Wednesday, June 14, 2017

क्या 2019 में किसान राजनीति का कोई नया मॉडल दे सकती है ?

मोदी के सामने कोई नेता नहीं टिकता। लेकिन देश में कोई मुद्दा बड़ा हो जाये तो क्या मोदी का जादू गायब हो जायेगा। ये सवाल इसलिये क्योंकि इंदिरा गांधी के दौर को याद कर लीजिये। कहां कोई विपक्ष का नेता इंदिरा गांधी के सामने टिकता था। खासकर 1971 के बाद इंदिरा लारजर दैन लाइफ की इमेज वाली जीती जागती नेता थीं। और कोई सोच भी नहीं सकता था कि इंदिरा की सत्ता जो 1973 तक अजेय दिखायी दे रही थी, 1974 के आते आते वही सत्ता डगमगाते दिखी । उस वक्त जेपी कोई इंदिरा के विकल्प नहीं थे। जेपी सिर्फ जनता के भीतर के सवालों को सतह पर ला रहे थे। और देखते देखते गुजरात से बिहार तक इंदिरा के खिलाफ आम जनता की गोलबंदी ही कुछ इस तरह होती चली गई कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी आंदोलन में शरीक हो गया। और संघ के भीतर की राजनीतिक कुलबुलाहट को भी पहली बार देवरस ने राजनीतिक शुद्दिकरण से कहीं आगे ला खड़ा किया। ठीक इसी तरह नया सवाल मोदी या कोई विकल्प के ना होने का नहीं बल्कि बेरोजगारी के बाद किसान के मुद्दों को लेकर जो कुलबुलाहट समाज के भीतर पनप रही है, अगर वह सतह पर आ जाये तो क्या देश की राजनीति बदल सकती है।

जाहिर है किसान या युवाओं से जुड़ा मुद्दा राष्ट् य राजनीति में ही उठा-पटक ना कर दे। इस पर बाखूबी मौजूदा सत्ता की नजर भी होगी और मौजूदा सत्ता को भी इंदिरा का दौर याद होगा। तो मुद्दा उभरेगा तो संघ की सक्रियता भी होगी। जैसे किसानों के मुद्दे पर किसान संघ सक्रिय है। यानी आने वाले वक्त में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पहल मौजूदा सत्ता के लिये तमाम अवरोधों को दूर कर रास्ता निकालने की होगी ही। और मौजूदा हालात को देख कर कोई भी नौसिखिया राजनीतिज्ञ पहली जुबां में ये कह सकता है कि अब संघ स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने के लिये दबाव बनायेगा और  आखिर में मोदी सरकार स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू कर खुद को नायक के तौर पर स्थापित कर लेगी। ये हो भी सकता है कि ये सब गुजरात चुनाव से एन पहले हो।

लेकिन ये भी पहली बार हो रहा है कि कोई एक दल यानी बीजेपी चुनाव दर चुनाव तो जीत रही है लेकिन देश में राजनीतिक शून्यता और गहरी होती जा रही है। यानी सवाल ये नहीं है कि कांग्रेस हो या वामपंथी या फिर कोई भी विपक्ष या समूचा विपक्ष भी मौजूदा मोदी सरकार का विकल्प बन नहीं पा रहा है या इनका इकट्टा होना भी बीजेपी के लिये कोई खतरे की घंटी नहीं है। क्योंकि जब केन्द्र समेत 17 राज्यों में बीजेपी की सरकार हो चुकी हो और आने वाले वक्त में कर्नाटक, हिमाचल, ओड़िशा को लेकर भी लग रहा हो कि वहा भी बीजेपी आ जायेगी। तो फिर कह सकते है कि बीजेपी स्वर्णिम काल को  जी रही है। संघ के लिये बेहतरीन दौर है जब उसके प्रचारक सत्ता में है और एजेंडा देश में लकीर खींच रहा है। लेकिन इस दौर की बारीकी को समझें तो मुश्किल ये है कि बीजेपी जीत कर भी कमजोर हो रही है। संघ की सत्ता में होने के वाबजूद वह अपने ढलान पर है। और इसी कोई दूसर वजह नहीं बल्कि सिर्फ इतनी सी वजह है कि जिन मुद्दों के कटघरे में देश खड़ा है, उन मुद्दों को अभी तक सुलझाने के लिये जनता ने संघ परिवार या बीजेपी की तरफ देखा।


कांग्रेस सत्ताधारी है और उसकी सत्ता तले ही गरीबी, महंगाई, भ्रष्टाचार , दलाली या संस्थानों के खत्म होने की शुरुआत हुई। और इन्हीं सवालों को नरेन्द्र मोदी ने चुनाव प्रचार के वक्त मुद्दा भी बनाया। लेकिन मोदी के सत्ता में आने के बाद अगर वही सवाल फन उठाये हुये हैं तो नया सवाल ये नहीं है कि फिर से जनता कांग्रेस को ले आये । नया सवाल ये है कि राजनीतिक व्यवस्था से मोहभंग के हालात बनना है। कांग्रेस की राजनीति का पर्याय बीजेपी में नहीं देखना है या कहें कमोवेश हर राजनीतिक दल का मतलब सत्ता में आने के बाद उसका कांग्रेसीकरण हो जाना है। ये भी कोई सोच सकता है। क्योंकि सरकारी आंकडो के लिहाज से ही समझें तो बीते 15 बरस में कमोवेश हर राजनीतिक दल ने एनडीए-यूपीए गठबंधन के दौर में सत्ता की मलाई चखी। लेकिन इन्ही 15 बरस में किसान ही नहीं बल्कि छात्र और बेरोजगार युवाओं की खुदकुशी के सच को परख लें तो हर घंटे दो किसान ने भी खुदकुशी की और हर घंटे दो छात्र या युवा बेरोजगार ने भी खुदकुशी की। 15 बरस में किसानों की खुदकुशी का आंकड़ा 2 लाख 34 हजार से ज्यादा का है। और इन्हीं 15 बरस में छात्रो की खुदकुशी 95 हजार से जेयादा तो युवा बेरोजगारों की खुदकुशी की संख्या एक लाख 44 हजार से ज्यादा की है। तो फिर सत्ता के परिवर्तन ने ही क्या किसान-युवाओ में उम्मीद जगाये रखी कि हालात ठीक हो जायेंगे। अगर ऐसा है तो अगला सवाल ये भी है कि पहली बार किसान जिस तरह अपनी फसल की किमत ना मिलने से परेशान है और सरकार को भी सुझ नहीं रहा है कि आखिर कैसे फसल की किमत को भी देने की व्यवस्था वह कर दें । तो समाधान के रास्ते कर्ज माफी और फसल बीमा से सुलझाने के प्रयास तल खोजे जा रहे हैं। लेकिन राजनीति इस सच से आखे मूंदे हुये है कि किसानों के मुद्दे से आंखे नेहरु के दौर में भी मूंदी गईं। तब लाल बहादुर सास्त्री ने जय जवान का नारे के साथ जय किसान को भी जोड़ा। लेकिन इंदिरा गांधी से लेकर मोदी तक के दौर में किसान कभी पंचवर्षीय योजनाओं में ही नहीं बल्कि हर बरस के बजट मे भी जगह पा नहीं पाया। और 1991 के बाजार इकनॉमी से पहले या बाद के 25 बरस के दौर में ये मान कर हर राजनीतिक सत्ता ने काम किया कि खेती पर जितनी बडी तादाद टिकी हुई है उसमें जीडीपी में खेती का योगदार कम होगा ही। यानी रुपया कहा से कमाया जाये और कहां खर्च किया जाए।

अर्थव्यवस्था की सारी थ्योरी इसी पर टिकी रही। यानी किसान का पेट भरा रहे । किसान के बच्चों को शिक्षा-स्वास्थ्य सर्विस मिले। देश के सोशल इंडेक्स को छूने की स्थिति में किसान भी रहे। ये कभी किसी सरकार ने सोचा ही नहीं। और चुनावी राजनीति को ही लगातार लोकतंत्र का जामा पहनाकर किसान ही नही युवा बेरोजगार और हाशिये पर तबको में जब यही आस जगायी गयी की सत्ता बदलने से हालात बदल जायेंगे तो क्या 2019 का चुनाव इस सोच के विकल्प के तौर पर याद किया जायेगा। क्योंकि 2014 में जो भी वादे गढ़े गये। जो भी राजनीतिक आरोप गढ़े गये, वह सही - गलत जो भी हो लेकिन पहली बार देश प्रचार प्रसार या कहे टेक्नालाजी के जरीये ऐसे चुनावी दौर में आया, जहां जो दिल्ली में दिखायी देता वही मंदसौर में दिखायी दे रहा था । जो मुंबई की हवा में राजनीतिक माहौल की गर्मी थी वही यूपी के किसी गांव में तपिश महसूस की जा रही थी । यानी आर्थिक असामनता के बावजूद चुनावी लोकतंत्र ने महानगर से लेकर गांव तक को एक प्लेटफार्म पर ला खडा कर दिया । और चाहे अनचाहे मोदी सरकार से नहीं बल्कि वोटरो की तादाद से भी चुनावी लोकतंत्र का आकलन होने लगा। और जब देश इतना राजनीतिक हो गया कि हर मुद्दे का राजनीतिक समाधान ही खोजने लगा तो फिर 2019 के चुनाव में ये अक्स क्या हालात पैदा कर सकता है ये किसे पता है। क्योंकि जिस तरह किसानों के संघर्ष व किसानों की त्रासदी , उनके दर्द को हडपने की राजनीतिक दल सोच रहे है उसमें पहली नजर में लग तो यही रहा है कि मोदी की राजनीति के सामने बौने पडते हर राजनीतिक दलों को पहली बार किसान संघर्ष में अपनी सियासी जमीन दिखायी देने लगी है। दरअसल, संसदीय चुनावी राजनीति के अक्स में अगर किसान को वोटर मान कर लोकतंत्र की धार को परखे तो फिर देश के इस अनूठे सच को भी समझ लें कि 2014 के लोकसभा चुनाव में कुल वोटर 83करोड 40 लाख , 82 हजार 814 वोटर थे । जिनमे से बीजेपी को 17 करोड 14 लाख 36 हजार 400 वोट मिले और दूसरी तरफ कांग्रेस को 10 करोड 67 लाख 32 हजार 985 वोट मिले । और देश में किसान मजदूर का सच ये है कि कुल 26 करोड 29 लाख किसान-मजदूर देश में है । जिनमें 11 करोड 86 लाख किसान तो 14 लाख 43 हजार मजदूर । यानी देश के ससंदीय राजनीति के इतिहास में 1951 से लेकर 2014 तक कभी किसी एक पार्टी को देश में मौजूद किसान-मजदूरों की तादाद से ज्यादा वोट नहीं मिला । लेकिन हर राजनीतिक दल के चुनावी घोषणापत्र में किसानों के हक की बात हर किसी ने जरुर की। 2014 में काग्रेस और बीजेपी दोनो ने बकायदा अपने अपने मैनिफेस्टो में किसानो  पर पन्ना भर खर्च भी किया गया। कांग्रेस ने उपलब्धियां गिनायी तो बीजेपी ने भी 2014 के चुनावी घोषणापत्र में 50 फीसदी न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने का वादा किया । और सत्ता में आने अगले बरस ही केन्द्र सरकार 50 फिसदी समर्थन मूल्य बढाने से 2015 में ही पलट गई । बकायदा 21 फरवरी 2015 को कोर्ट में एफिडेविट देकर कहा कि 50 फीसदी न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाना संभव नहीं है। सरकार के मुताबिक ऐसा करने से बाजार पर विपरित प्रभाव होगा। और तो और जिन राज्यों में किसानों को प्रति क्विंटल धान पर तीन सौ रुपये का बोनस मिलता था वह भी बंद कर दिया गया । तो सवाल सिर्फ चुनावी वादे और उससे पलटने भर का नहीं है। सवाल तो ये भी है कि भारत ने डब्ल्यूटीओ के साथ समझौता कर 10 फिसदी से ज्यादा समर्थन मूल्य ना बढाने पर हस्ताक्षर किये हुये हैं। तो आखिरी सवाल ये भी है कि जब राजनीतिक सत्ता के लिये बाजार ही मायने रखता है। और बाजार अर्थव्यवस्था में किसान को कोई जगह है ही नहीं तो फिर संसदीय चुनावी लोकतंत्र का मतलब किसान के लिये है क्या। और अगर किसानों की खुदकुशी तले ही चुनावी राजनीति का लोकतंत्र जी रही है तो फिर किसान को करना क्या
चाहिये। क्योंकि एक सच तो ये भी है कि किसानों से जुडे देश भर में 62 किसान संघ काम कर रहे हैं यानी राजनीति कर रहे हैं। और राजनीति करने वाले किसानों की जिन्दगी बदल गई लेकिन किसान की हालत बद से बदतर ही हुई। तो फिर 2019 में राजनीति को ही चुनावी लोकतंत्र की चौखट पर किसान खारिज कर दें या नये तरीके से परिभाषित कर दें । मानिये या ना मानिये हालात उसी दिशा में जा रहे है। जो खतरे की घंटी है। सवाल यही है कि राजनीतिक सत्ता इसे समझेगी या सत्ता के लिये राजनीति इस आग को और भड़कायेगी। और किसान राजनीति के इस सच को समझेंगे और देश को ही राजनीति का नया मॉडल देंगे।

