कल तक जो लोग ज़िन्दगी के जज्बे के आसरे समूचे समाज को आगे ले जाने का जज्बा देते थे, वही आज बहुत हो चुका का सवाल क्यों खडा कर रहे हैं? मुंबई में 1993 के सीरियल ब्लास्ट से लेकर दो साल पहले शहर में उतरे पानी और लोकल ट्रेनों के विस्फोट ने कभी मुंबई की थकी-चुकी जुबान को उभरने नही दिया। हर बार चकाचौंध रोशनी के बीच से कई चेहरे उभर कर आये और कहा, शहर के ज़ख्म शहर को रोक नही सकते है। हर हाथ ने दूसरे का हाथ थामा।
लेकिन ताज और ओबेराय होटल पर हमलों के बाद ही ऐसा क्या हुआ, जिसने समूचे देश को हिलाकर रख दिया है। जबकि, ताज-ओबेराय-नरीमन हाउस-कैफे पर हुये हमले में मरने वालो की संख्या पानी में डूब कर मरनेवाले और लोकल सीरियल ब्लास्ट में मरने वालों से कम है। मगर मुंबई की चकाचौंध रोशनी के बीच से अब जो चेहरे सामने आ रहे हैं, वह डरे-सहमे हैं। उन्हे भरोसा ही नहीं हो रहा है कि पैसे की ताकत को भी आंतक के सामने जिन्दगी के लिये वैसे ही गुहार लगानी पड़ेगी, जैसी कोई आम भारतीय गुहार लगाता है। जबकि, मुंबई का सच आंतक से भागने का नहीं आंतक के करीब जाना है।
मुंबईकर को मुंबई एक ऐसा सपना बेचती है, जिसमे वह अपनी जड़ों की तरफ जब भी लौटे तो उसका सीना चौड़ा हो। नज़रें उठी हुई हों। यानी जिन छोटे-छोटे शहरों से , गांवों से लोग-बाग मुंबई में दशकों से हैं, उनके लिये मुंबईकर होना उस सुनहरे गीत की तरह है, जिसकी धुन पाईडपाइपर की धुन से ज्यादा सुरीली है। कोई मुंबईकर जब अपने पैतृक घर लौटता है तो उसके साथ मुबंई की वे कहानियां होती हैं,जिसे महज सूंघने के लिये ही समूचा गांव-घर सर आंखों पर बैठा कर रखता है। इसलिये मुंबई का पानी त्रासदी नही बनता, जैसे कोसी का पानी जिन्दगी लीलने वाला बन जाता है । सीरियल ब्लास्ट उसके लिये आंतक का साया नही बनता बल्कि सपनों के शहर में एक और रंगीन सपना बन कर उभरता है। क्योंकि, बहुसंख्यक मुंबईकर को इसका एहसास है कि अगर उसने अपने घाव दिखाये या उसमे भरे मवाद का ज़िक्र भी किया तो वह कभी न रुकने वाले मुबंई में टिक नहीं पायेगा। और ना ही उसके सपनों के खरीदार उसकी जडो में मिलेंगे, जहा से उसे असल रुआब मिलता है। जो उसे अपने समाज में ताज-ओबेराय वाली सामाजिक मान्यता दिलाती है।
दरअसल ताज-ओबेराय वाली सामाजिक मान्यता दिलानी वाली मुंबई में कभी ताज-ओबेराय पर भी हमला होगा यह किसी मुंबईकर ने कभी सोचा नही होगा । यह ठीक वैसे ही है जैसे फलदार पेड़ों की जड़ें कितनी भी बदसूरत हों, लेकिन फल रसीला देती है । इसलिये उनकी जड़ों को भी सहेज कर रखा जाता है। लेकिन रसीले फल की जगह अगर बदसूरत जड़ें ही निकल पड़ें तो जड़ों को कौन सहेजना चाहेगा। जाहिर है डरे और खौफजदा चेहरों को इसी बात का डर है कि उनके तरीके और आम आदमी के तरीके एक से कैसे हो सकते हैं। लगातार देश को दो चेहरों में बांटकर देश चलाने का नजरिया भी इसी लिये निशाने पर है। निशाने पर राजनीतिक नैतिकता और जिम्मेदारी का सवाल है तो कई सवाल एकसाथ खडे हुये है।
मसलन संसदीय राजनीति को खारिज करने के लिये पहली बार वह तबका सामने आया है, जिसने दो चेहरे बनाने की राजनीति को ना सिर्फ जमकर हवा दी बल्कि खुल्लम-खुल्ला साथ दिया। 1903 में ताज होटल का सपना संजोने वाले जमशेदजी टाटा दुनिया के सामने औघोगिक भारत की एक चकाचौघ तस्वीर रखना चाहते थे। सौ साल बाद दुनिया की चकाचौंध के सामने नतमस्तक होकर भारत अपना सबकुछ बेचने को तैयार खड़ा है। जब ताज का सपना बुना जा रहा था तब देश को बनाने का सपना भी संजोया जा रहा था। आज जब ताज बारुद से धू-धू कर जला है तो देश को राजनीति और चकाचौंध की रोशनी धू-धू कर जला रही है। समूचे देश के बीच ताज-ओबेराय की भौगोलिक स्थिति दशमलव शून्य सरीखी होगी । लेकिन आधुनिक पहचान के तौर पर यह उस सौ फीसदी पर भारी है, जिनकी देश में तादाद पांच से सात फीसदी होगी।
