामकाज रोड़ा लगने लगे। किसानो से जुड़े सवाल विकास की योजनाओं के सामने कैसे खारिज हो सकते है यह आर्थिक सुधार के नाम पर खुल कर उभरा। सत्ताधारी के सामने नौकरशाही चूहे में बदलती दिखी। और यह सब झटके में हो गया ऐसा भी नहीं है । बल्कि आर्थिक सुधार के बाद देश को जिस रास्ते पर लाने का प्रयास किया गया उसमें ‘ पंजाब, सिंध , गुजरात,मराठा / द्रविड, उत्कल बंग ...” सरीखी सोच खारिज होने लगी । क्योकि भारत की विवधता , भारत के अनेक रंगो को पूंजी के धागे में कुछ इस तरह पिरोने की कोशिश शुरु हुई कि देश के विकास या उसके बौद्दिक होने तक को मुनाफा से जोडा जाने लगा । असर इसी का है कि विदेशी पूंजी के बगैर भारत में कोई उत्पाद बन नहीं सकता है यह संदेश जोर-शोर से दी जाने लगी । लेकिन संकट तो इसके भी आगे का है ।

भारत को लेकर जो समझ संविधान या राष्ट्रगीत या राष्ट्रगान तक में झलकती है उसे सत्ता ने अपने अनुकूल विचारधारा के जरीये हडपने की समझ भी विकसित कर ली। असर इसी का हुआ कि बाजारवाद की विचारधारा ने विकास के नाम पर संस्थानों के दरवाजे बंद कर दिये। तो एक वक्त सूचना के अधिकार के नाम पर हर संस्थान के दरवाजे थोड़े बहुत खोल कर लोकतंत्र की हवा सत्ता के जरीये बहाने की कोशिश हुई। तो मौजूदा वक्त में जनादेश के आसे सत्ता पाने वालो ने खुद को ही लोकतंत्र मान लिया और हर दरवाजे अपने लिये खोल कर साफ संकेत देने की कोशिश शुरु की पांच बरस तक सत्ता की हर पहल देश के लिये है । तो इस घड़ी में सूचना का अधिकार सत्ता की पंसद नापंसद पर आ टिका। और सत्ता जिस विचारधारा से निकली उसे राष्ट्रीय धारा मान कर राष्ट्रवाद की परिकल्पना भी सियासी विचारधारा के मातहत ही परिभाषित करने की कोशिश शुरु हुई। इसी का असर नये तरीके से शुरु हुआ कि हर क्षेत्र में सत्ता की मातृ विचारधारा को ही राष्ट्र की विचारधारा मानकर संविधान की उस डोर को ही खत्म करने की पहल होने लगी जिसमें नागरिक के अधिकार राजनीतिक सत्ता से जुड़े बगैर मिल नहीं सकते। हर संस्थान के बोर्ड में संघ के पंसदीदा की नियुक्ती होने लगी। गुड गवर्नेंस झटके में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के आईने में कैसे उतारा गया यह किसी को पता भी नहीं चला या कहे सबको पता चला लेकिन इसे सत्ता का अधिकार मान लिया गया । बच्चों के मन से लेकर देश के धन तक पर एक ही विचारधारा के लोग कैसे काबिज हो सारे यत्न इसी के लिये किये जाने लगे। नवोदय विघालय हो या सीबाएसई बोर्ड। देश के 45 केन्द्रीय विश्विघालय हो या उच्च शिक्षा के संस्थान आईआईटी या आईआईएम हर जगह को भगवा रंग में रंगने की कोशिश शुरु हुई। उच्च शिक्षण संस्थानों की स्वायत्ता को सत्ता अपने अधिन लाने के लिये मशक्कत करने लगी। और विचारधारा के स्तर पर शिमला का इंडियन काउंसिल आफ हिस्टोरिकल रिसर्च रेसंटर हो या इंडियन काउंसिल आफ सोशल साइंस रिसर्च या पिर एनसीईआरटी हो या यूजीसी। बोर्ड में ज्ञान की परिभाषा विचारधारा से जोड़कर देखी जाने लगी। यानी पश्चमी सोच को शिक्षा में क्यो मान्यता दें जब भारत की सांस्कृतिक विरासत ने दुनिया को रोशनी दी। और राष्ट्रवाद की इस सोच से ओत प्रोत होकर तमाम संस्थानो में वैसे ही लोग निर्णय लेने वाली जगह पर नियुक्त होने लगे जो सांस्कृतिक राष्ट्वाद की बीजेपी या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नजदीक रहे। यानी यहा भी यह जरुरी नहीं हा कि वाकई जो संघ की समझ हेडगेवार से लेकर गोलवरकर होते हुये देवरस तक बनी उसकी कोई समझ नियुक्त किये गये लोगो में होगी या फिर श्यामाप्रसाद मुखर्जी या दीन दयाल उपाध्याय की राजनीतिक सोच को समझने-जानने वाले लोगो को पदों पर बैठाया गया ।

दरअसल सत्ता के चापलूस या दरबारियो को ही संस्थानों में नियुक्त कर अधिकार दे दिये गये जो सत्ता या संघ का नाम जपते हुये दिखे । यानी पदों पर बैठे महानुभाव अगर सत्ता या संघ पाठ अविरल करते रहेंगे तो संघ का विस्तार होगा और सत्ता ताकतवर होगी यह सोच नये तरीके से विचारधारा के नाम पर विकसित हुई। जिसने उन संस्थानों की नींव को ही खोखला करना शुरु कर दिया जिन संस्थानों की पहचान दुनिया में रही। आईसीसीआर हो या पुणे का फिल्म इस्टीटयूट यानी एफटीआईई या पिर सेंसर बोर्ड हो या सीवीसी सरीखे
संस्थान, हर जगह दिन हाथो में बागडोर दी गई उनके काम के अनुभव या बौद्दिक विस्तार का दायरा उन्हें संस्थान से ही अभी ज्ञान अर्जित करने को कहता है लेकिन आने वाली पीढ़ियों को जब वह ज्ञान बांटेंगे तो तो निश्चित ही वही समझ सामने होगी जिस समझ की वजह से उन्हे पद मिल गया। तो फिर आने
वाला वक्त होगा कैसा या आने वाले वक्त में जिस युवा पिढी के कंघों पर देश का भविष्य है अगर उसे ही लंबे वक्त तक सत्ता अपनी मौजूदगी को श्रेष्ठ बताने वाले शिक्षकों की नियुक्ति हर जगह कर देती है तो फिर बचेगा क्या । यह सवाल अब इसलिये कही ज्यादा बड़ा हो चला है कि राजनीतिक सत्ता यह मान कर
चल रही है कि उसकी दुनिया के अनुरुप ही देश को ढलना होगा। तो कालेजों में उन छात्रों को लेक्चरर से लेकर प्रोफेसर बनाया जा रहा है,जो छात्र जीवन में सत्ताधारी पार्टी के छात्र संगठन से जुड़े रहे हैं। यानी मौजूदा वक्त बार बार एक ऐसी लकीर खींच रहा है जिसमें सत्ताधारी राजनीतिक दल या उसके संगठनों के साथ
अगर कोई जुड़ाव आपका नहीं रहा तो आप सबसे नाकाबिल हैं। या आप किसी काबिल नहीं है। मुस्किल तो यह है कि समझ का यह आधार अब आईएएस और आईपीएस तक को प्रभावित करने लगा है। बीजेपी शासित राज्यों में कलेक्टर, डीएम एसपी तक संघ के पदाधिकारियो के निर्देश पर चलने लगे है। ना चले तो नौकरी मुश्किल और चले तो सारे काम संघ के विस्तार और सत्ता के करीबियों को बचाने के लिये । तो क्या चुनी हुई सत्ता ही लोकतंत्र की सही पहचान है। ध्यान दें तो मौजूदा वक्त में भी मोदी सरकार को सिर्फ 31 फीसदी वोट ही मिले। वहीं जिन संवैधानिक संस्थानों को लेकर मनमोहन सिंह के दौर में सवाल उठे थे तब काग्रेस को भी 70 करोड़ वोटरों में से महज साढे ग्यारह करोड ही वोट मिले थे। बावजूद इसके कांग्रेस की सत्ता से जब अन्ना और बाबा रामदेव टकराये तो कांग्रेस ने खुले तौर पर हर किसी को चेतावनी भरे लहजे में वैसे ही तब कहा था कि चुनाव लड़कर जीत लें तभी झुकेंगे। लेकिन मौजूदा वक्त भारतीय राजनीति के लिये इसलिये नायाब है
क्योंकि जनादेश के घोड़े पर सवार मोदी सरकार ने अपना कद हर उस साथी को दबा कर बडा करने की कवायद से शुरु की जो जनादेश दिलाने में साथ रहा । और जो सवाल कांग्रेस के दौर में बीजेपी ने उठाये उन्ही सवालो को मौजूदा सत्ता ने दबाने की शुरुआत की। दरअसल पहली बार सवाल यह नहीं है कि कौन गलत है या कौन सही ।
सवाल यह चला है कि गलत सही को परिभाषित करने की काबिलियत राजनीतिक सत्ता के पास ही होती है । और हर क्षेत्र के हर संस्थान का कोई मतलब नहीं है क्योंकि विकास की अवधारणा उस पूंजी पर जा टिकी है जो देश में है नहीं और विदेश से लाने के लिये किसान मजदूर से लेकर उहोगपतियो से लेकर देसी कारपोरेट तक को दरकिनार किया जा सकता है। तो मौजूदा वक्त में सत्ता के बदलने से उठते सवाल बदलते नजरिये भर का नहीं है बल्कि सत्ता के अधिक संस्थानों को भी सत्ता की ताकत बनाये रखने के लिये कही ढाल तो कही हथियार बनाया जा सकता है । और इसे खामाशी से हर किसी को जनादेश की ताकत माननी होगी क्योंकि यह आपातकाल नहीं है।

