Friday, December 14, 2018

राहुल गांधी ने काग्रेस पर लगे हाईकमान के ढक्कन को खोल दिया....




अगर काग्रेस पर लगे हाईकमान के ढक्कन को खोल दिया जाये तो क्या होगा । ये सवाल करीब दस बरस पहले राहुल गांधी ने ही सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषक से पूछा था । और तब उस विश्वलेषक महोदय ने अपने मित्रो से बातचीत में इसका जिक्र करते हुये कहा कि राहुल गांधी राजनीति में रेवोल्शूशनरी परिवर्तन लाना चाहते है । लेकिन अगर अब काग्रेस के मुख्यमंत्री के चयन को लेकर राहुल गांधी के तरीके को समझे तो लगता यही है कि वाकई बोतल में बंद काग्रेस पर लगे हाईकमान के ढक्कन को उन्होने खोल दिया है । और चूंकि ये पहली बार हो रहा है तो ना पारंपरिक काग्रेस इसे पचा पा रही है ना ही मीडिया के ये गले उतर रहा है । और बार बार जिस तरह मोदी शाह की युगलबंदी ने इंदिरा के दौर की काग्रेस के तौर तरीको ज्यादा कठोर तरीको से अपना लिया है उसमें दूसरे राजनीतिक दल भी इस हकीकत को समझ नहीं पा रहे है कि राहुल की काग्रेस बदलाव की राह पर है । और ये रास्ता काग्रेस की जरुरत इसलिये हो चला है क्योकि काग्रेस मौजूदा वक्त में सबसे कमजोर है । पारंपरिक वोट बैक खिसक चुके है । पुरानो बुजुर्ग व अनुभवी काग्रेसियो के सामानातंर युवा काग्रेस की एक नई पीढी तैयार हो चुकी है । और संगठन से लेकर राज्य और केन्द्र तक के हालातो को उस धागे में पिरोना है जहा काग्रेस का मंच सबके लिये खुल जाये । यानी सिर्फ किसानो के बीच काम करने वालो में से कोई नेता निकलता है तो उसके लिये भी काग्रेस में जगह हो और दलित या आदिवासियो के बीच से कोई निकलता है तो उसके लिये भी अहम जगह हो । और तो और बीजेपी में भी जब किसी जनाधार वाले नेता को ये लगेगा कि अमित शाह की तानाशाही तो उसके जनाधार को ही खत्म कर उसे बौना कर देगी तो उसके लिये भी काग्रेस में आना आसान हो जायेगा । महत्वपूर्ण ये है कि इन सारी संभावनाओ को अपनाना काग्रेस की मजबूरी भी है और जरुरत भी है । क्योकि राहुल गांधी इस हकीकत को भी समझ रहे है कि काग्रेस को खत्म करने के लिये मोदी-शाह उसी काग्रेसी रास्ते पर चले जहा निर्णय हाईकमान के हाथ में होता है और हाईकमान की बिसात उनके अपने कारिन्दे नेताओ के जरीये बिछायी गई होती है ।  तो राहुल ने हाईकमान के ढक्कन को काग्रेस पर ये कहकर उठा दिया कि सीएम वही होगा जिसे कार्यकत्ता और विधायक पंसद करेगे । और ध्यान दें तो "शक्ति एप " के जरीये जब राहुल गांधी ने विधायक-कायकत्ताओ के पास ये संदेश भेजा कि वह किसे मुख्यमंत्री के तौर पर पंसद करते है तो शुरुआत में मीडिया ने इसपर ठहाके ही लगाये । राजनीतिक विश्लेषक हो या दूसरे दल हर किसी के लिये ये एक मजाक हो गया कि लाखो कार्यकत्ताओ के जवाब के बाद कोई कैसे मुख्यमंत्री का चयन करेगा । दरअसल डाटा का खेल यही है । डाटा हमेशा ब्लैक-एंड वाइट में होता है । यानी उसपर शक करने की गुंजाइश सिर्फ इतनी भर होती है कि जवाब भेजने वाले को किसी ने प्रभावित कर दिया हो । लेकिन एक बार डाटा आ गया तो मुख्यमंत्री पद के अनेको दावेदार के सामने उस डाटा को रखकर पूछा तो जा ही सकता है कि उसकी लोकप्रियता का पैमाना डाटा के अनुकुल या प्रतिकुल है । मध्यप्रदेश में कमलनाथ को भी मुख्यमंत्री पद के लिये चुने जाने की जरुरत होनी नहीं चाहिये थी । क्योकि ये हर कोई जानता है कि कमलनाथ ने चुनाव में पैसा भी लगाया और उनके पीछे दिग्विजिय सिंह भी खडे थे । यानी सिधिया के सीएम बनने का सवाल ही नहीं था । लेकिन " शक्ति एप" के जरीये जमा किया जाटा जब सिंधिया को दिखाया गया तो सिंधिया के पास भी दावे के लिये कोई तर्क था नहीं । दरअसल यही स्थिति राजस्थान की है । पहली नजर में लग सकता है कि बीचे चार बरस से जिस तरह सचिन पायलय ने राजस्थान में काग्रेस को खडा करने के लिये जान डाल रहे थे उस वक्त असोक गहलोत केन्द्र की राजनीति में सक्रिय थे । याद किजिये गुजरात-कर्नाटक में गहलोत की सक्रियता । लेकिन यहा फिर सवाल डाटा का है । और पायलट के सामने गहलोत आ खडे हो गया तो उसकी सबसे बडी वजह गहलोत की अपनी लोकप्रियता जो उन्होने मुख्यमंत्री रहते ही बनायी [ माना जाता है कि गहलोत के वक्त बीजेपी नेताओ के भी काम हो जाते थे और वसुंधरा के दौर में बीजेपी नेताओ को भी दुष्यतं के दरबार में चढावा देना पडता था ] उसे सचिन का राजनीतिक श्रम भी तोड नहीं पाया । कमोवेश छत्तसगढ में भी यही हुआ । हालाकि छत्तिसगढ की राजनीति को समझने वाले कट्टर युवा काग्रेसी भी मानते है कि टीएस सिंहदेव या ताम्रध्वज साहू के सीएम होने का मतलब बीजेपी की बी टीम सत्ता में है । और भूपेश बधेल ही एक मात्र नेता है जो रमन सिंह की सत्ता या राज्य में अडानी के खनन  लूट पर पहले बोलते थे सीएम बनने के बाद कार्रवाई कर सकते है । लेकिन फिर सवाल काग्रे के उस ढक्कन को खोलने का है जिसमें कार्यकत्ता को ये ना लगे कि हाईकमान के निर्देश पर पैराशूट सीएम बैठा दिया गया है । जाहिर है इसके खतरे भी है और भविष्य की राजनीति में सत्ता तक ना पहुंच पाने का संकट भी है । जाहिर है पारपरिक काग्रेसियो के लिये ये झटका है लेकिन राहुल गांधी की राजनीति को समझने वाले पहली बार ये भी समझ रहे है कि काग्रेस को आने वाले पचास वर्षो तक अपने पैरो पर खडा होना है या क्षत्रप या दूसरे राजनीतिक दलो के आसरे चलना है । फिर राहुल गांधी के पास गंवाने के लिये भी कुछ नहीं है [ कमजोर व थकी हुई काग्रेस के वक्त राहुल गांधी अध्य़क्ष बने ] लेकिन पाने के लिये काग्रेस के स्वर्णिम अतीत को काग्रेस के भविष्य में तब्दिल करना है । और इसके लिये सिर्फ काग्रेसी शब्द से काम नहीं चलेगा । बल्कि बहुमुखी भारत के अलग अलग मुद्दो को काग्रेस की छतरी तले कैसे समेट कर समाधान की दिशा दिखायी जा सकती है अब सवाल उसका है । इसलिये ध्यान दे तो तीन राज्यो में जीती के बाद किसानो की कर्जमाफी को किसानो की खुशहाली के रास्ते को बेहद छोटा सा कदम बताते हुये किसान के संकट के बडे कैनवास को समझने की जरुरत बतायी । यानी इक्नामिक माडल भी कैसे बदलेगा और हर तबके के लिये बराबरी वाली नीतिया कैसे लागू हो ये सवाल तो है । यानी तीन राज्यो की जीत के बाद तीनो राज्य के  मुख्यमंत्री अगर सिर्फ उसे चुन लिया जाये जो 2019 के लोकसभा चुनाव में ज्यादा से ज्यादा वोट दिलाने का दावा करे. , तो अगला सवाल ये भी होगा कि दावा तो कई नेता कर सकते है । लेकिन राहुल की काग्रेस उस राजनीतिक डर से मुक्ति चाहती है जहा सत्ता ना मिलने पर कोई नेता पार्टी तोड बीजेपी या अन्य किसी छत्रप से जा मिले और सीएम बन जाये । राहुल गांधी धीरे धीरे उस काग्रेस को मथ रहे है जो एक ऐसा खुला मंच हो जहा कोई भी आकर काम करें और लोकप्रियता के अंदाज में कोई भी पद ले लें । हां, इन तमाम विश्लेषण का आखरी सच यही है कि किसी कम्युनिस्ट-सोशलिस्ट पार्टी की तर्ज पर राहुल गांधी काग्रेस के महासचिव [ अध्यक्ष ] है । जिन्हे हटाया नहीं जा सकता । और काग्रे का सच भी है कि गांधी-नेहरु परिवार के ही ईर्द-गिर्द काग्रेस है । लेकिन राहुल गांधी ने काग्रेस पर लगे हाईकमान के ढकक्न को खोल दिया है ।

Tuesday, December 11, 2018

जनादेश ने लोकतंत्र के चौराहे पर ला खडा किया साहेब को......