लेकिन इस पांच से सात फीसदी के घेरे में आने के लिये जिस तरह देश के साठ-सत्तर फीसदी लोग बैचैन हैं और उनकी बैचेनी के पीछे जो राजनीतिक समझ बनायी गयी है, पहली बार वे दोनो आमने सामने खड़ी हैं। इसलिये बैचेनी दिखायी दे रही है । यह बैचेनी संसद पर हमले से लेकर दो महिने पहले दिल्ली में हुये धमाको के दौरान नही उभरी। यह बेचैनी उन आर्थिक नीतियों के फेल होने से नही उभरीं, जिसके लागू होने के बाद से देश के पचास हजार किसानो ने आत्महत्या कर ली। ये बेचैनी साप्रदायिक और अलगाववादी राजनीतिक हिसां के दौरान नहीं उभरी जिसने कश्मीर से कन्याकुमारी और मुंबई से गुवाहाटी तक में आग लगायी । बीते आठ साल में सौ से ज्यादा घटनाओ में एक हजार से ज्यादा लोग मारे गये। तब भी बेचैनी नहीं जागी।
हर बार समाधान की चाबी उस राजनीति के ही भरोसे रखी गयी, जिसने लोकतंत्र को ही हाशिये पर ढकेलने में गुरेज नही किया। जो चेहरे डरे-सहमे से आंतक के खिलाफ खड़े हैं, उन्ही चेहरों ने मराठीमानुस की अलगाववादी हिंसा के आगे घुटने भी टेके। बेचैनी से ज्यादा सुकून था उन्हीं चेहरो पर क्योंकि जो शिकार हो रहे थे उससे ताज-ओबेराय पर दाग लग सकता है। इस संस्कृति को सभी सहेज कर रखना चाहते थे । यह चकाचौंध बरकरार रहे । पांच सितारा संस्कृति पर आंच नहीं आये। उसके लिये राजनीति का निशाना जिस गोली से साधा जा रहा है, वह भी गौर करना होगा और भविष्य की दिशा क्या हो सकती है यह भी समझना होगा।
राजनीति को उकसाया जा रहा है सुरक्षाकर्मियों के भरोसे । देश में मिलेट्री शासन नही लोकतंत्र है , यह कहने की जरुरत नही है। लेकिन लोकतंत्र सुरक्षा घेरे में चल रहा है यह समझने की जरुरत जरुर है। देश में मौजूद पुलिसकर्मियों में से तीस फीसदी पुलिस वालो का काम वीआईपी सुरक्षा देखना है। यानी उन नेताओं की सुरक्षा करना जिन्हें जनता ने चुना है। दिल्ली में यह पचपन फीसदी है, और मुबंई में सैतिस फीसदी। महाराष्ट् में ओसतन एक पुलिसकर्मी पर महिने में उसकी पगार समेत ट्रेनिग और तमाम सुविधाओ समेत पन्द्रह हजार रुपये खर्च किये जाते है। यह रकम उतनी ही है, जितने में ताज-ओबेराय में एक वक्त एक छोटा परिवार खाना खा ले। साल भर में जितनी रकम महाराष्ट्र के समूचे पुलिस महकमे पर खर्च होती है, उससे दुगुना से ज्यादा लाभ ताज होटल एक महिने में कमा लेता है। देश के साठ फीसदी पुलिसकर्मियों को ताज में सबसे कम पगार पाने वाले भी कम पगार मिलती है। सेना को तमाम सुविधाओ समेत औसतन जितना वेतन मिलता है, उससे ज्यादा वेतव ताज-ओबेराय में शेफ को मिलता है। जिस समय ताज-ओबेराय पर हमला हुआ उससे बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कर्मचारी-अधिकारियों से लेकर देसी उधोगों के अधिकारी और सरकारी नौकरशाह और सांसद से लेकर नेता तक फंसे थे।
यह जगह उन चेहरो के लिये भी रोजमर्रा की सराय है, जो चकाचौंध रोशनी में नहाया हुआ है। इसलिये लहू कही ज्यादा खौफजदा है, क्योंकि उसके सराय पर हमला हुआ है । लेकिन नये दौर में यह सराय बरकरार रहे , इसके लिये संसदीय व्यवस्था ने वह तमीज भी छोड़ी है, जिसमें वह कभी कल्याणकारी हुआ करता था । ताज-ओबेराय का मतलब अगर विकसित देश होना है, तो नयी राजनीति का मतलब मुनाफे की थ्योरी के लागू करना है। मुनाफे से मतलब देश की तरक्की है। तरक्की से मतलब ताज में चाय की चुस्की के साथ अरब सागर के पानी को निहारना है। संसदीय राजनीति की ऐसी नीतियों पर टकराव ना हो इसलिये राजनीति के विकेन्द्रीकरण का ही परिणाम है कि देश में कुल सेना 37 लाख 89 हजार तीन सौ है तो राजनीति करने वाले चुने हुये नुमाइन्दों की तादाद 38 लाख 67 हजार 902 है । राजनेताओ की यह संख्या सिर्फ चुने हुये की है। सांसद से लेकर पंचायत और ग्राम पंचायत तक में चुनाव लड़ने वालों की तादाद का आकलन करे तो संख्या करोड़ पार कर जायेगी। दुनिया की किसी भी संस्था से सबसे ज्यादा रोजगार देनी वाली संस्था भारतीय राजनीति ही है।
जाहिर है सत्ता के विकेन्द्रीकरण में राजनीति ने अपना बचाव जीने के दूसरे विकल्पों को खत्मकर अपने साथ खड़े लोगो को बढ़ाकर किया । तो इस राजनीति के कंधों पर सवार होकर ताज-ओबेराय ने अपनी चमक बढ़ायी। अब जब दोनो आमने सामने हैं तो उस भारत के बनने का इंतजार कीजिये, जिसमे सोने की चिड़िया की धुन सिर्फ मुंबई की न हो बल्कि हिन्दुस्तान की हो।
Thursday, December 4, 2008
हिन्दुस्तान नहीं, मुंबई मेरी जान..