Thursday, June 18, 2015

मौजूदा मीडिया बनाम आपातकाल के दौर की पत्रकारिता


क्या मौजूदा वक्त में मीडिया इतना बदल चुका है कि मीडिया पर नकेल कसने के लिये अब सरकारों को आपातकाल लगाने की भी जरुरत नहीं है। यह सवाल इसलिये क्योंकि चालीस साल पहले आपातकाल के वक्त मीडिया जिस तेवर से पत्रकारिता कर रहा था आज उसी तेवर से मीडिया एक बिजनेस मॉडल में बदल चुका है, जहां सरकार के साथ खड़े हुये बगैर मुनाफा बनाया नहीं जा सकता है। और कमाई ना होगी तो मीडिया हाउस अपनी मौत खुद ही मर जायेगा। यानी 1975 वाले दौर की जरुरत नहीं जब इमरजेन्सी लगने पर अखबार के दफ्तर में ब्लैक आउट कर दिया जाये। या संपादकों को सूचना मंत्री सामने बैठाकर बताये कि सरकार के खिलाफ कुछ लिखा तो अखबार बंद हो जायेगा। या फिर पीएम के कसीदे ही गढ़े। अब के हालात और चालीस बरस पहले हालात में कितना अंतर आ गया है।

यह समझने के लिये 40 बरस पहले जून 1975 में लौटना होगा। आपातकाल लगा तो 25 जून की आधी रात के वक्त लेकिन इसकी पहली आहट 12 जून को तभी सुनायी दे गई जब इलाहबाद हाईकोर्ट ने इंदिरागांधी के खिलाफ फैसला सुनाया और समाचार एजेंसी पीटीआई ने पूरे फैसले को जस का तस जारी कर दिया। यानी शब्दों और सूचना में ऐसी कोई तब्दिली नही की जिससे इंदिरागांधी के खिलाफ फैसला होने के बाद भी आम जनता खबर पढने के बाद फैसले की व्याख्या सत्ता के अनुकूल करें । हुआ यही कि आल इंडिया रेडियो ने भी समाचार एजेंसी की कापी उठायी और पूरे देश को खबर सुना दी कि, श्रीमति गांधी को जन-प्रतिनिधित्व कानून की धारा 123 [ 7 ] के तहत भ्रष्ट साधन अपनाने के लिये दोषी करार दिया गया । और प्रधानमंत्री को छह वर्षों के लिये मताधिकार से वंचित किया गया। और 600 किलोमीटर दूर बारत की राजधानी नई दिल्ली में इलाहबाद में दिये गये फैसले की खबर एक स्तब्धकारी आघात की तरह पहुंची। इस अविश्वसनीय खबर ने पूरे देश को ही जैसे मथ डाला। एक सफदरजंग मार्ग पर सुरक्षा प्रबंध कस दिये गये। ट्रकों में भरकर दिल्ली पुलिस के सिपाही पहुंचने लगे। दल के नेता और कानूनी विशेषज्ञ इंदिरा के पास पहुंचने लगे। घर के बाहर इंदिरा  के समर्थन में संगठित प्रदर्शन शुरु हो गये। दिल्ली परिवहन की कुल 1400 बसों में से 380 को छोडकर बाकी सभी बसों को भीड़ लाद लाद कर प्रदर्शन के लिये 1, सफदरजंग पहुंचाने पर लगा दिया गया । और यह सारी रिपोर्ट भी
समाचार एजेंसी के जरीये जारी की जाने लगी। असल में मीडिया को ऐसे मौके पर कैसे काम करना चाहिये या सत्ता को कैसे काम लेना चाहिये यह सवाल संजय गांधी के जहन में पहली बार उठा।

और संजय गांधी ने सूचना प्रसारण मंत्री इन्द्र कुमार गुजराल को बुलाकर खूब डपटा कि प्रधानमंत्री के खिलाफ इलाहबाद हाईकोर्ट के पैसले को बताने के तरीके बदले भी तो जा सकते थे। उस वक्त आल इंडिया रेडियो में काम करने वाले न्यूज एडिटर कपिल अग्निहोत्री के मुताबिक वह पहला मौका था जब सत्ता को लगा कि खबरें उसके खिलाफ नही जानी चाहिये। और पहली बार समाचार एजेंसी पीटीआई-यूएनआई को चेताया गया कि बिना जानकारी इस तरह से खबरें जारी नहीं करनी है। और चूंकि तब समाचार एजेंसी टिकी भी सरकारी खर्च पर ही थी तो संजय गांधी ने महसूस किया कि जब समाचार एजेंसी के कुल खर्च का 80 फिसदी रकम सरकारी खजाने से जाती है तो फिर सरकार के खिलाफ खबर को एजेंसियां क्यों जारी करती है । उस वक्त केन्द्र सरकार रेडियो की खबरों के लिये 20 से 22 लाख रुपये समाचार एजेंसी पीटीआई-यूएनआई को देती थी । बाकि समाचार पत्र जो एजेंसी की सेवा लेते वह तीन से पांच हजार से ज्यादा देते नहीं थे। यानी समाचार एजेंसी तब सरकार की बात ना मानती तो एजेंसी के सामने बंद होने का खतरा मंडराने लगता। यह अलग मसला है कि मौजूदा वक्त में सत्तानुकूल हवा खुद ब खुद ही एजेंसी बनाने लगती है क्योंकि एजेंसियों के भीतर इस बात को लेकर ज्यादा प्रतिस्पर्धा होती है कि कौन सरकार या सत्ता के ज्यादा करीब है । लेकिन दिलचस्प यह है आपातकाल लगते ही सबसे पहले आपातकाल का मतलब होता क्या है इसे सबसे पहले किसी ने महसूस किया तो सरकारी रेडियो में काम करने वालों ने ही । और पहली बार आपातकाल लगने के बाद सुबह तो हुई लेकिन मीडिया के लिये 25 जून 1975 की रात के आखरी पहर में ही घना अंधेरा छा गया । असल में उसी रात जेपी यानी जयप्रकाश नारायण को गांधी पीस फाउंडेशन के दफ्तर से गिरफ्तार किया गया और जेपी ने अपनी गिरप्तारी के वक्त मौजूद पत्रकारों से जो शब्द कहे उसे समाचार एंजेसी ने जारी तो कर दिया लेकिन चंद मिनटों में ही जेपी के कही शब्द वाली खबर किल..किल..किल कर जारी कर दी गई । और समूचे आपाकताल के दौर यानी 18 महीनों तक जेपी के शब्दो को किसी ने छापने की हिम्मत नहीं की । और वह शब्द था , “ विनाशकाले विपरीत बुद्दी “ । जेपी ने 25 की रात अपनी गिरफ्तारी के वक्त इंदिरा गांधी को लेकर इस मुहावरे का प्रयोग किया था कि जब विनाश आता है तो दिमाग भी उल्टी दिशा में चलने लगता है । कपिल अग्निहोत्री के मुताबिक वह रात उनके लिये वाकई खास थी । क्योंकि उनका घर रउफ एवेन्यू की सरकारी कालोनी में था। जो गांधी पीस फाउंडेशन के ठीक पीछे की तरफ थी । तो रात का बुलेटिन कर जब वह घर पहुंचे और खाने के बाद पान खाने के लिये मोहन सिंह प्लेस निकले तबतक उनके मोहल्ले में सबकुछ शांत था । लेकिन जब वापस लौटे को बडी तादाद में पुलिस की मौजूदगी देखी । एक पुलिस वाले से पूछा, क्या हुआ है। तो उसने जबाब देने के बदले पूछा, तुम किधर जा रहे है। इसपर जब अपने घर जाने की बातकही तो पुलिस वाले ने कहा देश में इमरजेन्सी लग गई है। जेपी को उठाने आये हैं। और कपिल अग्निहोत्री के मुताबिक उसके बाद तो नींद और नशा दोनों ही फाख्ता हो गये। स्कूटर वापस मोड़ रेडियो पहुंच गये। रात डेढ बडे न्यूज डायरेक्टर भट साहेब को फोन किया तो उन्होने पूछी इतना रात क्या जरुरत हो गई । जब आपातकाल लगने और जेपी की गिरफ्तारी अपनी आंखों से देखने का जिक्र किया तो भट साहेब भी सकते में आ गये। खैर उसके बाद ऊपर से निर्देश या कि सुबह आठ बजे के पहले बुलेटिन में आपातकाल की जानकारी और उस पर नेता, मंत्री , सीएम की प्रतिक्रिया ही जायेगी। इस बीच पीटीआई ने जेपी की गिरफ्तारी की खबर, विनाशकाले विपरित बुद्दी के साथ भेजी जिसे चंद सेकेंड में ही किल किया जा चुका था। तो अब समाचार एंजेसी पर नहीं बल्कि खुद ही सभी की प्रतिक्रिया लेनी थी तो रात से ही हर प्रतिक्रिया लेने के लिये फोन घनघनाने लगे। पहला फोन बूटा सिंह को किया गया। उन्हें जानकारी देकर उनकी प्रतिक्रिया पूछी तो जबाब मिला, तुस्सी खुद ही लिख दो, मैनू सुनाने दी जरुरत नही हैगी। मै मुकरुंगा नहीं। इसी तरह कमोवेश हर सीएम , नेता ने यही कहा कि आप खुद ही लिख दो। कपिल अग्निहोत्री के मुताबिक सिर्फ राजस्थान के सीएम सुखाडिया ने एक अलग बात बोली कि लिख तो आप ही दो लेकिन कड़क लिखना। अब कडक का मतलब आपातकाल में क्या हो सकता है यह कोई ना समझ सका। लेकिन सभी नेता यह कहकर सो गये ।

