Friday, April 29, 2016

तो ये है देश का इकनॉमिक मॉडल


गुजरात में पाटीदारों ने आरक्षण के लिए जो हंगामा मचाया- जो तबाही मचायी । राज्य में सौ करोड़ से ज्यादा की संपत्ति स्वाहा कर दी उसका फल उन्हें मिल गया। सरकार ने सामान्य वर्ग में पाटीदारों समेत आर्थिक रुप से पिछड़े लोगों के लिए दस फीसदी आरक्षण की व्यवस्था कर दी। तो विकास की मार में जमीन गंवाते पटेल समाज के लिये यह राहत की बात है कि जिनकी कमाई हर दिन पौने दो हजार की है उन्हे भी आरक्षण मिल गया । यानी सरकारी नौकरी का एक ऐसा आसरा जिसमें नौकरी कम सियासत ज्यादा है । यानी आरक्षण देकर जो सियासी राजनीतिक बिसात अब बीजेपी बिछायेगी उसमें उसे लगने लगा है कि अगले बरस गुजरात में अब उसकी हार नहीं होगी । और इससे पहले कुछ ऐसा ही हाल हरियाणा के जाट आंदोलन का है। आरक्षण इन्हें भी चाहिए था । और आरक्षण की मांग करते हुये करीब 33 हजार करोड़ की संपत्ति स्वाहा इस आंदोलन में हो गई ।
धमकी सरकार गिराने की दे दी गई तो आरक्षण भी मिल गया । लेकिन यह सवाल दोनों जगहों पर गायब है कि नौकरी है कितनी। और जिस जमीन और खेती को गंवाकर आरक्षण की राजनीति के रास्ते देश निकल रहा है उसका सच आने वाले वक्त में ले किस दिशा में जायेगा । क्योकि गुजरात में पटेल समाज की 12 फिसदी खेती
की जमीन विकास ने हडप ली । हरियाणा में जाट समाज की 19 फिसदी जमीन विकास ने हडप ली । देश में किसानों की कमाई में 27 फिसदी की गिरावट बीते 3 बरस में आई है । और अगर आरक्षण के जरीये नौकरियों की चाहत है तो हालात हैं कितने बुरे इसका अंदाजा इससे भी लग सकता है कि गुजरात में 11,0189
रजिस्टर्ड बेरोजगार हैं । तो हरियाणा में 30 लाख से ज्यादा रजिस्टर्ड बेरोजगार है । और देश की अर्थव्यवस्था जिस दिशा में जा रही है उसमें रोजगार बिना विकास का नारा ज्यादा बुलंद है कैसे तो आईये इसे भी समझ
लें ।

देश का असल सच यही है । जहा देश भर में रजिस्टर्ड बेरोजगारों की संख्या 2 करोड 71 लाख 90 हजार है । तो वैसे बेरोजगार जो रोजगार दफ्तर तक भी नहीं पहुंच पाये उनकी संख्या 5 करोड 40 लाख है । और पूरे देश में सरकारी नौकरी करने वाले महज 1 करोड 70 लाख है । यानी जिस वक्त बिना रोजगार विकास के रास्ते मोदी सरकार चल पड़ी है और आरक्षण के मांग के लिये पटेल समाज से लेकर जाट समाज आरक्षण पा कर खुश है उस दौर का सच यह भी है कि बीते 9 बरस में देश में सरकारी नौकरी में 25 लाख नौकरियों की कमी आ गई । लेकिन ऐसा भी नहीं है कि विकास की सोच प्राइवेट नौकरिया पैदा कर रही है । मोदी सरकार
खुश है कि जीडीपी से लेकर निवेश में विकास हो रहा है लेकिन सच तो यही है कि भारत रोजगार रहित विकास की राह पर भारत चल पड़ा है। नौकरी का हाल क्य है-ये समझ लीजिए। देश के प्रमुख आठ कोर सेक्टरों में बीते बरस सबसे कम रोजगार पैदा हुआ । 2015 में सिर्फ 1.35 लाख युवाओं को रोजगार मिला । जबकि
2011 में 9 लाख और 2013 में 4.19 लाख युवाओ को नौकरी मिली थी । यानी जिसवक्त जीडीपी को लेकर सरकार अपना डंका दुनिया में यहकहकर बजा रही है कि दुनिया में छाई मंदी के बीच भी भारत की जीडीपी 7.7 फिसदी है । लेकिन इसका दूसरा सच यह हैकि रोजगार दर फकत 1.8 फीसदी है । हर महीने दस लाख युवा जॉब
मार्केट में कूद रहा है,लेकिन उसके लिए नौकरी है नहीं,क्योंकि एक तरफ सरकारी नौकरियां कम तो दूसरी तरफ निजी क्षेत्र में नौकरियों में सौ फिसदी तक की कमी आ चुकी है ।1996 -97 में सरकारी नौकरी जहां 1 करोड़ 95 लाख थी,जो अब एक करोड़ 70 लाख रह गई हैं । तो केयर रेटिंग के सर्वे के मुताबिक मोदी सरकार के दौर के पहले बरस यानी 2014-15 1072 कंपनियों नसिर्फ 12,760 जॉब पैदा किए । जबकि , 2013-14 में 188,371 नौकरियां निकली थी।तो क्या डिजिटल इंडिया से लेकर मेक इन इंडिया और स्टार्टअप इंडिया तक
मोदी सरकार की तमाम योजनाएं आकर्षक भले हों लेकिन रोजगार पैदा हो नहीं रहे। तो बड़ा सवाल यही है कि रोजगार रहित विकास का मतलब है क्या? रोजगार पैदा ही नहीं होंगे तो पढ़ा लिखा युवा जाएगा कहां? क्योंकि संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट कहती है कि अगले 35 साल में भारत उन देशों में होगा-जहां रोजगार का भयंकर संकट होना है। और इससे कौन इंकार करेगा कि पेट भरने के लिए रोजगार तो चाहिए ही। लेकिन रोजगार पैदा करने से क्या देश आगे बढता है । क्योंकि विजय माल्या की कंपनियो की फेरहसित को ही समझे तो यूनाइटेड स्प्रिट्स  लिमिटेड , यूनाइटेड ब्रेवरीज लिमिटेड , मंगलोर कैमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स, रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर ,यूबी इंजीनियरिंग लिमिटेड ,यूबीआईसीएस ,बर्जर पेंट , क्रॉम्पटन मालाबार कैमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स ,द एशियन एज, सिने ब्लिट्स सरीखे दर्जनो कंपनियो की ये फेरहिस्त काफी छोटी है । इस फेहरिस्त में देश की छोटी बडी दो हजार से ज्यादा कंपनिया आपको जोडनी होगी जिसमें काम करने वाले लोगो की तादाद 20 लाख पार कर जायेगी । और देश की सत्ता खुश हो जायेगी की भारत विकास की राह पर है । खूब रोजगार पैदा हो रहे है । तो जरा कल्पना किजिये देश के बैको को चूना लगाकर जो विजय माल्या लंदन भाग चुके है और अब वह कह रहे हैं कि भारत नहीं लौटेंगे ।

तो उसी विजय माल्या को बैंकों ने कर्ज दिया . उसी कर्ज से विजय माल्या ने कंपनियां खोली । उन्हीं कंपनियों में करीब एक लाख युवाओं को रोजगार मिले । और उसी रोजगार को देश के विकास से जोड़ा गया । और अब जब माल्या का सबकुछ लूट-लूटा चुका है तो सारी कंपनिया बंद हैं । सारे रोजगार खत्म हो चले हैं । तो मनमोहन सिंह के दौर के किंग ऑफ गुड टाइम्स मोदी सरकार के दौर में भगौडा बन चुके हैं । लेकिन सवाल वही उलझा है कि क्या देश के पास कोई इक्नामिक माडल नहीं है । क्योंकि मनमोहन सिंह के इक्नामिक माडल में विजयमाल्या हर बरस दो-चार कंपनियां.खोल रहे थे । मार्च 2012 में 6185 कर्मचारी काम करते थे । करीब 80 हजार से एक लाख लोगों को माल्या ने रोजगार दिया था । और माल्या के यूबी ग्रुप में कर्मचारी का औसत वेतन 2,28,258 रुपए से 8,85,470 रुपए की रेंज में था ।यानी माल्या ने पैसा बनाया तो पैसा बांटा भी। और सच कहा जाए तो पैसा डुबोकर भी पैसा बांटा। क्योंकि-किंगफिशर एयरलाइंस डुबने की स्थिति में माल्या ने सरकारी
बैंकों से यह कहते हुए ही कर्ज लिया कि कंपनी चलेगी तो रोजगार बढ़ेगा। और बैंक भी कर्ज देते रहे। लेकिन-जब कंपनी डूबी तो कर्मचारी सड़क पर आ गए और माल्या राजनीति के रास्ते पैसा लेकर लंदन भागने में कामयाब रहे। तो सवा बड़ा हैं, फर्जी विकास की राह पर देस चल रहा था । अब फर्जी विकास रोका गया तो फर्जी माडल ढह रहा है । फर्जी माडल के ढहने ने देश में रोजगार खत्म कर दिया है । और सवाल वही कि विजय माल्या देश लौट भी आये तो क्या होगा । क्या वह सहारा के सुब्रत राय की तर्ज पर जेल में रहेंगे । या फिर वसूली के उन रास्तो पर सरकार कोई नीतिगत फैसला लेगी । जिससे विदेशी बैंकों में जमा कालाधन वाकई देश लाया जा सके । पनामा पेपर के लीक होने के बाद उन चेहरो पर लगाम कसी जा सके । और 6 हजार से ज्यादा कारोबारियो की पेरहिस्त जिन्होने हजारो कंपनियां खोल कर देश को चूना लगाया । खुद रईसी में रहे उनपर कोई लगाम लगायी जा सके । यानी आरक्षण से आगे देश जा नहीं पा रहा है और नौकरी बगैर विकास की राह परह देश है । और हर कोई मान चुका है कि राजनीति में ही सबसे ज्यादा नौकरी भी है और पावर भी ।

