Friday, May 15, 2015

पहले साल में फिर सबसे अहम सवाल बचकाने करार दिये गये

26 मई 2014 को राष्ट्रपति भवन के खुले परिसर में नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में 45 सांसदों ने मंत्री पर की शपथ ली लेकिन देश-दुनिया की नजरें सिर्फ मोदी पर ही टिकीं।  और साल भर बाद भी देश-दुनिया की नजरें सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी ही टिकी हैं। साल भर पहले शपथग्रहण समारोह में सुषमा, राजनाथ जीत कर भी हारे हुये लग रहे थे और अरुण जेटली व स्मृति ईरानी लोकसभा चुनाव हार कर भी जीते थे। पहले बरस ने देश को यह पाठ भी पढ़ाया कि चुनाव जीतने के लिये अगर पूरा सरकारी तंत्र ही लग जाये तो भी सही है। और सरकार चलाने के लिये जनता के दबाव से मुक्त होकर चुनाव हारने या ना लड़ने वालों की फौज को ही बना लिया जाये। इसलिये देश के वित्त मंत्री, रक्षा मंत्री, मानव संसाधन मंत्री,सूचना प्रसारण मंत्री, वाणिज्य मंत्री, उर्जा मंत्री, पेट्रोलियम मंत्री, रेल मंत्री, संचार मंत्री, अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री समेत दर्जन भर मंत्री राज्य सभा के रास्ते संसद पहुंच कर देश को चलाने लगे। या फिर मंत्री बनाकर राज्यसभा के रास्ते सरकार में शामिल कर लिया गया। क्योंकि सरकार चलाते वक्त जनता के बोझ की जिम्मेदारी तले कोई मंत्री पीएमओ की लालदीवारो के भीतर सरकार के विजन पर कोई सवाल खड़ा ना कर दें। तो पहले बरस इसके कई असर निकले। मसलन मोदी जीते तो बीजेपी की सामूहिकता हारी। मोदी जीते तो संघ का स्वदेशीपन हारा। मोदी जीते तो राममंदिर की हार हुई विकास की जीत हुई। मोदी जीते तो हाशिये पर पड़े तबके की बात हुई लेकिन दुनिया की चकाचौंध जीती। मोदी पीएम बने तो विकास और हिन्दुत्व टकराया। मोदी पीएम बने तो विदेशी पूंजी के लिये हिन्दुस्तान को बाजार में बदलने का नजरिया सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को भी भारी पड़ता नजर आया। यानी पहले बरस का सवाल यह नहीं है कि बहुसंख्यक तबके की जिन्दगी विकास के नाम पर चंद हथेलियों पर टिकाने की कवायद शुरु हुई और बेदाग सरकार का तमगा बरकरार रहा। पहले बरस का सवाल यह भी नहीं है कि महंगाई उसी राज्य-केन्द्र के बीच की घिंगामस्ती में फंसी नजर आयी जो मनमोहन के दौर में फंसी थी।

पहले बरस का सवाल यह भी नहीं है कि कालाधन किसी बिगडे घोड़े की तरह नजर आने लगा जिसे सिर्फ चाबुक दिखानी है। और सच सियासी शिगूफे में बदल देना है। पहले बरस का सवाल रोजगार के लिये कोई रोड मैप ना होने का भी नहीं है और शिक्षा-स्वास्थ्य को खुले बाजार में ढकेल कर धंधे में बदलने की कवायद का भी नहीं है। पहले बरस का सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि जिस राजनीति और उससे निकले नायको को खलनायक मान कर देश की जनता ने बदलाव के लिये गुजरात के सीएम को पीएम बनाकर देश को बदलने के सपने संजोये उसी
जनता के सपनों की उम्र 2019 और 2022 तक बढायी गई। बैंक खातों से लेकर पेंशन योजना और विदेशी जमीन पर भारत की जयजयकार से लेकर देश को स्वच्छ रखने तले हर भावना को नये सीरे से ढालने की कोशिश हुई। और राजनीति को उसी मुहाने पर ला खडा किया गया जिसके प्रति गुस्सा था। क्योंकि जाति की राजनीति। भ्रष्ट होती राजनीति । सत्ता के लिये किसी से भी गठबंधन कर मलाई खाने की राजनीति। लाल बत्ती के आसरे देश को लूटने की राजनीति से ही तो आम आदमी परेशान था। गुस्से में था । उसे लग चुका था कि राजनीतिक सत्ता तो देश के 543 सांसदों की लूट या दर्जन भर राजनीतिक दलों की सांठगांठ । या देश के दस कारपोरेट या फिर ताकतवर नौकरशाही के इशारों पर चल रहा है । उनके विशेषाधिकार को ही देश का संविधान मान लिया गया है। इसलिये संविधान में मिले हक के लिये भी आम जनता को राजनेताओं के दरवाजे पर दस्तक देनी पड़ती। सत्ता के दायरे में खडे हर शख्स के लिये कानून-नियम बेमानी है और जनता के लिय सारे नियम कानून सत्ताधारियो के कोठे तक जाते हैं। यानी वहां से एक इशारा पुलिस थाने में एफआईआर करा सकता है। स्कूल में एडमिशन करा सकता है। अदालत जल्द फैसला दे सकती है। और अपराधी ना होने के बावजूद अपराधी भी करार दिये जा सकते है। लेकिन 26 मई 2014 के बाद हुआ क्या। पहले बरस ही कश्मीर में जिन्हे आतंकवादियों के करीब बताया उसके साथ मिलकर सत्ता बनाने में कोई हिचक नहीं हुई। महाराष्ट्र में जिसे फिरौती वसूलने वाली पार्टी करार दिया उसके साथ ही मिलकर सरकार बना ली। जिस चाचा भतीजे के भ्रष्टाचार पर बारामती जाकर कसीदे पढ़े उसी के एकतरफा समर्थन को नकारने की हिम्मत तो हुई नहीं उल्टे महाराष्ट्र की सियासत में शरद पवार
का कद भी बढ गया। जिस झारखंड में आदिवासियों के तरन्नुम गाये वहां का सीएम ही एक गैर आदिवासी को बना दिया गया।

पहले बरस का संकट तो हर उस सच को ही आईना दिखाने वाला साबित होने लगा जिसकी पीठ पर सवाल होकर जनादेश मिला। क्योंकि बरस भर पहले कहां क्या क्या गया। किसान खत्म हो रहा है। शिक्षा सस्थान शिक्षा से दूर जा रहे हैं। हास्पिटल मुनाफा बनाने के उद्योग में तब्दील हो गये हैं। रियल इस्टेट कालेधन को छुपाने की अड्डा बन चुके हैं।खनिज संपदा की विदेश लूट को ही नीतियों में तब्दील किया जा रहा है।  सुरक्षा के नाम पर हथियारो को मंगाने में रुचि कमीशन देखकर हो रही है। सेना का मनोबल अंतर्राष्ट्रिय कूटनीति तले तोड़ा जा रहा है। युवाओं के सामने जिन्दगी जीने का कोई ब्लू प्रिट नहीं है। हर रास्ता पैसे वालो के लिये बन रहा है। तमाम सस्थानो की गरिमा खत्म हो चुकी है । याद किजिये तो बरस भर पहले लगा तो यही कि सभी ना सिर्फ जीवित होंगे बल्कि पहली बार 1991 में अपनायी गई बाजार अर्थव्यवस्था को भी ठेंगा दिखाया जायेगा। वैकल्पिक सोच हो या ना हो लेकिन बदलाव की दिशा में कदम तो ऐसे जरुर उठेगे जो देश की गर्द तले खत्म होते सपनों को फिर से देश को बनाने के लिये खड़े होंगे। लेकिन रास्ता बना किस तरफ। विदेशी पूंजी पर विकास टिक गया।

विकास दर को आंकडो में बदलने की मनमोहनी सोच पैदा हो गई। रसोइयों से चावल दाल खत्म कर प्रेशर कूकर की इंडस्ट्री लगाने के सपने पाले जाने लगे। देशी व्यापारी, देशी उगोगपतियो से लेकर देसी कामगार और देसी नागरिक आर्थिक नीतियों की व्यापकता में सिवाय टुकटुकी लगाये विदेशी पैसा और विदेशी कंपनियो के आने के बाद ठेके पर काम करने से लेकर ठेके पर जिन्दगी जीने के हालात में बीते एक बरस से इंतजार में मुंह बाये खड़ा है। फिर जो कहा गया वह हवा में काफूर हो गया। 26 मई 2014 को सत्ता संभालने के महीने भर में ही यानी जून 2014 में तो दागी सांसदों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई को साल भर के भीतर अंजाम तक पहुंचाने का खुला वादा किया गया । लेकिन साल बीता है तो भी संसद के भीतर 185 दागी मजबूती के साथ दिखायी देते रहे। बीजेपी के ही 281 में से 97 सांसद दागी हैं। एडीआऱ की रिपोर्ट बताती है कि प्रधानमंत्री मोदी के मंत्रिमंडल में ही 64 में से 20 दागदार हैं। जबकि अगस्त 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने ही कहा कि कम से कम पीएम और तमाम राज्यो के सीएम तो किसी दागी को अपने मंत्रिमंडल में ना रखें। असल में पहला बरस तो भरोसा जगाने और उम्मीद के उडान देने का वक्त होता है । लेकिन देश में भरोसा जगाने के लिये विदेशी जमीन का बाखूबी इस्तेमाल उसी तरह किया गया जैसे बीजेपी से खुद को बडा करने के लिये पार्टी के बाहर का समर्थन प्रधानमंत्री मोदी को इंदिरा गांधी के तर्ज पर नायाब विस्तार देने लगा । देसी कारपोरेट को खलनायक करार देकर खुद को जनकल्याण से जोडने की कवायद का ही असर हुआ कि एक तरफ विदेशी कंपनियों से वायदे किये गये कि भारत में आर्थिक सुधाऱ के लिये जमीन बन जायेगी। तो दूसरी तरफ खेती की जमीन पर सवालिया निशान लगाने से लेकर मजदूरो की नियमावली भी सुधार से जोड़कर जनकल्याण पर्व मनाने के एलान किया गया । जनता तो समझी नहीं संघ भी समझ नहीं पाया कि मजदूर विरोधी कानून के खिलाफ खड़ा हो या जनकल्याण पर्व में खुद को झोंक दें। उम्मीद उस बाजार को देने की कोशिश की गई जो सिर्फ उपभोक्ताओ की जेब पर टिकी है। जिस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को अपने प्रचारकों पर गर्व रहता है कि उनके सामाजिक सरोकार किसी भी राजनीतिक दल के कार्यकर्ता पर भारी पड़ते है, वह संघ परिवार पहली बार बदलते दिखा। प्रचारक से पीएम बने नरेन्द्र मोदी ने उस ग्रामीण व्यवस्था को ही खारिज कर दिया जिसे सहेजे हुये संघ ने 90 बरस गुजार दिये । स्मार्ट सिटी की सोच और बुलेट ट्रेन दौडाने के ख्वाब से लेकर गांव गांव शौचालय बनाने और किसान मजदूर को बैक के रास्ते जिन्दगी जीने का ककहरा पढ़ाने का बराबर का ख्वाब सरकारी नीतियों के तहत पाला गया। यानी जिस रास्ते को 26 मई 2014 को शपथ लेने से पहले देश की जनता के बीच घूम घूमकर खारिज किया गया जब उसी रास्ते को बरस भर में ठसक के साथ मोदी सरकार ने अपना लिये। चूंकि 2014 का जनादेश कुछ नये संकेत लेकर उभरा । और उसकी वजह राजनीतिक सत्ता से लोगों का उठता भरोसा भी था। तो झटके में जनादेश के नायक बने प्रधानमंत्री मोदी बीतते वक्त के साथ देश के नायक से ब्रांड एंबेसडर में बदलते भी बने। और ब्रांड एंबेसडर की नजर से विकास का समूचा नजरिया उसी उपभोक्ता समाज की जरुरतो के मुताबिक देखा समझा गया जिसे देखकर दुनिया भारत को बाजार माने। तो पहले बरस का आखिरी सवाल यही उभरा कि बीते दस बरस के उस सच को मोदी सरकार आत्मसात करेगी या बदलेगी जहा देश के चालिस फिसदी संसाधन सिर्फ 62 हजार लोगों में सिमट चुके हैं। आर्थिक असमानता में तीस फिसदी के अंतर और बढ़ चुका है। जिसके दायरे में शहरी गरीब 700 रुपये महीने पर जिन्दा हैं तो शहरी उपभोक्ता 18690 रुपये महीने पर रह रहा है। यानी जिन नीतियों पर पहले बरस की सोच गुजर गई उस मुताबिक देश के पच्चीस करोड़ के बाजार के लिये सरकार को जीना है और वही से मुनाफा बना कर बाकी सौ करोड़ लोगों के लिये जीने का इंतजाम करना है।