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Punya Prasun Bajpai
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Monday, November 24, 2008
आरएसएस को हिन्दुत्व का पाठ पढ़ाएंगी सावरकर की पाती
राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की मानें तो एटीएस पंचतंत्र की कहानी लिख रहा है। क्योंकि जो लोग मालेगांव ब्लास्ट के आरोपी हो सकते हैं, वही लोग संघ के कार्यवाह मोहनराव भागवत और कार्यकारिणी सदस्य इन्द्रेश कुमार की हत्या की साजिश कैसे रच सकते हैं। लेकिन हिन्दुत्व की जिस राह को 'अभिनव भारत' सरीखा संगठन पकड़े हुये है और हिन्दुत्व का नाम लेते लेते आरएसएस जिस राह पर जा चुका है अगर दोनो की स्थिति को दोनो के घेरे में ही देखे तो पहला सवाल यही उठेगा कि मालेगांव को लेकर जो सोच अभिनव भारत में है, कमोवेश वही सोच आरएसएस को भी लेकर है। यानी मालेगाव और संघ के हिन्दुत्व में कोई अंतर करने की स्थिति में 'अभिनव भारत' नहीं है।
इस स्थिति को समझने से पहले जरा दोनों के अतीत को समझ लें। दरअसल, अभिनव भारत जिस हिन्दु महासभा से निकला उसके कर्ता-धर्त्ता सावरकर थे जो सीधे कहते थे," इस ब्रह्माण्ड में हिन्दुओं का अपना देश होना ही चाहिये, जहां हम हिन्दुओं के रुप में, शक्तिशाली लोगो के वंशज के रुप में फलते-फूलते रहें। सो, शुद्दि को अपनाये, जिसका केवल धार्मिक नहीं, राजनीतिक पहलू भी है । " वहीं हेडगेवार समाज के शुद्दिकरण के रास्ते हिन्दु राष्ट्र का सपना देशवासियो की आंखों में संजोना चाहते थे।
सावरकर पुणे की जमीन और कोकणस्थ ब्रह्माणों के बीच से हिन्दुसभा को खड़ा कर सैनिक संघर्ष के लिये 1904 में अभिनव भारत को लेकर ब्रिट्रिश सरकार को चुनौती दे रहे थे। वहीं दो दशक बाद हेडगेवार नागपुर की जमीन पर तेलुगु ब्राह्मणों के बीच से हिन्दुओं के अनुकुल स्थिति बनाने के लिये कांग्रेस की नीतियों का विरोध कर हिन्दुत्व शुद्दिकरण पर जोर दे रहे थे। उस दौर में सावरकर के तेवर के आगे आरएसएस कोई मायने नहीं रखती थी । ठीक उसी तरह जैसे अब आरएसएस के आगे हिन्दु महासभा कोई मायने नहीं रखती । सावरकर की पुत्रवधु हिमानी सावरकर 2004 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में हिन्दुमहासभा का अलख लिये चुनाव लड़ रही थीं। उस समय बीजेपी ही नहीं आरएसएस के स्वयंसेवक भी मजा ले रहे थे। हिमानी अपना चुनाव प्रचार करने ऑटो पर निकलती थीं और बीजेपी के समर्थक जो शायद आरएसएस से भी जुड़े रहे होगे, आटोवाले को कहते थे "हिमानी पैसा ना दे पाये तो हमसे ले लेना ।"
लेकिन वही दौर ऐसा भी था जब आरएसएस के भीतर बीजेपी को लेकर घमासान मचा हुआ था । इसलिये कार्यवाह का पद जब मोहन राव भागवत ने संभाला तो मोहनराव में लोग मधुकर राव भागवत को देख रहे थे । मधुकर राव भागवत ना सिर्फ मोहन भागवत के पिता थे बल्कि हेगडेवार जब आरएसएस को भारत की धमनियो में दौड़ाने की बात कहते थे तो मधुकरराव हमेशा उनके साथ खड़े रहे । उस दौर में मधुकर राव भागवत गुजरात में संघ के प्रांत प्रचारक थे, जो राजनीतिक नजरिए को खारिज कर हिन्दुत्व के जरिये समाज का शुद्दिकरण सामाजिक और सांस्कृतिक तौर पर करना चाहते थे। लेकिन मोहन भागवत ने जब कार्यवाह का पद संभाला तो अयोध्या में मंदिर निर्माण एक सपना बना दिया गया था। स्वदेशी मुद्दा एफडीआई के आगे घुटने टेक रहा था। गो-रक्षा का सवाल उठाना आर्थिक विकास की राह में पुरातनपंथी राग अलापने सरीखा करार दिया जा रहा था । धारा-370 का जिक्र राजनीतिक तौर पर एक बेमानी भरा शब्द हो चुका था। धर्मातरंण के आगे आरएसएस नतमस्तक नजर आ रहा था । बांग्लादेशी घुसपैठ का मामला वाजपेयी सरकार में ठंडे बस्ते में डल चुका था ।
पूर्वोत्तर में संघ के चार स्वंयसेवकों की हत्या के बावजूद तब के गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी की खामोशी ने संघ के माथे पर लकीर खिंच दी थी । जम्मू-कश्मीर को तीन हिस्सो में बांट कर देश को जोडने के संघ कार्यकारिणी के फैसले को वाजपेयी सरकार ने ही ठेंगा दिखा दिया था । और इन सबके बीच बीजेपी की तर्ज पर मुस्लिमो को साथ लाने की जो पहल संघ के भीतर इन्द्रेश कुमार कर रहे थे उसने संघ के एक बडे तबके में बैचेनी पैदा कर दी थी ।
