Tuesday, February 12, 2019

2019 की चुनावी बिसात पर राहुल की व्यूह रचना


2019 की दौड में नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी अगुवाई कर रहे है तो
अगुवाई करते नेता के पीछे खडे क्षत्रप की एक लंबी फौज है जो अपने अपने
दायरे में खुद की राजनीतिक सौदेबाजी के दायरे को बढा रहे है । इस कडी में
ममता , मायावती , अखिलेश , चन्द्रबाबू, चन्द्रशेखर राव, कुमारस्वामी ,
तेजस्वी , हेमतं सोरेन ,नवीन पटनायक सरीखे क्षत्रप है । लेकिन जैसे जैसे
वक्त गुजर रहा है वैसे वैसे तस्वीर साफ होती जा रही है कि राजनीतिक बिसात
बनेगी कैसी ।ध्यान दे तो नरेन्द्र मोदी की थ्योरी राष्ट्रवाद को लेकर रही
है । इसलिये वह चार मुद्दो को उटा रहे है । पहला विदेशो में मोदी की वजह
से भारत का डंका बज रहा है । दूसरा, डोकलाम में चीन को पहली बार मोदी की
कूटनीति ने ही आईना दिखा दिया । तीसरा , सर्जिकल स्ट्राइक के जरीये
पाकिस्तान धूल चटा दी । और चौथा हिन्दुत्व के रास्ते सत्ता चल रही है ।
और इसके लिये वह नार्थइस्ट में बांग्लादेशियो को खदेडने के लिये कानून
बनाने से भी नहीं चूक रही है । लेकिन राहुल गांधी की थ्योरी खुद को
राष्ट्रवादी बताते हुये अब मोदी के राष्ट्रवाद की थ्योरी तले इक्नामी के
अंधेरे को उभार रही है । राहुल गांधी का कहना है राष्ट्रवादी तो हम भी है
। और जहा तक हिन्दुत्व की बात है तो जनेउधारी तो हम भी है । लेकिन दुनिया
भर में डंका पिटने के बावजूद मोदी का राष्ट्रवादी गरीबो के लिये कुछ नही
कर रहा है ये सिर्फ कारपोरेट हित साध रहा है । यानी 2019 की तरफ बढते कदम
मोदी की व्यूह रचना में राहुल की सेंध को ही इस तरह जगह दे रहे है जैसे
एक वक्त की काग्रेस की चादर अब बीजेपी ने ओढ ली है और गरीब गुरबो का
जिक्र कर काग्रेस में समाजवादी-वामपंथी सोच विकसित हो गई है । यानी 2019
की बनती तस्वीर में क्षत्रपो के सामने संकट पाररंपरिक जाति और धर्म के
मुद्दे के हाशिये पर जाने से उभर रहा है । यानी आर्थव्.यवस्था को लेकर
जिस तरह काग्रेस सक्रिय हो चली है और राममंदिर को जिस तरह मोदी के साथ
संघ परिवार ने भी चुनाव तक टाल दिया है उसमें जातिय समीकरण के आधार पर
राजनीति करने वाले क्षत्रपो के सामने ये संकट है कि उनका वोट बैक भी उस
विकास को खोज रहा है जो उनके पेट और परिवार से जा जुडा है । इससे
क्षत्रपो की सौदेबाजी भी खासी कमजोर हो चली है । यानी इस तस्वीर का पहला
पाठ तो यही है बीजेपी क्षत्रपो को जीने नहीं देगी और काग्रेस क्षत्रपो को
अपनी शर्तो पर समझौता कराने की दिशा में ले जायेगी ।  राहुल प्रियका की
जोडी काग्रेस में आक्सीजन भर रही है या फिर क्षत्रपो के सामने जीवन मरन
का संकट खडा कर रही है । ये सवाल धीरे धीरे इसलिये बडा होता जा रहा है
क्योकि काग्रेस के कदम एकला चलो या फिर लोकसभा में ज्यादा से ज्यादा सीटो
पर चुनाव लडकर अपनी संख्या को बढाने के फार्मूले की तरफ बढ चुके है । और
ये सब कैसे हो रहा है ये देखना बेहद दिलचस्प है । क्योकि राहुल और
प्रियंका एक साथ जब चुनाव प्रचार के लिये उतरेगें तो इसका मतलब साफ है कि
यूपी बिहार झारखंड बंगाल, आध्र प्रदेश और उडीसा को लेकर साफ थेयोरी होगी
कि क्षत्रपो को राज्यो में अगुवाई की बात कहकर लोकसभाचतुनाव में ज्यादा
से द्यादा सीट खुद लडे । और मोदी विरोध की थ्योरी के सामानातंर पं बंगाल,
आध्रप्रेदश और उडिसा में किसी भी क्षत्रप के साथ समझौता ना करें । इस
थ्योरी को सिलसिलेवार समझे । यूपी में एक तरफ मायावती को लेकर मुस्लिम
समेत जाटव छोड बाकि दलित जातियो में ये सवाल अब भी है कि क्या चुनाव के
बाद मायावती सत्ता के लिये कही बीजेपी के साथ तो खडा नहीं हो जायेगी । तो
दूसरी तरफ अखिलेश के सामने यादव वोट बैक के अलावे ओबीसी जातियो के बिखराव
का संकट भी है और मायावती के साथ गठबंधन के बावजूद दलित वोट का ट्रासंभर
ना होने की स्थिति भी है । फिर काग्रेस को लाभ सीधा है । पहला, -काग्रेस
आर्थिक आधार पर अपने पारंपरिक वोट बैक को जोडने उतरेगी । तो दूसरा ,
महिला, युवा और अगडी जातियो के वोट को प्रियंका के आसरे जोडेगी । तो यूपी
से सटे बिहार झरखंड में काग्रेस अपनी सौदेबाजी के दायरे को बढा रही है
।इसलिये बिहार में तेजस्वी हो या झरखंड में सोरेन । दोनो के सामने
काग्रेस का प्रस्ताव साफ है , -तेजस्वी-सोरन सीएम बने लेकिन लोकसभा की
सीट ज्यादा काग्रेस के पास होगी । और ज्यादा सीटो पर चुनाव लडने का
फार्मूला ही पं बंगाल और आध्रपर्देश में काग्रेस को गटबंधन के बोझ से
मुक्त कर चुका है । उसलिये काग्रेस ने बंगाल में ममता बनार्जी के साथ तो
आध्र में चन्द्रबाबू के साथ मिलकर चुनाव ना लडने का फैसला किया है । यानी
काग्रेस इस हकीकत को बाखूबी समझ रही है कि लोकसभा चुनाव में जिसके पास
ज्यादा सीट होगी उसकी दावेदारी ही चुनाव के बाद पीएम के उम्मीदवार के तौर
पर होगी । और इसके लिये जरुरी है अपने बूते चुनाव लडना । तो ऐसे में
प्रियंका की छवि कैसे नरेन्द्र मोदी के औरे को खत्म करेगी इसपर काग्रेस
का ध्यान है । क्योकि 2014 में नरेन्द्र मोदी जिस हंगामे और जिस तामझाम
के साथ आये ये कोई कैसे भूल सकता है । और तब प्रचार में बीजेपी कही नहीं
थी सिर्फ मोदी थे । लेकिन इसके उलट प्रियंका गांधी की इंट्री बेहद खामोशी
से हुई । काग्रेस मुख्यालय में नेम प्लेट टांगने से लेकर कार्यकत्ताओ से
बिना हंगामे मिलने के तौर तरीके ने ये तो साफ जतला दिया कि प्रिंयका को
किसी प्रचार की जरुरत नहीं है । और काग्रेस का मतलब ही नेहरु गांधी
परिवार है । लेकिन बीजेपी यहा भी अपने ही कटघरे में फंस गई । जब उसने
खामोश प्रियका को खानदान और बिना हंगामे के राजनीति तले सिर्फ परिवार के
अक्स में देखना शुरु किया । यानी प्रिंयका की छवि बीजेपी ने ही अपनी
आलोचना से इतनी रहस्मयी और जादुई बना दिया कि प्रियका के बारे में जानने
के लिये वोटरो में भी उत्सुकता जाग गई । और काग्रेस ने प्रियंका की छवि
को मुद्दो को आसरे जिस तरह उभारने की कोशिश शुरु की है वह ना सिर्फ
प्रियाका को दिरा गांधी से जोड रही है बल्कि इंदिरा के दौर में जिस तरह
गरीबी हटाओ का नारा बुलंद हुआ । और जिसतरह मोदी के कारपोरेट प्रेम तले
किसान मजदूर का सवाल काग्रेस उटा रही है उसमें चाहे अनचाहे 2019 का चुनाव
अमीर बनाम गरीब की तरफ बढता जा रहा है । तो सवाल तीन है । पहला, क्या
प्रियका को सिर्फ यूपी तक सीमित रखा जायेगा । दूसरा , क्या प्रिंयका को
यूपी के सीएम के तौर पर प्रजोक्ट भी किया जायेगा ।  -तीसरा , क्या
प्रिंयका की छवि राहुल के लिये मुश्किल पैदा करेगा । पर इन सवालो का जवाब
भी काग्रेस के पास है । ध्यान से परखे तो  प्रिंयका गांधी को चुनावी
मैदान में तब उतारा गया जब राहुल गांधी की छवि पप्पू से इतर एक परिपक्व
नेता के तौर पर बनने लगी । फिर  राहुल गांधी ने अपनी राजनीति से मोदी को
कारपोरेट के साथ खडा करने में राजनीतिक सफलता पायी । और -तीसरा , किसान
और बेरजगारी के सवाल को जिस तरह राहुल ने मथा उसका ठीकरा मोदी सत्ता पर
फूटा । और इसी अक्स में प्रियका का राजनीतिक इन्ट्री ही राहुल गांधी ने
इस स्ट्रेटजी के साथ किया कि इंदरा की छवि में गरीबो के सावल को साथ लेकर
अगर प्रयका प्रचार मैदान में कूदेगी तो मोदी का औरा खत्म होगा ।


Tuesday, January 29, 2019

जिन्हे जार्ज ने खडा किया उन्होने ही जार्ज को धोखा दिया....

