Tuesday, September 16, 2014

सपने का टूटना या लोकतंत्र की जीत की उम्मीद

प्रधानमंत्री मोदी का जादू चल जायेगा। लेकिन नहीं चला। संघ परिवार की सक्रियता के बगैर जीत जायेंगे। लेकिन नहीं जीते। लव जेहाद और सांप्रदायिक बोल हिन्दु वोट को एकजुट रखेंगे। लेकिन नहीं रख पाये।
अल्पसंख्यक असुरक्षित होकर बीजेपी की छांव में ही आयेगा या फिर उसकी एकजुटता हिन्दुओं में जातीय समीकरण को भुला देगी। लेकिन यह भी नहीं हुआ। मायावती की गैरहाजरी में दलित वोट विकास की चकाचौंध में खोयेगा। लेकिन वह भी नहीं खोया। वसुंधरा की बिसात और मोदी की चमक राजस्थान में बीजेपी से इतर किसी को कुछ सोचने नहीं देगी। लेकिन यह भी नहीं हुआ। छह करोड़ गुजराती मोदी के पीएम बनने की खुमारी में डूबा रहेगा और आनंदीबेन मोदी को जीत का बर्थ-डे गिफ्ट दे देगी। लेकिन बर्थ-डे गिफ्ट भी धरा का धरा रह गया। तो फिर उपचुनाव के परिणाम के संकेत ने क्या लोकसभा चुनाव के फैसले को ही पलटने की तैयारी कर ली है। या फिर राजनीतिक शून्यता के ऐसे पायदान पर देश की संसदीय राजनीति जा खड़ी हुई है जहां बार बार आगे बढ़कर पीछे लौटने के अलावे कोई विकल्प देश की जनता के सामने है नहीं। मंडल की धार से 25 बरस पहले कमंडल टकरायी।

लेकिन 25 बरस बाद मोदी के विकास मंत्र ने मंडल की धार को भोथरा बना दिया और कमंडल को हिन्दु राष्ट्रवाद के आइने में उतार कर एक नयी लकीर खिंचने की नायाब पहल की। लगा यही कि मंडल के दौर में क्षत्रपों की सियासत ने देश का बंटाधार ही किया तो फिर मोदी के विकास के घोड़े की सवारी कुछ सकून तो देगी। लेकिन हकीकत से कहां कैसे वोटर भागे। उसे तो हर दिन रसोई में आंसू बहाने है। विकास का ताना बाना चाहे विदेशी पूंजी की आस जगाता हो। चाहे इन्फ्रास्ट्रक्चर के नाम पर क्रक्रीट का जंगल खडा करने की बैचैनी दिखाता हो। चाहे डिजिटल इंडिया के सपने तले हर हाथ में तकनालाजी की उम्मीद जागती हो। चाहे कॉरपोरेट के धुरंधरों और औघोगिक घरानो के एफडीआई के समझौते के नये रास्ते खुलते नजर आते हो। चाहे मोदी सरकार की इस चकाचौंध को बेहद बारिकी से मीडिया लगातार परोसता हो। और इस भागमभाग में चाहे हर कोई हर उस मुद्दे से ही दूर होता चला गया हो जो लोकसभा चुनाव के वक्त देश के आम जन की आंखों में जगाये गये हों। चाहे वह रोजगार पा जाने का सपना हो। चाहे वह पाकिस्तान और चीन से दो दो हाथ करने का सुकुन हो। चाहे बिचौलियों और कालाबाजारियों पर नकेल कसने की उम्मीद हो। चाहे कांग्रेस के गैर सरोकार वाले रईस कांग्रेसियों या कहें लूटने वालो को कटघरे में खड़ा करने की हनक हो। सबकुछ नरेन्द्र मोदी ने जगाया। और इन्हीं सबकुछ पर कुंडली मार कर देश को भुलाने और सुलाने का तरीका भी मोदी सरकार ने ही निकाला। तो क्या विकल्प की बात ख्वाब थी या विकल्प या विकास का ताना बाना सत्ता पाने का सियासी स्वाद बन चुका है । इसलिये सौ दिन की सरकार की हार ने मंडल प्रयोग से आगे मंडल का ट्रैक टू शुरु करने का संकेत दे दिये। जहां मायावती की खामोशी मुलायम को जीता कर आने वाले वक्त में गेस्टहाउस कांड को भुलाने की दिशा में जाना चाहती हैं। ठीक उसी तरह जैसे सुशासन बाबू जंगल राज के नायक के साथ खड़े हो गये। पहले तमगा दिया फिर दिल दे दिया ।

गजब की सियासत का दौर है यह । क्योंकि इस बिसात पर संभल कर चलने के लिये चुनावी जीत की तिकडमें ही हर दल के लिये महत्वपूर्ण हो चली हैं। और तिकडमों से निकलने वाली चुनावी जीत संविधान से बड़ी लगने लगी है। यूपी के सांप्रदायिक दंगे। मुजफ्फरनगर की त्रासदी के बीच सैफई का नाचगान। अब कोई मायने नहीं रखता। गहलोत के दौर के घोटाले सचिन पायलट की अगुवाई में काग्रेस की जीत तले छुप जाते हैं। मोदी के दरबार में वसुंधरा राजे के प्यादा से भी कम हैसियत पाना। यूपी की बिसात पर राजनाथ को प्यादा और योगी आदित्यनाथ का वजीर बनाने की चाहत वाले अमित शाह की चाल भी जीत के दायरे में मापी जाती है। और अमित शाह को हर राज्य में जीत का सेहरा पहनाने की हैसियत वाला मान कर आरएसएस झटके में प्यादे से वजीर बनाकर सुकुन पाती है। तो फिर चुनावी दौड़ का यह रास्ता थमता किधर है। शायद कहीं नहीं। क्योंकि यह दौड़ ही सत्ता की मलाई खाने के लिये जातीय और धर्म के आधार पर उचकाती है। या फिर विकास का अनूठा मंत्र देकर ऐसे भ्रष्टाचार की ऐसी लकीर खिंचती है,जिसके तले मजदूर के हक के कानून बदल जाये। पर्यावरण से खुला खिलवाड विकास के नाम पर दौड़ने लगे। जन-धन योजना तले देश की लाइफ इंशोरेंस कंपनी एलआईसी का नहीं बल्कि विदेशी बैंक एचडीएफसी के लाइफ इंशोरेंस का कल्याण हो। विदेशी पूंजी की आहट राष्ट्रीयता को इतना मजबूर कर दें कि जुंबा पर हिन्दु राष्ट्रवाद गूंजे जरुर लेकिन देश बाजार और व्यापार में बदलता दिखे। जिसमें चुनी हुई सरकार ही बिचौलिये या कमीशनखोर हो जाये। ध्यान दीजिये तो मनमोहन का दौर हो या मोदी का दौर पटरी वही है इसलिये बार बार देश उन्हीं क्षत्रपों की गोद में लौटता है, जहां मलाई खाने के लिये सत्ता के दरवाजे तो खुले मिलते है चाहें लूट खुली क्यों ना हो। इसलिये उपचुनाव के परिणाम निराशा और सपनों की टूटने के अनकही कहानी भी है और लोकतंत्र की जीत की उम्मीद भी।

Thursday, September 11, 2014

कश्मीर में अधिकारी, पुलिस या डॉक्टर नहीं बेटा, बाप या पति ही बचे हैं !!