आसान है कहना कि 2014 में उगा सितारा 2019 में डूब जायेगा । ये भी कहना आसान है पहली बार किसान-मजदूर-बेरोजगारी के समुद्दे सतह पर आये तो शहरी चकाचौंध तले विकास का रंग फिका पड गया । ये कहना भी आसान है कि बीजेपी आंकडो के लिहाज से चाहे विस्तार पाती रही लेकिन अपने ही दायरे में इतनी सिमटी की मोदी-शाह-जेटली से आगे देख नहीं पायी । और ये भी कहना आसान है कि साल भर पहले काग्रेस की कमान संभालने वाले राहुल गांधी ने पप्पू से राहुल के सफर को जिस परिपक्वता के साथ पूरा किया उसमें काग्रेस के दिन बहुरने दिखायी देने लग गये ।  लेकिन सबसे मुश्किल है अब ये समझना कि जिस लोकतंत्र की धज्जियां दिल्ली में उडायी गई उसके छांव तले राजस्थान , छत्तिसगढ और मध्यप्रेदश कैसे आ गये । और अब क्या 2019 के फेर में लोकतंत्र और ज्यादा लहूलुहान होगा । क्योकि जहा जहा दाव पर दिल्ली थी वहा वहा सबसे बुरी हार बीजेपी की हुई । छत्तिसगढ में अडानी के प्रोजेक्ट है तो रुपया पानी की तरह बहाया गया । पर जनादेश की आंधी ऐसी चली कि तीन बार की रमन सरकार ही बह गई । मद्यप्रदेश के इंदौर और भोपाल सरीखे शहरी इलाको में भी बीजेपी को जनता के मात देदी । जहा की सीट और कोई नहीं अमित शाह ही तय कर रहे थे । और राजस्थान में जहा जहा वसुधरा को घुल चटाने के लिये मोदी - शाह की जोडी गई वहा वहा वसुंधरा ने किला बचाया और जिन 42 सीटो को दिल्ली में बैठ कर अमित शाह ने तय किया उसमें से 34 सीटो पर बीजेपी की हार हो गई । तो क्या वाकई 2014 की जीत के नशे में 2019 की जीत तय करने के लिये बीजेपी के  तीन मुख्यमंत्रियो का बलिदान हुआ । या फिर काग्रेस ने वाकई पसीना बहाया और जमीनी स्तर पर जुडे कार्यकत्ताओ को महत्ता देकर अपने आलाकमान के पिरामिड को इस बार पलट दिया । यानी ना तो पैराशूट उम्मीदवार और ना ही बंद कमरो के निर्णयो को महत्व । तो क्या बूथ दर बूथ और  पन्ने दर पन्ने की सोच तले पन्ना प्रमुख की रणनीति जो शाह बनाते रहे वह इस बार टूट गया । हो सकता है ये सारे आंकलन अब शुरु हो लेकिन महज चार महीने बाद ही देश को जिस आमचुनाव के समर में कूदना है उसकी बिसात कैसी होगी और इन तीन राज्यो में काग्रेस की जीत या बीजेपी के हार कौन सा नया समीकरण तैयार कर देगी अब नजरे तो इसी पर हर किसी की होगी । हा , तेलगाना में काग्रेस की हार से ज्यादा चन्द्रबाबू के बेअसर होने ने उस लकीर को चाहे अनचाहे मजबूत कर दिया कि कि अब गठंबधन की शर्ते क्षत्रप नहीं काग्रेस तय करेगी । यानी जनादेश ने पांच सवालो को जन्म दे दिया है । पहला , अब मोदी को चेहरा बनाकर प्रेजीडेन्शिल फार्मेट की सोच की खुमारी बीजेपी से उतर जायेगी । दूसरा , मोदी ठीक है पर विकल्प कोई नहीं की खाली जगह पर ठसक के साथ राहुल गांधी नजर आयेगें । तीसरा , दलित वोट बैक की एकमात्र नेत्री मायावती नहीं है और 2019 में मायावती के सौदेबाजी का दायरा बेहद सिमट गया । चौथा, महागठबंधन के नेता के तौर पर राहुल गांधी को खारिज करने की स्थिति में कोई नहीं होगा । पांचवा, बीजेपी के सहयोगी छिटकेगें और शिवसेना की सौदेबादी का दायरा ना सिर्फ बीजेपी को मुश्किल में डालेगा बल्कि शिवसेना मोदी पर सीधा हमला बोलेगी । तो क्या वाकई काग्रेस के लिये अच्छे दिनो की आहट और बीजेपी के बुरे दिन की शुरूआत हो गई । अगर इस सोच को भी सही मान लें तो भी कुछ सवालो का जवाब जो जनता जनादेश के जरीये दे चुकी है उसे जुंबा कौन सी सत्ता दे पायेगी ये अपने आप में सवाल है । मसलन राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तिसगढ तीनो सत्ता धाटे के साथ काग्रेस को मिल रही है । यानी सत्ता पर कर्ज है । तीन राज्यो में किसान-मजदूर-युवा बेरोजगार बेहाल है । तीनो राज्यो में उघौगिक विकास ठप पडा है । तीनो राज्यो में खनिज संसाधनो की लूट चरम पर है । मद्यप्रदेश और छतिसगढ में तो संघ के स्वयसेवको की टोलिया का कब्जा सरकारी संस्थानो से लेकर सिस्टम के हर पुर्जे पर है । और सबसे बडी बात तो ये है कि मोजूदा दौर में जो खटास राजनीतिक तौर पर उभरी वह सिर्फ बयानबाजी या राजनीतिक हमले भर की नहीं रही । बल्कि सीबीआई और इनकमटेक्स के अधिकारियो ने काग्रेसी पर मामला भी दर्ज किया और छापे भी मारे । काग्रेस को फाइनेन्स करने वाले छत्तिसगढ के 27 और मद्यप्रदेश के 36 लोगो पर दिल्ली से सीबीआई और इनकमटेक्स के छापे पडे । यानी राजनीतिक तौर तरीके पारंपरिक चेहरे वाले रहे नहीं है । तो ऐसे में सत्ता परिवर्तन राज्य में जिस तल्खी के साथ उभरेगें उसमें इस बात का इंताजार करना होगा कि अब काग्रेस के लिये  संघ का मतलब सामाजिक सांस्कृतिक संगठन भर नहीं होगा । लेकिन बात यही नहीं रुकती क्योकि मोदी भी समझ रहे है और राहुल गांधी भी जान रहे है कि अगले तीन महिने की सत्ता 2019 की बिसात को तय करेगी । यानी सत्ता चलाने के तौर तरीके बेहद मायने रखेगें । खासकर आर्थिक हालात और सिस्टम का काम करना । मोदी के सामने अंतरिम बजट सबसे बडी चुनौती है । तो काग्रेस के सामने नोटबंदी के बाद असंगठित क्षेत्र को पटरी पर लाने और ग्रामिणो के हालत में सुधार तत्काल लाने की चुनौती है । और संयोग से इनकी तादाद सबसे ज्यादा उन्ही तीन राज्यो में है जहा काग्रेस को जीत मिली है ।  फिर भ्रष्ट्रचार के मुद्दो को उठाकर 2014 में जिस तरह बार बार मोदी ने काग्रेस को घेरा अब इन्ही तीन राज्यो में भ्रष्ट्रचार के मुद्दो के आसरे काग्रेस बिना देर किये बीजेपी को घेरेगी । मद्यप्रदेश का व्यापम घोटाला हो या वसुंधरा का ललित मोदी के साथ मिलकर खेल करना या फिर रमन सिंह का पनामा पेपर । और इस रास्ते को सटीक तरह से चलाने के लिये तीनो राज्यो में जो तीन चेहरे काग्रेस सबसे फिट है उसमें मध्यप्रदेश में कमलनाथ । तो राजस्थान में सचिन पायलट और छत्तिसगढ में भूपेश बधेल ही फिट बैठते है । और ये तिगडी काग्रेसी ओल्ड गार्ड और युवा को भी बैलेस करती है । और बधेल के जरीये रमन सिंह या छत्तिसगढ में अडानी के प्रोजक्ट पर भी लगाम लगाने की ताकत रखती है । पर इस कडी में आखरी सवाल यही है कि अब शिवराज, रमन सिंह और वसुंधरा का क्या होगा । या फिर मोदी - शाह की जोडी अब कौन सी बिसात बिछायेगी या फिर मोदी सत्ता कौन सा तुरुप का पत्ता देश के सामने फेकेगीं जिससे उनमें  है ये मई 2019 तक बरकरार रहे । या फिर बीजोपी के भीतर से वाकई कोई अवाज उठेगी या संघ परिवार जागेगा । लेकिन ध्यान दें तो कोई विकल्प अब बीजेपी के भीतर नहीं है । मोदी के बाद दूसरी कतार के नेता ऐसे है जो अपना चुनाव नहीं जीत सकते है या फिर उनकी कोई पहचान किसी राज्य तो दूर किसी लोकसभा सीट तक की नहीं है । मसलन, अरुण जेटली , धर्मेन्द्र प्रधान , पियूष गोयल या निर्माला सीमारमण । और इस कडी में हारे हुये मुख्यमंत्रियो को अमित शाह कौन सी जगह देगें ये भी सवाल है । यानी जनादेश ने साफ तौर पर बतलाया है कि जादू या जुमले से देश चलता नहीं और मंदिर नहीं सवाल पेट का होगा । सिस्टम गढा नहीं जाती बल्कि संवैधानिक संस्थाओ के जरीये चलाना आना चाहिये । शायद इसीलिये पांच राज्यो के जनादेश ने मोदी को लोकतंत्र के चौराहे पर ला खडा किया है ।

Monday, December 10, 2018

ना राजधर्म निभाया, ना धर्मसभा की मानेगें....


