Sunday, September 24, 2017

भाषण, सेक्स और चैनल

हालात  तो खुला खेल फर्रुखाबादी से आगे के हैं...

दिन शुक्रवार। वक्त दोपहर के चार साढ़े चार का वक्त । प्रधानमंत्री बनारस में मंच पर विराजमान। स्वागत हो रहा है । शाल-दुशाला ऊढ़ाई  जा रही है । भाषणों का दौर शुरु हो चला है। पर हिन्दी के राष्ट्रीय न्यूज चैनल पर हनीप्रीत के अभी तक गायब पूर्व पति विश्वास गुप्ता का कही से पदार्पण हुआ और वह जो भी बोल रहा था, सबकुछ चल रहा था । हनीप्रीत के कपड़ों के भीतर घुसकर। गुरमीत के बेड पर हनीप्रीत । कमरा नहीं हमाम । बाप - बेटी के नाम पर संबंधों के पीछे का काला पन्ना । भक्तों पर कहर और महिला भक्तों की अस्मत से खुला खिलवाड़। सबकुछ लाइव । और एक दो नहीं बल्कि देश के टाप पांच न्यूज चैनलो में बिना ब्रेक । पूरी कमेन्ट्री  किसी बीमार व्यक्ति या ईमानदार व्यक्ति के  बीमार माहौल से निकल कर बीमार समाज का खुला चित्रण । वो तो भला हो कि एएनआई नामक समाचार एजेंसी का, जिसे लगा कि अगर हनीप्रीत की अनंत  कथा  चलती रही तो कोई पीएम को दिखायेगा नहीं । और साढे तीन बजे से शुरु हुई विश्वास गुप्ता की कथा को चार बजकर पैंतीस मिनट पर एएनआई ने काटा तो हर किसी ने देखा अब प्रधानमंत्री मोदी को दिखला दिया जाये। यानी तीन सवालों ने जन्म लिया । पहला , एएनआई की जगह अगर न्यूज चैनलों ने पहले से लाइव की व्यवस्था हनीप्रीत के पूर्व पति की प्रेस कांन्फ्रेस की कर ली होती और पूर्व पति अपनी कथा रात तक कहते रहते तो पीएम मोदी का बनारस दौरा बनारस के भक्त चश्मदीदो के सामने ही शुरु होकर खत्म हो जाता ।

यानी फाइव  कैमरा सेट जो हर एंगल से पीएम मोदी को सडक से मंदिर तक और म्यूजियम से मंच तक लगा था वह सिवाय डीडी के कही दिखायी नहीं देता । दूसरा सवाल एएनआई ने पहले कभी किसी ऐसी लाइव प्रेस कान्फ्रेस को बीच में काटने की नहीं सोची जिसे हर न्यूज चैनल ना सिर्फ चटखारे ले कर दिखा रहा था बल्कि हर चैनल के भीतर पहले से तय सारे कार्यक्रम गिरा अनंतकालीन कथा को ही चलाने  का अनकहा निर्णय भी लिया जा चुका था। और तीसरा सवाल क्या एएनआई ने पीएमओ या पीएम की प्रचार टीम के कहने पर हनीप्रीत के पूर्व पति की उस प्रेस कांन्फ्रेस का लाइव कट कर दिया, जिसमें सेक्स था। थ्रिल था। सस्पेंस था । नाजायज संबंधों से लेकर बीमार होते समाज का वह सबकुछ था, जिसे कोई भी कहता नहीं लेकिन समाज के भीतर के हालात इसी तरह के हो चले हैं। यानी हर दायरे के भीतर का कटघरा इसी तरह सड-गल रहा है । और बेफ्रिक्र समाज किसी अनहोनी से बेहतरी के इंतजार में जिये चला जा रहा है। क्योंकि पीएम बनारस में क्या कहते क्या इसमें किसी की दिलचस्पी नहीं है । या फिर हनीप्रीत के  शरीऱ और गुरमित के रेप की अनकही कथा में समाज की रुचि है । तो संपादकों की पूरी फौज ही हनीप्रीत को दर्शको के सामने परोसने के लिये तैयार है। तो पीएम से किसी को उम्मीद नहीं है या फिर प्रतिस्पर्धा के दौर में जो बिकता  है वही चलता है कि तर्ज पर अब संपादक भी आ चुके है, जिनके कंधों पर टीआरपी ढोने का भार है। हो सकता है। फिर अगला सवाल ये भी है कि अगर ऐसा है तो इस बीमारी को ठीक कौन करेगा। या सभी अपने अपने दायरे में अगर हनीप्रीत हो चुके हैं तो फिर देश संभालने के लिये किसी नेहरु, गांधी , आंबडेकर, लोहिया , सरदार , शयामा प्रसाद मुखर्जी या दीन दयाल उपाध्याय  का जिक्र कर कौन रहा है। या कौन से समाज या कौन सी सत्ता को समाज को संभालने की फिक्र  है। कहीं ऐसा तो नहीं महापुरुषो का जिक्र सियासत सत्ता इसलिये कर रही है कि बीमार समाज की उम्मीदें बनी रहें। या फिर महापुरुषों के आसरे कोई इनकी भी सुन ले। मगर सुधार हो कैसे कोई समझ रहा है या ठीक करना चाह भी रही है । शायद  कोई नहीं ।

तो ऐसे में बहुतेरे सवाल जो चैनलो के स्क्रिन पर रेंगते है या सत्ता के मन की बात में उभरते है उनका मतलब होता क्या है  ?  फिर क्यो फिक्र होती है कि गुरुग्राम में रेयान इंटरनेशनल स्कूल में सात बरस के मासूम की हत्या पर भी स्कूल नहीं रोया । सिर्फ मां-बाप रोये । और जो खौफ में आया वह अपने बच्चो को लेकर संवेदनशील हुआ । फिर क्यों फिक्र हो रही है कि कंगना रनावत के प्यार के एहसासों के साथ रोशन खानदान ने खिलवाड़ किया । क्यों फिक्र होती है कि गाय के नाम पर किसी अखलाख की हत्या हो जाती है। क्यो फिक्र होती है कि लंकेश से लेकर भौमिक की पत्रकारिता सच और विचारधारा की लड़ाई लड़ते हुये मार दिये जाते है । क्यों फिक्र होती है लिचिंग जारी है पर कोई हत्यारा नहीं है । फिक्र क्यों होती है कि पेट्रोल - डिजल की कमाई में सरकार ही लूटती सी दिखायी देती है । फिक्र क्यो होती है बैको में जमा जनता के पैसे पर कारपोरेट रईसी करते है और सरकार अरबो रुपया इनकी रईसी के लिये माफ कर देती है । नियम से  फिक्र होनी नहीं चाहिये जब न्यूज चैनलों पर चलती खबर को लेकर उसके संपादको की मंडली ही खुद को जज माने बैठी हो । और अपने ही चैनल की पट्टी में चलाये  कि किसी को किसी कार्यक्रम से नाराजगी हो या वह गलत लगता हो तो शिकायत करें । तो अपराध करने वाले से शिकायत करेगा कौन और करेगा तो होगा क्या।

और यही हाल हर सत्ता का है । जो ताकतवर है उसका अपराध बताने भी उसी के पास जाना होगा । तो संविधान की शपथ लेकर ईमानदारी या करप्शन ना करने की बात कहने वाले ही अगर बेईमान और अपराधी हो जाये तो फिर शिकायत होगी किससे । सांसद-मंत्री-विधायक -पंचायत सभी जगह तो बेईमानों और अपराधियों की भरमार है । बकायदा कानून के राज में कानूनी तौर पर दागदार है औसत तीस फिसदी जनता के नुमाइंदे। तो फिर सत्ता की अनकही कहानियों को सामने लाने का हक किसे है । और सत्ता की बोली ही अगर जनता ना सुनना चाहे तो सत्ता फिर भी इठलाये कि उसे जनता ने चुना है । और पांच बरस तक वह मनमानी कर सकती है तो फिर अपने अपने दायरे में हर सत्ता मनमानी कर ही रही है । यानी न्याय या कानून का राज तो रहा नहीं । संविधान भी कहा मायने रखेगा । एएनआई की लाउव फुटेज  की तर्ज पर कभी न्यायपालिका किसी को देशद्रोही करार देगी और कभी राष्ट्रीयता का मतलब समझा देगी। और किसी चैनल की तर्ज पर सत्ता - सियासत भी इसे लोकतंत्र का राग बताकर वाह वाह करेगी  । झूठ-फरेब । किस्सागोई । नादानी और अज्ञानता । सबकुछ अपने अपने दायरे में अगर हर सत्ता को टीआरपी दे रही है तो फिर रोकेगा कौन और रुकेगा कौन । और सारे ताकतवर लोगो के नैक्सस का ही तो राज होगा। पीएम उन्हीं संपादको को स्वच्छभारत में शामिल होने को कहेंगे, जिनके लिये हनीप्रीत जरुरी है । संपादक उन्हीं मीडिया  कर्मियो को महत्व देंगे जो हनीप्रीत की गलियों में घूम घूम कर हर दिन नई नई कहानियां गढ़ सकें । और कारपोरेट उन्हीं संपादको और सत्ता को महत्ता देंगे जो बनारस में पीएम के भाषण और हनीप्रीत की अशलीलता तले टीआरपी के खेल को समझता हो। जिससे मुनाफा बनाया जा सके।