पहली बार बच्चे ने "क" से लिखा कश्मीर

पानी में डूबे कश्मीर को संभाले कौन। श्रीनगर के बीचो बीच पीरबाग में पुलिस हेडक्वार्टर में अब भी पानी है। और श्रीनगर के करीब सभी 25 पुलिस थाने। वाटामालू, हरवन,कारानगर, खानयार कोठीबाग, करालखुर्द,लालबाजार,मैसूमा, निशात,पंथा चौक, नौहट्टा, राजबाग, सदर, सफाकदल, नौकाम पुलिस थाने तक। सभी 7 सितंबर की सुबह ही पानी में डूब चुके थे। और सिर्फ श्रीगर के पुलिस थाने ही नहीं बल्कि अनंतनाग के अचावल, अशमुगम बिजबेहरा, डुरु, करनाक और सदर अनंतनाग पुलिस थाने भी पानी में डूबे है। वडगाम का बीरवा, चादोरा, चरार-ए-शरीफ,खाकमाकम, नोबरा और न्योमा पुलिस थाने भी पानी में डूब चुके हैं। इतना ही नहीं बल्कि झेलम के किनारे कुलगाम, शोपिंया, पुलवामा, गांधारबल, बांदीपुर की हर गली मोहल्ले में 7 सितंबर की सुबह तक 5 से 7 फीट पानी आ चुका था। और धीरे धीरे यह पानी 12 फीट तक चढ़ा। यानी सचिवालय हो या पुलिस स्टेशन बीते रविवार को जब सभी पानी में समाया तो ब्लैक संडे का मतलब कश्मीर को अब अपने भरोसे हर मुसीबत से सामना करना था। पुलिस-प्रशासन का कोई अधिकारी इस स्थिति में था ही नहीं कि वह हालात से खुद को बचाये या बची हुई हालात में किसे संभाले या संभालने के लिये कौन सी व्यवस्था करें। सबकुछ चरमरा चुका था। चरमराया हुआ है।

इतना ही नहीं सबसे सक्रिय लाल चौक पर भी पानी चढ़ना शुरु हुआ तो वहा मौजूद सेना के ट्रक सबसे पहले पोस्ट छोड़ ट्रक पर ही चढ़े। लेकिन धीरे धीरे पानी सात से आठ फीट पहुंच गया तो उसके बाद सिर्फ लाल चौक ही नहीं बल्कि समूचे कश्मीर में मौजूद सेना के सामने यह संकट आया कि सुबह जब ड्यूटी बदलती है तब जिन जवानों को ड्यूटी संभालने पहुंचना था, वह पहुंच ना पाये क्योंकि सेना के कैंप को भी पानी अपनी आगोश में ले चुका था। कैंप से बाहर निकलने के लिये सेना का ट्रक नहीं बोट चाहिये थी। हालात बद से बदतर होते चले जा रहे थे और किसे क्या करना है या हालात कौन कैसे संभालेगा इसकी कोई जानकारी किसी के पास नहीं थी। यानी राज्य की सीएम उमर अब्दुल्ला का संकट यह था कि वह किसे निर्देश दें। और निर्देश देने के बाद घाटी में राहत के लिये कौन सी व्यवस्था करें। सीएम हाउस से बाहर निकलने के लिये किस्ती या बोट चाहिये था। क्योंकि श्रीनगर के हैदरपुरा में पानी पांच फीट पार कर चुका था, जहां सीएम हाउस है। डाउन टाउन की संकरी गलियों के किनारे पुराने मकान की उम्र तो पानी की तेज धार के सामने 50 घंटे के भीतर ही दम तोड़ने लगी। एक मंजिला छोड, दो मंजिला और दो मंजिला छोड छत के अलावे कहां जाये यह डाउन-टाउन ही नहीं समूचे कश्मीर की त्रासदी बन गयी। चौबिस घंटे पहले तक जिस अधिकारी, जिस पुलिस वाले या जिस जवान
के इशारे पर सबकुछ हो सकता था। सात सितंबर की सुबह से हर कोई सिर्फ बेटा, बाप, या पति ही था । जिसे अपने परिवार को बचाना था।

लेकिन बचाने के लिये खुद कैसे बचे यह बेबसी भी छुपानी थी। यह बेबसी कितनी खतरनाक रही इसका अंदाजा इसी से लग सकता है कि अपनी आंखों के सामने अपनो की मौत देखने के बदले राहत के लिये इंतजाम के लिये कई बेटे बाप कई पति घर से निकले। और जो लौटे उन्हें अपना नहीं मिला। जो नहीं लौटे है उन्हें उनके अपने अब भी खोज रहे हैं। हालात संभाले कौन और कैसे यह सवाल इसलिये बीते पांच दिनों से सामने नहीं आया क्योकि बिगडे हालात में संभालने वाला तो कोई होना चाहिये। त्रासदी ने तो डाक्टर और मरीज दोनों को एक ही हालत में ला खड़ा किया। शेर-ए-कश्मीर इंस्ट्टीयूट आफ मेडिकल साइसं का गर्ल्स हॉस्टल डूब गया। यह रह रही दो सौ छात्रायें कैसे निकली और कहां गयीं, यह हर कोई खोज रहा है । 7 सितंबर को ही हॉस्पीटल की पहली मंजिल पानी में डूब चुकी थी और उस वक्त सोशल मीडिया पर एक ट्वीट आया, -लोकल्स, प्लीज हैल्प , 200 फीमेल रेसिडेन्ट डाक्टर्स आर इन गवर्नमेंट मेडिकल कालेज। लेकिन लोकल्स क्या करते या क्या किया होगा उन्होंने क्योंकि हर कोई तो खुद को बचाने में ही लगा रहा। और इस दौर में कैसे समूचे कश्मीर के किसी डाक्टर के पास कुछ भी नहीं बचा। और अब जब हॉस्पीटल में इलाज शुरु हुआ तो कैसे दवाई से लेकर इलाज के लिये हर छोटी से छोटी चीज भी डाक्टरों के पास नहीं है। और अफरातफरी के इस दौर में सेना के डाक्टर और उनके डाक्टरी सामान ही कश्मीर के हर घाव पर मलहम है। क्योंकि मौजूदा वक्त में कश्मीर का हर अस्पताल पानी में डूबा हुआ है।

बेमीना में डिग्री कालेज के सामने केयर हास्पीटल न्यूरोलाजी सेंटर। अमीनाबाग का अलशीफा अस्पताल। नौगांव बायपास के करीब गुलशननगर का अहमद अस्पताल। राजबाग का मॉडन हास्पीटल। किडनी हास्पीटल । यहां तक की सीएम हाउस के ठीक सामने हैदरपुरा बायपास पर मुबारक हास्पीटल भी पानी में इस तरह समाया हुआ है कि वहां इलाज तो दूर अस्पताल के भीतर जाना भी मुश्किल है। यानी जिन हालातों में कश्मीर के दर्जन भर अस्पतालों में पहले से मरीज थे। सात सितंबर की सुबह के बाद कौन कहां गया। यह किसी को नहीं मालूम क्योकि हर किसी खुद ही खुद को बचाना था और अस्पताल में भर्ती मरीजो को सिर्फ इतना ही कहा गया कि इलाज तो अब मुश्किल है और पहले हर कोई सुरक्षित जगह चला जाये। सुरक्षित का मलतब इलाज छोड जान बचाने का है। और कश्मीर में छोटे बडे 28 अस्पताल पानी में डूबे हुये है। जिनमें तीन हजार बेड हैं। यानी तीन हजार मरीज कहा गये किसी को नहीं पता। यानी कश्मीर के इस मंजर को कौन कैसे संभाले यह अपने आप में ही सबसे बड़ा सवाल 7 सितंबर के बाद से जो शुरु हुआ वह आज भी जारी है क्योंकि जिसे भी हालात संभालने के लिये निकलना था वह 7 सितंबर के बाद से अपने अपने दायरे में बेटा, बाप या पति  हो कर ही रह गया क्योंकि आपदा से निपटने का कोई सिस्टम है नहीं। यहा तक की जिस मौसम विभाग को यह नापना है कि कश्मीर में कितनी बरसात हुई या बाढ का कितना पानी घुसा हुआ है, वह दफ्तर भी पानी में डूब गया। इन हालातों में सेना हेलीकाप्टर और बोट से जहां पहुंच सकती थी वहां पहुंचने की जद्दोजहद में लगी हुई है। राहत का सामान श्रीनगर और जम्मू हवाई अड्डे पर आ रहा है और हेलीकाप्टर उसे ले उड़ रहा है। लेकिन घाटी से पानी निकले कैसे। पंप आयेंगे कहां से। और पुलिस प्रशासन नाम की चीज जो पूरी राज्य की व्यवस्था को चलाती, वह जब कश्मीर के हर मोहल्ले में बाप बेटे या पति-पत्नी बनकर अपनो की जान बचाने में लगी हुई है तो कल्पना कीजिये कश्मीर के मंजर का मतलब है क्या। इन हालातों में अब गृह सचिव को ही कश्मीर के हालात संभालने हैं। सीएम हाउस, सेना , पुलिस, राहत सामग्री, राज्यों से आने वाली मदद, डाक्टर। तमाम राज्यों के अधिकारी। यानी तमाम परिस्थितियों के बीच तालमेल कैसे बैठे और जिस हालात में समूचे कश्मीर के अधिकारी या कहे कश्मीर का पुलिस प्रशासन भी कही ना कही अपने अपने घर में एक आम नागरिक होकर बाढ़ की त्रासदी से खुद को बचाने में ही लगा हुआ है उसमें राहत कब कैसे किसे मिलेगी यह सवाल अब भी उलझा हुआ है। सीधे कहें तो कश्मीर का मंजर जितना डराने वाला है, उसमें राहत व्यवस्था लगातार पहुंच तो रही है लेकिन सबसे बड़ी मुश्किल सिलसिलेवार तरीके से हर क्षेत्र में राहत उन लोगो तक पहुंचाने की है जहां अब भी पानी है और उन जगहों पर पीने का पानी तक नहीं पहुंचा है। असल में हालात को समझने और राहत व्यवस्था करने में सबसे बडी भूल यह हो रही है कि कश्मीर में कोई व्यवस्था बची नहीं है, इसे केन्द्र अभी तक समझा नहीं है और राज्य सरकार यह मान नहीं रही है कि उसके हाथ में सिवाय कश्मीर के नाम के अलावे कुछ नहीं है। लेकिन इस मंजर में पहली बार हर बच्चा "क" से कश्मीर लिखना जरुर सिख चुका है।

