Wednesday, August 24, 2016

दो लाख कश्मीरी बच्चो के बारे में कौन सोचेगा?

सीरिया में बीते 425 दिनों से बच्चों को नहीं पता कि वह किस दुनिया में जी रहे हैं। स्कूल बंद हैं। पढ़ाई होती नहीं । तो ये बच्चे पढ़ना लिखना भी भूल चुके हैं। और समूची दुनिया में इस सच को लेकर सीरिया में बम बरसाये जा रहे हैं कि आईएसआईएस को खत्म करना है तो एक मात्र रास्ता हथियारों का है । युद्द का है। लेकिन वक्त के साथ साथ बड़े होते बच्चो को दुनिया कौन सा भविष्य दे रही है इसपर समूची दुनिया ही मौन है । इसलिये याद कीजिये तो समुद्र किनारे जब तीन बरस का एलन कुर्दी सीरियाई शरणार्थी के तौर पर दिखाई दिया तो दुनिया हिल गई । और पिछले हफ्ते जब पांच बरस का ओमरान घायल अवस्था में दुनिया के सामने आया तो दुनिया की रुह फिर कांप गई । तो क्या दुनिया भविष्य संभालने वाले बच्चो के भविष्य को ही अनदेखा कर रही है । ये सवाल दुनिया के हर हिस्से को लेकर उठ सकता है।

और ये सवाल कश्मीर का राजनीतिक समाधान खोजने वाले राजनेताओ के बरक्स भी उभर सकता है कि क्या किसी ने वाकई बच्चो की सोची है। क्योंकि कश्मीर घाटी में 46 दिनों से स्कूल कालेज सबकुछ बंद हैं। आर्मी पब्लिक स्कूल से लेकर केन्द्रीय विद्यालय तक और हर कान्वेंट से लेकर हर लोकल स्कूल तक । आलम ये है कि वादी के शहरों में बिखरे 11192 स्कूल और घाटी के ग्रामीण इलाको में सिमटे 3 280 से ज्यादा छोटे बडे स्कूल सभी बंद हैं । और इन स्कूल में जाने वाले करीब दो लाख से ज्यादा छोटे बडे बच्चे घरो में कैद हैं । बीते दो महीने से घरो में बंद है ।

ऐसे में छोटे छोटे बच्चे कश्मीर की गलियो में घर के मुहाने पर खड़े होकर टकटकी लगाये सिर्फ सड़क के सन्नाटे को देखते रहते हैं। और जो बच्चे कुछ बड़े हो गये हैं, समझ रहे है कि पढ़ना जरुरी है । लेकिन उनके
भीतर का खौफ उन्हे कैसे बंद घरो के अंधेरे में किताबो से रोशनी दिला पाये ये किसी दिवास्वप्न की तरह है। क्योंकि घाटी में बीते 46 दिनो में 69 कश्मीरी युवा मारे गये हैं। और इनमें से 46 बच्चे हाई स्कूल में पढ़ रहे थे । ऐसे में ये सवाल कोई भी कर सकता है कि इससे बडी त्रासदी किसी समाज किसी देश के लिये हो नहीं सकती कि हिंसा के बीच आतंक और राजनीतिक समाधान का जिक्र तो हर कोई कर रहा है लेकिन घरो में कैद बच्चो की जिन्दगी कैसे उनके भीतर के सपनों को खत्म कर रही है और खौफ भर रही है , इसे कोई नहीं समझ रहा है । हालांकि सरकार ने ने एलान किया कि स्कूल कालेज खुल गये हैं लेकिन कोई बच्चा इसलिये स्कूल नहीं आ पाता क्योंकि उसे लगता है कि स्कूल से वह जिन्दा लौटेगा या शहीद कहलायेगा। लेकिन घाटी में बच्चों की आस खत्म नहीं हुई है। उन्हे भरोसा है स्कूल कालेज खुलेंगे। ये अलग बात है कि किसी भी राजनेता की जुबा पर बच्चो के इस दर्द इस खौफ का जिक्र नहीं है । कोई मारे गये कश्मीरी युवाओं के हाथों में पत्थर को आतंक करार देकर मारने के हक में है तो कोई इसे सिर्फ पांच फिसदी का आंतक बताकर घाटी की हिसा को थामने के लिये हर बच्चों को अपना बताकर इनकी मौत को बर्बाद ना होने देने की बात कर रहा है । हुर्रियत तो शंकराचार्य , पोप, काबा के इमाम और दलाई लामा को पत्र लिखकर दखल देने को कह रहा है । लेकिन जिन बच्चो के कंघे पर कल कश्मीर का भविष्य होगा उन्हे कौनसा भविष्य मौजूदा वक्त में समाज और देश दे रहा है इसपर हर कोई मौन है । और असर इसी का है कि घाटी में 8171 प्राइमरी स्कूल, 4665 अपर प्राईमरी स्कूल ,960 हाई स्कूल ,300 हायर सेकेंडरी स्कूल, और सेना के दो स्कूल बीते 46 दिनों से बंद पडे है । श्रीनगर से दिल्ली तक कोई सियासतदान बच्चों के बार में जब सोच नहीं रहा है तो नया सच धीरे धीरे नये हालात के साथ पैदा भी हो रहे है । धीरे धीरे वादी की गलियो में स्कूल बैग लटकाये बच्चे दिख रहे है तो कुछ आस जगा रहे है कि शायद कही पढाई हो रही है ।

और जानकारी के मुताबिक लगातार स्कूलो के बंद से आहत कुछ समाजसेवियो ने अब अपने स्तर पर पहल की है और अपने घरों, मस्जिदों में अस्थायी स्कूल खोल लिए हैं ताकि बच्चों की पढ़ाई जारी रहे । श्रीनगर के रैनावारी इलाक़े की मस्जिद में 200 छात्रों को वालंटियर टीचर पढ़ा रहे है तो इंजीनियरिंग और मेडिकल की पढाई करने वाले बच्चों को अब प्रोफेशनल ट्यूटर पढा रहे है । यानी घाटी में बच्चो को लेकर राजनेता या राजनीतिक सत्ता नहीं बल्कि समाज और लोगो ने खुद पहल की है । कई जगहो पर मेज, कुर्सियां और ज़रूरी पैसे चंदे से इकट्ठा किये गये है । अधिकांश बच्चों को इन वैकल्पिक स्कूलों तक पहुंचने के लिए भारी सुरक्षा बलों के बीच से होकर गुजरना पड़ता है.कुछ बच्चे ऐसे रास्ते चुनते हैं जहां सुरक्षा बल कम हो । ये अलग सवाल है कि घाटी के हालात के सामधान का रास्ता सेना तले ही टटोला जा रहा है और 12 बरस बाद दुबारा घाटी में बीएसएफ की तैनाती हो गई है । और इस सवाल पर हर कोई खामोश है कि आखिर घाटी में बच्चे कर क्या रहे है ।



Sunday, July 31, 2016

किन्हें नाज है मीडिया पर ........

दिल्ली ! सत्ता का प्रतीक। ताकत का अहसास। लोकतंत्र की दुहाई। संविधान के रास्ते चलने के वादे को ढोती दिल्ली। लोकतंत्र के हर पाये की स्वतंत्रता का सुकून छिपाये दिल्ली। बिहार-बंगाल में जंगल राज हो सकता है, दिल्ली में नहीं। यूपी में सत्ता जाति में सिमटी दिखायी दे सकती है, लेकिन दिल्ली में नहीं । विकास की अनूठी पहचान बना चुका पंजाब आतंक से लेकर ड्रग्स में डूब जाता है , लेकिन दिल्ली में ऐसा नहीं हो सकता। तमिलनाडु तमाम विकास के दावे करते हुये भी अम्मा भोजन के भरोसे जीता है , लेकिन दिल्ली में ऐसा नहीं होता । महाराष्ट्र की सियासत कभी लुंगी को पुंगी बनाने की धमकी देती है तो कभी यूपी-बिहार के लोगो को घुसने से रोकने पर नहीं कतराती और सत्ता खामोशी से तमाशा देखती है। लेकिन दिल्ली में ऐसा नहीं हो सकता । राजस्थान-हरियाणा-यूपी में सत्ता के भरोसे दामादों को सहूलियत दी जा सकती है लेकिन दिल्ली में ये संभव नहीं है।