तारिख 2 अप्रेल 2009 । नीतीश कुमार ने रामविलास पासवान का साथ छोड़कर आये
गुलाम रसूल बलियावी का हाथ आपने हाथ में लेकर जैसे ही उन्हें जनतादल
यूनाईटेड में शामिल करने का ऐलान किया वैसे ही दीवार पर टंगे तीन बोर्ड
में से एक नीचे आ गिरा। गिरे बोर्ड में तीर के निशान के साथ जनतादल
यूनाइटेड लिखा था। बाकी दो बोर्ड दीवार पर ही टंगे थे, जिसमें बांयी तरफ
के बोर्ड में शरद यादव की तस्वीर थी तो दांयी तरफ वाले में नीतीश कुमार
की तस्वीर थी। जैसे ही एक कार्यकर्ता ने गिरे हुये बोर्ड को उठाकर शरद
यादव और नीतीश कुमार के बीच दुबारा टांगा, वैसे ही कैमरापर्सन के हुजूम
की हरकत से वह बोर्ड एकबार फिर गिर गया। इस बार उस बोर्ड को टांगने की
जल्दबाजी किसी कार्यकर्ता ने नहीं दिखायी। पता चला इस बोर्ड को 2 अप्रैल
की सुबह ही टांगा गया था। इससे पहले वर्षों से दीवार पर शरद यादव और
नीतीश कुमार की तस्वीर के बीच जॉर्ज फर्नांडिस की तस्वीर लगी हुई थी। और
तीन दिन पहले ही शरद यादव की प्रेस कॉन्फ्रेन्स के दौरान पत्रकारों ने जब
शरद यादव से पूछा था कि जॉर्ज की तस्वीर लगी रहेगी या हट जायेगी तो शरद
यादव खामोश रह गये थे।

लेकिन 30 मार्च को शरद यादव के बाद 2 अप्रैल को नीतीश की मौजूदगी में
जॉर्ज की जगह लगाया गया यह बोर्ड तीसरी बार तब गिरा, जब प्रेस
कॉन्फ्रेन्स के बाद नीतीश कुमार जदयू मुख्यालय छोड़ कर निकल रहे थे ।
मुख्यालय में यह तीनों तस्वीरें नीतीश के पहली बार मुख्यमंत्री बनने के
दौरान लगायी गयी थीं। उस दिन गुलाल और फूलों से नीतीश के साथ साथ जॉर्ज
और शरद यादव भी सराबोर थे। उस वक्त तीनों नेताओ को देखकर ना तो कोई सोच
सकता था कि कोई अलग कर दिया जायेगा या तीनों तस्वीरों को देख कर कभी किसी
ने सोचा नहीं था की जॉर्ज की तस्वीर ही दीवार से गायब हो जायेगी। और इसके
पीछे वही तस्वीर होगी, जिन्हें राजनीति के फ्रेम में मढ़ने का काम जॉर्ज
फर्नांडिस ने किया।

जार्ज फर्नांडिस कितने भी अस्वस्थ क्यों ना हों, लेकिन जो राजनीति देश
में चल रही है उससे ज्यादा स्वस्थ्य जॉर्ज हैं, यह कोई भी ताल ठोंक कर कह
सकता है। शरद यादव को जबलपुर के कॉलेज से राजनीति की मुख्यधारा में लाने
से लेकर लालू यादव की राजनीति को काटने के लिये नीतीश कुमार में पैनापन
लाने के पीछे जॉर्ज ही हैं। लेकिन जॉर्ज फर्नांडिस की जगह नीतीश कुमार को
वह जय नारायण निषाद मंजूर हैं, जो लालू यादव का साथ छोड़ टिकट के लिये
नीतीश के साथ आ खड़े हुये हैं।

सवाल जॉर्ज की सिर्फ एक सीट का नहीं है, सवाल उस राजनीतिक सोच का है
जिसमें खुद का कद बढ़ाने के लिये हर बड़ी लकीर को नेस्तानाबूद करना शुरु
हुआ है। और यह खेल संयोग से उन नेताओं में शुरु हुआ है, जो इमरजेन्सी के
खिलाफ जेपी आंदोलन से निकले हैं। हांलाकि सत्ता की राजनीतिक लकीर में
जॉर्ज ज्यादा बदनाम हो गये क्योंकि अयोध्या से लेकर गुजरात दंगो के दौरान
जॉर्ज बीजेपी को अपनी राजनीति विश्वनियता के ढाल से बचाने की कोशिश करते
रहे। लेकिन गुजरात दंगो के दौरान नीतीश और शरद यादव में भी हिम्मत नहीं
थी कि वह जॉर्ज से झगडा कर एनडीए गठबंधन से अलग होने के लिये कहते। दोनो
ही सत्ता में मंत्रीपद की मलाई खाते रहे।

असल में जार्ज अगर ढाल बने तो उसके पीछे उनकी वह राजनीतिक यात्रा भी है,
जो बेंगलूर के कैथोलिक सेमीनरी को छोड़ कर मुंबई के फुटपाथ से राजनीति का
आगाज करती है। मजदूरों के हक के लिये होटल-ढाबा के मालिकों से लेकर मिल
मालिकों के खिलाफ आवाज उठाकर मुंबई में हड़ताल-बंद और अपने आंदोलन से शहर
को ठहरा देने की हिम्मत जॉर्ज ने ही इस शहर को दी। 1949 में मुंबई पहुंचे
जॉर्ज ने दस साल में ही मजदूरों की गोलबंदी कर अगर 1959 में अपनी ताकत का
एहसास हडताल और बंद के जरीये महाराष्ट्र की राजनीति को कराया तो 1967 में
कांग्रेस के कद्दावर एस के पाटिल को चुनाव में हराकर संसदीय राजनीति में
नेहरु काल के बाद पहली लकीर खिंची, जहां आंदोलन राजनीति की जान होती है,
इसे भी देश समझे। जॉर्ज उस दौर के युवाओं के हीरो थे । क्योंकि वह रेल
यूनियन के जरीये दुनिया की सबसे बड़ी हडताल करते हैं। सरकार उनसे डरकर
उनपर सरकारी प्रतिष्ठानों को डायनामाइट से उड़ाने का आरोप लगाती है।
इसीलिये इमरजेन्सी के बाद 1977 के चुनाव में जब हाथों में हथकडी लगाये
जॉर्ज की तस्वीर पोस्टर के रुप में आती है, तो मुज्जफरपुर के लोगों के
घरों के पूजाघर में यह पोस्टर दीवार पर चस्पा होती है। जिस पर छपा था, यह
हथकड़ी हाथों में नही लोकतंत्र पर है। और नीचे छपा था- जेल का ताला
टूटेगा जॉर्ज फर्नाडिस छूटेगा।

