Thursday, April 17, 2014

आजादी के बाद मुसलमानों की अग्नि-परीक्षा !

1952 में मौलाना अब्दुल कलाम आजाद को जब नेहरु ने रामपुर से चुनाव लड़ने को कहा तो अब्दुल कलाम ने नेहरु से यही सवाल किया था कि उन्हें मुस्लिम बहुल रामपुर से चुनाव नहीं लड़ना चाहिये। क्योंकि वह हिन्दुस्तान के पक्ष में हैं और रामपुर से चुनाव लड़ने पर लोग यही समझेंगे कि वह हिन्दुस्तान में पाकिस्तान नहीं जाने वाले मुसलमानों के नुमाइन्दे भर हैं। लेकिन नेहरु माने नहीं। वह आजादी के बाद पहला चुनाव था और उस वक्त कुल 17 करोड़ वोटर देश में थे। संयोग देखिये 2014 के चुनाव के वक्त देश में 17 करोड़ मुसलमान वोटर हो चुके हैं। लेकिन 1952 में देश के मुसलमानों को साबित करना था कि वह नेहरु के साथ हैं। और 2014 में जो हालात बन रहे हैं, उसमें पहली बार खुले तौर पर मुस्लिम धर्म गुरु से लेकर शाही इमाम और देवबंद से जुड़े मौलाना भी यह कहने में हिचक नहीं रहे कि पीएम पद के लिये दौड़ रहे नरेन्द्र मोदी से उन्हें डर लगता है या फिर मोदी पीएम बने तो फिरकापरस्त ताकतें हावी हो जायेंगी।

तो क्या आजादी के बाद पहली बार देश का मुस्लिम समाज खौफजदा है। या फिर पहली बार भारतीय समाज में इतनी मोटी लकीर नरेन्द्र मोदी के नाम पर खींची जा चुकी है जहां चुनाव लोकतंत्र से इतर सत्ता का ऐसा प्रतीक बन चुका है, जहां जीतना पीएम की कुर्सी को है और हारना देश को है। यानी जितनी बड़ी तादाद में देश की जनता अपने नुमाइन्दो को चुनकर संसद में भेजती उसी प्रकिया पर सवालिया निशान लग रहा है। क्योंकि दुनिया के सबसे बडे लोकतांत्रिक देश में अगर वाकई मुस्लिम समाज सिर्फ मोदी के खिलाफ एकजुट है और यही एकजुटता जातीय समीकरण को तोड़ हिन्दु वोटरों का ध्रुवीकरण कर रहा है तो 2014 के चुनाव का नतीजा कुछ भी हो देश का रास्ता तो लोकतंत्र से इतर जा रहा है इसे नकारा कैसे जा सकता है।

वहीं बड़ा सवाल राष्ट्रीय राजनीतिक दल बीजेपी का भी है। जिसकी राजनीतिक सक्रियता संघ परिवार के आगे ठहर गई है क्योंकि पहली बार बीजेपी कार्यकर्ताओ को नही बल्कि सामाजिक सांस्कृतिक संगठन आरएसएस के स्वयंसेवकों को बूथ जीतो टारगेट दिया गया है। जिसके तहत देश के हर गांव ही नहीं हर बूथ स्तर तक पर स्वयंसेवकों की मौजूदगी है । हर राज्य में प्रांत प्रचारकों के पास एक ऑफ लाइन टैब । जिसमें उनके राज्य के हर संसदीय क्षेत्र का ब्यौरा है। संसदीय क्षेत्र में आने वाले हर गांव की जानकारी है। हर बूथ स्तर के स्वयंसेवकों के पास इलेक्टोरल रॉल है। हर कार्यकर्ता के ऊपर 200 घरों की जिम्मेवारी है। हर घर के वोटरों को बूथ तक लाने का जिम्मा का भी स्वयंसेवकों पर है। तो क्या पहली बार भारतीय राजनीति का चेहरा पूरी तरह बदल रहा है या फिर 2104 का चुनाव देश की तस्वीर संसद के अंदर बाहर पूरी तरह बदल देगा। क्योंकि मोदी जिस उड़ान पर है संघ परिवार की जो सक्रियता है। मुस्लिम समाज के नुमाइन्दो के जो उग्र तेवर हैं,उसमें क्या देश ने इससे पहले जो राजनीतिक गोलबंदी हिन्दुत्व या मंडल कमीशन के जरीये की वह टूट जायेगी। दलितों को लेकर जो नया ताकतवर वोट बैंक बना वह खत्म हो जायेगा।

ध्यान दें तो भारतीय समाज में उदारवादी अर्थव्यवस्था ने मध्यम वर्ग को विस्तार दिया और शहरीकरण ने गवर्नेंस से लेकर कल्याणकारी योजनायें और भ्रष्ट्राचार से लेकर विकास की अवधारणा को ही राजनीति मंत्र में मुद्दे की तर्ज पर बदल दिया। और पहली बार इन्हीं दो दायरे ने देश के भीतर एक ऐसे वोटबैंक को ताकतवर बनाकर खड़ा कर दिया, जहां पारंपरिक वोट बैक ही नहीं बल्कि वोट बैंक से जुडे मुद्दे हाशिये पर जाते हुये दिखायी देने लगे। दरअसल, मोदी इसी माहौल को अपना राजनीतिक हथियार बनाये हुये हैं। विकास को लेकर जो खाका नरेन्द्र मोदी गुजरात माडल के जरीये यूपी-बिहार या कहे समूचे देश में अपने मिशन 272 के तहत रख रहे हैं, वह अपने आप में नायाब है। क्योंकि बीते ढाई दशक में राजनीतिक तौर देश के हर विधानसभा या लोकसभा के चुनावी समीकरणों को देखें तो विकास का खाका बिजली पानी सड़क से आगे निकला नहीं है। कारपोरेट की सीधी पहल राजनीतिक तौर पर इससे पहले कभी हुई है। क्रोनी कैपटलिज्म यानी सरकार या मंत्रियो के साथ औघोगिक घरानो या कारपोरेट का जुडाव इससे पहले कभी खुले तौर उभरा नहीं । लेकिन मोदी ने मौजूदा दौर का राजनीतिककरण जिस तरह बीजेपी की ही राजनीति को बदल कर नये तरीके से रखने का प्रयास किया है, उसमें यह सवाल वाकई बड़ा हो चला है कि 2014 के चुनाव के बाद की राजनीति होगी कैसी। क्योंकि मायावती जिस दलित विस्तार के आसरे सत्ता तक पहुंचती रही या संसद में दखल देने की स्थिति में आयीं, वह मोदी की सियासत को लेकर अगर टूट रहा है तो यह अपने आप में 21वी सदी की सबसे बडा परिवर्तन होगा। क्योंकि अंबेडकर ने हिन्दुत्व व्यवस्था को माना नहीं। संघ की ब्राह्मण व्यवस्था को भी नहीं माना। सीधे कहें तो जातीय व्यवस्था के खिलाफ आंबेडकर सामाजिक बराबरी की व्यवस्था के प्रतीक बने। लेकिन नयी परिस्थिति में रामदास आठवले हो या रामविलास पासवान या रामराज यानी उदित राज। तीनों ही अंबेडकर की थ्योरी छोड संघ परिवार की उस व्यवस्था का साये तले आ खडे हुये, जहां मोदी के विकास की पोटली अंबेडकर के 1956 के धर्मपरिवर्तन से आगे मानी जा रही है। यह गोविन्दाचार्य के सोशल इंजिनियरिंग से भी आगे की सोशल इंजीनियरिंग है। क्योंकि गोविन्दाचार्य ने सोशल इंजीनियरिंग के जरीये मु्द्दों को पूरा करना सिखाया। चाहे कल्याण सिंह के जरीये बाबरी मस्जिद को ढहाना ही क्यो ना हो। लेकिन नरेन्द्र मोदी के दौर में बीजेपी की सोशल इंजीनियरिंग सत्ता पाकर हर मुद्दे को अपने अनुकूल परिभाषित करते हुये पूरा करने की सोच है। तो क्या दलित के बाद मंडल आयोग की सिफारिशों से निकले क्षत्रपों की सत्ता भी 2014 के चुनाव में ध्वस्त हो जायेगी। क्योंकि दलित वोट बैंक की ताकत के बाद यादव और कुर्मी ऐसा वोट बैंक है जो एकमुश्त एकसाथ खड़ा रहता है। लेकिन मोदी के मुस्लिम प्रेम की थ्योरी उसे भी तोड़ेगी। और पहली बार कर्नाटक हो या तमिलनाडु या केरल वहा भी बीजेपी दस्तक देगी। यानी दक्षिण के जातीय समीकऱण भी टूटेंगे।