Friday, May 8, 2015

60-12=48

आपको नौकरी मिली। नहीं मिली। किसानों को खून पसीने की कमाई मिली। नहीं मिली। जवानों के कटते गर्दन का जवाब सरकार ने कभी दिया। नहीं दिया। महंगाई से निजात मिली। नहीं मिली। बिना घूस के काम होता है। नहीं होता है। घोटालो की सरकार को बदलना है। बदलना है। स्विस बैंक से कालाधन लायेंगे। हां लायेंगे। आपने उन्हें साठ साल दिये। हमे सिर्फ साठ महीने देंगे। हां देंगे। और अब साठ महीनो में से बचे है अडतालीस महीने। तो क्या चुनाव से एन पहले नारे और नारों के साथ जनता की गूंज ने पहले बारह महीनों में देश को एक ऐसे मुहाने पर ला खड़ा किया, जहां नारों से सुर मिलाती जनता को लगने लगा कि सत्ता उसे घोखा दे रही है या फिर अच्छे दिन लाने के वादे के बीच उसी व्यवस्था के मोदी भी शिकार हो गये, जिसने 1991 के आर्थिक सुधार के बाद देश के हर सरकार को दबोचा चाहे वह यूपीए हो या एनडीए या फिर यूनाइटेड फ्रंट। किसानों के मुद्दा आर्थिक सुधार होने नहीं देगा। जवानों का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय कूटनीति चलने नहीं देगा। कालेधन पर नकेल आवारा पूंजी पर टिके विकास की रीढ़ को तोड़ देगा। महंगाई पर रोक बिचौलियों की राजनीतिक साठगांठ को खत्म कर देगा । तो क्या मोदी सरकार के पास विकास का कोई ऐसा माडल है ही नहीं जिसके आसरे देश में एक आर्थिक सोशल इंडेक्स खड़ा किया जा सका। समाज की विषमता को थामा जा सके। यकीनन पहले बरस के बीतते बीतते यही सवाल हर किसी के सामने मुंह बाये खड़ा है कि अगर मनमोहन डिजाइन की अर्थव्यवस्था ही मोदी के विकास के नारे में फिट करनी है तो फिर जो काम मनमोहन सिंह राजनीतिक मजबूरी की वजह से कर नहीं पाये वह काम आसानी से मोदी पूरा तो कर सकते हैं।

लेकिन हाशिये पर पड़े भारत के जिस बहुसंख्यक समाज को मुख्यधारा में लाने के सियासी तानेबाने बुने गये, उन्हें ही हाशिये पर ढकेलना पहले बारह महीनो में मोदी की फितरत बन गई। लेकिन पहली बार किसी सरकार की उपलब्धि कामकाज से ज्यादा चुनावी जीत पर जा टिकी यह भी मोदी के दौर का नायाब सच है। महाराष्ट्र, झारखंड और जम्मू कश्मीर में बीजेपी से ज्यादा केन्द्र सरकार की जीत और मोदी की जीत को ही जिस तरह देश के सामने रखा गया उसने पहली बार यह भी संकेत दिये की चुनाव जीतना और किसी भी तरह सरकार बना लेना ही सबसे महत्वपूर्ण है। क्योंकि सरकार अगर काम ना करे तो वह चुनाव हार जाती है। लेकिन कोई सरकार चुनाव जीतते चले तो फिर वह काम कर रही है यह बोलने और दिखाने की जरुरत नहीं है । शायद इसीलिये मोदी सरकार की उपलब्धियो के खाके में फिरौती लेने वाली पार्टी शिवसेना को करार देने के बाद भी साथ मिलकर सरकार बनाने में कोई हिचक नहीं दिखायी दी । बाप-बेटी की पार्टी और पाकिस्तान परस्त राजनीति करने वालो की कतार में मुफ्ती सईद की पार्टी को चुनाव प्रचार में करार देने के बाद भी सरकार साथ मिलकर बनायी । झारखंड में आदिवासियों का सवाल उठाकर गैर आदिवासियो के भ्रष्टाचार की अनकही कहानी चुनाव प्रचार में कही गई लेकिन झारखंड के सीएम के तौर पर गैर आदिवासी को चुना गया। दरअसल मोदी सरकार के पहले बारह महीने चुनावी संघर्ष और मनमोहन की नीतियो को खारिज करने में ज्यादा बीता । सरकार चलाने के लिये सत्ता की ताकत पीएमओ में कैसे केन्द्रित हो इसमें ज्यादा बीता। नौकरशाही और कारपोरेट के बीच मंत्रियो को नीतियां लागू कराने के लिये फाइलो पर चिडिया बैठाने की सोच के आगे कैसे ले जाया जा सकता है इस मशक्कत में ज्यादा बीता। यानी मोदी गुजरात से चलकर ही दिल्ली नहीं पहुंचे बल्कि दिल्ली को हराकर पीएम बने तो उसकी झलक दिखाने में पहले बारह महीने लगे इससे कार नहीं किया जा सकता है। तो अगला सवाल होगा कि
क्या पहले बारह महीनो में मोदी सरकार ने सिस्टम की ओवर हाइलिंग भर की है । यानी काम अगले 48 महीनो में होना है। तो सवाल ओवरहाइलिंग का नहीं बल्कि अपनी दिशा को बताने या अपने सियासी अंतर्विरोध को छुपाते हुये आगे बढा कैसा जाये इसपर मशक्कत का ही रहा। मोदी सरकार के लिये पहले बारह
महीनो में जो सवाल सबसे बडा बना वह मोदी के विकास की अवधारणा की मान्यता का ही रहा। क्योंकि विकास के लिये जिस तरह खुले तौर पर विदेशी निवेश की जरुरत बतायी गई। विदेशी निवेश के लिये भारत के श्रमिक कानूनों में बदलाव लाने की बात सोची गई। उसने मोदी के सामने संघ परिवार की उसी विचारधारा
को सामने ला खड़ा किया जो अभी तक स्वदेशी का राग अपना रही थी । विदेशी निवेश की जगह देसी पूंजी को महत्व देना चाह रही थी। मजदूरों के हितों के लिये संघर्ष करने पर उतारु थी। यानी विकास को लेकर टकराव राजनीतिक विरोधियों से नहीं बल्कि अपनो को ही सहेजना ज्यादा रहा। भारतीय मजदूर संघ
और स्वदेशी जागरण मंच को संभाला गया। तो अगला सवाल विदेशी निवेश के लिये देश में उस वातावरण का आकर खड़ा हो गया जो टिका तो सामाजिक-आर्थिक विसंगतियों के लेकर आजादी के बाद से सरकारों के नजरिये पर था। लेकिन उसे कही भ्रटाचार तो कही लाल फीताशाही से जोड़ा गया। कानूनों में बदलाव लाकर
विदेशी निवेश के लिये सियासी जमीन बनाने की मशक्कत शुरु हुई । लेकिन आखिरी सवाल उस जमीन का आकर खडा हो गया जिसके बगैर कोई योजना देश में लागू हो ही नहीं सकती। तो भूमि अधिग्रहण के सवाल ने किसानो के उस हालात को मोदी सरकार के सामने ला खड़ा किया जिसपर हर सरकार ने ना सिर्फ आखे मूंदी बल्कि आर्थिक सुधार के बाद से तमाम राजनीतिक दलो ने जिस सर्वसम्मती से इस बात पर मुहर लगा दी थी कि खेती अपनी मौत खुद मरेगी । जीडीपी में खेती का योगदान संभव नहीं है । तो खेती को उघोग का दर्जा देना भी बेमतलब होगा । यानी जिस तेजी से किसान किसानी छोड़ रहा है । जिस तेजी से देश में सस्ते
मजदूरो की तादाद बढ रही है।