जयपुर के पांडे मूर्त्तिवाले । वैसे पूरा नाम पंकज पांडे है , लेकिन पहचान यही है जयपुर के पांडे मूर्त्तिवाले । और इस पहचान की वजह है कि देश भर में जहा भी प्रमुख स्थान पर  भगवान राम की मूर्त्ति लगी है , वह पांडे जी ने ही बनायी है । यू श्रीकृष्ण और अन्य भगवान के मूर्त्तिया भी बनायी है और अलग अलग जगहो पर स्थापित की है । लेकिन भगवान राम की मूर्ति और वह भी अयोध्या में राम की प्रतिमा को लेकर पांडे जी इतने भावुक रहते है कि जब भी बात होती है तो बात करते करते उनकी आंखो में आंसू आ जाते है । आवाज भर्रा जाती है । और आखरी वाक्य अक्सर उनसे बातचीत में यही आकर ठहरती है कि अयोध्या में राम मंदिर तो बना नहीं लेकिन उन्होने भगवान राम की उस मूर्ति को बना कर रखा हुआ है जिसे राम मंदिर में स्थापित करना है । और अक्सर इस आखरी वाक्य से पहले आडवाणी की रथयात्रा से लेकर मोदी की ताकतवर सत्ता का जिक्र जरुर होता है । लेकिन राजनीति और सत्ता धर्म के मार्ग पर कहा चलते है इस सवाल पर संयोग से ह बार वह राजधर्म का जिक्र किया करते थे लेकिन 9 जिसंबर को राजधर्म की जगह धर्मसभा का जिक्र कर उन्होने यही उम्मीद जतायी कि 15 से 25 दिसंबर के बीच कोई बडा निर्णय होगा । निर्णय क्या होगा यह पूछने पर उन्होने चुप्पी साध ली लेकिन उम्मीद के इंतजार में रहने को कहा । और यही से यह बात भी निकली कि कैसे 50 की उम्र वाले पांडेजी आज 75 पार है लेकिन उम्मीद छूटती नहीं । लेकिन दूसरी तरफ दिल्ली में रामलीला मैदान की धर्मसभा में उम्मीद ही नहीं भरोसा भी गुस्से में तब्दिल होता दिखायी दिया । चाहे भैयाजी जोशी मंच से सत्ता से गुहार लगा गये कि राम मंदिर के लिये कानून तो सरकार को बनाना ही चाहिये । लेकिन संयोग से उसी दिन मोदी सत्ता के तीसरे कद्दावर नेता अरुण जेटली ने एक अंग्रेजी चैनल को दिये इंटरव्यू में जब साफ कहा कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार चलेगी । तो चार सवाल उठे । पहला , सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले को देखना चाहती है तो संघ परिवार सत्ता से विधेयक लाने की गुहार क्यो कर रहा है । दूसरा, सत्ता का मतलब है कि बीजेपी की सत्ता और बीजेपी जब खुद को संघ परिवार की सोच से अलग कर रही है तो फिर इसके संकेत क्या कानून तंत्र और भीडतंत्र को बांटने वाले है । तीसरा , क्या सत्ता तमाशा देखे और तमाशा करने करने के लिये विहिप -बंजरंग दल या स्वयसेवक तैयार है । चौथा , आखिर में राम मंदिर जब सियासत का प्यादा बना दिया गया है तो फिर अयोध्या में राम मंदिर के नाम पर भीडतंत्र की हैसियत तो प्यादे वाली भी ना होगी । तो क्या वह सत्ता की मंशा पर मठ्टा डालने का मन बना चुका है । यानी राम मंदिर से अगर वोटो का ध्रूवीकरण होता है और पारदर्शी तौर पर ये दिखायी देने लगा है कि राम भक्ति से ज्यादा सत्ता भक्ति ही अब संघ परिवार पर छायी हुई है तो फिर खडा होगा कौन । और राम मंदिर की दिशा में बढेगा कौन । क्योकि रामलीला मैदान में एक पुराने स्वयसेवक से जब चर्चा होने लगी तो उन्होने बेहद सरल शब्दो में उपनिषद का सार समझा दिया । बोले, ईश्वर के पास तो सबकुछ है , तो उन्होने अपने को बहलाने के लिये सृष्टि की रचना की । और मनुष्य उन्ही के कण से बने । तो मनुष्य खुद को कैसे समझे और ईश्वर को कैसे जाने तो सृष्टि बनाते वक्त ईश्वर ने मनुष्य़ के मन, दिमाग और तन को खुद से इस तरह अलग किया कि जिससे मनुष्य अपने होने या खुद को पहचानने के लिये भटकता फिरे । और ध्यान दिजिये जिसका मन राम में रम गया या अपने इश्वर में लग गया तो वह उस माया से मुक्ति पा जाता है जिसके लिये मनुष्य खुद के जीवन को खत्म कर देता है । हमारी बातो भगवा पहने एक व्यक्ति भी सुन रहे थे तो उन्होने बीच में टोका, तो जो मनुष्य खुद को शक्तिशाली समझता है वह तो ईश्वर से उतना ही दूर हो गया । क्यों ...मैने सवाल किया तो वह बेहिचक बोले क्योकि हर राजा को लगता है कि उसके पास सबकुछ है तो अपने मनोरंजन के लिये ही वह अपनी जनता से खेलता है । और वह ये भूल जाता है कि वह खुद उस ईश्वर के कण से बना है जिन्होने सृष्टि ही अपने लिये बनायी । यानी कण कण में भगवान का मतलब यही है कि सभी तो ईश्वर के कण से बने है और ताकतवर खुद को ही इश्वर मानने लगता है तो फिर ये भी इश्वर का तमाशा ही है । जाहिर है बातो में ऐसा रस था कि मैने सवाल कर दिया ...अब तो लोकतंत्र है राजा कहां कोई होता है । पर लोकतंत्र को भी शाही अंदाज में जीने की चाहत मुखौटे और चेहेर में कैसे बंट जाती है ये तो आप राम मंदिर के ही सवाल पर देख रहे है । स्वयसेवक महोदय ने ना कहते हुये भी जब मुखौटे का जिक्र किया तो मैने उसे और स्पष्ट करने को कहने की मंशा से अपनी समझ को राम मंदिर से इतर मौजूदा सामाजिक राजनीतिक हालात की दिशा में ये कहते हुये मोड दिया कि ..ऐसा तो नहीं मोदी के सत्ता में आने पर बतौर मुखौटा  सिर्फ गरीबी गरीब , किसान-मजदूर की बात बीचे साढे चार बरस में लगातार जारी है लेकिन असल चेहरा कारपोरेट हित और सत्ता की रईसी के लिये पूंजी के जुगाड में ही रमा हुआ है । और संयोग से तभी साध्वी रितंभरा मंच से बोलने खडी हुई और मंदिर कानून बनाने का जिक्र किया तो स्वयसेवक महोदय बोल पडे , अब मंदिर कानून का जिक्र कर रही है तो ये सवाल वृंदावन में अपने आश्रम के लिये सरकारी चंदा लेते वक्त क्यो नहीं कहा । यानी ...यानी क्या सरकार के साथ अंदरखाने मिलाप और बाहर  विलाप ? मुश्किल यही है कि 1992 के आंदोलन की पूंजी पर आज की गुलामी छुपती नहीं है । और यही हाल संघ परिवार का होचला है । कोई नानाजी देशमुख सरीखा तो है नहीं कि एक धोती और एक गमछा ले कर चल निकले । अब तो घुमने के लिये आलीशान गाडिया भी चाहिये और विमान प्रवास में सीट भी ए 1 । इन बातो को सुनते हुये एक और पुराने स्वयसेवक आ गये जो मंच से सत्ता को राम मंदिर के नाम पर लताड कर आये ते । उनकी आंखो में आंसू थे ..लगभग फूट पडे...देख लिजिये कोई सत्ता का आदमी आपको यहा दिखायी नहीं देगा । लेकिन राम मंदिर से सत्ता हर किसी को दिखायी दे रही है । गुलामी होने लगी है । साढ चार बरस बोलते रहे विकास है तो चुप रहो । अब विकास से कुछ हो नही रहा है तो राम राम कहने के लिये कह रहे है । अच्छा ही है जो इनके चंगुल से कक्काजी , दयानंद दी , शरद जी , मिश्रा जी , तोगडिया जी और ऐसे सैकडो अच्चे प्रचारको को निकाल दिया गया । और लगे सत्ता की गुलामी करने । मेरा तो ह्रदय दिन में रोता है और आंखे रात में बरसती है । बात बढती जा रही थी ..चंद भगवाधारी और जमा हो रहे थे । और जो जो जिन शब्दो में कहा गया उसका अर्थ यही निकल रहा था कि भगवा भीड भी अब संङल रही है और सत्ता तंत्र के खेल में प्यादा बन खुद को भीडतंत्र बनाने के लिये वह भी तैयार नही है । 