और अगली सुबह जब बुलेटिन चला तो पहली बार समाचार एजेंसी के रिपोर्टर आल इंडिया रेडियो पहुंचे। सारे नेताओ का प्रतिक्रिया लिखकर ले गये। और उसी वक्त तय हो गया कि अब देश भर में फैले पीआईबी और आलइंडिया रेडियो ही खबरों का सेंसर करेंगे। यानी पीआईबी हर राज्य की राजधानी में खुद ब खुद खबरों को लेकर दिशा-निर्देश बताने वाला ग्राउंड जीरो बन गया। यानी मौजूदा वक्त में पीआईओ के साथ खड़े होकर जिस तरह पत्रकार खुद को सरकार के साथ खडे होने की प्रतिस्पर्धा करते है वैसे हालात 1975 में नहीं थे। यह जरुर था कि सरकारी विज्ञापनों के लिये डीएवीपी के दप्तर के चक्कर जरुर अखबारो के संपादक लगाते। क्योंकि उस
वक्त डीएवीपी का बजट सालाना दो करोड़ रुपये का था। लेकिन अब के हालात में तो विज्ञापन के लिये सरकारों के सामने खबरो को लेकर संपादक नतमस्तक हो जाते हैं क्योंकि हर राज्य के पास हजारो करोड़ के विज्ञापन का बजट होता है। इसे एक वक्त हरियाणा के सीएम हुड्डा ने समझा तो बाद में राजस्थान मे
वसुधंरा से लेकर बिहार में नीकिश कुमार से लेकर दिल्ली में केजरीवाल तक इसे समझ चुके है। यानी अब खबरो को स्थायी पूंजी की छांव भी चाहिये। लेकिन अब की तुलना में चालिस बरस के कई हालात उल्टे भी थे। मसलन अभी संघ की सोच के करीबियों को रेडियो, दूरदर्शन से लेकर प्रसार भारती और सेंसर
बोर्ड से लेकर एफटीआईआई तक में फिट किया जा रहा है तो चालीस साल पहले आपातकाल लगते ही सरकार के भीतर संघ के करीबियों और वामपंथियों की खोज कर उन्हें या तो निकाला जा रहा था या हाशिये पर ढकेला जा रहा था । वामपंथी धारा वाले आंनद स्वरुप वर्मा उसी वक्त रेडियो से निकाले गये। हालांकि स
वक्त उनके साथ साम करने वालो ने आईबी के उन अधिकारियो को समझाया कि रेडियो में कोई भी विचारधारा का व्यक्ति हो उसके विचारधारा का कोई मतलब नहीं है क्योंकि खबरो के लिये पुल बनाये जाते हैं। यानी जो देश की खबरें जायेगी उसके लिये पुल वन, विदेशी खबोर क लिये पुल दू । और जिन खबरों को
लेना है जब वह सेंसर होकर पुल में लिखी जा रही है और उससे हटकर कोई दूसरी खबर जा नहीं सकती तो फिर विचारधारा का क्या मतलब। और आनंद स्वरुप वर्मा तो वैसे भी उस वक्त खबरों का अनुवाद करते हैं। क्योंकि पूल में सारी खबरें अंग्रेजी में ही लिखी जातीं। तो अनुवादक किसी भी धारा का हो सवाल तो अच्छे
अनुवादक का होता है। लेकिन तब अभी की तरह आईबी के अधिकारियों को भी अपनी सफलता दिखानी थी तो दिखायी गई। फिर हर बुलेटिन की शुरुआत प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने नाम से होनी चाहिये। यानी इंदिरा गांधी ने कहा है। और अगर किसी दिन कही भी कुछ नहीं कहा तो इंदिरा गांधी ने दोहराया है कि...,
या फिर इंदिरा गांधी के बीस सूत्री कार्यक्रम में कहा गया है कि.. । यानी  मौजूदा वक्त में जिस तरह नेताओ को सत्ताधारियों को कहने की जरुरत नहीं पडती और उनका नाम ही बिकता है तो खुद ब खुद ही अब तो नेताओं को खुश करने के लिये उनके नाम का डंका न्यूज चैनलों में बजने लगता है। वह चालीस बरस
पहले आपाताकाल के दबाब में कहना पड़ रहा था। फिर बडा सच यह भी है कि मौजूदा वक्त में जैसे गुजरात के रिपोर्टरों या पीएम के करीबी पत्रकारों को अपने अपने सस्थानो में जगह मिल रही है चालिस साल पहले आपातकाल के वक्त जेपी के दोलन पर नजर रखने के लिये खासतौर से तब बिहार में चाक चौबंद
व्यवस्था की गई। चूंकि रेडियो बुलेटिन ही सबकुछ होता था तो पटना में होने शाम साढे सात बजे के सबसे लोकप्रिय बुलेटिन के लिय़े शम्भूनाथ मिश्रा तो रांची से शाम छह बजकर बीस मिनट पर नया बुलेटिन शुरु करने के लिये मणिकांत वाजपेयी को दिल्ली से भेजा गया। फिर अभी जिस तरह संपादकों को अपने अनुकूल करने केलिये प्रधानमंत्री चाय या भोजन पर बुलाते हैं।