यानी देश के सारे नियम ही जब कमाई से जा जुड़े हों। कारपोरेट के सामने हर तिमाही तो सत्ता के सामने हर पांच साल का लक्ष्य हो । तो हर दौर में हर किसी को अपना लाभ ही नजर आयेगा । और अगर सारे हालात मुनाफे से जा जुड़े हैं तो राम-रहीम के डेरे से बेहतर कौन सा फार्मूला किसी भी सत्ता के लिये हो सकता है। और रायसिना हिल्स से लेकर फिल्म सिटी अपने अपने दायरे में किसी डेरे से कम क्यों आंकी जाये ।  और आने वाले वक्त में कोई ये कहने से क्यो कतरायेगा कि जेल से चुनाव तो जार्ज फर्नाडिस ने भी लड़ा तो गुरमित या हरप्रीत क्यो नहीं लड सकते है । या फिर इमरजेन्सी के दौर में जेपी की खबर दिखाने पर रोक थी । लेकिन अभी तो खुलापन है अभिव्यक्ति की आजादी है तो फिर रेपिस्ट गुरमित हो या फरार  हनीप्रीत । या किसी भी अश्लीलता या अपराधी की  खबरे दिखाने पर कोई रोक तो है नहीं । तो खुलेपन के दौर में जिसे जो दिखाना है दिखाये । जिसे जो कहना है कहे । जिसे जितना कहना है कह लें । यानी हर कोई जिम्मेदारी से मुक्त होकर उस मुक्त इकनामी की पीठ पर सवार है जिसमें हर हाल में मुनाफा होना चाहिये । तब तो गुजराती बनियो की  सियासत कह सकती है गुजराती बनिया तो महात्मा गांधी भी थे , ये उनकी समझ थी कि उनके लिये देश की जनता का जमावडा अग्रेजो से लोहा लेने का हथियार था । मौजूदा सच तो पार्टी का कार्यक्त्ता  बनाकर वोट जुगाडना  ही है । तो फिर देश का कोई भी मुद्दा हो उसकी अहमियत किसी ऐसी कहानी के आगे कहां टिकेगी जिसमें किस्सागोई राग दरबारी से आगे का हो । प्रेमचंद के कफन पर मस्तराम की किताब हावी हो । और लोकतंत्र के राग का आदर्श  फिल्मी न्यूटन की ईमानदारी के आगे घुटने टेकते हुये नजर आये। और ऐलान हो जाये कि 2019 में पीएम उम्मीदवार न्यूटन होगा  अगर वह आस्कार जीत जाये तो । या फिर हनीप्रीत होगी जिसे भारत की पुलिस के सुरक्षाकर्मी खोज नहीं पाये । यानी लोकप्रीय होना ही अगर देश संभालने का पैमाना हो तो लोकप्रियता का पैमाना तो कुछ भी हो सकता है ।  जिसकी लोकप्रियता होगी । जिसे सबसे ज्यादा दर्शक देखाना चाहता होंगे वही देश चलायेंगे। क्या हालात वाकई ऐसे हैं ? सोचियेगा जरुर।

Thursday, September 21, 2017

बिगड़ी इकनॉमी, ढहता मनरेगा और बेरोजगारी में फंसा देश 2019 का चुनाव देख रहा है

सबसे बडी चुनौती इकनॉमी की है । और बिगडी इकनॉमी को कैसे नये आयाम दिये जाये जिससे राजनीतिक लाभ भी मिले अब नजर इसी बात को लेकर है । तो एक तरफ नीति आयोग देश के 100 पिछडे जिलों को चिन्हित करने में लग गया है तो दूसरी तरफ वित्त मंत्रालय इकनॉमी को पटरी पर लाने के लिये ब्लू प्रिंट तैयार कर रहा है । नीति आयोग के सामने चुनौती है कि 100 पिछड़े जिलों को चिन्हित कर खेती, पीने का पानी , हेल्थ सर्विस और शिक्षा को ठीक-ठाक कर राष्ट्रीय औसम के करीब लेकर आये तो वित्त मंत्रालय के ब्लू प्रिंट में विकास दर कैसे बढे और रोजगार कैसे पैदा हो। नजर इसी पर जा टिकी है। और इन सबके लिये मशक्कत उघोग क्षेत्र, निर्माण क्षेत्र , रियल स्टेट और खनन के क्षेत्र में होनी चाहिये इसे सभी मान रहे हैं। यानी चकाचौंध की लेकर जो भी लकीर साउथ-नार्थ ब्लाक से लेकर हर मंत्रालय में खिंची जा रही हो, उसके अक्स में अब सरकार को लगने लगा है कि प्रथामिकता इकनॉमी की रखनी होगी इसीलिये अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकने के लिए एक ब्लूप्रिंट तैयार किया जा रहा है । जिससे जीडीपी में तेजी आये , रोजगार बढ़े। और बंटाधार हो चुके रियल इस्टेट और खनन क्षेत्र को पटरी पर लाया सके । लेकिन सवाल इतना भर नहीं । इक्नामिस्ट मनमोहन सिंह सत्ता में रहते हुये इकनॉमी को लेकर फेल मान लिये गये । और जनता की नब्ज को समझने वाले मोदी सत्ता संभालने के बाद इकनॉमी संबालने से जूझ रहे हैं। और देश का सच  ये है कि नेहरु ने 1960 में सौ पिछडे जिले चिन्हित किया । मोदी 2017 में 100 पिछडे जिलों के चिन्हित कर रहे हैं । 1960 से 1983 तक नौ कमेटियों ने सौ पिछड़े जिलों पर रिपोर्ट सौपी । कितना खर्च हुआ । या रिपोर्ट कितनी अमल में लायी गई ये तो दूर की गोटी है ।

सोचिये कि जो सवाल आजादी के बाद थे, वही सवाल 70 बरस बाद है । क्योकि जिन सौ जिलों को चिन्हित कर काम शुरु करने की तैयारी हो रही है उसमें कहा तो यही जा रहा है कि हर क्षेत्र में राष्ट्रीय औसत के समकक्ष 100 पिछडे जिलो को लाया जाये । लेकिन जरुरत  कितनी न्यूनतम है किसान की आय बढ जाये । पीने का साफ पानी मिलने लगे ।शिक्षा घर घर पहुंच जाये । हेल्थ सर्विस हर किसी को मुहैया हो जाये ।और इसके लिये तमाम मंत्रालयों या केन्द्र राज्य के घोषित बजट के अलावे प्रचार के लिये 1000 करोड़ देने की बात है । यानी हर जिले के हिस्से में 10 करोड । तो हो सकता है पीएम का अगला एलान देश में सौ पिछडे जिलों का शुरु हो जाये । यानी संघर्ष न्यूनतम का है । और सवाल चकाचौंध की उस इकनॉमी तले टटोला जा रहा है जहां देस का एक छोटा सा हिस्सा हर सुविधाओ से लैस हो । बाकि हिस्सों पर आंख कैसे मूंदी जा रही है ये मनरेगा के बिगडते हालात से भी समझा जा सकता है । क्योंकि मानिये या ना मानिये । लेकिन मनरेगा अब दफ्न होकर स्मारक बनने की दिशा में जाने लगा है । क्योकि 16 राज्यो की रिपोर्ट बताती है मनरेगा बजट बढते बढते चाहे 48 हजार करोड पार कर गया लेकिन रोजगार पाने वालो की तादाद में 7 लाख परिवारो की कमी आ गई । क्योंकि केंद्रीय ग्रामीण  विकास मंत्रालय की ही रिपोर्ट कहती है  कि 2013-14 में  पूरे 100 दिनों का रोजगार पाने वाले परिवारों की संख्या 46,59,347 थी,। जो साल 2016-17 में घटकर 39,91,169 रह गई । तो मुश्किल ये नहीं कि सात लाख परिवार जिन्हे काम नहीं मिला वह क्या कर रहे होंगे । मुश्किल दोहरी है , एक तरफ नोटबंदी के बाद मनरेगा मजदूरों में 30 फिसदी की बढोतरी हो गई । करीब 12 लाख परिवारों की तादाद बढ गई । दूसरी तरफ जिन 39 लाख परिवारों को काम मिला उनकी दिहाड़ी नही बढ़ी। आलम ये है कि इस वित्तीय वर्ष यानी अप्रैल 2017 के बाद से यूपी, बिहार,असम और उत्तराखंड में मनरेगा कामगारों की मजदूरी में सिर्फ एक रुपये की वृद्धि हुई । ओडिशा में यह मजदूरी दो रुपये और पश्चिम बंगाल में चार रुपये बढ़ाई गई ।