दिल्ली ने तो आपातकाल के दौर में सत्ता के राजकुमार से भी दो दो हाथ किये । और दिल्ली में तो नौकरशाही भी मंडल–कमंडल के दौर में टकराए। अदालतों ने भी ग्रीन दिल्ली से लेकर टूजी तक में ना सिर्फ अपने फैसलों से सत्ता को हकबकाया । बल्कि जेल की सीखचों के पीछे कारपोरेट-नेता-मंत्री तक को पहुंचाया। यूं हर दौर में दिल्ली की ताकत लुटियन्स की दिल्ली में सिमटी दिखी। साउथ ब्लाक से लेकर आईआईसी तक के चेहरे सत्ता का मुखौटा कुछ यूं लगाते कि लड़ाई राजपथ की हो या जनपथ की, बात भ्रष्टाचार की हो या घोटालों की, सबकुछ संसद के भीतर बाहर समझौतों में ही सिमट जाता । लेकिन इस  दौर में एक आस मीडिया ने जगाई। जब जब देश में ये बहस हुई कि मीडिया सत्ता की चाकरी कर रही है, तब किसी एक्टिविस्ट की तर्ज पर दिल्ली में ही एक
मीडिया संस्थान ने इंदिरा की सत्ता से दो दो हाथ किये। इमरजेन्सी के दौर में संघर्ष करते हुये सत्ता पलटने में खासी भूमिका निभायी।  इंडियन होने के बावजूद इंदिरा इज इंडिया कहने वालो से वह मीडिया संस्थान टकराया । जब बोफोर्स घोटाले के आग सत्ता के खिलाफ सत्ता के भीतर से निकली तो दक्षिण भारत से निकलने वाले एक अखबार ने सत्ता की हवा सच छाप कर निकाल दी। हिन्दुत्व के दायरे में सबसे बेहतरीन हिन्दू शब्द के तेवर अखबार की रिपोर्टिग ने दिखला दिये। और जब देश में सत्ता का दामन हवाला रैकेट में फंसा तो एक संस्थान ने बेहिचक ऐसी रिपोर्ट छापी कि सत्ता का ऊपरी आवरण ही ढहढहाकर गिर गया । तो दिल्ली में पत्रकारिता का अपना सुकून है । क्योंकि यहा लोकतंत्र भी जागता है तो मीडिया के हमले सत्ता को भी लोकतंत्र का पाठ पढ़ाते हैं। और सत्ता भी अपने अपने तरीके से मीडिया पर हमले कर लोकतंत्रिक व्यवस्था के बरकरार रखने के लिये एक सियासी वातावरण खुद ब खुद तैयार करती चली जाती है।

लेकिन इस बार हालात बदले हैं। तरीका बदला है। लोकतंत्र की परिभाषा भी बदली बदली सी लग रही है। क्यों........क्योंकि खबर को छूने से हर कोई कतरा रहा है। हर कोई जान रहा है कि खबर सत्ता की चूलें हिला सकती है लेकिन हवा में तैरती सत्ता की मदहोशी ने पहली बार खुमारी कम खौफ ज्यादा पैदा कर दिया है। तो इंदिरा की सत्ता को एक वक्त चुनौती देने वाला मीडिया संस्थान भी खामोश है। एक वक्त बोफोर्स घोटाले से सत्ता की कमीशनखोरी से देश में सियासत गर्म करने वाला अखबार भी खामोश रहना चाहता है। हवाला के जरीये लाखों की हेराफेरी करने नेताओं के नाम तक छापने वाला और कागज में दर्ज हस्ताक्षर और छोटे छोटे इंगित करते नामों की पूरी व्याख्या करने वाला मीडिया संस्थान भी इस बार खामोश है। कहीं रिपोर्टर तो कही संपादक तो कही मालिक ही सिमटे है। लेकिन खबर सबको पता है । खबर छापने का दंभ भरने वाले दिल्ली के तमाम ताकतवर मीडिया संस्थानों की हवा पहली बार दस्तावेजों को देखकर ही हवा हवाई क्यों हो रही है? तो क्या दिल्ली बदल चुकी है? लोकतंत्र की परिभाषा भी अब दिल्ली की अलग नहीं रही । या फिर पहली बार सत्ता ने हर संस्थान को सत्ता का हिस्सा बनाकर लोकतंत्र का अनूठा पाठ शुरु कर दिया है । जहां सहूलियत है । जहां खौफ है । जहां बदलाव है । जहां मुनाफा है । जहां सत्ता ना बदल पाने की सोच है। जहां विकल्पहीन हालात हैं। जहां धारा के खिलाफ चलने पर बगावती होने का तमगा लगने वाली स्थिति है। यानी पत्रकारिता कुछ इस तरह गायब की जा रही है, जहां रिपोर्टर को भी लगने लगे कि वह सत्ता के सामने या सत्ता के पीछ खड़ा है। संपादक भी मैनेजर नहीं बल्कि वैचारिक तौर पर लकीर के इस या उस पार खड़ा होने का सुकून भी पाल रहा है और हवा में घुलते राष्ट्रवाद को राजपथ पर चलते हुये ही देख-समझ पा रहा है। तो क्या पहली बार मीडिया के लिये खबर छापना या ना छापना पत्रकारिता या धंधा नहीं राष्ट्रवाद है।

राष्ट्रवाद पहली बार अदालत के दायरे में नही लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण व्यवस्था चुनावी राजनीति में जा सिमटा है। जो जीते उसी का राष्ट्रवाद सबसे बेहतरीन । जिसका अपना संविधान है । और इस संविधान के दायरे में एक सा खुलापन है, जहां बोलने का आजादी है । जहा कुछ भी खाने-पीने की आजादी है । जहां चीन-अमेरिका को लेकर तर्क करने की आजादी है । जहां आतंक पर चर्चा की पूरी गुंजाइश है । जहां विदेशी निवेश को स्वदेशी मानने की पूरी छूट है। जहा भ्रष्टाचार ,घूसखोरी, कमीशनखोरी, नीतियों के लागू ना होने के हालात पर आरोप लगाने की छूट है। और संविधान से मिली इस स्वतंत्रता को भोगने के लिये सिर्फ बिना कहे ये समझने की जरुरत है कि देश से बढ़कर कुछ भी नहीं। और देश का मतलब ही सत्ता है। और सत्ता पर कोई आंच पांच बरस तक नहीं आनी चाहिये, इसकी जिम्मेदारी नागरिकों की है । क्योंकि पहले की सत्ता में देश के नाम पर धंधा करने वाले मौजूदा दौर में तो समझ चुके हैं कि उनका मुनाफा, उनकी सहूलियत, उनकी सुविधा का खास ख्याल रखा जा रहा है । सवाल है कि कैसे लोकतंत्र का यह मिजाज अनंतकाल के लिये हो जाये। बस यही समझ नहीं आ रहा है क्योंकि जो खबर दिल्ली के बाजार में है। जो खबर हर कोई जान रहा है। जिस खबर को देखकर हर पत्रकार की बांछे खिल जाती हैं। जिस खबर के छपने से  पत्रकारीय साख मजबूत हो जाती है। फिर भी उस खबर को कोई क्यों खुद से अलग कर रहा है। इस दिलचस्प कहानी के भीतर इतने चरित्र हैं, जिन्हें कुरेदना दिल्ली को दौलताबाद ले जाने से कम नहीं है। आइये फिर भी मीडिया संस्थानों की अट्टलिकाओ में घुस कर देखा जाये मुश्किल है कहां। क्योंकि हर मीडिया संस्धान के भीतर खबरों को लेकर नायाब तरीके की उथल-पुथल लगातार चल रही है। और खामोशी से हर कोई खबरों से ज्यादा बदलते देश की तासीर को समझ कर खामोश है कि जो खबरों के झंडाबरदार उस दौर में बने पड़े हैं दरअसल वह रामलीला के चरित्रो को जीते हुये अपनी अपनी भूमिका को ही सच मान रहे हैं।

“आपको जिसके खिलाफ लिखना है लिख लें, लेकिन इन दो को छोड़ना होगा"
"क्यों, तब तो बहुत ही मोटी लक्ष्मण रेखा खींचनी होगी।"
" ये तो बेहद महीन लकीर खिंचने की बात है। बाकी तो आपको हर पर कलम चलाने की छूट है। अब आप लोग जो समझें। लेकिन हम झुकते नहीं हैं और हमारी पत्रकारीय धार का लोहा दुनिया मानती है। तो सोचिये धार भी बरकरार रहे और समझौता होते हुये भी ना लगे कि हमने कुछ छुपाया। ठीक है।"