Monday, June 12, 2017

संघर्ष की मुनादी के लिये 72 बरस के बूढ़े का इंतजार

इंदिरा गांधी कला केन्द्र से प्रेस क्लब तक
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खलक खुदा का, मुलुक बाश्शा का / हुकुम शहर कोतवाल का... / हर खासो-आम को आगह किया जाता है / कि खबरदार रहें / और अपने-अपने किवाड़ों को अन्दर से / कुंडी चढा़कर बन्द कर लें /गिरा लें खिड़कियों के परदे /और बच्चों को बाहर सड़क पर न भेजें /क्योंकि , एक बहत्तर बरस का बूढ़ा आदमी अपनी काँपती कमजोर आवाज में / सड़कों पर सच बोलता हुआ निकल पड़ा है ! धर्मवीर भारती ने मुनादी नाम से ये कविता नंवबर 1974 में जयप्रकाश नारायण को लेकर तब लिखी जब इंदिरा गांधी के दमन के सामने जेपी ने झुकने से इंकार कर दिया । जेपी इंदिरा गांधी के करप्शन और तानाशाही के खिलाफ सड़क से आंदोलन की अगुवाई कर रहे थे । और संयोग देखिये या कहे विडंबना देखिये कि 43 बरस पहले 5 जून 1974 को जेपी ने  इंदिरा गांधी के खिलाफ संपूर्ण क्रांति का नारा दिया । और 5 जून 2017 को ही दिल्ली ने हालात पलटते देखे । 5 जून को ही इंदिरा गांधी की तर्ज पर मौजूदा सरकार ने निशाने मीडिया को लिया । सीबीआई ने मीडिया समूह एनडीटीवी के प्रमोटरो के घर-दफ्तर पर छापा मारा । और 5 जून को ही  संपूर्ण क्रांति दिवस के मौके पर दिल्ली में जब जेपी के अनुयायी जुटे तो उन्हे जगह और कही नहीं बल्कि इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र में मिली । यानी जिस दौर में जेपी के आंदोलन से निकले छात्र नेता ही सत्ता संभाल रहे हैं, उस वक्त भी दिल्ली में जेपी के लिये कोई इमारत कोई कार्यक्रम लायक हाल नहीं है जहा जेपी पर कार्यक्रम हो सके । तो जेपी का कार्यक्रम उसी इमारत में हुआ जो इंदिरा गांधी के नाम पर है । और जो सरकार या नेता अपने ईमानदार और सरोकार पंसद होने का सबूत इंदिरा के आपातकाल का जिक्र कर देते है । उसी सरकार , उन्हीं नेताओं ने भी खुद को इंदिरा गांधी की तर्ज पर खडा करने में कोई हिचक नहीं दिखायी ।

तो इमरजेन्सी को  लोकतंत्र पर काला धब्बा मान कर जो सरकार मीडिया पर नकेल कसने निकली उसने खुद को ही जब इंदिरा के सामानातंर खडा कर लिया तो क्या ये मान लिया जाये कि मौजूदा वक्त ने सिर्फ इमरजेन्सी की सोच को  परिवर्तित कर दिया है । उसकी परिभाषा बदल दी है । हालात उसी दिशा में जा रहे हैं? ये सवाल इसलिये  क्योंकि इंदिरा ने तो इमरजेन्सी के लिये बकायदा राष्ट्रपति से दस्तावेज पर हस्ताक्षर करवाये थे । लेकिन मौजूदा वक्त में कोई दस्तावेज नहीं है । राष्ट्रपति के कोई हस्ताक्षर नहीं है । सिर्फ संस्थानों ने कानून या
संविधान के अनुसार काम करना बंद कर दिया है । सत्ता की निगाहबानी में तमाम संस्धान काम कर रहे है । तो इससे बडी विडंबना और क्या हो सकती है कि जेपी का नाम भी लेंगे । और जेपी के संघर्ष के खिलाफ भी खड़े होंगे । इंदिरा का विरोध भी करेंगे और इंदिरा के रास्ते पर भी चलेंगे । दरअसल संघर्ष के दौर में जेपी के साथ खडे लोगों के बीच सत्ता की लकीर खिंच चुकी है । क्योंकि एक तरफ वैसे है जो सत्ताधारी हो चुके है और सत्ता के लिये चारदिवारी बनाने के लिये अपने  एजेंडे के साथ है तो दूसरी तरफ वैसे है जो सत्ता से दूर है और उन्हे लगता है सत्ता जेपी के संघर्ष का पर्याय नहीं  था बल्कि क्रांति सतत प्रक्रिया है। इसीलिये दूसरी तरफ खड़े जेपी के लोगों में गुस्सा है। संपूर्ण क्राति दिवस पर जेपी को याद करने पहुंचे कुलदीप नैयर हो या वेदप्रताप वैदिक दोनो ने माना कि मौजूदा सत्ता जेपी की लकीर  को मिटा कर आगे बढ रही है। वहीं दूसरी तरफ मीडिया पर हमले को लेकर दिल्ली के प्रेस क्लब में 9 जून को जुटे पत्रकारो के बीच जब अगुवाई करने बुजुर्ग  पत्रकारों की टीम सामने आई तो कई सवालो ने जन्म दे दिया। मसलन निहाल सिंह , एचके दुआ, अरुण शौरी , कुलदीप नैयर , पाली नरीमन सरीखे पत्रकारों, वकील जो जेपी के दौर में संघर्षशील थे उन्होंने मौजूदा वक्त के एहसास तले 70-80 के दशक को याद कर तब के सत्ताधारियों से लेकर इमरजेन्सी और प्रेस बिल को याद कर लिया तो लगा ऐसे ही जैसे सिर्फ धर्मवीर भारती की कमी है । जो मुनादी लिख दें । तो देश में नारा लगने लगे कि सिंहासन खाली करो की जनता आती है । लेकिन ना तो इंदिरा गांधी कला केन्द्र में संपूर्ण क्रांति दिवस के जरीय जेपी को याद करते हुये और ना ही प्रेस क्लब में अभिव्यक्ति की आजादी के सवाल भागेदारी के लिये जुटे पत्रकारो को देखकर कही लगा कि वाकई संघर्ष का माद्दा कहीं  है क्योकि सिर्फ मौजूदगी संघर्ष जन्म नहीं देती । संघर्ष वह दृश्टी देती है जिसे 72 बरस की उम्र में जेपी ने संघर्ष वाहिनी से लेकर तमाम युवाओ को ही सडक पर खडा कर उन्ही के हाथ संघर्ष की मशाल थमा दी । और मशाल थामने वालो ने माना कि कोई गलत रास्ता पकडेंगे तो जेपी रास्ता दिखाने के लिये है ।

लेकिन मौजूदा वक्त का सब बडा सच संघर्ष ना कर मशाल थामने की वह होड है जो सत्ता से सौदेबाजी करते हुये दिके और सत्ता जब अनुकुल हो जाये तो उसकी छांव तले अभिव्यक्ति की आजादी के नारे भी लगा लें । और इंदिरा गांधी कला केन्द्र के कमान भी संभाल लें । अंतर दोनों में नहीं है । एक तरफ इंदिरा गांधी कला केन्द्र में जेपी का समारोह करा कर खुश हुआ जा सकता है कि चलो कल तक जहा सिर्फ नेहरु से लेकर राजीव गांधी के गुण गाये जाते थे अब उस इमारत में जेपी का भूत भी घुस चुका है । और प्रेस क्लब में पत्रकारो का जमावडे को जेखकर खुश हुआ जा सकता है चलो सत्ता के  खिलाफ संघर्ष की कोई मुनादी सुनाई तो दी । वाकई ये खुश होने वाला ही माहौल है । संघर्ष करने वाला नहीं । क्योकि जेपी के अनुयायी हो मीडिया  घराने संभाले मालिकान दोनो अपने अपने दायरे में सत्ताधारी है । और सत्ताधारियो का टकराव तभी होता है जब किसी एक की सत्ता डोलती है या दूसरे की सत्ता पहले वाले के सत्ता के लिए खतरे की मुनादी करना लगती है । लेकिन इसका ये मतलब कतई नहीं कि सत्ता इमानदार हो गई है । या सत्ता सरोकार की भाषा सीख गई है । ये खुद में ही जेपी और खुद में ही इंदिरा को बनाये रखने का ऐसा हुनर है जिसके साये में कोई संघर्ष पनप ही नहीं सकता है । क्योकि दोनो तरफ के हालातो को ही परख लें । मसलन जेपी के सत्तादारी अनुनायियो की फेहरिस्त को परखे तो आपके जहन में सवाल उटेगा चलो अच्छा ही किया जो जेपी  के संघर्ष में इनके साथ खडे नहीं हुए । लालू यादव, रामविलास पासवान , राजनाथ सिंह , रविशंकर प्रसाद , नीतीश कुमार से लेकर नरेन्द्र मोदी ही नहीं बल्कि मौजूदा केन्द्र में दर्जनों मंत्री और बिहार-यूपी और गुजरात में मंत्रियो की लंबी फेरहिस्त मिल जायेगी जो खुद को जेपी का अनुनायी । उनके संघर्ष में साथ खडे होने की बात कहेगे । और दूसरी तरफ जो मीडिया समूह घरानो में खुद को तब्दील कर चुके है वह भी इंदिरा के आपातकाल के खिलाफ संघर्ष करने के अनकहे किस्से लेकर मीडिया मंडी में घुमते हुये नजर आ जायेंगे । बीजेपी के तौर तरीके इंदिरा के रास्ते पर नजर आ सकते है और काग्रेस का संघर्ष बीजेपी के इंदिराकरण के विरोध दिखायी भी दे सकता है।