अगर चुनावी हवा का रुख ऐसा है तो इसके मायने मनमोहन सिंह सरकार से जोडने ही होंगे। क्योंकि बीते दस बरस की सत्ता के दौर का सच यह भी है कि पूंजी ने समाज को बाजार से जोड़कर जो विस्तार दिया, उसमें जीने के पुराने तरीके ना सिर्फ बदले बल्कि इसी दौर में 14 करोड़ वोटरों का एक ऐसा तबका भी खड़ा हो गया जिसके लिये नेहरु की मिश्रित अर्थव्यवस्था से लेकर लोहिया का समाजवाद मायने नहीं रखता। जो जेपी या वीपी के आंदोलन से भी वाकिफ नहीं हैं। जिसके लिये अयोध्या या मंडल भी मायने नहीं रखता। जिसके लिये खेती या औगोगिक उत्पादन पर टिकी अर्थव्यवस्था पर बहस भी मायने नहीं रखती। उसकी व्यवस्था में जीने के तौर तरीके बिना रोक टोक के होने चाहि्ये। उसे बाजार का उपभोक्ता बनना भी मंजूर है और सामाजिक ताने-बाने को तोडकर स्वच्छता पाना भी मंजूर है। ध्यान दें तो मनमोहन सिंह के दौर ने इस सोच को विस्तार दिया है और पहली बार मुद्दो को लेकर शहर या ग्रमिण क्षेत्र के विचार भी एक सरीखे होने की राह पर है। यानी 20 से 30 करोड़ के उस भारत के हाथ में दुनिया के सबसे बडे लोकतांत्रिक देश को सौपा जा चुका है जो समूचे देश को साथ लेकर चलने या जिन्दगी बांट कर चलने को तैयार नहीं है। और वोटरों की फेहहिस्त में भी किस तबके के भरोसे सत्ता तक कितनी कम तादाद में भी पहुचा जा सकता है इसका गणित भी पहली बार उसी लोकतंत्र पर हावी हो चला है जो यह मान कर चल रहा था कि संसद में हर तबके की नुमाइन्दगी इसी से हो सकती है कि हर वर्ग, हर तबके, हर समुदाय का अपना नुमाइन्दा हो। तो 2009 में महज साढे ग्यारह करोड वोट लेकर कांग्रेस सत्ता में पहुंची। और 2014 में इतने ही नये वोटर बढ़ चुके हैं। यानी पुराने भारत को ताक पर रख नये भारत को बनाने का सपना मौजूदा चुनाव का प्रतीक बन चुका है, क्योंकि सवा सौ करोड का देश बराबरी की मांग कर चल नहीं सकता। यह नेहरु से लेकर मनमोहन सिंह की असफलता का कच्चा-चिट्ठा है। तो आज मुस्लिम तबका दांव पर है कल कोई दूसरा होगा। यही 2014 के चुनाव का नया मिजाज है।

Monday, April 14, 2014

मोदी का मिशन बनाम संघ का टारगेट

मोदी को पीएम की कुर्सी चाहे 272 में मिलती हो लेकिन संघ का टारगेट 395 सीटों का है। संघ के इस टारगेट का ही असर है कि अगले एक महीने में मोदी के पांव जमीन पर तभी पडेंगे, जब उन्हें रैली को संबोधित करना होगा। यानी हर दिन औसतन चार से पांच रैली। और यह तेजी मोदी के रैली में इसलिये लायी जा रही है क्योंकि मोदी के पांव जिस भी लोकसभा सीट पर पड़ते हैं, उस क्षेत्र में संघ के स्वयंसेवकों में उत्साह भी आ जाता है और क्षेत्र में लोग संघ परिवार के साथ संबंध बनाने से भी नहीं चूक रहे। स्वयंसेवकों के लिये टारगेट का नाम बूथ जीतो रखा गया है। इसके तहत कम से कम 395 सीटों पर बीजेपी पूरा जोर लगाएगी। 100 से ज्यादा सीटें ऐसी, जिस पर जीत पक्की। 120-130 सीटें ऐसी, जिन पर थोड़ी मेहनत से ही जीत तो पक्की। यूपी, बिहार, झारखंड, उत्तराखंड से कम से कम 90 सीटें जीतने का टारगेट। लेकिन पहली बार सवाल सिर्फ पीएम की कुर्सी को लेकर टारगेट का नहीं है बल्कि देशभर में आरएसएस अपने स्वयंसेवकों की संख्या कैसे दुगुनी कर सकती है, नजरें इस पर भी हैं और इसीलिये समूचे संघ परिवार के लिये 2014 का चुनाव उसके अपने विस्तार के लिये इतना महत्वपूर्ण हो चला है और यह मोदी के मिशन 272 पर भी भारी है।

क्योंकि संघ के स्वयंसेवक पहली बार चुनाव में मोदी के लिये वोटरों को घरों से निकालने के नाम पर देश के हर गांव में जा पहुंचे हैं। लोगों से जुड़ाव राजनीतिक तौर पर नरेन्द्र मोदी का नाम लेकर है लेकिन आरएसएस के साथ जुड़कर कौन कैसे कितना सहयोग कर सकता है स्वयंसेवकों का समूचा काम इसी पर जा टिका है। असर इसी का है कि हर सुबह हर गांव में संघ का कैप लगने लगा है। चर्चा वर्तमान राजनीतिक माहौल से होते हुये मोदी पर केन्द्रित हो रही है। और संघ के कार्यकर्ताओं की तादाद में लगातार वृद्दि हो रही है। असर इसी का है कि मोदी की रैली ज्यादा से ज्यादा हो संघ का दबाब भी बीजेपी पर है और बीजेपी को भी लगने लगा है कि मोदी की पहुंच जितनी ज्यादा जगहों पर होगी उसे चुनावी जीत उतनी ही ज्यादा जगहों पर मिलेगी। तो रैली के जरीये हर जगह पहुंचा नहीं जा सकता है तो इसके लिये अब तकनीक का आसरा भी बडे स्तर पर लेने की तैयारी है। अगले 30 दिन में दर्जन भर थ्री डी तकनीक के जरीये विजय संकल्प रैली की जायेगी। जिससे 11 मई तक देश के 395 सीटों को मोदी अपनी रैली से तो छू ही लें। लेकिन यहीं से पहली बार नया सवाल खड़ा हो रहा है कि क्या मोदी पीएम पद के उम्मीदवार के तौर पर संघ परिवार को ही विस्तार दे रहे हैं। या फिर संघ के विस्तार के साथ ही मोदी का मिशन 272 भी पूरा होगा। असल में यह दोनो मिशन 2014 के चुनाव को लेकर जिस तरह घुल-मिल गये हैं, उसमें मोदी के पीछे संघ परिवार है या संघ परिवार के लिये मोदी है। इसी का लाभ मोदी को मिल रहा है। जिसके दायरे में बीजेपी के पुराने कद्दावर नेताओं का कद भी छोटा हो गया है और आडवाणी तक को कहना पड रहा है कि पार्टी उन्हें जो काम देगी उन्हें मंजूर है। और पार्टी का मतलब ही जब मोदी हो चला हो और पार्टी से बड़ा मोदी को बनाने में वहीं आरएसएस हो जो अक्सर सामूहिकता पर जोर देता रहा हो तो संकेत साफ है कि यह अपनी तरह का पहला चुनाव है जब आरएसएस चुनाव के जरीये संघ परिवार का सबसे बडा विस्तार देख रहा है।

बीजेपी यह मान कर चल रही है कि मोदी की लोकप्रियता मोदी की हर रैली से देश भर में बढ भी रही है और जीत भी दर्ज करा देगी। लेकिन इसे अंजाम तक पहुंचाने के लिये बीजेपी चाहे लोकसभा के मैदान में कमजोर हो लेकिन आरएसएस ने कैसे कमर कस ली है यह भी अपने आप में नायाब है। क्योंकि संघ के कार्यकर्ताओं के टारगेट 'बूथ जीतो के तहत ही देश के हर गांव में स्वयंसेवकों की मौजूदगी पक्की की गयी है। जहां तक संभव हो हर बूथ स्तर तक पर संघ के स्वयंसेवकों की मौजूदगी होनी चाहिये। इसे आरएसएस ने अपनी तरफ से पक्का किया है। वहीं हर राज्य में प्रांत प्रचारकों को एक एक ऑफ लाइन टैब दिया गए हैं, जिसमें उनके राज्य के हर संसदीय क्षेत्र का ब्यौरा भी है और हर गांव की जानकारी भी है। यानी स्वयंसेवकों को पता रहे कि इस बार टारगेट चुनाव में जीत का भी है। इतना ही नहीं हर बूथ स्तर के आरएसएस कार्यकर्ताओं को इलेक्टोरल रॉल पहुंचाए गए हैं। हर स्वयंसेवक के ऊपर 200 घरों की जिम्मेवारी है और उन्हे न सिर्फ इन घरों से संपर्क में रहना है बल्कि उन्हें घऱ से बूथों तक लाने का काम भी करना है। साथ ही प्रोफेशनलों और देश के कोने कोने में मौजूद संघ के संवाद केन्द्रों से फीड बैक भी लगातार जमा किए जा रहे हैं। जिनके जरीये बीजेपी के उम्मीदवारों को बताया जा रहा है कि उन्हे अपने क्षेत्रो में कैसी चुनावी रणनीति बनानी है। यानी बीजेपी से कही ज्यादा सक्रिय आरएसएस है। जो चुनाव को लेकर संघ के एक ऐसे विस्तार को अंजाम देने में लगी है जिसका आधार राजनीति है। यानी अभी तक संघ जिन सामाजिक-आर्थिक मुद्दों को लेकर राजनीतिक मंथन पर जोर देता था। पहली बार वहीं संघ राजनीतिक मंथन खुद कर सामाजिक आर्थिक परिस्थितियों को बदलने का स्टांप पेपर नरेन्द्र मोदी को थमा रहा है। और मोदी विकास का जो खाका खींच रहे हैं, उसके दायरे में संघ परिवार के तमाम सदस्य खारिज हो रहे हैं। स्वदेशी जागरण मंच से इतर कारपोरेट की धड़कन मोदी के साथ जुडी है। आरएसएस की सहयोगी किसान संघ की सोच से इतर से इतर खेती का आधुनिकीकरण बीजेपी के घोषणापत्र का हिस्सा है। भारतीय मजदूर संघ की कोई जरुरत मोदी के विकास मॉडल में नहीं है। देवालय से पहले शौचालय की थ्योरी तले विश्व हिन्दू परिषद का मंदिर राग पहले ही बंद हो चुका है। यानी संघ अपने विस्तार के लिये मोदी को किसी भी हद तक अधिकार देने को तैयार है और मोदी पीएम की कुर्सी तक पहुंचने के लिये संघ की ही सोच को हर हद तक दफन करने को तैयार है।

Wednesday, April 9, 2014

सर्किट हाऊस के कमरा नं 1 ए से 7 रेसकोर्स की दौड़ तक

2002 का "अछूत" 2014 में "पारस" कैसे बन गया ?