Tuesday, April 12, 2016

पानी के संकट को नहीं इसके धंधे को समझे

तो पानी का संकट भारत के लिये खतरे की घंटी है। क्योंकि दुनिया में जिस तेजी से जनसंख्या बढी और जिस तेजी से पानी कमा उसमें दुनिया के उन पहले देशों में भारत शुमार होता है, जहां सबसे ज्यादा तेजी से हर नागरिक के हिस्से में पानी कम होता चला जा रहा है। आलम यह है कि आजादी के वक्त यानी 1947 में 6042 क्यूबिक मीटर पानी हर व्यक्ति के कोटे में आता था। जो कम होते होते 2001 में 1816 क्यूबिक मीटर हो गया। तो 2011 में 1545 क्यूबिक मीटर पानी ही हर हिस्से में बचा । और आज की तारीख में यानी 2016 में 1495 क्यूबिक मीटर पानी हर व्यक्ति के हिस्सा का है। लेकिन विकसित होते देशों के कतार में भारत ही दुनिया का एक ऐसा देश है जहां पानी का कोई मैनेजमेंट है ही नहीं। यानी उपयोग में लाये जा चुके 90 फीसदी पानी को नदियों में पर्यावरण को और ज्यादा नुकसान करते हुये बहाया जाता है। 65 फीसदी बरसात का पानी समुद्र में चला जाता है। और इसके साथ साथ खेती और बिजली पैदा करने के लिये थर्मल पावर पर भारत की 90 फीसदी जनसंख्या टिकी है। यानी बिजली का उत्पादन बढाने के लिये पानी ही चाहिये । और सिंचाई के लिये बिजली से जमीन के नीचे से पानी निकालने की सुविधा चाहिये। और इस पूरी प्रक्रिया में विकसित होने का जो ढांचा भारत में अपनाया जा रहा है वह पानी को कही तेजी से खत्म कर रहा है। क्योंकि जनसंख्या पर रोक नहीं है । सूखे से निपटने के उपाय नहीं हैं। प्रदूषण फैलाते खाद के उपयोग पर रोक नहीं हैं। डैम और जलाशय के नुकसान पर कोई ध्यान नहीं है। उपजाऊ जमीन पर क्रंकीट खड़ा करने में कोई कोताही नहीं है। फसल बर्बादी से आंखें फेर आनाज आयात करने में कोई परेशानी नहीं है। और पानी से होती बिमारी को रोकने के कोई उपाय नहीं है । यानी भारत का रास्ता पानी को लेकर एक ऐसी दिशा में बढ़ रहा है, जहां खेती की अर्थव्यवस्था भी ढह जायेगी और थर्मल पावर सेक्टर भी बिजली देने में सक्षम महीं हो जायेगी ।

यानी जिस इकनॉमी को नेहरु ने हवाई उड़ान दी। वह इकनॉमी ही नहीं बल्कि देश भी 2050 में उसी इकनॉमी तले खत्म होने के कगार पर होगा क्योंकि 2050 में देश में प्रति व्यक्ति पानी का कोटा 1000 क्यूबिक मीटर से नीचे आ जायेगा । यानी चकाचौंध का वह पूरा ढांचा ही डगमगा रहा है। और चकाचौंध भी ऐसी जमीन पर कि एक तरफ पानी का संकट तो दूसरी तरफ संकट को ही धंधे में बदलने के कवायद। क्योंकि डेढ़ बरस बाद बोतलबंद पानी का धंधा 160 अरब रुपये का हो जायेगा। वह भी तब जब आज के हालात में पानी बेचने की दिशा में जो धंधा अपना चुके हैं। यह आंकडा उसका है। यानी अगले डेढ बरस में पानी का संकट और बढेगा तो तो यह 160 अरब के पानी का धंधा 200 अरब भी पार कर सकते हैं। यानी जो संविधान जीने का अकार हर नागरिक को देता है । उस संविधान की शपथ लेने वाली सरकारें हर नागरिक को मुफ्त में पीने का पानी भी दे पाने में सक्षम नहीं हो पा रही है। और जो पानी दिया भी जा रहा है उसमे भी 60 फीसदी पानी साफ नहीं है । और असर इसी का है कि देश में 72 फीसदी बिमारी साफ पानी ना मिलने की वजह से हो रही है। और इन्हीं बीमारियों के इलाज के लिये देश में स्वास्थ्य सेवा भी मुनाफा वाला धंधा इस तरह बन चुका है कि आज की तारिख में निजी हेल्थ सेक्टर 10 लाख करोड़ रुपये पार कर चुका है। और पानी के इस मुनाफे वाले धंधे से अगला जुड़ाव खेती की जमीन पर कंक्रीट खड़ा करने का है । कोई भी रियल इस्टेट खेती की जमीन इसलिये पंसद करता है क्योंकि वहा जमीन के नीचे पानी ज्यादा सुलभ होता है । और खेती की जमीन को कैसे क्रिकट के जंगल में बदला जाये इसका खेल अगर क्रोनी कैपटलिज्म का एक बडा सच है तो दूसरा सच यह भी है कि कि बीते 10 बरस में 47 फीसदी कंक्रीट के जंगल खेती के जमीन पर खडे हो गये । और कंक्रीट के इस जंगल का मुनाफा बीते दस बरस में 20 लाख करोड से ज्यादा का है । यानी भारत जैसे देश में पानी का संकट कैसे मुनाफे वाले धंधे में बदलता जा रहा है । और इसे ही विकास का अविरल धारा माना जा रहा है । यह वाजपेयी सरकार के दौर में तब कही ज्यादा साफ हो गया जब 2002 में नेशनल वाटर पॉलिसी में सरकार ने पानी को निजी क्षेत्र के लिये खोल दिया । यानी जल संसाधन से जुड़ी परियोजनाओं को बनाने, उसके विकास और प्रबंधन में निजी क्षेत्र की भागीदारी का रास्ता खुलते ही पानी से बाजार में मुनाफा कमाने की होड़ में कंपनियां टूट पड़ीं। जबकि इसी दौर में सरकार पीने का पानी उपलब्ध कराने के अपने सबसे पहले कर्तव्य से ही पीछे हटती चली गई। नतीजा यह हुआ कि आज भी साढ़े सात करोड़ से ज्यादा लोगों को पीने का साफ पानी उपलब्ध ही नहीं है । करोडो रुपयो के विज्ञापन इसपर फूके जा रहे है कि बोतलबंद पानी का कोई मुकाबला नहीं है। लेकिन सच यह भी है कुकरमुत्ते की तरह बोतलबंद पानी बेचने वाली कंपनिया उग तो आई लेकिन उसमें भी कीटनाशको की मिलावट है । और यह सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरमेंट की रिसर्च में सामने आया । यानी मानकों से कोई लेना देना नहीं। बीते साल नवंबर में मुंबई में 19 ऐसी कंपनियों पर रोक लगाई गई थी। और सूखे के बीच ही इस आखरी सच को भी जान लीजिये कि एक लीटर बोतलबंद पानी तैयार करने में पांच लीटर पानी खर्च होता है। तो सरकार के पास कोई नीति है नहीं इसलिये कैबिनेट की बैठक हो या आल पार्टी मीटिंग या सूखे पर चर्चा हो या पानी के संकट पर सरकार चर्चा करें । सभी के सामने वही बोलतबंद पानी होता है। जिसका धंधा अरबों-खरबों में पहुंच चुका है।

Sunday, April 10, 2016

नक्सलबाड़ी से जंगलमहल

बंगाल में सत्ता परिवर्तन के लिये "युद्ध क्षेत्र" होना चाहिये


साल की पत्तियों को जमा करते हैं । पांच पत्तियों को जोडकर प्लेट थाली जितना बड़ा बनाते हैं । फिर उसे धूप में सुखाते हैं । और सूखने के बाद सौ सौ के बंडल बनाते हैं । फिर सौ सौ के दस बंडल मिलाकर कर बेचते हैं । और इसकी कीमत मिलती है सौ रुपया । इसे करने में तीन दिन लग जाते है । और कोई काम तो जंगल में है नहीं । चिडिया पकड़ने के लिये इस तरह लकड़ी के छिलके को धागे से बाध कर बनाते हैं । रात में पेड़ पर लटकाते हैं तो सुबह दो चिड़िया तो फंस ही जाती है । जंगल में घूम कर सूखी लकड़िया जमा करते हैं । जिससे खाना बनाने के इंतजाम हो जाये । ममता दीदी ने यह राशन कार्ड बनवा दिया है । जो हमारे जिन्दा होने की निशानी भी है और जिन्दा रहने की जरुरत भी । क्योंकि इसी से दो रुपये किलो चावल मिलता है । हर हफ्ते छह किलों चावल और
आधा लीटर घासलेट । जिन्दगी जीने की यह कहानी उसी जंगलमहल के आडवडिया गांव की है । जिस जंगलमहल के सैकड़ों गांव की आग ने ममता बनर्जी को पांच बरस पहले सत्ता दिला दी । जंगलमहल के तीनों जिलों पश्चिमी मिदनापुर, पुरुलिया और बांकुरा के किसी भी गांव में घुसकर , किसी के घर के आंगन में खटिया पर बैठकर कुछ देर सुस्ता लीजिये तो ममता बनर्जी की सत्ता पाने की अनकही कहानी आपके आंखो के सामने रेंगने लगेगी । और वामपंथी सत्ता के खिलाफ हिंसक आंदोलन की शुरुआत कैसे हुई । उन तारीखो को अब भी ममता के साथ जुड चुके माओवादियो को याद है । क्योंकि उस दौर में संघर्ष और मौजूदा वक्त में सत्ता का सुकून कुछ माओवादियो को परेशान करता है । तो कुछ माओवादियो को सुकून देता है । यह हालात ठीक वैसे ही है जैसे कभी नक्सबाडी में कांग्रेस की सत्ता के खिलाफ माओवादी खडे हुये थे और सत्ता परिवर्तन के बाद सीपीएम ने हर उस माओवादी को निशाने पर लिया जिसने वाम सत्ता से जुडने से इंकार कर दिया । अंतर इतना ही है कि 1970-72 के बीच नक्सबाडी में माओवादियों का खून ज्यादा बहा । और 2011-13 के बीच जंगलमहल में माओवादियों के खिलाफ मामले ज्यादा दर्ज हुये । कानूनी फाइले ज्यादा बनी। और जो ममता के साथ जो आया उसकी फाइले बंद हुई । दर्ज मामले वापस लिये गये ।