या फिर दिल्चस्प यह भी है कि चालीस बरस पहले जिस आपातकाल के शिकार अरुण जेटली छात्र नेता के तौर पर हुये वह भी पिछले दिनो बतौर सूचना प्रसारण मंत्री जिस तरह संपादकों से लेकर रिपोर्टर तक को घर बुलाकर अपनी सरकार की सफलता के प्रचार-प्रसार का जिक्र करते रहे। और बैठक से निकलकर कोई संपादक बैठक की बात तो दूर बल्कि देश के मौजूदा हालात पर भी कलम चलाने की हिम्मत नहीं रख पाता है । जबकि आपातकाल लगने के 72 घंटे के भीतर इन्द्र कुमार गुजराल की जगह विघाचरण शुक्ल सूचना प्रसारण बनते ही संपदकों को बुलाते हैं। और दोपहर दो बजे मंत्री महोदय पद संभालते है तो पीआईबी के प्रमुख सूचना अधिकारी डां. ए आर बाजी शाम चार दिल्ली के बडे समाचार पत्रा को संपादकों को बुलावा भेजते है। मुलगांवकर { एक्सप्रेस } ,जार्ज वर्गीज { हिन्दुस्तान टाइम्स },गिरिलाल जैन { स्टेटेसमैन  } , निहालसिंह {स्टेटसमैन }  और विश्वनाथ { पेट्रियाट  } पहुंचते हैं। बैठक शुरु होते ही मंत्री महोदय कहते है कि सरकार संपादकों के कामकाज के काम से खुश नहीं है। उन्हें अपने तरीके बदलने होंगे। इसपर एक संपादक जैसे ही बोलते हैं कि ऐसी तानाशाही को स्वीकार करना उनके लिये असम्भव है। तो ठीक है कहकर मंत्री जी भी उत्तर देते है कि , “ हम देखेगें कि आपके अखबार से कैसा बरताव किया जाये “ । तो गिरिलाल जैन बहस करने के लिये कहते हैं कि ऐसे प्रतिबंध तो अंग्रेजी शासन में भी नहीं लगाय़े गये थे। शुक्ल उन्हें बीच में ही काट कर कहते है , “यह अंग्रेजी शासन नहीं है । यह राष्ट्रीय आपातस्थिति है “।  और इसके बाद संवाद भंग हो जाता है। और उसके बाद अदिकत्र नतमस्तक हुये। करीब सौ समाचारपत्र को सरकारी विज्ञापन बंद कर झुकाया गया। लेकिन तब भी स्टेटसमैन के सीआर ईरानी और एक्सप्रेस के रामनाथ गोयनका ने झुकने से इंकार कर दिया। तो सरकार ने इनके खिलाफ फरेबी चाले चलने शुरु की । लेकिन पीएमओ के अधिकारी ही सेंसर बोर्ड में तब्दिल हो गये । प्रेस परिषद भंग कर दी गई । आपत्तिजनक सामग्री के प्रकाशन पर रोक का घृणित अध्यादेश 1975 लागू कर दिया गया । यह अलग बात है कि बावजूद चालिस साल पहले संघर्ष करते पत्रकार और मीडिया हाउस आपातकाल में भी दिखायी जरुर
दे रहे थे । लेकिन चालीस साल बाद तो बिना आपातकाल सत्ता झुकने को कहती है तो हर कोई सरकारों के सामने लेटने को तैयार हो जाता है।

Wednesday, June 17, 2015

क्यों मीडिया को शीशे के घर में कैद करना चाहती है सत्ता?

साल भर पहले जब प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार ने ही न्यूज ट्रेडर शब्द इस्तेमाल किया तो संकेत तभी मिल गये थे कि सत्ता बदलते ही सत्ता के निशाने पर मीडिया तो होगा। लेकिन उस वक्त यह अंदेशा बिलकुल नहीं था कि मीडिया नामक संस्थान की साख को भी खत्म करने की दिशा में कदम बढेंगे। क्योंकि मनमोहन सिंह के दौर में राडिया कांड से चंद बडे नाम वाले पत्रकारों के संग क्रोनी कैपटलिज्म का खेल जब खुलकर उभरा तो मीडिया की साख पर बट्टा तो लगा लेकिन यह भरोसा भी जागा की देश में सत्ता बदलेगी तो मीडिया के भीतर पत्रकारों की अहमियत बढ़ेगी क्योंकि प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार ने ही न्यूज ट्रेडर शब्द कहकर दागी पत्रकारों को संकेत दे दिये हैं। लेकिन नई सत्ता ने साल भर के भीतर ही खुले संकेत दे दिये कि मीडिया की निगरानी सत्ता को बर्दाश्त नहीं है। खास बात यह है कि पहली बार अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की तर्ज पर देश में प्रधानमंत्री का चुनाव हुआ। और जनादेश भी ऐतिहासिक आया । तो झटके में लोकतांत्रिक संसदीय व्यवस्था ही
प्रधानमंत्री की जीत के सामने हार गई । यानी प्रधानमंत्री ने सिर्फ पूर्व की सत्ता को ही नहीं हराया बल्कि उस लोकतांत्रिक ढांचे को भी हरा दिया जो सत्ताधारी राजनीतिक दल के भीतर लोकतंत्र को जिन्दा रखता । मंत्रिमडलीय समूह मान्यता देता। यानी असर ऐसा हुआ कि सत्ता संभालने के बाद न्यूज ट्रेडर की जो परिभाषा प्रधानमंत्री ने दी उसी परिभाषा को हर मंत्री और हर नेता को अपनाना पड़ा।

क्योंकि हर मंत्री, हर नेता ही नहीं बल्कि राजनीतिक दल का आस्त्तिव ही जब प्रधानमंत्री की जीत पर टिक गया तो फिर कामकाज करने को लेकर विजन भी उसी लकीर पर जा टिका जिसमें जनादेश की मान्यता हमेशा बरकरार रहे । या फिर पांच बरस तक देश का नजरिया लोकतांत्रिक जनादेश के उसी नजरिये को कंघे पर उठाये रहे जो 16 मई 2014 को आया । सवाल है कि जब जनादेश अमूर्त नहीं था तो जनादेश को लेकर पांच बरस तक का नजरिया एक सरीखा कैसे हो सकता है। और मीडिया जो खुद को लेकर भी नजरिया बदलता रहा है उसका नजरिया सत्ता को लेकर पांच बरस तक एक सरीखा कैसे रह सकता है। मुश्किल यह नहीं है सत्ता और मीडिया टकराते रहे हैं। मुश्किल यह है कि मीडिया को लेकर सत्ता का ताना बाना मीडिया को भी उसी बिजनेस मॉडल में ला खड़ा कर रहा है जहा सरकार के निर्णय सीधे मीडिया हाउस के जीवन-मरण को प्रभावित करें। और पत्रकार के सामने सत्ता के अनुकुल रहने के अलावे कोई दूसरा रास्ता ना बने। यह इमरजेन्सी नहीं है । यह सामाजिक-आर्थिक तौर पर पत्रकार और मीडिया हाउस को खत्म करने वाले हालात हैं। जहां पत्रकार को सत्ता से नहीं उस समाज से लड़ना है जो जनादेश की आगोश में पांच बरस तक उग्र कैडर के तौर पर मदहोश रहना चाहता है। क्योंकि सत्ता ने ही समाज के इस तबके को उकसाया है। पहले जीत के लिये लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ उकसाया। फिर जीत बरकरार रखने के लिये संसदीय ढांचे से ज्यादा महत्व देकर इस कैडर को अपने बूते खड़े होने दिया। और यही एकाकी सत्ता की ताकत 16 मई 2014 से पहले अपने ही पारंपरिक नेताओ को दिल्ली में हराती है । और 16 के जनादेश में उन तमाम राजनीतिक दलों को, जो सत्तादारी बनते ही सरोकार खत्म कर लूट में ही लगे रहें। वैसे समझना यह भी होगा कि समाज का यह तबका लुपंन नहीं है। बल्कि उसी संसदीय और लोकतांत्रिक ढांचे से गुस्से में है जिसे पहले के सत्ताधारियो ने अपने अंटी में बांध कर देश में लूट मचायी । यानी जिस संसदीय राजनीतिक व्यवस्था को बदलने के लिये समाज के भीतर का एक वर्ग बेचैन रहा, गुस्से में रहा उसने सामने कोई वैचारिक मंच उभरा नहीं या कहें हर वैचारिक मंच फेल साबित हुआ तो उसने मई 2014 की जीत में ही अपने गुस्से को ठंडा किया। और उस हालात से आंखे मूंद ली कि जिस मंच को जनादेश के साथवोटरों ने मई 2014 में तैयार किया और जिन्हे मंच तले दफ्न किया कही वह दुबारा पांच बरस के बाद फिर से तो नहीं उभर आयेंगे। यानी मौजूदा सत्ता फेल हुई तो एक बार फिर मनमोहन सिंह का गणित, नेहरु-गांधी परिवार का बिना जिम्मेदारी सत्ता संभालने का गुरुर। क्षत्रपों का जातीय समीरण । भ्रष्टाचार और आपराध तले चुनाव जीतने का मंत्र । सबकुछ दुबारा जीवित होकर कही ज्यादा तेवर के साथ उभरेगें । क्योकि मई 2014 की सत्ता भटक रही है । और भटकती सत्ता को यह बर्दाश्त नहीं है कि कोई उसे बताये कि वह भटक क्यों रही है। असर इसी का है कि न्यूज ट्रेडर की जो परिभाषा 16 मई 2014 से पहले सुनायी दी वह मई 2015 बीतते बीतते बदल गयी। राडिया टेपकांड के नायक नायिका भी सत्ता को भाने लगे और मीडिया हाउस के मौजूदा लाट में से सत्ता ने ही चुन चुन कर पत्रकार होने का तमगा देना शुरु कर दिया । यानी बेहद बारिकी से पहले मीडिया हाउस को जनादेश का आईना दिखाया गया ।