“नहीं हम ऐसी खबरो के पीछे नहीं भाग सकते जिसे छापना मुश्किल हो । रिपोर्टरो को भी ऐसी खबरो के पिछे मत भगाइये । नहीं तो वह खबर ले कर आयेंगे । दस्तावेज जुगाड कर लायेंगे । उन दस्तावेजो को लेकर आप उन्हें लंबे वक्त तक जांच कर रहे हैं, कहकर भटका भी नहीं सकते है । तो इस रास्ते पर चले ही नहीं।"
"और अगर कोई भूले भटके ऐसी खबर ले आया जो हमारे अखबार के खांचे में सही नहीं बैठती है तो"
" ......तो क्या आप सिनियर है । आप संपादक है । अब ये हुनर तो आपके पास होना ही चाहिये ।"


"खबरों को आने से मत रोकिये । जो आ रही है आने दें । लेकिन कोई भी ऐसी खबर जो देश की हवा बिगाड दे उसे ना छापें। ना ही डिस्कस करें ।"
"लेकिन ऐसी खबरों का मतलब होगा क्या । देश की हवा का मतलब क्या है ? पाकिस्तान से युद्द का माहौल या आतंकवाद को लेकर कोई गलत पहल। "
"ना ना ....देश की राजनीति को समझिये । इस दौर में देश संकट से भी गुजर रहा है और विकास की नई परिभाषा गढने के लिये मचल भी रहा है । तो हमें देश के साथ खडा होना होगा। जो देश के हक में निर्णय ले रहा है उसके हक में ।"
"तब तो विपक्ष की राजनीति का कोई मतलब ही नहीं होगा । और उनके कहे को कोई मतलब ही नहीं बचेगा।"
" सही । आपकी खबर ही ये तय कर देगी कि जो सही है आप वहीं खडे हैं ।"
"तो फिर गलत या सही-गलत के बीच फंसने की जरुरत ही क्या है ।"

अखबारी जगत के तीन मित्रो की तीन कहानियां। ये शॉर्टकट कहानी है। क्योंकि संपादकों को बीच मौजूदा दौर में कहे जाने वाले शब्द और अनकहे शब्दों के बीच रहकर आपको सही गलत का पैसला करना होगा । तो अपने अपने संस्धानों को लेकर पत्रकार मित्रो के बीच संपादकों की इस बैठक को कितना भी लंबा खींचें। इसी बीच मुझे एक दिन एक पुराने मित्र ने कॉफी पीने का ऐसा आंमत्रण दिया कि मैं चौक गया ।  यार दो तीन घंटे। कॉफी पीते हुये बात करेंगे।
वह तो ठीक है। लेकिन शाम के वक्त दो तीन घंटे। बंधु शॉर्टकट में बतला देना।
और आखिर में तय यही हुआ कि जहॉ मुझे लगेगा कि मै बोर हो रहा हू तो मैं चल दूगा । शाम छह बजे फिल्म सिटी के सीसीडी पहुंचा। मित्र इंतजार कर रहे थे। बिना भूमिका उसने नब्बे के दशक में हवाला रैकेट
के दौर के दस्तावेजों और उस दौर की अखबार–मैग्जिन की रिपोर्टिंग दिखाते हुये पूछा कि क्या इस तरह के दस्तावेज अब कोई मायने रखते हैं।
बिलकुल मायने रखते हैं।
मायने से मेरा मतलब है कि अगर किसी दस्तावेज पर इसी तरह देश के तमाम राजनेताओ के नाम दर्ज हो तो क्या आज की तारीख में कोई मीडिया संस्धान छाप पायेगा।
ये क्या मतलब हुआ। अरे यार कोई भी दस्तावेज जांचना चाहिये। गलत भी हो सकता है।
मौजूदा दौर में जब सबकुछ सत्ता में जा सिमटा है तो फिर एक भी गलत खबर या कहें बिना जांचे परखे किसी दस्तावेज को सही कैसे कोई मान लेगा। और तुम खुद ही कह रहे हो कि राजनेताओं को कठघरे में खड़ा करने वाले दस्तावेज । जो भी सवाल मेरे जहन में उठे मैंने झटके में कह दिये। लेकिन मेरे ही सवालो को जबाब देकर मित्र ने फिर मुझे
कहा.....यार खबर गलत होगी तो हम यहां क्यों बैठे होते । मैं चर्चा क्यों कर रहा होता। जरा कल्पना करो सिस्टम चल कैसे रहा है । आप संस्धानों को टटोलेंगे । आप अधिकारियो से पूछेंगे । आप खबरों की कड़ियो को पकडेंगे । तथ्यों को उनके साथ जोडेंगे । और अगर सब सही लगे तब किसी संपादक का क्यों रुख होना चाहिये। तुम ही बताओ कि अगर तुम होते तो क्या करते। जाहिर है लंबी बहस के बाद ये ऐसा सवाल था जिसका जबाब तुरंत मैं क्या दूं। मेरे जहन में तो मौजूदा दौर के सारे हालात उभरने लगे। मौजूदा हालातों से टकराते उस दौर के हालात भी टकराने लगे, जब सत्ता में एक खामोश पीएम हुआ करते थे । दिल्ली में पत्रकारिता का सुकून ये तो है कि आप सत्ता की चाकरी करने वालों से लेकर सत्ता से टकराते पत्रकारों को बखूबी जान समझ लेते हैं। एक दौर में राडिया। एक दौर में भक्ति। एक दौर में धंधा। एक दौर में संघी। तो क्या इस या उस दौर में पत्रकारिता उलझ चुकी है। या उलझी पत्रकारिता को पहली बार पत्रकार ही सत्ता की गोद में बैठ कर सुलझाने लगे हैं। लेकिन सवाल को खबर का है । और सवाल मुझसे मेरा मित्र क्यों पूछ रहा है मैंने थाह लेने की कोशिश की । क्यों ये सवाल तो कोई सवाल हुआ नहीं । मुझे अजीब सा लग रहा था ये कौन से हालात हैं।
मैंने जोर से उसकी बात काटते हुये कहा , यार तुम ये सब मुझे कह रहे हो जबकि तुम खुद जिस जगह काम करते हो......वहां के संपादक । वहा का प्रबंधन तो खबरों पर मिट जाने वाले हैं। और तुम तो भाग्यशाली हो कि ऐसी जगह काम करते हो जहां खबरों को लेकर कोई समझौता नहीं होता ।
गुरु ...सही कह रहे हो । लेकिन जरा सोचो हम कर क्या करें।
मैंने भी भरोसा दिया, रास्ता निकलेगा। और हम मिलकर रास्ता निकालेगें। हम दो चार दिन में फिर मिलते है । तुम मुझे भी वो दस्तावेज दिखाओ । मै भी देखता हूं
.....अरे यार तुम्हारे ये न्यूज चैनल कितने भी बड़े हो जाये..कितना भी कमा लें लेकिन एक चीज समझ लो देश की सुबह आज भी अखबारो से होती है।
अरे ठीक है यार रात तो चैनलों से होती है। तो तय रहा अगली मुलाकात में
......लेकिन ये लिखते लिखते सोच रहा हूं अब अगली मुलाकात.....तो आप भी इंतजार कीजिए...

(जारी....)