जिस तेजी से खेती के लिये इस्तेमाल हर वस्तु पर बडी कंपनियो ने कब्जा कर लिया है । और जिस तेजी से किसान आहत होकर खुदकुशी कर रहा है उसमें खेती की जमीन पर सिचाई का इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने से बेहतर है, खेती की जमीन पर उद्योग लगा दिये जाये। बड़ी बड़ी योजनाओं को अमली जामा पहना कर विकास की चकाचौंध को विदेशी पूंजी के जरीये देश में ले या जाये। यानी जो सोच 1991 में वित्त मंत्री रहते हुये मनमोहन सिंह ने ड्राफ्ट की उसी सोच को 24 बरस बाद अमली जामा पहनाने में किसी सरकार को बहुमत मिला तो वह मोदी सरकार है। लेकिन पहले ही बरस मोदी इस सच को भूल गये कि आजादी के बाद किसी सरकार को सबसे कम वोट फिसदी के आधार पर सबसे ज्यादा सीटे मिली है। सिर्फ 31 फिसदी और 281 सीट । यानी देश उस दौर में भी बीजेपी को लेकर बंटा हुआ था जब मनमोहन सिंह सरकार के प्रति उसमें गुस्सा था । मनमोहन की आर्थिक नीतियो को उपभोक्ता समाज के लिये माना गया । काग्रेस में दो सत्ता ध्रूव को मनमोहन सरकार के लिये मौत का गीत माना गया । यानी 2014 में जाती हुई सरकार की एवज में जिसे चुना गया उसके पास बहुमत की ताकत तो है लेकिन जनता का वह साथ नहीं है जो अच्छे दिन के नारो में खोने को तैयार हो जाये । असर इसी का है जिस विकास को लेकर राजनीति चुनावी जीत को आधार बनाया गया उसमें बीजेपी को चुनावी जीत तो जनता लगातार यह सोच कर देती चली गई कि न्यूनतम जरुरतो को तो कोई सराकर पूरा करेगी । दूसरी तरफ बीजेपी ने मोदी के आसरे चुनावी जीत के लिये जो रास्ते बनाये वह भी भारतीय समाज को समझे बगैर क्यो पूरे नहीं हो सकते है इसे मोदी सरकार
पहले बरस समझ पायी यह कहना मुश्किल है । क्योकि विकास के लिये जो भी रास्ते बनाये गये उसमें संयोग से दिल्ली मुबई इंडस्ट्री कारीडोर को पूरा करने में राजनीतिक तौर पर तो कोई मुश्किल मोदी सरकार के सामने नहीं है । क्योकि जमीन जिन पांच राज्यो की ली जानी है उनमें बीजेपी की सरकार है । हरियाणा,राजस्थान,मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात । सभी जगह बीजेपी की सत्ता । लेकिन इसके बावजूद जमीन कैसे विकास के नाम पर लें ले यह नैतिक साहस राज्य सरकारो के पास है ही नहीं । और इसकी सबसे बडी वजह है विकास की तमाम नीतिया उपभोक्ताओ को ही ध्यान में रखकर बनायाजा रहा है । यानी देश
के नागरिको को लेकर विकास का कोई ब्लू प्रिट मोदी सरकार के पास है नहीं और इससे पहले की सरकारो के पास भी नहीं था । इसलिये जब वित्त मंत्री संसद के भीतर यह कहते है कि मोदी जी की विसाक की सोच से विकास दर आठ फिसदी पहुंच जायेगी । पूंजी ज्यादा आयेगी । तो फिर सिचाई में भी पैसा लगाया जा
सकेगा । और किसानो का भला होगा । यानी मोदी सरकार की भी वहीं सोच है जो मनमोहन सिंह के दौर में थी कि कारपोरेट/उघोघिक विकास से पूंजी कमायेगें और बचे हुये पैसे को मनरेगा या दूसरे सामाजिक कल्याण के पैकेज से बांटेगे । मुश्किल उस वक्त भी थी । मुश्किल इस वक्त भी है । लेकिन पहले बरस की
मोदी की सत्ता ने राजनीतिक तौर पर यह पारदर्शिता तो देश के सामने रख दी कि जो सत्ता में होगा उसकी समझ विपक्ष की राजनीति से बिलकुल जुदा होगी । क्योकि मेक न इंडिया का नारा लगाकर दुनिया भर मेंबारत को एक नायाब बाजार के तौर पर रखने वाले प्रधानमंत्री मोदी संसद में ही राहुल गांधी के इस
सवाल का जबाब नहीं दे पाते है कि किसान क्या मेक न इंडिया नहीं कर रहा है । और राजनीति जिस तरह जनता को लगातार ठग रही है उसमें कोई राहुल गांधी से भी नहीं पूछ पाता है कि जब बीते साठ बरस से किसान मेक इन इंडिया कर रहा है तो फिर मनमोहन सरकार ही नहीं बल्कि काग्रेस की तमाम सरकारो के वक्त
किसानो को लेकर बजट से लेकर हर नीति में कोई ऐसा इन्फ्रस्ट्रक्चर पैदा क्यो नहीं किया गया जिससे किसान के लिये सरकार हो । और किसान को भी लगे कि उसका वित् मंत्री या प्रधानमंत्री इन्द्र भगवान नहीं बल्कि चुनी हुई सरकार ही है । यानी जिन सवालो को लेकर देश का हर नागरिक अपने अपने दायरे
में जुझ रहा है पहली बार किसी सरकार के अंतर्विरोध ने उसे ना सिर्फ सतह पर ला दिया है बल्कि यह सवाल भी खडा कर दिया है कि बहुमत के साथ चुनावी जीत के बाद भी अगर कोई वैकल्पिक इक्नामिक माडल किसी सरकार के पास नहीं है तो फिर देश की राजनीति उसी दिशा में जायेगी जिसके खिलाफ खडे होकर
नरेन्द्र मोदी ने चुनाव प्रचार में उम्मीद की आवाज दी ।  और देश भी मोदी के साथ चलने को इसलिये तैयार हो गया क्योकि हर पार्टी का कांग्रेसीकरण हो चला था। यहां तक की दिल्ली में बैठे बीजेपी के नेता भी कांग्रेस की नीतियों से इतर सोच नहीं पा रहे थे। इसलिये गुजरात से निकलकर लुटियन्स की दिल्ली
को बदलने के ख्वाब मोदी ने जगाया । लेकिन पहले बारह महीने तो यह लगते हैं कि मोदी भी लुटियन्स की दिल्ली के रंगो में खो रहे हैं। मनाइये कि बाकि बचे 48 महीनो में अच्छे दिन की आस बरकरार रहे।

Tuesday, May 5, 2015

सिल्वर ओक से अशोक रोड के डिनर पार्टी का फर्क

वह शुक्रवार की रात थी। यह शनिवार की रात है। वह पांच बरस पहले का वाक्या था। यह पांच दिन पहले का वाक्या है। वह सितंबर का महीना था। यह मई का महीना है। वह यूपीए-2 के पहले बरस के जश्न की रात थी। यह मोदी सरकार के एक साल पूरे होने से पहले पत्रकारों को साथ खड़ा करने की रात है। 18 सितंबर 2010 और 2 मई 2015 में अंतर सिर्फ इतना ही है कि उस वक्त मनमोहन सिंह के प्रधान सचिव ने दो दर्जन पत्रकारों को दिल्ली के हैबिटेट सेंटर के सिल्वर ओक में डिनर का आमंत्रण दिया था और इस बार सूचना प्रसारण मंत्री अरुण जेटली ने दो दर्जन पत्रकारो के लिये डिनर की व्यवस्था अशोक रोड स्थित अपने घर पर की थी। पांच बरस पहले प्रधाननमंत्री मनमोहन सिंह को छोड़ समूचा पीएमओ पत्रकारों की आवभगत में मौजूद था। हर के हाथ में जाम था। लेकिन पांच बरस बाद पीएमओ का कोई अधिकारी तो नहीं लेकिन पत्रकारों के बीच खुद प्रधानमंत्री मोदी जरुर पहुंचे। यानी जो प्रधानमंत्री बार बार मीडिया को न्यूज ट्रेडर बताने से नहीं चूक रहे हों। और लोकसभा चुनाव चुनाव प्रचार के दौरान इस संकेत को देने से भी नहीं चूके कि मनमोहन सिंह के दौर में कौन कौन से पत्रकार कैसे क्रोनी कैपटिलिज्म के हिस्से बने हुये थे। फिर सच भी है कि राडिया टेप कांड के दौरान कई पत्रकारों के नाम आये।

लेकिन इसका दूसरा सच यह भी है कि प्रधानमंत्री मोदी शनिवार की रात जिस डिनर पार्टी में पहुंचे उसमें राडिया टेप में आये एक पत्रकार की मौजूदगी भी थी। तो क्या सत्ता का धर्म एक सरीखा ही होता है। क्योंकि मौजूदा वक्त में विकास को लेकर मोदी जो भी ताना बाना देश के सामने रख रहे हों और खुद को आम जनता से जोड़ने का जिक्र लगातार कर रहे हैं तो ऐसे में पांच बरस पहले पीएमओ की कॉकटेल पार्टी में मनमोहन सिंह का जितना गुणगान जिस तरीके से किया जा रहा था, वह सब उन सभी को याद आयेगा ही जो उस पार्टी में मौजूद थे । क्योंकि इंडिया हैबिटेट सेंटर के दरवाजे पर ही पोस्टर चस्पा था कि पीएमओ की कॉकटेल पार्टी सिल्वर ओक में हो रही है। इस तरह से खुली कॉकटेल पार्टी इससे पहले कभी किसी पीएम ने देनी की हिम्मत दिखायी नही थी। लेकिन मनमोहन सिंह आर्थिक सुधार की जिस उड़ान पर थे, उसमें खुलापन ऐसा था कि हर हाथ में जाम था। पत्रकारों की आवाजाही हो रही थी। धीरे धीरे समूहों में पीएमओ का हर अधिकारी खुल रहा था। पीएमओ के तमाम डायरेक्टर यह बताने से नहीं चूक रहे थे कि कैसे पहली बार आम आदमी को भी अपने साथ जोड़ने की पहल पीएमओ कर रहा है। कैसे पीएमओ का मीडिया सेल अपनी पहल से मुल्क से जुड़े अहम मुद्दों को उठा रहा है। देश में पहली बार कोई प्रधानमंत्री इतना पारदर्शी है, इतना ईमानदार है और किस तरह विकास के काम को अंजाम देने में जुटा है। जाहिर है विकास के रास्ते प्रधानमंत्री मोदी भी चल पड़े हैं और उन्हें लगातार यह महसूस हो रहा है कि विकास के लिये खेती की जमीन अगर वह मांग रहे है तो गलत क्या कर रहे हैं। 19 अप्रैल को संसदीय पार्टी को संबोधित करते हुये वह गुस्से में भी आये कि जमीन वह किसी अंबानी -अडानी के लिये तो मांग नहीं रहे हैं। कहते कहते तो मोदी यहा तक कह गये कि पत्रकार या मीडिया हाउस के लिये तो जमीन नहीं मांग रहे हैं। जाहिर है मीडिया की भूमिका को लेकर प्रधानमंत्री मोदी ने पत्रकारों की डिनर पार्टी में जरुर अपना पक्ष रखा होगा। नाराज भी हुये होंगे कि कुछ पत्रकार या मीडिया हाउस क्यों भूमि अधिग्रहण के खिलाफ हैं। पता नहीं दो दर्जन पत्रकार जो जेटली साहेब की डिनर पार्टी में मेहमान थे, उनमें से कितनों ने क्या कहा लेकिन पांच बरस पहले मनमोहन के विकास एजेंडे को लेकर कुछ ऐसी ही बहस चल पड़ी थी। तब पीएमओ के एक युवा अधिकारी से अनौपचारिक गुफ्तगु में जैसे ही विकास की नीतियो को लेकर मुल्क से इतर महज 15-20 करोड़ को ही देश मानने का सवाल उठाया...तो जवाब भी झटके के साथ आया, "डोंट टांक लाइक अरुंधति" { अरुंधति राय की तरह बात मत कीजिये} समाधान बताइये...रास्ता बताइये ।