फिर मीडिया हाउस की सफलता-असलता का पैमाना उसे सत्ता के जरीये खबरों को दिखाने या ना दिखाने के दायरे में लाकर मापने की कोशिश की गई। फिर सत्ता के हर एलान के साथ मीडिया हाउस का नाम लेकर जोड़ने या ना जोडने की सामाजिक मान्यता या गैर मान्यता की एक दीवार खड़ी की गई। फिर मीडिया को ही सत्ता के अनुकूल या प्रतिकूल होने की व्याख्या देश के खिलाफ होने या ना होने से जोड़ी गई। और एक वक्त के बाद सत्ता ने खुद को खामोश कर उन संस्थानों के जरीये मीडिया पर वार करना शुरु किया जहा सत्ता का कैडर पद संभाल कर खुद को संस्थान बना चुका था। प्रसार भारती का नजरिया मीडिया को लेकर क्या होगा। फिल्म सेंसर बोर्ड क्या सोचता है । उच्च शिक्षा सस्थान [ आईआईटी-आईआईएस सरीखे ] क्यों स्वतंत्र हो । एम्स के हालात हैं कैसे । नेहरु युवक केन्द्र कहीं युवाओं को भटका तो नहीं रहा। विदेश नीति में बड़बोलापन तो नहीं। कश्मीर को लेकर दिल्ली की नीति सही हा या नहीं। आर्थिक नीतियां बेरोजगारी तो पैदा नहीं कर रही। भुखमरी और गरीबी क्यों बढ़ रही है। किसान की खुदकुशी के आंकड़े लगातार बढ़ क्यों रहे हैं। यानी किसी भी क्षेत्र को लेकर कोई खबर कोई पत्रकार करें या मीडिया हाउस करें तो झटके में सत्ता और कैडर का नजरिया उसे देशद्रोही करार देने में नहीं चुकेगा। क्योंकि सत्ता ने यह मान लिया है कि जनादेश का मतलब वह खुद ही देश है। और पांच बरस तक उससे कोई सवाल पूछने का हकदार नहीं है क्योंकि देश ने उसे ताकत दी है। यानी बतौर नागरिक तो दूर लोकतंत्र की जरुरत के लिहाज से भी कोई नौकरशाह, कोई जज या कोई पत्रकार भी अगर सत्ता की नीतियों या निर्णय को लेकर सवाल खड़ा करें तो वह उन्हीं सस्थानों के बीच खारिज किया जायेगा जो प्रतीकात्मक तौर पर लोकतंत्र को जीते हैं। क्योंकि तमाम सस्थानों की कमान एक सरीखे विचारवानो के हाथ में दी गई। मुश्किल इतनी भर नहीं है कि सत्ता खुद को ही देश मान लें मुश्किल यह भी है कि देश जिस ताने बाने से बना है और टिका उस ताने बाने को ही सत्ता यह कहकर गलत करार देने लगे कि कि देश का मतलब तो हिन्दू राष्ट्र है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है। यानी जिन्हें पद चाहिये वह राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ के रंग में रंगे और नहीं रंग सकते तो रंगे होने का ढोग तो कर ही ले। क्योंकि पहली बार विवेकानंद इस्टीट्यूट या सूर्या फाउंडेशन ही बौद्दिक तौर पर सबसे सक्षम नहीं है बल्कि बीजेपी शासित राज्यों में डीएम और कलेक्टर को राज्यों के संघ प्रमुख के इशारों पर काम भी करना पडा रहा और नियुक्ति भी हो रही है। यानी जो धुन जातीय आधार पर क्षत्रपों ने सिस्टम को भ्रष्ट्र बनाने में लगायी उसका व्यापक रुप राष्ट्रीय स्तर पर अब नजर आ रहा है। असर इसी का है यादवो की ही यूपी में चलती है और लालू के नीतिश से गलबहिया डालते ही फिर से पुराने दिन बिहार में लौटने का खौफ हो चला है इसे कहने वाली बीजेपी की धार कुंद पड़ जाती है क्योंकि वह भी अपने कटघरे में उसी रास्ते पर है। लेकिन असल सवाल यही से मीडिया का भी खड़ा होता है और पत्रकारिता के तरीके का भी। बिजनेस माडल से इतर सोशल मीडिया भी ताकतवर तो है लेकिन यूपी के शाहजहापुर में यूपी का ही एक मंत्री पत्रकार की हत्या के आरोप में फंसने पर भी लाल बत्ती पर इसलिये घूमता है क्योकि सत्ता के सामने मीडिया बिखरा हुआ है। अपने अंतर्द्न्दो में पत्रकार फंसा हुआ है। और सत्ता भी मीडिया के सामने ही इस ठसक को दिखाने से नही चूकता कि दाग तो मीडिया पर भी है । यह अदा यूपी की सरकार भी दिखाती है और दिल्ली में केन्द्र सरकार की महिला मंत्री भी। यानी पहली बार सत्ता अपने तरीको से मीडिया को भी शीशे के घर में ला खडा करना चाह रही है जहा से कोई पत्रकार उसपर पत्थर ना फेकें ।

Wednesday, June 10, 2015

43 बरस बाद नेहरु युवा केन्द्र को बदलने की तैयारी

पटेल, गांधी,आंबेडकर के बाद अब मोदी सरकार भगत सिंह के नाम को भुनाने की तैयारी कर रही है। भगत सिंह एक ऐसा नाम है जिसके आसरे युवाओं को लेकर सरकारी कार्यक्रम सफल बनाये जा सकते हैं और भगत सिंह के नाम के सहारे हर तबके, जाति, संप्रदाय में बिखरे युवाओं को एक छतरी तले लाकर हर कार्यक्रम सफल बनाया जा सकता है। और इसकी शुरुआत योग दिवस से ही होगी। यानी 21 जून को जब दुनिया योग दिवस मनायेगी और भारत अपनी सांस्कृतिक पहचान के जरीये दुनिया को योग का महत्व समझायेगा तो अगला सवाल भारत में ही युवाओ को भी योग के जरीये सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के धागे में पिरोने की पहल शुरु होगी। जिसकी अगुवाई नेहरु युवा केन्द्र करेगा। लेकिन नेहरु शब्द कांग्रेस की राजनीतिक विरासत का प्रतीक है तो नेहरु युवा केन्द्र का नाम भी बदल कर राष्ट्रीय युवा संगठन की तर्ज पर रखा जायेगा । चूंकि वैचारिक पृष्छभूमि राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ की रहेगी तो उसी अनुकूल युवा स्वयंसेवकों से लेकर नेशनल कैडेट कोर और स्काउट गाईट तक के छात्र-छात्राओं को एक साथ लाया जायेगा। इसके लिये कितनी वृहद योजना बनायी जा रही है इसके संकेत नेहरु युवा केन्द्र के तीनो वाइस चैयरमैन के बदले जाने से लेकर पहले साल चलने वाले प्रोग्राम से भी समझा जा सकता है। युवाओं के लिये पहले बरस सरकार ने नारा दिया है, ‘  एक साल देश के नाम'  इसी के मातहत शुरुआत 350 ट्रेनी और तीस हजार युवा स्वंयसेवको की नियक्ती के जरिये होगी । पहले साठ दिन देश के सीमावर्ती इलाकों में ट्रेनिग और उसके बाद के दस महीनो में देशभर के युवाओं को जोडने के लिये तमाम युवा संगठनो के बीच योग के जरीये पैठ बनाने की पहल शुरु होगी। जाहिर है यह अपने तरह पहला प्रयोग होगा जो सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की विचारधारा के साथ साथ राजनीतिक तौर पर भी बीजेपी के साथ युवाओ को जोड़ेगा। क्योंकि एनसीसी और स्काउट-गाईट के कार्यक्रम सामान्य तौर पर साल में दो महीने के ही होते है बाकि वक्त खाली रहता है ।ऐसे में नेहरु युवा केन्द्र के कई सरकारी कार्यक्रमों को सफल बनाने के लिये एनसीसी और स्काउट-गाईड के छात्रों को जोडा जायेगा। दरअसल युवाओ को सिर्फ वोट बैंक के नजरिये से ना देखा जाये बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक तौर पर भी राष्ट्रीय भावना से जोडा जाये इसके लिये भी बदलता नेहरु युवक केन्द्र काम करेगा। इसी के मद्देनजर नेहरु युवक केन्द्र में जिन तीन वाइस चैयरमैन को नियुक्त किया गया तीनों ही वैचारिक तौर पर संघ के करीबी हैं।