Saturday, July 30, 2016

ये मेरा इंडिया

दिल्ली देश की राजधानी । सड़क कम गाड़ियां ज्यादा । बारिश कम लोग ज्यादा। अगर आप इस हुजूम में फंस गये तो क्या रात क्या दिन। बसर सड़क पर ही हो जायेगी। तो लाखो की गाड़ी हो या करोड़ों का बैंक बैलेंस । सडक पर इस तरह फंसे तो सबकुछ धरा का धरा रह जायेगा। क्योंकि यहां सिस्टम नहीं पैसा काम करता है। और पैसा इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं सुविधा देखती है । तो जनता के लिये 20 मेट्रो , 10 हजार बस टेम्पो टैक्सी पर अस्सी लाख कार इस कदर हावी है कि आधी उम्र तो सडक पर गाड़ी में बैठे बैठे बीत जाती है क्यों ये दिल्ली है । लेकिन झांकी अगर देश की देखनी हो तो फिर नजर आयेगा सिर्फ पानी । पानी और सिर्फ पानी । जी ये हाल उत्तराखंड , यूपी, बिहार, बंगाल, असम समेत आधे भारत का है । और इस पानी तले खेती की दो करोड़ हेक्टेयर से ज्यादा जमीन डूबी हुई है। यानी देश में खेती की कुल 15 करोड 96 लाख हेकटेयर जमीन में से 2 करोड़ 30 लाख ङेक्टेयर जमीन डूबी हुई है। खेती की जमीन पर निर्भर साढे तीन करोड किसान-मजदूरो के परिवारों को कोई पूछने वाला नहीं । 215 से ज्यादा जान बीते हफ्ते भर में पानी की वजह से जा चुकी है। और ये वही देश है, जहां बीते साल भर में सूखे के वजह से 1800 से ज्यादा किसानों ने खुदकुशी कर ली । तो सूखे से जुझना और बरसात में पानी में डूबना देश का ऐसा अनूठा सच है जहां इक्सवी सदी में विकास का हर नारा झूठा लगता है । और बच्चों को कौन सा पाठ पढाये ये सवाल बन जाता है । क्योंकि मुश्किल कल की नहीं मुश्किल तो आज की है । दिल्ली से सटे गाजियाबाद में स्कूल की फीस ना चुका पाने के हालात एक लड़की को खुदकुशी करने पर मजबूर कर देते हैं । क्योंकि मां बाप से ही स्कूल के शिक्षक मारपीट करने लगते हैं । और बेरोजगारी की त्रासदी हर दिन दो सौ से ज्यादा बच्चों को घर छोडने पर मजबूर करने लगे ।

तो आने वाले वक्त में कौन सी पौध देश संभालेगी ये सवाल इसलिये क्योंकि संविधान के तहत दिया गया शिक्षा का अधिकार भी कटघरे में दिखायी देता है । खासकर तब देश का सच ये हो कि 22 फिसदी बच्चे तो अब भी स्कूल नहीं जा पाते । -8 वी तक 37 फिसदी बच्चे मजदूर बनने के लिये स्कूल छोड़ देते हैं। 10 वीं पास करने वाले महज 21 फीसदी बच्चे होते हैं। सिर्फ दो फिसदी उच्च शिक्षा ले पाते है । और उसमें से भी 70 फीसदी देश में पढाई के बाद काम नहीं करते सभी विदेश रवाना हो जाते है । और इसी देश में शिक्षा के नाम पर कमाई करने वाले हर बरस साढ़े चार लाख करोड़ का कारोबार करते है । सरकार के शिक्षा के बजट से तीन गुना ज्यादा रईस परिवार अपने बच्चों को विदेश में पडाने के लिये हर बरस खर्च कर देते है । और तो देश कहां जा रहा है कौन सोचेगा । ये भी तो नहीं कह सकते ये सब कल की बाते है इन्हें छोड दें । क्योंकि जो कल बन रहा है उसका सच यही है कि देश की इक्नामी ही चंद हथेलियों पर सिमट रही है । हालात किस दिशा में जा रहे है ये इससे   समझा जा सकता है कि देश की कुल इक्नामी 65,20,000 करोड की है । जिसमें 10,00,000 करोड का कर्ज सिर्फ 12 कारपोरेट ने लिया है । सीबीआई बैक फ्राड के 150 मामलों की जांच कर रही है जिसकी रकम महज 20,000 करोड है । तो देश की मजबूती किन हाथों में सौपे खासकर तब जब देश में सबसे ज्यादा व्यवस्था मोबाईल पर आ टिकी है । क्योंकि हाथों में मोबाईल से पानी के खौफ को भी सेल्फी में उतारने का जुनून है तो लातूर जैसे सूखे इलाके में पानी लाने की जगह सूखे को ही सेल्फी में उतारने की सोच मंत्री की है । तो क्या विदेशी पूंजी । विदेशी तकनालाजी से रास्ता निकल सकता है । क्योंकि स्वदेशी की सोच विदेशी पूंजी तले कैसे काफूर हो गई और मान लिया गया कि एफडीआई के जरीये देश विकास के रास्ते चल सकता है । उद्योग धंधों में रफ्तार आ सकती है । रोजगार बढ सकता है । तक्नालाजी का आधुनिकरण हो सकता है । जबकि उद्योग धंधों की रफ्तर रुकी हुई है । रोजगार पैदा हो नहीं पा रहे । नई इंडस्ट्री लग नहीं रही । खेती-उघोग का योगदान जीडीपी में घटते घटते 1950 के 86 फिसदी से घटते घटते 34 फिसदी पर आ गया है । और स्वदेश का पाठ वाकई पीछे छूट गया । जो हुनर को रोजगार देता । जो रोजगार से सरोकार बनाता । जो सरोकार से देश बनाता । और जो देश को एक धागे में पिरोता है । तो इस अक्स में जरा स्मार्ट सिटी के सच को समझ लें । क्योकि जिस वक्त दिल्ली में स्मार्ट सिटी पर राष्ट्रीय सम्मेलन हो रहा था । उसी वक्त दिल्ली से सटे मिलेनियम सिटी यानी गुडगांव में सबकुछ ठप पडा था । और पीएमओ में राज्य मंत्री जीतेन्द्क सिंह ये समझा ही नहीं पा रहे थे कि आखिर स्मार्ट सिटी होगें कैसे । क्योकि अभी तो हम जिन शहरों को हम साइबर सिटी से लेकर स्मार्ट शहरों के रुप में जानते-पहचानते आए हैं-उनका हाल कैसे हर किसी को बेहाल कर देता है ये हर बरसात में सामने आ जाता है तो सवाल उन स्मार्टसिटी का है,जिन्हें स्मार्ट बनाने का दावा करते हुए कहा तो यही जा रहा है कि स्मार्टसिटी बनते ही सब कुछ ठीक हो जाएगा। लेकिन सच तो यही है कि स्मार्ट सीटी का तमगा जिन शहरो को दिया गया है वहा के इन्फ्र्सट्क्चर को मजबूत माना गया ।

यानी स्मार्ट शब्द उस आधुनिकता से जुडा है जहा टेकनालाजी पर टिकी पूरी व्यवस्था होगी । तो क्या स्मार्ट सीटी में पैर जमीन पर नहीं आसमान में रखे जायेंगे । क्योंकि देश में सौ स्मार्ट सिटी के लिये जो बजट है और शहरी व्यवस्था को सुधारने का जो बजट है अगर दोनो को मिला दिया जाये तो 7296 करोड़ रुपया है । जिसमें स्मार्ट सीटी के लिये 4091 करोड बजट रखा गया है । तो कल्पना किजिये जो गुडगांव सिर्फ एक बरसात में कुछ ऐसा नाले में तब्दील हुआ कि वहां 22 घंटे का जाम लग गया और हालात नियंत्रण में लाने के लिये धारा 144 लगानी पडी । उस गुडगांव नगर निगम का सालाना बजट 2000 करोड़ का है । यानी गुडगांव के अपने बजट से सिर्फ दुगने बजट में देश में 20 स्मार्ट सिटी बनाने की सोची गई है । और असर इसी का है कि सरकारी स्मार्ट सिटी की रैकिंग में नंबर एक पर भुवनेशवर में भी बारिश हुई नहीं कि शहर की लय ही बिगड गया । तो सवाल दो है । स्मार्ट सीटी का रास्ता सही दिशा में जा नहीं रहा या फिर भारतीय मिजाज में स्मार्ट सीटी की सोच ही भ्रष्टाचार की जननी है । क्योंकि गुडगांव ही नहीं बल्कि बैंगलोर हो या मुबंई । या फिर देश का कोई भी शहर। किसी भी शहर का इन्फ्रास्ट्रक्चर इस तरह तैयार किया ही नहीं गया कि अगल दस से बीस बरस में शहर की आबादी हर नजर से अगर दुगुनी हो  ये तो क्या शहर की व्यवस्था चरमरायेगी नहीं । 70 से 90 के दशक के बाद से किसी शहर के इन्फ्रस्ट्क्चर में कोई बदलाव किया ही नहीं गया । 30 एमएम से ज्यादा बरसात होने की निकासी की कोई व्यवस्था किसी शहर में नहीं है । जबकि दस लाख से उपर की आबादी वाले सौ से ज्यादा शहरों में बीते दो दशक में आबादी तीन गुना से ज्यादा बढ गई । ग्लोबल वार्मिग ने मौसम बदला है । लेकिन बदलते मौसम का सामना करने के लिये इन्फ्रास्ट्रक्चर बदल कर मजबूत कैसे किया जाये इस दिशा में कोई गंभीरता किसी सरकार ने कभी दिखायी ही नहीं । और स्मार्ट सीटी का खाका तैयार करने वाले नौकरशाहों के आंकडों को समझें तो उनके
मुताबिक 13 करोड लोगो को स्मार्ट सिटी के बनने से फायदा होगा । यानी सवा सौ करोड के देश में जब जीने की न्यूनतम जरुरतों के लिये -हर बरस गांव से 80 लाख से एक करोड ग्रामीणों का पलायन शहर में हो रहा है । तो शहरो के बोझ को सहने की ताकत बढ़ाने की जरुरत है या गांव को स्मार्ट या कहें सक्षम बनाने की जरुरत है। या कहे देश की इकनामी से ग्रामीण भारत को जोड़ने की जरुरत है। अगर ये नहीं होगा तो देश में स्मार्ट इलाके तो बन सकते है जो असमान भारत के प्रमाण होंगे । जिन्हे ठसक के साथ दुनिया को दिखाया जा सकेगा कि ये इंडिया है।

Wednesday, July 27, 2016

संघ परिवार को संतुष्ट करना है मोदी सरकार का काम ?