मीडिया में कहा जाता है पीएमओ संपर्क नहीं बनाता। तो लीजिये पहली बार पूरा पीएमओ ही मौजूद है। जाहिर है पांच बरस बाद मोदी सरकार की धड़कने भी बढ़ी होगी की कही साठ महिने माइनस बारह महिने और बचे अडतालिस महीने। इस ख्याल से तो मोदी सरकार का पहला बरस नहीं आंका जायेगा। क्योंकि मौजूद
पत्रकारों की फेरहिस्त में देश के सामने संजय गांधी के मारुति इंडस्ट्री का भंडाफोड़ करने वाले पत्रकार से लेकर हर दिन न्यूज चैनल पर देश के नाम संबोघन करने वाले पत्रकार भी थे। और देश के सबसे ज्यादा बिकने वाले अखबार के संपादक भी थे। जेटली साहेब के उन पंसदीदा रिपोर्टरों की फौज भी मौजूद थी, जिन पर कभी सुषमा स्वराज नाराज रहती थी कि वह मनगढंत स्टोरी करने में माहिर है। विपक्ष में रहते हुये कई बार सुषमा स्वराज ने जेटली पर यह कहकर निशाना साधा था कि वह अपने खास पत्रकारो को ब्रिफिग कर रिपोर्ट छपवाते हैं। लेकिन अब तो सत्ता है। खुद ही सरकार है। तो पत्रकारों के लिये सरकार की कोई भी जानकारी तो स्कूप हो सकता है। तो स्कूप की तलाश भी पत्रकारों को सरकारों के करीब ले जाती है। और सरकार के साथ खड़े होकर पीठ खुजलाने का अपना ही मजा है। वैसे कमोवेश यह हालात सोनिया गांधी के सलाहकारों की टीम में भी पांच बरस पहले देखा जा सकता था। लेकिन तब विरोध को चुप कराने के लिये डपटा जाता था। पांच बरस पहले पीएमओ रोजगार और देश की श्रमिक उर्जा को खपाने के लिये मनरेगा का गुणगाण हमेशा करता था और सिल्वर ओक में भी मीडिया के बीच उसकी आवाज आ रही थी। हालाकि मनरेगा भी लश्क्ष्यविहिन है और देश की कोई परियोजना मनरेगा के तहत पूरी नहीं हुई ,इस पर अंगुली उठाने का मतलब था....डोंट टाक लाईक अरुंधति का जबाव सुनना। हो सकता है मौजूदा वक्त में प्रधानमंत्री मोदी ने स्वच्छता अभियान को लेकर जो सोचा हो या जनधन योजना से अगर वह गरीबी खत्म होने का सपना पाल चुके हो। और कोई पत्रकार उस पर सवाल पूछे तो मोदी सरकार को बुरा लग सकता है । लेकिन अपने खास करीबी पत्रकार ऐसा सवाल सामान्य तौर पर पूछते नहीं हैं। कांग्रेस में यह तो हुनर था कि वह दो मोर्चे पर लगातार काम कर जनता को ठग भी लेती और कोई समझता उस समय तक चुनाव दस्तक दे देता। क्योंकि पांच बरस पहले मीडिया को डील करने वाले पीएमओ के अधिकारियों से मिलने-सुनने से यह एहसास जरुर हुआ कि मानवीय सोच की मोटी लकीर हर मुद्दे पर ठीक उसी तरह खिंची जाती है जैसे सोनिया गांधी की अगुवाई वाली नेशनल एडवाइजरी काउंसिल यानी एनएसी में वाम सोच की मोटी लकीर हर मुद्दे पर निकलती रही । यानि देश की नीतियो का चेहरा चाहे विकास की अत्याधुनिक धारा में बहने को तैयार हो लेकिन उसपर मानवीय पहलुओ की पैकेजिंग पीएमओ कर ही देता है । फिर मौजूदा वक्त में लौटे तो मोदी सरकार का संकट यह है कि सबकुछ मोदी है । और मानवीय चेहरे के तौर पर विकास की अनसुलझी पहेली से आगे कोई सवाल टकराता है तो वह संघ परिवार का हिन्दुत्व है । जो बार बार भारतीय मन को विदेशी निवेश पर टिके विकास की चकाचौंध से डिगाता है । लेकिन हर बार जीत उपभोक्ता समाज की होती है । मनमोहन सिंह के दौर में भी नागरिको के लिये कल्याण पैकेज था और उपभोक्ताओ के लिये नीतिया । तो मोदी के दौर में विकास की लकीर खिंचने से बनने वाली पूंजी से हाशिये पर पडे तबके के कल्याण का राग आलापा जा रहा है । यानी विकास की मोटी लकीर जस की तस है अंतर सिर्फ इतना है कि मोदी ने मनमोहन की चकाचौंध को गोटाले से जोडकर अपना सवाल हाशिये पर पडे तबके के लिये उठाया है तो जश्न सिल्वर ओक सरीखे खुली जगह किया नहीं जा सकता । लेकिन अंतर यह भी है कि तब पीएम खुली जगह में पत्रकारो के बीच नहीं गये लेकिन उस डिनर पार्टी में मौजूद कई पत्रकार बाद में राडिया टेप में फंसे । और पांच बरस बाद पत्रकारो के बीच पहुंच कर पीएम ने जरुर एहसास कराया कि जो जेटली की डिनर पार्टी में है वह न्यूज ट्रेडर नहीं है ।

Friday, May 1, 2015

संघ को 'साइज' में रखने के लिये रामदेव बन रहे हैं मोदी के हथियार !

अब पतंजलि की दवाइयों पर लिखे शब्दों का अर्थ कौन से आधुनिक शब्दकोष में जोड़ा जाये। क्योंकि बाबा रामदेव अगर पुत्रजीवक को बेटा न मानें, अश्वगंधा को घोडा न कहें, गौदंती को गाय के दांत से ना जोडें तो यह सवाल उठ सकता है कि क्या भारतीय मन के करीब प्राकृतिक इलाज को रखने भर के लिये इन शब्दों का इस्तेमाल बाबा रामदेव कर रहे हैं। तो फिर यह सवाल भी होगा कि कहीं यह प्रोडक्ट बेचने के सांस्कृतिक नुस्खे तो नहीं। यानी प्रचार प्रचार के लिये हर कंपनी जैसे अपने प्रोडक्ट के लिये उन शब्दों का इस्तेमाल करती है जो लोगों की जुबां पर चढ़ जायें उसी तर्ज पर बाबा रामदेव भी आस्था और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े शब्दों के इस्तेमाल कर अपना माल बेच रहे हैं। हो जो भी लेकिन भारत को भ्रटाचार मुक्त करने के बाबा रामदेव के अभियान के छांव तले पतंजलि या भारत स्वाभियान ट्रस्ट को उड़ान मिली, वह ना सिर्फ मार्केटिंग के तौर पर बल्कि राजनीतिक तौर पर भी कमाल का है। क्योंकि मनमोहन सिंह के दौर में योग गुरु राजनीति का पाठ पढ़ाते हुये रामलीला मैदान से आगे जिस राजनीतिक मकसद के लिये निकले उसने दिल्ली की सत्ता भी बदली और दिल्ली की सत्ता बदलते ही बाबा को भी बदल दिया। योग से भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष और सत्ता बदलाव के बाद खुद के विस्तार के लिये दिल्ली की सत्ता के लिये हथियार बनते बाबा रामदेव पर मोदी सरकार की कृपा के पीछे कौन से सियासी मंसूबे हो सकते हैं, यह भी कम दिलचस्प नहीं है । क्योंकि दिल्ली की सत्ता के लिये बाबा रामदेव या तो आने वाले वक्त में सबसे बडे हथियार साबित होंगे। या फिर दिल्ली की सत्ता 2019 तक बाबा रामदेव को इस हालात में ला खड़ा करेगी जहां राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ भी बाबा के स्वाभिमान ट्रस्ट के सामने कमजोर दिखायी देने लगे। इस खेल की डोर और कोई नहीं बल्कि प्रधानमंत्री मोदी के हाथ में ही होगी। वैसे यह सवाल कोई भी कर सकता है कि जब प्रधानमंत्री मोदी खुद संघ के प्रचारक रह चुके हैं और संघ परिवार प्रधानमंत्री मोदी के पीछे खड़ा है तो फिर बाबा रामदेव को खड़ा करने की जरुरत है क्यों।