जहां  ममता पर भरोसा कम है वहां माओवादी ममता बनर्जी के साथ आकर भी हथियार अपने पास छुपाये
हुये है । कि पता नहीं कब इसकी जरुरत पड़ जाये । लेकिन 2016 के विधानसभा चुनाव ने पहली बार उन हालातों को सामने नक्सलबाडी से लेकर जंगलमहल तक के ग्रामीण आदिवासियों के सामने ला खडा किया है जहां वह इस सच को समझने लगे है कि 50 बरस पहले काग्रेस के खिलाफ वामपंथियों ने नही नक्सलियो ने संघर्ष किया था। और उसी संघर्ष को राजनीतिक ढाल बनाकर सीपीएम सत्ता में आई । और 50 बरस बाद सीपीएम के खिलाफ ममता ने भी माओवादियो के संघर्ष को अपना राजनीतिक ढाल बनाया और सत्ता में  गई । इसीलिये 2016 के चुनाव प्रचार के बीच 7 अप्रैल को जब सिलिगुडी में प्रधानमंत्री मोदी रैली करने पहुंचते हैं तो भीड़ के बीच में 78 बरस के बेटे प्राण सिंह भी मिल जाते है । जो बात बात में यह बोलने से नहीं चूकते कि नक्सलबाड़ी ही आखिरी रास्ता है । क्योकि तब और अब के हालात में अंतर सिर्फ इतना आया है कि तब सत्ता का चरित्र साफ दिखायी देता था और अब सत्ता ने बहुत सारे तंत्र को अपने अनुकूल बना लिया है । और तंत्र में जुड़े लोग नौकरी करते हुये । सत्ता को ही जनता का नुमाइंदा करने वाला मानते है । प्राण सिंह उसी धनेश्वरी देवी के बेटे है जिन्हे 24 मई 1967 में पुलिस ने मारा था । उस वक्त कुल नौ माओवादी मारे गये थे । और उसके बाद ही नक्लबाडी संघर्ष की शुरुआत हुई थी । खुद प्राण सिंह ने 1967 में बंदूक उठायी थी । लेकिन अब वह साफ कहते है बदलाव बंदूक से नहीं विचारधारा से आयेगा । और नक्सलबाडी विचारधारा थी । लेकिन हालात कैसे बदल गये इसका एहसास चुनावी गहमा गहमी में अगर कांग्रेसी उम्मीदवार के पीछे खडे वामपंथियों को देखकर समझा जा सकता है तो बीजेपी दफ्तरों को सुरक्षा देती तृणमूल कांग्रेस से भी समझा जा सकता है ।  और इसके सामानांतर नक्सलबाडी के आंदोलन को खड़ा करने वाले जंगल संथाल की पत्नी नीलमणि के तील तील मरने वाले हालात कोई पूछने वाला नहीं से देखकर भी समझा जा सकता है । नीलमणि भूलने वाली बीमारी से ग्रसित है और घर में कोई संभालने वाला नहीं है तो अधनंग-अधमरी हालत में घर की चौखट पर दिनभर पडी रहती है । और जंगलसंथाल के घर से सटे कानू सन्याल के घर को देखती शांति मुंडा है तो अस्सी पार लेकिन उनके भीतर बदलाव की ललक अब भी धधकती है । महिला विंग की कमांडर रह चुकी शांति मुडा का अब भी मानना है कि ‘नक्सलबाडी” कहीं गलत नहीं था । हां उस वक्त चीन के चैयरमैन को हमारे चैयरमैन कहना गलत था । तो गलती तो होती है । लेकिन जब किसान-मजदूर आदिवासी भूखे मरने लगेंगे तो फिर कौन सा रास्ता बचेगा । शांति मुंडा का मानना है कि सत्ता ही नहीं बल्कि मौजूदा वामपंथियों के पास कोई इकनॉमिक माडल नही है । जिससे देश में हर किसी को दो जून की रोटी मिल सके । और राजनीति दे जून की रोटी छीन कर ही रईसी का नाम है । इस लिये वह सत्ता बंदूक की नली से निकलती है के नारे पर चोट करने वालो पर यह कहकर चोट करती है कि नक्सेबाजी  में वामपंथियों ने अपना उम्मीदवार क्यों खडा नहीं किया । कांग्रेसी उम्मीदवार को वामपंथी क्यों समर्थन कर रहे है ।

वैसे खास बात यह भी है कि जंगलसंथाल और कानू सन्याल के गांल हंसदिया को बीजेपी सांसद अहलूवालिया ने गोद लिया है। और शांति मुंडा के मुताबिक अहलूवालिया उनसे मिलने भी आये थे । और कह गये थे कि बुलेट से नहीं बेलेट से सत्ता चलती है तो पिर गांव की सड़क पर एक रोड़ा तक क्यों नहीं गिरा । और शांति मुंडा के इसी सवाल पर जब हमने अहलूवालिया से पूछा तो उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी किसी योजना को लीक होने नहीं देती । और बीडीओ से लेकर कलेक्टर तक तो ममता से डरता है कही बीजेपी सांसद से बात करने की जानकारी लीक ना हो जाये । तो इस खौफ में कोई काम के होगा । कह सकते हैं हर किसी के सवाल दूसरे के सवालों से टकराते हुये ही दिखते हैं । लेकिन नक्सलबाडी अगर राजनीतिक तौर पर वामपंथियों की प्रयोगशाला के तौर पर रही । तो बंगाल का दूसरा सच जंगलमहल है । जहा सत्ता बदलने के महज पांच बरस बाद ही नक्सलबाडी की तर्ज पर सवाल है । क्योंकि ममता बनर्जी ने उन माओवादियो को बदल दिया जो सत्ता में समा गये । सालबानी के विधायक जो इस बार भी टीएमसी के टिकट पर चुनाव लड रहे हैं उनकी जिन्दगी ममता ने बदल दी । यह अलग बात है कि किशनजी के साथ रहते हुये वह जंगलमहल की जिन्दगी बदलने की बात करते थे । जिस वक्त श्रीकांतो महतो जंगल महल के लिये संघर्ष कर रहे थे । तब उनके जहन में ग्रामीण आदिवासी की जिन्दगी में परिवर्तन लाना था । लेकिन ममता ने उन्हीं 2011 में सालबानी से टिकट दिया और चुनाव जीतने के बाद जो श्रीकांतो महतो साल के पत्तो पर खाना खाते थे । वह विधायक श्रीकांतो महतो करोड़पति बन गया । और जो माओवादी मनोज महतो पांव में गोली लगने से घायल गो गया वह ममता की सत्ता तले जीने को बिना किसी पद भी मजबूर हो गया क्योकि पुलिस जब उसे दौडाती तो वह कहा भाग कर कहा जाता और कैसे संघर्ष करता । ऐसे अनकहे सच जंगलमहल के बेलपहाडी से लेकर कांटा पहाडी और सालबानी से लेकर लालगढ में पटे पडे है । लेकिन चुनाव के वक्त पहली बार सत्ता से सटे माओवादी जब यह सवाल उठाते है कि बंगाल में सत्ता परिवर्तन की नींव सिंगूर या नंदीग्राम से नहीं बल्कि तत्कालीन सीएम बुद्ददेव भट्टचार्य  को बारुदी सुरहग से उडाने की घटना से पड़ी । यानी लालगढ से  शुरुआत हुआ तो ममता की राजनीति के उलझे तार खुद ब खुद खुलते चले जाते हैं । क्योंकि टीएमसी कैडर बन चुके माओवादी बकायदा तारीख सहित बताते हैं कि 2 नवंबर 2008 को पश्चिमी मिदनापुर में लालगढ की सीमा के करीब से जा रहे बुद्ददेव भट्टचार्य को बारुदी सुरंग से उडाने का प्लान मई-जून से ही बनने  गे था । क्योंकि जिंदल की फैक्टरी का उद्घाटन करने बुद्ददेव जायेंगे और किस रास्ते से जायेंगे । इसका जानकारी के बाद जंगल महल से गुजरते रेलवे पटरी से ही तार बिछा कर नेशनल हाइवे तक लायी गई थी । और जब बुद्ददेव बच गये तो उसके बाद से पुलिस और सीपीएम कैडर ने समूचे लालकगढ को खंगालना शुरु किया । और एक माओवादी के घर तक पुलिस पहुंची । जहा चीताभाई मूर्मू को मारा –पीटा गया । और उस घटना ने गांव वालो के भीतर गुस्सा बढाया तो सीपीएम कैडर ने हथियारों के साथ मौर्चा संभाल लिया ।