Tuesday, September 9, 2014

कौन है गुनहगार कश्मीर के ?

कश्मीर को इस हालात में आने देने से रोका जा सकता था। झेलम का पानी जिस खामोशी से समूचे कश्मीर को ही डूबो गया उसे रोका जा सकता था। घाटी के हजारों गांव पानी में जिस तरह डूब गये उन्हें बचाया जा सकता था। यह ऐसे सवाल हैं जो आज किसी को भी परेशान कर सकते है कि अगर ऐसा था तो फिर ऐसा हुआ क्यों नहीं। असल में सबसे बड़ा सवाल यही है कि चार बरस पहले ही जम्मू कश्मीर की फ्लड कन्ट्रोल मिनिस्ट्री ने इसके संकेत दे दिये थे कि आने वाले पांच बरस में कश्मीर को डूबोने वाली बाढ की तबाही आ सकती है । फरवरी में बाढ़ नियतंत्र मंत्रालय की तरफ से ने बकायदा एक रिपोर्ट तैयार की गई थी। जिसे घाटी से निकलने वाले ग्रेटर कश्मीर ने 11 फरवरी 2010 में छापी भी थी । और उस वक्त कश्मीर में तबाही के संकेत की बात सुनकर कश्मीर से लेकर दिल्ली तक सरकारे हरकत में आयी जरुर लेकिन जल्द ही सियासी चालों में सुस्त पड़ गयी। उस वक्त बाढ़ नियंत्रण विभाग के अधिकारियों ने माना था कि बाढ़ की स्थिति इतनी भयावह हो सकती है कि समूचा कश्मीर डूब जाये। बकायदा डेढ़ लाख क्यूसेक पानी नदी से निकलने का जिक्र किया गया था। और संयोग देखिये फिलहाल करीब पौने दो लाख क्यूसेक पानी कश्मीर को डुबोये हुये है। रिपोर्ट के मुताबिक इसकी आशंका चार बरस पहले ही जता दी गयी थी कि कश्मीर पूरी तरह कट जायेगा। जम्मू-श्रीनगर रास्ता बह जायेगा। हवाई अड्डे तक जाने वाली सड़क भी डूब जायेगी। और कमोवेश हालात वहीं है जिसका जिक्र चार बरस पहले की रिपोर्ट में किया गया था। सवाल सिर्फ वैसे ही हालात के होने भर का नहीं है बल्कि ऐसे हालात ना हो इसके लिये बाढ़ नियंत्रण विभाग ने बकायदा दस्तावेजों का बंडल ट्रक में भरकर दिल्ली भेजा।

सारी रिपोर्ट जल संसाधन मंत्रालय पहुंची भी। लेकिन सारी रिपोर्ट बीते चार बरस में सड़ती रही। क्योंकि उस वक्त जम्मू कश्मीर के बाढ़ नियंत्रण मंत्रालय ने केन्द्र से 2200 करोड रुपये के बजट की मांग की थी। जिसे 500
करोड़ रुपये की किस्ता के हिसाब से देने को कहा गया। जिससे बाढ़ नियंत्रण के बेसिक इन्फ्रास्ट्रक्चर को खड़ा करने के लिये काम शुरु हो सके। लेकिन तब की केन्द्र मे मनमोहन सरकार ने मार्च के महीने में 109 करोड़ रुपये देने का भरोसा भी दिया। लेकिन ना दिल्ली से कोई बजट श्रीनगर पहुंचा। ना जम्मू-श्रीनगर सरकार इस दौर में कोई इन्फ्रास्ट्रक्चर बना पायी जिससे बाढ़ को रोका जा सके। हुआ इसका उलट । बीते दस बरस में कश्मीर में कोई ऐसी जगह बची ही नहीं जहां से बाढ़ का पानी बाहर निकल सके। बेमिना जैसी जगह तो बाढ़ के लिये स्वर्ग बन गयी क्योंकि यहा रिहायशी और व्यवसायिक इमारतों ने समूची जमीन ही घेर ली । यानी बाढ़ की जिस त्रासदी का अंदेशा चार बरस पहले किया गया। उस पर आंख मूंदकर कश्मीर को जन्नत का नूर बनाने का सपना देखने वालों ने कभी महसूस ही नहीं किया कि अगर ऐसा होगा तो फिर ऐसा नजारा भी सामने होगा जब कश्मीर के आस्त्तिव पर ही सवालिया निशान लग जायेगा। जमीन पानी पानी और आसमान ताकती कातर निगाहें पीने के पानी के लिये तरसेंगी। लेकिन पहली बार यह सवाल भी खड़ा हुआ है कि क्या वाकई वक्त के साथ इस तरह की आपदा से निपटने की क्षमता खत्म होती जा रही है क्योंकि  1902 में पहली बार कश्मीर बाढ़ की गिरफ्त में फंसा। उसके 57 बरस बाद 1959 में घाटी इस बुरी तरह बाढ़ से घिरी की तब कश्मीर के लिये अग्रेंजों से मदद मांगी गई। और अब यानी 2014 के हालात तो सबके सामने हैं। तो पहला सवाल कमोवेश  हर 55 बरस के बाद कश्मीर बाढ की त्रासदी से घिरा है। दूसरा सवाल बाढ़ से निपटने के लिये पहली बार 2014 में ही सरकार बेबस नजर आ रही है। या फिर कोई तकनीक है ही नहीं कि कश्मीर के लोगो की जान कैसे बचायी जाये।