नरेन्द्र मोदी ने 6 अक्टूबर 2001 में जब सीएम की कुर्सी संभाली उस वक्त मोदी ने सोचा भी नही था कि जिस सीएम की कुर्सी पर बने रहने के लिये उन्हें विधानसभा की सीट देने के लिये कोई तैयार नहीं है, वही सीएम की कुर्सी 12 बरस बाद उन्हें पीएम की कुर्सी का दावेदार बना देगी। केशुभाई को गद्दी से उतारकर सीएम बने मोदी पहला चुनाव एलिसब्रिज से लड़ना चाहते थे। अहमदाबाद के दिल में बसा एलिसब्रिज ऐसी सीट थी, जो शहरी मिजाज लिये बीजेपी के पक्ष में थी। तो मोदी सेफ सीट सोच कर ही एलिसब्रिज से लड़ना चाहते थे। लेकिन हरेन पांडया ने एलिसब्रिज सीट छोड़ने से इंकार कर दिया। सीट की खोज में नरेन्द्र मोदी ने राजकोट का रास्ता पकड़ा। सोचा पटेल वोट या कहें केशुभाई के गढ़ में उन्हें मदद मिलेगी। राजकोट-2 की सीट वजूभाई वाला ने मोदी के लिये खाली कर दी। सौराष्ट्र के दिल में बसे राजकोट में मोदी ने भी चुनावी वादे पारंपरिक तौर पर ही किये। पानी की सप्लाई महीने में सिर्फ 4 दिन होती थी तो मोदी ने वादा किये कि वह महिने में 22 दिन पानी सप्लाई करवायेंगे। नर्मदा का पानी भी राजकोट तक पहुंचाने का वादा किया। 24 फरवरी 2002 को चुनाव परिणाम आये तो मोदी 14 हजार वोट से चुनाव जीते जरुर थे। लेकिन वजुभाई की तुलना में जीत आधी हो गई थी। और तो और राजकोट के साथ दो अन्य सीटो पर भी उपचुनाव हुये। लेकिन दोनों सीट कांग्रेस ने जीत ली। और मोदी की जीत के बावजूद यह माना जाने लगा कि मोदी के दिन इने-गिने हैं । क्योंकि 2003 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी की सत्ता खत्म होगी और कांग्रेस की वापसी होगी।

लेकिन सिर्फ तीन दिन बाद ही मोदी की दुनिया ही बदल जायेगी य़ह किसी ने नहीं सोचा था। लेकिन हुआ यही और 27 फरवरी को साबरमती एक्सप्रेस के कोच एस-6 को जिस तरह गोधरा में आग के हवाले कर दिया गया और 59 कारसेवक जिन्दा जल गये। उसके अगले दिन से ही गुजरात की तस्वीर बदल गयी। गुजरात देश के केन्द्र में आ गया। 28 फरवरी 2002 की सुबह दिल्ली में वाजपेयी सरकार बजट पेश करने की तैयारी में जुटी थी। और दिल्ली में संघ हेडक्वार्टर झंडेवालान में आरएसएस के सरसंघचालक कुप्प सी सुदर्शन लगातार संघ की गुजरात शाखा से संपर्क में थे। 11 बजे संसद में वाजपेयी सरकार ने बजट रखा ही था कि चंद मिनटों बाद ही संघ के हेडक्वार्टर से गोधरा कांड की आलोचना करते हुये कारसेवकों की हत्या का बदला लेने के संकेत देने वाली प्रेस विज्ञप्ति संघ के प्रवक्ता एमजी वैघ ने जारी कर दी। देखते देखते बजट के बोल न्यूज चैनलो पर पीछे छूट गये और गुजरात की आग न्यूज चैनलों के स्क्रीन पर रेंगने लगी। अहमदाबाद की सड़कों पर विश्व हिन्दू परिषद भगवा लगराते हुये पहुंचने लगे थे। धीरे धीरे अजब सा तनाव पूरे वातावरण में घुलने लगा था। सच यह भी है कि 27 फरवरी को गोधरा की घटना के सामने आने के बावजूद गुजरात का उच्च तबका जो आज मोदी के साथ खड़ा है, वो 27 की रात अहमदाबाद के कर्णावती क्लब में जगजीत सिंह की गजल गायकी में खोया हुआ था। लेकिन 28 परवरी के बाद से गुजरात का नजारा जो बदला उसने नरेन्द्र  मोदी की सत्ता को एक ऐसी प्रयोगशाला में बदला, जहां हिन्दुत्व का बोलबाला था। संघ परिवार का गुस्सा था। क्रिया की प्रतिक्रिया का खुल्लम खुल्ला एलान था। कोई रोकने वाला नहीं था। बतौर प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के राजधर्म का पाठ भी संघ के दबाब में भोथरा साबित हो गया। और मोदी चाहे अनचाहे बीजेपी से लेकर संघ परिवार के केंन्द्र में आ खड़े हुये। जहां उन्हें चाहने वाले थे या मोदी के जरीये सियासत साधने वाले और दूसरे तरफ मोदी को नापसंद करने वाले।

ध्यान दें तो मोदी 2002 में बीजेपी से लेकर संघपरिवार की बिसात पर प्यादे से ज्यादा कुछ नहीं थे। और वाकई अहमदाबाद से 30 किलोमीटर दूर गांधीनगर के सर्किट हाऊस के कमरा नं 1ए में रहने के दौरान नरेन्द्र मोदी को इसका एहसास तक नहीं थी कि जो गुजरात में हो रहा है, वह हालात 12 बरस बाद उन्हें दिल्ली के 7 रेसकोर्स की दौड़ में शामिल कर देंगे। मोदी 4 अक्टूबर को 2001 में जब गुजरात पहुंचे थे तब गांधीनगर के सर्किट हाऊस के कमरा नं 1 को ही अपना घर बनाया। उसके बाद राजकोट से पहला चुनाव लड़ने पहुंचे तो भी सर्किट हाउस का कमरा नं 1 को ही अपनी रिहाइश बनाया। उस वक्त बीजेपी के दिल्ली में बैठे कद्दवर नेता हों या नागपुर में संघ परिवार के वरिष्ठ स्वयंसेवक। विहिप के नेता हो या स्वदेशी जागरण मंच के कार्यकर्ता, हर कोई मोदी के साथ था या मोदी के पीछे। लेकिन बीते बारह बरस में मोदी के राजनीतिक प्रयोग ने उन्हें जिस तरह 7 रेसकोर्स की दौड़ में लाकर खड़ा कर दिया, उसने मोदी को चाहे सर्किट हाऊस के कमरा नं 1से दूर कर दिया लेकिन मोदी नं 1 बनकर 7 रेसकोर्स की दौड में अकेले हो गये। वडोदरा से बतौर पीएम पद के उम्मीदवार के तौर पर लोकसभा चुनाव के लिये पर्चा भरते मोदी के साथ ना तो कोई बीजेपी का कद्दावर नेता नजर आया। ना ही बीजेपी की विचारधारा। ना ही संघ की सोच। ना ही विहिप की गूंज। सिर्फ मैं ही मैं की सोच से अभिभूत मोदी ने जो काम बतौर सीएम नहीं किया, वह सारे काम पीएम पद के उम्मीदवार बनते ही शुरु कर दिया। घासी जाति हो या चायवाला-पहली बार खुली गूंज पीएम पद के लिये किसी योद्दा की तर्ज पर लड़ते मोदी ने ही किया। बीजेपी को नहीं सीधे वोट मुझे ही मिलेगा यानी कोई उम्मीदवार, कोई पार्टी मायने नहीं रखती, यह गूंज भी मोदी की ही है। संघ के ब्राह्मणवादी सोच में सोशल इंजिनियरिंग भी मोदी ने ही फिट करके बताया कि मिशन 272 का मतलब होता क्या है। 2009 के चुनावी घोषणा पत्र की शुरुआत ही राममंदिर से हुई थी लेकिन 2014 के घोषणापत्र का अंत रामजन्मभूमि पर राममंदिर के साथ हुआ । प्राथमिकताएं मोदी ने ही बदलीं। गुजरात के 6 करोड़ गुजरातियों से आगे सवा सौ करोड़ भारतियों का सवाल अब उठाना है तो वडोदरा से आगे बनारस से चुनाव लड़ने का फैसला भी मोदी ने ही किया। और इसी रास्ते ने पहली भारतीय राजनीति को एक ऐसा नेता दे दिया जिसे 2002 में अछूत समझा जाता था और 2014 में पारस समझा जा रहा है। यानी जो हर हर मोदी कह चुनाव लड़ेगा उसे घर घर मोदी के नाम के वोट भी मिल जायेंगे। लेकिन 7 रेसकोर्स की दौड में निकले मोदी को अभी इंतजार करना पड़ेगा, क्योंकि बनारस में में हर कोई कहता है, जल में कुभ्भ कुभ्भ में जल है, बाहर भीतर पानी / फूटा कुभ्भ जलहिं समाना, यह तत कथ्यौ ज्ञानी।

Tuesday, April 8, 2014

खामोश वोटरों से ना पूछे वोट किसे देंगे ?