इंदिरा का राष्ट्रवाद संस्थानों के राष्ट्रीकरण में छुपा था । मौजूदा सत्ता का राष्ट्रवाद निजीकरण में छुपा है । इंदिरा के दौर में मीडिया को रेंगने कहा गया तो वह लेट गया और मौजूदा वक्त में मीडिया को साथ खडे होने कहा जा रहा है तो वह नतमस्तक है । इंदिरा के दौर में मीडिया की साख ने मीडिया घरानो को बडा नहीं किया था । लेकिन मौजूदा दौर में पूंजी ने मीडिया को विस्तार दिया है उसकी सत्ता को स्थापित किया है । इंदिरा गांधी के सामने सत्ता के जरीये देश की राजनीति को मुठ्ठी में करने की चुनौती थी । मौजूदैा वक्त में सत्ता के सामने पूंजी के जरीये देश के लोगो को अपने राजनीति एजेंडे तले लाने की चुनौती है । तब करप्शन का सवाल था । तानाशाही का सवाल था । अब राजनीति एजेंडे को देश के एजेंडे में बदलने का सवाल है। सत्ता को ही देश बनाने- मनवाने का सवाल है । तब देश में सत्ता के खिलाफ लोगो की एकजुटता  ही संघर्ष की मुनादी थी । अब सत्ता के खिलाफ पूंजी की एकजूटता ही सत्ता बदलाव की मुनादी होती है । इसीलिये मनमोहन सिंह को गवर्नेंस पाठ कारपोरेट घराने पढाने से नहीं चुकते । 2011-12 में देश के 21 कारपोरेट बकायदा पत्र लिखकर सत्ता को चुनौती देते है । और  मौजूदा वक्त में कारपोरेट की इसी ताकत को सत्ता अपने चहेते कॉरपोरेट में समेटने के लिये प्रयासरत है । तो लडाई है किसके खिलाफ । लड़ा किससे जाये । किसके साथ खड़ा हुआ जाये । इस सवाल को पूंजी की सत्ता ने इस लील लिया है कि कोई संपादक भी किसी को सत्ताधारी का दलाल नजर आ सकता है । और कोई सत्ताधारी भी कारपोरेट का दलाल नजर आ सकता है । लोकतंत्र की परिभाषा वोटतंत्र में इस तरह जा सिमटी है कि जितने वाले को ये गुमान होता है कि चुनावी जीत सिर्फ राजनीतिक दल की जीत नहीं बल्कि देश जीतना हो चुका है और उसकी मनमर्जी से ही अब लोकतंत्र का हर पहिया घुमना चाहिये । और लोकतंत्र के हर पहिये को लगने लगा है कि राजनीतिक सत्ता से आगे फिर वही वोटतंत्र है जिसपर राजनीतिक सत्ता खडी है तो वह करे क्या । ये ठीक वैसे ही है जैसे एक वक्त  राडिया टेप सिस्टम था । एक वक्त संस्थानो को खत्म करना सिस्टम है । एक वक्त बाजार से सबकुछ खरीदने की ताकत विकास था । एक वक्त खाने-जीने को तय करना विकास है । एक वक्त मरते किसानों के बदले सेंसेक्स को बताना ही विकास था । एक वक्त किसान-मजदूरो में ही विकास खोजना है । सिर्फ राजनीतिक सत्ता ने ही नहीं हर तरह की सत्ता ने मौजूदा दौर में सच है क्या । ठीक है क्या । संविधान के मायने क्या है । कानून का मतलब होना क्या चाहिये । आजादी शब्द का मतलब हो क्या । भ्रम पैदा किया और उस भ्रम को ही सच बताने का काम सियासत करने लगी । इसी के सामानांतर अगर मीडिया की स्तात को समझे तो राजनीतिक सत्ता या कहे राजनीतिक पूंजी का सिस्टम उसके जरुरत बना दी गई । प्रेस क्लब में अरुण शौरी इंदिरा-राजीव गांधी के दौर को याद कर ये बताते है कि कैसे अखबारो ने तब सत्ता का बायकॉट किया । प्रेस बिल के दौर में जिस नेता-मंत्री  ने कहा कि वह प्रेस बिल के साथ है तो उसकी प्रेस कान्फ्रेस से पत्रकारों ने उठकर जाने का रास्ता अपनाया । लेकिन प्रेस क्लब में जुटे मीडिया कर्मीयो में जब टीवी पत्रकारों के हुजूम को देखा तो ये सवाल जहन में आया । कि क्या बिना नेता-मंत्री के टीवी न्यूज चल सकती है । क्या नेताओं-मंत्रियों का बायकॉट कर चैनल चलाये जा सकते हैं। क्या सिर्फ मुद्दों के आसरे , खुद को जनता की जरुरतो से जोडकर खबरों को परोसा जा सकता है । जी हो सकता है । लेकिन पहली लड़ाई सस्ंथानों को बचाने की लड़नी होगी । फिर चुनावी राजनीति को ही लोकतंत्र मानने से बचना होगा । पूंजी पर टिके सिस्टम को नकारने का हुनर सिखना होगा । जब सरकार से लेकर नेताओं के स्पासंर मौजूद है तो प्रचार के भोंपू के तौर पर टीवी न्यूज चैनलों के आसरे कौन सी लडाई कौन लडेगा । जेपी की याद तारिखो में सिमटाकर इंदिरा कला केन्द्र अमर है तो दूसरी तरफ प्रेस कल्ब में इंदिरा की इमरजेन्सी को याद कर संघर्ष का रईस मिजाज भी जिवित है ।

मनाइए सिर्फ इतना कि जब मुनादी हो तब धर्मवीर भारती की कविता ' मुनादी ' के शब्द याद रहे......बेताब मत हो / तुम्हें जलसा-जुलूस, हल्ला-गूल्ला, भीड़-भड़क्के का शौक है / बादश्शा को हमदर्दी है अपनी रियाया से / तुम्हारे इस शौक को पूरा करने के लिए / बाश्शा के खास हुक्म से / उसका अपना दरबार जुलूस की शक्ल में निकलेगा / दर्शन करो ! /वही रेलगाड़ियाँ तुम्हें मुफ्त लाद कर लाएँगी / बैलगाड़ी वालों को दोहरी बख्शीश मिलेगी / ट्रकों को झण्डियों से सजाया जाएगा /नुक्कड़ नुक्कड़ पर प्याऊ बैठाया जाएगा / और जो पानी माँगेगा उसे इत्र-बसा शर्बत पेश किया जाएगा / लाखों की तादाद में शामिल हो उस जुलूस में / और सड़क पर पैर घिसते हुए चलो / ताकि वह खून जो इस बुड्ढे की वजह से / बहा, वह पुँछ जाए ! / बाश्शा सलामत को खूनखराबा पसन्द नहीं !.

Thursday, June 8, 2017

न कोई सरोकार, न कोई पॉलिसी फिर भी कहा "अन्नदाता सुखी भव"

बीते 25 बरस का सच तो यही है कि देश में सत्ता किसी की रही हो लेकिन किसान की खुदकुशी रुकी नहीं। और हर सत्ता के खिलाफ किसान का मुद्दा ही सबसे बड़ा मुद्दा होकर उभरा। तो क्या ये मान लिया जाये कि विपक्ष के लिये किसान की त्रासदी सत्ता पाने का सबसे धारधार हथियार है और सत्ता के लिये किसान पर खामोशी बरतना ही सबसे शानदार सियासत। क्योंकि राहुल गांधी तो विपक्ष की राजनीति करते हुये मंदसौर पहुंचे लेकिन पीएम खामोशी बरस कजाकस्तान चले गये। कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह दिल्ली छोड़ मंदसौर जाने के बदले बिहार चले गये। बाब रामदेव के साथ मोतीहारी में योग करने  लगे और किसानों के हालात पर बोलने की जगह योग पर ही बोलने लगे। तो क्या ये कहा जा सकता है कि राजनीति अपना काम कर रही है और किसान की त्रासदी जस की तस। यानी एक तरफ सत्ता योग कर रही है तो दूसरी तरफ विपक्ष सियासी स्टंट हो रहा है । दरअसल राजनीति के इसी मिजाज को समझने की जरुरत है क्योंकि किसान की फसल बर्बाद हो जाये तो मुआवजे के लाले पड़ जाते हैं।

कर्ज में डूब वह खुदकुशी कर लेता है लेकिन भारत में विधायक-सांसद चुनाव हार कर भी विशेषाधिकार पाये रहता है। हर पूर्व विधायक सांसद को भी किसान की आय से 300 से 400 गुना ज्यादा कम से कम मिलता ही है। देश में किसान की औसत महीने की आय 6241 रुपये है लेकिन विधायक सांसद को पेंशन-सुविधा के  नाम पर हर महीने 2 से ढाई लाख मिलते हैं। तो नेताओं के सरोकार किसान के साथ कैसे हो सकते हैं और संसद के भीतर याद कीजिये तो किसानों को लेकर किसी भी बहस को देख लीजिये संकट कोरम पूरा करने तक का आ जाता है। यानी 15 फिसदी  संसद में किसानों की समस्या पर चर्चा में शामिल नहीं होते। तो फिर किसानों का नाम लेकर राजनीति साधने या सत्ता चलाने का मतलब होता क्या है। क्योंकि राजनीति कर सत्ता पाने के लिये हर राजनीतिक दल को चंदा लेने की छूट है। और चंदा संयोग से ज्यादातर वही कारपोरेट और औघोगिक घराने देते हैं, जिनका  मुनाफा सरकार की उन नीतियो पर टिका होता है जो किसानों के हक में नहीं होती। मसलन खनन से लेकर सीमेंट-स्टील प्लांट की ज्यादातर जमीन खेती की जमीन पर या उसके बगल में होती है।

लेकिन मुश्किल इतनी भर नहीं है। राजनीति कैसे सांसद विधायक के सरोकार किसान-मजदूर से खत्म कर सिर्फ पार्टी के लिये हो जाते है ये एंटी डिफेक्शन बिल के जरीये समझा जा सकता है । मसलन मंदसौर की घटना पर मंदसौर के ही बीजेपी सांसद किसानों पर संसद में वोटिंग होने पर अपनी पार्टी के खिलाफ वोट नहीं दे सकते। यानी मंदसौर के किसान अगर एकजुट होकर स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशो को लागू कराने पर  अड जाये तो मंदसौर का ही सांसद क्या करेगा। व्हिप जारी होने पर पार्टी का साथ देना होगा । क्योंकि याद कीजिये बीजेपी ने भी 2014 के चुनावी  घोषणापत्र में 50 फीसदी न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने का वादा किया। लेकिन 21 फरवरी 2015 को कोर्ट में एफिडेविट देकर कहा कि 50 फीसदी न्यूनतम  समर्थन मूल्य बढ़ाना संभव नहीं है। क्योंकि ऐसा करने से बाजार पर विपरित प्रभाव होगा । यानी चुनावी घोषणापत्र जैसे दस्तावेज में किए वादे का भी  कोई मतलब नहीं। तो फिर चुनावी घोषमापत्र और सरकारो के होने का मतलब ही किसानो के लिये क्या है। क्योंकि महाराष्ट्र में तो बकायदा पीएम और सीएम दोनो ने ही लागत से पचास फिसदी ज्यादा देने का वादा किया था । यानी नेताओं  के सरोकार जब सामाजिक और आर्थिक तौर पर किसानों के साथ होते नहीं है तो  पिर किसानों की बात करने वाला विपक्ष हो किसानों के बदले योग करते हुये कृषि मंत्री हैं। किसानों के जीवन पर फर्क पड़ेगा कैसे। क्योंकि देश की अर्थव्यस्था में किसानी कही टिकती नहीं मसलन देश के ही सच को परख लें।  किसानो पर कुल कर्ज है 12 लाख साठ हजार करोड का है जिसमें फसली कर्ज 7 लाख 70 हजार करोड का है तो टर्म लोन यानी खाद बीज का लोन 4 लाख 85 हजार  करोड का है। और उसके नीचे की लकीर बताती है कि देश के 50 कॉरपोरेट का चार लाख सत्तर हजार करोड़ रुपए का कर्ज संकटग्रस्त है यानी बैंक मान चुकी  है कि वापस आने की संभावना बहुत कम है। कॉरपोरेट को चिंता नहीं कि संकटग्रस्त कर्ज चुकाएगा नहीं तो क्या होगा क्योंकि उसे एनपीए मानने से लेकर री-स्ट्रक्चर करने की जिम्मेदारी सरकार की है। और एनपीए का आलम ये है कि वह 6 लाख 70 हजार करोड़ का हो चुका है । और इन सब के बीच बीते तीन बरस में केन्द्र सरकार ने देश के ओघोगिक घरानों को 17 लाख 14 हजार 461 करोड़ की रियायत टैक्स इंसेटिव के तौर पर दे दी है। तो देश में कभी एनपीए, टैक्स माफी या सकंटग्रस्त तर्ज पर बहस नहीं होती। हंगामा होता है तो किसानों के सवाल पर । क्योंकि देस में 26 करोड पचास लाख परिवार किसानी से जुडे है । तो फिर राजनीति तो किसानी के नाम पर ही होगी । और बाजार इक्नामी के साये तले किसान की अर्थव्यवस्था कहा मायने रखती है। और शायद यही से सवाल खडा होता है कि कर्जमाफी से भी किसान का जीवन बदलता क्यों नहीं।  