जाहिर है बाईस साल पहले के चुनाव और अब के चुनाव में एक नयी पीढ़ी आ चुकी
है, जिसे न तो जेपी आंदोलन से मतलब है, न इमरजेन्सी उसने देखी है। और
जॉर्ज सरीखा व्यक्ति उसके लिये हीरो से ज्यादा उस गंदी राजनीति का प्रतीक
है, जिस राजनीति को जनता से नही सत्ता से सरोकार होते है। इस पीढी ने
बिहार में लालू का शासन देखा है और नीतीश को अब देख रहा है। नीतीश उसके
लिये नये हीरो हो सकते हैं क्योकि लालू तंत्र ने बिहार को ही पटरी से
उतार दिया था। लेकिन लालू के खिलाफ नीतीश को हिम्मत जॉर्ज फर्नाडिस से ही
मिली चाहे वह समता पार्टी से हो या जनतादल यूनाईटेड से। लेकिन केन्द्र
में एनडीए की सत्ता जाने के बाद बिहार में लालू सत्ता के आक्रोष को
भुनाने के लिये जो रणनीति नीतीश ने बनायी, उसमें अपने कद को बढाने के
लिये जॉर्ज को ही दरकिनार करने की पहली ताकत उन्होने 12 अप्रैल 2006 में
दिखा दी। लेकिन सियासत की बिसात कैसे महाभारत की चौसर पर भी भारी हो चुकी
है इसका एहसास तो तब शरद यादव को भी हो चुका होगा । जो 13 बरस पहले नीतिश
की बिसात पर वजीर बन कर जार्ज को मात देने के लिये तैयार हो गये । और बरस
भर पहले नीतिश ने सत्ता के लिये मोदी प्रेम तले शरद यादव को भी दरकिनार
कर दिया । तो 2006 को याद किजिये जार्ज के खिलाफ जब पार्टी अध्यक्ष चुनाव
में शरद यादव और जॉर्ज आमने सामने खड़े थे । बिलकुल गुरु और चेले की
भिंडत । मगर बिसात नीतिश की थी । जार्ज को 25 वोट मिले और शरद यादव को
413 । लेकिन चुनाव के तरीके ने यह संकेत तो दे दिये की नीतीश की बिसात पर
जॉर्ज का कोई पांसा नहीं चलेगा और जॉर्ज को खारिज करने के लिये नीतीश
अपने हर पांसे को जार्ज की राजनीतिक लकीर मिटाकर अपनी लकीर को बड़ा
दिखाने के लिये ही करेंगे ।

लेकिन, इसका अंदाजा किसी को नहीं था कि इस तिगडी की काट वही राजनीति
होगी, जिस राजनीति के खिलाफ आंदोलन खड़ा करने की बात तीनों ने ही अपने
राजनीतिक कैरियर की शुरुआत में की थी । इसीलिये जॉर्ज को अस्वस्थ बताकर
मुज्जफरपुर से टिकट काटने के बाद नीतीश ठहाका लगा रहे थे कि बिना उनके
समर्थन के जॉर्ज चुनाव मैदान में कूदकर अपनी भद ही करायेंगे । वहीं,
जॉर्ज अपना राजनीतिक निर्वाण लोकसभा चुनाव लड़कर ही चाहते हैं। इसीलिये
जॉर्ज ने पर्चा भरने के बाद अपने मतदाताओं से जिताने की तीन पन्नो की जो
अपील की है, उसका सार यही है कि जिस तरह गौतम बुद्द के दो शिष्यों में एक
देवदत्त था, जो बुद्ध को मुश्किलों में ही डालता रहा, वहीं उनके दोनों
शिष्य ही देवदत्त निकले । आनंद जैसा कोई शिष्य जार्ज को तब मिला नहीं और
अनथक विद्रोही नेता उसके बाद धीरे धीरे भूलने वाली बिमारी की चपेट में आ
गये । अल्जाइमर ने गिरफ्त में लिया तो जार्ज भूल गये नीतिश कौन है । शद
यादव कौन है । इंदिरा गांधी कौन थी । बाल ठाकरे कौन थे । अच्छा है इस दौर
में उनकी यादश्त नहीं थी वर्ना प्रधानमंत्री मोदी को देख गुजरात दंगो के
दौर में वाजपेयी के राजधर्म को याद करते और अब के राजधर्म को नकारने के
लिये निकल पडते । लंबी खामोशी के बाद जार्ज के निधन की खबर भी जिस खामोशी
के साथ आई उसने निद्रा में समायी मौजूदा सियासत को सिर्फ मौत की सूचना भर
से जगाया । अच्छा है एनडीए के पांच सारथियो में से वाजपेयी और जार्ज का
निधन हो चुका है । दोनो ही आखरी दिनो में सबकुछ भूल चुके थे ।  जसवंत
सिन्हा भी सबकुछ भूल चुके है  [ अल्जाइमर से ग्रसित ]  । आडवाणी और मुरली
मनोहर जोशी को खामोश किया जा चुका है ।  तो अस्वस्थ जार्ज के निधन की खबर
भी अस्वस्थ सियासत तले दब गई ।


Sunday, January 27, 2019

स्वंयसेवक की कडक चाय : कैप्टन के हाथों जहाज गडमगाने लगा है ...तो हलचल शुरु हो गई !


कडक चाय कितना मायने रखेगी जब चाय पिलाने वाला स्वयसेवक हो और झटके में कह दें अब तो जेटली भी चुनाव के बाद के हालात में अपनी जगह बनाने में जा जुटे है । तो क्या मोदी का जादू खत्म । सवाल खत्म या जारी रहने का नहीं है , जरा समझने की कोशिश किजिये जेटली हर उस कार्य से पल्ला झाड रहे है जो उन्ही के देखरेख में शुरु हुआ । सिर्फ सीबीआई या ईडी या इनकमटैक्स भर का नहीं है जो कि चंदा कोचर के मामले में उनका दर्द सामने आ गया । तो ये दर्द है ऐसा माना जाये......हा हा , बिलकुल नहीं , बल्कि खुद को चुनाव बाद के हालात में फिट करने की कोशिश है ।