जाहिर है इन परिस्तिथितियो को महज संघ के भीतर का कट्टर हिन्दुत्व ही नही देख कर खुद को अलग थलग समझ रहा था बल्कि मराठी समाज का वह तबका जो सावरकर के आसरे कभी आरएसएस को मान्यता नहीं देता था, वह कहीं ज्यादा खिन्न भी था । 2002 से लेकर 2006 के दौरान विश्व हिन्दु परिषद से लेकर भारतीय मजदूर संघ,स्वदेशी जागरण मंच और किसान संघ के बीच का तालमेल भी बिगड़ता गया । इन सब के बीच सरसंघचालक कुपं सीं सुदर्शन की उस पहल ने आग में घी का काम किया जब आरएसएस पर लगी सांप्रदायिक छवि को धोने के लिये सुदर्शन ने मुस्लिम समारोह-सम्मेलनो में जाना शुरु कर दिया । महाराष्ट्र के हिन्दुवादी आंदोलन में संघ की इन तमाम पहल का नतीजा समाज के भीतर संघ की घटती हैसियत से साफ नजर आने लगा । 2004 में बाजपेयी सरकार की चुनाव में हार ने ना सिर्फ संघ के एंजेडे की हवा निकाल दी जो संघ के लिबरल होने पर बीजेपी की सत्ता का स्वाद चख रहा था और सत्ता को अपना औजार बनाकर हिन्दुत्व का राग अलापने से भी नही कतरा रहा था । बल्कि इस दौर में संघ के भीतर जिस मराठी लॉबी को हाशिये पर ठकेला गया था उसने खुलकर संघ की सेक्यूलर सोच को निशाना बनाना शुरु किया ।
इस दौर में सावरकर -गोडसे की नयी पीढ़ी, जो संघ से पहले अंसतुष्ट थी, उसने सावरकर की संस्था 'अभिनव भारत' को फिर से सक्रिय करने की दिशा में वर्तमान कालखंड को ही उचित माना । इस विंग ने संघ पर भी मुस्लिम परस्ती और हिन्दु विरोधी सेक्यूलर राह पर जाने के आरोप मढ़ा। ऐसा नही है कि अभिनव भारत एकाएक उभरा और उसने संघ को निशाने पर ले लिया । दरअसल, 2006 में अभिनव भारत को दुबारा जब शुरु करने का सवाल उठा तो संघ के हिन्दुत्व को खारिज करने वाले हिन्दुवादी नेताओ की पंरपरा भी खुलकर सामने आयी। पुणे में हुई बैठक में , जिसमे हिमानी सावरकर भी मौजूद थीं, उसमें यह सवाल उठाया गया कि आरएसएस हमेशा हिन्दुओं के मुद्दे पर कोई खुली राय रखने की जगह खामोश रहकर उसका लाभ उठाना चाहता रहा है। बैठक में शिवाजी मराठा और लोकमान्य तिलक से हिन्दुत्व की पाती जोड कर सावरकर की फिलास्फी और गोडसे की थ्योरी को मान्यता दी गयी । बैठक में धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी से लेकर गोरक्षा पीठ के मंहत दिग्विजय नाथ और शंकराचार्य स्वामी स्वरुपानंद के भक्तो की मौजूदगी थी । या कहे उनकी पंरपरा को मानने वालो ने इस बैठक में माना कि संघ के आसरे हिन्दुत्व की बात को आगे बढाने का कोई मतलब नहीं है।
माना यह भी गया कि बीजेपी को आगे रख कर संघ अब अपनी कमजोरी छुपाने में भी ज्यादा वक्त जाया कर रहा है इसलिये नये तरीके से हिन्दुराष्ट्र का सवाल खड़ा करना है तो पहले आरएसएस को खारिज करना होगा । हालांकि, ऐरएलएल के भीतर यह अब भी माना जाता है कि कांग्रेस से ज्यादा नजदीकी हिन्दुमहासभा की ही रही । 1937 तक तो जिस पंडाल में कांग्रेस का अधिवेशन होता था, उसी पंडाल में दो दिन बाद हिन्दुमहासभा का अधिवेशन होता। और मदन मोहन मालवीय के दौर में तो दोनो अधिवेशनों की अध्यक्षता मालवीय जी ने ही की। इसलिये आरएसएस कांग्रेस की थ्योरी से हटकर सोचती रही । लेकिन हिन्दु महासभा का मानना है कि संघ ने बीजेपी की सत्ता का मजा लेकर सत्ता दोबारा पाने के लिये खुद के संगठन का कांग्रेसीकरण ज्यादा कर लिया है और हिन्दु राष्ट्र की थ्योरी को पूरी तरह नकार दिया है।
महत्वपूर्ण यह भी है ब्राह्मणों की पंरपरा को लेकर भी मतभेद उभरे। चूकि हेडगेवार की तरह सुदर्शन भी तेलुगु ब्रह्मण है, तो हिन्दुत्व पर कड़ा रुख अपनाने की सुदर्शन की क्षमता को लेकर भी यह बहस हुई कि संघ फिलहाल सबसे कमजोर रुप में काम कर रहा है। इसलिये संघ की मराठी लाबी भी सावरकर की सोच को आगे बढाने में मदद करेगी। इन सब का असर संघ पर किस रुप में पड़ा है या फिर देश में जो राजनीतिक हालात हैं, उसमे सरसंघचालक सुदर्शन भी अंदर से किस तरह हिले हुये है इसका अंदाजा पिछले महीने 7 नबंबर को दिल्ली के जंतर-मंतर पर गो-रक्षा के सवाल पर हिमानी सावरकर के साथ मंच पर खडे सुदर्शन को देख कर समझा जा सकता था । यानी जो परिस्थितियां सावरकर और संघ को अलग किये हुये थीं, उसमे पहली बार संघ के भीतर भी इस बात को लेकर कुलबलाहट है कि जिस राह पर वह चल रही है वह रास्ता सही नहीं है।