26 महीने बीत गए और 34 महीने बाकी हैं । तो विपक्ष हो या संघ परिवार के भीतर के संगठन पहली बार खुले सवाल लेकर हर कोई अपना रास्ता बनाने की दिशा में बढना चाह रहा है । और प्रधानमंत्री मोदी का विरोध करते हुये एकतरफ क्षत्रप एकजुट हो रहे है । तो मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों को लेकर संघ परिवार में विरोध के स्वार ना उठे उसकी मशक्कत खुद सरसंघचालक मोहन भागवत और सुरेश सोनी अब खुलकर कर रहे हैं। हालात को परखें तो नीतिश कुमार संघ परिवार पर सीधे चोट कर देश भर के साहित्यकार लेखकों को जमा कर अपनी राजनीतिक हैसियत बिहार के बाहर राष्ट्रीय स्तर पर देखना चाह रहे हैं। यानी निगाहों में 2019 अभी से समाने लगा है। ममता बनर्जी संघीय. ढांचे का सवाल उठाकर ना सिर्फ मोदी सरकार पर सीधी चोट कर रही है बल्कि नीतीश कुमार और केजरीवाल से मुलाकात कर 2019 की बिसात तीसरे मोर्चे की दिशा में ले जाने का प्रयास कर रही है ।

केजरीवाल तो सीधे अब प्रदानमंत्री मोदी से टकराने के रास्ते निकल पड़े हैं । इसलिये हर उस मुद्दे के साथ खुद को खड़ा कर रहे हैं, जहां मोदी पर सीधे निशाना साधा जा सके । जाहिर है बिहार, बंगाल और दिल्ली की इस आवाज में कितना दम होगा या 2019 तक क्या ये वाकई कोई विकल्प बना पायेंगे ये अभी दूर की गोटी है । लेकिन प्रधानमंत्री मोदी के लिये असल सवाल तो संघ परिवार को अपने साथ सहेज कर रखने का है । क्योंकि दूसरी तरफ बीएमएस मोदी सरकारी की आर्थिक नीतियों को मजदूर विरोधी मान रहा है । और उसे लग रहा है कि ऐसे में उसके सरोकार मजदूर संगठन के तौर पर कैसे बचेगें । तो स्वदेशी जागरण मंच के सामने मुस्किल हर क्षेत्र में विदेशी पूंजी निवेश को लेकर बढती मोदी सरकार की लालसा है । ऐसे में ििस्वदेशी जागरण मंच के सामने अपनी महत्ता को बनाये रखने का होता जा रहा है। वहीं संघ के भीतर के ठेंगडी गुट को लगने लगा है कि मोदी सरकार की इक्नामी वाजपेयी दौर के ही समान है तो वह अब खुली अर्थव्यस्था के विकल्प का सवाल उटा कर ये चेताने लगा है कि अगर चुनाव अनुकुल इक्नामी नहीं अपनायी गई तो 2019 में चुनाव जीतना भी मुश्किल हो जायेगा । लेकिन खास बात ये है कि संघ परिवार के भीतर की हलचल की आंच मोदी सरकार पर ना आये इसके लिये शॉक आब्जर्वर का काम खुद संघ के मुखिया मोहन भागवत और दो बरस बाद छुट्टी से लौटे सुरेश सोनी कर रहे हैं।

और दोनों ही स्वयंसेवक इस हालात को बनने से रोक रहे है कि 2004 वाले हालात 2019 में कही ना बन जाये जब स्वयंसेवको ने खुद को वाजपेयी सरकार के चुनाव से खुद को अलग कर लिया था । इसीलिये दिल्ली के गुजरात भवन में आर्थिक नीति को लेकर तो दो दिन पहले हरियाणा भवन में शिक्षा नीति को लेकर जिस तरह संघ के मुखिया की मौजूदगी में संघ के संगठनो के नुमाइन्दे और सरकार के आला मंत्रियों से चर्चा हुई । उसने ये संकेत तो साफ दे दिये मोदी सरकार के हर मंत्रालय का कच्चा चिट्ठा अब आरएसएस देखना नहीं बताना चाहता है । यानी संघ की लकीर पर सरकार कैसे चले । और जहा ना चले वहा तालमेल कैसे बिठाये । क्योकि आर्थिक नीतियों पर संघ परिवार की तरफ से और सरकार की तरफ से बैठा कौन ये भी कम दिलचस्प नहीं । संघ के सात संगठन बीएमएस , स्वदेशी जागरण मंच, किसान संघ , ग्राहक पंचायत, लघु उघोग भारती, सहकार बारती, दीनदयाल संस्धान बैठ तो दूसरी तरफ बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के साथ अरुण जेटली । वैकेया नायडू, पीयूष गोयल, निर्माला सितारमण, कलराज मिश्र , बंडारु दत्तात्रेय । तो शिक्षा नीति को बनाने के लिये संघ के विघा भारती , भारतीय शिक्षा मंडल , एबीवीपी , शिक्षक महाविघालय , शिक्षा संस्कृति न्यास , संस्कृत भारती तो सिक्षा मंत्री प्रकाश जावडेकर , राज्य मंत्री महेन्द्र नाथ पांडे और उपेन्द्र कुशवाहा बैठे । । और सहमति बनाने तके लिये संघ के मुखिया मोहन भागवत के अलावे दत्तात्रेय होसबोले , सुरेश सोनी , कृष्ण गोपाल और बीजेपी संगटन
मंत्री रामलाल मौजूद रहे । यानी लग ऐसा रहा है कि सरकार का कामकाज संघ परिवार को संतुष्ट करना है । क्योंकि मोदी सरकार को भी साफ लगने लगा है कि सरकार से ज्यादा आम जनता से सरोकार स्वयंसेवकों के ही है । और राजनीतिक तौर पर सरकार की सफलता नीतियो से नहीं चुनावी जीत से समझी मानी जाती है । और अगर वाजपेयी के दौर की तर्ज पर कही संघ के भीतर सरकार को लेकर ही टकराव हो गया तो हर चुनाव में मुश्किल होगी । इसीलिये बैठक में जब संघ ने एफडीआई, विनिवेश और बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर आपत्ति जतायी । तो अमित शाह समेत सात मंत्रियों ने संघ के सुझाव के पालन का भरोसा जता दिया । इसी तर्ज पर शिक्षा नीति को लेकर पहली बार जब एचआरडी मंत्री प्रकाश जावडेकर के साथ संघ के संगठन शिक्षा भारती के साथ एवीबीपी, शिक्षा संस्कृति न्यास बैठे और उन्होने महंगी शिक्षा , व्यवसायिक होती शिक्षा , शिक्षा के कारपोरेटीकरण का सवाल उठाया । तो प्रकाश जावडेकर ने संघ के सुझाव के पालन का भरोसा जताया । और बैठक में दीनानाथ बत्रा हो या अतुल कोठारी उनकी लीक को ही शिक्षा नीति का हिस्सा बनाने पर सहमति जतायी गई । जाहिर है ये सिलसिला यही रुकेगा नहीं । क्योकि मोदी सरकार के दो बरस बीत चुके है और बैचेनी हर किसी में है कि नीतिया ना संघ के अनुकुल बन पा रही है ना ही नीतियो से चुनावी जीत मिलेगी । ऐसे मोड पर विहिप भी अब विचार समूह के तहत राम मंदिर ही नहीं बल्कि धर्मातरण और क़ॉमन सिविल कोड पर भी सरकार से बात करने पर जोर दे रहा है । तो सवाल यही है कि 26 महीने बीते चुके मोदी सरकार के सामने वक्त वाकई 34 महीने का है । या फिर अगले 16 महीनो में यूपी, पंजाब, गोवा और गुजरात के चुनाव की जीत हार ही सबकुछ तय कर देगी ।