Sunday, December 9, 2018

अर्थ्वयवस्था का चेहरा भी बदलेगा 11 दिसंबर के बाद




ये पहली बार होगा कि तीन राज्यो के चुनाव परिणाम देश की राजनीति पर ही नहीं बल्कि देश के इकनामिक माडल पर भी असर डालेगें । खास तौर से जिस तरह किसान-मजदूर के मुद्दे राजनीतिक प्रचार के केन्द्र में आये । और ग्रामिण भारत के मुद्दो को अभी तक वोट के लिये इस्तेमाल करने वाली राजनीति ने पहली बार अर्थव्यवस्था से किसानो के मुद्दो को जोडा वह बाजार अर्थव्यवस्था से अलग होगी , इसके लिये अब किसी राकेट साइंस की जरुरत नहीं है । ध्यान दें तो काग्रेस ने अपने घोषणापत्र मे जिन मुद्दो को उठाया उसे लागू करना उसकी मजबूरी भी है और देश की जरुरत भी । क्योकि मोदी सत्ता ने जिस तरह कारपोरेट की पूंजी पर सियासत की और सत्ता पाने के बाद कारपोरेट मित्रो के मुनाफे के लिये रास्ते खोले वह किसी से छुपा हुआ नहीं है । और 1991 में आर्थिक सुधार के रास्ते कारपोरेट के जरीये काग्रेस ने ही बनाये ये भी किसी से छुपा नहीं है । लेकिन ढाई दशक के आर्थिक सुधार के बाद देश की हथेली पर भूख-गरीबी और असमानता जिस तरह बढी और उसमें राजनीतिक सत्ता का ही जितना योगदान रहा उसमें अब राहुल गांधी के सामने ये चुनौती है कि वह अगर तीन राज्य जीतते है तो वैकल्पिक अर्थव्यवस्था की लकीर खिंचे । और शायद ये लकीर खिंचना उनकी जरुरत भी है जो भारतीय इक्नामिक माडल के चेहरे को खुद ब खुद बदल देगी । इसके लिये काग्रेस को अर्थशास्त्री नहीं बल्कि राजनीतिक क्षमता चाहिये । क्योकि चुनावी घोषणापत्र के मुताबिक दस दिनो में किसानो की कर्ज माफी होगी । न्यूतम समर्थन मूल्य किसानो को मिलेगा । मनरेगा मजदूरो को काम-दाम दोनो मिलेगा । छोटे-मझौले उघोगो को राहत भी मिलेगी और उनके लिये इन्फ्रास्ट्क्चर भी खडा होगा । अब सवाल है जब ये सब होगा तो किसी भी राज्य का बजट तो उतना ही होगा , तब कौन सा रुपया किस मद से निकलेगा । जाहिर है कारपोरेट को मिलने वाली राहत राज्यो के बजट से बाहर होगी । और उसी मद का रुपया ग्रामिण इक्नामी को संभालेगा । क्योकि किसान मजदूर या छोटे-मझौले उघोगो के हालात में सुधार का एक मतलब ये भी है कि उनकी खरीद क्षमता में बढोतरी होगी । यानी कारपोरेट युग में जिस तरह की असमानता बढी उसमें ग्रामीण भारत की पहचान उपभोक्ता के तौर पर कभी हो ही नहीं पायी । फिर जब दुनिया भर में भारत का डंका पीटा जा रहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया की पांचवी सबसे बडी इक्नामी हो चुकी है तो अगला सवाल कोई भी कर सकता है कि जब इतनी बडी इक्नामी है तो फिर भारतीय कारपोरेट अपने पैरो पर क्यो नहीं खडा हो पा रहा है । और उसे सरकार से राहत क्यो चाहिये । फिर एनपीए की सूची बतलाती है कि कैसे दस लाख करोड से ज्यादा की रकम कारपोरेट ही डकार गये और उनसे वसूली की जगह मोदी सत्ता ने की खेप में राहत देनी शुरु कर दी । और इसी कतार में आम जनता का बैको में जमा रुपया भी कारपोरेट सत्ता से करीबी दिखा कर फरार हो गया । जिन्हे भगौडा कहकर वापस भारत लाने का शिगूफा राजनीतिक तौर पर मोदी सत्ता ने बार बार कही । लेकिन सवाल ये नहीं है कि जो भगौडे है उन्हे सत्ता वापस कब लायेगी बल्कि बडा सवाल ये है कि क्या वाकई मोदी सत्ता के पास कारपोरेट से इतर कोई आर्थिक ढांचा ही नहीं है । जाहिर है यही से भारतीय राजनीति के बदलते स्वरुप को समझा जा सकता है । क्योकि जनवरी में मोदी सरकार आर्थिक समिक्षा पेश करेगी और अपने पांच बरस की सत्ता के आखरी बरस में चुनाव से चार महीने पहले अंतरिम बजट पेश करेगी । और दूसरी तरफ काग्रेस अपने जीते हुये राज्यो में कारपोरेट से इतर ग्रामिण इक्नामी पर ध्यान देगी । यानी राज्य बनाम केन्द्र या कहे काग्रेस बनाम बीजेपी का आर्थिक माडल टकराते हुये नजर आयेगा । और अगर ऐसा होता है तो फिर पहली नजर में कोई भी कहेगा कि जिस आर्थिक माडल का जिक्र स्वदेशी के जरीये संघ करता रहा और एक वक्त बीजेपी भी आर्थिक सुधार को बाजार की हवा बताकर कहती रही उसमें बीजेपी सत्ता की कहीं ज्यादा कारपोरेट प्रेमी हो गई और काग्रेस भारत के जमीनी ढांचे को समझते हुये बदल गई ।
दरअसल पहली बार राजनीतिक हालात ही ऐसे बने है कि काग्रेस के लिये कोई भी राजनीतिक प्रयोग करना आसान है और बीजेपी समेत किसी भी क्षत्रप के लिये मुशिकल है । क्योकि राहुल गांधी के कंघे पर पुराना कोई बोझ नहीं है । काग्रेस को अपनी पुरानी जमीन को पकडने की चुनौती भी है और मोदी के कारपोरेटीकरण के सामानांतर नई राजनीति और वैक्लिपक इकनामी खडा करना मजबूरी है । मोदी सत्ता इस दिशा में बढ नहीं सकती क्योकि बीते चार बरस में उसने जो खुद के लिये जो जाल तैयार किया उस जाल को अगले दो महीने में तोडना उसके लिये संभव नहीं है । हालाकि तीन राज्यो के जनादेश का इंतजार करती बीजेपी ये कहने से नहीं चूक रही है कि मोदी वहा से सत्ता हो जहा से काग्रेस या विपक्ष की सोच खत्म हो जाती है । तो ऐसे में ये समझना भी जरुरी है कि चुनाव के जो आंकडे उभर रहे है उसमें बीजेपी से दस फिसदी तक एससी-एसटी वोट खिसके है । किसान-मजदूरो के वोट कम हुये है । बेरोजगार युवा और पहली बार वोट डालने वालो ने भी बीजेपी की तुलना में  काग्रेस को करीब दस फिसदी तक ज्यादा वोट दिये है । और अगर अगले दो तीन महीनो में मोदी उन्हे दोबारा अपने साथ लाने के लिये आर्थिक राहत देते है तो तीन सवाल तुरत उठेगें । पहला , राज्यो के जनादेश में हार की वजह से ये कदम उठाया गया । दूसरा , काग्रेस की नकल की जा रही है । तीसरा , चुनाव नजदीक आ गये तो राहत देने के कदम उठाये जा रहे है । फिर असल सच तो यह भी है सरकारी खजाना खाली हो चला है तभी रिजर्व बैक से एक लाख करोड रुपया बाजार में लाने के लिये रिजर्व बैक के बोर्ड आफ डायरेक्टर्स पर दवाब बनाया जा रहा है । फिर चुनाव जब चंद फर्लाग की दूरी पर हो तो कारपोरेट मित्रो से पूंजी की जरुरत मोदी सत्ता को पडेगी ही । और कारपोरेट मित्रो को अगर ये एहसास होता है कि मोदी सत्ता जा रही है तो वह ज्यादा दांव मोदी पर ही लगायेगे । क्योकि काग्रेस तब मोदी के कारपोरेट मित्रो की पूंजी से बचना चाहेगी । पिर एक सच ये भी है कि पहली बार काग्रेस ने राजनीतिक तौर पर मोदी के कारपोरेट मित्रो का नाम खुले तौर पर अपने चुनावी प्रचार में ना सिर्फ लिया बल्कि भ्रष्ट्रचार के मुद्दो को उठाते हुये क्रोनी कैपटलिज्म का कच्चा-चिट्टा भी खोला ।
तो चुनावी दांव के बदलते हालात में आखरी सवाल ये भी होगा कि तीन राज्यो की जीत के बाद काग्रेस महज महागढबंधन में एक साझीदार के दौर पर दिखायी नहीं देगी बल्कि काग्रेस  के ही इर्द -गिर्द समूचे विपक्ष की एकजूटता दिखायी देगी । और इसका बडा असर यूपी में नजर आयेगा जहा काग्रेस अकेले चुनाव लडने की दिशा में बढेगी । क्योकि काग्रेस अब इस हकीकत को समझ रही है कि जब मायावती को तीन राज्यो के दलितो ने कांग्रेस की तुलना में कम वोट दिया तो यूपी में उसे गंठबंधन के साथ जाने पर कोई लाभ नहीं होगा । क्योकि काग्रेस के पारंपरिक वोट बैक सिर्फ किसान तक सीमित नहीं रहे है बल्कि दलित आदिवासी, ओबीसी और ब्रहमण भी यूपी में साथ रहे है । इसीलिये काग्रेस के लिये दिल्ली की सत्ता हमेशा यूपी के रास्ते निकली है । तो जिस परिवर्तन की राह पर काग्रेस खडी है उसमें तीन राज्यो के जनादेश पहली बार राजनीतिक तौर तरीके भी बदल रहे है और देश का इक्नामिक माडल भी ।

Saturday, December 8, 2018

स्वंयसेवक की चाय ! भरभरा कर गिरने वाले बांध को दो दो बोरियो से थामा नहीं जा सकता है साहेब...