इस घटना से लेकर 2010 में जब लालगढ के नेताई गांव में जब सीपीएम हथियारबंद कैडर हरमत वाहिनी ने नौ लोगों को मारा तो उस घटना ने बंगाल में सत्ता परिवर्तन की नींव पुखत्क र दी । क्योकि पहली बार बंगाल पुलिस और सीपीएम कैडर के बीच लकीर कैसे मिट चुकी है य.ह साफ साफ दिखायी देने लेगा । और ममता बनर्जी ने राजनीतिक तौर पर माओवादियो के समूचे संघर्ष को ही साधना शुरु कर । वजह भी यही है टीएमसी सांसद शुभेन्दु अधिकारी शुरु से जंगलमहल के हालातो से दो चार हो रहे थे । तो वही आज की तारिख में ममता बनर्जी और टीएमसी में शामिल हुये माओवादियों के बीच कडी है । और सीपीएम की हरमद वाहिनी से दो दो हाथ करने
वाले माओवादियों को साथ खडा कर ममता बनर्जी ने अपना राजनीतिक घेरा ठीक उसी तरह बढाया और मजबूत किया जैसे 1970-72 के दौर में वामपंथियों ने नक्सलबाडी में बनाया था । तो सिर्फ तरीका ही नहीं बल्कि वैचारिक तौर पर भी वामपंथियों से लेकर ममता बनर्जी ने अपने पने राजनीतिक बिसात पर प्यादा वाम
सोच को ही बनाया । इसलिये नक्सलबाडी में घूमते हुये आप आज भी मार्क्स, लेनिन, चिन ली पाओ से लेकर माओ तक की प्रतिमा देख सकते हैं । तो जंगलमहल के पश्चिमी मिदनापुर के शहरी बाजार के सबसे व्यस्तम चौराहे पर कार्ल मार्क्स की प्रतिमा भी आपका स्वागत करेगी । और तस्वीरो की नींव बुलंद दिखायी दे इसके लिये ज्योति बसु ने लाल पत्थर कटवाया । तो ममता ने लाल पत्थर के सफेद-नीले से रंग कर इस एहसास को जंगम महल में जगाया कि तृणमूल कांग्रेस वाम से भी ज्यादा वाम है । लेकिन अतीत के हालातो का ककहरा दोनों भूल गये हैं तो यह भी भूल गये कि बंगाल में सत्ता परिवर्तन के लिये एक “ युद्द-क्षेत्र “हमेशा चाहिये । और 2016 के विधानसभा चुनाव के वक्त ना तो 1967 वाला नक्सलबाडी है,  ना ही 2011 का जंगल महल सरीखा कोई “ युद्द-क्षेत्र “ है । सिर्फ ढहते मूल्यों की सियासत को लेकर गुस्सा है । इसलिये सिर्फ पांच बरस में वाम और  ममता में कोई अंतर किसी को नजर आ नहीं रहा है ।

Thursday, March 31, 2016

कोलकत्ता एक ऐसा शहर..........

हुगली नदी किनारे तीस मील की लंबाई में बसा हुआ महानगर कोलकत्ता। खौफ, दशहत अंधेरे और उत्तेजना का शहर । यह शहर द्वंद का है और अनोखे टकराव भरे तर्जुबे का है । यहा रोशन रोशन सड़के और अंधी गलियां है । कहीं दौलत की रेलपेल और एश का नंगापन , तो कही गरीबी बदहाली, बीमारी और भूख है । श्रद्दा और अंधविश्वासों के तिलिस्मी महल भी है और भाले की नोंक की तरह सीने में उतरती हुई झुग्गियां भी है । एक तरफ दूर तक फैला हुआ लंबा-चौडा मैदान जो तकरीर और तफरीह के शौकिन चेहरो की छलकती हुई भीड के भर जाने से और भी फैला नजर आता है , तो दूसरी तरफ दरबो जैसी खोलियों में सूखे ईधन जैसे बेरौनक जिस्मो के अंबार । जहा ना उजाला है ना हवा । और ख्वाइशों ने किसी के लिये गुंजाईश नहीं छोड़ी । और इस शहर में अगर कोई पुल ढह जाये । ऐसा पुल जिसपर गाडियां नहीं रेंगती बल्कि पुलों के नीचे जिन्दगी आबाद रहती है । तो असे महज हादसा या दुर्घटना नहीं कहा जा सकता । बल्कि खुले आसमान तले रहने वालो के सिर पर ही आसमान के गिर जाने सरीखा है । फिर कोलकत्ता ऐसा शहर है जिसे देखकर किसी को टोक्यो तो किसी को लंदन और किसी को न्यूयार्क याद आ ही जाता है। लेकिन सच यही है कि हर नजर ने कोलकत्ता को अपने नजरीये से ना सिर्फ देखा बल्कि उसे एक नाम भी दे दिया । किसी ने सीटी आफ जाय कहा । तो राजीव गांधी ने कोलकत्ता को डाईंग सिटी कहा था । लेकिन चर्चिल ने कोलकत्ता को देखर अपनी मां से कहा था , " ये एक अजीम शहर है । और रात की ठन्डी हवा और सुरमई धन्ध में यह लंदन जैसा दिखाई देता है । " तो 1863 में ब्रिटिश संवाददाता सार जार्ज ट्रेविलियन ने लिखा, "कलकत्ते से ज्यादा उदासिन बस्ती दुनिया की चारो दिशाओ में और कोई नहीं । " किपलिंग ने कलकत्ते को , "खौफनाक और डरावनी रातो का शहर कहा था । " वायसराय राबर्ट क्लाइव ने कलकत्ते को , "कायनात की सबसे बुरी बस्ती करार दिया । " तो विलियम हंटर ने एक रात अपनी मंगेतर को जो मुहब्बतनामा भेजा उसके लफ्जे में कलकत्ते का जिक्र कुछ यू था । " तसव्वुर करो उन तमाम चीजों का , जो फितरत में सबसे शानदार है । और उसके साथ साथ उन समाम अनासिर का जो तामीर के फन में सबसे ज्यादा हसीन होते है । फिर तुम अपने आप कलकत्ता की एक धुंधली सी तस्वीर देख लोगी । और 1827 में गवर्नर जनरल के सामने अपने पेंशन का मुद्दमा लेकर गालिब भी कलकत्ता पहुंचे थे और गालिब कलकत्ते पर आशिक हो गये थे । गालिब ने लिखा भी , "कलकत्ता का जो जिक्र किया तूने हमनशीं / इन तीर मेरे सीने में मारा कि हाय हाय / वह सब्जाजार हाए मुतर्रा कि है गजब / वह नाजनी बुताने-खुद आरा कि हाय हाय "

कुछ मायनो में कलकत्ता की कहानी हिन्दुस्तान की कहानी है , बल्कि तीसरी दुनिया की एक मुख्तसर तस्वीर । ये तस्वीर बताती है कि साम्राज्य क्यो और कैसे वजूद में आये । कलकत्ता की कहानी औघोगिक क्रांति की कहानी है । कलकत्ता की कहानी दुनिया के मजदूरो को एक करन सत्ता बदलने की कहानी है । कलकत्ता की कहानी राजनीतिक शून्यता को संघर्ष के आसरे भरने की कहानी है । इसीलिये कलकत्ते में पुल ढहा तो राजनीति कही तेजी से ढहती और खडी होती दिखी । यानी कैलकटा...कलकत्ता....कोलकाता... । तो इस दौर में नाम बदला लेकिन मिज़ाज नहीं...। यही है कोलकाता की ख़ूबी...। कहा जाता है कि शहर में चमक और सफ़ाई देखनी है तो दिल्ली जाएं....। मशहूर और रईस देखने हैं तो मुंबई का रुख़ करें। लेकिन शहर में रूह महसूस करनी है तो कोलकाता आएं....। माना ये भी जाता है कि कोलकाता की रूह बसती है...वहां की भीड़ में। और इसी भीड़ भरे कोलकाता की हलचल तबदील हो गई एक कोहराम में जब शहर की जान माने जाने वाले बड़ा बाज़ार में एक फ्लाई ओवर निर्माण के दौरान ही ढह गया। कोलकाता में कोहराम....की वजह यक़ीनन फ़िलहाल गिरा हुआ फ़्लाई ओवर है...तकलीफ़देह और दिल को दहलाने वाला हादसा। लेकिन इस हादसे की वजहों पर नज़र डालें तो अंदाज़ा मिलेगा कि ये शहर का मिज़ाज ही है जो फ़्लाई ओवर के बनाए जाने की रफ़्तार पर हावी हो गया था। इत्मीनान के साथ आहिस्ता आहिस्ता शहर की भीड़ भरी रफ़्तार के साथ इसका काम भी पूरा किया जा रहा था। 2009 से बनना शुरू हुए इस फ़्लाई ओवर को यूं तो बन जाना चाहिये था साल 2012 में। लेकिन इस बीच सरकार बदल गई लेकिन बदल ना पाई तो इस फ़्लाई ओवर की सूरत। साल 2016 तक फ़्लाई ओवर 65 से 75 फ़ीसदी ही बन पाया। मानो कुछ यूं कि इस फ़्लाई ओवर के बनने या ना बनने से शहर के सुकून भरे भीड़ भाड़ वाले माहौल पर कोई असर ना हो रहा हो।भला कोई असर होता भी तो कैसे क्योंकि कोलकाता राजधानी है उस पश्चिम बंगाल राज्य की....। जहां सियासत भी करवट लेती है बेहद आहिस्ता आहिस्ता। आज़ादी के बाद 10 या 15 नहीं बल्कि लगभग 25 साल तक इस शहर ने कांग्रेस की हुकूमत देखी तो उसके बाद 34 साल लगातार वामपंथी सत्ता के नीचे ये शहर अपने मिज़ाज के साथ इत्मीनान से सांस लेता रहा। कोलकाता में क्यों है भीड़ के बावजूद भी एक इत्मीनान....क्यों है यहां की हलचल में भी एक सुकून। वजह शायद ये है कि इस भीड़ की ज़ुबान यूनिसेफ़ की माने तो दुनिया की सबसे मीठी ज़ुबान बांग्ला है। ऐसी जुबान....जिसने आज़ादी से पहले ढाका से लेकर कोलकाता को एक धागे में पिरोया। वो मीठी बांग्ला जिसने रबीन्द्र नाथ टैगोर के रबीन्द्र संगीत को बांग्लादेश के राष्ट्र कवि नज़रुल इस्लाम के गीतों से जोड़ा। सियासत की जगह बांग्ला जज़्बे को अगर मौक़ा दिया जाता तो कभी सरहदें ना बनती। क्योंकि भद्र बांग्ला ने हमेशा पिरोया चीज़ों को पिरोया है बिखेरा नहीं। लोगों से लेकर इमारत तक। कोलकाता शहर की ख़ूबसूरती में शामिल है....कोलोनियल आर्किटेक्चर से लेकर...नवाबों की हवेलियां....और मॉडर्न अट्टालिकाएं.....। यहा वजह है कि कोलकाता का इत्मीनान हादसों के बीच भी कभी गुम नहीं होगा। क्योंकि मौजूदा दौर के टूटते पुल के सामने आज भी ख़ामोश ख़ड़ा है कोलकाता की संस्कृति को समेटे हावड़ा ब्रिज।