तो क्या कश्मीर के बचाव को लेकर सरकार के हालात बीसवी सदी से भी बुरे हो चले हैं। यह सवाल इसलिये बड़ा है क्योंकि इससे पहले 1959 में जब कश्मीर में बाढ़ आयी थी तब समूची घाटी पानी में डूब गयी थी। उस वक्त कश्मीर सरकार के पास बाढ़ से बचने के कोई उपाय नही थे तो तत्कालिक सीएम गुलाम मोहम्मद बख्शी ने अग्रेजो से मदद मांगी थी। और तब इग्लैंड के इंजीनियरों ने झेलम का पानी शहर से दूसरी दिशा में मोड़ने के लिये वुल्लहर तक जमीन और पहाड़ को भेद डाला। इसके लिये बकायदा भाप के इंजन का इस्तेमाल किया गया। असल में 1948 में आयी बाढ ने ही कश्मीर को आजादी के बाद पहली चेतावनी दी थी । और तब प्रधानमंत्री नेहरु ने कश्मीर सरकार को ही बाढ़ से निपटने के उपाय निकालने की दिसा में कदम बढ़ाने को कहा था। और उसी के बाद शेख अब्दुल्ला की पहल पर ब्रिटिश इंजीनियरों ने श्रीनगर के पदशाही बाग से वुल्लहर तक करीब 42 किलोमिटर लंबा फ्लड चैनल बनाया गया। जिससे बाढ़ का पानी शहर से बाहर किया जा सके। असर इसी का हुआ कि राजबाग का जो इलाका आज पानी में पूरी तरह डूबा हुआ है और हेलीकाप्टर से राहत देने के अलावे सरकार के पास कोई दूसरा रास्ता नहीं है वहीं 55 बरस पहले अंग्रेंजों की तकनीक से राजबाग में बाढ़ का पानी आने के बावजूद जान-माल की कोई हानि नहीं हुई। लेकिन बीते पचास बरस में बाढ की त्रासदी से निपटने की दिशा में कोई काम तो हुआ नहीं उल्टे पेड़ों की कटाई और पहाड़ों को गिराकर जिसतरह
रिहाइश शुरु हुई और इसी आड में व्यवसायिक धंधे ने निर्माण कार्य शुरु किया असर उसी का है कि मौजूदा बाढ के वक्त समूचे कश्मीर की जमीन ही बाढ़ के लिये बेहतरीन जमीन में बदल चुकी है। घाटी के सारे फ्लड चैनल बंद हो चुके हैं।

झेलम की जमीन नादरु नंबल, नरकारा नंबल और होकारसर पर रिहायशी कालोनिया बन गयी हैं। यहां तक की श्रीनगर विकास अथराटी ने भी फ्लड चैनल पर शापिंग काम्पलेक्स खोल दिया है। यानी कश्मीर जो आज बाढ की बासदी से कराह रहा है उसके पीछे वहीं अंधी दौड़ है जो जमीनों पर कब्जा कर मकान या दुकान बनाने को ही सबसे बडा सुकुन माने हुये है। और हर कोई इसे आपदा मान कर खामोश है और गुनहगारो की तरफ कोई देखने को तैयार नहीं है।

Monday, September 8, 2014

कश्मीर में पानी उतरने के बाद के खौफनाक मंजर देखने के लिए कौन तैयार है?

आंतक ने कश्मीर को छलनी जरुर किया लेकिन बाढ़ की त्रासदी ने तो कश्मीर के आस्त्तिव पर ही सवालिया निशान लगा दिया है। वैली और लेक की खूबसूरती ने ही कश्मीर को जन्नत बनाया लेकिन अब वैली और लेक ही जिन्दगी पर भारी पड़ रही है। झेलम का पानी दर्जन भर लेक में और लेक का पानी वैली को तहस-नहस कर अब तक डेढ़ हजार गांवों को अपनी हदों में ले चुका है जहां लाखों लोगों के सामने पहला और आखिरी सवाल किसी तरह जिन्दगी बचाने का है। खासकर दर्जन भर लेक से घिरी कश्मीर वैली। आधुनिकता की चादर ओढे घाटी बाढ़ की त्रासदी में एक झटके में सातवी सदी में पहुंच गयी जब आवाजाही के लिये सिर्फ लकड़ी की कश्ती होती थी। लेकिन उस दौर में भी संपर्क साधे जा सकते थे । लेकिन 21 वीं सदी में कश्मीर ने पहली बार उस सच को करीब से देखा है, जब हाथ में मोबाइल है लेकिन बात हो नहीं सकती क्योंकि साढ़े तीन सौ टावर गिर चुके हैं। बारह सौ ने काम करना बंद कर दिया है।

शाम ढलते ही अंधेरा जिन्दगी का हिस्सा बन गया है। क्योंकि डेढ़ हजार ट्रांसफारमर पानी में हैं। पावर सप्लाई बंद है। बच्चो के लिये दूध, पावरोटी तक के लाले पड़ चुके हैं। सतह पर बने घरों में पानी है और घाटी में सिर्फ बीस फिसदी घर ही ऐसे हैं जो दो मंजिला हैं यानी मौजूदा त्रासदी में पानी के उपर आसरा लेने के लिये घाटी के 12 लाख लोगों के लिये जगह भी नहीं है। ज्यादातर खुले आसमान तले मदद की आस में हर पल मौत को देख रहे हैं या फिर कश्मीर की उन लेक से दूर होना चाह रहे है जो कश्मीर की खूबसूरती की पहचान रही। मुश्किल यह है कि डल लेक, गंगाबल लेक, शेषनाग लेक , सतसार लेक , मानसबल लेक, नुंदकोल लेक से लेकर सरीखे दर्जन भर लेक बाढ़ की इस त्रासदी में गडसर लेक में बदल चुके हैं, जिसका मतलब ही होता है डेथ आफ लेक यानी मौत। यानी वैली और लेक की जिस खूबसूरती ने कश्मीर को जन्नत बनाया और हर कश्मीरी हसीन वादियों पर रश्क करता रहा आज उन्हीं वादियों से जिन्दगी बचाने के लिये हर आंख पानी में कश्ती तो आसमान में वायुसेना के विमान को ही देख रही है। क्योंकि कश्मीर की जिस जमीन को लेकर 1947 से ही संघर्ष होता रहा और 1989 के बाद से तो जिस जमीन को सांप्रदायिकता के झरोखे में रखकर दिल्ली से श्रीनगर सुकुन की सिय़ासत करते रहे उस जमीन पर आयी बाढ की त्रासदी ने उन्हें बेबस बना दिया है।

ध्यान दें तो एक हजार करोड की मदद के एलान के साथ प्रधानमंत्री मोदी 36 घंटे पहले कश्मीर दौरा कर लौटे। और उसके बाद से पानी में फंसे करीब पचास लाख लोगो के लिये बीते 36 घंटे से वायु सेना के 23 विमान, 26 हेलीकाप्टर राहत के लिये लगे हुये हैं। दस हजार कंबल , तीस हजार टेंट । सौ से ज्यादा नाव। बोरियो में भरकर खाने की व्यवस्था। लेकिन यह सब कुछ शहरी श्रीनगर में ही खप रहा है या कहे राहत घाटी के उन क्षेत्रों से आगे बढ़ा ही नहीं है, जो कश्मीर देश से कटा हुआ है। आलम यह है कि बाढ़ की वजह से रेडियो कश्मीर, श्रीनगर की सेवाएं भी बंद हो गई हैं। लोगों को बचाने पहुंची राहत टीमें ख़ुद बाढ़ में कई जगह फंस फंस कर आगे बढ पा रही हैं।  सारे संपर्क सूत्र कट चुके हैं। यानी एक तरफ कश्मीर की वादियों को पहचान देने वाले हजरत बल, शालीमार निशात बाग, चश्मेशाही सबकुछ पानी पानी है। और त्रासदी का यह नजारा दिखायी भी दे रहा है लेकिन यह कल्पना के परे है कि उन इलाकों में क्या होगा जहा सबकुछ खत्म हो चला है लेकिन वहां ना राहत पहुंच पायी है ना ही कोई कैमरा। अनंतनाग, कुलगाम पुलवामा,बडगाम, शोपिया, बारामूला , कूपवाडा यानी करीब 25 से तीस लाख की आबादी। यह पूरा इलाका पानी में है और अभीतक यहा पानी में रेंगती कश्ती भी नहीं पहुंची है और आसमान में मंडराते 26 हेलीकाप्टर भी नहीं। अनंतनाग की वानपोह, डायलगाम, नौगाम, शीर, सरीखे टाउन में तो हालात कही ज्यादा बदतर होने की खबर है। यह सभी बहुल बस्तियां है और यह इलाके हस्तकरधा की पहचान वाले क्षेत्र हैं। लेकिन बाढ की त्रासदी में सबकुछ बर्बाद हो चुका है। कूपवाडा की लोलाब वैली। पुलवामा का पंपोर, तराल,काकापोरा । शोपिया का तो जिला अस्पताल ही पानी में है। इन इलाको के करीब साढे तीन लाख आबादी तक राहत की कोई लकीर नहीं पहुंची है। वहीं नया खतरा दक्षिण कश्मीर से पानी बहकर मध्य कश्मीर के तरफ आने का हो चला है।  श्रीनगर तो पानी से घिरा हुआ है, वहा हालत बहुत ख़राब है। लेकिन अब पानी सोपोर में पहुंचने के आसार है जिससे झेलम का स्तर और बढ़ जाएगा और पूरे शहर के डूबने का ख़तरा भी मंडराने लगा है।लेकिन कश्मीर की त्रासदी तो उस लाइन आफ कन्ट्रोल पर है जिसे लेकर भारत पाकिस्तान के बीच चार बार युद्द हो चुके हैं। और हर बार सारा विवाद लाइन आफ कन्ट्रोल पर ही आ टिका है। गोलियों और घमाके ने लाइन आफ कन्ट्रोल के आर पार खडी सेना को कई मौकों पर आमने सामने ला खड़ा किया।