जब नदी में उफान हो और बांध ही भरभरा कर गिरने की स्थिति में हो तब रेत की दो दो बोरियो को जुटा कर बांध बचाया नहीं जा सकता । चाय की प्याली टेबल पर रखते रखते स्वयसेवक के जुबा से निकलते इन शब्दो ने मुझे भी चौकाया और प्रोफेसर साहेब को भी । दोनो ही एक साथ बोल पडे, क्या मतलब है इसका ?
बेहद शांत स्वर में स्वयसेवक ने कहा आप हमेशा चाय की प्याली का तुफान मापते है इस बार देश के तुफान को समझे और बांध के भरभराने को परखे । बांध कौन है ? जैसे ही मैने कहा, तो इस बार प्रोफेसर साहेब ठहाका लगाकर बोले प्रसून जी आप भी बांध के बारे में पूछेगें । देश का मामला है तो उफान राज्यो के जनादेश से मापने की कोई गलती ना करें । मुझे ही कहना पडा ,लेकिन आज स्वयसेवक महोदय के तेवर ही कुछ और थे , बीच में लगभग कूदते हुये बोले ... आप तो बाहर से देख रहे है लेकिन मै तो अंदर से देख भी रहा हूं और दिवालियापन को समझ भी रहा हूं । दिवालियापन यानी....यानी जिस तरह 2014 की तर्ज पर ही 2019 की बिसात बिछायी जा रही है उसमें आपको जानकार हैरत होगी कि काग्रेस का भ्रष्ट्रचार और राम मंदिर पर उग्र तेवर का काकटेल बना कर ये परोसना चाहते है । पर 2014 में तो विकास की बात थी । अब टोकते हुये प्रोफेसर साहेब बोले , तो स्वयसेवक महोदय लगभग बिगड गये ...और गुस्से में बोले आप टोके नहीं तो मै समझाउ.. जी हम चाय की चुस्की लेते है आप ही 2019 को लेकर घुंधलके को साफ किजिये । धुधलका क्या है अब तो एक्जीट पोल ने जिस तरह काग्रेस की जीत तय की है उसी का विस्तार 2019 में हो जायेगा .... प्रोफेसर साहेब फिर बोले तो स्वयसेवक महोदय बोल पडे आप चाय का मजा लिजिये ...लेकिन समझने की कोशिश किजिये कि पटरी से गाडी उतर क्यो रही है । जी बताइये...और प्रोफेसर साहेब आप भी सुने , मुझे ही स्टैड लेना पडा ।
तो बांध भरभरा रहा है और भरभराते बांध को ये एहसास ही नहीं है कि उसकी दो दो बोरियो से अब नदी का उफान रुकेगा नहीं । और ये 11 दिसबंर को जब साफ होगा तो कल्पना किजिये 2019 के लिये कौन सी बोरिया लेकर बांध बांधने की कोशिश होगी । जरा सिलसिलेवार समझे ....एक तरफ उग्र हिन्दुत्व का उभार बुलंदशहर में उभरा । काग्रेस के भ्रष्ट्रचार को मुद्दा बनाने के लिये ब्रिट्रिश बिचौलिये मिशेल का दुबई से प्रत्यापर्ण कर लाया गया । यानी 2014 के बाद विकास का बही खाता बता कर चुनाव में जाने की हिम्मत मोदी सरकार के पास नहीं है । लेकिन जिन दांव को ये खेलना चाहते है वह दांव भी इन्हे उल्टा पडेगा । ये आप कह रहे है । मुझे टोकना पडा । जी , मै ही कह रहा हूं , क्योकि भ्रष्ट्रचार तो सत्ता का सिस्टम होता है । और हमेशा विपक्ष भ्रष्ट्राचार के मुद्दे को उठाता है लेकिन जब सत्ता उठाने लगे तो कई परते उघडती है । मसलन ? मसलन यही कि यूपीए के दौर में सीएजी विनोद राय और अगस्ता वेस्टलैड के बिचौलिये मिशेल एक नहीं है । और ये हर कोई जानता है कि विनोद राय के प्रसेपशन वाली कोयला और 2 जी घोटाले की रकम को ही करप्शन का मुद्दा बनाकर बीजेपी ने काग्रेस को कटघरे में खडा किया । विनोद राय बीजेपी के लिये सरकारी प्यादा बन गये । लेकिन मिशेल क्यो बनेगें । क्योकि सत्ता का प्यादा बनने का मतलब है जो बयान अंतर्रष्ट्रीय कोर्ट में मिशेल ने दिया है उस  बयान से पलट जाये । और मिशेल को अंतर्रष्ट्रीय कोर्ट बरी कर चुका है । तो सत्ता जो चाहती है वह कैसे मिशेल बोल देगें । मान्यवक सत्ता क्या बुलवाना चाहती है मिशेल से .....प्रोफेसर साहेब ने उत्सुकता में पूछा , तो स्वयसेवक महोदय बोले अब तो ये देश का बच्चा बच्चा जानता है कि मिशेल एक बार कह दें कि फैमली का मतलब है गांधी परिवार और एपी का मतलब है अहमद पटेल । और मसला यही है कि इंटरनेशवल कोर्ट में मिशेल ने सिर्फ खुद को कानूनी तौर पर बिचौलिया होने के कार्य पर बोला है । तो मिशेल बीजेपी की 2019 की बिसात पर कैसे और क्यो प्यादा बनेगा । बात तो सही है और आप दूसरा मुद्दा उग्र हिन्दुत्व को बुलंदशहर से कैसे जोड रहे थे ।
आपको ये तो पता है ना कि 6 दिसबंर को योगी आदित्यनाथ को दिल्ली बुलाया गया । जी । क्यो बुलाया गया । ये तो आप बतायेगें । प्रोफेसर साहेब की इस टिप्पणी पर स्वयसेवक महोदय मुस्कुराये और बोल पडे । योगी सीएम है और 2019 में यूपी के सीएम की महत्ता क्या होगी ये दिल्ली की सत्ता बाखूबी समझ रही है । और अब मामला यूपी में कानून व्यवस्था का नहीं है बल्कि कानून के राज की एवज में हिन्दुत्व के पोस्टर ब्याय के तौर पर खुद को स्थापित करने का है । और दिल्ली चाहती है कि इस काम को तेजी से किया जाये । लेकिन योगी चाहते है ये काम धीरे धीरे हो जिससे वह ना सिर्फ पोस्टर ब्याय बने बल्कि हालात संभालने की उनकी काबिलियत पर भी मुह लगें । समझे नही , साफ कहे मुझे् टोकना पडा,,प्रसून जी आपको भी साफ बताना होगा कि बजरंग दल और बिहिप ही नहीं बल्कि बीजेपी का कार्यकत्ता भी अगर बुंलदशहर में पुलिस के हत्या में आरोपी है तो फिर राज्य का मुखिया कानून व्यवस्था देखे या हिन्दुत्व का पोस्टर ब्याय बने । अब प्रोफेसर साहेब से रहा नहीं गया ... तो झटके में बोल पडे । मुस्किल है कोई भी प्रयोग एक बार ही होता है । दूसरी बार संभव नहीं है । यही तो मै भी कब रहा हूं ..अब स्वयसेवक महोदय बोले । लेकिन मै कुछ समझ नहीं पा रहा हूं . मुझे ही कहना पडा । इसमें समझना क्या है , गुजरात के प्रयोग से मोदी निकले तो यूपी के प्रयोग से योगी निकलेगें । अंतक सिर्फ इतना है कि गुजरात के वक्त अटलबिहारी वाजपेयी थे जो राजधर्म की बात कह रहे थे और यूपी के वक्त खुद राजधर्म वाले मोदी जी है जो अपने लिये योगी का बलिदान चाहते है । और योगी इन हालातो को समझ रहे है तो समझे टकराव कहा कैसे होगा . और 2019 के बाद बीजेपी के हाथ में क्या होगा और उसका चेहरा कौन होगा । तो क्या आप 2019 में मोदी का अस्त देख रहे है । मै कोई अस्त या उदय नहीं देख रहा हूं ...सिर्फ हालात बता रहा हूं कि कैसे उग्र हिन्दुत्व की डोर और करप्शन के आसरे 2019 में बेडा पार करने की तैयारी है ।