इसके अलावे वैचारिक तौर पर संघ के करीबी विनय सहस्त्रबुद्दे तमाम युवा कार्यक्रम को देखेंगे तो सूर्या फाउंडेशन इसमें हर तरीके से मदद करेगा । खास बात यह भी है कि मोदी सरकार नेहरु युवा केन्द्र के उस नजरिये को ही पूरी तरह बदल रही है जो सोच इस केन्द्र को बनाते वक्त रखी गयी थी । राष्ट्रीय युवा फेस्टीवल के जरीये देश भर के युवाओ को जोड़ने के लिये सांस्कृतिक कार्यक्रमों को ही इससे पहले आयोजित
किया जाता था। लेकिन अब सरकार की योजनाओ को लागू कराने में भी देश भर के युवाओं को जोडना चाहिये। यह समझ भी विकसित हुई है । असर इसी का है कि नेहरु युवा केन्द्र के सामने नये कार्यक्रमो में स्वच्छ भारत अभियान भी है और जन-धन योजना भी । सासंद आदर्श ग्राम योजना भी है और संघ की सोच को दर्शाना वाला पुनर्जागरण कार्यक्रम भी । यानी प्रदानमंत्री मोदी की योजनाये और आरएसएस की विचारधारा का समावेश कर कैसे नेहरु युवा केन्द्र को काम पर लगाया जा सकता है । यही काम अपने अपने तरीके से संघ के करीबी विण्णु दत्त शर्मा, शेखर राव पेरेला और दिलिप सैकिया वाइस चैयरमैन के पद पर बैठकर फिलहाल देख रहे हैं। यूं भी मोदी सरकार इस हकीकत को भी समझ रहे है कि नेहरु युवा केन्द्र का अपना जो विस्तार है उसके मातहत कोई भी काम करने से देश भर में जिस तेजी से लाभ मिल सकता है वैसे किसी दूसरे संगठन के जरीये संभव नहीं है।
यहां तक कि बीजेपी का युवा मोर्चा भी इस रुप में सक्षम नहीं है। क्योंकि नेहरु युवा केन्द्र के तहत काम करने वाले हर शक्स को स्टाइपेंड के तौर पर कुछ ना कुछ रकम मिलती ही है । फिर 20 से 29 बरस की उम्र के बीच के जिन तीस हजार युवाओ को नेहरु युवा केन्द्र से जोडने की शुरुआत हो रही है उन्हे भी स्टाइपेंड के तौर पर 25 से 30 हजार के बीच कोई रकम दी ही जायेगी । तो एक लिहाज से युवाओ के लिये यह शुराती नौकरी भी होगी और बडी तादाद में संघ के संवयसेवक भी इस काम में खप जायेंगे। खासबात यह भी है कि योग के तौर पर बाबा रामदेव के संगठन स्वाभिमान ट्रस्ट और खुद बाबा रामदेव को युवाओ को लेकर नयी योजना में कही शरीक नहीं किया गया है ।

 आलम तो यह है कि बाबा रामदेव को 21 जून के किसी योग कार्यक्रम के किसी कमेटी तक में नहीं रखा गया है । और इसकी सबसे बडी वजह संघ के सामने का वह संकट है जिसमें उसे लगने लगा है कि योग और युवाओं को जरीये अगर बाबा रामदेव का विस्तार होता चला गया तो संघ के स्वयसेवक भी एक वक्त के बाद बाबा रामदेव के साथ चले जायेंगे। क्योंकि स्वयंसेवकों के सामने पहली बार दोहरी दुविधा है । एक तरफ मोदी सरकार के उन कार्यक्रमों में भी शरीक होना है जो उनकी विचारधारा में फिट नहीं बैठते है और दूसरी तरफ ऱाष्ट्रवाद और स्वदेशी का प्रचार प्रसार ज्यादा आधुनिक तरीके से बाबा रामदेव कर रहे हैं। और स्वामिमान ट्रस्ट के साथ जुडे युवाओं को रोजगार मिलता है जबकि संघ के स्वयसेवक के तैर पर सेवा करने के एवज में कोई सहुलियत संघ अभी भी नही दे पाता है । खास बात यह है कि दो महीने पहले हरिद्रार के पंतजलि भवन यानी
बाबा रामदेव के हेडक्वाटर में संघ ने अपना कार्क्रम किया । और कायर्क्रम में आये युवा स्वयसेवको का सामने यह सवाल उठा कि अगर पंतजलि तमाम सुविधाओ से लैस होकर स्वदेशी की सोच को जिन्दा रख सकता है और राष्ट्रवाद का नारा भी स्वाभिमान ट्रस्ट के तहत जिवित रख सकता तो फिर संघ के साथ ही क्यो चला
जाये । असल में इसका असर भी यह हुआ कि उत्तखंड के कई युवा स्वयसेवक इस सम्मेलन के बाद बाबा रामदेव के साथ आ गये । और उसके बाद उत्तराखंड के संघ प्रचारको ने निर्णय लिया कि अब पंतजलि में कोई कार्यक्रम संघ का नहीं कराया जायेगा । दरअसल मोदी सरकार यह भी समझ रही है कि अगर देश भर के युवा
एक छतरी तले  जाये तो फिर विकास की जिस अवधारणा को लेकर वह देश में नयी लकीर खिंचना चाह रही है उसे खिंचने में भी आसानी होगी ।

क्योकि नेहरु युवा केन्द्र की पकड मौजूदा वक्त में देश के बडे हिस्से में है । करीब तीन लाख महिला मंडल अगर नेहरु युवक केन्द्र के मातहत चल रहा है तो बारह हजार से ज्यादा युवा वालेंटियर  भी जुडे हुये है । यानी जो काम कभी काग्रेस ने युवा काग्रेस के विस्तार के लिये किया उसी रास्ते को बीजेपी संघ की विचारधारा के विस्तार से जोडगी ।इसीलिये नेहरु युवा केन्द्र की जोनल से लेकर जिला स्तर तक की कमेटियो को पुनर्गठिक किया जा रहा है । उसके बाद विवेकानंद के  साथ दीनदयाल उपाध्याय के बारे में भी देश भर के छात्र छात्राये जाने इस दिशा में भी काम होगा । लेकिन इसके लिये हर उस कार्यक्रम को युवाओ को साथ जोडना होगा जो कार्यक्रम अभी तक कई दूसरे संगठन चला रहे है । असर इसी का है कि 21 जून के अंतर्ऱाष्ट्रीय योग दिवस के लिये 35 पेज की जो पुस्तिका निकाली जा रही है उसमें योग और भारतीय संस्कृति की उन्ही बिन्दुओ का जिक्र किया गया है जिनका जिक्र बाबा रामदेव पंतजलि के तहत करते रहे है । इसीलिये 21 जून को बाबा रामदेव ने दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में जब अपने योग कार्यक्रम के लिये जगह मांगी तो उन्हे यह कहकर जगह नहीं दी गयी कि सुरक्षा का संकट पैदा हो जायेगा ।  फिर इसी के सामानांतर बाबा रामदेव के दूसरे शिष्य सत्यवान को महत्व देना शुरु कर दिया । आलम यह है कि खुद प्रधानमंत्री मोदी ने रामदेव के शिष्य सत्यवान से पीएमओ में मुलाकात की और अब संघ समर्थित सुदर्शन चैनल पर भी सत्यवान के योग कार्यक्रम वैसे ही शुरु हो गये है जैसे कभी बाबा रामदेव के शुरु हुये थे । यानी पहली बार संघ ही नही सरकार भी इस सच को समझ रही है कि अगर देशभर के युवा , योग और भगत सिंह के नाम पर जुडते चले गये तो फिर किसी भी कार्यक्रम  को देश भर में लागू कराने में कोई परेशानी तो नहीं ही होगी उल्टे राजनीतिक तौर पर भी वैचारिक जमीन खुद ब खुद तैयार होती चली जायेगी ।

Tuesday, June 9, 2015

क्या 225 सांसदों और 1258 विधायकों के खिलाफ पुलिस जागेगी?