और संकरे शहर की सबसे संकरी गली के बीच में बीते नौ बरस से जिस पुल को बनाने का जद्दोजहद इन हालातो को लेकर चलती रही कि एक खंबा लगे तो 100 परिवारो की नींद में खलल आ जाये । चार पिलर खडे करने हो तो सौकडो मजदूर और बेबस पड़े लोगो की जिन्दगी हराम हो जाये । ऐसे में उस पुल के गिरने का
मतलब होता क्या है । यह सारा नजारा आज खुल कर हर आंखो के सामने आ गया । चलती बस और किनारे खडे ट्रक टैक्सी अगर इसकी चपेट में आये तो पुल की छांव में बैठे रिक्शा और गाथ गाडी खिंचने वाले भी दब गये । लेकिन कल्पना किजिये बडी तादा में पुल के नीचे ही जिन्दगी बसर करने वाले परिवारो का
क्या हुआ होगा । पुल के नीचे परिवार छोड काम पर निकला मजदूर हुगली नदीं किनारे भी मजदूरी कर रहा था और कई मजदूर तो पुल के उपर ही काम कर रहे थे । कितने दबे , कितने मरे । सियासत इसकी गिनती बतायेगा और बता रहा है । लेकिन जो शहर बिना गिनती के जीता हो वहा कितनो की मौत तो किसी कागज पर भी दर्ज नहीं होगी । क्योकि कोलकत्ता का सच यही है कि यहा लाखो लोग खुले आसमान तले पूरी उम्र गुजार देते है । फुटपाथ पर पैदा होते है । जवान होते होते है । बच्चे पैदा करते हैं और मर जाते हैं। यहां गरीबी ऐसे रंग-रुप लेकर साथ लेकर आती है कि बहुतेरे इस नजारे की ताब नही ला सकते । यहां हिंसा है । वहशत है । और टकराव है । दूसरी तरफ तन्जीम है । धीमापन है और घर की चौखट पर उस पुरानी मिट्टी की महक है जो हर शहर से गायब हो चली है । अन हालातो के बीच जिस उलाके में पुल ढहा वह इलाका तो व्यापार और उघोग के एतबार से कोलकत्ता का सबसे बडा इलाका है । कह सकते है चेतना का सबसे बडा केन्द्र बडा बाजार का इलाका । जहा के घरो में आज भी धन्ना सेठ रहते हैं । न्हे फक्र है खुद के भ्दर मानुष होने का । इसीलिये जैसे ही पुल के
गिरने की आवाज आई हर किसी ने पहले अपने घर को टटोला । कोई बाहर तो नहीं । कही कोई पुल की तरफ तो नहीं गया । क्योकि पुल के नीचे मजदूर-साहूकार ही नहीं बसते बल्कि इस पूरे इलाका का शहर यही जीवंत होता है । इसीलिये पुल ढहा तो कोलकत्ता ठहर गया । क्योकि पुल ढहा और सत्ता का भ्रष्टाचार एक ऐसा राज्य में गूजने लगा जो हिन्दुस्तान की पहली रियासती राजधानी थी । और जहा 1967 के चुनाव के बाद 14 सियासी पार्टियों की मिली जुली हुकूमत ने यह एलान किया था कि पश्चम बंगाल के मंत्रियों की हिफाजत के लिये अब पुलिस की दरकार न होगी । सीएम की तनख्वाह 1150 रुपये से घटाकर सात कर दी गई थी । और मंत्रियो का वेतन नौ सो घटाकर 500 रुपये । और तो और जिस कोलकत्ता में लू से सैकडो मौते होती थी वहा सरकारी दफ्तरो से एयरकंडीशन हटाने का फैसला ले लिया गया था । और कलकत्ता के मैदान में जब पहली सभा हुई तो जिक्र किसानो की बदहाली का हुआ था । मजदूरो के हक के सवाल थे । तालिम में सुधार की बात ती । बेजमीन मजदूरो की रोटी के सवाल थे । शहर की दीवारो पर इन्कलाब के नारे थे, " बंगाल के बेटो ! नींद से जागो और दहाडो शेर की तरह । " दुनिया के सबसे ज्यादा बागी छात्र भी यही थे ।और आजादी के बाद दंगे भी बंगाल में ही भडके । और उस वक्त महात्मा गांधी ना होते तो दंगे पूरे देश को अपनी हद में लेलेते । तो मनाईये जब सियासत मैली हो रही है । भ्रष्टाचार राजनीति के दामन से बंध चुका है ऐसे में कोई रोशनी कोलकत्ता
से निकले तो ठीक नहीं तो हर जिस्म पर ऐसे दाग बढते चले जायेगें । और सियासी आरोप प्रत्यारोप में मौत खो जायेगी ।

Tuesday, March 22, 2016

आजादी के संघर्ष के प्रतीकों की परीक्षा

क्या मौजूदा राजनीतिक बिसात पर पहली बार आजादी के संघर्ष के प्रतीक ही दांव पर हैं। क्योंकि एक तरफ भारत माता की जय तो दूसरी तरफ भगत सिंह। एक तरफ बीजेपी का राष्ट्रवाद तो दूसरी तरफ वाम आजादी का नारा । एक तरफ तिरंगे में लिपटा राष्ट्रवाद तो दूसरी तरफ लाल सलाम तले मौजूदा सामाजिक विसगंतियों पर सीधी चोट। तो क्या गुलाम भारत के संघर्ष के प्रतीकों की आजाद भारत में नये तरीके से परीक्षा ली जा रही है। क्योंकि भारत माता कोई आज का शब्द तो है नहीं। याद कीजिये 1882 में बंकिमचन्द्र चटर्जी ने आजादी के संघर्ष को लेकर आनंदमठ लिखी तो आजादी के बाद 1952 में हेमन गुप्ता ने आनंदमठ पर फिल्म बनायी तो उनके जहन में भारत माता की वही तस्वीर उभरी जो रविन्द्रनाथ टैगौर के भतीजे अवनिन्द्रनाथ टैगोर ने बंगाल के पुनर्जागरण के दौर में भारत माता पहली तस्वीर बनायी थी। भारत माता के चार हाथ दिखाये गये थे। जो भारत की समूची सांस्कृतिक विरासत को सामने रख देता। क्योंकि उन चार हाथो में शिक्षा -दीक्षा, अन्न-वस्त्र दिखाये गये। और आनंदमठ भी इन्ही चारो परिस्थितियों को उभारती है। इतना ही नहीं देश में पहली बार किरण चन्द्र चौधरी ने 1873 भारत माता नाम से नाटक किया तो उसमें भी भारत की आजादी के संघर्ष को इस रुप में दिखाया जहा धर्म और संस्कृतियों का मेल हो। गुलामी से मुक्ती और अंखड भारत की पहचान एकजुटता के साथ बने।