मुज़फ्फरनगर दंगों के साए में 10 अप्रैल का इंतज़ार

अगर दिल्ली का रास्ता यूपी से होकर निकलता है तो पहली बार यूपी का रास्ता मुजफ्फरनगर दंगों से होकर निकल रहा है। यूपी की कुल अस्सी लोकसभा सीट पर मुकाबला तीन या चार कोणीय है। लेकिन मुजफ्फरनगर दंगों के बाद और नरेन्द्र मोदी के पीएम उम्मीदवार होने के बाद हर सीट पर मुकाबला आमने सामने का हो यह और कोई नहीं यूपी का मुसलमान चाह रहा है। सवाल तीन हैं। क्या मुस्लिमों की यह सोच बीजेपी को लाभ पहुंचायेगी। क्या यूपी में जातीय समीकरण टूट जायेंगे। क्या मुस्लिम बीजेपी को रोकने के लिये दूसरे हर दल के उम्मीदवार को मौलाना मान कर वोट देगा। यह ऐसे तीखे सवाल हैं, जो मुजफ्फरनगर से लेकर बनारस की गलियों तक में गूंज रहे हैं। बीजेपी को लाभ यानी मोदी का नाम लेकर अमित शाह के बदला लेने की थ्योरी का मतलब है क्या। यह दिल्ली की सीमा पार करते ही मेरठ से लेकर सहारनपुर के बीच बेहद खामोशी से रेंगती है। यानी वह दस सीटें, जहां दस अप्रैल को वोट पड़ने हैं, उसके समीकरण बेहद तीखे और सीधे हैं। पूरा इलाके के साठ फीसदी लोग गन्ने की खेती से जुड़े हैं। यानी गुड से लेकर चीनी और शराब बनाने तक के लिये गन्ने के इस्तेमाल जहा भी जिस तरह होता है, उसमें धर्म मायने नहीं रखता। पेट की भूख या कहे रोजगार हर किसी को साथ जोड़कर काम कराता रहा है। लेकिन मुजफ्फरनगर दंगों के बाद पहली बार सामाजिक आर्थिक ताना बाना टूटा तो चुनाव की दस्तक ने इस टूटे हुये ताने बाने के बीच की लकीर को जिस उम्मीद में और चौडा कर दिया कि वोट देकर न्याय का सुकून तो पा सकते हैं। जाट-गुर्जर और मुसलमान ही यहां टकराये। गुर्जर कम और जाट ज्यादा। दूसरी तरफ मुसलमान। मुसलमान ने अपने राजनीतिक रहनुमा के तौर पर पारपरिक तौर पर कांग्रेस को देखा। अयोध्या कांड से समाज दरकाया तो मुलायम पहले मौलाना बने और कांग्रेस से मुसलमान छिटका। लेकिन यादवों की भीड़ में मुसलमान मौलाना मुलायम की चौखट पर ही तमाशा बना तो उसे मायावती अच्छी लगी। दलित वोट के साथ जैसे ही मुसलमान खड़ा हुआ मायावती को यूपी की गद्दी मिल गयी। पश्चिमी यूपी ही नही बल्कि समूचे यूपी में बीते बीस बरस का सच यही रहा कि मुसलमान सामाजिक सुकून,आश्रय, और आर्थिक सौदेबाजी में भटकता रहा। इस दरवाजे से उस दरवाजे और उस दरवाजे से इस दरवाजे। हालात यह बन गये कि जातीय समीकरण में जैसे ही मुस्लिम जिस तरफ सरका उसे जीत मिल गयी। लेकिन पहली बार मुस्लिम समाज उस न्याय को खोज रहा है जहां उसे दंगों के दौरान धोखा मिला। दंगों के बाद सियासी रंग ने डराया और अब वही चुनावी समीकरण उसके घाव को हरा कर रहे हैं, जिसे कभी वह सुकून के तौर पर देखता था। तो बीजेपी के पक्ष में मुसलमान अगर जाने को तैयार नहीं है तो वह करेगा क्या और बीजेपी के बोल अमित शाह ही तय करेंगे तो फिर चुनावी जीत-हार का रास्ता बनता किसके लिये है।

यह सवाल समूचे यूपी में बड़ा होता जा रहा है। यूपी की 28 लोकसभा सीट ऐसी हैं, जहां 20 फिसदी से ज्यादा मुसलिम वोटर हैं। यानी इन 28 सीटों पर दलित या यादव के साथ मुसलिम वोटर हो लिया तो बीजेपी की हार तय है। लेकिन इन्हीं 28 सीटो में से 19 सीट ऐसी भी है सहा जातिय समीकरण टूटे यानी दलित,ठाकुर,पटेल और ओबीसी बीडेपी की पक्ष में एकजुट होकर टूटे तो मुस्लिम वोट बैंक भी कुछ नहीं कर पायेगा। तो पहली बार यूपी में मुस्लिम चाह रहे हैं कि जातीय समीकरण बने रहें,जिससे वह अपने वोट के जरिए निर्णायक हालात बना दें कि कौन जीतेगा कौन हारेगा। लेकिन टूसरी परिस्थिति कहीं ज्यादा दिलचस्प हो चली है। कांग्रेस और आरएलडी यानी अजित सिंह के साथ चुनाव मैदान में है तो जाट वोट जो अजित सिंह की बपौती माना जाता रहा है, उसमें मुजफ्फरनगर दंगों के हालात सेंध लगा रहे हैं। जाट वोटरों को लगने लगा है कि मुस्लिमों के अनुकूल हालात अगर चुनाव के बाद बने तो फिर मुस्लिम दंगों का बदला लेने से नहीं चूकेंगे। और चूंकि पश्चिमी यूपी में खेत खलिहान के मालिक जाट हैं, जिस पर रोजगार के लिये मुसिलम काम करते रहे हैं तो उस पर भी आंच आ सकती है। यानी चुनाव में वोट किसे दें या किसे ना दें यह उस पारंपरिक रोजगार यानी रोजी रोटी से जा जुड़ा है, जहां चुनाव ने इससे पहले कभी सेंध लगायी नहीं थी। जाट वोटर को बीजेपी में दम दिखायी दे रहा है क्योंकि मुस्लिमों के लिये बीजेपी या कहे मोदी खलनायक के तौर पर है। तो दंगा के हालात पहली बार उस जातीय समीकरण को तोड़ रहे हैं, जिसे मुसलिम पहली बार बरकरार रखना चाहता है। बीजेपी इस हालात से खुश है क्योंकि उसे वाजपेयी सरकार के दौर से ठीक पहली अयोध्या कांड के आसरे बनी राजनीतिक जमीन का वो चेहरा याद आ रहा है जब 55 से ज्यादा सीटो पर बीजेपी जीती थी। बीजेपी का अपना गणित फिर उन्हीं हालात को देख रहा है। लेकिन पहली बार बीजेपी का गणित धर्म के आसरे समाज को बांटने के बदले दंगों से उपजे आक्रोश को अपने हक में करने की राजनीति को हवा दे रहा है। ऐसे में मुस्लिम समाज वोट बैंक में तब्दील होकर भी अपने आप में अभी अकेला है। और उसे चुनावी समर में अपना कोई नायक दिखायी दे नहीं रहा है। कांग्रेस फिसलन पर है। मौलाना मुलायम को यादवों की फ्रिक ज्यादा है और यूपी में छोटे बड़े सौ से ज्यादा दंगे समाजवादी पार्टी की सरकार के दौरान हो चुके हैं, जिसमें चालीस जगहों पर यादव और मुसलमान ही टकराये और दोनो का ही दावा रहा कि सरकार उनकी है।

लेकिन मामला जब थानों में पहुंचा तो जमीन मुसलमानो को ही गंवानी पड़ी। क्योंकि हर थाने में थानेदार यादव ही हैं। यह हालात मायावती के प्रति राजनीतिक प्रेम मुसलिमों में जगाते जरुर हैं। लेकिन मायावती का संकट पहली बार बीजेपी को लेकर नरेन्द्र मोदी के अपने जातीय समीकरण होना है। मोदी घासी जाति के हैं। यूपी के जातीय समिकरण में मोदी ओबीसी के बीच बैठते हैं। और जिस तरह कि सोशल इंजीनियरिंग इस बार मोदी के नाम से लेकर टिकटों के बंटवारे तक में बीजेपी में की है, उसने जातीय समीकरण की इस थ्योरी के मायने ही बदल दिये हैं, जो बीस बरस पहले मंडल-कमंडल की राजनीति से निकले थे। दलित और ओबीसी को पहली बार बीजेपी के भीतर से दिल्ली का लालकिला दिखायी देने लगा है । और इस हालात ने बीजेपी के बीतर ब्रह्ममणो को लेकर कुछ नये सवाल पैदा कर दिये है जो लखनउ ,कानपुर से लेकर बनारस और गोरखपुर तक में हेगामा खडा किये हुये है। ब्रह्मणों को लगने लगा है कि मोदी की अगुवाई बीजेपी को पिछडी जातियों के नये रहनुमा के तौर पर तो खड़ा नहीं कर देगी। फिर जिस तरह मुरली मनमोहर जोशी की सीट बदली गयी, लालजी टंडन को घर बैठाया गया । कलराज मिश्रा को भी पूर्वाटल के दरवाजे पर चुनाव लडने बेजा दिया गया । उससे ब्रह्मण नाखुश जरुर है । लेकिन बीजेपी हो या संघ परिवार या फिर मोदी सभी इस हकीकत से भी वाकिफ है कि ब्रह्ममणो के पास बीजेपी के अलावे कोई और विकल्प है नहीं। लेकिन बीजेपी के सामने मुश्किल यह है कि यूपी की दस सीट रामपुर,मोरादाबाद,बिजनौर,ज्योतिबा फुले नगर, सहारनपुर,मुजफ्फरनगर, बलरामपुर,बहराइच,बरेली और मेऱठ में तीस फीसदी से ज्यादा मुसलमान हैं और इन दस सीटों से लगी 22 सीटों पर मुसलिम समाज का ताना-बाना हिन्दुओं से वैसे ही जुड़ा है, जिसका जिक्र बनारस की गलियों में गंगा-जमुनी तहजीब को लेकर होता है। बावजूद इसके इन सीटों पर अभी तक बीजेपी नेताओं के कुल 18 रैलियों में विकास से ज्यादा स्वाभिमान और हिन्दुत्व वाद की थ्योरी को ही परोसा गया। चूंकि बीजेपी हर मायने में सबसे आगे चल रही है और मोदी खुले तौपर पीएम के उम्मीदवार से आगे निकल कर बतौर पीएम ही अपने वक्तव्यों को रख रहे हैं तो पहली बार बीजेपी रैलियो में कह रही है। या कहें जिस तरह खुद को रख रही है वही सच भी है और चुनावी तिकडमों में उसे बदलने वाले हालात भी इसबार उसके साथ नहीं हैं। तो ऐसे हालात की नयी गूंज आजमगढ़ से लेकर बनारस की गलियो में सुनायी देने लगी है। आजमगढ एकदम बनारस से लगा हुआ है औक बनारस में मोदी है तो आजमगढ में मुलायम सिंह यादव।