और दूसरी तरफ -बीते साल नवंबर से इस साल मार्च तक बिहार, छत्तीसगढ़, राजस्थान, झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में तो काम मांगने वालों की संख्या में 30 फीसदी तक बढ़ोतरी दर्ज हुई । तो मनरेगा का बजट  48000 करोड़ कर सरकार ने अपनी पीढ जरुर ठोकी । लेकिन हालात तो सुप्रीम कोर्ट के निर्देश को लागू ना करा पाने तक के है । एक तरफ 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा , मनरेगा की मजदूरी को राज्यों के न्यूनतम वेतन के बराबर लाया जाए ।  लेकिन इस महीने की शुरुआत में केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा गठित एक समिति ने मनरेगा के तहत दी जानी वाली मजदूरी को न्यूनतम वेतन के साथ जोड़ने को गैर-जरूरी करार दे दिया जबकि खुद समिति मानती है कि 17 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में मनरेगा की मजदूरी खेत मजदूरों को दी जाने वाली रकम से भी कम है। तो फिर पटरी से उतरते देश को राजनीति संभालेगी कैसे । और इसी लिये जिक्र युवाओ का हो रहा है । बेरोजगारी का हो रहा है । और ध्यान दीजिये राहुल के निशाने पर रोजगार का संकट है। पीएम मोदी के निशाने पर युवा भारत है। और दोनों की ही राजनीति का सच यही है कि देश में मौजूदा वक्त में सबसे ज्यादा युवा है । सबसे ज्यादा युवा बेरोजगार है। और अगर युवा ने तय कर लिया कि सियासत
की डोर किसके हाथ में होगी तो 2019 की राजनीति अभी से पंतग की हवा में उड़ने लगेगी । क्योकि 2014 के चुनाव में जितने वोट बीजेपी और काग्रेस दोनो को मिले थे अगर दोनों को जोड़ भी दिया जाये उससे ज्यादा युवाओ की तादाद मौजूद वक्त में है । मसलन 2011 के सेंसस के मुताबिक 18 से 35 बरस के युवाओ की तादाद 37,87,90,541 थी । जबकि बीजेपी और काग्रेस को कुल मिलाकर भी 28 करोड़ वोट नहीं मिले । मसलन 2014 के चुनाव में बीजेपी को 17,14,36,400 वोट मिले । तो कांग्रेस को 10,17,32,985 वोट मिले और देश का
सच ये है कि 2019 में पहली बार बोटर के तौर पर 18 बरस के युवाओ की तादाद 13,30,00,000 होगी यानी जो सवाल राहुल गांधी विदेश में बैठ कर उठा रहे हैं उसके पीछे का मर्म यही है कि 2014 के चुनाव में युवाओं की एक बडी तादाद कांग्रेस से खिसक गई थी । क्योकि दो करोड रोजगार देने का वादा हवा हवाई हो
गया था और याद किजिये तब बीजेपी ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में रोजगार कामुद्दा ये कहकर उठाया था कि "कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार बीते दस साल के दौरान कोई रोजगार पैदा नहीं कर सकी, जिससे देश का विकास बुरी तरह प्रभावित हुआ"। तो मोदी ने सत्ता में आने के लिये नंवबर  2013 को आगरा की  चुनावी रैली में पांच बरस में एक करोड रोजगार देने का वादा किया था । पर रोजगार का संकट किस तरह गहरा रहा है और हालात मनमोहन के दौर से भी बुरे हो जायेंगे ये जानते समझते हुये अब ये सवाल राहुल गांधी ,  मोदी  सरकार
को घेरने के लिये उठा रहे हैं । यानी मुश्किल ये नहीं कि बेरोजगारी बढ़ रही है संकट ये है कि रोजगार देने के नाम पर अगर युवाओं को 4 बरस पहले बीजेपी बहका रही थी और अब नजदीक आते 2019 को लेकर कांग्रेस वही सवाल उठा रही तो अगला सवाल यही है कि बिगडी इकनॉमी , मनरेगा का ढहना और  रोजगार संकट
सबसे बडा मुद्दा तो 2019 तक हो जायेगा लेकिन क्या वाकई कोई विजन किसी के पास है की हालात सुधर जाये  ।


Tuesday, September 19, 2017

चैनल खोये हैं हनीप्रीत में, देश परेशान है मन के मीत से

एक तरफ हनीप्रीत का जादू तो दूसरी तरफ मोदी सरकार की चकाचौंध । एक तरफ बिना जानकारी किस्सागोई । दूसरी तरफ सारे तथ्यो की मौजूदगी में खामोशी । एक तरफ हनीप्रीत को कटघरे तक घेरने के लिये लोकल पुलिस से लेकर गृहमंत्रालय तक सक्रिय । दूसरी तरफ इक्नामी को पटरी पर लाने के लिये पीएमओ सक्रिय । एक तरफ हनीप्रीत से निकले सवालो से जनता के कोई सरोकार नहीं । दूसरी तरफ सरकार के हर सवाल से  जनता के सरोकार । तो क्या पुलिस- प्रशासन, नौकरशाह-मंत्री और मीडिया की जरुरत बदल चुकी है या फिर वह भी डि-रेल है । क्योंकि देश की बेरोजगारी के सवाल पर हनीप्रीत का चरित्रहनन देखा-दिखाया जा रहा है । पेट्रोल की बढ़ती कीमतों पर हनीप्रीत के नेपाल में होने या ना होना भारी है । गिरती जीडीपी पर हनीप्रीत के रेपिस्ट गुरमीत के संबध मायने रखने लगे हैं। 10 लाख करोड पार कर चुके एनपीए की लूट पर डेरा की अरबो की संपत्ति की चकाचौंध भारी हो चली है । नेपाल में हनीप्रीत का होना नेपाल तक चीन का राजमार्ग बनाना मायने नहीं रख रहा है ।

जाहिर है ऐसे बहुतेरे सवाल किसी को भी परेशान कर सकते हैं कि आखिर जनता की जरुरतो से इतर हनीप्रीत सरीखी घटना पर गृमंत्रालय तक सक्रिय हो जाता है और चौबिस घंटे सातों दिन खबरों की दिशा में हनीप्रीत की चकाचौंध . हनीप्रीत की अश्लीलता । हनीप्रीत के चरित्र हनन में ही दुनिया के पायदान पर पिछडता देश क्यों रुचि ले रहा है । या उसकी रुची भी अलग अलग माध्यमो से तय की जा रही है । अगर बीते हफ्ते भर से हनीप्रीत से जुड़ी खबरों का विश्लेषण करें तो शब्दो के आसरे सिर्फ उसका रेप भर नहीं किया गया । बाकि सारे संबंधो से लेकर हनीप्रीत के शरीर के भीतर घुसकर न्यूजचैनलों के डेस्क पर बैठे कामगारों ने अपना हुनर बखूबी दिखाया । यूं एक सच ये भी है कि इस दौर में जो न्यूज चैनल हनीप्रीत की खबरो के माध्यय से जितना अश्लील हुआ उसकी टीआरपी उतनी ज्यादा हुई ।

तो क्या समाज बीमार हो चुका है या समाज को जानबूझकर बीमार किया जा रहा है । यूं ये सवाल कभी भी उठाया जा सकता था । लेकिन मौजूदा वक्त में ये सवाल इसलिये क्योंकि 'वैशाखनंदन '  की खुशी भी किसी से देखी नहीं जा रही है। यानी चैनलों के भीतर के हालात वैशाखनंदन से भी बूरे हो चले है क्योकि उन परिस्थितियों को हाशिये पर धकेल दिया जा रहा है जो 2014 का सच था । और वही सच कही 2019 में मुंह बाये खडा ना हो जाये , तो सच से आंखमिचौली करते हुये मीडियाकर्मी होने का सुरुर हर कोई पालना चाह रहा है । याद किजिये 2014 की इक्नामी का दौर जिसमें बहार लाने का दावा मोदी ने चुनाव से पहले कई-कई बार किया। लेकिन तीन साल बाद महंगाई से लेकर जीडीपी और रोजगार से लेकर एनपीए तक के मुद्दे अगर अर्थव्यवस्था को संकट में खड़ा कर रहे हैं तो चिंता पीएम को होना लाजिमी है। और अब जबकि 2019 के चुनाव में डेढ बरस का वक्त ही बचा है-सुस्त अर्थव्यवस्था मोदी की विकास की तमाम योजनाओं को पटरी से उतार सकती है। क्योकि 2014 में
इक्नामिस्ट मनमोहन सिंह भी फेल नजर आ रहे थे । और अब ये सवाल मायने नही रखते कि , नोटबंदी हुई मगर 99 फीसदी नोट वापस बैंक आ गए । एनपीए 10 लाख करोड से ज्यादा हो गया । खुदरा-थोक मंहगाई दर बढ रही है ।  उत्पादन-निर्माण क्षेत्र की विकास दर तेजी से नीचे जा रही है । आर्थिक विकास दर घट रही है । क्रेडिट ग्रोथ साठ बरस के न्यूनतम स्तर पर है । यानी सवाल तो इक्नामी के उस वटवृक्ष का है-जिसकी हर डाली पर झूलता हर मुद्दा एक चुनौती की तरह सामने है। क्योंकि असमानता का आलम ये है कि दुनिया के सबसे ज्यादा भूखे लोग भारत में ही । यूएन की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 19 करोड़ से ज्यादा लोग भुखे सोने को मजबूर हैं। सरकार की रिपोर्ट कहती है करोडपतियो की तादाद तेजी से बढ़ रही। दो फ्रांसीसी अर्थशास्त्रियों थोमा पिकेती और लुका सॉसेल का नया रिसर्च पेपर तो कहता है कि भारत में साल 1922 के बाद से असमानता की खाई सबसे ज्यादा गहरी हुई है ।