अब मुझे टोकना पडा... तब तो कोई विजन या कोई सिस्टम तक काम नहीं कर रहा है ।
क्यो अब प्रोफेसर साहेब ने मुझे ही टोका ।
इसलिये क्योकि बुलंदशहर की घटना से पुलिस का मनोबल डाउन होगा या तो सत्ता विरोधी होगा । औऱ ध्यान दिजिये हुआ क्या , लखनउ से नौकरशाह का आदेश आया तो बुलंदशहर के एसपी को भी नतमस्तक होना पडा । लेकिन इसके समानातंर जरा ये भी समझे कि अक्सर सत्ता ही अपने अनुकुल परिस्थितियो को बनवाने के लिये नौकरशाह को निर्देश देती है । नौकरशाह नीचेल स्तर पर आदेश देता है । और जब जांच होती है तो नौकरशाह को ही जेल होती है ।
ये आप क्या कह रहे है प्रसून जी ... अब स्वयसेवक बोले । मैने भी तपाक से कहा...कोयला घोटाले मे किसे जेल हुई । सचिव को ही ना । और कोयला सचिव ने अपनी मर्जी से तो आदेश दिये नहीं थे । फिर कोयला सचिव के पीछे आईएएस संगठन खडा हुआ ना । इसी तरह बुलंदशहर की घटना के बाद पुलिस महकमा एक होगा ना ।
तो क्या सत्ता के पास वाकई कोई विजन देश को चलाने का है ही नहीं । ये सवाल जिस मासूमियत से प्रोफेसर साहेब ने पूछा , लगभग उसी मासूमियत से स्वयसेवक महोदय का जवाब आया , विजन होता तो सोशल इंजिनियरिंग फेल ना होती । बहराइच की सांसद सावित्रीबाई फुले ने बीजेपी छोड दी । कुशवाहा 11 दिसबंर का इंतजार कर रहे है । इंतजार किजिये ये कतार बढती जायेगी ....क्यों ,  क्योकि दलित अगर बीजेपी को वोट देगा नहीं और हिन्दु के नारे से समाज पाटने के जगह अगर बंटेगा तो फिर बीजेपी के साथ कौन खडा होगा ।इसलिये आप इंतजार किजिये पांच राज्यो के परिणाम संघ के लिये भी सीख होने वाले है और सुविधाभोगी होकर संघर्ष करने की बात कहने वालो के लिये आखरी किल ठुकने वाली है ।
मगर एक जानकारी दिजिये दलित वोट जायेगें किधर...क्यो ? ये सवाल आपके जहन में क्यो आया । मेरे जहन में ये सवाल तभी आ गया था जब मायावती ने काग्रेस के साथ मध्यप्रदेश या छत्तिसगढ या राजस्थान में कोई समझौता नहीं किया । और अगर इन राज्यो के चुनाव के फैसले में मायावती हाशिये पर चली जाती है..जो एक्जिट पोल में नजर भी आ रहा है  तो फिर इसका एक मतलब ये भी होगा कि दलित भी अब मायावती के भरोसे नहीं है ।
तब तो दो सवाल और होने चाहिये । अब प्रोफेसर साहेब बोले । क्या ? पहला सरस्वती फुले बीजेपी छोड किस पार्टी का दामन थामेगी । और दूसरा क्या राज्यो के चुनाव संकेत होगें कि काग्रेस के पास अपने पारंपरिक वोटबैक लोट रहे है ।
महत्वपूर्ण सवाल है .... क्योकि फुले अगर काग्रेस में चली जाती है तो मान कर चलिये मायावती की काट काग्रेस को मिल गई । क्योकि सरस्वती फुले फायरब्रांड भी है और मायावती की घटती साख के बाद विकल्प भी । फिर बीजेपी से अगर मायावती ने सौदाबाजी कर अगर चुनाव लडा है जो लगातार मैसेज जा रहा है कि 2019 से पहले मायावती डर और पद दोनो के लालच से अलग चुनाव लडी तो राज्यो में काग्रेस की जीत तमाम क्षत्रपो को संकेत दे देगी कि काग्रेस को अब महागठबंधन के लिये मेहनत नहीं करनी है बै बल्कि क्षत्रप ही काग्रेस की शर्ते पर साथ जुडे ।
ये तो सौदेबाजी में ही पता चलेगा । स्वयसेवक का ये कहना था पर अगले ही पल खुद स्वयसेवक महोदय ही बोल पडे...ठीक कह रहे है आप अगर काग्रेस खिल रही है और मोदी ढल रहे है तो फिर सौदेबाजी के हालात काग्रेस तय करने लगेगी । 
इसका मतलब है बीजेपी के बुरे दिन आने वाले है । बात प्रोपेसर साहेब ने की लेकिन स्वयस्वक महोदय मेरी तरफ देखते हुये बोले , बुरे दिन तो देश के आने वाले है । खजाना खाली है । संवैधानिक संस्थाये तार तार है । सीबीआई पर सुप्रीम कोर्ट के सवाल सत्ता की मनमर्जी तले संविधान की ही आहुति देख रहे है ।
आज आपके तेवर बेहद कडे है .... खास कर मोदी सत्ता को लेकर ....और आपके सवाल सिर्फ आप तक सीमित है या संघ परिवार की भीतर भी कसमसाहट है .... मैने एक साथ कई सवाल दागे..लेकिन सवालो को सुनने के बाद स्वयसेवक महोदय सिर्फ इतना ही बोले...संघ कोई राजनीतिक संगठन नहीं है लेकिन अब संघ पर राजनीतिक हमले हो रहे है और संघ की कार्यशैली सास्कृतिक संगठन वाली है तो आपको बाहर से संघ खामोश ही दिखायी देगा लेकिन स्वंयसेवक दर स्वयसेवक के भीतर ये सवाल तो है कि आखिर मोदी युग में संघ सुविधायुक्त होकर  वैचारिक तौर पर सिकुडता क्यो चला गया । फिर जिस तर्ज पर सत्ता ने तमाम संस्थानो के जरीये विरोधियो को डराया उसकी जद में बीजेपी से ही जुडे लोग भी आ गये ।
ये तो आप नई बात कह रहे है ..कि डराने के दाये में बीजेपी भी आ गई ...कोई उदाहरण ..मुझे बोलना पडा ..
है ना ...आपसे इससे पहले भी बीजेपी के एक शख्स विभव उपाध्याय के बारे में जिक्र हुआ था ।
जी वहीं जो पहली बा 2005 में मोदी जी को जापान ले गये थे ...
जी ..आपकी यादश्त काफी मजबूत है प्रसून जी...उन्ही विभव उपाध्याय को ईडी नोटिस भेजती है । उनके करीबियो पर डीआईआई छापा मारती है ।
ये तो आप नई जानकारी दे रहे है ....
जी क्या कहे और तो और हरियाणा में तो संघ से जुडे खट्टर सीएम है लेकिन दिल्ली की सत्ता जब सीएम पर भी अपने अधिकारियो के जरीये सुपर सीएम बैठा देती है तो फिर सीएम इमानदार हो कर भी क्या करेगा ..... क्यों
अब देखिये जीएसटी के इंसपेक्टरो तक को इतनी ताकत के साथ भ्र्ष्ट्राचार करने का अधिकार मि गया है कि फरीदाबाद में बीजेपी से ही जुडे एक व्यापारी को वही का जीएसटी अधिकारी नहीं बख्शता ।
तो क्या बीजेपी की भी नहीं चलती या फिर वह अधिकारी ही बेहद महत्वपूर्ण है ।
अरे नहीं जनाब .... मै तो सिस्टम के करप्ट होने की व्याख्या कर रहा हूं ... अधिकारी छोटा सा है ...शायद उसका नाम कोई गोल्डन जैन है । बेहद भ्रष्ट्र है ....सभी जानते है । लेकिन सिस्टम ही जब किसी को भी राजनीतिक दवाब के तहत परेशान करने वाला बना दिया जायेगा तो होगा क्या ...हर करप्ट व्यक्ति खुद को मोदी के ग्रूप का बतायेगा ।  ये लकीर फरीबाद से लेकर चडीगढ तक चली जायेगी..फिर खट्टर कितने भी इमानदार स्वयसेवक रहे हो ..होगा क्या
जारी........ 