ये सवाल इसलिए क्योंकि कर्ज माफी तात्कालिक उपाय से ज्यादा कुछ नहीं-लेकिन किसानों के दर्द पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकते हुए राजनेताओं ने इसी उपाय को केंद्रीय उपाय करार दे डाला है। सच तो यह है कि 70 बरस में ऐसी व्यवस्था नहीं हो पाई कि किसान खुद अपने पैर पर खड़ा हो सके। सिर्फ किसान ही क्यो पूंजी से पूंजी बनाने के खेल में जो नहीं है उसके लिये आगे बढने का या कहे जिन्दगी बेहतर बनाने को कोई इक्नामी प्लानिंग देश में हुई ही नहीं है । मसलन यूपी की दो तस्वीरों को याद कर लीजिये। राहुल गांधी की खाट सभा में लोग तीस सौ रुपये की खाट लूटने में ही लग गये और योगी की सभा के बाद लोग 40 रुपये का डस्टबीन लूटने में ही लग गये। जबकि दोनों ही किसान-मजदूर। सिस्टम को बेहतर बनाने की बात कर रहे थे। यानी देश में किसानों की जो माली हालत है, उसमें सुधार कैसे आये और किसान भी गर्व से सीना चौडा कर खेती करें, क्या ऐसे हालात देश में आ सकते है। ये सवाल इसलिये क्योंकि किसानी को बेहतर करने के लिए जो इंतजाम किए जाने चाहिए थे-वो तो हुए नहीं अलबत्ता दर्द से कराहते किसानों को कर्जमाफी के रुप में लॉलीपॉप थमाया गया। तो एक सवाल अब है कि क्या राज्य सरकारें किसानों का कर्ज माफ कर सकती हैं और क्या ऐसा करने से किसानों की दशा सुधरेगी। तो दोनों सवालों का जवाब है कि ये आसान नहीं। क्योंकि कई राज्यों का वित्तीय घाटा जीडीपी के 5 फीसदी से 10 फीसदी तक पहुंच गया है, जबकि नियम के मुताबिक कोई भी राज्य अपने जीडीपी के 3 फीसदी तक ही कर्ज ले सकता है । यानी पहले से खस्ता माली हालत के बीच किसानों की कर्ज माफी का उपाय आसान नहीं है क्योंकि राज्यों के पास पैसा है ही नहीं और विरोध प्रदर्शन के बीच कर्ज माफी का ऐलान हो जाए, बैंक कर्ज माफ भी कर दें तो भी साहूकारों से लिया लोन माफ हो नहीं सकता ।-किसान कर्ज माफी के बाद भी बैंक से कर्ज लेंगे और एक फसल खराब होते ही उनके सामने जीने-मरने का संकट खड़ा हो जाता है,जिससे उबारने का कोई सिस्टम है नहीं । फसल बीमा योजना अभी मकसद में नाकाम साबित हुई है । और कर्ज माफी की संभावनाओं के बीच भी किसान की मुश्किलें बढ़ती ही हैं,क्योंकि वो कर्ज चुकाना नहीं चाहता या चुका सकता अलबत्ता नए कर्ज मिलने की संभावना बिलकुल खत्म हो जाती है। तो सवाल कर्ज माफी का नहीं,सिस्टम का है। और सिस्टम का मतलब ही जब राजनीतिक सत्ता हो जाये तो कोई करें क्या  । तो होगा यही कि आलू दो रुपये किलो होगा और आलू चिस्प 400 रुपये किलो । टमाटर 5 रुपये होगा और टमौटो कैचअप 200 रुपये किलो । और संसद की कैंटीन में चिप्स है, कैचअप है । और पीएम भी कैंटीन की डायरी में लिख देते है, अन्नदाता सुखी भव ।

Tuesday, June 6, 2017

क्या देश मरघट हो चला है ?

हर घंटे खुदकुशी करता है किसान-छात्र-बेरोजगार युवा


छात्र हो किसान हो या बेरोजगार युवक हो । खुदकुशी लगातार जारी है । साल दर साल जारी है । और सत्ता किसी की भी रहे हालात इतने बदतर हैं कि बीते 15 बरस के दौर में 99 हजार 756 छात्रों ने देश में खुदकुशी कर ली। किसानों की खुदकुशी इन्ही 15 बरस में 2 लाख 34 हजार 642 तक हो गई । और बेरोजगारी भी कैसे देश के युवा को लील रही है, उसकी खुदकुशी के आंकड़े भी 1 लाख 44 हजार 974 है । और साल दर साल छात्र, किसान और बेरोजगारों की खुदकुशी के ये आंकडे सरकारी संगठन एनसीआरबी यानी नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के हैं । यानी बरस दर बरस खुदकुशी देश में कोई रुदन पैदा नही करती । और इन 15 बर के दायरे में कोई राजनीतिक दल ये कह नही सकता कि उसने सत्ता नहीं भोगी।

क्योंकि न 15 बरस में अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर मनमोहन सिंह की सत्ता रही है । और मौजूदा वक्त में मोदी की सत्ता में भी खुदकुशी ना तो छात्रों की रुकी है ना किसानों की ना ही बेरोजगारों की। और सत्ता के लिये सत्ताधारियों से गठबंधन इन 15 बरस में देश की 37 राजनीतिक दलों ने किया । तो दोष दिया किसे जाये? कटघरा बनाया किसके लिये जाये? या फिर उलझ जाया जाये कि किसकी सत्ता में सबसे ज्यादा मौत हुई । सोचिये जो भी लेकिन इस सच के आईने में उस घने अंधेरे पर प्रहार जरुर कीजिये जो सत्ता की राजनीति तले ऐसे सच को भी सही तरीके से बता नहीं पाती । और लगता है जिन्दगी मौत पर भारी हो चली है और उसी जिन्दगी की जद्दोजहद में समाज कुंद हो चला है ।

और धीरे धीरे देश के हालात बताते है कि शिक्षा व्यवस्था चरमरा रही है तो छात्रो के सामने मुश्किल है। रोजगार निकल नहीं रहे तो बेरोजगारी कही ज्यादा मुश्किल हालात पैदा कर रही है। और किसान वह तो हमेशा ही संघर्ष की राह पर है वह पीढियों से देश को अन्न खिलाता जरुर आया है लेकिन खुद के भाग्य का पैसला वह आज भी नहीं कर सकता । और उसकी नियती खुदकुशी ही कैसे होती जा रही है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ में बीजेपी लगातार चुनाव जीत रही है । शिवराज और रमन सिंह जीत की हैट्रिक लगाकार 15 बरस से सत्ता में है । वही महाराष्ट्र में कांग्रेस स्तात में 15 बरस रही और ढाई बरस पहले ही बीजेपी की सत्ता आई । लेकिन किसानो की खुदकुशी थमी नहीं । तो आंदोलन की तस्वीर से इतर खुदकुशी की तस्वीर है क्या । आलम ये है कि बीते 15 बरस में महाराष्ट्र में 56215 किसानों ने खुदकुशी की तो मध्यप्रदेश में 19778 किसानों ने खुदकुशी कर ली । ौर इन्ही 15 बरस में छत्तीसगढ में 16,153 किसानों ने खुदकुशी की ।

यानी 15 बरस का एनसीआरबी का ये खुदकुशी का आंकडा ये बताने के लिये काफी है कि किसी सरकार को कभी किसानों की खुदकुशी की फिक्र नहीं रही । यानी एनसीआरबीत हर दूसरे बरस किसानों की खुदकुशी का
आंकडा जारी करती है । तो पांच बरस के लिये सत्ता में आई सरकार को भी दो बरस बाद पता चलता है कि कितने किसानों ने खुदकुशी की । लेकिन बरस दर बरस जिस तरह किसानो की खुदकुशी तीनो राज्यो में होती रही उसमें सबसे बडा सवाल तो यही है कि फिर किसानो की फिक्र है किसे । और खुदकुशी से लेकर फसल के
समर्थन मूल्य और फसल बीमा के सवाल ही नहीं बल्कि खुदकुशी करने वाले किसानो के परिवार को राहत देने के एलान कितने पोपले होते है उसका अंदाज इसी से लग सकता है कि 15 फीसदी किसान परिवार तो ऐसे है जो खुदकुशी को भी विरासत के तौर पर अपना चुके है । और राज्य ही नहीं केन्द्र सरार के राहत पैकेज भी खुदकुशी क्यो रोक नहीं पा रहे है । ये सिर्फ सवाल नहीं बल्कि देश का ऐसा सच है जिससे हर सत्त आंख चुराती है लेकिन किसानो के हर में बोलने से नहीं घबराती । लेकिन कोई सरकार किसानों के हक में क्यो खडी हो नहीं पाती । ये सवाल कोई भी पूछ सकता है ।

तो किसान तो दूर देश में उपभोक्ता संस्कृति और सरकार का कारपोरेटीकरण किस दिसा में देश को ले जा रहा है इसका अंदाजा इससे भी लग सकता है कि सेन्ट्रल इस्टीट्यूट आफ पोस्ट हारवेस्टिंग इंजिनियरिंग एंड टेक्नालाजी ने रिपोर्ट जारी की और बताया कि हर बरस औसतन 92 हजार 651 करोड रुपये का अनाज सरकार ही ब्रबाद कर देती है । और जो किसान आज पर दूध, सब्जी फल उडेल रहा है उसके पीछे का सच तो ये भी है कि सरकार ही हर बरस 31 करोड रुपये से ज्यादा की सब्जी और फल बर्बाद कर देती है । क्योकि सरकार के पास भंडारण के व्यवस्था नहीं है । किसानो की फसल की किमत देने तो दूर उसकी आधी किमत भी उन्हे मिल नही पा रही है । कल्पना किजिये कि हर बरस औसतन 7186 करोड का आम । 3903 करोड का केला । 5005 करोड का आलू और 3666 करोड़ का टमाटर यू ही बर्बाद हो जाता है । वह बी सरकार की ही नीतियों से । तो फिर सड़क पर बहते दूध या फल सब्जी के फेकें जाने से क्या वाकई सरकार दुखी है । ये मुश्किल है । क्योकि कोलकत्ता के इंडियन इंसट्टीटूट आफ मैनेजमेंट की रिसर्च कहती है कि देश में सरकार के पास सिर्फ 10 पिसदी के ही बंडारण के व्यवस्था है । जिस जहब से 2011-12 से लेकर 2016-17 के बीच 61 हजार 824 टन अनाज बर्बाद हो गया ।और जिस महाराष्ट्र में सत्ता किसानो के हक की बात करने के लिये अब बेताब नजर आ रही है उसका सच तो ये बी है कि 2016-17 में देश में कुल 8679 टन अनाज बर्बाद हुआ , उसमें सिर्फ महारा,्ट्र में 7963 टल अनाज बर्बाद हो गया । तो कौन सी सस्कृति में हम जी रहे है ये सवाल तो कोई बच्चा भी पूछ सकता है । खासकर जब देश में बात उपनिषद और गीता से लेकर गाय की हो रही है। पशुधन बचाने का जिक्र हो चला है । ऐसे में किसे फिक्र है कि देश में बीते 15 बरस में औसतन हर एक धंटे में दो किसान खिदकुशी कर रहा है । और छात्र और बेरोजगार युवाओ की तादाद मिला दे तो हर घंटे एक छात्र और एक युवा खुदकुशी कर रहा है । लेकिन इस सच से हर कोई आंख मूंदे हुये है कि जिसनी तादाद में इंसानो की मौत हो रही है उसके सामने संयोग से जानवरो की मौत भी कम पड जायेगी।