लेकिन पहली बार बाढ़ के जरीये प्रकृतिक आपदा की ऐसी तस्वीर लाइन ऑफ कन्ट्रोल पर ही उभरी कि सबकुछ पानी पानी हो गया। क्या इस पार क्या उस पार। दोनों तरफ त्रासदी का ऐसा मंजर है कि पहली बार दोनों ही देशों के प्रधानमंत्रियो ने एक दूसरे को मदद देने की गुहार लगा दी। हालात दोनों तरफ के हैं कैसे यह इससे भी समझा जा सकता है कि बारी बारिश, नदियो में उफान, बाढ और भूस्खलन से मौतों की तादाद हो या बेघर लोगों की त्रासदी। लाइन ऑफ कन्ट्रोल के इसपार का पानी हो या उसपार का पानी सभी उन्हीं नदियों की तबाही से निकला मंजर है जो कश्मीर की जननी है। झेलम हो या नीलम। रावी हो या चेनाब। हर नदी के उफान ने दोनो तरफ तबाही फैलायी है। यहां 200 से ज्यादा मौतें हुई है तो पीओके में 183 । इस पार तीन लाख लोग प्रभावित हुये है तो उसपार 28 हजार प्रभावित हुये है। इस पार तीन हजार करोड़ का नुकसान हो चुका है तो उसपार 600 करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है। बेघरों की तादाद की जानकारी दोनो तरफ नहीं है लेकिन सेना का जरिये इस पार बीस हजार बेघर है तो उसपार 16 हजार बेघर । पुनर्वास कैसे हो इसका इंतजाम अभी तक किया नहीं जा सका है। बावजूद इसके छिटपुट व्यवस्ता तले इसपार पुनर्वास शिविर में तीन हजार पहुंचे है तो उसपार पुनर्वास शिविर में 700 लोग हैं। पीओके में सैकड़ों मकान ध्वस्त हो चुके हैं।  हजारों लोगों के सामने पीओके में सवाल खड़ा हो गया है कि उनके लिये टेंट तक नहीं पहुंचे। कंबल, दरिया कुछ भी नहीं है। लेकिन त्रासदी ने एलओसी को भी अपनी गिरप्त में ले लिया है । सुरक्षा के कई पोस्ट बह गये हैं। खतरा यह भी मंडरा रहा है कि उस पार से कहीं आतंकवादी इस त्रासदी का लाभ उठाकर कश्मीर में घुस ना आयें। लेकिन पहली बार जमी के जन्नत के आस्त्तितव पर खतरा मंडरा रहा है और दिल्ली हो या इस्लामाबाद श्रीनगर हो या मुज्जफराबाद सोचा कभी किसी ने नहीं कि ऐसी प्रकृतिक विपदा आयेगी तो निपटेंगे कैसे और कोई तंत्र क्यों नहीं है इसपर हर कोई खामोश है। लेकिन जिस हालात में कशमीर अभी खड़ा है कल्पना कीजिये जब पानी उतरेगा उसके बाद के मंजर को देखने के लिये कौन तैयार है!

Friday, September 5, 2014

भ्रष्टाचार के सत्ताधारी नैक्सेस को कौन तोड़ेगा

एक लाख 70 हजार करोड़ का 2 जी घोटाला और 1लाख 86 हजार करोड़ के कोयला घोटाले ने मनमोहन सरकार की सियासी नाव में ऐसा छेद किया की सरकार का सूपड़ा ही साफ हो गया और कांग्रेस इतिहास के सबसे बुरे दौर में जा पहुंची। और इसी दौर में इन घोटालों की जांच कर रही सीबीआई के कामकाज को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को सरकारी तोता कहने में कोताही नहीं बरती। इसलिये 2 जी सपेक्ट्रम और कोयलागेट की जांच को सुप्रीम कोर्ट ने अपनी निगरानी में ले लिया। लेकिन दिल्ली के 2 जनपथ यानी सीबीआई डायरेक्टर के सरकारी घर पर मिलने वालो की सूची ने देश के प्रीमियर जांच एजेंसी सीबीआई के डायरेक्टर को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है। और अब यह सवाल देश के सामने सबसे बड़ा हो चला है कि क्या कोई पद अगर संवैधानिक हो उसे कटघरे में खड़ा करना प्रधानमंत्री के लिये भी मुश्किल है। हालात परखे तो पहली बार भ्रष्टाचार को लेकर जांच कर रही सीबीआई के डायरेक्टर के घर के मेहमानों ने यह तो सवाल खड़ा कर ही दिया है कि देश में सबसे ताकतवर वहीं है जिसके पास न्याय करने के सबसे ज्यादा अधिकार है। कांग्रेस के दौर में चीफ जस्टिस रहे रंगनाथ मिश्र को सियासी लाभ और बीजेपी के दौर में चीफ जस्टिस
रहे सदाशिवम को केरल का राज्यपाल बनाने को भी इस हालात से जोड़ा जा सकता है। पूर्व सीएजी विनोद राय की बीजेपी से निकटता भी इस दायरे में आ सकता है। लेकिन बड़ा सवाल तो सीबीआई डायरेक्टर का है, जिन्हें लोकपाल में लाने के खिलाफ वही सियासत थी जो दागियो की फेरहिस्त से इतर मुलाकातियों की सूची में दर्ज है।