11 मई को शिकायत । 27 दिनों में जांच पूरी । 8 जून को एफआईआर दर्ज और 28 वें दिन गिरफ्तारी। फिर 4 दिन की पुलिस रिमांड। वाकई दिल्ली पुलिस ने पहली बार एक ऐसा रास्ता देश के तमाम राज्यों की पुलिस के सामने बनाया है जिसके बाद देश के हर राज्य में अगर पुलिस इसी तेजी से काम करने लगे तो क्या संसद और क्या विधानसभा कही भी कोई दागी नेता ना बचे। यानी पुलिस शिकायत लेने के बाद जांच तेजी से करें और एफआईआर दर्ज करने के चौबिस घंटे के भीतर आरोपी को गिरफ्तार करने लगे तो तो कोई दागी सांसद या कोई दागी मंत्री या विधायक बच नहीं पायेगा। क्योंकि अब सवाल सिर्फ दिल्ली के एक मंत्री के फर्जी डिग्री के मामले में दिल्ली पुलिस की पहल भर का नहीं है ।

अब सवाल यह है कि देश में संसद से लेकर तमाम विधानसभाओं में अगर कोई आपराधिक पृष्ठभूमि का या फिर भ्रष्टाचार का आरोपी और कानून का उल्लंघन करने वाला है तो फिर हर राज्य की पुलिस तेजी से हर मामले की छानबीन कर आरोपियों को सजा दिलाने की दिशा में बढ़ सकती है। यह सवाल इसलिये क्योंकि मौजूदा वक्त में लोकसभा में 543 में से 185 सांसद ऐसे हैं, जिनपर भ्रष्टाचार के या आपराधिक मामले दर्ज हैं। यानी जनता की नुमाइन्दगी करने वाले 34 फीसदी सांसद दागी हैं। इसी तरह राज्यसभा में 232 में से 40 सांसद
ऐसे है जिनपर आपराधिक या भ्रष्टाचार के मामले दर्ज है। यानी जिन राज्यों में सांसदों के खिलाफ जहां जहां मामले चल रहे हैं, वहां वहां पुलिस तेजी से कार्रवाई कर संसद को पाक साफ बनाने की दिशा में बढ़ सकती है । यानी साल भर पहले जिसका जिक्र प्रधानमंत्री बनने के तुरंत बाद नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्रपति के अभिभाषण का जबाब देते हुये यह कह किया कि सुप्रीम कोर्ट न्यायिक प्रक्रिया के तहत दागी सासंदो के खिलाफ कार्रवाई करें। और जो दोषी है, उन्हें सजा मिले जो पाक साफ है वह शान से संसद में बैठें। तो दिल्ली पुलिस ने पहली बार अपनी कार्रवाई से यह तो साबित कर दिया जब किसी मंत्री की गिरफ्तारी बिना स्पीकर को जानकारी दिये बगैर की जा सकती है तो फिर सांसद हो या विधायक किसी को भी गिरफ्तार तो किया ही जा सकता है । ऐसे में सांसद, विधायक या मंत्री के किसी विशेषाधिकार का कोई मतलब भी नहीं है । यह सवाल इसलिये बड़ा है क्योंकि दिल्ली ही नहीं देश के हर राज्य में दागियों की भरमार है।

नेशनल इलेक्शन वाच की रिपोर्ट के मुताबिक समूचे देश में तो कुल 4032 विधायकों में 1258 विधायक दागी हैं। यानी जिस देश में 36 फीसदी विधायक दागी हैं, उस देश में अब हर राज्य की पुलिस को दिल्ली पुलिस की तर्ज पर कार्रवाई तो शुरु कर ही देनी चाहिये। क्योंकि दिल्ली पुलिस ने उस मिथ को भी तोड़ दिया कि किसी मंत्री की गिरफ्तारी/हिरासत के साथ संबंधित सरकार और स्पीकर/सभापति को सूचना भेजी जाए। हालाकि सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन यह भी बताती है कि आपराधिक मामलों में विधायकों-सासंदों की गिरफ्तारी पर कोई पाबंदी नहीं है। यानी किसी को कोई जानकारी पहले से देने की कोई जरुरत नहीं है । तो अब सवाल तीन है । दिल्ली पुलिस की तर्ज पर क्या वाकई हर राज्य की पुलिस काम कर सकती है । दूसरा दिल्ली पुलिस क्या केन्द्र सरकार के दागी मंत्रियो के खिलाफ भी पहल कर सकती है । तीसरा क्या पुलिस को लेकर सत्ता सियासत का खेल थम सकता है । यह सारे सवाल झटके में उठते तो हैं लेकिन एक झटके में कैसे दफन हो जाते है यह भी दिल्ली से सटे यूपी में ही एक मंत्री के उपर खुल्लम खुल्ला एक पत्रकार को जिन्दा जलाने के आरोप के बाद भी गिरफ्तारी ना होने से उभरते हैं। क्योंकि उत्तरप्रदेश के मंत्री राममूर्ति सिंह वर्मा समेत पांच लोगों के खिलाफ शाहजहापुर के एक पत्रकार को जिन्दा जलाने के आरोप में केस दर्ज होता है है। पत्रकार मंत्री को अपनी रिपोर्ट से अवैध खनन और जमीन हड़पने का जिक्र करता है। पत्रकार के घरवाले कहते है कि मंत्री के कहने पर एक कोतवाल ही पत्रकार पर पेट्रोल छिड़क कर आग लगा देता है। यानी दिल्ली में पुलिस सत्ता की ताकत को भी नही बख्शती। और यूपी में सत्ता की ताकत के आगे नतमस्तक होकर कोतवाल ही पत्रकार को जिन्दा जलाने की दिशा में बढ़ जाता है। तो आखरी सवाल यही उठता है कि क्या वाकई पुलिस हो तो दिल्ली पुलिस की तरह या पुलिस होती ही है दिल्ली पुलिस की तरह।

Sunday, May 31, 2015

विकास के मनमोहन-मोदी मॉडल से तौबा !

साल भर पहले मनमोहन सिंह अछूत अर्थशास्त्री थे । साल भर पहले पहले जातीय राजनीति करने वाले बीजेपी के लिये अछूत थे । साल भर पहले कश्मीरी पंडितों की घरवापसी बीजेपी के लिये सबसे अहम थी । साल भर पहले किसानों के दर्द पर बीजेपी जान छिड़कने को तैयार थी । साल भर पहले सत्ता के दलालों के लिये बीजेपी में गुस्सा था । साल भर पहले बीजेपी को विश्व बैंक की नीतियों पर गुलाम बनाने वाली प्रतित होती थी।  साल भर पहले बीजेपी अपनी जीत पर इतराती हुई एकला चलो के नारे को लगा रही थी । और साल भर में सबकुछ बदल गया । मनमोहन सिंह के लिये 7 आरसीआर के दरवाजे खुल गये । जातीय राजनीति की जमीन से उपजे जीतनराम मांझी से गलबहियां डालने के रास्ते निकाले जाने लगे। कश्मीरी पंडितों की उम्मीद मुफ्ती के साथ सत्ता प्रेम तले दफ्न होने लगी। किसानों को विकास के जाल में फंसाने के उपाय खोजे जाने लगे । राडिया टेपकांड की फाइल बंद कर दी गई। बिहार में चुनावी जीत के लिये जिस पप्पू यादव की दबंगई के कसीदे पढे गये वह दबंगई छूमंतर होने लगी । तो सरकार चलाने के लिये भी कही ममता तो कही जयललिता से हाथ मिलाना शुरु हो गया। विश्व बैंक की नीतियां विकास के लिये शानदार लगने लगीं और विश्व बैंक के हिमायती योजना आयोग के जिस मोंटेक सिह अहलूवालिया की अर्थशास्त्रीय सोच की टोपी संसद के भीतर उछाली गई उसी सोच के पनगढिया को नीति आयोग सौप दिया गया। तो क्या साल भर पहले जनता ने बदलाव के जो सपने नरेन्द्र मोदी के जरीये संजोये वह सिवाय सपने के और कुछ नहीं था । और क्या संसदीय राजनीति करते हुये सत्ता चलाने का कोई दूसरा रास्ता देश में है ही नहीं । यानी जातीय राजनीति , दागी राजनीति और कारपोरेट राजनीति ही जीत का आखिरी चुनावी मंत्र है। और सत्ता मिलने के बाद सांस्कृतिक राष्ट्रवाद हो या हिन्दू राष्ट्रवाद या फिर राष्ट्रीय स्वाभिमान का सवाल सब कुछ ठंडे बस्ते में डाल कर ही सत्ता चलायी जा सकती है । क्योंकि सत्ता को उसी संसद के जरीये चलना है जहां भ्रष्टाचार और आपराधिक मामलो में लपेटे दौ सौ से ज्यादा सांसद है। इनमें 185 सांसदों को तो जनता ने ही अपनो वोट से चुना है। और बाकि राज्यसभा के सदस्यों में दागियों से ज्यादा तो उस सिस्टम की पहचान है जहां प्राइवेट बिजनेस निजी मुनाफे पर टिके होते हैं ।यानी राज्यसभा के चालिस फीसद सदस्यों के अपने घंघे है । कोई कारपोरेट से जुडा है तो कोई उघोगपति है । किसी के की फार्म है तो किसी के उत्पाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में बिकते है ।