तो सियासत की उस बारीक लकीर को भी समझना होगा कि बाबा रामदेव अब भ्रटाचार के मुद्दे पर खामोश क्यों हो गये। बाबा रामदेव जिस भारत स्वाभिमान आंदोलन की अगुवाई करते है जब उसका नारा ही विदेशी कंपनियो के सौ फीसदी बायकाट है तो फिर वह मोदी सरकार के खिलाफ हल्ला बोल के हालात में क्यों नहीं आते। और प्रधनमंत्री मोदी जब दुनिया में घूम घूम कर शिक्षा और स्वास्थ्य सेक्टर को भी विदेशी हाथों में देने की वकालत करते हैं तो फिर बाबा रामदेव जो स्वदेशी शिक्षा और स्वदेशी चिकित्सा का नारा लगाते हैं तो सरकार का विरोध क्यों नहीं कर पाते। असल में बाबा रामदेव के भारत स्वाभिमान ट्रस्ट के पन्नों को खोल कर देखे तो विचारों के लिहाज से आरएसएस की सोच के काफी करीब नजर आयेगा। यानी अधिकतर क्षेत्रों में तो संघ और स्वाभिमान ट्रस्ट एक सरीखा लगेंगे। दोनों के बीच अंतर सिर्फ हिन्दुत्व को लेकर ही है। संघ हिन्दुत्व को हिन्दु राष्ट्र के तौर पर भी देखता समझता है और बाबा रामदेव का स्वाभिमान ट्रस्ट हिन्दुत्व के बदले राष्ट्रीयता का ही प्रयोग करता है। जिसमें सभी धर्म की जगह है। इस्लाम की भी। असल खेल यही से शुरु होता है। बाबा रामदेव की अपनी ताकत है और योग के जरीये देश भर में लोकप्रिय बाबा रामदेव जिस स्वदेशी और राष्ट्रीयता का सवाल उठाते है उससे संघ को परहेज नहीं है। लेकिन संघ कभी नहीं चाहता है कि उसके सामानांतर राष्ट्रीयता का नारा लगाते हुये कोई संगठन बड़ा हो। याद कीजिये तो अन्ना आंदोलन के वक्त भी आरएसएस अन्ना के संघर्ष को सफल बनाने के लिये साथ खड़ा हो गया था। लेकिन रामलीला मैदान में जब भारत स्वाभिमान मंच तले बाबा रामदेव भ्रटाचार को ही लेकर संघर्ष करने उतरे तो संघ ने खुद को पीछे कर लिया। जबकि मुद्दा अन्ना के सवाल को आगे ले जाने वाला था। राजनीतिक तौर पर रामदेव भी अन्ना की तर्ज पर उस वक्त किसी सियासी पार्टी बनाने या चुनाव में संघर्ष करने का कोई एलान नहीं कर रहे थे। लेकिन रामदेव की लोकप्रियता रामलीला मैदान में ही दफन हो जाये इसका प्रयास संघ ने बखूबी किया। और शायद रामलीला मैदान हादसे के बाद बाबा रामदेव भी संघ की इस लक्ष्मण रेखा को समझ गये। लेकिन अब देश
की सत्ता पर काबिज प्रधानमंत्री मोदी की जरुरत और आने वाले वक्त में खुद को कही ताकतवर बनाने के लिये बाबा रामदेव की उपयोगिता या संघ से टकराव ना हो इसकी व्यूह रचना को समझना जरुरी है। प्रधानमंत्री मोदी आरएसएस को बाखूबी समझते है। ठीक उसी तरह जैसे प्रधानमंत्री बनने के बाद अटल बिहारी वाजपेयी समझ रहे थे। संघ से कितनी दूरी और कितनी निकटता रहनी चाहिये इसे बीजेपी के जिस भी राजनेता ने समझा वह झटके में देश की राजनीति में सर्वमान्य बनने लगता है। और इस सच को हर कोई समझता है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में संघ परिवार जिस ताकत के साथ मोदी के हक में खड़ा हुआ उसने चुनाव का मिजाज ही बदल दिया। और बीजेपी इस सच को भी जानती है कि 2004 में जब हिन्दू ताकतें घर पर बैठ गई तो वाजपेयी को हार मिली। यानी नरेन्द्र मोदी को ने वाले वक्त में सियासत उस तलवार की धार पर करनी है जहां उनके आर्थिक विकास की डोर का परचम भी लहराये। राष्ट्रवाद आहत भी ना हो । हिन्दुत्व के रंग भी दिखायी दें। और मोदी की पहचान सर्वमान्य नेता के तौर पर बनती चली जाये। ध्यान दें तो नीतियों को लेकर हर मोड पर मोदी सफल हो रहे हैं। मसलन विदेशी निवेश पर अब संघ खामोश है। आर्थिक नीतियों को लेकर भारतीय मजदूर संघ चुप है चाहे मजदूरों के खिलाफ नीतियों को खुले तौर पर अपनाया जा रहा हो । किसान विरोधी सरकार का ठप्पा खुले तौर पर मोदी सरकार पर लग रहा है लेकिन किसान संघ कही बिल में जा घुसा है। और यह सब हो इसलिये रहा है क्योंकि संघ को लग रहा है कि अगर केन्द्र में मोदी सरकार का विरोध वह करने लगे तो फिर सरकार ही ना रहेगी तो आरएसएस जिस विस्तार की कल्पना अपने लिये किये हुये है, वह कैसे होगा ।

लेकिन प्रधानमंत्री मोदी इस सच को वाजपेयी से कहीं आगे की समझ से समझने लगे है कि सवाल अब यह नहीं है कि संघ को कितनीढील दी जाये। सवाल यह है कि संघ के सामानांतर कैसे कोई बडी लकीर खींच दी जाये। दरअसर बाबा रामदेव का बढ़ता कारोबार और भारत स्वाभिमान ट्रस्ट का विस्तार इसी की कडियां है । क्योंकि बाबा रामदेव के विस्तार के दौर में घर वापसी और अल्पसंख्यक मसलों पर प्रधानमंत्री मोदी को दुनिया के मंचों पर वैसी सफाई देनी नहीं होगी जैसे संघ परिवार को लेकर देनी पड़ रही है। इसलिये सवाल सिर्फ यह नहीं है कि मोदी सरकार के आने के बाद बाबा रामदेव का टर्नओवर 67 फीसदी बढकर 2000 करोड तक जा पहुंचा। सवाल यह है कि संघ के सामांनातर बाब रामदेव का विस्तार हो कैसे रहा है और इस विस्तार का उपयोग मोदी की सियासत करेगी कैसे। असल में आरएसएस का कैडर स्वयंसेवक है। जबकि बाबा रामदेव का कैडर स्वयंसेवक और नौकरी करने वाले इन्सेन्टिव पर टिका है । कारपोरेट को लेकर दोनो का नजरिया स्वदेशी है। दोनों ही बहुराष्ट्रीय कंपनियों के खिलाफ है। आज की तारीख में संघ के देश भर में करीब 15 करोड़ स्वयंसेवक हैं। जबकि भारत स्वाभिमान ट्रस्ट के साथ पांच करोड़ लोग जुड़े हैं । संघ की देश भर में 50 हजार शाखायें लगती हैं। जबकि बाबा रामदेव के पतंजलि स्टोर पांच हजार हैं। संघ अपने विस्तार को ब्लाक स्तर पर ले जा रहा है। यानी ब्लाक स्तर पर ही स्वयंसेवक सारी जरुरतों की व्यवस्था करेगा । जबकि स्वाभिमान ट्रस्ट हर गांव मनें पांच व्यक्ति को तैयार कर रहा है। जो स्टोर खोलकर उसके सामानो को बेचेंगे। संघ के विस्तार में सिर्फ विचार मायने रखते हैं। लेकिन भारत स्वाभिमान ट्रस्ट हर गांव में एक इमारत ले रहा है। जिसमें कम्पयूटर भी होगा और सामानो को लाने या बांटने के लिये मोटरसाइकिल भी रखी जायेगी । स्वाभिमान ट्रस्ट के साथ अभी 15 लाख लोग सक्रिय हैं। यानी वह गांव में सामानो को ला ले जा रहे हैं। संघ वैचारिक तौर पर हिन्दुत्व का जिक्र कर हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना को मूर्त देने में लगे है। जबकि वावा रामदेव राष्ट्रीयता का सवाल उठा कर अपने प्रोडक्ट को बेचते हुये योग को ही विस्तार का जरीया बना रहे है। दोनों का मंशा सौ फिसदी मतदान की है। यानी संघ मोदी सरकार के रहहते हुये विस्तार को अमली जामा पहना पा रहा है। लेकिन जहां उसे लगता है कि उसके विचारों को सरकार महत्व देना बंद कर रही है तो उसकी सक्रियता केन्द्र सरकार के खिलाफ भी एक वक्त के बाद हो सकती है। लेकिन बाबा रामदेव के साथ अमूर्त विचार नही बल्कि मूर्त धंधा है। योग है। और विस्तार के लिहाज से समझे तो संघ 2004 से 2014 के दौरान इस हद तक सिमटा कि उसकी शाखाये घटकर 30 हजार हो गई थी। वहीं बाबा रामदेव के पंतजलि का टर्नओवर मनमोहन सिंह के दौर में धीरे धीरे रफ्तार से बारस सौ करोड ही पहुंचा लेकिन मोदी सरकार के आते ही टर्न ओवर दो हजार करोड हो गया । यानी मोदी सरकार के आसरे संघ भी विस्तार कर पा रहा है और बाबा रामदेव भी । लेकिन संघ से टकराना मोदी के वश में नहीं है और रामदेव को कभी भी आईना दिखाना मोदी के हाथ में है । फिर रामदेव का कैडर राजनीति से कही नहीं जुडा है जबकि संघ का कैडर तो बीजेपी को ना सिर्फ प्रभावित करने के हालात में रहता है बल्कि बीजेपी में उसकी इंन्ट्री भी होती है । तो बाबा रामदेव 2019 के चुनाव में देश के छह लाख गांव तक या तो मोदी के लिये काम करेगें या फिर उनके धंधों पर अंकुश लगना शुरु हो जायेगा । यानी रामदेव का बढता कुनबा संघ परिवार के विस्तार पर भी भारी कैसे पड़ेगा। और आने वाले वक्त में बाबा रामदेव के जरीये देश में स्वदेशी बनाम बहुराष्ट्रीय कंपनी से ज्यादा भारत स्वाभिमान बनाम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ होगा कैसे। इसका इंतजार कीजिए क्योंकि संसद के भीतर बाबा रामदेव को लेकर उठे सवाल कोई मायने नहीं रखते है क्योकि बाबा रामदेव की डोर तो प्रधानमंत्री मोदी के हाथ में है ।

Thursday, April 30, 2015

क्यों सत्ता में आते ही बदल जाते नेता?