मामला सिर्फ मोहन भागवत या इन्द्रेश की हत्या की साजिश का नहीं है , पुणे में गोखले-साठे-पेशवा-सावरकर की कतार में खडे कोकनस्थ बह्मण अब स्वदेशी अर्थव्यवस्था के उस ढांचे को जीवित करना चाह रहे हैं, जिसकी बात कभी संघ के नेता दत्तोपंत ढेंगडी किया करते थे। लेकिन ढेंगडी अपनी बात कहते कहते मर गये मगर न वाजपेयी सरकार ने उनकी बात सुनी ना सरसंघचालक ने उन्हे तरजीह दी । जाहिर है, आजादी के बाद पहली बार अगर अभिनव भारत को बनाने की जरुरत सावरकर को मानने वाले कर रहे है तो इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि हिन्दुत्व की जो थ्योरी सामाजिक और सांस्कृतिक तौर पर अभी तक आरएसएस परोस रही है और बीजेपी उसे राजनीतिक धार दे रही है, वह अपने ही कटघरे में पहली बार खड़ी है।
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Wednesday, November 19, 2008
आतंकवाद के राजनीतिक संकेत को अंजाम देने की सामाजिक फितरत
छह दिसबंर 1992 को दोपहर दो से तीन बजे के दौरान नागपुर के महाल स्थित मोहल्ले में आरएसएस मुख्यालय के ठीक बगल की खुली जगह पर पुलिस जुटने लगी थी। अयोध्या से बाबरी मसजिद ढहाने की खबर जैसे जैसे आ रही थी, आरएसएस मुख्यालय में सरगरमी बढ़ रही थी। संघ के स्वयंसेवकों से लेकर छिटपुट पदाधिकारियों की मौजूदगी में यह एहसास समूचे इलाके में था कि जो कहा, सो किया। यानी पहली बार उस जीत का एक एहसास संघ मुख्यालय या कहे महाल मोहल्ले की गलियों में महसूस किया जा सकता था, जिसे आजादी के ठीक बाद से कभी महसूस नहीं किया गया था।
महाल का जिक्र इसलिये क्योंकि इस मोहल्ले में कमोवेश हर परिवार संघ का स्वयंसेवक है। और पहला एहसास इसलिये क्योंकि आजादी से पहले और बाद की दो घटनाएं संघ के स्वयंसेवकों को टीस दिये हुये थीं। दरअसल, हिन्दुत्व को लेकर संघ की पहल को सावरकर ने कभी मान्यता नहीं दी। इसी वजह से सावरकर नागपुर आये तो भी संघ मुख्यालय नही गये। हालांकि संघ के मुखिया से मुलाकात में कोई गुरेज नहीं किया लेकिन महाल में संघ के स्वयंसेवकों को हमेशा यह एहसास रहा कि सावरकर के तेवर के आगे संघ हिन्दुत्व बौना है।
नागपुर के काटन मार्केट की एक सभा में सावरकर यह कहने से भी नहीं चूके कि सांस्कृतिक संगठनों से देश हिन्दुत्व की राह पर नहीं चल निकलेगा। खैर महाल के स्वयंसेवकों को दूसरी टीस गांधी की हत्या के बाद आरएसएस पर प्रतिबंध का लगना था। लेकिन
6 दिसंबर 92 की दोपहर जिस जगह पर पुलिस जमा हो रही थी, उसी खुली जगह पर संघ के सरसंघचालक देवरस की कुर्सी भी लगा दी गयी। देवरस करीब तीन-साढे तीन बजे संघ मुख्यालय के अपने घर के बगल की इस खुली जगह पर दो लोगों का सहारा लेकर आये और लकड़ी की उस कुर्सी पर बैठ गये । करीब तीन दर्जन पुलिसकर्मियों ने समूचे क्षेत्र को घेर रखा था। पत्रकारों की भीड़ मौजूद थी। सभी की बातों का जबाब भी देवरस दे रहे थे। पुलिस ने इसके संकेत दे दिये थे कि देवरस की गिरफ्तारी होगी। लेकिन उनकी बिगडी तबीयत की बजह से उन्हे संघ मुख्यालय में ही नजरबंद कर रखा जायेगा। जैसे ही इसकी पहल पुलिस ने शुरु की अचानक कुछ लडकियों और महिलाओ ने देवरस के इर्द-गिर्द घेरा बना लिया। जानकारी मिली की यह दुर्गावाहिनी से जुड़ी हुई हैं। पुलिस टीम में कोई महिला पुलिसकर्मी थी नहीं तो नजरबंदी की पहल रुक गयी क्योंकि पुलिस से दो-दो हाथ करने को दुर्गा वाहिनी की लड़कियां तैयार थीं।