तो क्या हनीप्रीत सरीखे सवालों के जरिये मीडिया चाहे -अनचाहे या कहे अज्ञानवश उन हालातो को समाज में बना रहा है जहा देश का सच  राम रहिम से लेकर हनीप्रीत सरीखी खबरो में खप जाये । और सक्रिन पर अज्ञानता ही सबसे ज्यादा बौधिक क्षमता में तब्दिल अगर दिखायी देने लगें । तो ये महज खबरो को परोसने वाला थियेटर नहीं है बल्कि एक ऐसे वातावरण को बनाना है जिसमें चुनौतियां छुप जाये । क्योंकि अगर अर्थव्यवस्था पटरी से उतरी तो देश को जवाब देना मुश्किल होगा और उस वक्त सबकी नजरें सिर्फ एक बात टिक जाएंगी
कि क्या मोदी ब्रांड बड़ा है या आर्थिक मुद्दे। यानी चाहे अनचाहे मीडिया की भूमिका भी 2019 के लिये ऐसा वातावरण बना रही है जहां हनीप्रीत भी 2019 में चुनाव लड़ लें तो जीत जाये ।





Sunday, September 17, 2017

जहर मिलता रहा..जहर पीते रहे....... बंदिशों में बेखौफ होने का मजा

यादें बेहद धूमिल है...कैसे जिक्र सिर्फ इंदिरा गांधी का होता था। कैसे नेताओं की गिरप्तारी की जानकारी अखबारों से नहीं लोगो की आपसी बातचीत से पता चलती थी । कैसे दफ्तरो के बाबू टाइम पर आने लगे थे । बसें वक्त पर चल रही थी । रेलगाडियां लेट नहीं हो रही थी । स्कूलो में टीचर भी क्लास में वक्त पर पहुंचते। जिन्दगी अपनी रफ्तार से हर किसी की चल रही थी । फिर इमरजेन्सी का मतलब या खौफजदा होने की वजह क्या है. ये सवाल उस दौर में हमेशा मेरे जहन में बना रहा। यादें धूमिल हैं लेकिन याद तो आता है कि गाहे-बगाहे कभी छुट्टी के दिन घर में पिता जी के मित्रों की चर्चा का जमावडा होता तो जिक्र इमरजेन्सी या इंदिरा गांधी के साथ साथ जेपी का भी होता । पांचवी-छठी क्लास में पढने के उस दौर की यादे सहेज कर रखना मेरे लिये इसलिये आसान था क्योंकि पिताजी का तबादला दिल्ली से बिहार होने की वजह इमरजेन्सी का लगना और जेपी के बिहार में होना ही था। और इसका जिक्र इतनी बार घर में हुआ कि मैं शुरु में सिर्फ इतना ही जान पाया कि1975 में दिल्ली छूट रहा है और रांची जा रहे हैं तो वजह इमरजेन्सी है ।

खैर ये अलग यादें हैं कि उस वक्त रेडियो का बुलेटिन ही कितना महत्वपूर्ण होता था ...और कैसे रांची में शाम 6 बजकर बीस मिनट का प्रादेशिक बुलेटिन शुरु करने के बाद पटना में साढ़े सात बजे के बुलेटिन के लिये पिताजी को जाना पड़ा और पूरा परिवार ही इमरजेन्सी में दिल्ली से रांची फिर पटना घूमता रहा । लेकिन आज संदर्भ इसलिये याद आ रहा है क्योंकि बीते कई महीनों से मुझे बार बार लग रहा है कि जो भी पढ़ाई की, या जिस वातावरण को जीते हुये हम स्कूल-कॉलेज से होते हुये पत्रकारिता के दौर को जीते हुये चर्चा करते रहे ...सबकुछ अचानक गायब हो गया है । पटना के बीएन कालेज में राजनीतिशास्त्र पढ़ते-पढ़ते हम कई मित्र छात्र देश के संविधान को ही नये सिरे से लिखने की बात तक करते । बकायदा जीने के अधिकार का जिक्र कर कैसे उसे लागू किया जाना चाहिये चर्चा बाखूबी होती । हिन्दी के शिक्षक गांधी मैदान के किनारे एलीफिस्टन सिनेमा हाल के मुहाने पर चाय की दुकान में नीबू की चाय की चुस्कियों में बता देते कि वसंत का मौसम हम युवाओं को जीने नहीं देता क्योंकि सारी परीक्षा वसंत में ही होती है । पटना साइंस कालेज के फिसड्डी छात्रों में होने के बावजूद जातिय राजनीति का ज्ञान पटना यूनिवर्सिटी में एक के बाद एक कर कई हत्याओं ने 1983 में ही समझा दिया था । और नागपुर में पत्रकारिता करते हुये दलित -संघ - नक्सलवाद को बाखूबी समझने के लिये उस वातावरण को जीया । यानी पत्रकारिता के आयाम या कहे उसका कैनवास इतनी विस्तृत था कि किसी खाके में किसी ने 1989 से 1995 तक बांटने की या कहे रखने की कोशिश नहीं की । जबकि उस वक्त के सरसंघचालक बालासाहेब देवरस के साथ सैकड़ों बार बैठना हुआ । उस वक्त दलित राजनीति के केन्द्र में नागपुर के रिपब्लिकन नेताओं के साथ कई कई दिन गुजारे। म्हारों की बस्ती में जा कर रहा । उनके बीच से दलित रंगभूमि को खड़ा किया । तब के नक्सली संगठन पीपुल्स वार ग्रूप के सर्वेसर्वा सीतारमैया से तेलगांना के जंगलों में जा कर मुलाकात की । और नागपुर में रहते हुये पत्रकारिता का एैसा अंदाज था कि क्या मुंब्ई क्या दिल्ली या क्या लंदन । देश दुनिया से कोई भी पत्रकार या रिसर्च स्कॉलर नागपुर पहुंचा तो या तो वह हमारी चौखट पर जानकारी के लिये या फिर हम जानकारी
हासिल करने के लिये उसकी चौखट पर। याद नहीं आता इंदिरा गांधी के इमरजेन्सी के दौर को छोडकर कभी कोई प्रधानमंत्री बहस - चर्चा में आया । जेएनयू में रहते हुये मुनिस रजा तो शैक्सपियर और किट्स के जरीये क्लासिकल अंग्रेजी साहित्य को छात्रों के साथ शाम में घूमते-टहलते हुये बकायदा जीते । छात्र भी जीते । आगवानी साहेब तो जेएनयू की खूबसूरती तले पर्यावरण का जिक्र अक्सर करते । यूं हाल में रहे बीबी भट्टाचार्य भी सिर्फ देश ही नहीं बल्कि इंटरनेशनल इक्नामी पर चर्चा कर सामाजिक-राजनीतिक पहलुओं का जिक्र नई नई किताब या किसी रिसर्च पेपर के बताकर करते । फणीश्वरनाथ रेणु की दिनमान की पत्रकारिता । अज्ञेय का पेड़ पर घर बनाकर रहना । और उनकी मुश्किल हिन्दी । मुक्तीबोध के चांद के मुंह ढेडा । या फिर पाश का सबसे खतरनाक होता है सपनों का मर जाना । या फिर प्रेमचंद की ही दलित पत्रकारिता को लेकर बहस । कह सकते है सवाल और समझ जितने दायरे में घूमते रहे उस दायरे में गुरुदत की प्यासा भी रेंगी और घडकन बढाने वाली "ब्लेम इट आन रियो" भी