सामान्य तौर पर यह समीकरण दोनों को एक दूसरे के खिलाफ खड़ा करता है। लेकिन जिस तरह बनारस में मुलायम की घेराबंदी मुस्लिम कर रहे हैं और पहली बार उलेमा के उम्मीदवार के पक्ष में अपना दल भी खड़ा हो गया है और बीएसपी को भी संदेस भेजा जा रहा है कि मुलायम को हराने के लिये मुकाबला त्रिणोणीय न बनाये उसने बनारस को लेकर भी नये समीकरण बनाने शुरु कर दिये हैं। क्योंकि बनारस की गलियो में चाहे वह अस्सी घाट हो या गोधुलिया । हर जगह दो ही सवाल है । पहला नरेन्द्र मोदी पीएम पद के उम्मीदवार है तो बनारस का कायाकल्प मोदी कर सकते हैं। अगर वह चुनाव जीत जाये। और दूसरी आवाज धीमी है मगर सुनायी देने लगी है कि बनारस को ही यह मौका मिला है कि वह मोदी को संसद ना भेज गुजारात लौटा दें। जिससे बनारसी संस्कृति पर आंच ना आये। असर इसी का है कि मुलायम सिंह यादव अपने खिलाफ हर उम्मीदवार को टोह रहे हैं और बनारस में कांग्रेसी अजय राय को बीजेपी ने अभी से ही मोह लिया है। यह टोगना या मोहना सौदेबाजी की प्रतीक है। लेकिन सियासत की बिसात पर पहली बार पंडित और मौलाना दोनो समझने लगे हैं कि 2004 में जामा मसजिद के जिस शाही इमाम बुखारी ने बीजेपी के लिये अजान लगायी थी वही शाही इमाम बुखारी 2014 में अगर कांग्रेस के लिये अजान लगा रहे हैं तो यह सब बेमतलब है। और चुनावी जीत-हार के रास्ते को हर हाल में उन्हीं सामान्य वोटरों की अंगुलियो के निशान से गुजरना है, जिसने जीत हार के लिये बार बार अपनी ही उंगुलियो को घायल किया है। तो वोट किसे कौन देगा यह सवाल पूछते ही पहली बार यूपी में हर चेहरा दहशत के साथ ही खामोश हो जाता है। लेकिन चर्चा कीजिये तो सियासत की परते उघाड़कर अपने लहुलूहन पेट-पीठ को दिखाने से नहीं चूकता ।








Thursday, April 3, 2014

2014 के चुनावी लोकतंत्र में फर्जी वोटर का तंत्र

2014 के आम चुनाव में उतने ही नये युवा वोटर जुड़ गये हैं, जितने वोटरों ने देश के पहले आमचुनाव में वोट डाला था। यानी 1952 का हिन्दुस्तान बीते पांच बरस में वोट डालने के लिये खड़ा हो चुका है। 2014 में 2009 की तुलना में करीब साढ़े दस करोड नये वोटर वोट डालेंगे। और 1952 के आम चुनाव में कुल वोट ही 10 करोड 59 हजार पड़े थे। जाहिर है पहली नजर में लग सकता है कि दुनिया के सबसे बडे लोकतांत्रिक देश का विस्तार बीते छह दशक में कुछ इस तरह हुआ है, जिसमें आजादी के बाद छह नये हिन्दुस्तान समा गये हैं। क्योंकि 1952 में कुल वोटरों की तादाद महज 17 करोड 32 लाख 12 हजार 343 थी। वहीं 2014 में वोटरों की तादाद 81 करोड़ पार कर गयी है। जाहिर है इतने वोटरों के वोट से चुनी हुई कोई भी सरकार हो, उसे पांच बरस तक राज करने का मौका मिलता है और अपने राज में वह कोई भी निर्णय लेती है तो उसे सही माना जाता है। इतना ही नहीं सरकार अगर गलत निर्णय लेती है और विपक्ष विरोध करता है तो भी सरकार यह कहने से नहीं चूकती कि जनता ने उन्हें चुना है। अगर जनता को गलत लगेगा तो वह अगले चुनाव में बदल देगी। लोकतंत्र के इसी मिजाज को भारतीय संसदीय राजनीति की खूबसूरती मानी जाती है।

लेकिन लोकतंत्र के इसी मिजाज में अगर यह कहकर सेंध लगा दी जाये कि वोट डालने वाले लोग की बडी तादाद फर्जी होते हैं। या फिर जो पूरी मशक्कत चुनाव आयोग वोटर लिस्ट को तैयार करने में पांच बरस तक लगाता है उसी चुनाव आयोग के मातहत काम करने वाले बूथ लेवल अधिकारी  [ बीएलओ ] फर्जी वोटर कार्ड बनवाने से लेकर फर्जी वोट डाले कैसे जायें-इसके उपाय बताने में लग जाता है तो लोकतंत्र का अलोकतांत्रिक चेहरा ही सामने आयेगा। नियम के मुताबिक देखें तो किसी भी वोटर के लिये वोटर आईकार्ड बनवाने के लिये पहचान पत्र और निवास का पता जरुर चाहिये। लेकिन दिल्ली-एनसीआर[ नोएडा, गाजियाबाद, गुडगांव, फरीदाबाद] में राष्ट्रीय न्यूज चैनल आजतक के स्टिंग आपरेशन के जरीये जो तथ्य उभरे उसने लोकतंत्र के पर्व को ही दागदार दिखा दिया। चुनाव आयोग की माने तो फ्रि और फेयर चुनाव के लिये वोटर लिस्ट का सही होना सबसे जरुरी है। और इसमें सबसे बडी भूमिका बीएलओ यानी बूथ लेबव अधिकारी की ही होती है । जिसके हिस्से में में एक या दो पोलिग बूथ आते हैं। और बीएलओ चूकि स्थानीय सरकारी कर्मचारी होता है तो वोटर लिस्ट तैयार करने में उसे इलाके के लोगों का फ्रेंड, फिलास्फर और गाईड माना जाता है । लेकिन यही बीएलओ अगर रुपये लेकर फर्जी वोटर कार्ड बनाने में जुट जाये। फर्जी वोट डालने वालो को बताने लगे कि कैसे वोट डालने के बाद्गुली पर लगी स्यायी को कैसे मिटाया जा सकता है। नीबू या पपीते के दूध से। या फिर जिस कैमिकल से मिटाया जा सकता है, वह कहां मिलता है तो पहली सवाल यह उठ सकता है कि यह तो कमोवेश हर क्षेत्र में होता है लेकिन इसके जरीये चुनावी लोकतंत्र पर कैसे अंगुली उठायी जाये ।

तो यहां से एक दूसरी परिस्थितियां सामने आये कि दिल्ली के गांधीनगर इलाके में बने वोटर कार्ड के फार्म में निवास के पते पर बेघर लिखकर भी वोटर आईकार्ड बन जाता है। और 30 हजार से ज्यादा आईकार्ड ऐसे भी है जो एक ही व्यक्ति के नाम से दर्जन भर वोटर कार्ड बने हुये हैं। इतना ही नहीं थोक में फर्जी वोटर कार्ड बनाकर चुनाव के वक्त वोट डलवाने के ठेकेदार भी एन चुनाव के वक्त प्रत्याशियों के दरवाजे को खटखटाने को तैयार हैं। जो ज्यादा पैसा बहायेगा उसे वोट डलवाने की जिम्मेदारी भी यह ठेकेदार ले लेते हैं। और इन सबसे एक कदम और आगे वाली स्थिति यह है कि जिस प्राइवेट कंपनी को वोटर आईकार्ड लेमिनेशन का ठेका मिलता है वह भी वोटरों के सौदागरो से सीधे धंधा करने को तैयार है। यानी जितने वोटआईकार्ड चाहिये मिल जायेंगे । सिर्फ तस्वीरें देनी हैं। फर्जी वोटर की फर्जी तस्वीर कई एंगल से ले कर एक ही फर्जी वोटर के हवाले कई वोटर आईकोर्ड दिये जा सकते हैं। और चूंकि इस बार चुनाव भी नौ फेज में हो रहे हैं। यहां तक की बिहार और यूपी में तो अलग अलग क्षेत्रों में हर हफ्ते वोट डाले जायेंगे। तो अंगुली के निशान मिटाने का वक्त भी है और फर्जी वोट डालने के लिये राज्य से बाहर जाना ही नहीं है। मुश्किल यह नहीं है कि चुनाव आयोग इस पर रोक नहीं लगा सकता या राजनेता इससे परेशान हैं। और सवाल यह भी नहीं है कि देश भर में फर्जी वोटरों को लेकर देश का कोई भी आम वोटर अनभिज्ञ हो। लेकिन पहली बार 2014 के चुनाव में फर्जी वोटरों की तादाद को लेकर जो नयी परिस्तितियां सामने आयी हैं, वह डराने वाली हैं। क्योंकि 2009 की तुलना में 11 करोड़ नये वोटर इस बार वोट डालने के लिये तैयार है । और देश में सरकारे कितने वोट से बन जाती है यह 2009 की यूपीए सरकार को ही देख कर समझा जा सकता है । 2009 में कांग्रेस को सिर्फ साढ़े ग्यारह करोड़ वोट मिले थे। वही बीजेपी को साढ़े आठ करोड़ वोट मिले थे । देश के दर्जन भर क्षत्रपो में सवा करोड से ज्यादा वोट पाने वाला कोई नहीं था। अब जरा कल्पना किजिये कि जो ग्यारह करोड नये वोटर इस बार वोट डालने के लिये तैयार है उसमें कितनी फर्जी हो सकते है ।