इरोम के राजनीति में आने के मायने

सोलह बरस पहले इरोम ने सरकार के एक फैसले का विरोध किया । और रास्ता आमरण अनशन का चुना । वही रास्ता जिसपर कभी महात्मा गांधी चले थे । लेकिन इरोम के अनशन को आत्महत्या की कोशिश माना गया । हिरासत में लेकर । नाक में नली लगाकर जबरन भोजन दिया गया । और बीते 15 बरस 8 महीने से अस्पताल के 15 गुणा 10 फीट के कमरे को इरोम की जिन्दगी बना दी । और जिस सवाल से लगातार इरोम जुझती रही कि जब महात्मा गांधी को भी अपनी असहमति जाहिर करने की इजाजत थी तो भारत के नागरिक के तौर पर उन्हें क्यों ये आजादी नहीं है । तो क्या इरोम ने भी मान लिया कि उसे आजादी राजनीतिक व्यवस्था से लड़कर लेनी होगी और इसके लिये चुनाव लड़कर उसी सिस्टम का हिस्सा बनना होगा, जिस सिस्टम ने बीते 16 बरस के उसके आंदोलन को ये कहकर खारिज किया कि मणिपुर से आफ्सपा यानी सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम खत्म नहीं किया जा सकता । तो क्या देश में हर संघर्ष हर आंदोलन को चुनाव के मैदान में जाना ही पड़ेगा । क्योंकि सिस्टम का हर रास्ता राजनीतिक सत्ता ने हड़प लिया है । क्योंकि सवाल तो हर जगह पर है । संघर्ष हर जगह पर है । आंदोलन हर इलाके में है ।मणिपुर में आफ्सपा तो छत्तीसगढ के बस्तर में माओवाद, उडीसा के कालाहांडी की भूखमरी , विदर्भ के किसानो की खुदकुशी , बुंदेलखंड का सूखा और बेरोजगारी , तमिलनाडु के कुडनकुल्लम में परमाणु संयत्र का विरोध । और कश्मीर में भी आफ्सा का सवाल और इस कतार में देश भर में तीन दर्जन से ज्यादा इलाको में कही संघर्ष तो कही आंदोलन चल रहा है । तो क्या वाकई हर मुद्दे को लेकर संघर्ष करते लोगो के सामने आखरी रास्ता राजनीतिक मैदान में ही कूदना मजबूरी है क्योकि संविधान में लोकतांत्रिक व्यवस्था के मातहत कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका में जो चैक एंड बैलेस किया गया उसे राजनीतिक सत्ता ने वाकई हडप लिया है । और राजनीतिक सत्ता के सारे तौर तरीके या कहे सारी नीतिया भी चुनाव जीतने पर जा टिकी है । और 16 बरस के संघर्ष के बाद अब इरोम शर्मिला जब ये कह रही है कि वह संघर्ष छोड़ चुनाव लडेंगी । तो क्या ये उस सिस्टम की जीत है जो संघर्ष को खत्म कराती है या फिर सिस्टम को बदलने के लिये आंदोलनों की नई जिद है । कि वह सिस्टम
में घुस कर सिस्टम को ठीक करेंगे।

तो याद किजिये हाल ही में रिलिज हुई फिल्म मदारी का डॉयलाग , जिसमें नायक पूछता है क्या सरकार भ्रष्ट है । तो गृह मंत्री की भूमिका को जी रहा कलाकार कहता है सिस्टम भ्रष्ट नहीं है बल्कि भ्रष्टाचार के लिये ही सिस्टम है । तो फिर याद कीजिये भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना आंदोलन को । और सोचिये क्या वाकई राजनीति में जाकर सत्ता पाकर भी क्या सिस्टम बदला जा सकता है । क्योकि दिल्ली में भी लोकपाल का सवाल को हाशिये पर है । और दिल्ली के ही ये दस विधायक ऐसे जो सत्ता पाने के बरस भर के भीतर दागी हो गये । जेल पहुंच गये । और दूसरी तरफ एसोशियसन फार डेमोक्टेरिक रिफार्म यानी एडीआर की रिपोर्ट की माने तो 543 सांसदो में से 182 सांसद दागी है देश भर के कुल 4032 विधायको में से 1258 विधायक दागी है औरयाद किजिये प्रधानमंत्री मोदी ने सत्ता में आते ही कहा था कि दागी केस का सामना करें । पाक साफ होकर संसद पहुंचे । लेकिन एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक मोदी कैबिनेट में भी 24 मंत्रियो के खिलाफ अपराधिक मामले दर्ज है । जिसका जिक्र एफिडेविट में है । और राज्यों के मंत्रियों में भी 23 फिसदी दागी हैं । और तीन दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने भी चुनाव आयोग से पूछा कि द गी सांसदों पर वह क्या कारावाई कर रही है । तो क्या सिस्टम वाकई भ्रष्ट है । क्योंकि याद किजिये तो 1993 में वोहरा कमेटी ने राजनीतिक भ्ष्टाचार को लेकर अपनी रिपोर्ट में पुलिस , नौकरशाह, सरकारी मुलाजिम , मीडियाकर्मी और राजनेताओ का गठजोड़ बताया था । बावजूद इसके केजरीवाल सिस्टम साफ करने की कसम खाते हुये सत्ता तक पहुंचे। और अब बीते 16 बरस से मणिपुर में आफ्सा के खिलाफ संघर्ष कर रही इरोम शर्मिला भी चुनाव लडकर हालात बदलना चाहती है । और बकायदा कहती है कि , "किसी भी राजनीतिक दल ने मेरे लोगों की आफ़्सपा हटाने की मांग को नहीं उठाया. इसीलिए मैंने ये विरोध ख़त्म करने और 2017 के असेंबली चुनावों की तैयारी करने का फ़ैसला किया है। मैं 9 अगस्त को अदालत में अपनी अगली पेशी के समय भूख हड़ताल ख़त्म कर दूँगी।" तो सवाल यही कि क्या इरोम शर्मिला सिस्टम से हार गईं ? क्योंकि असल सवाल यही से बडा होता कि क्या वाकई सिस्टम में घुस कर सिस्टम को बदला जा सकता है । या फिर सिस्टम के जरीये राजनीतिक सत्ता को चुनौती देने वाले हो या संघर्ष करने वाले सिर्फ अपनी पहचान ही बना पाते है । और भारत में पहचान पाने का मतलब है राजनीतिक चुनाव लडने में आसानी । क्योंकि ध्यान दीजिए तो मैग्सेसे अवॉर्ड विजेता आईएफएस संजीव चतुर्वेदी को आज तक दिल्ली में डेपुटेशन नहीं मिल पाई।

यूपी सरकार में बालू माफिया को चुनौती देने वाली दुर्गा शक्ति नागपाल को निलंबन झेलना पड़ा । आखिर में यूपी सीएम के दरबार में हाजिरी के बाद ही निलंबन वापस हुआ। और यूपी में बालू माफिया का खेल बदस्तूर जारी है। अशोक खेमका का 23 साल के करियर में 47 बार ट्रांसफर हो चुका है, और किसी सरकार ने उन्हें एक जगह पर दो साल पूरे होने नहीं दिए । यूपी में तैनात आईपीएस अमिताभ ठाकुर को सत्ता से जान का खतरा लगता है तो वो केंद्र से डेपुटेशन पर बुलाए जाने की मांग कर रहे हैं। यानी राजनीतिक सत्ता से कोई टकरा नहीं सकता । गलत को गलत तभी कह सकता है जब राजनीतिक सत्ता के अनुकूल हो । तो क्या कड़वा सच यही है कि सिस्टम को कोई बदल नहीं सकता, और सिस्टम बड़े बड़ों को झुका भी सकता है, और मार भी सकता है । क्योंकि कर्नाटक में आईएएस डीके रवि के खुदकुशी कर ली । कारण इमानदार छवि । बिहार में स्वणिम चतुर्भुज सड़क योजना से जुडे सत्येन्द्र दुबे की हत्या हो गई । कारण भ्रष्ट नहीं थे । इंडियन आयल के मंजूनाथ की हत्या कर दी गई । कारण गलत होने नहीं दिया। तमिलनाडु के दलित आईएएस उमाशंकर की इमानदारी ना जयललिता को रास आई ना करुणानिधी को । और राजनीतिक सत्ता ही कैसे सबकुछ है ये इस बार की आईएएस टापर टीना डाबी और 6 बरस पुराने आईएस अजय यादव से भी समझा जा सकता है । टीना को टापर होने पर भी मनचाहा कैडर हरियाणा नहीं मिला । उन्हे राजस्थान भेज दिया गया ।और वो कहने को मजबूर हैं कि सारे कैडर एक समान हैं । तो यूपी की सत्ता की पहचान शिवपाल यादव के दामाद अजय यादव के लिये मोदी सरकार ने ही नियम कायदे ताक पर रख कर तमिलनाडु कैडर में नौ बरस पूरे किये बिना यूपी डेपुटेशन पर भेज दिया । क्योकि शिवपाल यादव ने पीएम को पत्र लिखा और डीओपीटी ने अपने ही नियमो को सत्ता की सुविधा के लिये बदल दिये ।

Sunday, July 24, 2016

सिल्वर स्क्रीन का डॉन "महानायक" क्यों ?