तो क्या जेटली को लग चुका है कि बीजेपी दुबारा सत्ता में नहीं लौटगी । प्रोफेसर साहेब ने घुमा कर पूछा तो स्वयसेवक महोदय ने भी घुमा कर कहा राजनीति में कुछ भी संभव है लेकिन ये समझने की कोशिश किजिये कि जो सबसे ताकतवर है उसी से पल्ला झाडने का अंदाज विकसित क्यो हो रहा है । मसलन, मुझे पूछना पडा ।
मसलन क्या वाजपेयी साहेब , गडकरी ने तब उस कारपोरेट के हक में कहा जब मोदी सत्ता माल्या और नीरव मोदी को चोर कहने से नहीं चुक रही थी । पर गडकरी ने चोर शब्द पर ही एतराज कर दिया । फिर आपने कल परेड क वक्त राहुल गांधी के बगल में बैठे नीतिन गडकरी की बाडी लैक्वेज नहीं पढी ।
तो आप बाडी लेग्वेज पढने लगे है .....प्रोफेसर की इस चुटकी पर स्वयसेवक महोदय बोल पडे....ना ना यारी नहीं समझी । दरसल गडकरी काग्रेस के हिमायती या राहुल गांधी के प्रशसंक नहीं है । लेकिन गडकरी किसी से वैसी दुशमनी नहीं करते जैसी मोदी सत्ता कर रही है । और ध्यान दिजिये राहुल से बातचीत कर गडकरी राहुल को कम मोदी को ज्यादा देख रहे होगें ।
अब ये तो मन की बात है ...इसे आप कैसे पढ सकते है । मेरे टोकते ही अब प्रोफेसर साहब बोल पडे...इसमें पढना क्या है  हालात समझे । हर कोई अपनी अपनी पोसचरिंग ही तो कर रहा है । लेकिन हर के निशाने पर सत्ता का कैप्टन है ।
वाह कमाल है प्रोफेसर साहेब आप बाहर सs कैसे सब पढ ले रहेहै ।
पढ नही रहा हूं बल्कि नंगी आंखो से देख रहा हूं ।
कैसे ...मुझे ही टोकना ।
देखिये मोदी सत्ता के तीन पीलर में से एक तो जेटली है ....और बजट से एन पहले उनके ब्लाग जो बयान कर रहे है वह क्या दर्शाता है । राजनीति टाइमिंग का खेल है । इसे स्वयसेवक साहेब शायद ना समझे लकिन हम बाखूबी समझते है । क्यो स्वयसेवक महोदय जरा आप ही इसे डि-कोड किजिये ।
क्या .. अचानक स्वयसेवक महोदय अब चौक पडे ।
यही की न्यूयार्क से जेटली सत्ता के रोमान्टिज्म पर सवाल खडा करते है । इधर , बीजेपी के पोस्टर ब्याय योगी आदित्यनाथ संदेश देते है कि राम मंदिर तो चौबिस घंटे में वो बनवा सकते है । फिर सुब्रहमण्यम स्वामी लिखते है , राम मंदिर बनाने में क्या है एक बार वीएचपी को खुला छोड दिजिये बन जायेगा राम मंदिर । और उससे पहले याद कर लिजिये विएचपी के कोचर महोदय कह गये राममंदिर को काग्रेस ही बनायेगी । और फिर संघ मेंदूसरे नंबर के भैयाजी जोशी ये कहने से नहीं चुकते कि लगता है राम मंदिर 2025 में ही बनेगा । तो इसका क्या मतलब निकाला जाये ।
स्वयसेवक महोदय ने बिना देर किये प्रोफेसर साहेब की नजरो से नजर मिलायी और बोल पडे ..डिकोड क्या करना है ...बीजपी में सभी को समझ में आ रहा है कि कैप्टन अब जहाज को आगे ले जाने की स्थिति में नहीं है तो हाबसियन स्टेट की हालात बन रही है ।
यानी
यानी यही कि प्रोफेसर साहेब जिसे मौका मिल रहा है वह कैप्टन पर हमला कर खुद को भविष्य का कैप्टन बनाने की दिशा में जाना चाह रहा है । सुब्हमण्य स्वामीबता रहे है कि रहे है कि जेटली ही सबसे बडे अपराधी है । योगी कह रहे है कि मोदी तो कभी राम मंदिर बनाना ही नहीं चाहते है । गडकरी इशारा कर रहे है कारपोरेट उनके पीछे खडा हो जाये तो मोदी माइनस बीजेपी को सत्ता में वह ला सकते है । फिर संघ भी समझ रहा है कि जहाज डूबेगा तो उनकी साख कैसे बची रहे । लेकिन इस हालात को बनाते वक्त हर कोई ये भुल रहा है कि जिस कटघरे को सभी मिल कर राहुल गांधी के लिये बना रहे थे वह अब उन्ही के लिये गले की हड्डी बन रही है ।
वह कैसे ...
वाजपेयी जी आप हालात परखे । मोदी ने शुरु से चाहा कि देश प्रेजिडेन्शियल इलेक्शन की तरफ बढ जाये जिससे एक तरफ लोकप्रिय मोदी होगें तो दूसरी तरफ पप्पू समझे जाने वाले राहुल गांधी । लेकिन धीरे धीरे कैसे हालात पलट रहे है ये समझे ।
वह कैसे अब प्रोफेसर साहेब मुखातिब हुये ....
वह ऐसे प्रोफेसर साहब ...बेहद प्यार से स्वयसेवक महोदय जिस तरह बोले उससे हर कोई ठहाका लगाने लगा....
समझे...जो प्रेसिडिनेशियल इलेक्शन का चेहरा था अब वही बीजेपी के नेताओ या कहे जेटली तक के निशाने पर है । और बीजेपी जो सांगठनिक पार्टी है । जिसका संगठन हर जगह है । फिर संघ की भी जमीन बीजेपी को मजबूती देती है । लेकिन मोदी-शाह ने जिस तरह खुद को लारजर दैन लाइफ बनाने की कोशिश की उसमें अब अगर वह हारेगें तो सिर्फ वह नहीं ढहेगें बल्कि बीजेपी संघ दोनो की जमीन भी खत्म होगी । वही दूसरी तरफ काग्रेस का संगठन सभी जगह नहीं है , लेकिन धीरे धीरे जिस तरह राहुल गांधी का कद साख के साथ बढ रहा है वह चाहे अनचाहे प्रसिडेन्शियल उम्मीदवार बन रहे है । और इसका लाभ सीधे काग्रेस को मिलेगा । या कहे मिल रहा है ।
तो क्या ये मान लिया जाये कि चुनाव मोदी बनाम राहुल गांधी होने से लाभ काग्रेस को है ।
जी वाजपयी जी ......और उसपर प्रियका गांधी के मैदान में उतरने से प्रसेडेशियल इलेक्शन में काग्रेस को एक नया आयाम मिल जायेगा ।
 वह कैसे...अब प्रोफेसर साहेब बोले...
वह दक्षिण भारत में नजर आयेगा ...जहा इंदिरा गांधी खासी लोकप्रिय थी । वहा इंदिरा का अक्स लिये जब प्रियका गांधी पहुंचेगी तो बीजेपी का संगठन या संघ का शाखा भी कुछ कर नही पायेगी ।
तो बीजेपी को अपनी रणनीति बदल लेनी चाहिये...
प्रोफेसर साहेब ....जब बीजेपी का मतलब ही मोदी हो तब रणनीति कौन बदलेगा । तब तो सिर फुट्ववल ही होगा । जिसकी शुरुआत हो चुकी है । और फरवरी शुर तो होने दिजिये तब आप समझ पायेगें कि कैसे धीरे धीरे टिकट की मारामारी भी बीजेपी को उसी के चक्रव्यू में फंसा कर खत्म कर देगी ।
पर टिकट की ये मारामारी तो सपा-बसपा में भी होगी ।
बिलकुल होगी क्या है ....मायावती को ही अब भी टिकट के बदले करोडो चाहिये । तो रुपये-पैसे वाले ही बसपा का टिकट पायेगें । फिर उसके काउंटर में सपा की जो सीटे बसपा के पास चली गई है वहा सपा का उम्मीदवार क्या करेगा । और क्या वहा गठबंधन के बावजूद वो ट्रासभर नहं होगा । इसका लाभ बीजेपी को मिल जायेगा कयोकि चाहे अनचाहे मुकाबला हर जगह त्रिरोणिय हो जायेगा । दरअसल यही वह फिलास्फी है जिसके आधार पर शाह की सियासी गोटिया चल रही है । लेकिन काग्रेस कैसे डार्क हार्स हो चली है ये किसी को समझ नहीं आ रहा है । और चुनाव का समूचा मिजाज ही अगर मोदी का चेहरा देखते देखते अब ताजा-नये चेहरे को खोज कर राहुल-प्रियका को देख रहा है तो फिर सवाल जातिय समीकरण या गठबंधन का कहा बचेगा ।
स्वयसेवक महोदय आप तो काग्रेसी हो चले है ।
क्यो प्रोफेसर साहेब
क्योकि आप राहुल गांधी को खडा किये जा रहे है
ना ना प्रोपेसर साहेब सिर्फ लकीर खिंच रहे है ...मुझे बीच में कूदना पडा ।  क्योकि पप्पू से करीशमाई नेता के तौर पर मान्यता पाते राहुल के पिछे उनकी कार्यशौली की सीधी लकीर है । जो कही जुमला या तिरछी नहीं होती है । याद किजिये भूमि अधिकग्रहण , सूट बूट की सरकार , किसान संकट , नोटबंदी , जीएसटी की जल्दबाजी और फिर राज्यो में जीत के साथ ही किसान कर्ज माफी ।
वाजपयी जी इसमें एक बात जोडनी होगी कि मोदी सत्ता को सच बताने वाला कोई बचा ही नहीं ।
हा हा हा हा ....आप इशारा क्या है ।
मै आपकी तरफ इशारा नहीं कर रहा हूं ..बल्कि हकीकत समझे...मै दो दिन पहले  ही एक अग्रेजी के राष्ट्रीय चैनल पर चुनावी सर्वे को देख रहा था । उस सर्व में यूपी का सर्वे खासा महत्वपूर्ण था । बकायदा एससी-एसटी , ओबीसी और उच्च जाति में काग्रेस को 19 से 26 फिसदी के बीच वोट दिखाये गये । लेकिन आखिर में बताया गया कि काग्रेस के हिस्से में सिर्फ 12 फिसदी वोट है । यानी एडिटर चवाइस पर रिजल्ट निकाला जा रहा है कि आका खुश हो जाये । और आका को सिर्फ रिजल्ट देखने की फुरसत है क्योकि वह शुशी देता है तो जमीनी सच है क्या ...इसे प्रधान सेवक भी कैसे समझेगें ।
तो क्या साहेब हवा में है ....
ना ना ...जो उन्हे बताया जा रहा है वह उसे ही सच मान रहे है । और बताने वाले झूठ क्यो बोले जब साहेब को सिर्फ जीत ही सुननी है । फिर ध्यान दिजिये उनके तमाम भाषणो में अब सपने नहीं दिखाये जाते बल्कि काग्रेस-विपक्ष गठबंधन को कोसा जाा है ।
और कोसने का अंदाज भी एसा है जिससे सहानुभूति के वोट उन्हे मिल जाये ....
वाह प्रोफेसर साहेब..बडी पैनी नजर है आपकी साहेब पर....

 

Saturday, January 26, 2019

रौशन है लोकतंत्र....क्योकि जगमग है रायसिना हिल्स की इमारते !