इसके सामानांतर आजादी के संघर्ष में भगत सिंह को याद कीजिये तो इन्कलाब के नारे के साथ भगत सिंह ने आजादी के आंदोलन को एक नयी धार दी। कच्ची उम्र में ही भगत सिंह ने अंग्रेजी सत्ता को बंदूक से लेकर विचार और आर्थिक मुद्दों से लेकर साप्रदायिकता तक पर ना सिर्फ राजनीतिक चुनौती दी। बल्कि मार्क्सवादी विचारधारा के तहत विकल्प की सोच भी पैदा की। सिनेमायी पर्दे पर आजादी के तुरंत बाद 1948 में दिलीप कुमार ने तो 1965 में मनोज कुमार ने भगत सिंह की भूमिका को फिल्म शहीद में बाखूबी जीया। यानी भारत माता की तस्वीर हो या इन्कलाब के जरीये भगत सिंह का संघर्ष दोनों ही जिस भी माध्यम के जरीये आजादी के बाद उभरे उसने देश के भीतर लकीर नहीं खिंची बल्कि खिंचती लकीरों को मिटाने की ही कोशिश की। क्योंकि दोनों तस्वीर गुलाम भारत के दौर में आजादी के संघर्ष का सच रही। लेकिन यह दोनों तस्वीरे कैसे आजाद भारत में सत्ता के राष्ट्रवाद और सत्ता से आजादी के नारे तले आकर खडी हो जायेगी यह किसने सोचा होगा। क्योंकि राष्ट्रवाद का प्रतीक भारत माता की जय तो संघर्ष का प्रतीक भगत सिंह। तो क्या आजादी के संघर्ष के प्रतीकों के आसरे मौजूदा राजनीति देश के भीतर आजादी से पहले के भारत के हालात देख रही है। या फिर मौजूदा वक्त में भारत माता और भगत सिंह को दो राजनीतिक विचारधाराओं में बांट कर राजनीति का नया ककहरा गढ़ा जा रहा है। जिससे एक तरफ भारत माता की जय, राष्ट्रवाद के अलघ को जगाये और मौजूदा राजनीति की धारा बने। तो दूसरी तरफ भगत सिंह का इन्कलाब आजादी के संघर्ष की तर्ज पर मौजदा राजनीतिक सत्ता को आजादी के नारे से ही चुनौती देता नजर आये। जाहिर है यह दोनों हालात देश के मौजूदा हालात में कहा और कैसे फिट बैठेगें यह कोई नहीं जानता। ठीक उसी तरह जिस तरह 1967 में नक्सलबाडी से जो लाल सलाम का नारा निकला उसे 2011 में पश्चिम बंगाल की जनता ने ही खारिज कर दिया। और 1990 में अयोध्या आंदोलन के वक्त जय श्रीराम के नारे ही जिस तरह हिन्दुत्व का प्रतीक बन गया । लेकिन आजतक ना अयोध्या में राम मंदिर बना और ना ही जय श्रीराम का नारा बचा। तो फिर भारत माता के आसरे जिस राजनीतिक राष्ट्रवाद को मौजूदा वक्त में खोजा या नकारा जा रहा है, उसका सियासी हश्र होगा क्या यह कोई नहीं जानता। लेकिन भारत में भारत माता के नाम पर दो मंदिर ऐसे जरुर है जो बताते है कि आजादी से पहले और आजादी के बाद भी भारत माता को जिस रुप में देखा-माना गया उस रुप में मौजूदा राजनीति भारत माता को मान्यता नहीं दे रही है। क्योंकि वाराणसी और ॠषिकेश में मौजूद भारत माता के मंदिर के आसरे राष्ट्रवाद के उस सच को भी
जाना समझा जा सकता है जब आजादी को लेकर संघर्ष भी था और भारत माता के लिये जान न्यौछवर करने का जुनून भी था। और दोनों ही मंदिरों की पहचान उस भारत से जुड़ी है संयोग से जिसे मौजूदा सियासी राजनीति ने हाशिये पर ठकेल दिया है।

वाराणसी में भारत माता का मंदिर बनाने की जरुरत तब पडी जब असहयोग आंदोलन की हिंसा ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी तक को हिलाकर रख दिया। उस वक्त देश की एकता और अखण्डता को बनाये रखने के लिए स्वतंत्रता सेनानी शिव प्रसाद गुप्त और आर्किटेक्ट दुर्गाप्रसाद खत्री ने गांधी जी से बात की कि एक ऐसा मंदिर बने जिसमें सभी धर्म और जाति के लोगों की आस्था हो। और 1936 में यह मंदिर बना। जिसमे किसी देवी देवता की नहीं बल्कि अखंड भारत का नक्शा ही भारत माता की पहचान बना। जिसका उद्घाटन 1936 में महात्मा गांधी ने किया । तो ॠषिकेश में भारत माता का मंदिर स्वामी विवेकानंद की भारत के बारे में सोच को लेकर बनाया गया । इसलिये ॠषिकेश के आठ मंजिला मंदिर भारत माता के उन प्रतिको को जीवंत कर देता है । जिसपर आज कोई बहस नहीं होती । पहली मंजिल पर भारत के मानचित्र के साथ दूध और फसल को हाथ में लिये भारत माता की तस्वीर है। तो दूसरी मंजिल से आठवी मंजिल तक भारत की आजादी के संघर्ष। भारत की सांस्कृतिक पहचान । भारत की सभ्यता और हर धर्म के समावेश के साथ प्रकृति को समेटे हिन्दुस्तान की वह तस्वीर है, जो राष्ट्रवाद के मौजूदा पारिभाषा से गायब हो चुकी है। ॠषिकेश के भारत माता मंदिर का उद्घाटन 15 मई 1983 को इंदिरा गांधी ने किया और संयोग देखिये वाराणसी हो या ॠषिकेश दोनों ही जगहों की पहचान मंदिरों के आसरे जुड़ी लेकिन भारत माता मंदिर को बेहद कम लोग जानते हैं। जो जानते भी होंगे वह उस मंदिर तक पहुंच नहीं पाते। लेकिन अब जब देश में भारत माता और भगत सिंह की पहचान किसके साथ किसरुप में जुड़े इसको लेकर ही जब सियासी संघर्ष हो रहा है तो धीरे धीरे यह सवाल देश में ही बड़ा होते जा रहा है कि क्या वाकई राष्ट्र की सीमाओं को अब बांधने का वक्त आ गया है। या फिर राषट्रवाद के नारे तले सारी कश्मकश राष्ट्र के भीतर नागरिकों में ही मची है। क्योंकि मौजूदा राष्ट्रवाद किसी दूसरे देश के खिलाफ नहीं है। बल्कि एक भारतीय का दूसरे भारतीय के खिलाफ का राष्ट्रवाद है । यानी नफरत और कडवाहट है , जो राजनीति से निकली है । इसीलिये इसके दायरे में मुसलमान भी हैं और दलित भी । और कौमों से लेकर जातीय आधार पर राजनीति, सत्ता के लिये खुद में सभी को समेट लेने पर आमादा हैं। और इससे टकराने के लिये जेएनयू में ही पहले राष्ट्रवाद पर शिक्षकों ने खुले आसमान तले छात्रों को पढ़ाना शुरु किया तो अब आजादी को लेकर शिक्षको ने विचारों की नयी सीरिज शुरु की है। और इससे टकराने के लिये सत्ताधारी बीजेपी ने राष्ट्रवाद को ही अपना राजनीति मंत्र बना लिया है। तो फिर इसका अंत होगा कहां ? क्योंकि यह ना तो सम्यताओं के संघर्ष का मामला है । ना ही धर्मो के टकराव का मसला है। और ना ही उस नफरत का जिसकी छांव में पहला विश्वयुद्द हो गया क्योंकि तब सर्बिया के लोगों से ऑस्ट्रियाई मूल के हंगरीवासी नफ़रत करते थे। हंगरीवासियों से रूसी, रूसियों से जर्मन और जर्मनों से फ्रांसीसी नफ़रत करते थे। अंग्रेज़ हर किसी से नफ़रत करते थे। और युद्द की आग भडकी तो हर कोई एक दूसरे पर टूटपड़ा। तुर्क भी और अरब भी । गुलाम भारत और अमरीका भी । लेकिन मौजूदा वक्त में अमेरिका हो या यूरोपिय यूनियन , सभी अपनी सीमाएं और बाज़ार एक-दूसरे के लिए खोल रहे हैं। और भारत का राष्ट्रवाद खुद के ही खिलाफ आ खड़ा हुआ है । क्योंकि राजनीतिक सत्ता सिर्फ संस्धानों से ही नहीं बल्कि संविधान से भी बड़ी होती जा रही है। और समूचा संघर्ष राजनीतिक सत्ता पाने या बचाने का है।

Monday, March 14, 2016

जेएनयू, पीएमओ,मीडिया और विपक्ष नहीं चाहता भ्रष्टाचार देश में मुद्दा बने

आज जब सत्ता का राष्ट्रवाद, जेएनयू के राष्ट्रविरोधी नारे और मीडिया की सही भूमिका के बीच यह सवाल बड़ा होते चला जा रहा है कि सही कौन और गलत कौन । तब जहन में पांच-साढे पांच बरस पहली तीन घटनायें याद आती हैं। पहली बार 18 सितंबर 2010 को तब के पीएम मनमोहन सिंह के प्रिंसिपल सेकेट्री टीके नायर ने हैबिटेट सेंटर के सिल्वर ओक में वरिष्ठ पत्रकारों-संपादकों को कॉकटेल पार्टी दी थी। नवंबर 2010 में राडिया टेप के जरीये पत्रकार दलालों के नाम सामने आये थे। और उसी दौर में जेएनयू के गोदावरी हॉस्टल में शुक्रवार की देर रात पत्रकार प्रांजयगुहा ठाकुरत, साहित्यकार नीलाभ और पुण्य प्रसून वाजपेयी [ लेखक ] को 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले से लेकर राडिया टेप पर चर्चा के लिये निमंत्रण दिया गया था। उस वक्त जेएनयू स्टाइल के सेमिनार[ हास्टल में खाना खत्म होने के बाद खाने वाली जगह पर ही टेबल कुर्सी जोडकर चर्चा ] से पहले गोदावरी और पेरियार हॉस्टल के बाहर ढाबे में हमारे पहुंचते ही हर मुद्दे से जुड़ा सवाल उठा और हर सवाल यहीं आकर रुकता कि संसदीय चुनावी राजनीति और माओवाद की सोच से इतर दूसरी कोई व्यवस्था हो सकती है या नहीं। और हर सवाल का जबाब यहीं आकर ठहरता कि राजनीतिक व्यवस्था ही जब भ्रष्टाचार को आश्रय दे रही है और जबतक देश में विचारधाराओं के राजनीतिक टकराव से इतर क्रोनी कैपटलिज्म के खिलाफ संघर्ष शुरु नहीं होगा तब तक रास्ता निकलेगा नहीं। और रास्ता जो भी या जब भी निकलेगा उसमें छात्रों की भूमिका अहम होगी । खैर, पीएमओ की तरफ से कॉकटेल पार्टी में मुझे भी बुलाया गया था। और हेबिटेट सेंटर में घुसते ही दायीं तरफ सिल्वर ओक में पीएमओ के तमाम डायरेकटरो के साथ पीएम के सलाहकारों की टीम जिस तरह शराब परोस [आफर] रही थी । उस माहौल में किसान-मजदूर से लेकर विकास के मनमोहन मॉडल पर चर्चा भी हो रही थी । और उस वक्त मनमोहन सिंह के डायरेक्टरों की टीम में सबसे युवा डायरेक्टर जो एक वक्त एनडीटीवी में काम कर चुके थे, उनसे हर बातचीत के आखिर में जब वह यह कहते कि, यार अरुंधति स्टाइल मत अपनाओ...पहले तो मुझे खीझ हुई लेकिन बाद में चर्चा के दौर में मुझे यह कहना पड़ा कि शायद मनमोहन सरकार को विचारधारा की राजनीतिक जुगाली पसंद है।