Tuesday, May 23, 2017

टकराव में फंसी दुनिया के लिये आतंकवाद भी मुनाफे का बाजार

भारत ने पहली बार पाकिस्तानी पोस्ट को फायर एसाल्ट से उडाने की विडियो जारी कर खुद को अमेरिका और इजरायल की कतार में खड़ा कर दिया । क्योंकि सामान्य तौर पर भारत या पाकिस्तान ही नहीं बल्कि चीन और रुस भी अपनी सेना का कार्रवाई का वीडियो जारी तो नहीं ही करते हैं। तो इसका मतलब है क्या । क्या अब पाकिसातन अपने देश में राष्ट्रवाद जगाने के लिए कोई वीडियो जारी कर देगा । या फिर समूची दुनिया ही जिस टकराव के दौर में जा फंसी है, उसी में भारत भी एक बडा खिलाड़ी खुद को मान रहा है । क्योंकि दुनिया के सच को समझे तो गृह युद्द सरीखे अशांत क्षेत्र के फेहरिस्त में सीरिया ,यमन , अफगानिस्तान ,सोमालिया , लिबिया , इराक , सूडान और दक्षिण सूडान हैं । तो आतंक की गिरप्त में आये देशों की फेरहिस्त में पाकिस्तान , बांग्लादेश , म्यानमार ,टर्की और नाइजेरिया है।

तो आंतकी हमले की आहट के खौफ तले भारत , फ्रास ,बेल्जियम ,जर्मनी ,ब्रिटेन और स्वीडन हैं । वहीं देशों के टकराव का आलम ये हो चला है कि अलग अलग मुद्दों पर उत्तर कोरिया , दक्षिण कोरिया ,चीन ,रुस ,फिलीपिंस , जापान, मलेशिया ,इंडोनेशिया ,कुर्द और रुस तक अपनी ताकत दिखाने से नहीं चूक रहे। तो क्या दुनिया का सच यही है दुनिया टकराव के दौर में है । या फिर टकराव के पीछे का सच कुछ ऐसा है कि हर कोई आंख मूंदे हुये है क्योकि दुनिया का असल सच तो ये है कि 11 खरब , 29 अरब 62 करोड रुपये का धंधा या हथियार बाजार । जी दुनिया में सबसे बडा धंधा अगर कुछ है तो वह है हथियारों का । और जब दुनिया का नक्शा ही अगर लाल रंग से रंगा है तो मान लीजिये अब बहुत कम जमीन बची है जहा आतंकवाद, गृह युद्द या दोनों देशों का टकराव ना हो रहा हो । और ये तस्वीर ही बताती है कि कमोवेश हर देश को ताकत बरकरार रखने के लिये हथियार चाहिये । तो एक तरफ हथियारों की सलाना खरीद फरोख्त का आंकडा पिछले बरस तक करीब 11 सौ 30 खरब रुपये हो चुका है।

तो दूसरी तरफ युद्द ना हो इसके लिये बने यूनाइटेड नेशन के पांच वीटो वाले देश अमेरिका, रुस , चीन , फ्रासं और ब्रिटेन ही सबसे ज्यादा हथियारो के बेचते है । आंकडो से समझे तो स्टाकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्त इस्टीटयूट के मुताबिक अमेरिका सबसे ज्यादा 47169 मिलियन डालर तो रुस 33169 मिलियन डालर , चीन 8768 मिलियन डालर , फ्रास 8561 मिलियन डालर और ब्रिट्रेन 6586 मिलियन डालर का हथियार बेचता है । यानी दुनिया में शांति स्तापित करने के लिये बने यूनाइटेड नेशन के पांचो वीटो देश के हथियारो के धंधे को अगर जोड दिया जाये तो एक लाख 4 हजार 270 मिलियन डालर होता है । यानी चौथे नंबर पर आने वाले जर्मनी को छोड़ दिया जाये तो हथियारों को बेचने के लिये पांचो वीटो देशो का दरवाजा ही सबसे बडा खुला हुआ है । आज की तारीख में अमेरिका-रुस और चीन जैसे देशों की नजर में हर वो देश है,जो हथियार खऱीद सकता है। क्योंकि हथियार निर्यात बाजार का सबसे बड़ा हिस्सा इन्हीं तीन देशों के पास है । अमेरिका के पास 33 फीसदी बाजार है तो रुस के पास 23 फीसदी और चीन के पास करीब 7 फीसदी हिस्सा है ।यानी अमेरिकी राष्ट्रपति जो दो दिन पहले ही रियाद पहुंचे और दनिया में बहस होने लगी कि इस्लामिक देसो के साथ अमेरिकी रुख नरम क्यो है तो उसके पीछे का सच यही है कि अमेरिका ने साउदी अरब के साथ 110 बिलियन डालर का सौदा किया । यानी सवाल ये नहीं है कि अमेरिका इरान को बुराई देशों की फेहरिस्त में रख कर विरोध कर रहा है । सवाल है कि क्या आने वाले वक्त में ईरान के खिलाफ अमेरिकी सेन्य कार्रवाई दिखायी देगी । और जिस तरह दुनिया मैनेचेस्टर पर हमला करने वाले आईएस पर भी बंटा हुआ है उसमें सिवाय हथियारो को बेच मुनापा बनाये रखने के और कौन सी थ्योरी हो सकती है ।

और विकसित देसो के हथियारो के धंधे का असर भारत जैसे विकासशील देसो पर कैसे पडता है ये भारत के हथियारों की खरीद से समझा जा सकता है । फिलहाल , भारत दुनिया का सबसे बडा या कहे पहले नंबर का देश का जो हथियार खरीदता है । आलम ये है कि 2012 से 2016 के बीच पूरी दुनिया में हुए भारी हथियारों के आयात का अकेले 13 फ़ीसदी भारत ने आयात किया. । स्कॉटहोम इंटरनेशनल पीस रीसर्च इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत ने 2007-2016 के दौरान भारत के हथियार आयात में 43 फ़ीसद की बढ़ोतरी दर्ज की गई । और जिस देश में जय जवान-जय किसान का नारा आज भी लोकप्रिय है-उसका सच यह है कि 2002-03 में हमारा रक्षा बजट 65,000 करोड़ रुपये का था जो 2016-17 तक बढ़कर 2.58 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है. । जबकि 2005-06 में कृषि को बजट में 6,361 करोड़ रुपये मिले थे जो 2016-17 में ब्याज सब्सिडी घटाने के बाद 20,984 करोड़ रुपये बनते हैं । यानी रक्षा क्षेत्र में 100 फीसदी विदेशी निवेश की इजाजत के बावजूद भारत के लिए विदेशों से हथियार खरीदना मजबूरी है। जिसका असर खेती ही नहीं हर दूसरे क्षे6 पर पड रहा है । और जानकारों का कहना है कि भारत हथियार उद्योग में अगले 10 साल में 250 अरब डॉलर का निवेश करने वाला है । यानी ये सवाल छोटा है कि मैनचेस्टर में इस्लामिक स्टेट का आंतकी हमला हो गया । या भारत ने पाकिसातनी सेना की पोस्ट को आंतक को पनाह देने वाला बताया । या फिर सीरिया में आईएस को लेकर अमेरिका और रुस ही आमने सामने है । सवाल है कि टकराव के दौर में फंसी दुनिया के लिये आंतकवाद भी मुनाफे का बाजार है ।

Thursday, May 18, 2017

इंसाफ पर ना-पाक मुहर क्यों ?

क्या भारत को वाकई कुलभूषण जाधव मामले में काउंसलर एक्सेस मिल जायेगा। ये सबसे बड़ा सवाल है क्योंकि पाकिस्तान के भीतर का सच यही है कि कुलभूषण जाघव को राजनयिक मदद अगर पाकिस्तान देने देगा तो पाकिस्तान के भीतर की पोल पट्टी दुनिया के सामने आ जायेगी । और पाकिस्तान के भीतर का सच आतंक, सेना और आईएसआई से कैसे जुड़ा हुआ है इसके लिये चंद घटानाओं को याद कर लीजिये। अमेरिकी ट्विन टावर यानी 2001 में 9/11 का हमला। और पाकिस्तान ने किसी अमेरिकी एजेंसी को अपने देश में घुसने नहीं दिया । जबकि आखिर में लादेन पाकिस्तान के एबटाबाद में मिला । इसी तरह अमेरिकी पत्रकार डेनियल पर्ल की हत्या आतंकवादियों ने 2002 में की । लेकिन डेनियल के अपहरण के बाद से लगातार पाकिस्तान ने कभी अमेरिकी एजेंसी को पाकिस्तान आने नहीं दिया। फिर याद कीजिये मुबंई हमला । 26/11 के हमले के बाद तो बारत ने पांच डोजियर पाकिस्तान को सौंपे। सबूतों की पूरी सूची ही पाकिस्तान को थमा दी लेकिन लश्कर-ए-तोएबा को पाकिस्तान ने आंतकी संगठन नहीं माना । हाफिज सईद को आतंकवादी नहीं माना । भारत की किसी एजेंसी को जांच के लिये पाकिस्तान की जमीन पर घुसने नहीं दिया । फिर सरबजीत को लेकर एकतरफा जांच की । पाकिस्तान के ही मानवाधिकार संगठन ने सरबजीत को लेकर पाकिस्तानी सेना की संदेहास्पद भूमिका पर अंगुली उठायी तो भी किसी भारतीय एजेंसी को पाकिस्तान में पूछताछ की इजाजत नहीं दी गई । और जेल में ही सरबजीत पर कैदियों का हमला कर हत्या कर दी।

और दो बरस पहले पठानकोट हमले में तो पाकिस्तान की जांच टीम बाकायदा ये कहकर भारत आई कि वह भी भारतीय टीम को पाकिस्तान आने की इजाजत देगी । लेकिन दो बरस बीत गये और आजतक पाकिस्तान ने पठानकोट हमले की जांच के लिये भारतीय टीम को इजाजत नही दी । यानी अगला सवाल कोई भी पूछ सकता है कि क्या वाकई पाकिस्तान जाधव के लिये भारतीय अधिकारियों को मिलने की इजाजत देगा । यकीनन ये अंसभव सा है । क्योंकि पाकिस्तान के भीतर का सच यही है कि सत्ता तीन केन्द्रों में बंटी हुई है । जिसमें सेना और आईएसआई के सामने सबसे कमजोर चुनी हुई सरकार है. और तीनों को अपने अपने मकसद के लिये आतंकवादी या कट्टरपंछी संगठनो की जरुरत है। और सत्ता के इसी चेक एंड बैलेस में फंसे पाकिस्तान के भीतर कोई भी विदेशी अधिकारी अगर जांच के लिये जायेगा या पिर जाधव से मिलने ही कोई राजनयिक चला गया। तो पाकिस्तान का कौन सा सच दुनिया के सामने आ जायेगा।