तो 70वें गणतंत्र दिवस को भी देश ने मना लिया । और 26 जनवरी की पूर्व संध्या पर भारत को तीन " भारत रत्न " भी मिल गये । फिर राजपथ से लेकर जनपथ और देश भर के राज्यो में राज्यपालो के तिरगा फहराने के सिलसिले तले देश के विकास और सत्ता की चकाचौंध को बिखराने के अलावे कुछ हुआ नहीं तो गणतंत्र दिवस भी सत्ता के उन्ही सरमायदारो में सिमट गया जिनकी ताकत के आगे लोकतंत्र भी नतमस्तक हो चुका है । संविधान लागू हुआ तो 1952 में आम चुनाव संपन्न हुआ । तब चुनाव आयोग का कुल दस करोड रुपया खर्च हुआ । और गणतंत्र बनने के 70वें बरस जब देश चुनाव की दिशा में बढ चुका है तो हर उममीदवार अपनी ही सफेद-काली अंटी को टटोल रहा है कि चुनाव लडने के लिये उसके पास कितने सौ करोड रुपये है । पर आज इस बात को दोहराने का कोई मतलब नहीं है लोकतंत्र कहलाने के लिये देश का चुनावी तंत्र पूंजी तले दब चुका है । जहा वोटो की किमत लगा दी जाती है । और हर नुमाइन्दे के जूते तले आम लोगो की न्यूनतम जरुरते रेंगती दिखायी देती है । और जब नुमाइन्दे समूह में आ जाये तो पार्टी बन कर देश की न्यूनतम जरुरतो को भी सत्ता अपनी अंटी में दबा लेती है । यानी रोजगार हो या फसल की किमत । शिक्षा अच्छी मिल जाय या हेल्थ सर्विस ठीक ठाक हो जाये । पुलिस ठीक तरह काम करें या संवैधानिक संस्थान भी अपना काम सही तरीके से करें । पर ऐसा तभी संभव है जब सत्ता माने । सत्ताधारी समझे । और नुमाइन्दो का जीत का गणित ठीक बैठता हो । यानी देश किस तरह नुमाइन्दो की गुलामी अपनी ही जरुरतो को लेकर करता है ये किसी से छुपा नहीं है । हां, इसके लिये लोकतंत्र के मंदिर का डंका बार बार पीटा जाता है । कभी संसद भवन में तो कभी विधानसभाओ में । और नुमाइन्दो की ताकत का एहसास इससे भी हो सकता है मेहुल चोकसी देश को अरबो का चूना लगाकर जिस तरह एंटीगुआ के नागरिक बन बैठे वैसे बाईस एंटीगुआ का मालिक भारत में एक सासंद बन जाता है । यानी संसद में तीन सौ पार सासंदो की यारी या ठेंगा दिखाकर माल्या , चौकसी या नीरव मोदी समेत दो दर्जन से ज्यादा रईस भाग चुक है और संसद इसलिये बेफिक्र है क्योकि अपने अपने दायरे में हर सांसद कई माल्या और कई चौकसी को पालता है और अपने तहत आने वाले 22 लाख से ज्यादा वोटरो का रहनुमा बनकर संविधान की आड में रईसी करता है ।  जी, एंटिगुआ की कुल जनसंख्सया एक लाख है और भारत में ेक सांसद के तहत आने वाे वोटरो क तादाद 22 लाख । सच यही है कि दुनिया में भारत नंबर एक का देश है जहा सबसे ज्यादा वोटर एक नुमाइन्दे के तहत रहता है । 545 सासंदो वाली लोकसभा में हर एक सासंद के अधिन औसतन  बाईस लाख बीस हजार 538 जनता आती है । और चीन जहा की जनसंख्या भारत से ज्यादा वहां नुमाइन्दो की तादाद भारतसे करीब छह गुना ज्यादा है । यानी चीन के एक सांसद के तहत 4 लाख 48 हजार 518 जनसंख्या आती है क्योकि वहा सांसदो की तादाद 2987 है । और अमेरिका में एक सांसद के उपर 7 लाख 22 हजार 636 जनसंख्या का भार होता है तो रुस में तीन लाख 18 हजार जनसंख्या एक नुमाइन्दे के अधिन होती है । तो पहला सवाल तो यही है कि क्या छोटे राज्यो के साथ साथ अब देश में सासंदो की तादाद भी बढाने की जरुरत है । लेकिन जिन हालातो में दुनिया के सबसे बडे लोकतांत्रिक देश की लूट में लोकतंत्र के प्रतिक बने नुमाइंदे ही शामिल है उसमें तो लूट की भागीदारी ही बढेगी । यानी चोरो और अपराधियो की टोली ज्यादा बडी हो जायेगी । मसलन अभी 545 सासंदो मेंसे 182 ऐसे दागी है जो भ्रष्ट्रचार और कानून को ताक पर रख अपना हित साधने के आरोपी है । तो फिर जनता के लिये कितना मायने रखता है लोकतंत्र का मंदिर । और लोकतंत्र के मंदिर के सबसे बडे मंहत की आवाज भी जब उनके अपने ही पंडे दरकिनार कर दे तो क्या माना जाये । मसलन , देश के प्रधानसेवक लालकिले के प्रचीर से आहवान करते है कि एक गांव हर सासंद को गोद ले ले । क्योकि उसे हर बरस पांच करोड रुपये मिलते है तो भारत में औसतन एक गांव का सालाना बजट विकास के लिये सिर्फ 10 लाख का होता है तो कम से कम वह तो विकास की पटरी पर दौडने लगे । पहले बरस होड लग जाती है । लोकसभा-राज्यसभा के 796 सांसदो में से 703 गांव गोद भी ले लेते है । अगले बरस ये घटकर 461 परआता है । 2017 में ये घटकर 150 पर पहुंच जाता है और 2018 में ये सौ के भी नीचे आ जाता है । लेकिन सवाल सिर्फ ये नहीं ह कि गांव तक गोद लेने मेंसांसदो की रुची नहीं रही । सवाल तो ये है कि 2015 में ही जिन 703 गांव को गोद लिया गया उसके 80 फिसदी गांव की हालत यानी करीब 550 गांव की हालात गोद लेने के बाद और ही जर्जर हो गई । ये सोच है पर देश के सामने तो लूट तले चलती गवर्नेस  का सवाल ज्यादा बडा है । और इसके लिये रिजर्व बैक के आंकडे देखने समझने के लिये काफी है । जहा जनता का पैसा कर्ज के तौर पर  कोई कारपोरेट या उहोगपति बैक से लेता है । उसके बाद देश के हालात ऐसे बने है कि ना तो उघोग पनप सके । ना ही कोई धंधा या कोई प्रजोक्ट उडान भर सके । लेकिन इकनामी का रास्ता लूट का है तो फिर बैकिंग सिस्टम को ही लूट में कैसे तब्दिल किया जा सकता है ये भी आंकडो से देखना कम रोचक नहीं है । मसलन 2014-15 में कर्ज वसूली सिर्फ 4561 करोड की हुई और कर्ज माफी 49,018 करोड की हो गई । 2015-16 में 8,096 करोड रुपय कर्ज की वसूल की गई तो 57,585 करोड रुपये की कर्ज माफी हो गई । इसी तरह 2016-17 में कर्ज वसूली सिर्फ 8,680 करोड रुपये की हुई तो 81,683 करोड की कर्ज माफी कर दी गई । और 2017-18 में बैको ने 7106 करोड रुपये की कर्ज वसूली की तो 84,272 करोड रुपये कर्ज माफी हो गये । यानी एक तरफ अगर किसानो की कर्ज माफी को परखे तो सत्ता के पसीने छूट जाते है कर्ज माफी करने में । लेकिन दूसरी तरफ 2014 से 2018 के बीच बिना हंगामे क 2,72,558 करोड रुपये राइटिग आफ कर दिये गये । यानी बैको के दस्तावेजो से उसे हटा दिया गया जिससे बैक घाटे में ना दिखे । कमाल की लूट प्रणाली है । लेकिन लोकतंत्र का तकाजा यह है कि सत्ता ही संविधान है तो फिर गणतंत्र दिवस भी सत्ता के लिये । इसीलिये लोकतंत्र की पहरीदारी करने वाले सेवक, स्वयसेवक, प्रधानसेवक सभी खुश है कि रायसीना हिल्स की तमाम इमारते रौशनी में नहायी हुई है । तो लोकतंत्र इमारतो में बसता है और उसकी पहचान अब उसका काम या संविधान की रक्षा नहीं बल्कि एलईडी की चमक है ।     

Thursday, January 24, 2019

एक परिवार काग्रेस को पुनर्जिवित करेगा तो दूसरा परिवार अपने ही स्वयंसेवक को हाथो खत्म हो चला है.....