इसीलिये देश के बेसिक सवाल जो इकनॉमी से जुड़े हैं, उसका एक चेहरा वामपंथी सोच तो दूसरा पश्चिमी विकास मॉडल से आगे जाता नहीं है। तो पश्चिमी मॉडल की ही देन है कि सार्वजनिक स्थल पर भी पीएमओ को कॉकटेल पार्टी करने में कोई शर्म नहीं आती। क्योंकि मैंने तब सवाल उठाया कि क्या वाकई भारत जैसे देश में प्रधानमंत्री कार्यालय के जरिए इस तरह सार्वजनिक तौर कॉकटेल पार्टी करने की बात सोची भी जा सकती है । और उस वक्त जेएनयू के अनुभव में यह साफ दिखा कि मनमोहन सिंह की इकनॉमी जेएनयू में एक ऐसा प्रतीक थी, जो चाय की कीमत तले प्लास्टिक के कप और कुल्हड के दौर को खत्म करते हुये भी निशाने पर रहती और घोटालो तले देश को बेचे जाने के सवाल को भी खूब उठाती। और सारे सवाल जेएनयू के भीतर हर ढाबे हर नुक्कड पर होते। जिसमें ढाबेवाला भी शामिल होता । खैर आज जेएनयू में माहौल बहुत बदल गया है ऐसा भी नहीं है। हां, बोलने से पहले एक संशय और हर निगाह में एक शक जरुर दिखायी देने लगा है। लेकिन जेएनयू के भीतर जो सवाल बदल गये हैं, वह भ्रष्टाचार को लेकर गुस्से और राजनीतिक व्यवस्था को ही बदलने की कुलबुलाहट का है। वजह भी यही रही कि उस दौर में राडिया टेप में आये पत्रकारों के लेकर खासा गुस्सा भी जेएनयू में छात्रों नजर भी आता था। लेकिन तब भी जेएनयू बहस की गुंजाइश रखता रहा। और बहस के लिये निमंत्रण भी देता रहा। यह अलग सवाल है कि तब राडिया टेप में नाम आये पत्रकार जेएनयू में जाने से कतराते क्यों रहे। और राडिया टेप को लेकर एक तरह की खामोशी यूपीए सरकार के भीतर नजर आती रही। लेकिन तब के हालात को अब यानी साढे पांच बरस बाद परखने की कोशिश करें तो कई सवाल उलझेंगे। मसलन जेएनयू के भीतर राडिया टेप का सवाल नहीं बीजेपी और संघ पररिवार के जरीये समाज को बांटने या हिन्दुत्व का राग अलापने को लेकर जोर पकड़ चुका है। जमीनी मुद्दे गायब है तो छात्र राजनीतिक संगठनो के प्यादे के तौर पर ही अपनी पहल दिखा रहे है या कुछ भी कहते हैं तो वह राजनीतिक दलों की विचारधारा से जुडता नजर आता है। इसी आधार पर मीडिया के बंटने और बांटने के सवाल हैं। यानी राजनीतिक सत्ता का दायरा हो या सत्ता के विरोध की राजनीति के सवाल इससे इतर कोई भूमिका समाज की हो सकती है यह नजर नहीं आता। यानी समाज में जिन मुद्दों पर एका हो सकती है . दलित-मुस्लिम से लेकर किसान-मजदूर और उंची जाती से जुडे नब्बे फीसद देश के जिन सवालों पर एक खड़े हो सकते हैं, उन सवालों को बेहद महीन सियासत से दरकिनार कर दिया गया है। इसलिये सत्ता के सामने इकनॉमी का सवाल नहीं राष्ट्रवाद का सवाल है। मीडिया के सामने
राष्ट्रवाद या राष्ट्रद्रोह का सवाल है। छात्रों के सामने जेएनयू या रोहित वेमूला तले वैचारिक मतभेद ही संघर्ष का मुद्दा है। तो क्या सारे हालात जानबूझ कर बनाये जा रहे हैं। या फिर देश के भूलभूत मुद्दे संघर्ष खडा ना कर दें, और जनता एकजुट ना हो जाये इसीलिये असल मुद्दों की जड़ पर ना जाकर वैचारिक तौर पर राजनीतिक दल सतही मुद्दों को विचारधारा से जोड़कर देश में राजनीतिक संघर्ष का क अखाड़ा बना रहे हैं। जहां एक तरफ हिन्दुत्व यानी राइट-सेन्ट्रल नजर आये तो दूसरी तरफ वाम सेन्ट्रल हो। और देश के नागरिक भी राजनीतिक दलों की भूमिका तले खुद को बांट लें। तो क्या इसकी सबसे बड़ी वजह वही चुनावी राजनीति है जो भ्रष्टाचार और आर्थिक कारोबार को साथ लेकर चलती है।

ध्यान दें तो देश में विचारधारा के टकराव पर कभी सत्ता बदली नहीं। 1975 में गुजरात में चिमनभाई की कुर्सी के जाने की वजह भी भ्रष्टाचार का मुद्दा बनना था। और जेपी जिस जमीन पर खड़े होकर देश को बांध रहे थे वह इंदिरा गांधी के दौर का भ्रष्टाचार ही था । और आपातकाल एक हद तक भ्रष्टाचार के खिलाफ जनसंघर्ष को दबाने की ही चाल थी। यह समझना होगा कि दिल्ली की सत्ता अयोध्या में राम मंदिर की वजह से सभी नहीं बदली । लेकिन बोफोर्स घोटाले यानी भ्रष्टाचार के मुद्दे को लेकर वीपी सिंह को जनता ने हाथों हाथ लेकर दो तिहाई बहुमत वाली राजीव गांधी की सरकार को भी सत्ता से बेदखल कर दिया। बिहार में लालू यादव को भी भ्रष्टाचार की वजह से जनता ने हराया और नीतीश कुमार सत्ता में आये । यूपी में मायावती भी पिछली बार भ्रष्टाचार की वजह से ही चुनाव हारीं। और केजरीवाल ने भी सियासत पाने के लिये भ्रष्टाचार को ही मुद्दा बनाया । अन्ना का आंदोलन भी जनलोकपाल को लेकर खड़ा हुआ। जिससे संसद तक थर्राई। क्योंकि जनलोकपाल के मुद्दे पर जाति-धर्म या वैचारिक आधार पर जनता को बांटा नहीं जा सकता था । लेकिन ध्यान देने वाला सच यह भी है कि सत्ता कभी भ्रष्टाचार से नहीं लडती और ना ही भ्रष्टाचार मुद्दा बने यह चाहती है। मसलन दिल्ली में ही
श्री श्री रविशंकर के साथ अगर प्रधानमंत्री मोदी खड़े हुये तो दिल्ली के सीएम केजरीवाल भी खड़े हुये। मोदी ने श्री श्री के जरीये हिन्दुत्व को अपने साथ जोड़ा। तो केजरीवाल को भी लगा कि श्री श्री के साथ होकर वह भी
सॉफ्ट हिन्दुत्व की लकीर पर चल सकते हैं। यानी सत्ता में आने के बाद केजरीवाल के लिये भी यह सवाल गौण हो गया कि आखिर देश में किसान मरे या जवान मरे वजह भ्रष्टाचार ही है। और भ्रष्टाचार का सवाल सत्ता से जुड़ा है। तो अब केजरीवाल भी भ्रष्टाचार के मुद्दे से बचना चाहेंगे, क्योंकि चुनावी राजनीति का भ्रष्टाचार हो या चुनावी संसदीय राजनीति का आधार क्रोनी कैपिटलिज्म। भ्रष्टाचार के दायरे को कोई सत्ता राजनीतिक मुद्दा बनने से घबराती है। यानी जिस भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सवार होकर केजरीवाल सत्ता तक पहुंचते है, वह सत्ता केजरीवाल को उसी सिस्टम का हिस्सा बनाने से नहीं चूकती जहां भ्रष्ट संस्थानों के आसरे प्रचार प्रसार।
यह मीडिया को बांट कर अपने मुनाफे में भागेदारी भी हो सकती है और किसी के किसी मीडिया समूह या किस, कारपोरेट को निशाने पर लेकर सत्ता चलाने की सुविधा भी हो सकती है । सत्ता की यह सुविधा समाज को बांटती ही नहीं बल्कि कैसे मुश्किल हालात खड़ा करती है यह यूपी के सत्ताधारी नेता आजम खान के मुस्लिम परस्त बयान के बाद समाज के भीतर मुसलमानों की मुश्किलात से भी समझा जा सकता है। और रोहित वेमुला के जरीये दलित के सवाल उठाने के बाद किसी सामान्य दलित नागरिक के सामने पैदा होने वाली मुश्किल से भी समझा जा सकता है। लेकिन राजनीतिक मशक्कत पहले राजनीतिक जमीन बनाने की है जिससे देश पारंपरिक राजनीति में ही उलझा रहे तो छात्र राजनीति को वैचारिक संघर्ष से जोडने की तैयारी में वामपंथी है और साथ में कांग्रेस भी है। मसलन 16 मार्च को इलाहबाद यूनिवर्सिटी तो 21 को दिल्ली में छात्र संघर्ष को राजनीतिक जमीन पर उतारने की तैयारी हो रही है। और यह मोदी सरकार के लिये फिट मामला है। क्योंकि भ्रष्टाचार का मामला उभारने का मतलब है हर तबके के भीतर की बैचेनी को उभार देना। जो राजनीतिक दलों को मजबूत नहीं करती बल्कि जनता के बीच से विकल्प की राजनीति को पैदा कर देती है। और मौजूदा वक्त में कोई राजनीतिक दल ऐसा नहीं चाहता क्योंकि भ्रष्टाचार की फेरहिस्त में क्रोनी कैपटिलिज्म के दायरे में हर राजनीतिक दल हैं। सवाल सिर्फ ललित मोदी या माल्या भर का नहीं है। सवाल तो कालेधन का भी है। और एनपीए का भी । और 7 हजार से ज्यादा कारोबारियों का भी है। और हर क्षेत्र की रकम और वक्त को को मिला दे तो 2008 से 2015 तक का सच उभरेगा और आंकड़ा 90 लाख करोड़ को पार कर जायेगा । तब सवाल जनता की सहभागिता से पैदा होने वाले विकल्प का होगा और इसे फिलहाल जेएनयू या हैदराबाद यूनिवर्सिटी के छात्र संघर्ष के दायरे में देखना भूल होगी।