लेकिन इंटरनेशनल कोर्ट आफ जस्टिस के फैसले को अगर पाकिस्तान नहीं मान रहा है तो मान लीजिये इसके पीछे बडी वजह पाकिस्तान के पीछे चीन खड़ा है,जो भारत के लिये अगर ये सबसे मुश्किल सबब है , तो पाकिस्तान के लिये सबसे बडी ताकत है । क्योंकि इंटरनेशनल कोर्ट आफ जस्टिस के फैसले को जिस तरह पाकिस्तान ने बिना देर किये खारिज किया उसने नया सवाल तो ये खडा कर ही दिया है कि क्या आईएसजे के फैसले को ना मान कर पाकिस्तान यून में जाना चाहता है । यून में चीन के वीटो का साथ पाकिस्तान को मिल जायेगा ।जैसे जैश के मुखिया मसूद अजहर पर वीटो पर चीन ने बचाया । जाहिर है चीन के लिये पाकिस्तान मौजूदा वक्त में स्ट्रेटजिक पार्टनर के तौर पर सबसे जरुरी है और भारत चीन के लिये चुनौती है । और ध्यान दें तो कश्मीर में आंतकवाद से लेकर इकनामिक कॉरीडोर तक में जो भूमिका चीन पाकिस्तान के साथ खडा होकर निभा रहा है उसमें जाधव मामले में भ चीन पाकिस्तान के साथ खडा होगा इंकार इससे भी नहीं किया जा सकता । लेकिन जाधव मामले में पाकिस्तान का साथ देना चीन को भी कटघरे में खड़ा सकता है । क्योंकि मौजूदा वक्त में इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस के 15 जजो की कतार में चीन के भी जज जियू हनक्वीन भी है । और आज फैसला सुनाते हुये दो बार रोनी अब्राहम ने सर्वसम्मति से दिये जा रहे फैसले का जिक्र किया । तो एक तरफ चीन के जज अगर फैसले के साथ है तो फिर मामला चाहे यूएन में चला जाये वहा चीन कैसे पाकिस्तान के लिये वीटो कर सकता है । लेकिन ये तभी संभव है जब चीन भी जाधव मामले पर आईएसजे के फैसेल को सिर्फ कानूनी फैसला माने । लेकिन सच उल्टा है . कोर्ट का फैसला भारत पाकिस्तान के संबंधो के मद्देनजर सिर्फ कानून तक सीमित नहीं है और चीन का पाकिस्तान के साथ खडे होना या भारत के खिलाफ जाना कानूनी समझ भर नहीं है । बल्कि राजनीयिक और राजनीति से आगे न्यू वर्ल्ड आर्डर को ही चीन जिस तरह अपने हक में खडा करना चाह रहा है उसमें भारत के लिये सवाल पाकिस्तान नहीं बल्कि चीन है । जिससे टकराये बगैर पाकिस्तान के ताले की चाबी भी नहीं खुलेगी ये भी सच है ।

क्योंकि इससे पहले कभी इंटरनेशनल कोर्ट आफ जस्टिस के पैसले को लेकर पाकिस्तान का रुख इस तरह नहीं रहा । क्योकि ये चौथी बार है, जब भारत और पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय कोर्ट में आमने-सामने हैं। और 1945 में बने इंटरनेशनल कोर्ट आफ जस्टिस के इतिहास में ये पहला मौका है जब किसी देश के खिलाफ इतना कडा पैसला दिया गया हो । और याद किजिये तो 18 बरस पहले पाकिस्तान ने इसी इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस का दरवाजा ये कहकर खटखटा था कि भारत ने जानबूझ कर पाकिस्तान के टोही विमान को मार गिराया । जबकि सच यही था कि सोलह सैनिकों को ले जा रहा पाकिस्तान का विमान जासूसी के इरादे से भारत के कच्छ में घुस आया था । और तब कोर्ट की 15 जजो की पीठ ने 21 जून 2000 को पाकिस्तानं के आरोपों को बहुमत से खारिज कर दिया था । और आज पाकिस्तान की दलील जाधव को जासूस बताने की खारिज हुई ।तो पाकिस्तान को दोनो बार मात मिली है। और पन्नों को पलटें तो 1971 के युद्द के बाद पूर्वी पाकिस्तान को भारत ने जब बांग्लादेश नाम का देश ही खडा कर दिया । और 90 हजार पाकिस्तानी सैनिको को बंदी बनाया । युद्द के बाद 1973 में पाकिस्तान भारत के खिलाफ आसीजे पहुंचा। पाकिस्तान ने आरोप लगाया कि भारत 195 प्रिजनर्स ऑफ वॉर्स को बांग्लादेश शिफ्ट कर रहा है, जबकि उन्हें भारत में गिरफ्तार किया गया है। ये गैरकानूनी है। भारत ने इस मामले लड़ाई लड़ी लेकिन जब तक कुछ फैसला हो पाता दोनों देशों ने 1973 में न्यू दिल्ली एग्रीमेंट साइन कर लिया। और उससे पहले 1971 में भारत ने अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन के अधिकार क्षेत्र के खिलाफ एक मामला दायर किया था। पाकिस्तान ने इस संगठन में भारत की शिकायत की थी। इसमें संगठन ने पाकिस्तान का साथ दिया था इसीलिए इस संगठन के खिलाफ भारत ने अंतरराष्ट्रीय न्यायालय का रुख किया। लेकिन-आसीजे से भारत को निराशा हाथ लगी क्योंकि 18 अगस्त 1972 को फैसला पाकिस्तान के पक्ष में गया था। उस वक्त पाकिस्तान के राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो ने इंटरनेशनल कोर्ट आफ जस्टिस की खूब वाहवाही की थी । और आज पाकिस्तान उसी इंटरनेशनल कोर्ट आफ जस्टिस के फैसले को गलत बता रहा है । तो सवाल अब कुलभूषण जाधव पर अंतरराष्ट्रीय कोर्ट के फैसले का नहीं बल्कि इंसाफ पर पाकिस्तान के नापाक मुहर का है ।


Friday, May 12, 2017

घाटी के सफर पर 24 घंटे

कल तक बंदूक का मतलब आतंक था, आज वादी की हवाओं में बारुद है......


जहाज ने जमीन को छुआ और तो खिड़की से बाहर का मौसम कुछ धुंधला धुंधला सा दिखायी दिया। तब तक एयर-होस्टेज की आवाज गूंज पड़ी...बाहर का तापमान 27 डिग्री है । उमस भी है। सुबह के 11 बजे थे और जहाज का दरवाजा खुलते ही गर्म हवा का हल्का सा झोंका चेहरे से टकराया। सीट आगे की थी तो सबसे पहले श्रीनगर की हवा का झोंका चेहरे से टकराया। घाटी आना तो कई बार हुआ और हर बार आसमान से कश्मीर घाटी के शुरु होते ही कोई ना कोई आवाज कानों से टकराती जरुर रही कि कश्मीर जन्नत क्यों है। लेकिन पहली बार जन्नत शुरु हुई और जहाज जमीन पर आ गया और कोई आवाज नहीं आई। गर्मी का मौसम है जहाज खाली। किराया भी महज साढे तीन हजार। यानी सामान्य स्थिति होती तो मई में किराया सात से दस हजार के बीच होता। लेकिन वादी की हवा जिस तरह बदली। या कहें लगातार टीवी स्क्रीन पर वादी के बिगड़ते हालात को देखने के बाद कौन जन्नत की हसीन वादियों में घूमने निकलेगा । ये सवाल जहन में हमेशा रहा लेकिन जहाज जमीन पर उतरा तो हमेशा की तरह ना तो कोई चहल-पहल हवाई अड्डे पर नजर आई ना ही बहुतेरे लोगों की आवाजाही। हां, सुरक्षाकर्मियों की सामान्य से ज्यादा मौजूदगी ने ये एहसास जरुर करा दिया कि फौजों की आवाजाही कश्मीर हवाई अड्डे पर बढ़ी हुई है। और बाहर निकलते वक्त ना जाने क्यों पहली बार इच्छा हुई कि हर एयरपोर्ट का नाम किसी शक्स के साथ जुड़ा होता है तो श्रीनगर अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट किसके नाम पर है। और पहली बार नजर गई एक किनारे में लिखा है शेख-उल-आलम एयरपोर्ट। कौन है शेख-उल-आलम...ये सोच
बाहर निकला तो इकबाल हाथ में मेरे नाम का प्लेकार्ड लिये मिल गया। इकबाल । श्रीनगर के डाउन टाउन में रहने वाला। टैक्सी चलाता है । और आज से नहीं 1999 से इकबाल में पहली बार एयरपोर्ट पर ही मिला था । तब मैं भी पहली बार श्रीनगर पहुंचा था। लेकिन तब साथ में कैमरा टीम थी। क्योंकि अमरनाथ यात्रा के दौरान आतंकी हिंसा की रिपोर्ट करने पहुंचा। और उसके बाद दर्जनों बार इकबाल ही हवाईअड्डे पर दिल्ली से एक फोन करने पर पहुंच जाता । और हर बार मेरे सवालों का जबाब देते देते वह शहर पहुंचा देता। ये शेख-उल-आलम कौन थे । जिनके नाम पर श्रीनगर हवाई अड्डा है।