काग्रेस की पहचान नेहरु-गांधी परिवार से जुडी है । बीजेपी की पहचान संघ परिवार से जुडी है । बिना नेहरु-गांधी परिवार के काग्रेस हो ही नहीं सकती तो काग्रेस की कमजोरी-ताकत दोनो ही नेहरु-गांधी परिवार में सिमटी है । और बिना संघ परिवार के बीजेपी का आस्त्तिव ही नहीं है तो वैचारिक तौर पर संघ की सोच हो या हिन्दुत्व की छतरी तले बीजेपी के राजनीतिक भविष्य को आक्सीजन देने का काम यह संघ परिवार पर ही टिका है । काग्रेस अभी तक नेहरु गांधी परिवार के करिष्माई नेतृत्व के आसरे सत्ता पर काबिज रही है चाहे वह नेहरु का काल हो या इंदिरा गांधी का या फिर राजीव गांधी या परदे के पीछे सोनिया गांधी की सियासत का । और इस दौर में जनसंघ से जनता पार्टी होते हुये बीजेपी में उभरी स्वयसेवको की टोली की ये पहचान रही कि वह काग्रेस के मुस्लिम तुष्टिकरण के विरोध के आसरे धीरे धीरे आगे बढती रही । और सत्ता के जरीये काग्रेस विरोध के दायरे को बढाती भी रही और काग्रेस विरोध के आसरे अपनी सत्ता गढती भी रही । लेकिन सौ बरस की उम्र पार कर चुकी काग्रेस में ये पहला मौका है कि नेहरु गांधी परिवार की पांचवी पीढी के दो सदस्य काग्रेस को संभालने के लिये एक साथ चलने को तैयार है । और दूसरी तरफ 2025 में सौ बरस की होने जा रहे संघ परिवार से निकले स्वयसेवको का सत्ताकरण ही कुछ इस तरह हुआ कि वह संघ परिवार को ही कमजोर कर सत्ता की ताकत तले संघ परिवार को ले आये । तो ये वाकई दिलचस्प हो चला है कि एक तरफ करिष्माई नेतृत्व के आसरे सत्ता की चौखट पर पहुंचने वाली काग्रेस में धीरे धीरे राहुल गांधी ने चुनावी जीत के आसरे खुद को करिष्माई तौर पर स्थापित करने की दिशा में कदम बढाये है तो प्रियकां गांधी की राजनीतिक झलकियो ने ही उन्हे पहले से करिष्माई मान लिया है । तो दूसरी तरफ नरेन्द्र मोदी ने पूंरव स्वयसेवको की लीक छोड 2014 मेंखुद को करिष्माई तौर पर स्थापित तो किया लेकिन इसी स्थापना को अपनी ताकत मान कर संघ परिवार की सोच तक को खारिज कर दिया । या कहे मोदी सत्ता के दौर में संघ परिवर के मुद्दे भी सरोकार खो कर मोदी के करिष्माई नेतृत्व में ही हिन्दुत्व से लेकर स्वदेशी और भारतीयकरण से लेकर स्वयसेवक होने के पीछे के संघर्ष को ही खत्म कर बैठे । तो नेहरु-गांधी परिवार और संघ परिवार की इसी बिसात पर 2019 का आम चुनाव होना है । तो पांसे कैसे और किस तरह फेंके जायेगें ये वाकई रोचक है । और सवाल कई है ।
मसलन, क्या मोदी का करिष्माई नेतृत्व बीजेपी-संघ परिवार की सत्ता को बरकरार रख पायेगा । क्या राहुल गांधी के साथ खडी प्रियंका का करिष्मा मोदी सत्ता की जडे हिला देगा । क्या मोदी-शाह में सिमट चुकी बीजेपी के पास कोई नेता ही नहीं है जो काग्रेस के करिष्माई नेतृत्व को चुनाव मैदान में पटकनी दे दें । या फिर बीजेपी में हर नेता के सामने ये चुनौती है कि वह कैसे मोदी-शाह को पहले पटकनी दें फिर खडा हो सके । क्या राहुल प्रियंका की जोडी अब मोदी विरोध के गठबंधन के सामने ही चुनौती बन रह है । यानी एक वक्त के बाद क्षत्रपो के सामने संकट होगा कि वह बीजेपी विरोध के साथ काग्रेस विरोध की दिशा में भी बढ जाये । जाहिर है ये सारे सवाल है । लेकिन इन सवालों के आसरे ही चुनावी राजनीति के परखे तो तीन सच सामने उभरगें । पहला , प्रियकां के जरीये महिलाये और युवाओ का वोट सिर्फ बीजेपी ही नहीं बल्कि अखिलेश-मायावती से भी खिसकेगा । दूसरा , यूपी में चेहरा खोज रही काग्रेस को पियंका का एक ऐसा चेहरा मिल चुका है जो लोकसभा चुनाव के बाद आखिलेश-मायावती के उस सौदबाजी में सेंघ लगाने के लिये काफी है कि राज्य कौन संभाले और केन्द्र कौन संभाले [ अगर लोकसभा चुनाव के बाद मायावती पीएम उम्मीदवार के तौर पर उभरती है  ] । क्योकि काग्रेस ने अभी प्रियंका गांधी को पूर्वी यूपी की कमान सौपी है । अगला कदम रायबरेली से चुनाव मैदान में उतारना होगा । और फिर 2022 में यूपी विधानसभा के वक्त प्रिंयका गांधी को ही सीएम उम्मीदवार पद के लिये उतरना । तीसरा, क्षत्रपो को अब समझ में आने लगा है कि गठबंधन का मतलब तभी है जब उसमें काग्रेस शामिल हो । यानी सिर्फ क्षत्रपो का मिलना गठबंधन तो है लेकिन वह सिर्फ सत्ता के लिये सौदेबाजी का दायरा बढना है । और इन तीन हालातो के दौर को और किसी ने नहीं बल्कि मोदी के करिष्माई नेतृत्व ने ही पैदा किया है । और मोदी के करिष्माई नेतृत्व के पीछे संघ परिवार को ही कमोजरी करना रहा । क्योकि संघ परिवार का हर वह संगठन जो काग्रेस की सत्ता को चुनौती देने के लिये संघर्ष करते हुये बीजेपी का रास्ता अभी तक बनाता रहा उसे ही मोदी के करिष्माई नेतृत्व  ने खत्म कर दिया । विहिप के पास प्रवीण तोगडिया नहीं है तो विहिप को प्रवीण तोगडिया के हर कदम से लडना पडा रहा है । किसान संघ के सक्षम नेतृत्व को कैसे मोदी सत्ता के काल में खत्म किया गया ये मध्यप्रदेश में क्काजी के जरीये उभरा । फिर भारतीय मजदूर संघ हो या स्वदेशी जागरण मंच या फिर आदिवासी कल्याण संघ , हर संघठन को कमजोर किया गया । या कहे संघ के हर संगठन का काम ही जब करिष्माई नेतृत्व मोदी के लिये ताली बजाना हो गया तो फिर वह नीतिया भी बेमानी हो गई जो किसान को खुदखुशी की तरफ धकेल रही थी । युवाओ को बेरोजगारी की तरफ । उत्पादन ठप पडा है तो उघोगपतियो के पास काम नहीं । व्यापरियो के सामने जीएसटी से लेकर विदेशी निवेश और ई-मारकेटिंग का खतरा है । मजदूर को नोटबंदी ने तबाह कर दिया । यानी संकट काल स्वयसेवक की सत्ता के वक्त संघ की सोच के विपरीत है ।
तो आखरी सवाल यही हो चला है कि काग्रेस की राजनीति ने संघ या पुरानी बीजेपी की कार्यशौली को अपना लिया है । और मोदी के करिष्माई नेतृत्व ने काग्रेस के करिष्माई सोच को अपना लिया है ।       

Tuesday, January 22, 2019

.....और सत्ता कहती है जय हिद !