अगर दिल्ली और एनसीआर को ही देश में बने वोटर आईकार्ड का आधार बनाया जाये तो मौजूदा वक्त में 25 फिसदी वोटर आईकार्ड फर्जी हो सकते है । दिल्ली के मतदाता जागरुक मंच के अध्यक्ष ओ पी कटारिया की माने तो फर्जी वोटरो की तादाद चालिस फिसदी तक हो सकती है । और मौजूदा हालात में चुने हुये नुमान्दे ही दुबारा भी चुने जाये इसके लिये शुरु से ही भिडे रहते है । यानी सरकार की नीतिया या किसी राजनेता की जनता के बीच कैसी भागेदारी है यह मायने नहीं रखता बल्कि कैसे फर्जी वोटर और फर्जी आईकार्ड की व्यवस्था हो जाये । इसी पर सारा श्रम लगता है । हरियाणा सरकार के मंत्री सुखबीर कटारिया के खिलाफ चुनाव आयोग की पहल ने दो सवाल पैदा कर दिये है । पहला अगर वोट की तादाद ही चुनाव में जीत हार तय करती है तो फिर फर्जी वोट के जुगाड के तरीके पैदा करना ही राजनेता का असल काम हो चला है । और दूसरा , चुनाव आयोग जिस जमीनी स्तर पर वोटर कार्ड के लिये निचले लेबल के दिकारियो को लगाता है उन्हे खरीदने से लेकर उपर तक के अधिकारी अगर मंत्रियो और पार्टियो के लिये काम करने लगे तो फिर चुनाव का मतलब होगा क्या। ये दोनों सवाल हरियाणा के मंत्री सुखबीर कटारिया के खिलाफ मामला दर्ज होने से उभरा है। क्योंकि बीएलओ हो या ईआरओ [ इलेक्ट्रोल रजिस्ट्रेशन आफिसर ] दोनों की भूमिका ही फर्जी वोटरआई कार्ड बनवाने में खुकर सामने आयी है। और दागी नेताओं की नयी भागेदारी फर्जी वोटर के जरीये चुनाव जीतने के भी सामने आये है । महत्वपूर्ण यह भी है कि फर्जी वोटर आईकार्ड की शिकायत पर चुनाव आयोग ने तेजी से काम भी किया है । और देश भर में फर्जी वोटर आईकार्ड को खारिज करने की तादाद भी बीते पांच बरस में एक करोड से ज्यादा की है । लेकिन नया सवाल यह उभरा है कि फर्जी वोटर की शिकायत के बाद जिन वोटरआई कार्ड को चुनाव आयोग ने खारिज करने का निर्देश दिया उसे रद्द करने भी वही अधिकारी काम पर लगे जो फर्जी कार्ड बनाने में लगे है । आम वोटरो की शिकायत जो इसी दौर में सामने आयी है वह भी चौकाने वाली है क्योंकि वोटर आईकार्ड होने के बावजूद सही वोटरों के नाम भी उनके अपने ही क्षेत्र से इसी दौर में गायब हो गया। वैसे एक सच यह भी है जमीनी स्तर पर या कहे पहले स्तर पर जिन बीएलओ को वोटर आईकार्ड बनवाने के लिये काम पर लगाया जाता है उन्गे एक बरस में तीन हजार रुपये मिलते हैं। और प्रति फोटो कार्ड के चार रुपये। अब जरा कल्पना कीजिये जिस लोकतंत्र के नाम पर देश में सरकारे बदलती है। या कहे सत्ता मिलने के बाद करोडों-अरबो के वारे न्यारे नीतियों के नाम पर होते हो वहां वोट खरीदने या फर्जी वोटर की कीमत कोई भी सत्ता में आने के लिये क्या कुछ नहीं करेगा। फिर मौजूदा वक्त में देश में जब राजनीतिक तौर पर भ्रष्टाचार मुद्दा हो। भ्रष्टाचार के दायरे में केन्द्रीय मंत्री से लेकर नौकरशाह और कारपोरेट से लेकर मीडिया का एक वर्ग भी आ रहा हो। तो सवाल यही है कि जिस चुनाव के जरीये देश में सत्ता बनती बिगडती हो जब उसी चुनावी तंत्र में घुन लग गयी हो तो उसे सुधारने का रास्ता होगा क्या। क्या सिर्फ चुनाव आयोग की कडाई से हालात सुधर जायेगें या फिर भ्रष्ट होते संस्थानों को कानूनी दायरे में कडाई बरतने भर से सुधार आ जायेगा । या कहे नेता सुधार जाये या सत्ता ईमानदार हो जाये तो हालात ठीक हो जायेंगे। दरअसल मुश्किल यही है कि देश में समूचा संघर्ष सत्ता पाने के लिये ही हो रही है और राजनीतिक सत्ता को ही हर व्यवस्था में सुधार का आधार माना जा रहा है ।

यानी समाज लोभी है और लोभी समाज को ठीक करने की जगह जब राजनीतिक सत्ता से ही समाज को हांकने का खेल खेला जा रहा हो तो फिर दुनिया के सबसे बडे लोकतांत्रिक देश के लोकतंत्र पर दाग लगने से बचायेगा कौन यह अभी तो अबूझ पहेली है । क्योकि देश तो 2014 के आम चुनाव में ही लोकतंत्र का पर्व मनाने निकल पड़ा है। जहां चुनाव आयोग 3500 करोड खर्च करेगा। और तमाम राजनीतिक दल 30,500 करोड़ । और यह कल्पना के परे है कि फर्जी वोटर के तंत्र पर कितना कौन खर्च कर रहा है या करेगा ।

Tuesday, April 1, 2014

जनादेश के जश्न से पहले कद्दावर नेताओं की तिकड़म


1977 में देश की सबसे कद्दावर नेता इंदिरा गांधी को राजनारायण ने जब हराया तो देश में पहली बार मैसेज यही गया कि जनता ने इंदिरा को हरा दिया। लेकिन राजनारायण उस वक्त शहीद होने के लिये इंदिरा गांधी के सामने खड़े नहीं हुये थे बल्कि इमरजेन्सी के बाद जनता के मिजाज को राजनारायण ने समझ लिया था। लेकिन इंदिरा उस वक्त भी जनता की नब्ज को पकड़ नहीं पायी थीं। और 52 हजार वोट से हार गयीं। राजनारायण 1971 में इंदिरा से हारे थे और 1977 में इंदिरा को हरा कर इतिहास लिखा था। लेकिन उसी रायबरेली में इस बार सोनिया गांधी के खिलाफ किसी कद्दावर नेता को कोई क्यों खड़ा नहीं कर रहा है यह बड़ा सवाल है। तो क्या 2014 के चुनाव में जनता की नब्ज को हर किसी ने पकड़ लिया है इसलिये कद्दावर नेताओ के खिलाफ कोई शहीद होने को तैयार नहीं है या फिर जिसने जनता की नब्ज पकड़ ली है वह कद्दावर के खिलाफ चुनाव मैदान में उतरने को तैयार है। यह सवाल पांच नेताओं को लेकर तो जरुर है। रायबरेली में सोनिया गांधी, बनारस में नरेन्द्र मोदी,लखनऊ में राजनाथ सिंह, आजमगढ़ में मुलायम सिंह यादव और अमेठी में राहुल गांधी ।

हर नेता का अपना कद है। अपनी पहचान है। लेकिन पहली बार इन पांच नेताओं के खिलाफ कौन सा राजनीतिक दल किसे मैदान में उतार रहा है हर किसी की नजर इसी पर है। यानी कद्दावर नेता के खिलाफ कद्दावर नेता चुनाव मैदान में उतरेंगे या कद्दावर के सामने कोई नेता शहीद होना नहीं चाहता इसलिये कद्दावर हमेसा कद्दावर ही नजर आता है। 2014 के चुनाव को लेकर यह सवाल बड़ा होते जा रहा है। राहुल गांधी के खिलाफ बीजेपी स्मृति इरानी को उतारा है। नरेन्द्र मोदी के खिलाफ कांग्रेस ने अभी तक किसी कद्दावर के नाम का एलान किया नहीं है। सोनिया गांधी के खिलाफ भी बीजेपी ने खामोशी बरती है। सपा ने तो उम्मीदवार ना उतारने का एलान इस खुशी से किया जैसे उसके सियासी समीकरण की पहली जीत हो गयी। राजनाथ के खिलाफ आम आदमी पार्टी ने जावेद जाफरी को उतारकर लखनवी परंपरा को ही बदल दिया है। मुलायम के खिलाफ कांग्रेस और बीजेपी अभी तक खामोश हैं।