देश का सच यही है कि जो सत्ता में रहता है वह गरीब और किसान विरोधी होता ही है। और जब सत्ता का विरोध करते हुये विरोधियो को सत्ता मिल जाती है तो वह गरीब और किसान विरोधी हो जाता है और फिर कल तक जो सत्ता में थे वह गरीब और किसानो के हक में नारे लगाने लगते हैं। यानी हर दौर में विपक्ष के हाथ में सबसे ताकतवर हथियार किसान मजदूर या कहें हाशिये पर पड़े लोगों के हक में नारा लगाना ही होता है और सत्ता में आने के बाद कारपोरेट और विदेशी निवेश से लेकर उघोगो के लिये खेती की जमीन छिनने के अलावे कोई मॉडल किसी के पास होता नहीं है। नेहरु का विरोध करने वाले लोहिया के चेले किस राह पर है यह देश से छुपा नहीं है। इंदिरा का विरोध करने वाले जेपी के भक्त लत्ता पाने के बाद किस रास्ते चले यह भी किसी से छुपा नहीं है। राजीन गांधी को कटघरे में खडाकर सत्ता पाने वाले वीपी सिंह कहां कैसे फिसले यह सच हर किसी के सामने है। और ताजा यादों में वाजपेयी के दौर की शाइनिग इंडिया की हवा सोनिया गांधी की अगुवाई ने निकाली। और मनमोहन सिंह के विकास की रफ्तार को स्कैम इंडिया बताकर हर चुनावी सभा में नरेन्द्र मोदी ने हवा निकाली। और अब मोदी सत्ता में है तो राहुल गांधी को किसान-मजदूर याद आ रहे हैं।

यानी देश की सबसे बडी त्रासदी यही है कि किसी भी सत्ता के पास देश के गरीब और किसान मजदूर की जिन्दगी पटरी पर लाने के लिये कोई ब्लू प्रिंट तो है ही नहीं। उल्टे विकास की जिन नीतियों को सत्ता अपनाती है उसमें देश की खनिज संपदा की लूट से लेकर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार से लेकर पीने के पानी सरीखी न्यूतम जरुरतो को भी कारपोरेट के हवाले कर मुनाफा बनाने के धंधे में तब्दील करती चली जा रही है। असर इसी का है कि राहुल गांधी जब मोदी के आधुनिक मेक इन इंडिया पर यह कहकर चोट करते हैं कि किसान भी तो मेक इन इंडिया है तो देश को अच्छा लगता है। क्योंकि बदलती सत्ता के बीच भी देश कभी नहीं बदला और एक ही देश में दो देश हमेशा नजर आये । मौजूदा वक्त में आलम यह चला है कि एक तरफ खेती पर टिके अस्सी करोड लोगो की दो जून की रोटी से जुडा सरकारी खर्च है तो दूसरी तरफ उससे कही ज्यादा आठ कारपोरेट का टर्न ओवर। इसीलिये प्रधानमंत्री मोदी जब मेक इन इंडिया का जिक्र करते है तो विदेशी निवेश को लेकर सवाल उठते है और जब प्रधानमंत्री भूमि अधिग्रहण अध्यादेश लाने का जिक्र करते हैं तो कारपोरेट के लिये किसानों की जमीन छीनने का सवाल खड़ा हो ताजा है। यानी मेक इन इंडिया के जरीये उत्पादन पैदा करने वाला देश भारत हो सकता है और खेती की जमीन को मेक इन इंडिया से जोडकर किसान की बदहाली खत्म की जा सकती है इसपर देश का भरोसा जागता नहीं है। तो पहला सवाल यही है कि आखिर सरकार पर भरोसा जाग क्यों नहीं रहा है। जरा इस सिलसिले को समझे तो पीएम कहते है विदेशी निवेश के लिये रास्ता बनाना जरुरी है। देशी निवेशक कहते है लालफिताशाही और भ्रष्टाचार तो खत्म कीजिये। पीएम कहते है चीन की तरह भारत को मैन्युफ़ैक्चरिंग हब बनायेगें । तो रिजर्व बैंक के गवर्नर रधुराम राजन कहते है सिर्फ़ मैन्युफ़ैक्चरिंग पर ध्यान देने से बात नहीं बनेगी। अब सवाल है कि क्या प्रधानमंत्री मोदी मेक इन इंडिया कहकर निवेशकों के कान में मिसरी घोल रहे हैं. क्योंकि मनमोहन सिंह के दौर में विकास दर में गिरावट आई । गवर्नेंस चौपट दिखी। सत्ता के दो पावर सेंटर हो गये। घोटालों की बाढ़ आ गई। और मोदी ने आते ही सबसे पहले उन्हीं हालातों पर चोट की जो मनमोहन सरकार की देन थी। और जनता का भरोसा जागा कि शायद इसबार कुछ बदल होगा क्योंकि पीएम की कुर्सी पर बैठने वाला शख्स लुटियन्स की दिल्ली का नहीं है। यानी उस राजनीतिक गलियारे का नहीं है जहां हर पार्टी के राजनेता राजनीतिक धिंगा-कुश्ती करते ज्यादा नजर आते है लेकिन होते सभी एक हैं। इसलिये मोदी जब कहते है कि ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा तो यह अच्छा लगता है। लेकिन बीतते वक्त के साथ फिर वहीं सवाल खड़ा होता है कि सिस्टम बदलेगा कैसे। यानी हाशिये पर पडे तबके की सुध लेगा कौन। क्योंकि देश की मुश्किल तो काम करने वाले युवा हाथों में काम का नहीं होना है। खेती की जमीन खत्म होने पर बेरोजगारी के बढने का है। इन्फ्रास्ट्रक्चर सिर्फ उद्योगों या कारपोरेट के लिये है। यानी किसानी करते देश के सबसे ज्यादा लोगो को उघोग से जुड़ा मानने की हालत में सरकार है नहीं। उल्टे मेक इन इंडिया के बाद बड़े ज़ोर-शोर से ' डिज़िटल इंडिया' और 'स्किल्ड इंडिया' का जिक्र किया गया । लेकिन वित्त मंत्री संसद में तर्क देते है कि विकास दर बढेगी तो पूंजी आयेगी और फिर सिचाई पर भी ध्यान दे दिया जायेगा । अब सवाल है कि वित्त मंत्री को अगर सही माना जाये तो फिर मेक इन इंडिया के मातहत जो 25 क्षेत्र चुने गये उनमें ऊर्जा, ऑटोमोबाइल, कंस्ट्रक्शन और फ़ार्मा जैसे क्षेत्र शामिल हैं.लेकिन खेती तो है ही नहीं । और खुद सरकार मानती है कि
औद्योगिक विकास के लिए ज़मीन चाहिए । यानी सरकार की प्राथमिकता मेक इन इंडिया के जरीये विकास दर बढाने की है । उससे कमाई गई पूंजी को खेती में लगाने का जिक्र हो रहा है । यानी वही रास्ता जिसका जिक्र वित्त मंत्री से लेकर पीएम बनने तक मनमोहन सिंह 1991 से 2014 तक करते रहे । और उससे उपजे असंतोष ने ही मोदी को पीएम बना दिया। लेकिन अब सिर्फ शब्द बदले जा रहे हैं। लेकिन नीतियां जस की तस । तो फिर क्या माना जाये कि पीएम का दांव सिर्फ लुभाने वाला है । क्योंकि कालेधन से लेकर दागी सांसदों तक के सवाल पर तो पीएम ने जो कहा उससे अब साल पूरा होते होते बदल रहे है या कहें फिसल रहे है। गद्दी संभालने का बर पूरा होने का महीना भी शुरु हो चुका है। याद कीजिये जून 2014 में संसद में पीएम मोदी ने ताल ठोंक कर कहा था कि साल भर के भीतर संसद में कोई दागी नहीं बचेगा। सभी की फाइल खुलेंगी। जो दोषी होगा वह जेल जायेगा। जो पाक साफ होगा वह छाती ठोंक कर संसद में बैठेगा। लेकिन सच तो यह है कि मोदी मंत्रिमंडल के 64 मंत्रियो में 20 दागी हैं। संसद के भीतर 543 सांसदों में से 185 सांसद दागी हैं। इनमें सबसे ज्यादा बीजेपी के 281 सांसदो में से 97 दागी हैं।

असल में सत्ता दागदार होकर भी दागी नहीं होती । नैतिकता हर बार नेता से हार जाती है। क्योंकि संसद ही नही देश के कमोवेश हर विधानसभा की हालत यही है कि वहा दागियों की भरमार है। लेकिन कोई कहता है उसे राजनीतिक तौर पर फंसाया गया तो कोई कहता है मुकदमा ही फर्जी है । अब कहे कोई कुछ भी लेकिन
देश का सच है कितना खतरनाक यह भी देख लिजिये। नेशनल इलेक्शव वाच के मातहत एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक। मौजूदा संसद में अगर 34 फिसदी सांसदो के खिलाफ आपराधिक या भ्रषटाचार के मामले हैं। तो इसी तरह राज्यसभा के 232 सांसदो में से 40 दागी हैं। और तो और 13 राज्यों की सरकार के 194 मंत्रियों में से 44 दागी हैं। और देश के तमाम विधायको का जिक्र करें तो कुल 4032 विधायको 1258 विधायक दागी हैं। यानी देश के 36 फिसदी विधायकों के खिलाफ आपराधिक और भ्रष्टाचार के मामले दर्ज हैं। तो सवाल यह हो चला है कि सुप्रीम कोर्ट ने आठ महीने पहले ही प्रधानमंत्री समेत देश के तमाम मुख्यमंत्रियों को यह सुझाव भी दिया था कि वह अपने मंत्रिमंडल में तो कम से कम दागियो को ना रखे। लेकिन जब तेरह सीएम और पीएम तक इस हालत में नहीं है कि वह दागियों को अपने मंत्रिमंडल में ना रखें तो फिर किसान-मजदूर के सवाल सिवाय सियासत के कहा मायने रखेंगे। और अगर कोई यह सोच रहा है कि सियासी हंगामे से ही सही किसानों की हालत कुछ तो सुधर सकती है। तो जमीनी सच यही है कि बीते 25 बरस में पहली बार किसानों की आत्महत्या की रफ्तार सबसे तेज है। 2006 में हर सात घंटे एक किसान खुदकुशी करता था आज की तारिख में हर 5 घंटे में एक किसान की आत्महत्या की खबर आ रही है। इस बरस पहले 120 दिनों में ही छह सौ किसानों खुदकुशी कर चुके है।