मेहुल चोकसी ने भारतीय नागरिकता छोड दी। उससे पहले जांच के लिये भारत लौटने से ये कह कर इंकार कर दिया था कि भारत में उनकी लिचिंग हो सकती है । विजय माल्या ने पहले भारतीय जेल को अमानवीय बताया और अब स्विस बैक से कहा आप मेरे अकाउंट की जानकरी भारतीय जांच एंजेसी सीबीआई  को कैसे दे सकते है जो खुद ही दागदार है । जिसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर रही है । भारत के राष्ट्रीयकृत बैको से जनता के पैसे को कर्ज ले कर ना लौटाने वाले कारपोरेट व उघोगपतियो की कतार करीब 900 तक पहुंच चुकी है । और आंकडा बारह हजार करोड रुपये पार कर चुका है । इसी दौर में देश पर बढता कर्ज 80 लाख करोड का हो चुका है । और आक्सफाम की ताजा रिपोर्ट बताती है कि भारत के टापमोस्ट सिर्फ नौ लोगो की आमदानी - कमाई या संपत्ति का कुल आंकडा देश के 65 करोड लोगो की आय संपत्ति या आमदनी के बराबर है । दुनिया में भारत को लेकर तमाम चकाचौंध बिखराने के बावजूद दुनिया भर से भारत के बाजार में डालर झौकने वाले बढ क्यो नहीं रह है ये सवाल अब भी अनसुलझा सा बना दिया गया है । 2017 में 40 बिलियन डालर का निवेश हुआ तो 2018 में 43 बिलियन जालर का निवेश भारत में हुआ । जबकि ब्राजिल सरीखे देश में 59 बिलियन डालर का विदेशी निवेश 2018 में हो गया । जहा की सत्ता ने दुनिया घूमने पर सबसे कम खर्च किया । और चीन में 142 बिलियन डालर का निवेश 2018 में हो गया । तो भारत की दौड में किस देश से हो सकती है ये सोचने समझने स पहले इस हकीकत को भी जान लें कि यूपी में निवेश को लेकर जब योगी-मोदी ने बाइब्रेट गुजरात की तर्ज पर सम्मेलन किया तो निवेश का भरोसा देने वाले एक विदेशी कारपोरेट ने पिछले दिनो अध्ययन कर पाया कि कृर्षि अर्थव्यवस्था पर टिके यूपी में किसानो को अब अपनी फसल बचाने के लिये गाय के लिये बाड बनाने से जुझना पड रह है । और बाड लगाने क लिये किसानो के पास पैसे नहीं है और राज्य सरकार गायो की बढती तादाद के लिये गौ चारण की जमीन तक की व्यवस्था तो दूर कोई व्यवस्था तक करने में सक्षम नहीं है । दिल्ली की एक संस्था से मदद लेकर भारत के मेडिकल क्षेत्र में निवेश की योजना बनाने वाली विदेशी कंपनी ने पाया कि भारत में प्राइवेट अस्पताल खोलना सबसे फायदे का धंधा है । और सरकारी अस्पताल में न्यूनतम जरुरते तो दूर 70 फिसदी बिमार और ज्यादा बिमारी लेकर अस्पताल से लौटते है । यानी अस्पताल साफ सुधरे रहे सिर्फ ये काबिलियत ही प्राइवेट अस्पताल को लायक होने का तमगा दे देती है । फिर भारत का अनूठा सच शिक्षा से भी जुडा है जहां स्कूल जाने वाले 50 फिसदी से ज्यादा बच्चे जोड-घटाव तक नहीं कर सकते । अग्रेजी तो दूर की गोटी है हिन्दी भी पढ नहीं पाते । यानी सामने वाला जो बोल रहा है उसे सुन कर जो सही गलत समझ में आये उसे ही सच मान कर देश की आधी आबादी जिन्दगी जी रही है । और इस जिन्दगी को चलाने वाले नेताओ की कतार सिर्फ बोलती है क्योकि बोल कर वोट पाने का लाइसेंस उन्ही के पास हो और लोकतंत्र का तकाजा यही कहता है कि जो खूब शानदार बोल सकता है वहीं देश की सत्ता को संभाल सकता है । यानी सारे सवाल उस दायरे में आकर सिमट जाते है जहा 2014 में 10 जनपथ तक जीरो जीरो लगाते हुये करोडो के घोटाले-घपले का आरोप नेहरु गांधी परिवार पर नरेन्द्र मोदी लगाकर सत्ता पाते है और 2019 में नरेन्द्र मोदी को चौकीदार चोर है कि उपमा दे कर राहुल गांधी अब परिपक्व नजर आने लगते है क्योकि उनकी अगुवाई में काग्रेस कई राज्यो में लौट आती है ।
तो सवाल कई है । मसलन , क्या भारत को बनाना रिपब्लिक बनाकर सत्ता पाना ही लोकतंत्र हो चुका है । क्या भारतीय ही भारत को लूट कर गणतंत्र होने का तमगा सीने से लगाये हुये है । क्या भारतीय राष्ट्रवाद या राष्ट्रीयता का मोल भाव सत्ता बनाने या बिगाडने में जा सिमटा है । क्या संविधान को भी सत्ता का औार बनाकर सत्ताधारी देश से खेलने में हिचक नहीं रह है । क्या देश में खुली लूट कर देश छोडकर भागना बेहद आसान है क्यो कि सत्ता पाने की तिकडम [ चुनाव के तौर तरीके  ] ही एक ऐसी पूंजी पर जा टिकी है जो इमानदारी से बटोरी नहीं जा सकती और बेइमानी किये बगैर लौटायी नहीं जा सकती । क्या दुनिया में भारत इसलिये आकर्षण का केन्द्र है क्योकि भारतीय बाजार से कमाई सबसे ज्यादा है । या फिर जिस तरह दो जून की रोटी तले आस्था के समंदर में देश के 80 करोड लोग गोते लगाते है उसमें दुनिया की कोई भी फिलास्फी फेल होने के बाद भारत आकर आंनद ले सकती है । या फिर भारत धीरे धीरे खुद को उस पुरातन अवस्था में ले जा रहा है जहा विकसित या विकासशील होने-कहलाने का मार्ग नहीं जाता बल्कि अतीत के गौरवमयी हालातो को धर्म की चादर में लपेट कर सत्ता सुला देना चाहती है । यानी मिजाज लेकतंत्र का हो या परिभाषा आजादी की गढी जाये या फिर आस्था के आसरे राष्ट्रवाद और देश भक्ति के नारे लगाये जाये , भारत कैसे सत्ता की लूट और विज्ञान के आसरे विकसित होने की तरफ ध्यान ही ना दें इसके उपाय भी लगातार खोजे जा रहे है । क्योकि शिक्षा-प्रोफेशनल्स-रोजगार को लेकर दुनिया में फैले विदेशियो की तादाद में भारत का नंबर चीन - जापान के बाद आता है ।  चीनी और जापानी देश लौटते है । नागरिकता छोडते नहीं । अपने देश के लिये काम करते है । पर दुनिया में फैले भारतीयो की तादाद लगातार बढ रही है और ये तादाद ना लौटने के लिये बढ रही है । तो क्या लोकतंत्र के नाम पर भारत खुद को ही नये तरीके से गढ रहा है जहा गांव से रास्ता छोटे शहर । छोटे शहर से बडे शहर । बडे शहर से महानगर । और महानगर से देश छोड कर जाने का रास्ता ही भारत की पहचान हो चुकी है । और जो राजनीति सत्ता देश को चलाने के लिये बैचेन रहती है वह भी अब विदेशी जमीन पर अपने होने का राग गा रही है क्योकि देश के भीतर का सिस्टम या तो पूंजी पर जा टिका है या पूंजीपतियो पर जो सत्ता को भी गढते है और सत्ता के जरीये खुद को भी । फिर सियासत डगमगाने लगे तो देश की नागरिकता छोड भारतीय व्सवस्था पर ही सवाल उठाने से नहीं चुकते । और सत्ता कहती है जय हिन्द !     

Sunday, January 20, 2019

महाभारत की चौसर छोटी है 2019 के महासमर के सामने ...