तो क्या पहलीबार कद्दावर नेताओं को घेरने के लिये उम्मीदवारों के एलान में देरी हो रही है या फिर सियासी जोड-तोड मौजूदा राजनीति में कद्दावर को बचाने में जुटी हुई है। यह सावल इसलिये बड़ा है क्योंकि राहुल गांधी के खिलाफ स्मृति इरानी के लड़ने का मतलब है बीजेपी में ऐसा कोई नेता नहीं जो ताल ठोक कर राहुल गांधी को चुनौती दें। क्योंकि स्मृति इरानी को हारने में ही लाभालाभ है। स्मृति फिलहाल राज्यसभा की सदस्य हैं। और चुनाव हार भी जाती हैं तो राज्यसभा की सीट पर आंच आयेगी नहीं। वैसे बीजेपी में हर बड़ा नेता अमेठी में चुनाव लडने की एवज में राज्यसभा की सीट मांग रहा था। लेकिन स्मृति को तो कुछ देना भी नहीं पड़ा। और चुनाव राहुल गांधी के खिलाफ लड़ रही है तो प्रचार मिलेगा ही। और राहुल गांधी के लिये स्मृति इरानी का लडना फायदेमंद भी साबित होगा क्योंकि स्मृति की पहचान कही ना कही टीवी सीरियल कलाकर से जुडी हुई हैं और अमेठी में ताल ठोंक रहे आप के कुमार विश्वास भी मंचीय कवि हैं तो तो झटके में राहुल बनाम कलाकार-अदाकार का केन्द्र अमेठी हो गया। यानी अमेठी 77 वाले हालात से दूर है जब गांधी परिवार के सबसे ताकतवर बेटे संजय गांधी अमेठी में चुनाव हारे थे। लेकिन उस वक्त भी संजय गांधी के खिलाफ खडे उम्मीदवार को कोई नहीं जानता था उल्टे जनता के फैसले को बडा माना गया था। वहीं सोनिया गांधी को लेकर कोई रणनीति किसी के पास नहीं है। रायबरेली में 37 बरस पहले इंदिरा गांधी हारी थीं। लेकिन रायबरेली में सोनिया गांधी हार सकती है यह 2014 में कोई मानने को तैयार नहीं है। इसलिये रायबरेली में कोई कद्दावर नेता शहीद होना भी नहीं चाहता। बीजेपी की उमा भारती हो या आप की शाजिया इल्मी दोनों ने ही रायबरेली से कन्नी काटी। और बीजेपी ने जिसे मैदान में उतारा वह विधायक का सीट भी नहीं जीत सकता। सपा छोड कर बीजेपी में शरीक हुये अजय अग्रवाल को सोनिया के खिलाफ उतार कर बीजेपी ने साफ कर दिया कि मोदी के खिलाफ वह कांग्रेस से किसी कद्दावर काग्रेसी नेता को मैदान में देखना नहीं चाहती। तो सवाल तीन हैं। बीजेपी ने अमेठी और रायबरेली को वाकओवर दिया। तो बनारस में उम्मीदवार के एलान को लेकर रुकी कांग्रेस भी मोदी को वाकओवर दे देगी। या फिर पीएम पदत्याग से बना सोनिया का कद आज भी हर कद पर भारी है। या सोनिया 2014 के चुनाव में महज एक प्रतीक है। क्योंकि राहुल दौड़ में है। हो जो भी लेकिन गांधी परिवार सरीखी सुविधा बाकि कद्दावर नेताओ के लिये तो बिलकुल ही नहीं है। राजनाथ या मोदी को लेकर राजनीतिक दलों की बिसात उलट है। राजनाथ हो या नरेन्द्र मोदी सत्ता के लिये दोनो ही रेस में हैं। दोनो को पता है कि लखनऊ या बनारस से जीत का मतलब दोनों नेताओ के लिये होगा क्या । इसलिये मोदी के खिलाफ चुनावी गणित को ठोक बजाकर हर दल देख रहा है और राजनाथ को हर दल ने अपने उम्मीदवारों के आसरे घेरने का प्रयास किया है। लखनऊ में चुनावी जीत हार मुस्लिम और ब्राहमण वोटरों पर ही टिकी है । 5 लाख से ज्यादा मुस्लिम और -करीब 6 लाख ब्रह्ममण वोटर लखनऊ में हैं। और राजनाथ के खिलाफ आम आदमी पार्टी ने जैसे ही फिल्मी कलाकार जावेद जाफरी को उतारा वैसे ही कई सवाल सियासी तौर पर उठे। क्या आप मुसलिम वोटर को अपने साख देख रहा है। वहीं बाकी तीनों दल यानी सपा, बीएसपी और कांग्रेस तीनों माने बैठे हैं कि मुस्लिम वोटर अगर उनके साथ आता है तो जीत उन्हीं की होगी क्योंकि तीनो ही दलो के उम्मीदवार ब्राह्णमण हैं।

ऐसे में राजनाथ का नया संकट यही है कि अगर ब्राहमण वोटर बीजेपी से छिटका या राजनाथ से छिटका तो राजनाथ मुश्किल में पड जायेंगे क्योंकि जातीय समीकरण के लिहाज राजपूतों की तादाद लखनउ में 80 हजार से भी कम है । लेकिन मुस्लिम उम्मीदवार के मैदान में उतरने से राजनाथ को लाभ है कि मुस्लिम वोटर अगर जावेद जाफरी में सिमटा तो कांग्रेस, सपा और बीएसपी के लिये यह घातक साबित होगा। वहीं राजनाथ से उलट बिसात मोदी को लेकर बनारस में हर राजनातिक दल की है क्योंकि वहां केजरीवाल को सामने कर सीधी लड़ाई के संकेत हर राजनीतिक दल की लगातार खामोशी दे रही है। बनारस में हर कोई बनारसी दांव ही चल रहा है। मोदी बनारस में मोदी से ही लड़ रहे हैं। मोदी का कद बीजेपी से बडा है । मोदी पीएम पद के उम्मीदवार है। 2014 में सरकार बीजेपी की नहीं मोदी की बननी है। सोमनाथ से बाब विश्वानाथ के दरवाज में मोदी यूं ही दस्तक देने नहीं पहुंचे हैं। यह सारे जुमले मोदी को मोदी से ही लड़ा रहा है इसलिये नया सवाल यही हो चला है कि मोदी के खिलाफ कांग्रेस मैदान में उतारेगी किसे। नजरें हर किसी की है। कांग्रेस के पांच नेता दिगग्विजय सिंह , आनद शर्मा , प्रमोद तिवारी , राशीद अल्वी और पी चिंदबरम अभी तक जिस तरीके से मोदी को चुनौती देने के लिये अपने नाम आगे किये है और काग्रेस हाईकमान ने कोई गर्मजोशी नहीं दिकायी उससे अब नये संकेत उभरने लगे है कि मोदी को घेरने के लिये क्या हर राजनीतिक दल अपने उम्मीदवार को उतारने से बनारस में बच रहे है । क्योकि मोदी के खिलाफ केजरीवाल चुनाव लडने की मुनादी कर चुके है और वोट बिखरे या कटे नहीं इसपर खास ध्यान हर राजनीतिक दल दे रहा है ।

बनारस में जितनी तादाद यहा ब्राह्मण की है उतने ही मुसलमान भी हैं। और पटेल-जयसवाल को मिला दें तो इनकी तादाद भी ब्रह्मण-मुसलमान के बराबर हो जायेगी। तो १६ लाख वोटरों वाले काशी में मोदी के शंखनाद की आवाज को खामोश तभी किया जा सकता है जब जाति और धर्म का समीकरण एक साथ चले। और यह तभी संभव है जब मुलायम-मायावती एक तरीके से सोचें और कांग्रेस मोदी को ही मुद्दा बनाकर केजरीवाल की परछाई बन जायें। असल में कांग्रेस की खामोशी या उम्मीदवार खड़ा करने को लेकर देरी इसकी संकेत देने लगी है कि वोटों के समीकरण और मोदी की परछाई को ही मोदी के खिलाफ खड़ा करने की एक नयी सियासत कांग्रेस भी बना रही है और आजमगढ पहुंचे मुलायम सिंह यादव भी बनारस में आजगढ की हवा बहाने में लगे हैं। यानी मुसलिम वोटर के गढ में मुलायम खुद के मौलाना होने का तमगा लेने पहुंचे हैं और बनारस के कबीरपंथी सोच में मोदी सेंध लगाने पहुंचे हैं। सवाल सिर्फ इतना है कि पहली बार कद्दावर नेताओं की तिकड़मी राजनीति के सामने उसी जनादेश को छोटा कर आंका जा रहा है जो जनादेश नेताओं के कद्दावर बनाता है। तो आजादी के बाद चुनावी इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण पन्ना लिखा जा रहा है 2014 में । क्योंकि जनादेश तिकडमी कद्दावरों को धूल चटायेगा और धूल से कुर्सी तक पहुंचायेगा। इसके लिये सिर्फ इंतजार करना पड़ेगा।

Wednesday, March 26, 2014

मोदी या केजरी, किसे पारस साबित करेगा बनारस?