मुलाकातियों के डायरी के इन पन्नो में जिन नामों को जिक्र बार बार है। उनमें 2 जी स्पेक्ट्रम, कोयला खादानों के अवैध आंवटन, हवाला घपले, सरघाना चीटफंड का घपला यानी किसी आरोपी ने सीबीआई दफ्तर जाकर अपनी बात कहने की हिम्मत नहीं दिखायी बल्कि सभी ने दसियों बार सीबीआई डायरेक्टर के घर का दरवाजा खटखटाने में कोई हिचक नहीं दिखायी। फेहरिस्त खुद ही कई सवालो को जन्म देती है। मसलन, कोयला घोटाले में फंसे महाराष्ट्र के दर्डा परिवार के देवेन्द्र दर्डा एक दो बार नहीं बल्कि 30 बार सीबीआई डायरेक्टर से मिलने पहुंचे। तीन कोयला खादान पाने वाले एमपी रुगटा तो 40 बार सीबीआई डायरेक्टर के घर पहुंचे। रिलायंस यानी अनिल अंबानी का नाम भी 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले में आया है तो उसके दिल्ली के एक अधिकारी टोनी पचास बार मिलने पहुंचे। इस फेहरिस्त में हवाला घोटाले में फंसे पूर्व सीबीआई डायरेक्टर एपी सिंह और विवादास्पद मोईन अख्तर कुरैशी भी कई बार सीबीआई डायरेक्टर के घर पहुंचे। खास बात यह भी है कि
चुनाव प्रचार के दौरान तो प्रधानमंत्री मोदी भी मीट एक्सपोर्टर मोईन अख्तर कुरैशी को आरोपो के कटघरे में खडा कर चुके थे और उन्होंने कुरैशी के संबंध 10 जनपथ से भी जोड़े थे। मुश्किल सिर्फ यह नहीं है कि सीबीआई डायरेक्टर के घर कोयलाघोटाले के आरोपियों के अलावा 2 जी स्पेक्ट्रम के खेल में फंसे कई कारपोरेट्स के अधिकारी भी पहुंचे। परेशानी का सबब यह है कि 2013-2014 के दौरान आधे दर्जन से ज्यादा अधिकारियों के नाम सीबीआई डायरेक्टर के साथ मुलाकातियों की फेरहिस्त में जिक्र है जिनके खिलाफ सीबीआई जांच चल रही है। और नामों की फेरहिस्त में देश के वीवीआईपी भी है । यानी देश की जिस जांच एंजेसी को लेकर लोगो में भरोसा जागना चाहिये उस जांच एजेंसी का खौफ ही इस तरह हो चुका है कि हर कोई सीबीआई डायरेक्टर की मेहमाननवाजी चाहती है क्योंकि सीबीआई डायरेक्टर के घर पहुंचे मेहमानों की डायरी के इन पन्नो में सिर्फ दागी नहीं है बल्कि राजनीतिक गलियारे के दलाल भी है राजनेता भी और वीवीआईपी कतार में खड़े खास भी।

तो क्या सीबीआई डायरेक्टर इस देश का सबसे ताकतवर शख्स है जिसके सामने हर किसी को नतमस्तक होना पड़ता है या फिर सीबीआई डायरेक्टर से हर खास की मुलाकात एक आम बात है। क्योंकि नामों की फेरहिस्त में हिन्दुस्तान जिंक के विनिवेश मामले में फंसे वेदांता के अनिल अग्रवाल का नाम भी है। एस्सार कंपनी के प्रतिनिधि सुनील बजाज का भी नाम है जो कंपनी 2 जी मामले में फंसी है। दीपक तलवार का नाम भी है जो राजनीति गलियारे में लॉबिइस्ट माना जाता है। इतना ही नहीं देश के पूर् विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद हो या सेबी के पूर्व अध्यक्ष यू के सिन्हा, पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी के दामाद रंजन भट्टाचार्य हो या दिल्ली के पूर्व पुलिस कमीशनर नीरज कुमार या फिर ओसवाल ग्रूप के अनिल भल्ला या बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता शहनवाज हुसैन। हर ताकतवर शख्स सीबीआई डायरेक्टर के घर सिर्फ चाय पीने जाता है या सीबीआई डायरेक्टर के घर मेहमान बनना दिल्ली की रवायत है। यह सारे सवाल इसलिये बेमानी है क्योंकि खुद सीबीआई डायरेक्टर को इससे ताकत मिलती है। और ताकतवर लोग अपनी ताकत, ताकतवाले ओहदे के नजदीकी से पाते है। क्योंकि सीबीआई डायरेक्टर ही लगातार बदलते रहे और आखिर में यह कहने से नहीं चुके कि अगर सुप्रीम कोर्ट को लगता है कि जांच पर असर पड़ेगा तो वह खुद को अलग कर सकते है। लेकिन यह हालात क्यों कैसे आ गये। यह भी दिलचस्प है। मीडिया में डायरी की बात आई तो सबसे पहले कहा ऐसी कोई डायरी नहीं है। जब पन्ने छपने लगे तो फिर कहा , मैंने किसी को लाभ नहीं पहुंचाया। अब कहा सुप्रीम कोर्ट चाहे तो वह खुद को जांच से अलग कर लेंगे। मुश्किल सिर्फ इतनी नहीं है बल्कि ताकतवर नैक्सेस कैसे मीडिया को भी दबाना चाहता है यह भी इसी दौर में नजर आया क्योंकि मीडिया डायरी के पन्नों को ना छापे, ना दिखाये या सीबीआई
डायरेक्टर एक प्रीमियर पद है इसलिये इसपर रोक लगनी चाहिये। यह सवाल भी सीबीआई डायरेक्टर ने ही सुप्रीम कोर्ट के सामने उठाया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने जब इससे इंकार कर दिया तो फिर सबसे दिलचस्प सच सामने यह आ गया कि जबसे सीबीआई के मेहमानों के नाम सार्वजनिक होने लगे उन 72 घंटों में सीबीआई डायरेक्टर के घर देश का कोई वीवीआईपी चाय पीने नहीं पहुंचा। यानी 2013-14 के दौरान दिल्ली में 2 जनपथ यानी सीबीआई डायरेक्टर का सरकारी निवास जो हर दागी और खास का सबसे चुनिंदा घर था उस घर में जाने वालों ने झटके में ब्रेक लगा दी।

देश में भ्रष्टाचार की असल मुश्किल यही है कि ताकतवर को हर रास्ता कानून की ताकत तबतक देता है जब तक वह कानून की पकड़ में ना आये और इस दौर में जबतक वह चाहे कानून की घज्जिया उड़ा सकता है। क्योंकि ताकतवर लोगों के सरोकार आम से नहीं खास से होते है। और यही नैक्सस इस दौर में सत्ता का प्रतीक बन चुका है। और संसद कुछ कर नहीं पाती क्योंकि वहा भी दागियों की फेरहिस्त सांसदों से नैतिक बल छिन लेती है। और चुनाव के दौर में चुनावी पूंजी को परखे तो ज्यादातर पूंजी उन्हीं कारपोरेट और उघोगपतियों की लगी होती है जो एक वक्त दागी होते है और संसद के जरिये दाग घुलवाने के लिये चुनाव से लेकर सत्ता बनने तक के दौर में राजनेताओं के सबसे करीब हो जाते है!

Sunday, August 31, 2014

मोदी के बौद्ध धर्म का प्रेम और हिन्दुत्व राग के पीछे का सच

नरेन्द्र मोदी यूं ही क्योटो के प्रसिद्द तोजी बौद्ध मंदिर में नहीं गये । और उसके बाद किंकाकुजी बौद्दध मंदिर यूं ही नहीं पहुंचे। और इसी बरस नवबंर में होने वाले सार्क सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी नेपाल जायेंगे
तो यूं ही काठमांडू के बौद्धनाथ या स्वंयम्भूनाथ स्तूप के दर्शन करने नहीं जायेंगे या फिर अमिताभा मोनेस्ट्री के दर्शन करने की इत्छा यूं ही नहीं जतायेंगे। यानी नवंबर में सार्क सम्मेलन के दौराम प्रधानमंत्री मोदी
पशुपति नाथ मंदिर नहीं बल्कि बौद्ध मंदिर जायेंग। और सबसे पहले भूटान यात्रा करने भी प्रधानमंत्री मोदी यूं ही नहीं गये। ध्यान दें तो बौद्ध घर्म का जहां जहां प्रचार प्रसार हुआ और जहां जहां की सरकार बौद्ध धर्म से
प्रभावित रही हैं, प्रधानमंत्री मोदी सभी के साथ एक नया रिश्ता बना रहे है और सेतू का काम बौद्ध धर्म कर रहे हैं। तो यह सवाल नागपुर में आंबेडकरवादियो से लेकर यूपी के मायावती के दलित वोट में भी उठने लगा है
कि प्रधानमंत्री मोदी के बौद्ध प्रेम के पीछे की कहानी बौद्ध धर्म प्रभावित देशों के साथ भारत के रिश्तो को नया आयाम देना है या फिर संघ परिवार के विस्तार के लिये गुरु गोलवरकर के दौर की वह सीख है।  जिसे
राजनीति के आइने में प्रधानमंत्री मोदी उतारना चाह रहे हैं। संघ के पन्नों को पलटे तो १९७२ में सरसंघचालक गुरु गोलवरकर ने ठाणे में पांडुरंग शास्त्री आठवले के निवास पर हुये दस दिन के हुये चिंतन बैठक में इस बात
पर जोर दिया था कि जात-पात, संप्रदाय, भाषा सेउपर उठकर संघ परिवार के विस्तार के लिये सभी को साथ लेना जरुरी है। असर इसी का हुआ कि केरल के दलित चिंतक श्री रंगाहरि आरएसेस के बौद्दिक प्रमुख के पद पर हाल के दिनों तक रहे। और इसी कड़ी में विश्व हिन्दुपरिषद के बालकृष्ण नाईक लंबे समय से दुनियाभर के बौद्ध धर्म को मानने वाले देशो के साथ संपर्क बनाये हुये हैं । और संघ परिवार का भूटान, नेपाल, श्रीलंका ,जापान समेत दर्जनभर देशों के बौद्ध धर्मावलंबी के साथ संबंध बना हुआ है।