महासमर या महाभारत । 2019 के लोकसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दल जिस लकीर को खिंच रहे है वह सिर्फ राजनीति भर नहीं है । सत्ता हो या विपक्ष दोनो के पांसे जिस तरह फेंके जा रहे है वह जनादेश के लिये समर्थन जुटाने का मंत्र भी नहीं है । बल्कि महासमर या महाभारत की गाथा एक ऐसे दस्तावेज को रच रही है जिसमें संविधान और लोकतंत्र की परिभाषा आने वाले वक्त में सत्ता के चरणो में नतमस्तक रहेगी इंकार इससे भी किया नहीं जा सकता है । और जो रचा जा रहा है उसके तीन चेहरे है । पहला , चुनावी तंत्र का चेहरा । दूसरा  कारपोरेट लूट की पालेटिकल इक्नामी । तीसरा जन सरोकार या जन अधिकार को भी सत्ता की मर्जी पर टिकाना । रोचक तीनो है , पर देश के लिये घातक भी तीनो है । और देश के  सामाजिक-आर्थिक हालातो के बीच लोकतंत्र की त्रासदी के तौर पर तीनो ही अपनी अपनी सत्ता को संभाले भी हुये है । कोलकत्ता में ममता की रैली   [ रैली पर खर्च किया गया रुपया जनता का ही है ] में गठबंधन की छतरी तले विपक्ष का हुजुम पहली नजर में साफ साफ दिखा देता है कि बीजेपी से किसी की दुश्मनी नहीं है । टारगेट पर नरेन्द्र मोदी  है जिन्होने अपनी कार्यशैली से देश मेंउस लोकतंत्र को ही खत्म कर दिया जो संसदीय राजनीति के नारे तले हर राजनीतिक दल के  जीने का हक [ जन अधिकार की बात करने वाले भी और जन की पूंजी की लूट करने वाले भी ] देती है । या फिर संविधान की परिभाषा सत्तानुकुल कर चुनी हुई सत्ता को संविधान के भी उपर बैठा दिया । और कानूनी या संवैधानिक तौर अगर ये काम इंदिरा गांधी ने इमरजेन्सी ला कर किया तो नरेन्द्र मोदी ने बिना इमरजेन्सी के उस सच को उभार दिया जिसे कहने या उभारने से हर सत्ता अपने अपने दायरे में इससे पहले बचती रही है । यानी 2019 के महाभारत का पहला सच ममता की रैली से यही उभरा कि अगर सत्ता 2019 में पलट गई तो फिर मोदी को कोई बख्शेगा नहीं । और इसका खुला इजहार भी हुआ कि मोदी सत्ता ने सोनिया से लेकर ममता । अखिलश से लेकर मायावती । तेजस्वी से लेकर हार्दिक पटेल तक को नहीं बख्शा तो फिर सत्ता पलटने पर मोदी को भी बख्शा नहीं जायेगा  ।  लेकिन  राजनीतिक मंत्र सिर्फ राजनीतिक दुश्मनी के तहत ही सभी को एक छतरी तले लेते आया , सच ये भी नहीं है । हकीकत तो ये है कि अक बडी छतरी तले छोटी छोटी छतरियों को थामे विपक्ष है । जो 2019 के जनादेश के बाद तीन परिस्थियो को परख रहा है । जिसमें एक तरफ बीजपी या काग्रेस को समर्थन देने की स्थिति है । यानी तमाम क्षत्रप सत्ता की मलाई खाने के लिये काग्रेस के साथ जायेगें । या फिर मोदी माइनस बीजेपी को भी समर्थन देने की स्थिति में आ जायगें । दूसरी परिस्थिति ज्यादा रोचक है जिसमें क्षत्रपो का गठबंधन की अपने में से किसी नेता को चुन लें और काग्रेस या बीजेपी उस समर्थन दे दें । लेकिन सबसे ज्यादा रोचक तीसरी परिस्थिती है जिसके केन्द्र में मायावती है । जो अपनी सीटो की संख्या तले खुद ही पीएम का दावेदार बन कर काग्रेस या बीजेपी से कहे कि उसके पीछ वह अपनी ताकत [ सासंदो की संख्या ] झोंक दें । दरअसल इस तीसरी परिस्थति में कई परते है । पहला तो यही कि अखिलेश यादव भी सीटो की संख्या में मायावती से जा से कम रहेगें तो फिर पहला समझौता माया-अखिलेश में होगा । कौन राज्य सभाले और कौन केन्द्र संभाले । इस समझौते के तहत अखिलेश का झुकाव काग्रेस के पक्ष में होगा । लेकिन इस गणित की दूसरी परत ये भी कहती है कि मायावती के सामानातंर अगर ममता भी बंगाल में कमाल कर देती है तो फिर ममता खुद को उन क्षत्रपो के साथ जोडकर पीएम उम्मीदवार के तौर पर प्रोजेक्ट करेगी जिनके सबंध ममता से करीब है । उसमें केजरीवाल भी है और फारुख अब्दुल्ला भी । चन्द्रबाबू भी हामी भर सकते है और केसीआर भी । यानी बडी छतरी तले कई छतरिया ही नहीं बल्कि छतरियो के भीतर भी छतरियो का ऐसा समझौता जो महाभारत की चौसर को भी मात कर दें । लेकिन इस राजनीतिक मंत्र का सियासी मिजाज साफ है 2019 में ऐसा परिवर्तन जिसमें बीजपी और मोदी की सत्ता को एक साथ ना देखा जाये ।   
पर राजनीतिक महासमर के इस खेल में कारपोरेट लूट की पालेटिकल इकनामी का चेहरा भी कम रोचक नहीं है । क्योकि जिस दौर में सरकारी खजाने को रिजर्व बैक से तीन लाख करोड की जरुरत पड गई उस दौर में अंबानी की कंपनी को आखरी क्वाटर में 10 हजार करोड का शुद्द मुनाफा हो जाता है । इंटरकाम के क्षेत्र में एयरटेल समेत तमाम कंपनिया रिस रह है लेकिन जियो को 28 फिसदी का लाभ हो जाता है । और कोलकत्ता में ममता की रैली से ये आवाज भी खुले तौर पर निकलती है कि सत्ता अंबानी का पाल पोस रही है । यानी देश की एवज में पंसदीा कारपोरेट को लाभ पहुंचाने के तमाम रास्ते खोल रही है । और फिर 2013 के हालातो में जब नरेन्द्र मोदी को पीएम उम्मीदवार बनाया जाये या नहीं या फिर आडवाणी के विरोध के स्वर को भी कारपोरेट की पूंजी तले तौलने का काम 2019 में ये कहकर शुरु हो गया कि तब बीजेपी-संघ के भीतर से आवाज यही थी कि जो पूंजी लगायेगा वहीं पीएम उम्मीदवार होगा । और तब कारपोरेट ने ही नरेन्द्र मोदी का नाम लेना शुरु कर दिया । गुजरात माडल को राजनीतिक माडल बनाया गया । और आडवाणी सवाय विरोध के तब कुछ कर ना सके । और देश ने 2014 के चुनाव की चकाचौंध का मिजाज नरेन्द्र मोदी की प्रचार शैली [ तकनीकी प्रचार  ] से लेकर सैकडो हवाई रैली करते हुये भी हर रात वापस गांधीनगर पहुंचने की देखी । और उसके बाद सत्ता की तरफ से चुनाव में मदद करने वाले कारपोरेट को लाभालाभ देने की देश की नीतियो को भी खनन से लेकर पोर्ट और पावर सेक्टर से लेकर टेलीकाम तक में देखा । तो क्या 2019 के महाभारत के लिये बिछती चौसर पर कारपोरेट को अपने अनुकुल करने या मोदी सत्ता से लाभ लेने वाले कारपोरेट को सत्ता बदलने पर ना बख्शने का पांसा फेका जा रहा है । या फिर जिन कारपोरेट को लूट का मौका मोदी सत्ता में नहीं मिला उन्हे सत्ता परिवर्तन के बाद लाभ के हालात से जोडने के लिये पैसे फेके जा रहे है ।
लेकिन 2019 के महाभारत में सबसे परेशान वाला तीसरा चेहरा है जो जन-सरोकार या जन अधिकार की बात को ही सत्ता की दौड तले खत्म कर देता है । यानी सत्ता कैसे संविधान है । सत्ता ही कैसे लोकतंत्र की परिभषा है । और सत्ता ही कैसे हिन्दुस्तान है । ये संवैधानिक पद पर बैठे नरेन्द्र मोदी की कार्यशौली भर का नतीजा नहीं है बल्कि सत्ता केन्द्रित लोकतंत्र में कैसे राजनीतिक दलो की कार्यशैली भी सिर्फ सत्ता के भरोसे ही लोगो को जिन्दा रहने या जिन्दा रहने की सुविधा/नीतियो को टिकाती है ये भी काबिलेगौर है । और ये वाकई बेहद त्रासदी पूर्ण है कि मान्यता तभी मिलती है जब सत्ता का हाथ सर पर हो । यानी जो मोदी की सत्ता में मोदी के साथ खडे है और कल जब मोदी की सत्ता नहीं होगी तब की सत्ता में जो सत्ता के साथ खडे होगें , मान्यता उन्ही की होगी । बाकि सभी कीडे-मकौड की तरह रहे , जीये या खत्म हो जाये कोई फर्क नहीं पडता । इसका नजारा कई दृश्टी से हो सकता है । पर उदाहरण के लिये लगातार किसानो के बीच काम कर रहे लोगो को ही ले लिजिये । दो महीने पहले दिल्ली में किसानो का जमघट मोदी सत्ता की किसान विरोधी नीतियो को लेकर हुआ । दिल्ली में किसानो के तमाम संगठन जुटे इसके लिये तमाम समाजसेवी से लेकर पत्रकार पी साईनाथ ने खासी मेहनत की । पर दिल्ली में सजा मंच इंतजार करता रहा कि तमाम राजनीतिक दलो के चेहरे कैसे मंच पर पहुंच जाये । और जब संसद के अंदर बाहर चमकते चेहरे मंच पर पहुंचे और किसानो के हितो की बात कहकर हाथो में हाथ डाल कर अपनी एकता दिखाते रहे तो इसे ही सफल मान लिया गया । और कोलकत्ता में ममता की रैली में जब नेताओ का जमावडा जुटा तो किसानो के बीच काम कर रहे योगेन्द्र यादव कोलकत्ता से दो सौ किलोमिटर दूर एक सामान्य सी सभा को बंगाल में ही संबोधिक तर रहे थे । पर उनका कोई अर्थ नहीं क्योकि सत्ता के सितारे तो कोलकत्ता में जुटे थे । यानी महत्ता तभी होगी जब आप सत्ता केन्द्रित सियासत के साझीदार बन जाये । वरना आप हो कर भी कही नहीं है । तो कया देश के सारे रास्ते सत्ता में जा सिमटे है और पत्रकार कहलाने के लिये । अच्छा शिक्षक , वकील , डाक्टर , लेखक , सामजसेवी होने के लिये या तो सत्ता से सट जाये या फिर चुनाव मैदान में कूद जाये । और देश का मतलब राजनीति सत्ता ही है । ध्यान दिजिये हो तो यही रही है ।
और जो सत्ताधारी है उनके लिये आखरी मंत्र....अटलबिहारी वाजपेयी के दौर में प्रमोद महाजन बेहद ताकतवर हो गये थे । नरेन्द्र मोदी के दौर में अमित शाह बेहद ताकतवर है । तो ताकत का मतलब क्या है ये भी समझे ।