अब यह सवाल हर जहन में उठ सकता है कि जिन सवालों को साल भर पहले नरेन्द्र मोदी ठसक के साथ उठा रहे थे वही सवाल अब सरकार चलाने में भारी पड़ रहे है । क्योंकि जिस यूपी में 15 लाख बेरोजगारों के नाम रोजगार दफ्तरों में दर्ज है उसी यूपी में पुलिस भर्ती में सत्ता के अनुकूल जाति देखी जाती है और जिस यूपी में आठ करोड लोग गरीबी की रेखा से नीचे हो वहा सत्ता शाहीअंदाज में विवाह समारोह करती हो और प्रधानमंत्री मोदी भी इसमें शरीक होने से नहीं हिचकते । दागदार लालू यादव की सत्ता को जंगल राज कहने में साल भर पहले भी नहीं हिचके और आज भी जो बीजेपी नहीं हिचकती है उनके साथ विवाह समारोह में गलबहियां डालकर फोटो खिंचवाने के लिये प्रधानमंत्री मोदी भी सैफई क्यों पहुंच जाते है । मुश्किल यह नहीं है कि जयललिता का आय से ज्यादा संपत्ति के मामले में बरी होते ही देश के पीएम बधाई देते है या फिर चिट पंड में फंसी ममता को राजनीतिक तौर पर एक वक्त लताड़ते है और दूसरे पल समझौते की दिशा में कदम बढ जाते है । टूटती तृणमूल को राहत मिलती है तो जो ममता मनमोहन के साथ बांग्लादेश नहीं गई वह मोदी के साथ खड़ी होती दिखायी देती है । मुश्किल यह है कि हाशिये पर पडे देश के करोड़ों करोड़ लोग जो सत्ता के बदलाव से अपनी जिन्दगी में बदलाव के सपने संजोते हैं उनके सामने वही हालात नये चेहरे के साथ  खड़े होते हैं । तो क्या हर पांच बरस बाद अब देश चुनाव के लिये जनता की भावनाओं के साथ खेलने का नायाब अवसर दे रहा है और यही राजनीतिक बिसात है । या फिर राजनीतिक सत्ता ही ऐसे मुहाने पर आ खडी हुई है जहा संसदीय ढांचा ही लोकतंत्र का आखिरी गीत है जिसे संसद के भीतर सुनने से लोकतंत्र का मर्सिया लगता है और जनता के बीच खड़े होकर
सुनने से दुनिया का सबसे बडा लोकतांत्रिक देश होने का गुरुर पैदा होता है। और सच है क्या यह हर चुनाव के वक्त नेताओं के भाषण या राजनेता के खिलाफ आक्रोश में सड़क पर जमा होते लोगों से खड़ा होते आंदोलन के बीच पता चल नहीं पाता है। क्योंकि राज्य चलाने का कोई आर्थिक-सामाजिक मॉडल कहीं से निकलता नहीं है । साल भर पहले पीएम बनने के लिये सैकड़ों मिल की यात्रा करते हुये नरेन्द्र मोदी जो कह रहे थे, वह सिवाय नेहरु से लेकर मनमोहन सिंह के दौर में सत्ता से बने सामाजिक मवाद के दिखाने-बताने के अलावे और कुछ था भी नहीं। और तीन बरस पहले दिल्ली के रामलीला मैदान से लेकर जंतरमंतर तक भी अन्ना के संघर्ष में जो कहा जा रहा था, वह भी सिवाय संसदीय राजनीतिक सत्ता के भीतर के मवाद को दिखाने-बताने के अलावे और कुछ था भी नहीं। यानी देश चले कैसे और चल रहे देश को कौन रोककर खड़े हैं और उसे दरकिनार किया कैसे जाये यह सवाल हर दौर में अनसुलझे रहे है या फिर संसदीय ढांचा जिन आधारों पर आ खड़ा हुआ है उन आधारों को ही देश मान लिया गया है। अगर कोई नेता,राजनेता,नौकरशाह,पार्टी कार्यकर्ता, व्यापारी, उघोगपति नहीं है तो वह देश का नागरिक है कहां और देश के संविधान के तहते उसे जो हक मिले है उसकी सुनेगा कौन इसकी कोई व्यवस्था किसी रुप में मौजूद है नहीं। यह सवाल इसलिये बड़ा है क्योंकि देश में आर्थिक सुधार 1991 में शुरु हुये। और उसके बाद से देश के हालात में विकास का नाम लेकर कमोवेश हर पीएम ने अपने अपने तरीके से
रास्ते निकालने का जिक्र किया । विकास को चकाचौंध से जोड़ा। और मौजूदा वक्त में भी प्रधानमंत्री मोदी जिस तरह लगातार विदेशी निवेश के जरीये विकास का जिक्र कर रहे है और उसी से हाशिये पर पडे भारत की तस्वीर बदलने का सपना दिखा रहे है, उसके उलट स्थिति यह है कि 1991 में भी भारत दुनिया के मानचित्र पर भूखमरी में पहले नंबर पर था और 2014-15 में भी भुखमरी में भारत पहले नंबर पर है।

तो फिर विकास के नाम पर किसका विकास होता है या आम जनता क्यों बदहाली में ही रह जाती है, यह सवाल बहुत जटिल नहीं है । पन्नों को पलटें तो 1991 में 1 अरब 30 करोड़ का विदेशी निवेश भारत में हुआ ।
और 2014-15 में 35 अरब डॉलर का विदेशी निवेश हुआ । लेकिन इसी विदेशी निवेश के आसरे देश को विकास की राह पर लाने का दावा करने वाले अब इस आंकड़े से परेशान होंगे कि 1990-92 के वक्त भी 21 करोड़ लोग भुखमरी के शिकार थे और 2014-15 में भी करीब 19 करोड 60 लाख लोग भुखमरी के शिकार है । वैसे यह सवाल उठ सकता है कि तब आबादी कम थी और अब आबादी ज्यादा है । लेकिन समझना यह भी होगा कि आखिर विकास का कौन सा मॉडल हम अपना रहे है । क्योंकि दुनिया के मानचित्र पर पच्चीस बरस पहले भी इसी दौर में भारत के तमाम पड़ोसियों के भुखमरी के हालात में खासा सुधार हुआ है। नेपाल में भुखमरी की स्थिति में 65.6 फीसदी और भूटान में 49.9 फीसदी की कमी हुई। चीन में भी भारत से कम भुखमरी है । और यह रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र के स्टेट ऑफ फूड इनसिक्योरिटी इन द वर्ल्ड की है। जिसके मुताबिक दुनियाभर में 79 करोड़
चालिस लाख लोग भुखमरी के शिकार है, इनमें से भारत में 19 करोड़ चालिस लाख लोग शामिल है । और मनमोहन सिंह विकास के नाम पर जिस आर्थिक सुधार को लेकर आये और चीन उस वक्त भी जिस कृषि विकास को लेकर काम कर रहा था असर उसी का है कि 1991 में चीन में 29 करोड़ भुखमरी के शिकार थे जो 2015 में घट कर 13 करोड़ पर आ गया और भारत इस दौर में 21 करोड़ से घटकर 19.4 करोड तक पहुंचा । यानी दुनिया में भुखमरी में नंबर एक । तो अब सवाल यह भी है ककि क्या विकास को लेकर देश में जो रास्ता 1991 के बाद से अपनाया गया वह गलत है क्योंकि विकास से गरीबों को तो अभी भी जोड़ा जा रहा है। जानकारों का कहना है कि बच्चों को पोषण और मिड डे मिल स्कीमों में बजट की कमी से भारत में भुखमरी की स्थिति में सुधार नहीं हुआ। तो सवाल सीधा है कि जब विकास के लिए उठाए गए कदमों का फायदा गरीबों और हाशिए पर पड़े लोगों तक पहुंच ही नहीं रहा तो क्या विकास की बातें बेमानी हैं या सरकार की तमाम योजनाएं उस हाशिए पर पड़े इंसान के लिए हैं ही नहीं, जिन्हें केंद्र में रखकर योजनाएं बनाने का दावा किया जाता है। और ऐसे में अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह बतौर कमजोर पीएम रहे हो हो या ताकतवर पीएम के तौर पर नरेन्द्र मोदी। और दोनों ही कुछ भी कहे लेकिन देश के विकास का कोई ब्लू प्रिट वाकई है तो किसी के पास भी नहीं।