कबाली का अंदाज गुस्से का है । कबाली का अंदाज हाशिये पर पड़े व्यक्ति के चुनौती देने का है । कबाली का अंदाज सिस्टम से मार खाये नायक का है । कबाली का अंदाज खुद न्याय करने का है । सही मायने में ये अंदाज उस तलयवर का है जो आम आदमी का नायक है । और जब समाज में नायक बचे नहीं है तो सिल्वर स्क्रीन ही आम आदमी के दिलो में उतर कर एक एसा महानायक देता है जो सिस्टम को अपनी हथेली पर नचाता है । चकाचौंध की माफियागिरी को टक्कर देते हुये तीन घंटे में पोयटिक जस्टिस करता है । तो क्या रजनीकांत की उड़ान सिर्फ इतनी है । क्योकि याद किजिये सिल्वर स्क्रीन पर डॉन की भूमिका में पहली बार रजनी कांत दिखायी भी दिये तो बालीवुड स्टार अमिताभ बच्चन की फिल्म डॉन के रिमेक बिल्ला में । हर स्टाइल अमिताभ का । और 1980 में माना यही गया कि रजनीकांत तमिल फिल्मों के अमिताभ बच्चन हैं। लेकिन साढे तीन दशक
बाद सिल्वर स्क्रीन का वही तमिल नायक बालीवुड के नायकों को पीछे छोड़ इतना आगे निकल जायेगा कि मुंबई के सिनेमाघर भी उसकी फिल्म के लिये सुबह चार बजे खुल जायेंगे । या किसने सोचा होगा ।

वैसे याद किजिये तो एनटीआर ने भी अमिताभ बच्चन की डॉन के रिमेक के तौर पर युगान्धर फिल्म में बतौर डॉन की भूमिका को ही सिल्वर स्रिकन पर जिया । लेकिन बालीवुड को कभी छू भी नहीं पाये एनटीआर । और तमिल फिल्मो के लोकप्रिय एमजीआर तो दक्षिण भारत से आगे निकल ही नहीं पाये । कमाल हसन ने प्रयास जरुर किया लेकिन उनकी लोकप्रियता नायकन से आगे निकल नहीं पायी । तो रजनीकांत ने वह कौन सी नब्ज पकडी है जिसे बालीवड के खान बंधु हो या अमिताभ बच्चन वह भी इस नब्ज को पकड नहीं पाये । और समाज या राजनीति में भी नायक खत्म होते चले गये । तो समझना होगा कि निजी जिन्दगी में कुली बढई और कंडक्टरी करते हुये सिल्वर स्क्रीन के नायक बने रजनीकांत ने उस खोखले पन को हमेशा नकारा जो चकाचौंध और पावर तो देता है लेकिन आम आदमी से काट देता है । इसलिये उनके दरवाजे को जब भी राजनेताओं ने खटखटाया उन्हे ना ही सुनने को मिला । और रजनीकांत ने निजी जीवन से लेकर सिल्वर स्क्रीन पर भी उसी समाज से निकले उसी चरित्र को जीया जो समुदाय , जो समाज आज भी हाशिये पर है । इसीलिये तमाम तकनीकी माध्यमों से गुजरने वाली रजनीकांत की अदा सिल्वर स्किरन पर एक ईमानदार अदा बन जाती है । जो उन्हे आम जनता का नायक बना देती है ।

लेकिन सवाल यही कि आखिर डॉन का चरित्र ही नायक कैसे गढता है । वरदराजन मुदलियार ,हाजी मस्तान , दाउद , छोटा राजन ये नाम अंडरवर्लड डॉन के है । जाहिर है ये खलनायक है । लेकिन इन्ही डॉन की भूमिका को गढते हुये सिल्वर स्क्रीन पर जिस जिस कलाकार ने इसे जिया वह नायक बन गया । फिल्मों की कतार देखे । दीवार-, डॉन , दयावान , कंपनी-, सत्या , ब्लैक फ्राइडे , सरकार , अग्निपथ और वह सारी फिल्मे सफल हुई जो डॉन का ताना बाना बुनते हुये सिल्वर स्क्रिन पर आई और लोगो के दिमाग में छा गई । हिन्दी सिनेमा ही नहीं बल्कि दक्षिण की फिल्मो की फेरहसित देखे तो वहा भी हर वह फिल्म सफल हुई जो अ डरवर्ल्ड डॉन को लारजर दैन लाइफ बनाती । तमिल फिल्म बिल्ला , बाशा , जेमनी , अरिन्थुम अरियामुलुम , पुधुपेट्टई , पोक्किरी , मनकथा , सुदुकावुम और इसी कतार में अब कबाली का नाम भी लिया जा सकता है । जिसमें रजनीकांत डॉन की भूमिका में है । यानी लकीर बारिक है लेकिन डॉन का मतलब कही ना कही आम आदमी के हक में खड़ा शख्स होता है । जो सिल्वर स्किरन पर नायक । लेकिन कानून के नजर में अपराधी । तो क्या सिल्वर स्क्रीन का पोयटिक जस्टिस राजनीतिक न्याय  व्यवस्था पर भारी पडने लगा है । या फिर सिनेमा महज मनोरंजन है । ये सवाल इसलिये क्योकि सिनेमा में ज्यादातर डॉन दलित-पिछडे समाज से ही निकलते है । गरीबी और मुफलिसी में संघर्ष करते तबके में से कोई चुनौती देता है तो ही वह नायक बनता है । याद किजिये मुब्ई में वरदराजन मुदलियार डॉन के तौर पर तब खडा होता है जब लुंगी को मराठी मानुष की राजनीति चुनौती देती है ।
जीना मुहाल करती है ।और इसपर बनी फिल्म दयावान का नायक भी सिल्वर स्क्रीन पर कुछ इसी पहचान के साथ खड़ा होता है । तो क्या राजनीतिक तौर पर कोई नायक समाज को इसीलिये नहीं मिल पा रहा है क्योकि राजनीतिक न्याय व्यवस्था कानून के राज के बदले कानून पर ही राज करने लगती है । और समाज के भीतर का संघर्ष राजनीतिक सत्ता अपने अपने वोट बैक के नजरिये से हर जगह दबाती चली जाती है । ये सवाल इसलिये भी महत्वपूर्ण है जब मुनाफा और मार्केट इकनामी राजनीतिक सत्ता का भी मूलमंत्र बन चुका है तब समझाना होगा कि अंडरवर्ल्ड पर बनी फिल्मो का मुनाफा कमोवेश किसी भी सामान्य फिल्म की तुलना में 75 से 200 फिसदी ज्यादा होता है । और डॉन के चरित्र को लेकर बनी कबाली भी पहले ही दिन सारी फिल्मों की कमाई के सारे रिकार्ड तोड़ चुकी है ।