Friday, December 7, 2018

जनादेश बता देगा ...मोदी ढल रहे है...शाह उग रहे है...राहुल गढ रहे है !




पांच राज्यो के चुनाव प्रचार में तीन सच खुल कर उभरे । पहला , अमित शाह बीजेपी के नये चेहरे बन रहे है । दूसरा , काग्रेस का सच गांधी परिवार है और राहुल गांधी के ही इर्द-गिर्द नई काग्रेस खुद को गढ रही है । तीसरा , 2014 में देश के रक्षक के तौर पर नजर आते नरेन्द्र मोदी भविष्य की बीजेपी के भक्षक के तौर पर उभर रहे है । पर तीनो के अक्स में कही ना कही 2014 में लारजर दैन लाइफ के तौर पर उभरे नरेन्द्र मोदी है और उनकी छाया तले देश की समूची राजनीतिक सियासत का सिमटना है । और चार बरस बाद संघर्ष करते हुये राजनीति के हर रास्ते ये बताने से नहीं चूक रहे है कि छाया लुत्प हो चुकी है । 2019 की दिशा में बढते कदम एक ऐसी राजनीति को जन्म दे रहे है जिसमें हर किसी को अब अपने बूते तप कर निकलना है । क्योकि परत दर परत परखे तो ये पहला मौका रहा जब बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने नरेन्द्र मोदी से ज्यादा चुनावी रैलिया की । और इससे पहले नरेन्द्र मोदी की चुनावी रैलिया बीजेपी ही नहीं देश भर के लिये संदेश होती थी कि मोदी कितने लोकप्रिय है । क्योकि उसमें खूब भीड होती थी । औसतन डेढ घंटे तक नरेन्द्र मोदी का भाषण चलता था ।  कमोवेश उसी तर्ज पर इस चुनाव प्रचार में अमित शाह की चुनावी रैलियो में भी भीड जुटी . अमित शाह के भाषण लंबे होने लगे । मोदी का भाषण राजस्थान के प्रचार में तो तीस मिनट तक आ गिरा । पर शाह का भाषण औसतन 45 से 50 मिनट रहा ।  तो बीजेपी के भीतर ये सवाल काफूर हो गया कि सिर्फ मोदी की ही चुनावी रैली में भीड जुटती या भाषण का कन्टेट सिर्फ मोदी के पास  है । यानी एक विश्लेषण ये भी हो सकता है कि भीड जब जुटानी ही है तो फिर रैली किसी भी नेता की हो वह जुट ही जायेगी और भीड के आसरे रैली की सफलता या नेता की लोकप्रियता को आंकना गलत है । और दूसरा विश्लेषण ये भी कहता है कि नरेन्द्र मोदी ने ही ढील दी कि अगर उनकी पीठ पर 2014 के वादो का बोझ है तो फिर अमित शाह बोझ रहित है । यानी रणनीति के तहत अमित शाह को आगे किया गया । लेकिन पहली बार चुनावी प्रचार के थमने के बाद जब जनादेश का इंतजार देश कर रहा है तो ये सवाल चाहे अनचाहे हर जहन में होगा ही अगर वाकई बीजेपी तीनो राज्यो में हार गई तो क्या होगा । क्योकि मेनस्ट्रीम मीडिया को परखे तो उसकी रिपोर्ट नरेन्द्र मोदी की छवि हार के बावजूद बनाये रखने की दिशा गढनी शुरु हो चुकी है । एक तरफ ये परोसा जा रहा है कि छत्तिसगढ, मध्यप्रदेश और वसुंधरा में बीजेपी सीएम की पहचान तो नरेन्द्र मोदी के केन्द्र पटल पर आने से पहले ही खासी पहचान वाली रही है । और तीनो ही 2013 में अपने बूते जीते थे । तो इन बार तीनो की अपनी परिक्षा और अपना संघर्ष है । यानी नरेन्द्र मोदी का इन चुनाव से कोई लेना देना नहीं है । तो दूसरी तरफ ये भी कहा जाने लगा है केन्द्र और राज्य को चलाने वाले नेताओ की अदा में फर्क होता है । राज्य में सभी को साथ लेकर चलना जरुरी है लेकिन केन्द्र में ये जरुरी नहीं है क्यकि प्रधानमंत्री की पहचान उसके अपने विजन से होती है । जैसे इंदिरा गांधी थी । वैसे ही नरेन्द्र मोदी भी अकेले है । यानी चुनावी हार का ठिकरा मोदी के सिर ना मढा जाये या फिर जिस अंदाज में नरेन्द्र मोदी चार महीने बाद अपने चुनावी समर में होगें वहा उन्हे उनके तानाशाही रवैये या उनकी असफलता को कोई ना उभारे , इस दिशा में मोदी बिसात मिडिया के ही जरीये सही पर बिछायी तो जा रही है । तो एक संदेश तो साफ है कि  पांच राज्यो के जनादेश का असर बीजेपी में जबरदस्त तरीके से पडेगा और चाहे अनचाहे मोदी से ज्यादा अमित शाह के लिये जनादेश फायदेमंद होने वाला है । क्योकि आज की तारिख में अमित शाह की पकड बीजेपी के समूचे संगठन पर है । सीधे कहे तो जैसे नरेन्द्र मोदी ही सरकार है वैसे ही अमित शाह ही बीजेपी है । और 2019 में अगर मोदी का चेहरा चूकेगा तो बीजेपी को 2019 के समर के लिये तैयार होना होगा और तब चेहरा अमित शाह ही होगें । ऐसे हालात में कोई भी सवाल खडा कर सकता है कि क्या नरेन्द्र मोदी ऐसा होने देगें । या फिर क्या फर्क पडता है मोदी की जगह अमित शाह ले लें । क्योकि दोनो है तो एक दूसरे के राजदार । तो दोनो को एक दूसरे से खतरा भी नहीं है । लेकिन बीजेपी का भविष्य बीजेपी के अतित को कैसे खारिज कर चुका है ये वाजपेयी - आडवाणी की जोडी से मोदी-शाह की जोडी की तुलना करने पर भी समझा जा सकता है । वाजपेयी और आडवाणी के दौर में बीजेपी की राजनीति आस्था और भरोसे पर टिकी रही । और दोनो ही जिस तरह एक दूसरे के पूरक हो कर सभी को साथ लेकर चले उसमें बीजेपी के संगठन में निचले स्तर तर सरोकार का भाव नजर आता रहा । संयोग से मोदी अमित शाह के दौर में सिर्फ आडवाणी या जोशी को ही बेदखल नहीं किया गया बल्कि काम करने के तरीके ने बतलाया कि किसी भी काबिल को खडे होने देना ही नहीं है और सत्ता के लिये अपने अनुकुल सियासत ही सर्वोपरि है । तो यही मैसेज बीजेपी संगठन के निचले पायदान तक पहुंचा । यानी अमित शाह अगर 2019 के रास्ते को बनायेगें तो सबसे पहले उनके निशाने पर नरेन्द्र मोदी ही होगें इसे कोई कैसे इंकार कर सकता है । दरअसल धीरे धीरे ये रास्ता कैसे और क्यो बनता जा रहा है ये भी चुनाव प्रचार के वक्त ही उभरा । क्योकि बीजेपी शासित तीनो राज्यो में बीजेपी की जीत का मतलब बीजेपी के क्षत्रप ही होगें मोदी नहीं ये तीनो के प्रचार के तौर तरीको ने उभार दिया । जहां तीनो ही मोदी सत्ता की उपलब्दियो को बताने से बचते रहे और मोदी भी अपनी साढे चार बरस की सत्ता की उपलब्धियो को बताने की जगह काग्रेस के अतित या सत्ता की ठसक तले काग्रेसी नेताओ को धमकी देने की ही अंदाज में ही नजर आये । दरअसल मोदी इस हकीकत को भूल गये कि भारत लोकतंत्र का अम्यस्त हो चुका है । यानी कोई सत्ता अगर किसी को धमकी देती है तो वह बर्दाश्त किया नहीं जाता । हालाकि 2014 में सत्ता में आने के लिये मोदी की धमकी जनता को रक्षक के तौर पर लगती थी । इसलिये ध्यान दिजिये तो 2013-14 में जो मुद्दे नरेन्द्र मोदी उठा रहे थे , उसके दायरे में कमोवेश समाज के सारे लोग आ रहे थे । और सभी को मोदी अपने रक्षक के तौर पर नजर आ रहे थे । इसलिये पीएम बनने के बाद नरेन्द्र मोदी का हर अभियान उन्हे जादुई ताकत दे रहा था । लेकिन धीर धीरे ये जादू काफूर भी हुआ लेकिन मोदी खुद को बदल नहीं पा रहे है क्योकि उन्हे अब भी अपनी ताकत जादूई छवि में ही दिखायी देती है । उसलिये राफेल पर खामोशी बरत कर जब वह अगस्ता वेस्टलैंड में मिशेल के जरीये विपक्ष को धमकी देते है तो जनता का भरोसा डिगने लगता है । क्योकि ये हर किसी को पता है कि अंतर्ष्ट्रीय कोर्ट से मिशेल बरी हो चुके है और भारतीय जांच एंजेसी या अदालत किस अंदाज में काम करती है । बोफोर्स में वीपी सिंह के दौर में क्या हुआ ये भी किसी से छुपा नहीं है । यानी कोरी राजनीतिक धमकियो से साढे चार बरस गुजारे जा सकते है लेकिन पांचवे बरस चुनाव के वक्त ये चलेगें नहीं । और जिस रास्ते अमित शाह ने बीजेपी के संगठन को गढ दिया है उसमें चुनावी हार के बाद शाह की पकड बीजेपी पर और ज्यादा कडी होगी क्योकि तब 2019 की बात होगी और शिवराज, रमन सिंह या वसुंधरा को कैसे पार्टी संगठन में एडजस्ट किया जायेगा ये भी सवाल होगा ? लेकिन इसके सामानातंर काग्रेस की जीत और हार के बीच राहुल गांधी ही खडे है । और काग्रेस के लिये गांधी परिवार ताकत भी है और कमजोरी भी ये बात पांच राज्यो के जनादेश के बाद खुल कर उभरेगी । चुकि 2014 के बाद ये दूसरा मौका है कि बीजेपी और काग्रेस आमने सामने है । इससे पहले गुजरात और कर्नाटक के चुनावी फैसले ने बाजी एक एक कर रखी है । और अब तीन राज्यो में बीजेपी की सत्ता को अगर काग्रेस खिसका नहीं पायी तो ये राहु गांधी की सबसे बडी हार मानी जा सकती है लेकिन प्रचार के तौर तरीको ने बता दिया कि राहुल गांधी के अलावे काग्रेस में ना तो कोई दूसरा नेता है और ना ही काग्रेस किसी दूसरे नेता को परखना चाहती है । यानी राहुल गांधी का कद ही काग्रेस का कद होगा और काग्रेस की हार भी राहुल गांधी की ही हार कहलायेगी । तो ऐसे हालात में काग्रेस की जीत राहुल गांधी को काग्रेस के भीतर इंदिरा वाली छवि के तौर पर स्थापित भी कर सकती है जहा वह 1977 की हार के बाद 1980 में दूबारा सत्ता पा गई थी । हालाकिं खुद को नये सिरे से गढते राहुल गांधी ने प्रचार के दौरान काग्रेसी ओल्ड गार्ड को ये एहसास करा दिया कि 2014 के हार के पीछे 2012-13 में काग्रेसी मंत्रियो का अहम भी था । जो सत्ता के मद में चूर हो कर जनता से ही कट गये थे । और इसी का लाभ मोदी को मिला । पर अब राहुल गांधी इस एहसास को समझते हुये ये भी चुनावी प्रचार में जनता को बताते रहे कि सत्ता का रंग मोदी पर भी काग्रेसी अंदाज में कही ज्यादा गाढा है । तो चुनावी प्रचार का असर जनादेश के जरीये मोदी शाह और गांधी तीनो के भविष्य को तय करेगा ये भी तय है ।

Thursday, December 6, 2018

महत्वपूर्ण क्यों और क्या होगा पांच राज्यो के जनादेश के बाद....?