Tuesday, April 28, 2015

किसानों के अंधेरे घर से सियासी दीया जलाने का हुनर

यह कल्पना के परे है कि मरते किसानों के बीच से कुछ किसानो को चुन लिया जाये और फिर उनके परिवारो के रुदन में शरीक होकर सियासत साधी जाये। राजस्थान में दर्जनो किसानो की मौत हो गई लेकिन आप ने दौसा के किसान गजेन्द्र को चुना। कांग्रेस के नेता सचिन पायलट और गहलोत को लगा यह घोखा होगा तो वह गजेन्द्र की मौत के 48 घंटे बाद एक और किसान परिवार के घर ढांढस बंधाने पहुंचे। बीजेपी के नेता खुदकुशी करते किसानो में से चंद के घरो की सांकल बजा आये। और अब राहुल गांधी विदर्भ के उस इलाके में किसानों के बीच सियासी अलख जगाने निकलेगें जो इलाका किसानो के लिये मरघट हो चुका है। 30 अप्रैल को नागपुर से 145 किलोमीटर दूर अमरावती के घामनगांव तालुका और चांदुर तालुका के दर्जन भर गांव में 15 किलोमीटर पैदल चल कर चुने गये उन नौ किसानों के घर पर दस्तक देंगे जो अब दुनिया में नहीं है। यह ठीक वैसे ही है जैसे 29 जून 2006 को मनमोहन सिर्ह बतौर प्रधानमंत्री यवतमाल पहुंचकर 34 विधवाओ से मिले थे। और उसके बाद किसानो के लिये करोडों के पैकेज का एलान कर दिल्ली वापस लौट आये। लेकिन उसके बाद देश विकास की चकाचौंध तले दौड़ने लगा। और चकाचौंध से आहत तब विदर्भ के बीजेपी के ही नेता देवेन्द्र फडनवीस हो जो अब महाराष्ट्र के सीएम हो या फिर नीतिन गडकरी जो अब मोदी सरकार में मंत्री हैं, अक्सर विदर्भ के किसानों के दुख में यह कहकर शरीक होते रहे कि मनमोहन सरकार का कोई ध्यान किसान पर नहीं है। उस वक्त निशाने पर महाराष्ट्र की कांग्रेस सरकार भी आई। देवेन्द्र फडनवीस ने तो किसानों को लेकर काग्रेस एनसीपी सरकार को इस तरह कटघरे में खड़ा किया जैसे हर किसान को लगा कि वाकई सत्ता बीजेपी की होती तो किसानों का भला हो जाता। लेकिन किसे पचा था कि दिल्ली और महाराष्ट्र दोनों जगहों पर बीजेपी की सरकार होगी लेकिन किसानों की आत्महत्या का आंकडा नया रिकार्ड बनाने लगेगा।

यानी जो किसानो की जो मौत 2006-07 में सबसे ज्यादा होती थी उसे भी 2014-15 का दौर पीछे छोड़ देगा। तब हर सात घंटे में एक किसान खुदकुशी करता था और मौजूदा वक्त में हर छह घंटे में किसान खुदकुशी कर रहा है। विदर्भ में इसी बरस 468 किसान खुदकुशी कर चुका है। लेकिन नया सवाल तो खुदकुशी करते किसानो की कब्र पर सियाली रोशनी फैलाने का है । क्योंकि अमरावती में इसी बरस 54 किसान खुदकुशी कर चुके हैं। मनमोहन सिंह की सत्ता के दौर में तेरह सौ से ज्यादा किसानों ने खुदकुशी की । लेकिन राहुल गांधी के लिये खास तौर से आत्महत्या कर चुके नौ किसानों को चुना गया जिनके घर राहुल गांधी जायेंगे। अब कल्पना किजिये कि जिस अमरावती के हर गांव में किसान आत्महत्या कर रहा है वहा के तलेगांव, आर्वी, कोन्डण्पुर , अंजनसिंगी को चुना गया । और इन चार गांव में से तीन किसान परिवार की विधवाओं के साथ या जिन बच्चो के सिर से बाप का साया उठ गया उन बच्चों के साथ बैठकर राहुल गांधी दर्द बांटेंगे। तो क्या पहला सवाल गांव के बीच यह नहीं उठेगा कि जब दर्जनों किसानों ने यहा खुदकुशी की है तो फिर खुदकुशी कर चुके सिर्फ तीन किसान निलेश भारत वाडके, अंबादास महादेव वाहीले और किशोर नामदेव कांबले के दरवाजे पर ही राहुल गांधी क्यों पहुंचे। और इसके बाद अमरावती के ही चांदुर रेलवे ताल्लुका के तीन गांव के छह किसानों के घर जा
कर परिजनो से दुख दर्द बांटेंगे जिनके घर आत्महत्या की आग अभी भी सुलग रही होगी। खुदकुशी कर चुके किसान कचरु गोमा तुपसुंदरे ,मारोतराव नेवारे , माणिक लक्ष्मण ठवकार,अशोक मारोतराव सातपैसे ,रामदास अडकिने और शंकर अडकिने के घर पर भी दुखियारे मां बाप होंगे। विधवाएं होंगी। छोटे छोटे बच्चे होंगे।

राहुल गांधी वहां पहुंचेंगे तो न्यूज चैनलो के कैमरे भी पहुंचेंगे। और उसके बाद समूचा देश उन घरो के भीतर के हालातों को देखेगा। परिजनो के आंसुओं को देखेगा। भर्रायी आवाजों से नौ किसानों के परिवार के दर्द को देश का दर्द मान कर किसानो का रोना रोयेगा। हो सकता है इसके बाद महाराष्ट्र की सीएम भी जागे। चूंकि वह खुद नागपुर के है तो विदर्भ के खुकुशी करते किसानो के बीच जाकर अपने होने का एहसास करें। फिर मोदी सरकार के मंत्री नितिन गडकरी भी विदर्भ के किसानों की फिक्र कर सकते हैं। यानी जिस तरह 2006 में मनमोहन सिंह पहुंचे । 2007 में वर्धा के किसान वानखेडे की खुदकुशी के बाद सोनिया गांधी पहुंचीं। 2008 में किसान यात्रा निकालने राजनाथ सिंह वर्धा पहुंचे। और अमरावती से लेकर यवतमाल तक नाप आये। 2009 में उद्दव ठाकरे नागपुर पहुचे और चन्द्रपुर से लेकर यवतमाल तक किसानों के दर्द को समेट वापस मुब्ई पहुंच गये । 2010 में शरद पवार पहुंचे । वह भी विदर्भ का रोना रोकर दिल्ली की सियासत में यह कहते हुये गुम हो गये कि किसान तो राज्य का मसला है केन्द्र इसमें क्या कर सकता है । यह सिलसिला हमेशा हर बरस चलता रहा। वैसे याद कीजिये तो 2009 में राहुल गांधी विदर्भ से कलावती को खोज लाये थे और दिल्ली के राजनीतिक गलियारे
में कलावती अंधेरे में रोशनी दिखाने वाला नाम हो गया। यानी जब जब दिल्ली अंधेरे में समाती है तब तब उसे अंधेरे में समाये किसानों की याद आती है और उसी उर्जा को लेकर दिल्ली की सियासत तो हर बार चमक जाती है लेकिन किसानों का अंधेरा कही ज्यादा घना हो जाता है। और इस बार तो यह अंघेरा इतना घना है कि 2015 के पहले सौ दिनो में देश में 1153 किसान खुदकुशी कर चुके हैं।यानी हर दो घंटे एक किसान की खुदकुशी।

Sunday, April 26, 2015

बीच बहस में भूकंप के सामने तमाशबीन देश


पहले बेमौसम बारिश , फिर ओलावृष्टि, उसके बाद तूफानी हवा और अब भूंकप । क्या यह सब सिर्फ प्राकृतिक विपदा या प्रकृति के बदलाव के संकेत है या प्रकृति के साथ मनुष्य के खिलवाड का नतीजा । हो जो भी लेकिन प्रकृति को समझने या प्रकृति को उसके मुताबिक ना चलने देने की बहस तो पैदा हुई ही है । और वही लोग प्रकृति के साथ विकास के नाम पर खिलवाड को लेकर परेशान हो चले है जो विकास की चकाचौंध में सुविधाओं से लैस होने के लिये मचल रहे हैं । कमाल यह है कि दो दिनो में दो बार भूंकप के झटके ने दो तरह से लोगों को सोचने के लिये मजबूर कर दिया है । पहला जमीन पर तकनीक का बोझ ना डाले और दूसरा तकनीक के आसरे प्राकृतिक आपदा से बचने के उपाय खोज लिये जायें । यह अलग मसला है कि कि दोनों ही क्षेत्र में कोई काम सरकारों ने किया नहीं । जनता ने रुचि दिखायी नहीं । और बडे बुजुर्गों का यही ककहरा हर किसी को याद रह गया कि प्रकृति के सामने तो विज्ञान भी नहीं टिक पायेगा या जब धरती डोलेगी तो मानव की कोई भी ताकत उसे रोक ना पायेगी । लेकिन झटके में अब हर किसी को स्मार्ट सिटी नहीं स्मार्ट गांव याद आने लगे हैं । पेड़ पौधो के साथ खेत फसल से लेकर गाय को बचाने तक के शिगूफे चल पड़े हैं । तो दूसरी तरफ जापान की तर्ज पर हर इमारत को भूंकपरोधी बनाने की दिशा में नियम-कायदो का जिक्र हो चला है । डिजास्टर मैनेजमेंट के रेवेन्यू मंत्रालय के अधीन होने पर सरकार की सोच पर हंसा जा रहा है और दुनिया के तमाम देशों में विकास और
प्रक़ति के बीच के तालमेल को लेकर चल रही बहस की भारत में गुंजाइश तक ना होने का रोना रोया जा रहा है । गजब के नजरिये से भारत को देखने समझने की गुंजाइश न्यूज चैनलों के स्क्रीन से लेकर जेएनयू और आईआईटी के गेट पर युवाओ के जमावडों के बीच पैदा हो चली है ।

वैसे भूंकप के बाद उठते सवाल शनिवार-रविवार की बहस का हिस्सा बनेंगे ही नहीं बल्कि देश के आर्थिक सुधार पर अंगुली उठा देगी यह तो कभी नई पीढी के युवाओं के बीच खड़े होकर
जाना समझा नहीं । लेकिन भूंकप ने विकास को लेकर उठते सवालों को जितना आयाम दिया वह संभवत भू-वैज्ञानिकों के इस मत पर भारी पड जाये कि भूकंप की वजह टोक्टोनिक प्लेट का टकराना मात्र है । या फिर भारतीय टोक्टोनिक प्लेट के यूरेशियन प्लेट से टकरा कर नीचे दबते चले जाने की प्रक्रिया अभी भी जारी है । यानी हिमालय क्षेत्र में जमीन के हिलने की वजह भारतीय प्लेट के उपर हिमालय के बढते बोझ से फाल्ट के पैदा होने और उस गैप को भरने की प्रक्रिया भर है । तो वैज्ञानिक जो बताये लेकिन दिल्ली की बहस के बीच यह सवाल कही ज्यादा महत्वपूर्ण हो चला है कि हिमालय के साथ खिलवाड़ । हिमालय रेंज में निर्माण भूकंप के लिये रास्ते बना रहा है । और टाइटोनिक प्लेट भी अगर टकरा रही है तो उसकी बडी वजह खनिज संपदा से लेकर जमीन पर प्रकृति का खुला दोहन ही सच है । लेकिन दोहन को लेकर नजरिया सिर्फ पेडों के काटने या परमाणु संयत्र के लगाने भर का नहीं है । और ना ही तकनीक पर टिकी जिन्दगी को ही विकास मानना है । बल्कि अर्से बाद भूकंप ने उन सवालों को जन्म दिया है जो सवाल नई पीढी के रोजगार के रास्ते बाधक है । मसलन खेती के जरिये देश की जीडीपी बढ नहीं सकती । लेकिन जीडीपी के बढने से देश का पेट भी नहीं भरता ।  ज्यादा से ज्यादा शहर बनाने की वकालत के बाद स्मार्ट सिटी का मतलब होगा क्या । जब भारत की नई पहचान दुनिया के सबसे ज्यादा बेरोजगार और गरीब शहरी के तौर पर होने लगी है तो फिर गांव को और बेहतर
गांव बनाने से आगे शहर में तब्दिल करना करने का फैसला कहा तक सही  है । जितनी बडी तादाद में खेती की जमीन पर उघोग बने उतनी बडी तादाद में रोजगार क्यों नहीं मिले । खेती पर टिके लोगों की जिन्दगी अगर सिर्फ दो जून की रोटी ही उपलब्ध करा पाती है तो उद्योगों के भरोसे खेती पर टिके लोगो के रोजगार छिनने की एवज में सिर्फ तीन फिसदी लोगो को ही रोजगार मिलता है ।