आप पहले व्यक्ति है जो पूछ रहे हैं। जनाब वो संत थे । उन्हें नुन्द श्रृषि । यहां से 60 किलोमीटर दूर कुलगाम के क्योमोह गांव में जन्म हुआ था । बहुत नामी संत थे । कुलगाम चलेंगे क्या । श्रीनगर से अनंतनाग। वहां से 10 किलोमीटर ही दूर है । न न । मैं झटके में बोला । कल सुबह लौटना भी है। कुछ घंटों के लिये इस बार आये है। हां ..रोज टीवी पर रिपोर्ट दिखाते दिखाते सोचा शनिवार का दिन है छुट्टी है। रविवार को लौट जाऊंगा । जरा हालात देख आऊं । लोग हालात देख कर नहीं आते और आप हालात देखने आये हो। अब ये किसी से संभल नहीं रहा है। या कहे कोई संभाल नहीं रहा। आप जो भी कहो। लेकिन हर कोई तो सड़क पर ह। ना कोई काम है । ना कमाई। स्कूल कालेज चलते नहीं। बच्चे क्या करें। और मां बाप परेशान हैं। ये देखिये गिलानी का घर। चारों
तरफ पुलिस वाले क्यों है। सिर्फ सिक्यूरिटी फोर्स ही तो है हर जगह। और इकबाल के कहते ही मेरी नजर बाहर सड़क पर गई तो बख्तरबंद गाडियों में सिक्यूरिटी फोर्स की आवाजाही ने खींच लिया। ये सिर्फ हैदरपुरा [ गिलानी का घर ] में है या पूरे शहर में । शहर में आप खुद ही देख लेना । कहां जायेंगे पहले। सीधे लाल चौक ले चलो। जरा हालात देखूंगा । चहल-पहल देखूंगा । फिर यासिन मलिक से मिलूंगा । अब चलती नहीं है सेपरिस्टों की। क्यों दिल्ली से तो लगता है कि अलगाववादी ही कश्मीर को चला रहे हैं। इकबाल हंसते हुये बोला । जब महबूबा दिल्ली की गुलाम हो गई तो आजाद तो सिर्फ सेपरिस्ट ही बचे। फिर चलती क्यों नहीं। क्योंकि अब लोगों में खौफ नहीं रहा । नई पीढी बदल चुकी है । नये हालात बदल चुके हैं । लेकिन सरकारों के लिये कश्मीर अब भी नब्बे के युग में है। आप खुद ही यासिन से पूछ लेना, नब्बे में वह जवान था। बंदूक लिये घाटी का हीरो था । अब सेपरिस्टों के कहने पर कोई सड़क पर नहीं आता । सेपरिस्ट ही हालात देखकर सड़क पर निकले लोगों के साथ खड़े हो जाते हैं। पूछियेगा यासिन से ही कैसे वादी में हवा बदली है और बच्चे-बच्चियां क्यों सडक पर है । रास्ते में मेरी नजरें लगातार शनिवार के दिन बाजार की चहल-पहल को भी खोजती रही । सन्नाटा ज्यादा नजर आया । सड़क पर बच्चे खेलते नजर आये। डल लेक के पास पटरियों पर पहली बार कोई जोड़ा नजर नहीं आया। और लाल चौक। दुकानें खुली थीं। कंटीले तारों का झुंड कई जगहों पर पड़ा था। सुरक्षाकर्मियों की तादाद हमेशा की तरह थी। लाल चौक से फर्लांग भर की दूरी पर यासिन मलिक का घर। पतली सी गली । गली में घुसते ही चौथा मकान। लेकिन गली में घुसते ही सुरक्षाकर्मियों की पहली आवाज किससे मिलना है । कहां से आये है । खैर पतली गली । और घर का लकड़ी का दरवाजा खुलते ही। बेहद संकरी घुमावदार सीढ़ियां । दूसरे माले पर जमीन पर बिछी कश्मीरी कारपेट पर बैठ यासिन मलिक। कैसे आये । बस आपसे मिलने और कश्मीर को समझने देखने आ गये । अच्छा है जो शनिवार को आये । जुम्मे को आते तो मिल ही नहीं पाते। क्यों ? शुक्रवार को सिक्यूरिटी हमें किसी से मिलने नहीं देती और हमारे घर कोई मिलने आ नहीं पाता । यानी । नजरबंदी होती है । तो सेपरिस्टो ने अपनी पहचान भी तो जुम्मे के दिन पत्थरबाजी या पाकिस्तान का झंडा फरहाने वाली बनायी है । आप भूल कर रहे हैं । ये 90 से 96 वाला दौर नहीं है । जब सेपरिस्टो के इशारे पर बंदूक उठायी जाती। या सिक्यूरिटी के खिलाफ नारे लगते । क्यों 90 से 96 और अब के दौर में अंतर क्या आ गया है। हालात तो उससे भी बुरे लग रहे हैं। स्कूल जलाये जा रह हैं। लड़कियां पत्थर फेंकने सड़क पर निकल पड़ी हैं। आतंकी खुलेआम गांव में रिहाइश कर रहे है । किसी आतंकी के जनाजे में शामिल होने  लिये पूरा गांव उमड़ रहा है । तो आप सब जानते ही हो तो मैं क्या कहूं । लेकिन ये सब क्यों हो रहा है ये भी पता लगा लीजिये । ये समझने तो आये हैं। और इसीलिये आपसे मिलने भी पहुंचे हैं। देखिये अब सूचना आप रोक नहीं सकते। टेक्नालाजी हर किसी के पास है । या कहे टेक्नालाजी ने हर किसी को आपस मे मिला दिया है । 90-96 के दौर में कश्मीरियों के टार्चर की कोई कहानी सामने नहीं आ पाई । जबकि उस दौर में क्या कुछ हुआ उसकी निशानी तो आज भी मौजूद है । लेकिन देश – दुनिया को कहां पता चला । और अब जीप के आगे कश्मीरी को बांध कर सेना ने पत्थर से बचने के लिये ढाल बनाया तो इस एक तस्वीर ने हंगामा खड़ा कर दिया । पहले कश्मीर से बाहर पढ़ाई कर रहा कोई छात्र परेशान होकर वापस लौटता तो कोई नहीं जानता था। अब पढे-लिखे कश्मीरी छात्रों के साथ देश के दूसरे
हिस्से में जो भी होता है, वह सब के सामने आ जाता है । कश्मीर के बाहर की दुनिया कश्मीरियों ने देख ली है। इंडिया के भीतर के डेवलेपमेंट को देख लिया है । वहां के कालेज, स्कूल, हेल्ख सेंटर , टेक्नालाजी सभी को देखने
के बाद कश्मीरियों में ये सवाल तो है कि आखिर ये सब कश्मीर में क्यों नहीं । घाटी में हर चौराहे पर सिक्यूरिटी क्यों है ये सवाल नई पीढ़ी जानना चाहती है । उसे अपनी जिन्दगी मे सिक्यूरिटी दखल लगती है। आजादी के मायने बदल गये है बाजपेयी जी । अ