लेकिन आजादी के बाद पहली बार संघ परिवार यह महसूस कर रहा है अपने बूते उसकी सरकार बनी है तो संघ की हर उस पहचान को राष्ट्रीयता के साथ जोड़ने का खुला प्रयास भी हो रहा है जिसकी कल्पना इससे पहले की जरुर गयी लेकिन उसे लागू कैसे किया जाये यह सवाल अनसुलझा ही रहा। और चूंकि आरएसएस का प्रचारक रहते हुये नरेन्द्र मोदी ने भी गोलवरकर का पाठ हर प्रचारक की तर्ज पर पढ़ा ही होगा कि विस्तार के लिये जात-पात, वर्ण भाषा संप्रदाय को आडे नहीं आने देना चाहिये। और अब जब नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री तो सियासत साधने के लिये भी गोलवरकर के मंत्र को राजनीतिक जमीन पर उतारने से चूकेंगे नहीं। यानी महाराष्ट्र में रिपब्लिक पार्टी के नाम पर सियासत करने वाले अंबेडकरवादी हो या अंबेडकर का नाम लेकर दलित राजनीति करने वाली मायवती। खतरे की घंटी दोनों के लिये है। पहली नजर में लग सकता है कि मायावती की समूची सियासत ही आज शून्य पर आ खडी हुई है तो वह प्रधानमंत्री मोदी को निशाने पर लेने के लिये जन-धन योजना पर वार करने से चूक नहीं रही है। लेकिन नरेन्द्र मोदी जिस सियासत को साधने के लिये कई कदम आगे बढ़ चुके है, उसके सामने अब मायावती या मुलायम के वार कोई मायने रखेंगे नहीं। क्योंकि राष्ट्रीयता की बिसात पर संघ की उसी सोच को व्यवस्था बनाया जा रहा है जिस दिशा में किसी दूसरे राजनीतिक दल ने काम किया नहीं और आरएसएस अपने जन्म के साथ ही इस काम में लग गया।

वनवासी कल्याण आश्रम जिन क्षेत्रों में सक्रिय है और उस समाज के पिछडी जातियों के जितना करीब होकर काम कर रहा है क्या किसी राजनीतिक दल ने कभी उस समाज में काम किया है। पुराने स्वयंसेवकों से
मिलिये तो वह आज भी कहते मिलेगें कि जेपी के कंघे से राजनीतिक प्रयोग करने वाले बालासाहेब देवरस इंदिरा गांधी के बाद मोरारजी देसाई को नहीं जगजीवन राम को प्रधानमंत्री बनवाना चाहते थे । सिर्फ दलित ही नहीं बल्कि जिस हिन्दु शब्द को लेकर सियासी बवाल देश में लगातार बढ़ रहा है उसकी नींव भी कोई आज की नहीं है। जिस नरेन्द्र मोदी को हिन्दूत्व शब्द के कटघरे में खड़ा किया जा रहा है और अटल बिहारी वाजपेयी का हवाला देकर संघ के प्रचारक का माडरेट चेहरे का जिक्र किया जा रही है क्या १९७४ में लोकसभा में वाजपेयी की दिया भाषण, 'अब हिन्दू मार नहीं खायेगा ' किसी को याद नहीं है। संघ परिवार ने तो वाजपेयी के इस भाषण की करोड़ों कॉपियां छपवाकर देश भर में बंटवायी थीं। यह अलग सवाल है कि १९७७ में विदेश मंत्री बनने के बाद वाजपेयी ने कभी हिन्दु शब्द का जिक्र सियासी तौर पर नहीं किया। लेकिन संघ के भीतकर का सच यह भी है कि देवरस हो या उससे पहले गोलवरकर या फिर देवरस के बाद में रज्जू भैया। सभी ने वाजपेयी को नेहरु की तर्ज पर देश में सर्वसम्मति वाले भाव को पैदा करने को कहा भी और रास्ता भी बताया। क्योंकि हिन्दु शब्द तो संघ के जन्म के साथ ही जुड़ा। हेडगेवार ने खुले तौर पर हिन्दू होने की वकालत की। तो गोलवरकर ने तो हेडगेवार के दौर से संघ के प्रतिष्ठित स्वयसेवक एकनाथ रानाडे को १९७१-७२ में तब प्रतिनिधि सभा से अलग कर दिया जब उन्होने विवेकानंद शिला स्मारक पर काम करते वक्त विवेकानंद को इंदिरा गांधी के कहने पर हिन्दू संस्कृति की जगह भारतीय संस्कृति का प्रतीक बताया।

उस वक्त गोलवरकर यह कहने से नहीं चूके कि राजनीतिक वजहों से अगर हिन्दू शब्द को दरकिनार करना पड़े तो फिर संघ का आस्तित्व ही संकट में है। और इसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता । और गुरु गोलवरकर के जीवित रहते हुये कभी रानाडे प्रतिनिधी सभा का हिस्सा ना बन पाये। लेकिन देवरस ने अपने दौर में राजनीतिक वजहों से ही हिन्दू शब्द पर समझौता किया। जनता पार्टी के अध्यक्ष के तौर पर जब चन्द्रशेखर और मधुलिमये ने देवरस को समझाया कि हिन्दू शब्द पर खामोशी बरतनी चाहिये क्योंकि यह राजनीति जरुरत है तो उस वक्त आरएसएस में बकायदा निर्देश जारी हुआ कि कौई हिन्दू शब्द ना बोलें। दरअसल मौजूदा वक्त में दलित सियासत के उफान पर आने के संकेत हो या हिन्दू शब्द के राजनीतिकरण के तो समझना यह होगा कि मौजूदा सरसंघचालक भी देवरस की ही लकीर के है जो खुद हेडगेवार की लकीर पर चले। और तीनों के दौर में ही राजनीतिक प्रयोग हुये और खुले संकेत उभरे कि राजनीतिक प्रयोग आरएसएस कर सकता है और आरएसएस की राजनीतिक सक्रियता उस अंडर-करेंट को उभार सकती है जो राजनीतिक दलों की
सक्रियता से सतह पर नहीं आ पाती। इसलिये तमाम राजनीति दल जो भी सोचे संघ परिवार के भीतर केन्द्रीय मंत्री नजमा हेपतुल्ला और गोवा के डिप्टी सीएम फ्रांसिस डिसूजा के बयान को अंडर करेंट के सतह पर आने के नजरिये से ही देखा जा रहा है। संघ परिवार के भीतर हर तबके को साथ जोड़ने की कुलबुलाहट कैसे तेज हुई और कैसे समझौते भी किये गये यह बुद्ध को लेकर संघ की अपनी समझ के बदलने से भी समझा जा सकता है। एक वक्त आरएसएस ने बुद्ध को विष्णु का अवतार कहा। लेकिन आपत्ति होने पर बुद्ध घर्म को अलग से मान्यता भी दी । लेकिन जैसे ही हिन्दू शब्द पर सियासत के लिये मुश्किल हुआ वैसे ही राष्ट्रीयत्व की लकीर आरएसएस ने खींचनी शुरु की। असर इसी का है कि संघ के हर संघठन के साथ राष्ट्रीय शब्द जुड़ा। खुद हेडगेवार ने भी हिन्दु स्वयंसेवक संघ नहीं बनाया बल्कि राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ नाम दिया। और हिन्दु शब्द को सावरकर के हिन्दु महासभा से जोडकर यह बहस करायी कि सावरकर के हिन्दु शब्द में मुस्लिम या ईसाई के लिये जगह नहीं है। लेकिन आरएसएस के हिन्दु शब्द में राष्ट्रीयता का भाव है और इसमें हर घर्म-संप्रदाय के लिये जगह है। लेकिन पहली बार गुरु गोलवरकर १९६३ में जब नेपाल गये और लौटकर उन्होंने चीन का नेपाल में बढते प्रभाव पर नेहरु और लालबहादुर शास्त्री को यह कहकर रिपोर्ट भेजी भारत को अपना अंतराष्ट्रीय प्रभाव विकसित करना चाहिये । नेहरु ने कुछ किया या नहीं लेकिन उसके बाद पहली बार गुरु गोलवरकर ने ही हिन्दू शब्द को खुले तौर पर आत्मसात करते हुये विश्व हिन्दू परिषद का निर्माण किया। और मौजूदा वक्त में इसी विहिप से जुडे प्रचारक बालकृष्ण नाईक अमेरिका छोडकर दिल्ली-नागपुर की गलियां नापने लगे और बौद्ध धर्म को सेतू बनाकर संघ के साथ वास्ता बनाने में जुटे हैं। और मोदी ने क्वेटो के जरीये इस रास्ते को फिलहाल बनारस के नाम पर पकड़ा है लेकिन यह रास्ता सियासी तौर पर कैसे दलित राजनीति करने वालो का डिब्बा
गोल करेगा और बीजेपी को कितना विस्तार देगा इसका इंतजार करना होगा।