बाबरी मस्जिद को लेकर और अयोध्या में राम मंदिर को लेकर पत्रकारो के सवाल जबाब के बीच देवरस बार बार यह संकेत दे रहे थे कि बाबरी मस्जिद का ढहाया जाना कोई आखिरी या पहली सफलता नहीं है बल्कि रणनीति का एक हिस्सा मात्र है । जिसे राजनीतिक तौर पर देखना और समझना चाहिये चाहे यह सास्कृतिक संघर्ष नजर आ रहा हो। ऐसे में डंडो से लैस दुर्गावाहिनी की लड़कियां जैसे ही पुलिस से दो-दो हाथ करने को नजर आयीं तो मैंने सरसंघचालक देवरस से पूछा, "दुर्गावाहिनी के इसतरह इस्तेमाल का मतलब क्या निकाला जाये..जब यह सहमति बन चुकी है कि आपको आप ही के निवास में नजरबंद रखा जायेगा।" इस पर देवरस का जबाब था कि दुर्गावाहिनी को भी समझना होगा कि कल को उनकी परिस्थतियां किन वातावरण के घेरे में आ सकती हैं। फिर यह एक तैयारी है जिसमे सभी को भागीदारी देनी होगी । इस पर मेरा सवाल था--क्या यह राजनीतिक समझ विकसित करने की तैयारी है । देवरस ने कहा-सास्कृतिक संघर्ष है । लेकिन राजनीति से तो अछूता कुछ भी नहीं । फिर हंसते हुये बोले, आपलोगों से ज्यादा से ज्यादा बात हो सके, इसके लिये दुर्गावाहिनी ने रास्ता बना दिया आप उन्हे बधायी दें। कुछ देर में ही महिला पुलिसर्मियों की टुकड़ी पहुंची और कुछ विरोध और नारों के बीच देवरस को नजरबंद कर लिया गया ।
वहीं अगले दिन नागपुर के मुस्लिम बहुल इलाके मोमिनपुरा के लोगों ने बाबरी मस्जिद ढहाये जाने के विरोध में एक रैली निकालने का निर्णय लिया । रैली निकल रही है, उसकी जानकारी पुलिस के पास भी पहुंची । पुलिस और रैली निकालने वालों की तकरार के बाद तय हुआ की रैली शहर में नहीं घूमेगी । मोमिनपुरा से निकल कर आधे किलोमीटर का चक्कर लगा कर वापस मोमिनपुरा की गलियों में चली जायेगी और सभा भी वही करेगी । रैली दोपहर में जब निकली तो काले झंडे और बैनर के साथ नारे भी लग रहे थे। लेकिन जैसे ही मोमिनपुरा के मुहाने पर रैली पहुंची, पुलिस ने मुख्य सड़क पर रैली न लाने का निर्देश देकर वहीं सभा करने को कहा। नारे लगा रहे युवाओं में इससे आक्रोष भड़का। उनका कहना था कि वह बाबरी मस्जिद को ढहाये जाने के विरोध का सार्वजिक इजहार भी नहीं कर सकते। वे पुलिस बैरिकेट तोड़कर सड़क पर आने लगे । पुलिस ने लाठिया भांजी । लेकिन महज पांच मिनट के भीतर ही उस वक्त के नागपुर के पुलिस कमिश्नर ईनामदार ने गोली चलाने का निर्देश दे दिया। करीब 22 राउंड से ज्यादा गोलियां चलीं। 13 लडकों की मौत हो गयी। बीस से ज्यादा घायल हो गये। जो लड़के मरे वह सभी मोमिनपुरा के भीतर ही मरे। इतना ही नहीं मोमिनपुरा के एक छोर से दूसरे छोर तक लाशें गिरीं। पुलिस ने महज मुख्य सड़क रक रैली को आने से ही नहीं रोका बल्कि आक्रोष दबाने के लिये मोमिनपुरा के भीतर घरों में घुसकर युवाओ की डंडो से जमकर पिटाई की। जो बाहर निकला उसे गोली मार दी। किसी लड़के के शरीर में गोली कमर से नीचे नही लगी । नागपुर के लिये यह अपने तरह की पहली घटना थी, क्योकि इससे पहले कभी पुलिस की गोली चली और लोग मरे यह बुनकरो के आंदोलन में हुआ था या फिर दलित आंदोलन के उग्र रुप धारण करने पर।
लेकिन,यह पहला मौका था जब 6 दिसंबर की घटना के 48 घंटो के बाद ही समूचे शहर को लगने लगा कि मोमिनपुरा और महाल की पांच किलोमीटर की दूरी सीमा पार सरीखी दूरी हो गयी है। यह घटना उस वक्त तो कानून-व्यवस्था को बरकरार रखने के दायरे में सिमट कर थम गयी लेकिन उस दौर से लेकर आंतकवाद का दामन पकड कर अपने आक्रोष को ठंडा करने या समाधान की राह सोचने की जो समझ विकसित होती चली गयी वह आज मुंह बाएं सामने खड़ी है।
जाहिर है अयोध्या की घटना के बाद देश ने जो देखा समझा या कहे राजनीति ने सत्ता का दामन पकड़ कर अपनी सहुलियतों को जिस तरह सियासी रंग में रंग दिया इसमें दोनो ही तबकों के हाथ खाली रहे। इतना ही नहीं सियासी रंग इतना गाढ़ा हुआ कि देश के बहुसंख्यक तबके ने खुद को ठगा महसूस किया। समूचे देश में मुस्लिमो ने मोमिनपुरा सरीखे मोहल्लो से निकलना बंद किया और उनके इजहार का तरीका उन्हीं तक सिमटता गया, जिसे कभी कांग्रेस ने तो कभी मुस्लिम लिडरानों ने राजनीति का हथियार बनाया । कमोवेश आरएसएस का भी अपने घेरे में यही हाल हुआ। देवरस सरीखा कोई सरसंघचालक उनके बाद न हुआ जो खुले आसमान तले सवालो का जबाब देने आता। या फिर सांस्कृतिक आंदोलन को भी राजनीतिक तौर पर ढालने का मंत्र जानता। बंद कमरो में रणनीति बनने लगी और अपने अपने घेरे में लोकतंत्र के कई आधार स्तंभ ढहाये गये और उसे सफलता मान कर जीत का राजनीतिक आंतक पैदा किया गया।