अब  आजादी के नारो में पाकिस्तान का जिक्र कर आप नई पीढी को गुमराह नहीं कर सकते हैं। तो क्या सेपरिस्टो की कोई भूमिका नहीं है । आतंकवाद यूं ही घाटी में चल रहा है। गांव के गांव कैसे हथियारों से
लैस हैं। लगातार बैंक लूटे जा रहे हैं। पुलिस वालों को मारा जा रहा है । क्या ये सब सामान्य है । मैं ये कहां कह रहा हू सब सामान्य है । मैं तो ये कह रहा हूं कि कश्मीर में जब पीढी बदल गई, नजरिया बदल गया । जबकि दिल्ली अभी भी 90-96 के वाकये को याद कर उसी तरह की कार्रवाई को अंजाम देने की पॉलिसी क्यों अपनाये हुये है । क्या किसी ने जाना समझा कि वादी में रोजगार कैसे चल रहा है । घर घर में कमाई कैसे हो रही है । बच्चे पढाई नही कर पा रहे है । तो उनके सामने भविष्य क्या होगा । तो स्कूल जला कौन रहा है । स्कूल जब नहीं जले तब पांच महीने तक स्कूल बंद क्यों रहे...ये सवाल तो आपने कभी नहीं पूछा । तो क्या सेपरिस्ट स्कूल जला रहे हैं । मैंने ये तो नहीं कहा। मेरे कहने का मतलब है जनता की हर मुश्किल के साथ अगर दिल्ली खड़ी नहीं होगी तो उसका लाभ कोई कैसे उठायेगा, ये भी जले हुये स्कूलों को देखकर समझना चाहिये। हुर्रियत ने तो स्कूलों की जांच कराने को कहा । मैंने खुद कहा कौन स्कूल जला रहा है सरकार को बताना चाहिये। आप नेताओं से मिलें तब आपको सियासत समझ में समझ में आयेगी । फिर आप खुद ही लोगों से मिलकर पूछें कि आखिर ऐसा क्या हआ की जो मोदी जी चुनाव से पहले कश्मीरियत का जिक्र कर रहे थे वह वही मोदी जी चुनाव परिणाम आने के बाद कश्मीरियो से दूरी क्यों बना बैठे । और चुनी हुई महबूबा सरकार का मतलब है कितना । यासिन से कई
मुद्दो पर खुलकर बात हुई । बात तो इससे पहले भी कई बार हुई थी । लेकिन पहली बार यासिन मलिक ने देश की राजनीति के केन्द्र में खडे पीएम मोदी को लेकर कश्मीर के हालात से जोडने की वकालत की । सीरिया और आईएसआईएस के संघर्ष तले कश्मीर के हालात को उभारने की कोशिश की । करीब दो घंटे से ज्यादा वक्त गुजारने के बाद मोहसूना [ यासिन का घर } से निकला तो श्रीनगर में कई लोगो से मुलाकात हुई । लेकिन जब बात एक पूर्व फौजी से हुई और उसने जो नये सवाल खडे किये । उससे कई सवालों के जबाव पर ताले भी जड दिये। मसलन पूर्व फौजी ने साफ कहा , जिनके पास पैसा है । जिनका धंधा बडा है । कमाई ज्यादा है । उनपर क्या असर पडा । क्या किसी ने जाना । और जब वादी के हालात बिगड चुके है जब उसका असर जम्मू पर कैसे पड रहा होगा क्या किसी ने जाना । क्या असर हो रहा है । आप इंतजार किजिये साल भर बाद आप देखेगें कि
जम्मू की डेमोग्राफी बदल गई है । वादी में जो छह महीने काम-कमाई होती थी जब वह भी ठप पडी चुकी है तो फिर धाटी के लोग जायेगें कहा । कमाई-धंधे का केन्द्र जम्मू बन रहा है । सारे मजदूर । सारे बिजनेस जम्मू शिफ्ट हो रहे है ।जिन हिन्दु परिवारो को लगता रहा कि घाटी में मिस्लिम बहुतायत है और जम्मू में हिन्दू परिवार तो हालात धीरे धीरे इतने बदल रहे है कि आने वाले वक्त में मुस्लिमो की तादाद जम्मू में भी ज्यादा हो जायेगी । और जम्मू से ज्यादा बिसनेस जब कश्मीर में है तो फिर जम्मू के बिजनेस मैन भी कश्मीरियो पर ही टिके है । लेकिन चुनी हुई सरकार के होने के बावजूद सेना ही केन्द्र में क्यो है । और सारे सवाल सेना को लेकर ही क्यू है । कोई महबूबा मुफ्ती को लेकर सवाल खडा क्यो नहीं करता । ये बात आप नेशनल कान्प्रेस वालो से पूछिये या फिर किसी भी नेता से पूछिये आपको समझ में आ जायेगा । लेकिन आपको क्या मानना है कि महबूबा बेहद कमजोर सीएम साबित हुई है । महबूबा कमजोर नहीं मजबूत हो रही है । उसका कैडर । उसकी राजनीति का विस्तार हो
रहा है । वह कैसे । हालात को बारिकी से समझे । घाटी में जिसके पास सत्ता है उसी की चलेगी । सिक्यूरटी उसे छुयेगी नहीं । और सिक्रयूरटी चुनी हुई सरकार के लोगोग को छेडेगी भी नहीं । महबूबा कर क्या रही है । उसने
आंतकवादियो को ढील दे रखी है । सेपरिस्टो [ अलगाववादियों ] को ढील दे रखी है । पत्थरबाजो के हक में वह लगातार बोल रही है । तो फिर गैर राजनीतिक प्लेयरो की राजनीतिक तौर पर  नुमाइन्दगी कर कौन रहा है । पीडीपी कर रही है । पीडीपी के नेताओ को खुली छूट है । उन्हे कोई पकडेगा नहीं । क्योकि
दिल्ली के साथ मिलकर सत्ता की कमान उसी के हाथ में है । और दिल्ली की जरुरत या कहे जिद इस सुविधा को लेकर है कि सत्ता में रहने पर वह अपनी राजनीति या एंजेडे का विस्तार कर सकती है । लेकिन बीजेपी इस सच को ही समझ नहीं पा रही है कि पीडीपी की राजनीति जम्मू में भी दखल देने की स्थिति में आ रही है । क्योकि जम्मू सत्ता चलाने का नया हब है । और कमान श्रीनगर में है । फिर जब ये खबर ती है कि कभी सोपोर में या कभी शोपिया में सेना ने पत्थरबाजो या तकवादियो को पनाह दिये गांववालो के खिलाफ आपरेशन शुरु कर
दिया है तो उसका मतलब क्या होता है । ठीक कहा आपने दो दिन पहले ही 4 मई को शोपिया में सेना के आपरेशन की खबर तमाम राष्ट्रीय न्यूज चैनलो पर चल रही थी । जबकि शोपियां का सच यही है कि वहा गांव-दर-गांव आंतकवादियो की पैठ के साथ साथ पीडीपी की भी पैठ है । अब सत्ताधारी दल के नेताओ को सिक्यूरिटी देनी है और नेता उन्ही इलाको में कश्मीरियों को साथ खडाकर रहे है जिन इलाको में आंतक की गूंज है । तो सिक्यूरटी वाले करे क्या । इस हालात में होना क्या चाहिये । आप खुद सोचिये । सेना में कमान हमेशा एक के पास होती है तभी कोई आपरेशन सफल होता है लेकिन घाटी में तो कई हाथो में कमान है । और सिक्यूरटी फोर्स सिवाय सुरक्षा देने के अलावे और कर क्या सकती है । हम बात करते करते डाउन-टाउन के इलाके में पहुंच चुके थे । यहां इकबाल का घर था तो उसने कारपेट का बिजनेस करने वाले शौहेब से मुलाकात
करायी । और उससे मिलते ही मेरा पहला सवाल यही निकला कि बैंक लूटे जा रहे है । तो क्या लूट का पैसा आंतकवादियो के पास जा रहा है । शौहेब ने कोई जबाव नहीं दिया । मैने इकबाल  तरफ देखा । तो आपस में कस्मीरी में दोनों ने जो भी बातचीत की उसके बाद शौहेब हमारे साथ खुल गया । लेकिन जवाबा इतना ही
दिया कि मौका मिले तो जे एंड के बैंक के बारे में पता कर लीजिये । ये किसको लोन देते है । कौन  जिन्होने लोन नहीं लौटाया । और जिन्होंने लोन लिया वह है भी की नहीं । तो क्या एनपीए का आप जिक्र कर रहे है । आप कह
सकते है एनपीए । लेकिन जब आपने बैंक के लूटने का जिक्र किया तो मै सिर्फ यहीं समझाना चाह रहा हूं कि बैक बिना लूटे भी लूटे गये है । लूटे जा रहे है । लूटने का दिखावा अब इसलिये हो रहा है जिससे बैक को कोई जवाब ना देना पडे । डाउन डाउन में ही हमारी मुलाकात दसवी में पढाई करने वाले छात्र मोहसिन वानी से हुई । निहायत शरीफ  । जानकारी का मास्टर । परीक्षा देकर कुछ करने का जनुन पाले मोहसिन से जब हमने उसके स्कूल के बार में पूछा तो खुद सेना के स्कूल में अपनी पढाई से पहले उसने जो कहा , वह शायद भविष्य
के कश्मीर को पहला दागदार चेहरा हमें दिखा गया । क्योंकि जिक्र तो सिर्फ उसकी पढाई का था । और उसने झटके में घाटी में स्कूल-कालेजो का पूरा कच्चा-चिट्टा ये कहते हुये हमारे सामने रख दिया कि अगर अब मुझसे स्कूल और हमारी पढाई के बारे में पूछ रहे है तो पहले ये भी समझ लें सिर्फ 20 दिनों में कोई स्कूल साल भर की पढाई कैसे करा सकता है । लेकिन घाटी में ये हो रहा है । क्योंकि कश्मीर घाटी में बीते 10 महीनो में कुल जमा 46 दिन स्कूल कालेज खुले । आर्मी पब्लिक स्कूल से लेकर केन्द्रीय विद्यालय तक और हर कान्वेंट से लेकर हर लोकल स्कूल तक । आलम ये है कि वादी के शहरों में बिखरे 11192 स्कूल और घाटी के ग्रामीण इलाको में सिमटे 3 280 से ज्यादा छोटे बडे स्कूल सभी बंद हैं । और इन स्कूल में जाने वाले करीब दो लाख से ज्यादा छोटे बडे बच्चे घरो में कैद हैं । ऐसे में छोटे छोटे बच्चे कश्मीर की गलियों में घर के मुहाने पर खड़े होकर टकटकी लगाये सिर्फ सड़क के सन्नाटे को देखते रहते हैं। और जो बच्चे कुछ बड़े हो गये हैं, समझ रहे हैं कि पढ़ना जरुरी है । लेकिन उनके भीतर का खौफ उन्हे कैसे बंद घरों के अंधेरे में किताबो से रोशनी दिला पाये ये किसी सपने की तरह है। क्योंकि घाटी में बीते 10 महीनो में 169 कश्मीरी युवा मारे गये हैं। और इनमें से 76 बच्चे हाई स्कूल में पढ़ रहे थे । तो क्या बच्चो का ख्याल किसी को नहीं । नही हर कोई हिंसा के बीच आतंक और राजनीतिक समाधान का जिक्र तो कर रहा है लेकिन घरो में कैद बच्चो की जिन्दगी कैसे उनके भीतर के सपनों को
खत्म कर रही है और खौफ भर रही है , इसे कोई नहीं समझ रहा है । लेकिन अब तो सरकार कह रही है स्कूल कालेज खुल गये । और बच्चे भटक कर हाथो में पत्थर उठा लिये है तो वह क्या करें । ठीक कह रहे है आप । आप दिल्ली से आये है ना । तो ये भी समझ लिजिये स्कूल कालेज खुल गये हैं लेकिन कोई बच्चा इसलिये स्कूल नहीं आ पाता क्योंकि उसे लगता है कि स्कूल से वह जिन्दा लौटेगा या शहीद कहलायेगा। बच्चे के भीतर गुस्सा देख मै खुद सहम गया । मै खुद भी सोचने लगा जिन बच्चो के कंघे पर कल कश्मीर का भविष्य होगा उन्हे कौनसा भविष्य मौजूदा वक्त में समाज और देश दे रहा है इसपर हर कोई मौन है । और असर इसी का है कि घाटी में 8171 प्राइमरी स्कूल, 4665 अपर प्राईमरी स्कूल ,960 हाई स्कूल ,300 हायर सेकेंडरी स्कूल, और सेना के दो स्कूल में वाकई पढाई हो ही नही रही है ।  श्रीनगर से दिल्ली तक कोई सियासतदान बच्चों के बार में जब सोच नहीं रहा है । हमारी बातचीत सुन खालिद भी आ गया था । जो बेफ्रिकी से हमे सुन रहा था । लेकिन जब मैने टोका खालिद आप कालेज में पढते है । तो उसी बेफ्रिकी के अंदाज में बोला...पढता था । क्यों अब । वापस आ गया । कहां से । कोटा से । राजस्थान में है । वापस क्यो आ गये । खबर तो बनी थी कश्मीर के लडको को राजस्थान में कैसे कालेज छोडने को कहां गया । मुझे भी याद आया कि सिर्फ राजस्तान ही नहीं बल्कि यूपी में कश्मीरी छात्रो को वापस कश्मीर लौटने के लिये कैसे वही के छात्र और कुछ संगठनो ने दवाब बनाया । बाद में गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने इसका विरोध किया । लेकिन ये मुझे खालिद से मिलकर ही पता चला कि दिल्ली की
आवाज भी कश्मीरी छात्रों के लिये बे-असर रही । फिर भी मैने खालिद को टटोला अब आगे की पढाई । तो उसी गुस्से भरे अंदाज में खालिद बोल पडा सीरिया में बीते 725 दिनों से बच्चों को नहीं पता कि वह किस दुनिया में जी रहे हैं। स्कूल बंद हैं। पढ़ाई होती नहीं । तो ये बच्चे पढ़ना लिखना भी भूल चुके हैं। और समूची दुनिया में इस सच को लेकर सीरिया में बम बरसाये जा रहे हैं कि आईएसआईएस को खत्म करना है तो एक मात्र रास्ता हथियारों का है । युद्द का है। लेकिन वक्त के साथ साथ बड़े होते बच्चों को दुनिया कौन सा भविष्य दे रही है इसपर समूची दुनिया ही मौन है । इसके बाद बातचीत को कईयो से हुई । 90-96 के आंतकवाद के जख्मो को भी टटोला और अगले दिन यानी रविवार को सुबह सुबह जब एयरपोर्ट के निकल रहा था तो चाहे अनचाहे इकबाल बोला , सर
आपको सीएम के घर की तरफ से ले चलता हूं । वक्त है नहीं । फिर मिलना भी नहीं है । अरे नहीं सर ..मिलने नहीं कह रहा हू । आपने फिल्म हैदर देखी थी । हां क्यों । उसमें सेना के जिन कैंपों का जिक्र है । जहां आतंकवादियो को रखा जाता था । कन्सनट्रेशन कैंप । हा, वही कैंप, जिसमें कश्मीरियों को बंद रखा
जाता था । उसे श्रीनगर में पापा कैंप के नाम से जानते हैं। और श्रीनगर में ऐसे तीन कैंप थे । लेकिन मैं आपको पापा-2 कैंप दिखाने ले जा रहा हूं । कन्सनट्रैशन कैंप अब तो खाली होगा । नहीं.. वही तो दिखाने ले जा रहा हूं
। और जैसे ही सीएम हाउस शुरु हुआ ...इकबाल तुरंत बोल प़डा , देख लीजिए,,यही है पापा-2 । तो 1990-96 के दौर के कन्सनट्रैशन कैप को ही सीएम हाउस मे तब्दील कर दिया गया । मैंने चलती गाड़ी से ही नजरों को घुमा कर देखा और सोचने लगा कि वाकई घाटी में जब आंतकवाद 90-96 के दौर में चरम पर था और अब जब आतंकवाद घाटी की हवाओ में समा चुका है तो बदला क्या है आंतकवाद...कश्मीर या कश्मीर को लेकर सियासत का आंतकी चेहरा ।

क्योंकि मेरे जहन में सीएम हाउस को देखकर पापा-टू कैप में रखे गये उस दौर के आंतकवादी मोहम्मद युसुफ पैरी  याद आ गया । जिसने आंतक को 90 के दशक में अपनाया । पाकिस्तान भी गया । पाकिस्तान में हथियार चलाने की ट्रेनिंग भी ली । उसकी पहचान कूकापैरी के तौर पर बनी । वह उस दोर में जेहादियो का आदर्श था । लेकिन पाकिसातन के हालात को देखकर लौटा तो भारतीय सेना के सामने सरेंडर कर दिया । फिर मुख्यधारा में शामिल होने के लिये इखवान नाम का संगठन शुरु किया । जो आतंकवाद के खिलाफ था । और कूकापैरी जो कि मुसलमान था । कश्मीरी था । आतंकवादी बन कर आजादी के लिये निकला था । वही कूकापैरी जब आंतकवाद के खिलाफ खडा हुआ तो कश्मीर में हालात सामान्य होने लगे । उसी के आसरे 1996 में भारत कश्मीर में चुनाव करा सका । वह खुद भी चुनाव लड़ा । जम्मू कश्मीर आवामी लीग नाम की पार्टी बनायी ।  विधायक बना । और आंतकवाद के जिस दौर में फारुख अबंदुल्ला लंदन में गोल्फ खेल रहे थे । वह चुनाव लडने 1996 में वापस इंडिया लौटे । और चुनाव के बाद फारुख अब्दुल्ला को दिल्ली ने सत्ता थमा दी । और कूकापैरी को जब बांदीपूरा के हसैन सोनावारी में जेहादियो ने गोली मारी तो उसके अंतिम संस्कार में सत्ताधारी तो दूर । डीएम तक नहीं गया । कश्मीर के आतंक के दौर की ऐसी बहुतेरी यादें लगातार जहन में आती रही और सोचने लगा कि वाकई घाटी में जब आंतकवाद 90-96 के दौर में चरम पर था और अब जब आतंकवाद घाटी की हवाओं में समा चुका है तो बदला क्या है आतंकवाद...कश्मीर या कश्मीर को लेकर सियासत का आतंकी चेहरा । ये सोचते सोचते कब दिल्ली दिल्ली आ गया और कानों में एयर होस्टेज की आवाज सुनाई पड़ी कि बाहर का तापमान 36 डिग्री है । सोचने लगा सुबह 11 बजे दिल्ली इतनी गर्म । और जन्नत की गर्माहट के बीच सुकून है कहां ।