मधुबाला की खूबसूरती से लेकर वहीदा का अंदाज और डिंपल का जादू भी चर्चा में शरीक रहा । रेखा-अमिताभ की जोड़ी के रोमानीपन तले विवाह के बंधन पर चर्चा हुई । मीना-कुमारी के इश्क और शराब में भी गोते लगाये । लेकिन कभी कुछ ठहरा नहीं । स्कूल कालेज या पत्रकारिता करते हुये समाज के हर क्षेत्र में घुमावड़ा। थमा कुछ भी नहीं। अंडरवर्ल्ड को जानने समझते बंबई भी पहंचे। भाई ठाकुर से भी मिले । उसके ज्ञान पर रश्क भी हुआ। और 1989 में शिवसेना की सामना के शुरुआत वाले दिन पत्रकारों की टोली के साथ गोवा से लौटते हुये बंबई में बालासाहेब ठाकरे से मुलाकात के मोह में रुक भी गये । और ठाकरे की ठसक को छत पर बीयर के साथ तौला भी । और लौटते वक्त फैज की नज्म ...जख्म मिलता रहा ..जख्म पीते रहे ...हम भी जीते रहे...को भी बखूबी गुनगुनाया । एसपी सिंह की पत्रकारिता को सलाम करते हुये अपने ही अखबार के मालिक के खिलाफ खडे होकर एसपी को सहयोग करते रहे । प्रभाष जोशी की पत्रकारिता के अंदाज को बखूबी जीते हुये अपने जन्मदिन वाले दिन संपादकीय पन्ने पर उस लेख को छापने की मांग रख दी जो बताता था,,,क्यों नहीं हो पा रहा है व्यवस्था परिवर्तन और 18 मार्च को बकायदा लेख छा पर प्रभाष जी का फोन लोकमत के संपादक को आया....बता देना आज छप गया है....क्यों नहीं हो पा रहा है व्यवस्था परिवर्तन...जन्मदिन की बधाई भी दे देना । और कहना कि जरा बाबरी मस्जिद को ढहाने वालों पर भी लेख लिखे..नागपुर में है तो दिल्ली का कुछ भला करे। यानी चर्चा बहस हर बात को लेकर ।

हालात तो इतने खुले हुये कि...6 दिसबंर 1992 का बाद देश में माहौल जो भी हो..लेकिन कहीं गोली नहीं चली..कोई मरा नहीं...मगर नागपुर के मोमिनपुरा में विरोध रैली सडक पर ना आ जाये तो तबके कमीश्नर ईनामदार ने गोली चलवा दी....12 लोग मारे गये ...मरने वालो में संयोग से वह लड़का भी जो चार दिन बाद दिलीप कुमार को मुशायरे में बुलवाने के लिये आमंत्रण देकर स्वीकृति लेकर नागपुर पहुंचा था । और मुशायरा रद्द हुआ तो ...आग्रह पर दिलीप कुमार ने भी खासकर अखबार में छापने के लिये पत्र लिखा...हालात पर लिखा और शायरी के अंदाज में मुश्यरा दिलों में जगाये रखने की तमन्ना भी जाहिर की । 10 या 11 दिसंबर 1992 को दिलीप कुमार का पत्र छपा भी । नागपुर यूनिर्वसिटी के पालेटिकल साइस के प्रोफेसर राणाडे ने घर बुलाकर चाय पिलाई । चर्चा की । चर्चा तो खूब होती रही । जब राहुल गांधी ने मनमोहन सिंह की इक्नामिक पालेसी पर अंगुली उठाई तब फिल्म दीवार के दृश्य ...मंदिर से निकल कर दो अलग अलग रास्तों पर जाते अमिताभ बच्चन और शशि कपूर की तर्ज पर मनमोहन सिंह और राहुल गांधी का जिक्र किया ...और भास्कर ने लेख छापा तो पीएमओ को अच्छा नहीं लगा । लेकिन पीएमओ का अंदाज भी चर्चा वाला ही रहा । क्या होना चाहिये ...पीएमओ बाहर से देखने में कितना अमानवीय है, इस पर भी खुल कर चर्चा की । मनमोहन सिंह के दौर में घोटाले दर घोटालों का जिक्र भी रिपोर्टो के जरीये खूब किया । कोयला से लेकर टू-जी । राडिया टेप से लेकर कलमाडी । खूब लिखा । सत्ता की एडवाइरी को भी देखा-सुना परखा । सत्ता की हेकडी को भी देखा । वाजपेयी की सादगी में मनमोहन सिंह को खोजना मूर्खता लगा। तो सत्ता की चौखट पर खडे होकर कहने से भी नहीं चूके । नागपुर से ए बी वर्धन की यारी जारी रही तो 2004 में इक्नामिस्ट मनमोहन की इक्नामिक पॉलिसी तले खडे होकर बर्धन ने जब एलान किया.....डिसइन्वेस्टमेंट को बंगाल की खाडी में डूबो देना चाहिये...फिर फोन कर पूछा ..समुद्र इतना गहरा होता कि उसमें से डिसइन्वेस्टमेंट वापस तो नहीं निकलेगा । और ठहाके के अंदाज में सत्ता को भी बिना लाल बत्ती जी लिया। यही खुलापन लगातार खोज रहा हूं..सोच रहा हूं कोई जिक्र किसी गजल का कोई क्यों नहीं कर रहा.....क्या वह आखिरी पाश था जो कलाई में बंधी खडी के कांटे को घूमते हुये ठहरा मान चुका था । आखिर साहित्य--संगीत पर देश में बात क्यों नहीं हो रही है । क्यों घर में जुटे चार दोस्त भी पकौडी-चाय पर ठहाके लगाते सुनाई दिखायी नहीं दे रहे हैं । क्यों खुफिया तरीके से कोई फोन कर बताता है ,,,बंधुवर प्रेमचंद की गोदान अब सिलेबस से बाहर कर दी गई है । क्यों मीडिया संस्धानों में जिन्दगी पर चर्चा नहीं हो पा रही है । क्यों सरकारी दफ्तरों में घुसते ही एक तरह की मुर्दानगी दिखायी दे रही है । ऐसा क्यो लग रहा है कि हर किसी ने लक्ष्य निर्धारित कर लिये है और उसे पाने में जुटा है । जैसे गुरुग्राम में सात बरस के प्रघुम्न की हत्या पर कंडक्टर को गिरफ्तार कर पुलिस सबूत जुटाने में जुटी । तो फिर देश भी चुनाव दर चुनाव जीतने के लिये माहौल बनाने के लिये ही काम करेगा । सत्ता हो या विपक्ष । और इस माहौल में जनता भी तो पहले ही तय कर रही है उसे किससे चाहिये । क्या चाहिये । देने वाले के सामने भी लक्ष्य है । और उसी आसरे वह भी तय कर रहा है किसे कितना देना है । तो फिर याद किजिये पंचतंत्र की कहा यो को । पंचतंत्र जो दुनिया के हर भाषा में अनुवादित है । और उसे दो हजार बरस पहले विष्णु शर्मा ने उस राजा के कहने पर लिखा । जिसके बच्चे बिगडे हुये थे । और वन में रह कर तपस्या कर रहे विष्णु शर्मा की तरफ भी राजा का ध्यान इसलिये गया क्योकि वह भोग-उपभोग से दूर वन में तपस्या कर रहे थे । यानी तब राजा भी जानते थे कि ज्ञान उसी के पास होगा जिसे कुछ चाहिये नहीं । यानी 2019 का लक्ष्य रखकर कौन का काम होगा और कौन सा ज्ञान किसके पास होगा । मुक्त हो कर जीने का मजा देखिये । ..जख्म मिलता रहा / जख्म पीते रहे / जख्म जब भी कोई जहन-ओ-दिल को मिला / जिन्दगी की तरफ एक दरीचा खुला / जिन्दगी हमें रोज आजमाती रही / हम भी उसे रोज आजमाते रहे....



Wednesday, September 13, 2017

एक करोड़ खाली पड़े सरकारी पदों पर भर्ती क्यों नहीं?

युवा भारत में सबसे बुरे हालात युवाओं के ही हैं....


रोजगार ना होने का संकट या बेरोजगारी की त्रासदी से जुझते देश का असल संकट ये भी है केन्द्र और राज्य सरकारों ने स्वीकृत पदो पर भी नियुक्ति नहीं की हैं। एक जानकारी के मुताबिक करीब एक करोड़ से ज्यादा पद देश में खाली पड़े हैं। जी ये सरकारी पद हैं। जो देश के अलग अलग विभागों से जुड़े हैं । दो महीने पहले ही जब राज्यसभा में सवाल उठा तो कैबिनेट राज्य मंत्री जितेन्द्र प्रसाद ने जवाब दिया। केन्द्र सरकार के कुल 4,20,547 पद खाली पड़े हैं। और महत्वपूर्ण ये भी है केन्द्र के जिन विभागो में पद खाली पड़े हैं, उनमें 55,000 पद सेना से जुड़े हैं। जिसमें करीब 10 हजार पद आफिसर्स कैटेगरी के हैं। इसी तरह सीबीआई में 22 फीसदी पद खाली हैं। तो प्रत्यर्पण विभाग यानी ईडी में 64 फीसदी पद खाली हैं। इतना ही नहीं शिक्षा और स्वास्थ्य सरीखे आम लोगो की जरुरतों से जुडे विभागों में 20 ले 50 फीसदी तक पद खाली हैं। तो क्या सरकार पद खाली इसलिये रखे हुये हैं कि काबिल लोग नहीं मिल रहे। या फिर वेतन देने की दिक्कत है । या फिर नियुक्ति का सिस्टम फेल है । हो जो भी लेकिन जब सवाल रोजगार ना होने का देश में उठ रहा है तो केन्द्र सरकार ही नहीं बल्कि राज्य सरकारों के तहत आने वाले लाखों पद खाली पडे हैं। आलम ये है कि देश भर में 10 लाख प्राइमरी-अपर प्राइमरी स्कूल में टीचर के पद खाली पड़े हैं। 5,49,025 पद पुलिस विभाग में खाली पडे हैं। और जिस राज्य में कानून व्यवस्था सबसे चौपट है यानी यूपी। वहां पर आधे से ज्यादा पुलिस के पद खाली पड़े हैं। यूपी में 3,63,000 पुलिस के स्वीकृत पदो में से 1,82,000 पद खाली पड़े हैं। जाहिर है सरकारों के पास खाली पदो पर नियुक्ति करने का कोई सिस्टम ही नहीं है। इसीलिये मुश्किल इतनी भर नहीं कि देश में एजुकेशन के प्रीमियर इंस्टीट्यूशन तक में पद खाली पड़े हैं। मसलन 1,22,000 पद इंजीनियरिंग कालेजो में खाली पडे है। 6,000 पद आईआईटी, आईआईएम और एनआईटी में खाली पड़े हैं।