Wednesday, July 20, 2016

देश के भीतर का सच

आतंकवाद, उग्रवाद, नक्सवाद में सुलगता देश

कश्मीर में आतंकवाद , नार्थ इस्ट में उग्रवाद तो मध्य भारत में नक्सलवाद। और बीते 16 बरस का सच यही कि कुल 45 हजार 469 लोगों की मौत हो चुकी है।तो कश्मीर के आतंकवाद के मद्देनजर पहले राज्यसभा फिर लोकसभा में चर्चा केदौरान जब कई सवालो का जिक्र उठा तो सवाल ये भी उठा कि कश्मीर नार्थ इस्टऔर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों को लेकर सरकार की नीति होनी क्या चाहिये ।क्योंकि तीनों जगहों पर सुरक्षाकर्मियों को लगातार उस हिंसा का सामना करना पड़रहा है, जिसके तार कहीं ना कही सीमा पार से भी जा जुड़े है। गृह मंत्रालयकी ताजा रिपोर्ट भी तीनों जगहों को लेकर उस चिता को ही उभारती है, जहांकश्मीर में आतंक के पीछे पाकिस्तान है । तो नार्थ इस्ट में उग्रवाद के पीछे चीन का होना और बांग्लादेश की जमीन के इस्तेमाल को करना है । और -नक्सलवाद के पीछे अंतराष्ट्रीय माओवादी विचारधारा से मिलती मदद का होना है । यानी तीनो जगहों में लगातार हो रही हिंसा के मद्देनजर केन्द्र की सत्ता बदली हो या राज्यो में सत्ता परिवर्तन हुआ हो । हालातों में कोई अंतर नहीं आया। क्योंकि बीते 16 बरस में केन्द्र की सत्ता भी 360 डिग्री में घूम कर बीजेपी के पास आ चुकी है। और राज्यों में भी  र राजनीतिक दल ने सत्ता भोगी है । और मौत के आंकडे तीनो जगहों पर डराने वाले है । कश्मीर में 21 हजार 63 मौतों के अगर बांट दें तो 5262 नागरिक मारे गये । 3335 सुरक्षा कर्मी शहीद हो गये और 12466 आतंकवादी मारे गये । लहुलूहान नार्थ इस्ट भी हुआ है। जहां का 90 फिसदी हिस्सा अंतराष्ट्रीय बार्डर है । और वहां उग्रवाद की वजहों से 12281 लोग मारे जा चुके हैं, जिसमें 5112 नागरिक मारे गये तो 1130 सुरक्षाकर्मी शहीद हो गये । और 6 हजार 39 उग्रवादी मारे गये । वही नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ, झारखंड,बिहार, उडिसा,महाराष्ट्र, आध्रप्रेदेश और तेलंगाना के 35 जिलों में बीते सोलह बरस में 12 हजार 125 लोग मारे जा चुके है । जिसमें 5900 नागरिक गरीब पिछड़े आदिवासी किसान रहे हैं । 5628 माओवादी मारे जा चुके हैं। और देश के भीतर की हिसा से जुझते ढाई हजार से ज्यादा सुरक्षाकर्मी मारे जा चुके हैं। और 48 घंटे पहले ही बिहार-झारखंड सीमा पर 10 सुरक्षाकर्मी मारे गये तो सुरक्षाकर्मी ही अपनी सुरक्षा और सुविधा को लेकर फूट पड़े । यानी सुरक्षाकर्मियो के सामने भी आंतक , उग्रवाद या नक्सली हिसा से जुझते हुये अपने अपने संकट है । कही राजनीति आडे आती है । कहीं राज्यों के आपसी टकराव सामने आते है । तो कही केन्द्र राज्य टकराते है । तो कही सुरक्षाकर्मियों को सारी सुविधायें नहीं मिल पाती हैं।

और इन तीन हिस्सों को लेकर ठोस नीति ना होने की वजह से ही सेना, सुरक्षाकर्मी या कहें पुलिस को ही हर परिस्थितियों से जूझना पड़ रहा है। आलम ये है कि देश के इन तीन जगहों पर करीब नौ लाख सुरक्षाकर्मियों की तैनाती है । यानी राजनीतिक सरोकार पीछे छूट रहे हैं और युद्द से हालात देश के भीतर आंतरिक सुरक्षा के मद्देनजर कैसे बनते चले जा रहे हैं, इस सच को कोई सरकार क्यों नहीं समझ रही है ये भी सवाल है । जाहिर है ऐसे में आतंकवाद , उग्रवाद और नक्सली हिंसा से प्रभावित देश के इन तीन क्षेत्रो का एक सच ये भी है कि यहा राजनीति फैसलो से ज्यादा राजनीतिक सत्ता ने सुरक्षाकर्मियो के आसरे ही हालात पर नियंत्रण को चाहा है । क्योकि इन इलाको के सियासी अंतर्विरोध को संभालने की हालात में कोई राजदनीतिक सत्ता कभी आ नहीं पाय़ी और देश में सेना हो या अद्दसैनिक बल या फिर राज्यो की पुलिस । सबसे ज्यादा तैनाती उन्हीं इलाकों में है । ग्लोबल सिक्यूरटी रिपोर्ट की माने तो सिर्फ इन तीन इलाकों में करीब नौ लाख सुरक्षाकर्मीयो की तैनैाती हा । जिसमें कशमीर में करीब 4 लाख सुरक्षाकर्मी , नार्थ इस्ट में करीब तीन लाख और नक्सलप्रभावित इलाको में 164 667 सुरक्षाकर्मी । और बीते सौलह बरस में सिर्फ इन्ही क्षेत्रो में 7062 सुरक्षारर्मी शहीद हो चुके है । और इन इलाको को लेकर लगातार यही सवाल बडा होता चला गया कि सुरक्षाकर्मियो के आसरे कैसे आंतकवाद पर या उग्रवाद पर या पिर माओवाद पर नकेल कसी जा सकती है ।

यानी सुरक्षाकर्मियो  क्या क्या उपलब्ध कराया जाये जिससे वहा के हालात का सामना सेना, इद्दसैनिक बल कर सके । महत्वपूर्ण है कि गृहमंत्रालय की ताजा रिपोर्ट में ही तैनात सुरक्षाकर्मियो को दी जाने वाली सुविधा, आधुनिकीकरण और मुआवजे को लेकर सवाल है । यानी सेना के आधुनिकरण के साथ साथ । तैनात सुरक्षाकर्मियो को दी जाने वाली सुविधा और शहीद होने के बाद परिनजनो की राहत की राशी बढाने का जिक्र किया गया है । यानी तीनो क्षेत्रो का सुरक्षा बजट बीते 16 बरस में 200 फिसदी तक बढ गया । लेकिन हालात फिर भी नियत्रंण में नहीं आ रहे है तो सवाल समाजिक-राजनीति समाधान के ना खोजने का है । क्योंकि याद कीजिए दंतेवाड़ा में जिस वक्त 76 सीआरपीएफ के जवानों को नक्सलियों ने खूनी भिडंत के बाद मार गिराया था-उस वक्त केंद्र में मनमोहन सरकार थी और उस वक्त बीजेपी ने यह कहते हुए कांग्रेस पर निशाना साधा था कि पूरी सरकार ही फेल है। और अब तो बीजेपी ही सत्ता में है । और बिहार -झारखंड सीमा पर नक्सली हिसा में 10 सुरक्षाकर्मी मारे जाते है तो सत्त खामोश हो जाती है । लेकिन सवाल सियासत का नहीं सवाल नहीं । सवाल सरकारो के फेल पास का नहीं । बल्कि सवाल हालातो पर नियंत्रण को लेकर किसी नीति के ना होने का है । और असर इसी का है कि 2014 में 1091 नक्सली घटनाओ में 310 मौते हुई । तो 2015 में 1088 नक्सली घटनाओ में 226 मौते हुई । जबकि सरकार के ही आंकडे बताते है कि मौजूदा वक्त में 10 से 15 हजार नक्सली है और डेढ़ लाख से ज्यादा सुरक्षा बल तैनात है । यानी एक नक्सली पर 10 सुरक्षाकर्मी । और सुरक्षाकर्मियो की तैनाती का आलम ये है कि सीआरपीएफ की 85 बटालियन , बीएसएफ की 15 बटालियन, आईटीबीपी और एसएसबी की पांच -पांच बटालियन नक्सलप्रभावित क्षेत्रो में है । तो सवाल यही कि क्या सुरक्षाकरमियो के आसरे ही सामाजिक-आर्थिक हालातो से राजनीति मुंह चुरा रही है । या फिर राजनीतिक चुनावो के अंतविरोधो की वजह से सरकारे कोई ठोस नीति बना नहीं पा रही है । या फिर नीतिया बनाकर भी अमल में ला नहीं पा रही है । और संसद में बार बार यही सवाल कश्मीर को लेकर भी उठा कि समाधान का रास्ता तो राजनीतिक तौर पर ही निकलना होगा । अन्यथा घायलों की बढती तादाद और मौत की बढती संख्या को ही हमेशा गिनना पडेगा ।