ऐसे मे साधु-संतो के बीच हिन्दुत्व को लेकर यह नयी बहस है कि आरएसएस जिस हिन्दु राष्ट्र की परिकल्पना को समेटे हुये हो, उससे लाख दर्जे बेहतर तो सावरकर थे, जो सीधे संघर्ष की बात तो करते थे । सावरकर की सोच अचानक उन संगठनो में पैठ बनाने लगी है जो आरएसएस के जरिये बीजेपी को राजनीतिक मान्यता देते रहे हैं । जाहिर है सावरकर की थ्योरी तले पहले जनसंघ खारिज था तो अब बीजेपी खारिज हो रही है। इसलिये साध्वी प्रज्ञा को साधु-संतो के बीच अचानक एक प्रतीक भी बनाया जा रहा जो बिगड़ती व्यवस्था में हिन्दुत्व की नयी थ्योरी को पैदा कर सके। इसलिये बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिह हो या आरएसएस के सरकार्यवाहक मोहनराव भागवत दोनों यही कह रहे है कि भारतीय संस्कृति से जुड़ा व्यक्ति आतंकवादी नहीं हो सकता । वहीं कांग्रेस मुस्लिमो को रिझाने के लिये संकेत की भाषा अपना रही है कि संघी हिन्दुत्व भी आंतकवाद की राह पर है।
हालांकि साध्वी-साधु प्रकरण से यह ख्याल जरुर बढ़ाया जा रहा है कि आंतकवाद का धर्म से कुछ भी लेना देना नहीं है । लेकिन राजनीतिक तौर पर नया सच यह भी है कि अगर आंतकवाद का धर्म होता है तो धर्म के आसरे किया गया आंतकवाद, आंतकवाद नही कुछ और होता है। दरअसल, 6 दिसबंर 1992 को बाबरी मस्जिद ढहाने के बाद सरसंघचालक देवरस ने इसी संकेत की बात की थी कि अयोध्या का मतलब महज मंदिर निर्माण नहीं हिन्दुत्व जागरण है और मोमिनपुरा में विरोध का इजहार रोक कर पुलिस की गोली ने इस संकेत को अंजाम दिया था। संयोग से देश इसी राजनीतिक संकेत और अंजाम के बीच झूल रहा है, बच सकते हैं तो बचें।
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Sunday, November 16, 2008
मस्त लोगों के मरे हुये मन
नोट-आज 16 नवंबर, प्रेस दिवस है। ये लेख उसी उपलक्ष्य में लिखा गया है।
6 जून 1981 को बिहार की बागमती नदी में समस्तीपुर-वनमंखी पैसेंजर गाड़ी के सात डिब्बे टूट कर गिर गये । उस समय दिनमान के संपादक रघुवीर सहाय ने अपने संपादकीय में लिखा-
" रेल दुर्घटना की खबर ने उन्हे छोड़, जिन के अपने सगे उस गाडी में थे, किसी को विचलित नहीं किया।" संपादक के नाम एक ऐसे पत्र को दिनमान की कवर स्टोरी का हिस्सा बनाया, जिसमें इस घटना को एक भयानक राष्ट्रीय विपत्ति बताया गया था। यह वाकया इसलिये याद आ गया दो महीने पहले बिहार में ही कोसी नदी ने जब अपनी धारा बदली तो सात जिलो के दो लाख लोगो को लील लिया। लेकिन किसी अखबार-पत्रिका या न्यूज चैनल की कवर या मुख्य स्टोरी यह तब तक नहीं बन पायी जब तक प्रधानमंत्री ने इसे राष्ट्रीय विपदा नही बताया।
दिल्ली के किसी समाचार-पत्र को पढ़ कर बिहार के हालात की जानकारी किसी को नही मिल सकती थी । न्यूज चैनलों ने भी एक हफ्ते तक प्राइम टाइम में इस खबर को छूने की हिम्मत नही दिखायी। उन्हें इसकी टीआरपी न मिलने का डर था। यानी 1981 के बाद देश के विकास और मीडिया के आधुनिकीकरण में लगे 27 सालो में हर शख्स अकेला ही होता जा रहा है। 27 साल पहले हजारों अकेले आदमियों की मौत हुई थी और 2008 में लाखों अकेले आदमी मरे नहीं लेकिन इस या उस दौर में सरोकार का मीडिया, मुनाफे के मीडिया में बदल गया।
दरअसल खुले बाजार ने महज मुनाफे की थ्योरी को समाज और आर्थिक तौर पर ही नही परोसा बल्कि राजनीति और मीडिया को एक साथ सरोकार की भाषा छुड़वाने की स्थितियां बना दीं। इस दौरान मीडिया सबसे रईस होकर उभरा तो उसके भीतर सत्ता के करीब होने की ललक बढ़ी। लेकिन बाजार व्यवस्था का प्रभाव महज बिजनेस के रुप में मीडिया पर पड़ा, ऐसा भी नही है । लोकतंत्र का जो पाठ संसदीय राजनीति ने नीतियों के जरीये देश के सामने रखा, उसमें निजी शब्द हावी होता चला गया। खासकर निजी का मुनाफा ही निजी की सुरक्षा हो गयी । सत्ता के सामने अपने हक की लड़ाई के मायने तक बदलने लगे। जब आम आदमी का विकास एक दूसरे के हक को छीनकर परिभाषित होने लगा तो जिसका पेट भरा था या जो मुनाफे की पायदान पर सबसे ऊपर खड़ा था, उसने अपने आपको लोगो से काटकर सत्ता के अनुकुल करना ही बेहतर समझा। हकीकत मे लोकतंत्र की यह परिभाषा राज्य ने ही गढ़ी जिसने अपनी भूमिका एजेंट भर की रखी तो मीडिया भी इससे हटकर नही सोच पाया ।