6,000 पद देश के 47 सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी में खाली पड़े हैं। यानी कितना ध्यान सरकारों को शिक्षा और स्वास्थ्य को लेकर हो सकता है, ये इससे भी समझा जा सकता है कि दुनिया में भारत अपनी तरह का अकेला देश है जहा स्कूल-कालेजों से लेकर अस्पतालो तक में स्वीकृत पद आधे से ज्यादा खाली पड़े है । आलम ये है कि 63,000 पद देश के 363 राज्य विश्वविघालय में खाली पडे हैं। 2 लाख से ज्यादा पद देश के 36 हजार सरकारी अस्पतालों में खाली पडे हैं। बुधवार को ही यूपी के स्वास्थ्य मंत्री सिद्दार्थ नाथ सिंह ने माना कि यूपी के सरकारी अस्पतालों में 7328 खाली पड़े पदो में से 2 हजार पदों पर जल्द भर्ती करेंगे। लेकिन खाली पदो से आगे की गंभीरता तो इस सच के साथ जुडी है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानना है कि कम से कम एक हजार मरीज पर एक डाक्टर होना ही चाहिये । लेकिन भारत में 1560 मरीज पर एक डाक्टर है । इस लिहाज से 5 लाख डाक्टर तो देश में तुरंत चाहिये । लेकिन इस दिशा में सरकारे जाये तब तो बात ही अलग है । पहली प्रथमिकता तो यही है कि जो पद स्वीकृत है । इनको ही भर लिया जाये । अन्यथा समझना ये भी होगा कि स्वास्थय व कल्याण मंत्रालय का ही कहना है कि फिलहाल देश में 3500 मनोचिकित्सक हैं जबकि 11,500 मनोचिकित्सक और चाहिये ।

और जब सेना के लिये जब सरकार देश में ही हथियार बनाने के लिये नीतियां बना रही है और विदेशी निवेश के लिये हथियार सेक्टर भी खोल रही है तो सच ये भी है कि आर्डिनेंस फैक्ट्री में 14 फीसदी टैक्निकल पद तो 44 फिसदी नॉन-टेक्नीकल पद खाली पडे हैं।

यानी सवाल ये नहीं है कि रोजगार पैदा होंगे कैसे । सवाल तो ये है कि जिन जगहो पर पहले से पद स्वीकृत हैं, सरकार उन्हीं पदों को भरने की स्थिति में क्यों नहीं है। ये हालात देश के लिये खतरे की घंटी इसलिये है क्योंकि एक तरफ खाली पदों को भरने की स्थिति में सरकार नहीं है तो दूसरी तरफ बेरोजगारी का आलम ये है कि यूनाइटेड नेशन की रिपोर्ट कहती है कि 2016 में भारत में 1 करोड 77 लाख बेरोजगार थे । जो 2017 में एक करोड 78 लाख हो चुके हैं और अगले बरस 1 करोड 80 पार कर जायेंगे। लेकिन भारत सरकार की सांख्यिकी मंत्रालय की ही रिपोर्ट को परखे तो देश में 15 से 29 बरस के युवाओ करी तादाद 33,33,65,000 है । और ओईसीडी यानी आरगनाइजेशन फार इक्नामिक को-ओपरेशन एंड डेवलेपंमेंट की रिपोरट कहती है कि इन युवा तादाद के तीस पिसदी ने तो किसी नौकरी को कर रहे है ना ही पढाई कर रहे है । यानी करीब देश के 10 करोड युवा मुफलिसी में है । जो हालात किसी भी देश के लिये विस्पोटक है । लेकिन जब शिक्षा के क्षेत्र में भी केन्द्र और राज्य सरकारे खाली पद को भर नहीं रही है तो समझना ये बी होगा कि देश में 18 से 23 बरस के युवाओं की तादाद 14 करोड से ज्यादा है । इसमें 3,42,11,000 छात्र कालेजों में पढ़ाई कर रहे हैं। और ये सभी ये देख समझ रहे है कि दुनिया की बेहतरीन यूनिवर्सिटी की कतार में भारतीय विश्वविधालय पिछड चुके है । रोजगार ना पाने के हालात ये है कि 80 फीसदी इंजीनियर और 90 फिसदी मैनेजमेंट ग्रेजुएट नौकरी लायक नही है । आईटी सेक्टर में रोजगार की मंदी के साथ आटोमेशन के बाद बेरोजगारी की स्थिति से छात्र डरे हुये हैं। यानी कहीं ना कहीं छात्रों के सामने ये संकेट तो है कि युवा भारत के सपने राजनीति की उसी चौखट पर दम तोड रहे है जो राजनीति भारत के युवा होने पर गर्व कर रही है । और एक करोड़ खाली सरकारी पदों को भरने का कोई सिस्टम या राजनीतिक जिम्मेदारी किसी सत्ता ने अपने ऊपर ली नहीं है।

Monday, September 11, 2017

मां-बाप क्या करें ? जब हर जिम्मेदारी से है मुक्त चुनी हुई सरकार

तो सुप्रीम कोर्ट को ही तय करना है कि देश कैसे चले। क्योंकि चुनी हुई सरकारों ने हर जिम्मेदारी से खुद को मुक्त कर लिया है। तो फिर शिक्षा भी बिजनेस है। स्वास्थ्य सेवा भी धंधा है। और घर तो लूट पर जा टिका है। ऐसे में जिम्मेदारी से मुक्त सरकारों को नोटिस थमाने से आगे और संविधान की लक्ष्मण रेखा पार न करने की हिदायत से आगे सुप्रीम कोर्ट जा नहीं सकता। और नोटिस पर सरकारी जवाब सियासी जरुरतो की तिकड़मों से पार पा नहीं सकता। तो होगा क्या। सरकारी शिक्षा फेल होगी। प्राइवेट स्कूल कुकुरमुत्ते की  तरह फले-फुलेंगे। सरकारी हेल्थ सर्विस फेल होगी। निजी अस्पताल मुनाफे पर इलाज करेंगे। घर बिल्डर देगा। तो घर के लिये फ्लैटधारकों की जिन्दगी बिल्डर के दरवाजे पर बंधक होगी। यानी जीने के अधिकार के तहत ही जब न्यूनतम जरुरत शिक्षा, स्वास्थ्य और घर तक से चुनी हुई सरकारें पल्ला झाड़ चुकी हो तब सिवाय लूट के होगा क्या सियासत लूट के कानून को बनाने के अलावा करेंगी क्या। और सुप्रीम कोर्ट सिवाय संवैधानिक व्याख्या के करेगा क्या। हालात ये है कि 18 करोड़ स्कूल जाने वाले बच्चो में 7 करोड़ बच्चों का भविष्य निजी स्कूलों के हाथो में है। सरकार का शिक्षा बजट 46,356 करोड़ है तो निजी स्कूलों का बजट 8 लाख करोड से ज्यादा है। यानी देश की न्यूनतम जरुरत, शिक्षा भी सरकार नहीं बाजार देता है। जिसके पास जितना पैसा। और पैसे के साथ उन्हीं नेताओं की पैरवी, जो जिम्मेदारी मुक्त है। और तो और नेताओ के बडी कतार चाहे सरकारी स्कूल में बेसिक इन्फ्रस्ट्रक्चर ना दे पाती हो लेकिन उनके अपने प्राईवेट स्कूल खूब बेहतरीन हैं। इसीलिये निजी  स्कूलों की कमाई सरकारी स्कूलो के बजट से करीब सौगुना ज्यादा है। तो मां-बाप क्या करें । सुप्रीम कोर्ट के नोटिस पर 21 दिन बाद आने वाले जवाब का इंतजार करें ।