Tuesday, August 26, 2014

नेहरु मॉडल से आगे मोदी मॉडल

5 लाख 21 हजार करोड़ के बजट वाले योजना आयोग ने 2013-14 में किया क्या यह अपने आप में सबसे बड़ा सवाल है। जबकि योजना आयोग की ताकत इससे भी समझी जा सकती है कि इस दफ्तर में योजना सचिव के अलावा 45 एडिशनल सचिव, 29 डायरेक्टर, 23 वरिष्ट सलाहकार, 18 डिप्टी सचिव और डेढ़ हजार कर्मचारी काम करते हैं। बावजूद इसके बीते दस बरस में कोई उपलब्धि भरा काम योजना आयोग के दफ्तर से नहीं निकला। और ध्यान दें तो सालाना 5 लाख करोड़ के बजट पर बैठे प्लानिग कमीशन को लेकर जनता के बीच अर्से बाद गुस्सा तब फूटा जब पता चला की योजना आयोग ने एक टॉयलेट पर 35 लाख रुपये खर्च कर दिये। और महज 35 रुपये की कमाई वाले लोगो को भी गरीब नहीं माना । असल में योजना आयोग की दुर्गती मनमोहन सिंह के दौर में बद से बदतर हुई । पीडीएस से लेकर मनरेगा और इन्फ्रास्ट्रकचर को टालने से लेकर राज्यों के मांग पर खुली मनमानी बीते दस बरस में देखी गयी। कही कोई सुधार हुआ नहीं और योजना आयोग की मनमानी का आलम यह रहा कि मोंटेक सिंह ने अपने सलाहकारों को ही खुला खेल करने की आजादी दे दी। मसलन इन्फ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में मोटेंक सिंह के सलाहकार गजेन्द्र हल्दिया ने इन्फ्रास्ट्रक्चर की कोई भी योजना पास होने ही नहीं थी। खुद गजेन्द्र हल्दिया योजना आयोग में अधिकारी रहे फिर मोटेंक के सलाहकार हो गये । लेकिन किसी भी काम को कभी अंजाम नहीं दिया जा सका।

हालांकि मनमोहन सिंह के दौर में भी कई कैबिनेट मंत्रियों ने प्लानिंग कमीशन में बदलाव करने की आवाज उठायी लेकिन चिदंबरम, मोटेंक और मनमोहन की तिकडी ने अर्थव्स्था का ऐसा खाका देश के लिये बवनवाया कि आर्थिक तौर पर देश का बंटाधार ही हुआ। शायद इसीलिये यह सवाल खड़ा हो गया है कि 1950 में प्लानिंग कमीशन को लेकर जो नेहरु ने सोचा 2014 में उसे पलटने का फैसला नरेन्द्र मोदी ले रहे है या फिर प्लानिंग कमीशन के जरिये नये सिरे से देश की आंतरिक व्यवस्था को मथने की तैयारी मोदी कर रहे हैं। होगा क्या और आने वाले वक्त में योजना आयोग किस नाम से क्या काम करेगा इसका इंतजार तो करना ही होगा। लेकिन जो सवाल प्रधनमंत्री के जहन में है और आज जिस तरह यशवन्त सिन्हा की अगुवाई में 18 विशेषज्ञ बैठे उसने इसके संकेत तो दे ही दिये कि मौजूदा सरकार को नेहरु मॉडल मंजूर नहीं है।

क्योंकि इतिहास के पन्नों को पलटे को योजना आयोग को लेकर नेहरु की यह सोच सामने आती ही है कि प्रधानमंत्री नेहरु कई बार वित्त मंत्रालय से कई मुद्दों पर टकराये । और जब जब इनके सामने मुश्किल आयी तब तब योजना आयोग के जरिये नेहरु ने काम किया। नेहरु के दौर में चार वित्त मंत्री नेहरु से टकराये और उन्होने इस्तीफा भी दिया। वित्त मंत्री षणमुगम शेट्टी ने 15 अगस्त 1948 को पद छोड़ा। तो वित्त मंत्री जान मथई ने नियोजन मंडल के अधिकार और कार्यप्रणाली के सवाल पर 1950 में पद छोड़ा। वहीं वित्त मंत्री सीडी देशमुख ने 1956 में इस्तीफा दिया। हालांकि तब सवाल महाराष्ट्र राज्य के गठन और आंदोलन बड़ी वजह थी। वहीं वित्त मंत्री वीटी कृष्मामाचारी ने 1958 में इस्तीपा दिया। वैसे वित्त मंत्रियों का प्रधानमंत्री से टकराने का सिलसिला इंदिरा और राजीव गांधी के दौर में भी रहा। याद कीजिये तो मोरारजी देसाई ने 1969 में इंदिरा की आर्थिक नीतियों को लेकर विरोध किया और फिर इस्तीफा दे दिया । वही राजीव गांधी के दौर में वीपी सिंह प्रधनामंत्री से टकराये। और एक सच यह भी है कि मुशकिल दौर में नेहरु से लेकर इंदिरा गांधी और राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री रहते हुये वित्त मंत्रालय संभाला। और ध्यान दें तो प्लानिंग कमीशन के जरीये हर प्रधानमंत्री ने नेहरु के इस मॉडल को ही अपनाया जहां वित्त मंत्रालय से इतर देश में नयी योजना लागू की जा सके। 1951 को लेकर पहली योजना कृषि को विकसित करने पर टिकी थी। और 12 वीं योजना राज्यों को राजनीतिक बजट मुहैया कराने पर ही टिकी रही। लेकिन मोदी मॉडल योजना आयोग के उस नये चेहरे को विकसित करना चाहता है, जहां भविष्य की योजना बने । यानी 2020 का भारत कैसा हो या फिर आरएसएस के सौ बरस पुरे होने पर 2025 का माडल हो क्या इसकी कल्पना के साथ उसे जमीन पर उतारने की दिशा में आयोग काम शुरु कर दें । शाय़द इसीलिये योजना आयोग के नये नामो में भारत भविष्य वेद से लेकर इंडिया फ्यूचररामा तक का नाम लिया जा रहा है।