खाक भी जिस ज़मी की पारस है, शहर मशहूर यह बनारस है। तो क्या बनारस पहली बार उस राजीनिति को नया जीवन देगा जिस पर से लोकतंत्र के सरमायेदारों का भी भरोसा डिगने लगा है। बनारस की तहजीब, बनारस का संगीत , बनारस का जायका या फिर बनारस की मस्ती। राजनीति के आईने में यह सब कहां फिट बैठता है। लेकिन नरेन्द्र मोदी और अरविन्द केजरीवाल का सियासी अखाड़ा बनारस बना तो फिर बनारस या तो बदल रहा है या फिर बनारस एक नये इतिहास को लिखने के लिये राजनीतिक पन्नों को खंगाल रहा है। बनारस से महज १५ कोस पर सारनाथ में जब गौतम बुद्द ने अपने ज्ञान का पहला पाठ पढ़ा, तब दुनिया में किसी को भरोसा नहीं था गौतम बुद्द की सीख सियासतों को नतमस्तक होना भी सिखायेगी और आधुनिक दौर में दलित समाज सियासी ककहरा भी बौध धर्म के जरीये ही पढेगा या पढ़ाने की मशक्कत करेगा। गौतम बुद्ध ने राजपाट छोडा था। मायावती ने राजपाट के लिये बुद्द को अपनाया। इसी रास्ते को रामराज ने उदितराज बनकर बताना चाहा और केजरीवाल ने तो गौतम बुद्द की थ्योरी को सम्राट अशोक की तलवार पर रख दिया। सम्राट अशोक ने बुद्दम शरणम गच्छामी करते हुये तलवार रखी और केजरीवाल ने सत्ता गच्छामी करते हुये सियासी तलवार भांजनी शुरु की। बनारस तो मुक्ति पर्व को जीता रहा है फिर यहा से सत्ता संघर्ष की नयी आहट नरेन्द्र मोदी ने क्यो दी। मोक्ष के संदर्भ में काशी का ऐसा महात्म्य है कि प्रयागगादु अन्य तीर्थो में मरने से अलोक्य, सारुप्य तथा सानिद्य मुक्ती ही मिलती है और माना जाता है कि सायुज्य मुक्ति केवल काशी में ही मिल सकती है। तो क्या सोमनाथ से विश्वनाथ के दरवाजे पर दस्तक देने नरेन्द्र मोदी इसलिये पहुंचे कि विहिप के अयोध्या के बाद मथुरा, काशी के नारे को बदला जा सके। या फिर संघ परिवार रामजन्मभूमि को लेकर राजनीतिक तौर पर जितना भटका, उसे नये तरीके से परिभाषित करने के लिये मोदी को काशी चुनना पड़ा।

अगर ऐसा है तो फिर यह नया भटकाव है क्योंकि काशी को तो हिन्दुओं का काबा माना गया। याद कीजिये गालिब ने भी बनारस को लेकर लिखा, तआलल्ला बनारस चश्मे बद्दूर, बहिस्ते खुर्रमो फिरदौसे मामूर, इबादत खानए नाकूसिया अस्त, हमाना काबए हिन्दोस्तां अस्त। यानी हे परमात्मा, बनारस को बुरी दृष्टि से दूर रखना, क्योंकि यह आनंदमय स्वर्ग है। यह घंटा बजाने वालों अर्थात हिन्दुओ का पूजा स्थान है, यानी यही हिन्दुस्तान का काबा है। तो फिर केजरीवाल यहां क्यों पहुंचे। क्या केजरीवाल काशी की उस सत्ता को चुनौती देने पहुंचे हैं, जिसके आसरे धर्म की इस नगरी को बीजेपी अपना मान चुकी है। या फिर केजरीवाल को लगने लगा है कि राजनीति सबसे बड़ा धर्म है और धर्म सबसे बड़ी राजनीति। संघ परिवार धर्म की नगरी से दिल्ली की सत्ता पर अपने राजनीतिक स्वयंसेवक को देख रहा है। और केजरीवाल काशी की जीत से दिल्ली की त्रासदी से मुक्ति चाहते हैं।  वैसे बनारस की राजनीतिक बिसात का सच भी अपने आप में चुनौतीपूर्ण है। क्योंकि जितनी तादाद यहां ब्राह्मण की है, उतने ही मुसलमान भी हैं। करीब ढाई-ढाई लाख की तादाद दोनों की है। पटेल डेढ़ लाख तो यादव एक लाख है और जायसवाल करीब सवा लाख। मारवाडियों की तादाद भी ४० हजार है। इसके अलावा मराठी, गुजराती, तमिल , बंगाली, सिख और राजस्थानियों को मिला दिया जाये तो इनकी तादाद भी डेढ लाख से उपर की है। तो १६ लाख वोटरों वाले काशी में मोदी का शंखनाद गालिब की तर्ज पर हिन्दुओं का काबा बताकर मोदी का राजतिलक कर देगा या फिर काशी को चुनौती देने वाले कबीर से लेकर भारतेन्दु की तर्ज पर केजरीवाल की चुनौती स्वीकार करेगा। क्योंकि गालिब बनारस को लेकर एकमात्र सत्य नहीं है। इस मिथकीय नगर की धार्मिक और आध्यात्मिक सत्ता को चुनौतिया भी मिलती रही हैं। ऐसी पहली चुनौती १५ वी सदी में कबीर से मिली। काशी की मोक्षदा भूमि को उन्होंने अपने अनुभूत-सच से चुनौती दी और ऐसी बातों को अस्वीकार किया। उन्होंने बिलकुल सहज और सरल ढंग से परंपरा से चले आते मिथकीय विचारों को सामने रखा और बताया कि कैसे ये सच नहीं है। अपने अनुभव ज्ञान से उन्होने धार्मिक मान्यताओं के सामने एक ऐसा सवाल खड़ा कर दिया, जो एक ओर काशी की महिमा को चुनौती देता था तो दूसरी ओर ईश्वर की सत्ता को। उन्होंने दो टूक कहा-जो काशी तन तजै कबीरा। तो रामहिं कौन निहोरा। यह ऐसी नजर थी , जो किसी बात को , धर्म को भी , सुनी -सुनायी बातो से नहीं मानती थी। उसे पहले अपने अनुभव से जांचती थी और फिर उस पर भरोसा करती थी।

काशी का यह जुलाहा कबीर कागद की लेखी को नहीं मानता था, चाहे वह पुराण हो या कोई और धर्मग्रंथ। उसे विश्वास सिर्फ अपनी आंखो पर था। इसलिये कि आंखों से देखी बातें उलझाती नहीं थी…तू कहता कागद की लेखी, मै कहता आंखन की देकी। मै कहता सुरझावनहरी, तू देता उरझाई रे। वैसे बनारस की महिमा को चुनौती तो भारतेन्दु ने १९ वी सदी में भी यह कहकर दी…..देखी तुमरी कासी लोगों , देखी तुमरी कासी। जहां बिराजे विस्वनाथ , विश्वेश्वर जी अविनासी। ध्यान दें तो बनारस जिस तरह २०१४ का सियासी अखाडा बन रहा है और सियासी आंकड़े में कूदने वाले राजनीति के महारथियो को जैसे जैसे बनारस के रंग में रंगने की सियासत भी शुरु हुई है। वह ना तो बनारस की संस्कृति है और ना ही बनारसी ठग का मिजाज। बिस्मिल्ला खां ने अमेरिका तक में बनारस से जुड़े उस जीवन को मान्यता दी, जहां मुक्ति के लिये मुक्ति से आगे बनारस की आबो हवा में नहाया समाज है। शहनाई सुनने के बाद आत्ममुग्ध अमेरिका ने जब बिस्मिल्ला खां को अमेरिका में हर सुविधा के साथ बसने का आग्रह किया तो बिस्मिल्ला खां ने बेहद मासूमियत से पूछा, सारी सुविधा तो ठीक है लेकिन गंगा कहा से लाओगे। और बनारस का सच देखिये। गंगा का पानी हर कोई पूजा के लिये घर ले जाता है लेकिन बनारस ही वह जगह है जहा से गंगा का पानी भरकर घर लाया नहीं जाता । तो ऐसी नगरी में मोदी और केजरीवाल किसे बांटेंगे या किसे जोड़ेंगे। वैसे भी घंटा-घडियाल, शंख, शहनाई और डमरु की धुन पर मंत्रोच्चार से जागने वाला बनारस आसानी से सियासी गोटियो तले बेसुध होने वाला शहर भी नहीं है। बेहद मिजाजी शहर में गंगा भी चन्द्राकार बहती है बनारस हिन्दु विश्वविघालय के ३५ हजार छात्र हो या काशी विघापीठ और हरिश्चन्द्र महाविघालय के दस -दस हजार छात्र। कोई भी बनारस के मिजाज से इतर सोचता नहीं और छात्र राजनीति को साधने के लिये भी बनारस की रंगत को आजमाने से कतराता नहीं। फिर बनारस आदिकाल से शिक्षा का केन्द्र रहा है और अपनी इस विरासत को अब भी संजोये हुये हैं। ऐसे में पूर्व टैक्स कमीश्नर केजरीवाल हो या पूर्व चायवाले मोदी, दोनों की बिसात पर बनारसी मिजाज प्यादा हो नहीं सकता और दोनों ही वजीर बनने के लिये लालालियत है तो फिर बनारस का रास्ता जायेगा किधर। नजरें सभी की इसी पर हैं। क्योंकि बनारस की बनावट भी अद्भुत है….यह आधा जल में है । आधा मंत्र में है । आधा फूल में है । आधा शव में है । आधा नींद में है। आधा शंख में है । तो केजरीवाल की मोदी को चुनौती देने के अंदाज में बनारसी मिजाज में आधी राजनीति है। लेकिन पहली बार अंदाज गालिब का हो या कबीर का। जीत मोदी की हो या केजरीवाल की। मगर मौका बनारस को ही मिला है कि वह सियासत का पूर्ण विराम तय करें । या फिर दिल्ली की दोपहरी और गुजरात की रात को बनारस की सुबह से नयी रंगत दे दें !