बीजेपी या काग्रेस ही नहीं बल्कि देश की तमाम राजनीतिक पार्टियां भी जानती है कि 11 दिसबंर के बाद देश की राजनीति बदल जायेगी । और संभवत पांच राज्यो से इतर देश में वोटरो का एक बडा तबका भी मान रहा है कि पांच राज्यो के जनादेश से 2019 की राह निकलेगी । जैसे जैसे तारिख नजदीक आ रही है वैसे वैसे काग्रेस और बीजेपी की राजनीति में भी परिवर्तन साफ दिखायी दे रहा है । और इस बदलते माहौल की सबसे बडी वजह यही है कि दांव पर बीजेपी या काग्रेस पार्टी नहीं बल्कि नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी का होना है । क्योकि एक तरफ 2014 के जनादेश ने जिस तरह मोदी के लारजर दन लाइफ के औरे को बना दिया । वही नेहरु गांधी परिवार में 2014 का सबसे कमजोर राहुल गांधी का कद 2019 में उसी दिशा में ले जा रहा है जहा 11 दिसबंर के बाद या तो वह देश के प्रधानमंत्री पद के सबसे प्रमुख दावेदार हो जायेगें या फिर क्षत्रपो की कतार में खडे नजर आयेगें । लेकिन कैसे 2014 के हालात 2019 की बिसात पर बीजेपी और काग्रेस की चाल को उलट दे रही है ये समझना कम दिसचस्प नहीं है । 
पहले काग्रेस की जीत तले बीजेपी की फितरत को समझे । गुजरात में बराबरी की टक्कर देते हुये जीत ना पाना । कर्नाटक में गठबंधन से मात दे देना । और राजस्थान में काग्रेस की जीत का मतलब है बीजेपी के भीतर जबरदस्त उथल-पुथल । जो वसुंधरा राजे सिंधिया को एक क्षेत्रिय पार्टी बनाने की दिशा में ले जा सकती है । क्योकि मोदी-शाह की जोडी वसुंधरा को बर्दाश्त करने की स्थिति में तब होगी नहीं । और इसके संकेत बीजेपी छोड काग्रेस में गये मानवेन्द्र सिंह [ बीजेपी नेता जसंवत सिंह के बेटे  ]  को जिताने के लिये अंदरुनी तौर पर बीजेपी का ही सक्रिय होना । यहा ये समझ जरुरी है कि बीजेपी की मतलब अमित शाह होता है । और मान्वेन्द्र की जीत का मतलब वसुंधरा की हार है । ये खेल पहले काग्रेस में खूब होता था । लेकिन काग्रेस बदल रही है तो सचिन पायलट की मोटरसाउकिल के पीछे अशोक गहलोत बैठ कर हवा खाने से नहीं कतराते । खैर मध्यप्रदेश में अगर काग्रेस जीतती है तो नया सवाल शिवराज सिंह चौहान के बाद कौन ये भी उभरेगा । ठीक उसी तरह जैसे दिल्ली में काग्रेस हारी तो 15 बरस सत्ता भोगने वाली शीला दीक्षित को लेकर हुआ क्या या कौन से सवाल उठे ये महत्वपूर्ण है । ये अलग बात है कि अब काग्रेस संभली है तो शीला दीक्षित के बेटे संदीप दीक्षित को काग्रेस का महासचिव पद दे दिया गया है । पर सवाल है कि क्या संघ के प्रिय और मोदी-शाह को खटकने वाले शिवराज का राज बीजेपी के भीतर भी बरकरार रह पायेगा । और इसी के सामानातंर छत्तिसगढ में भी क्या काग्रेस की जीत रमन सिंह के आस्तितव को भी बरकरार रख पायेगी । क्योकि रमन सिंह या कहे उनके बेटे का नाम जिस तरह राहुल गांधी ने पनामा पेपर के जरीये उठाया तो विपक्ष के तौर पर लडाकू बीजेपी की अगुवाई कैसे रमन सिंह कर पायेगें । खासकर तब जब रमन सिंह के खिलाफ बतौर काग्रेसी उम्मीदवार खडी अटलबिहारी वाजपेयी की भतीजी करुणा शुक्ला को जिताने में बीजेपी का ही एक प्रभावी गुट लगा हुआ है । यानी रमन सिंह को हारा हुआ देखने वाले छत्तिसगढ बीजेपी में है । और बीजेपी का मतलब अमित शाह ही होता है ये बताने की जरुरत नहीं है । और इसी लकीर को अगर तेलगांना ले जाईये तो वहा बीजेपी खिलाडी के तौर पर तो है लेकिन बीजेपी जिन मुख्य खिलाडियो के आसरे खेल रही है उसमें काग्रेस के लिये तेलगांना में संगठन खडा करने और चन्द्रबाबू नायडू के साथ होने के हालात ने झटके में केसीआर, औवैसी और बीजेपी को एक ही मंच पर ला खडा किया । यानी काग्रेस के लिये जो धर्म की राजनीति में जो सवाल उलझा था उसका रास्ता तेलगंना में निकलता दिखायी देता है जहा काग्रेस का साफ्ट हिन्दुत्व बीजेपी-केसीआर के वोट बैक में सेंध लगाती है और खामोश मुस्लिम को अपने अनुकुल करती है । यानी बीजेपी की बिसात पर केसीआर का चलना और औवैसी का संभल संभल कर खुद को संभालना ही काग्रेस की जीत है । क्योकि ये 2014 की उसी आहट को 2019 में दोहराने की दिशा में ले जा रही है जब एक वक्त कोई काग्रेस के साथ चलना नहीं चाह रहा था तो अब ये संकट 11 दिसबंर के जनादेश के बाद बीजेपी के साथ हो सकता है । जब एनडीए में भगदड मच जाये ।
लेकिन इसके उलट बीजेपी की जीत सीधे राहुल गांधी की लीडरशीप पर सवाल खडा करती है । यानी बीजेपी अगर तीन राज्यो में जीतती है तो मोदी-अमित शाह का कद जितना नहीं बढेगा उससे राहुल गांधी का कद कही ज्यादा छोटा हो जायेगा । और संकेत तब यही निकलेगें कि 2019 में काग्रेस विपक्ष की अगुवाई करने की हैसियत में नहीं है । लेकिन बीजेपी की जीत बीजेपी के संगठन को मोदी-शाह तले जिस तरह केन्द्रीत करेगी उसमें बीजेपी का 2019 का चेहरा वहीं होगा जैसा इंदिरा गांधी के वक्त काग्रेस का था ।
और यही से सबसे महत्वपूर्ण सवाल खडा होता है कि 2019 की तरफ बढते कदम एक तरफ बीजेपी को केन्द्रियकृत करती जा रही है तो संकट से जुझती काग्रेस अपने पिरामिड वाले ढांचे को उलटने का प्रयास कर रही है । 11 दिसबंर को जीत के बाद 2019 के लिये बीजेपी में सारे फैसले मोदी-शाह करेगें । 11 दिसबंर को जीत के बाद काग्रेस में राहुल की मान्यता को सर्वोपरी जरुर होगी लेकिन संगठन का ढांचा नीचे से उपर आयेगा । यानी कार्यकत्ता की आवाज को महत्व दिया जायेगा । बीजेपी में जिस तरह 75 पार के नेताओ को मार्गदर्शक मंडल में बैठा कर रिटायर कर दिया गया । उसके उलट काग्रेस में ओल्ड गार्ड संगठन को मथने में लगेगे । और उसके लिये निर्देश राहुल गांधी नहीं देगें बल्कि बुजुर्ग नेता खुद ही कहेगें । यानी जो संकेत चिदबंरम ने ये कहकर दिया कि मनमोहन सिंह की दूसरी पारी में ही उन्हे मंत्री नही मनना चाहिये था बल्कि संगठन को संभालना चाहिये था । ये संकेत है कि काग्रेस धीरे धीरे युवाओ के हाथ में जायेगाी । तो बीजेपी की जीत मोदी-शाह की ताकत को संघ से भी ज्यादा बढाती है । और बीजेपी को सिर्फ कार्यकत्ताओ के आंकडो में विस्तार मिलता है । कार्यकत्ताओ की उपयोगिता मोदी-शाह की जोडी तले ना के बराबर हो जाती है ।  लेकिन काग्रेस की जीत राहुल गांधी को संगठन सुधारने से लेकर काग्रेस को युवा ब्रिग्रेड के जरीये मथने का मौका देगी । जिसमें युवा मंत्री होगा लेकिन बुजर्ग रिटायर ना होकर संगठन और सत्ता  के बीच कडी के तौर पर रहेगी । यानी काग्रेस और बीजेपी दोनो ही बदल रही है या 11 दिसबंर के बाद बदलती हुई दिखायी देगी तो बधाई मोदी सत्ता को ही देनी होगी । जिसने चरम की राजनीति को अंजाम दिया । असर यही हुआ कि अब बीजेपी का काग्रेसीकरण हो नहीं सकता और काग्रेस सत्ता के मद में खो कर गांधी परिवार की भक्ति में लीन हो नहीं सकती । अब तो नये राजनीतिक प्रयोग । वैकल्पिक नीतियो की सोच । आर्थिक सुधार के आगे का इक्नामिक माडल और ग्रामिण भारत के मुद्दो को केन्द्र में रखने की मजबूरी ही 2019 की दिशा तय कर रही है ।