और इस बीच चंद दिनो पहले की खबर की तरह खबर आ जाये कि गोरखपुर में 125 बच्चे । तो फर्रुखाबाद में 38 और सैफई में 98 बच्चे मर  गये। बांसवाडा में भी 90 बच्चे मर गये। ये सच बीते दो महीने का है तो मां-बाप शिक्षा के साथ अब बच्चो के जिन्दा रहने के लिये इलाज की तालाश में भटके। और इलाज का आलम ये है कि 100 करोड जनसंख्या जिस सरकारी इलाज पर टिकी है उसके लिये बजट 41,878 करोड का है। 25 करोड नागरिकों के लिये प्राइवेट इलाज की इंडस्ट्री 6,50,000 करोड पार कर चुकी है। यानी इलाज की जगह सरकारी अस्पतालो में मौत और मौत की एवज में करोड रुपये का मुनाफा।  तो दुनिया में भारत ही एकमात्र एसा देश है जहा शिक्षा और हेल्थ सर्विस का सिर्फ निजीकरण हो चला है बल्कि सबसे मुनाफे वाली इडस्ट्री की तौर पर शिक्षा और हेल्थ ही है। तो मां-बाप क्या करें। जब शिक्षा के नाम पर  कत्ल हो जाये । इलाज की एवज में मौत मिले। और एक अदद घर के लिये खुद को ही बिल्डर के हाथो रखने की स्थिति आ जाये और चुनी हुई सरकार पल्ला झाड ले तो फिर सुप्रीम कोर्ट का ये कहना भर आक्सीजन का काम करता है कि , " बैंक बिल्डर का नहीं फ्लैटधारको को फ्लैट दिलाने पर ध्यान दें। बिल्डर डूबता है तो डूबने दें।" तो जो बात सुप्रीम कोर्ट संविधान की व्यख्या करते हुये कह सकता है उसके चुनी हुई सरकारे सत्ता भोगते हुये लागू नहीं कर  सकती। क्योंकि सवाल बच्चो की मौत के साथ हर पल मां बाप के मर के जीने का भी होता है। इसीलिये गुरुग्राम के श्यामकुंज की गली नं 2 में जब नजर कत्ल किये जा चुके प्रद्यु्म्न 50 गज के घर पर पडती है तो कई सवाल हर जहन  में रेंगते है। क्योंकि पूरी कालोनी जिस त्रासदी को समेटे प्रद्युम्न की मां ज्योति ठाकुर को सांतवना देने की जगह खुद के बच्चे की तस्वीर आंखों  में समेटे है। वह मौजूदा सिस्टम के सामने सवाल तो हैं। क्योंकि बच्चे का कत्ल ही नहीं बल्कि सिर्फ बच्चे को पालने के आसरे पूरा परिवार कैसे जिन्दगी जीता है उसकी तस्वीर ही प्रद्युम्न के घर पर मातम के बीच खामोशी तले पसरी हुई है।

और फैलते महानगरो में हाशिये पर पड़े लोगों के बीच देश के किसी भी हिस्से में चले जाइये इस तरह पचास गज की जमीन पर घर बनाकर बच्चो को बेहतर जिन्दगी देने की एवज में खुद जिन्दगी से दो दो हाथ करते  परिवार आपको दिखायी दे जायेगें । और बच्चो को पढाने के नाम पर इन्हीं परिवारो की जेब में डाका ढाल कर इस देश में सालाना दो लाख करोड़ की फिस-डोनेशन प्राइवेट स्कूलों से ली जाती है।  सबसे ज्यादा जमीन शिक्षा के  नाम पर प्राईवेट-कान्वेंट स्कूल को मिल गई। सिर्फ एक रुपये की लीज पर। तीस बरस के लिये। इसी दौर में प्राइवेट शिक्षा का बजट देश के शिक्षा बजट से 17 गुना ज्यादा का हो गया।  तो जो परिवार रेयान स्कूल में कत्ल के बाद फूट पडे । उन स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चो को मां-बाप के लिये चुनी हुई सरकारें क्या वाकई कुछ सोचती भी हैं। क्योंकि आज का सच यही है कि प्राइवेट स्कूलों की फीस भरने में मां-बाप की कमर दोहरी हो रही है। एसोचैम का सर्वे कहता है कि बीते चार साल में निजी स्कूलों की फीस 100 से 120 फीसदी बढ़ गई है । प्राइवेट स्कूलों की फीस हर साल औसतन 10 से 20 फीसदी बढ़ाई जाती है । बच्चो की पढाई को लेकर मंहगाई मायने नही रखती । स्कूलो की मनमानी पर कोई रोक लगती नहीं । मसलन महानगरो में एक बच्चे को पढाने का सालाना खर्च किस रफ्तार से बढा । उसका आलम ये है कि 2005 में 60 हजार । 2011 में 1 लाख बीस हजार । तो 2016 में 1 लाख 80 हजार सालाना हो चुका है।यानी महानगरो में किसी परिवार से पूछियेगा कि एक ही बच्चा क्यों तो जवाब यही आयेगा कि दूसरे बच्चे को पैदा तो कर लेंगे लेकिन पढायेंगे कैसे । यानी बच्चो की पढाई परिवार की वजह से पहचाने वाले देश में परिवार को ही खत्म कर रही है । लेकिन सिर्फ प्राइवेट स्कूल ही क्यो । पढाई के लिये ट्यूशन एक दूसरी ऐसी इंडस्ट्री है जिसके लिये स्कूल ही जोर डालते है । आलम ये है कि देश का शिक्षा बजट 46,356 करोड का है । और  ट्यूशन इंडस्ट्री तीन लाख करोड़ रुपए पार कर चुकी है । एसोचैम का सर्वे कहता है कि महानगरों में प्राइमरी स्कूल के 87 फीसदी छात्र और हाई स्कूल के 95 फीसदी छात्र निजी ट्यूशन लेते हैं । महानगरों में प्राइवेट ट्यूटर एक क्लास के एक हजार रुपए से चार हजार रुपए वसूलते हैं जबकि ग्रुप ट्यूशन की फीस औसतन 1000 रुपए से छह हजार रुपए के बीच है । यानी दो जून की रोटी में
मरे जा रहे देश में नौनिहालो की पढाई से लेकर इलाज तक की जिम्मेदारी से चुनी हुई सरकारे ही मुक्त है ।  क्योकि देश की त्रासदी उस कत्ल में जा उलझी है जिसका आरोपी दोषी नहीं है और दोषी आरोपी नहीं है क्योकि उसकी ताकत राजनीतिक सत्ता के करीब है । जब काग्रेस सत्ता में तो कांग्रेस के करीब और अब बीजेपी सत्ता में तो बीजेपी के करीब रेयान इंटरनेशनल की एमडी ग्रेस पिंटो । यू देश का सच तो ये भी है कि देश के 40 फीसदी निजी स्कूलों या शैक्षिक संस्थानों के मालिक राजनीतिक दलों से जुड़े हैं । बाकि अपने ताल्लुकात राजनीति सत्ता से रखते है । क्योंकि ध्यान दीजिए तो डीवाई पाटील,शरद पवार, सलमान खुर्शीद, छगन भुजबल, जगदंबिका पाल, जी विश्वानाथन,ज्योतिरादित्य सिंधिया, शिवपाल यादव, मनोहर जोशी,अखिलेश दास गुप्ता,सतीश मिश्रा जैसे नेताओं की लंबी फेहरिस्त है,जिनके स्कूल हैं या जो स्कूल मैनजमेंट में सीधे तौर पर शामिल हैं ।तमिलनाडु में तो 50 फीसदी से ज्यादा शैक्षिक संस्थान राजनेताओं के हैं । महाराष्ट्र में भी 40 से
50 फीसदी स्कूल राजनेताओं के हैं तो उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में भी यही हाल है । दरअसल, शिक्षा अब एक ऐसा धंधा है, जिसमें कभी मंदी नहीं आती। स्कूल की मंजूरी से लेकर स्कूल के लिए तमाम दूसरी सरकारी सुविधाएं लेना राजनेताओं के लिए अपेक्षाकृत आसान होता है और स्कूल चलाने के लिए जिस मसल पावर की जरुरत होती है-वो राजनेताओं के पास होती ही है। तो एक बच्चे की हत्या के बाद मचे बवाल से सिस्टम ठीक होगा यही ना देखियेगा । कुछ वक्त बाद परखियेगा रेयान इंटरनेशनल स्कूल में 7 बरस के बच्चे की हत्या ने किस किस को लाभ पहुंचाया।

Wednesday, September 6, 2017

हत्यारों को कठघरे में कौन खड़ा करेगा?