1991 से लेकर 2008 तक के दौरान आर्थिक सुधार को लेकर जो भी नीतियां राज्य ने अलग अलग सरकारों के दौर में रखीं, उसे बिजनेस मीडिया {आर्थिक अखबार-बिजेनेस चैनल } ने कभी खारिज नही किया । मीडिया भी नीतिगत तौर पर सत्ता के करीब ही हुआ क्योंकि लोकतंत्र की परिभाषा बदली थी तो चौथे स्तभं को लेकर भी नयी व्याख्या सरकार के नजरिये से नजर मिला कर चलने की ज्यादा हो गयी। मीडिया को आर्थिक तौर पर चलाते हुये मुनाफा बनाना पूरी तरह सत्ता पर टिका क्योंकि मीडिया इस डेढ़ दशक में सरोकार के सूचना तंत्र से ज्यादा सूचना तंत्र का बिजनेस बन गया ।
इसकी सुरक्षा मीडिया को मुनाफे के तौर पर मिली यह भी सच है। यह समझ ठीक उसी तरह विकसित हुई, जैसे थोड़ी से भी सुरक्षा पाते ही एक भारतीय आदमी अपने को इतना अधिक सत्ता के नजदीक समझने लगा है कि उसका सोचने का ढंग उसी तरह मानव विरोधी और निर्मम हो जाता है, जैसा शासक वर्ग का है। इस के पीछे कही ना कही यह विचारधारा भी काम कर रही है कि देश की सामाजिक व्यवस्था को न्याय के पक्ष में बदलने में आम नागरिको का कोई हाथ हो नही सकता । वह तो केवल सत्ता के शीर्ष स्थानों पर बैठे लोगो द्रारा बदली जायेगी। जो लोग समाज को बनाने में अपने मौलिक अधिकारो को छोड़ चुके हैं, वे सह्हदय भी नही हो सकते । यही होंगे तो केवल अपनी इकाइयों के साझीदार के लिये, जाति के लिये, संप्रदाय के लिये या परिवार के लिये होगे।
मीडिया इस समझ से अछूता है ऐसा भी नही है। इसलिये इस दौर में जिस तरह की खबरों को परोसा जा रहा है या जिस तरह से परोसा जा रहा है वह निजी मुनाफे और सत्तानूकुल बने रहने के सच से हटकर कतई नहीं है। इसका दूसरा पहलू यह भी है कि राष्ट्र की संपत्ति से लेकर औघोगिक और सामरिक समृद्दि तक में देश के लोगों की और संस्थाओ की भागेदारी गायब हो रही है। वह खुले बाजार की तरह सीमापार की करेंसी तक पर जा टिकी है। मीडिया भी इससे अछूता नही है। एफडीआई का कितना फीसदी मीडिया के विस्तार में लगाया जा सकता है, यह सरकार और मीडिया के बीच समझौते का नया पहलू है।
शायद इसीलिये किसानों की आत्महत्या से लेकर आंतकवाद छाया और उस पर सांप्रदायिक राजनीति के आसरे सत्ता चमकाने के तथ्यों को नजरअंदाज कर बाजार की शानोशौकत से लेकर हंसी ठठा का खेल अखबारों से लेकर न्यूज चैनलो में नजर आता है। उसमे यह कहने से गुरेज नही किया जा सकता कि मीडिया के मन में समाज और राष्ट्र की वह कल्पना मर चुकी है, जिसमें यह संभव हो की सत्ता के संवेदनहीन होने पर मीडिया की खबर समूचे देश को सचेत कर दे।
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Monday, November 10, 2008
साधु,सिपाही और मुस्लिम आतंकवाद में कहां है देश
आतंकवाद के घेरे में साधु और सिपाही के आने से झटके में मुस्लिम आतंकवाद पर विराम लग गया है । वह बहस जो हर आतंकवादी हिंसा के बाद "सॉफ्ट स्टेट" को लेकर शुरु होती थी और इस्लामिक आतंकवाद के साथ कभी सीमा पार तो कभी बांग्लादेश तो कभी अलकायदा सरीखे संगठन को छूते हुये पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के इर्द गिर्द ताना बाना बुनती थी, अचानक वह बहस थम गयी है ।
साध्वी प्रज्ञा से लेकर लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद श्रीकांत पुरोहित के आतंकवादी ब्लास्ट में शामिल होने ने संकेतों ने अचानक उस मानसिकता को बैचेन कर दिया है जो यह कहने से नहीं कतराती थी कि हर मुसलमान चाहे आतंकवादी न हो लेकिन हर आतंकवादी मुसलमान जरुर है। इसमे दो मत नही कि मुस्लिम समुदाय को लेकर आतंकवाद की जो बहस समाज के भीतर चली और बीजेपी-कांग्रेस सरीखे राष्ट्रीय राजनीतिक दलो ने उसे जिस तरह देखा, उसमें देश की सामाजिक-आर्थिक स्थिति जुड़ती चली गयी। इसे खुफिया एजेंसियों ने भी माना कि बाजार अर्थव्यवस्था का जो चेहरा विलासिता के नाम पर भारतीय समाज से जुड़ा है, उसमे बहुसंख्यक तबके के सामने यह संकट भी पैदा हो गया है कि वह पाने की होड़ में अपना क्या क्या गंवा दे। खासकर समाज के भीतर जब समूचे मूल्य पूंजी के आधार पर तय होने लगे हैं और सरकार की नीतियां भी नागरिकों को साथ लेकर चलने के बजाय एक तबके विशेष के मुनाफे को साथ लेकर चल रही