इसी तरह जितनी खनिज संपदा उड़ीसा और झारखंड से लेकर बेल्लारी तक निकाल कर दुनिया के बाजारों में बेची गई उसके एवज में देश की चौबिस कंपनियों के टर्न ओवर में तो दो हजार फीसदी से ज्यादा का इजाफा हुआ लेकिन जिस जमीन को खोखला किया गया वहा से ग्रामीण आदिवासियों के पलायन के साथ साथ बंजर जमीन का भी जन्म हुआ । राजस्थान, कर्नाटक, झारखंड , उड़ीसा और तेलगांना में ही सिर्फ बीस लाख हेक्टेयर से ज्यादा जमीन नंगी पड़ी है । यानी वहां ना तो रिहाइश है और ना ही जमीन के नीचे पानी को बांधने वाले जमीन के उपर कोई हालात है । कमाल तो यह है कि दिल्ली आईआईटी के ही एक छात्र ने चर्चा में यह भी जानकारी दी कि देश में लग अलग वजहो से चाहे ग्रामीण आदिवासियों का पलायन होता रहा हो लेकिन सभी किसी सरकार ने यह नही बताया कि पानी की वजह से भी देश में लाखों लोगों का अपना पुश्तैनी घर-जमीन सबकुछ चोड कर जाना पड़ा । यानी सिर्फ डैम या पावर प्लाट की वजह से नहीं बल्कि देश में ऐसी जगहें हैं जहां जमीन के नीचे पानी बचा नहीं है । या फिर कुंओं के जरीये पानी निकालना मुश्किल है । या फिर पीने लायक पानी ही उपलब्ध नहीं है । इस तरह की जमीनों से आजादी के बाद से 2011 करीब 76 लाख लोग घरबार छोड़ चुके हैं । जबकि सरकारी योजना के दायरे में उघोगों की वजह से करीब 20 लाख लोगों का ही पलायन हुआ है । और खनन या खादान के वजहों से चौदह लाख लोग विस्थापित हो गये । यानी देश में आजादी के बाद अगर सरकारी कड़े साढे छह करोड़ लोगों को विस्थापित बताते हैं तो उसके भीतर का सच यह है कि इनमें से एक करोड लोग पानी और पर्यावरण की वजह से विस्थापित हुये हैं। यानी देश में विकास को लेकर जो भी अविरल धारा नेहरु के दौर से खिंचने का प्रयास हुआ है और मौजूदा दौर में प्रधानमंत्री मोदी खिंचना चाह रहे है , संयोग से उसी पढने-लिखने वाली युवा पीढी को उनकी नीतियां संतुष्ट कर नहीं पा रही हैं , जिन्हें आधुनिक मेक इन इंडिया से जोडने का खवाब भी संजोया जा रहा है । तो कया सरकार की सोच और आईआईटी-जेएनयू के छात्रो से लेकर भूकंप को जानने समझने वाले विशेषज्ञों की नजर में भारत को आगे बढ़ाने के रास्ते अलग हैं । रास्ते अलग नहीं है लेकिन विकास किसके लिये और विकास की किमत के बदले खोने वालों की हथेली पर बचता क्या है इसका कोई ब्लूं प्रिट अगर किसी सरकार के पास नहीं है तो फिर भूकंप से मरने वालों की तादाद कितनी भी बडी क्यों ना हो वह कम लगेगी । क्योंकि न्यूज चैनलों पर किसानो के संकट के वक्त लगातार तल रहा था कि बीत बीस बरस में तीन लाख बीस हजार किसानों ने खुदकुशी कर ली । आर्थिक सुधार के बाद से यानी 1991 से लेकर 2011 तक 85 लाख किसानों ने किसानी छोड़ दी ।

इसी दौर में देश में खेतीहर मजदूरों की तादाद में तीन करोड़ से ज्यादा का इजाफा हो गया । और इसी दौर में देश के टॉप दस कारपोरेट के टर्नओवर खेती की उस जबट के बराबर हो गया जिसपर देश के अस्सी करोड़ लोग टिके हैं । इसी दौर में देश में इतना निर्माण हुआ जितना 1947 से लेकर 1995 तक हुआ था । यानी सड़क से लेकर रिहाइशी घर और उघोगो से लेकर बांध और सड़क तक जितना भी निर्माण हुआ है उसने बीते पांच दशकों के निर्माण की बराबरी कर ली है । यानी जो भूकंप 1934 में आया था और जिसने हिमालय से लेकर बिहार के मुंगेर तक एसी तबाही मचायी थी कि लाखो लोग बेधर हो गये थे । करीब आठ हजार लोगो की मौत बिहार में हुई थी । अगर उस तरह का भूकंप दोबोरा आये तो मौक के आंकडों के सामने गिनती छोटी पड़ जायेगी क्योंकि सारी मौतों की वजह निर्माणधीन इमारतें ही रही है । जेएनयू के छात्रो के बीच चर्चा में राजनीतिक घोल तो आयेगा तो फिर आंकडें भी खुल कर सामने आ गये कि सिर्फ मोदी ही नहीं बल्कि मनमोहन सिंह के दौर में भी देश की 25 कंपनियों-कारपोरेट को जो जमीन दी गई उसमें 70 पिसदी से ज्यादा तो खेती की जमीन ही थी । दिल्ली
से सटे गुडगाव में रिलायंस को 10117 हेक्टेयर जमीन दी गई । जहां ज्वार, बाजरा, धान, गेहू सब होता था । 49 गांव बर्बाद हो गये । इसी तरह महाराष्ट्र के रायगढ में तो 14 हजार हेक्टेयर जमीन पर रिलायंस इंडस्ठ्री
खड़ी हुई । यहा तो समूची जमीन ही खेती की थी । 47 गांव बर्बाद हुये लेकिन फिक्र किसे है । जो अब कांग्रेस मोदी को कारपोरेट की बताते हैं और मोदी भी अंबानी अडानी को नहीं कहकर सभी को खुश कर देते है । तो फिर अगला सवाल भूस्खलन का होगा । क्योंकि भूस्खलन ना हो इसके लिये प्रकृति के सारे रास्ते विकास के नाम पर ही खत्म कर दिये गये है । सरकार का नजरिये किस हद तक प्रकृति के खिलाफ है या पर्यावरण उसकी किताब से बाहर की चीज है यह जेएनयू के छात्र के इस तर्क से ही उभर आया कि देश में एसईजेड के नाम पर सिर्फ पांच राज्य महाराष्ट्र,आध्र प्रदेश, यूपी, राजस्थान और गुजरात में जो जमीन ली गई उसमें से 45 फिसदी जमीन ना तो किसी के हवाले की गई ना ही जमीन पर किसान या स्थानीय ग्रमीणो को कोई उपज उपजाने की इजाजत दी गई । आसम यह है कि देश में एसाईजेड की दो लाख पचपन हजार हेक्टेयर जमीन पडी पडी बंजर हो गई । और करीब पौने दो लाख जमीन उधोगो के हवाले कर भी बिना काम पड़ी है क्योकि उसपर निर्माणाधीन उघोगों को कुछ और जमीन चाहिये लेकिन अब उसे ले कैसे यह सियासी आंदोलन के सौदेबाजी में जा फंसा है । यानी सवाल सिर्फ एसी , फ्रिज और सडको पर दौडती तीस करोड से ज्यादा दौड़ती गाडियों भर का नहीं है । बल्कि भूकंप के हालात पैदा कर भूंकप के लिये सबसे अनुकुल जमीन पर रिहाइश की इजाजत देने की भी है । और भूंकप आने पर बचा कैसे जाये इस दिशा में आंख मूंद लेना भी है । क्योंकि दिल्ली ही सिस्मिक जोन नं 4 पर है । उसमें यमुना की जमीन पर खडी इमारतों की कतार के साथ साथ सरकारी इमारतें भी मौजूद हैं । लेकिन दिल्ली में कभी किसी स्तर पर इस सच को परखने की कोशिश की ही नहीं गई कम से कम यमुना की जमीन पर निर्माण होने वाली इमारतों को भूकंपरोधी बनाना जरुरी कर दिया जाये । आलम तो यह है कि कामनवेल्थ गेम्स के दौर में बनी इमारते भी पूरी तरह भूंकपरोधी नहीं है । जबकि सुप्रीम कोर्ट ने पिछले बरस तो दिल्ली एनसीआर को लेकर चिंता जताते हुये हुये निर्माणाधीन इमारत को भूकंपरोधी बनाने की दिशा में कदम उठाने को कहा । विशेषज्ञों की मानें तो भूकंपरोधी तकनीक अपनाते हुये निर्माण करने में बीस से पच्चीस फिसदी खर्च ज्यादा लगता है । लेकिन दिल्ली में रिहाइश तो दूर माल और सिनेमाहाल तक भूकंपरोधी नहीं है । यानी प्रकृति के सामने कोई कुछ कर नहीं सकता यह सोच कर कर ही विकास की लकीर खिंच कर उसे जिन्दगी जीने के लिये जब सरकारी स्तर पर जरुरी बनाया जा रहा है तो फिर बचाने के लिये डिजास्टर मैनेटमेंट की सोच भी क्या कर लेगी । जिसके लिये अलग मंत्रालय नहीं है कोई अलग से मंत्री नहीं है । राजस्व मंत्रालय संभालने वाले मंत्री को ही भूकंप से प्रभावितों को बचाने के लिये उपाय खोजने हैं । है ना कमाल की सोच । जबकि इन सब के बीच भूगर्भ वैज्ञानिक जेके बंसल का मानना है कि नेपाल से 32 गुना अधिक शक्तिशाली भूकंप के आने की आशंका अभी हिमालय और उसके आसपास के इलाकों में बनी हुई है।