तो गौरी लंकेश की हत्या हुई। लेकिन हत्या किसी ने नहीं की। यह ऐसा सिलसिला है, जिसमें या तो जिनकी हत्या हो गई उनसे सवाल पूछा जायेगा, उन्होंने जोखिम की जिन्दगी को ही चुना। या फिर हमें कत्ल की आदत होती जा रही है क्योंकि दाभोलकर, पंसारे, कलबुर्गी के कत्ल का जब हत्यारा कोई नहीं है तो फिर गौरी लंकेश की हत्या के महज 48 घंटो के भीतर क्या हम ये एलान कर सकते हैं कि अगली हत्या के इंतजार में शहर दर शहर विरोध के स्वर सुनाई दे रहे हैं। पत्रकार, समाजसेवी या फिर बुद्दिजीवियों के इस जमावड़े के पास लोकतंत्र का राग तो है लेकिन कानून का राज देश में कैसे चलता है ये हत्याओ के सिलसिले तले उस घने अंधेरे में झांकने की कोशिश तले समझा जा सकता है। चार साल बाद भी नरेन्द्र दामोलकर के हत्यारे फरार हैं। दो बरस पहले गोविंद पंसारे की हत्या के आरोपी समीर गायकवाड को जमानत मिल चुकी है । कलबुर्गी की हत्या के दो बरस हो चुके है लेकिन हत्यारो तक पुलिस पहुंची नहीं है। कानून अपना काम कैसे कर रही है कोई नहीं जानता। तो फिर गौरी लंकेश की हत्या जिस सीसीटीवी कैमरे ने कैद भी की वह कैसे हत्यारों को पहचान पायेगी। क्योकि सीसीटीवी को देखने समझने वाली आंखें-दिमाग तो राजनीतिक सत्ता तले ही रेंगती हैं। और सत्ता को विचारधारा से आंका जाये या कानून व्यवस्था के कठघरे में परखा जाये। क्योंकि दाभोलकर और पंसारे की हत्या को अंजाम देने के मामले में सारंग अकोलकर और विनय पवार आजतक फरार क्यों हैं। और दोनों ही अगर हत्यारे है तो फिर 2013 में दाभोलकर की हत्या के बाद 2015 में पंसारे की हत्या भी यही दोनों करते हैं तो फिर कानून व्यवस्था का मतलब होता क्या है। महाराष्ट्र के पुणे शहर में दाभोलकर की हत्या कांग्रेस की सत्ता तले हुआ। महाराष्ट्र के ही कोल्हापुर में पंसारे की हत्या बीजेपी की सत्ता तले हुई। हत्यारों को कानून व्यवस्था के दायरे में खड़ा किया जाये। तो कांग्रेस-बीजेपी दोनों फेल है। और अगर विचारधारा के दायरे में खड़ा किया जाये तो दोनो की ही राजनीतिक जमीन एक दूसरे के विरोध पर खडी है।

यानी लकीर इतनी मोटी हो चली है कि गौरी लंकेश की हत्या पर राहुल गांधी से लेकर मोदी सरकार तक दुखी हैं। संघ परिवार से लेकर वामपंथी तक भी शोक जता रहे हैं। और कर्नाटक के सीएम भी ट्वीट कर कह रहे हैं, ये लोकतंत्र की हत्या है। यानी लोकतंत्र की हत्या कलबुर्गी की हत्या से लेकर गौरी शंकर तक की हत्या में हुई। दो बरस के इस दौर में दो दो बार लोकतंत्र की हत्या हुई। तो फिर हत्यारों के लोकतंत्र का ये देश हो चुका है। क्योंकि सीएम ही जब लोकतंत्र की हत्या का जिक्र करें तो फिर जिम्मेदारी है किसकी। या फिर हत्याओ का ये सिलसिला चुनावी सियासत के लिये आक्सीजन का काम करने लगा है। और हर कोई इसका अभयस्त इसलिये होते चला जा रहा है क्योंकि विसंगतियों से भरा चुनावी लोकतंत्र हर किसी को घाव दे रहा है। तो जो बचा हुआ है वह उसी लोकंतत्र का राग अलाप रहा हैं, जिसकी जरुरत हत्या है। या फिर हत्यारो को कानूनी मान्यता चाहे अनचाहे राजनीतिक सत्ता ने दे दी है। क्योंकि हत्याओं की तारीखों को समझे। अगस्त 2013 , नरेन्द्र दाभोलकर की हत्या। फरवरी 2015 गोविन्द पंसारे की हत्या। अगस्त 2015 एमएम कलबुर्गी की हत्या। 5 सितंबर 2017 गौरी लंकेश की हत्या। गौरतलब है कि तीनों हत्याओं में मौका ए वारदात से मिले कारतूस के खोलों के फोरेंसिक जांच से कलबुर्गी-पानसारे और दाभोलकर-की हत्‍या में इस्‍तेमाल हथियारों में समानता होने की बात सामने आई थी। बावजूद इसके हत्यारे पकड़े नहीं जा सके हैं। तो सवाल सीधा है कि गौरी लंकेश के हत्यारे पकड़े जाएंगे-इसकी गारंटी कौन लेगा? क्योंकि गौरी लंकेश की  हत्या की जांच तो एसआईटी कर रही है, जबकि दाभोलकर की हत्या की जांच को सीबीआई कर चुकी है, जिससे गौरी लंकेश की हत्या के मामले में जांच की मांग की जा रही है। तो क्या गौरी लंकेश की हत्या का सबक यही है कि हत्यारे बेखौफ रहे क्योकि राजनीतिक सत्ता ही लोकतंत्र है जो देश को बांट रहा है ।

या फिर अब ये कहे कि कत्ल की आदत हमें पड़ चुकी है क्योंकि चुनावी जीत के लिये हत्या भी आक्सीजन है। और सियासत के इसी आक्सीजन की खोज में जब पत्रकार और आरटीआई एक्टीविस्ट निकलते है तो उनकी हत्या हो जाती है। क्योंकि जाति, धर्म या क्षेत्रियता के दायरे से निकलकर जरा इन नामों की फेरहिस्त देखे। मोहम्मद ताहिरुद्दीन,ललित मेहता,सतीश शेट्टी,अरुण  सावंत ,विश्राम लक्ष्मण डोडिया ,शशिधर मिश्रा, सोला रंगा राव,विट्ठल गीते,दत्तात्रेय पाटिल, अमित जेठवा, सोनू, रामदास घाड़ेगांवकर, विजय प्रताप, नियामत अंसारी, अमित कपासिया,प्रेमनाथ झा, वी बालासुब्रमण्यम,वासुदेव अडीगा ,रमेश अग्रवाल ,संजय त्यागी ।

तो ये वो चंद नाम हैं-जिन्होंने सूचना के अधिकार के तहत घपले-घोटाले या गडबड़झालों का पर्दाफाश करने का बीड़ा उठाया तो विरोधियों ने मौत की नींद सुला दिया। जी-ये लिस्ट आरटीआई एक्टविस्ट की है। वैसे आंकड़ों में समझें तो सूचना का अधिकार कानून लागू होने के बाद 66 आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है ।159 आरटीआई कार्यकर्ताओं पर हमले हो चुके हैं और 173 ने धमकाने और अत्याचार की शिकायत दर्ज कराई है । यानी इस देश में सच की खोज आसान नहीं है। या कहें कि जिस सच से सत्ता की चूलें हिल जाएं या उस नैक्सस की पोल खुल जाए-जिसमें अपराधी और सत्ता सब भागीदार हों-उस सच को सत्ता के दिए सूचना के अधिकार से हासिल करना भी आसान नहीं है।  दरअसल, सच सुनना आसान नहीं है। और सच को उघाड़ने वाले आरटीआई एक्टविस्ट हों या जर्नलिस्ट-सब जान हथेली पर लेकर ही घूमते हैं। क्योंकि पत्रकारों की बात करें तो अंतरराष्ट्रीय संस्था कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट की रिपोर्ट कहती है कि भारत में पत्रकारों को काम के दौरान पूरी सुरक्षा नहीं मिल पाती। भ्रष्टाचार और राजनीति तो खतरनाक बीट हैं । 1992 के बाद 27 ऐसे मामले दर्ज हुए,जिनमें पत्रकारों को उनके काम के सिलसिले में कत्ल किया गया लेकिन किसी एक भी मामले में आरोपियों को सजा नहीं हो सकी । तो गौरी लंकेश के हत्यारों को सजा होगी-इसकी बहुत उम्मीद नहीं की जा सकती। लेकिन-एक तरफ सवाल वैचारिक लड़ाई का है तो दूसरी तरफ सवाल कानून व्यवस्था का है। क्योंकि सच यही है कि बेंगलुरु जैसे शहर में अगर एक पत्रकार की घर में घुसकर हत्या हो सकती है तो देश के किसी भी शहर में पत्रकार-आरटीआई एक्टिविस्ट की हत्या हो सकती है-और उन्हें कोई बचा नहीं सकता। यानी अब गेंद सिद्धरमैया के पाले में है कि वो दोषियों को सलाखों के पीछे तक पहुंचवाएं। क्योंकि मुद्दा सिर्फ एक हत्या का नहीं-मीडिया की आजादी का भी है। और सच ये भी है कि मीडिया की आजादी के मामले में भारत की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स की 2107 की वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम रैकिंग कहती है कि भारत का 192 देशों में नंबर 136वां है । और इस रैंकिंग का आधार यह है कि किस देश में पत्रकारों को अपनी बात कहने की कितनी आजादी है। और जब आजादी कटघरे में है तो हत्यारे कटघरे में कैसे आयेंगे।