Saturday, March 5, 2016

पारंपरिक राजनीति को कन्हैया की चुनौती

जो नारे कभी नक्सलबाडी में लगे वह नारे अब दिल्ली तो पहुंच गये । लेकिन दिल्ली से लगते नारे क्या बंगाल और केरल में वामपंथी राजनीति को हवा दे पायेंगे । लाल सलाम के साथ आजादी के नारो के मिश्रण ने पहली बार नक्सलबाडी से इतर भारतीय वाम राजनीति में जो लकीर खींची उसने चुनाव की तारीखों के एलान के साथ यह सवाल भी बड़ा कर दिया है कि क्या एक वक्त कांग्रेस के खिलाफ खड़ा लाल सलाम अब बीजेपी के विरोध में खड़ा होते हुये कांग्रेस के साथ जा खड़ा हुआ है । क्योंकि जेएनयू में राहुल गांधी और सीताराम येचुरी की एक साथ मौजूदगी ने यह सवाल तो खड़ा कर ही दिया कि मौजूदा वक्त में बीजेपी के खिलाफ वामपंथी सोच के साथ कांग्रेस भी आ खड़ी हुई है । हालांकि कन्हैया ने काग्रेस और वामपंथियों के साथ खड़े होने की तस्वीर को सच के साथ खड़ा कर विचारधारा को दरकिनार किया । लेकिन अब चुनाव असम , बंगाल और केरल में है जहा वामपंथी राजनीति की मौजूदगी है । तो क्या बीजेपी के खिलाफ तीनो जगहो पर वामपंथी और काग्रेस साथ खडे होंगे । खासकर बंगाल को लेकर यह सवाल बड़ा है कि अतिवाम धारा ने काग्रेस की सत्ता 1967 में बंगाल में डिगाई। वामपंथी सिंगूर से नंदीग्राम तक काग्रेसी धारा में बहे तो ममता ने वाम सोच को लालगढ में पकड़ा और बंगाल की सत्ता बदल गई । उसके बाद से वाम राजनीति बंगाल में हाशिये पर चली गई । लेकिन अब मोदी सरकार को कटघरे में खड़ा करने के लिये कांग्रेस भी उसी वाम सोच को अगर पकड़ रही है जो लाल सलाम का नारा लगाती है तो फिर पहली बार बीजेपी भी चाहे अनचाहे वाम राजनीति की चुनावी जमीन के केन्द्र में खड़ी होगी । क्योंकि राइट और लेफ्ट की लकीर के एक तरफ बीजेपी है तो दूसरी तरफ ममता, राहुल और येचुरी तीनो है । और इस खेल के बीच तीन बड़े सवाल हर जेहन में हैं।पहला क्या यह चुनाव ऱाष्ट्रवाद और देशद्रोह का एसिड टेस्ट होगा । दूसरा क्या यह मोदी सरकार के लिये एसिड टेस्ट होगा और तीसरा क्या छात्र राजनीति पारंपरिक राजनीति की बिसात को बदल देगी । ध्यान दे तो तीनों सवालों के केन्द्र में मोदी सरकार है । क्योंकि जो सवाल जेएनयू में नारों के शक्ल में कन्हैया ने उठाये । उन सवालो को राहुल गांधी संसद में उठाने से नहीं चूके
। लेकिन असर कन्हैया का ज्यादा हुआ । तो क्या कन्हैया परसेप्शन के तौर पर राहुल गांधी के लिये भी चुनौती है । और चाहे अनचाहे बीजेपी को वह चुनावी स्पेस मिल गया जिसमें कल तक कांग्रेस की भी भागेदारी थी । या फिर मोदी सरकार ने अपनी सियासत से ऐसा माहौल बना दिया जिसमें तमाम राजनीतिक दल इसके खिलाफ दिखायी दे । और खिलाफ खडे राजनीतिक दलों के सामने यह संकट हो कि वह अपनी राजनीति मोदी सरकार का विरोध कर ही दिखा पाये ।

दरअसल बीजेपी भी इस सच को समझ रही है और कांग्रेस भी । इसीलिये असम में असमगण परिषद के साथ गठबंधन को लेकर बीजेपी में ही सवाल उठने लगे है । बंगाल में कांग्रेस वाम और ममता के बीच दोराहे पर खड़ी है । केरल में एलडीएफ और यूडीएफ के पारंपरिक संघर्ष के बीच संघ की दस्तक कुछ नये गुल खिलाने को तैयार हैं ।तमिलनाडु में जयललिता का साथ बीजेपी को कांग्रेस के ऊपर ला खड़ा कर सकता है । यानी जो सवाल संसद से लेकर दिल्ली की सड़कों पर उछाले जा रहे है उन सवालो को ही बीजेपी अपनी ताकत बना रही है ।

ध्यान दें तो जेएनयू में कन्हैया की पहली विवादास्पद नारेबाजी से जेएनयू कैंपस में वापस लौटने तक देश ने जो देखा-सुना और समझा, उसमें एक बात साफ दिखी कि या तो आप राष्ट्रवादी हैं या राष्ट्रविरोधी। और इसे ही बीजेपी अपनी ताकत बना रही है । और बीजेपी का यही रुख कन्हैया के जरीये राजनीति विरोध को तो स्पेस दे रहा है लेकिन राजनीतिक विकल्प उभर नहीं पा रहा है । यानी पांच राज्यों के चुनाव की मुनादी ऐसे वक्त हुई है जहां देश में राजनीतिक माहौल सबसे गर्म है । सत्ता और विपक्ष के बीच टकराव चरम पर है । राष्ट्रवाद और देशद्रोह के बीच की लकीर सियासी तौर पर मोटी हो रही है । और जीत के लिये छात्र संघर्ष को ही हथियार बनाया जा रहा है । और कन्हैया के नारे राजनीतिक शून्यता का सवाल तो उठा रहे हैं लेकिन इसे भरेगा कौन इसका जबाब अभी भी गायब है । तो क्या छात्र राजनीति मौजूदा वक्त की जरुरत है । क्योंकि विपक्ष के पास तेवर नहीं बचे और सत्ता के लिये इससे सुनहरा वक्त नहीं होता कि छात्र राजनीति का विरोध राजनीतिक विकल्प को पनपने नहीं देता । यानी विरोध के स्वर छात्रों के बीच से निकले और छात्र ही अगुवाई करते नजर आये तो पारपरिक राजनीतिक दलों का आस्तित्व खुद ब खुद संकट में नजर आने लगेगा । ध्यान दें तो मौजूदा वक्त में छात्र संघर्ष की गूंज का कोई राजनीतिक सिरा आपके पकड़ में नहीं आयेगा । जबकि इससे पहले छात्रों को
राजनीति ने अपना टूल बनाया । मसलन 1960 के दशक के आखिर में परवान चढ़े नक्सल आंदोलन से लेकर चार साल पहले के अन्ना आंदोलन तक जब भी देश में बड़े राजनीतिक-सामाजिक आंदोलन हुए छात्रों का बड़ा तबका उसे सफल बनाने में जुटा। यानी छात्रों ने राजनीतिक सत्ता को बदलने में अपने संघर्ष को झोका । लेकिन पहली बार राजनीतिक नेतृत्व गायब है और छात्र ही राजनीतिक दलों की तुलना में कही ज्यादा तीखे तरीके से मुद्दो को उठा रहा है । यानी जेपी से लेकर वीपी तक । और आडवाणी से लेकर आन्ना तक के संघर्ष को छात्रों की मदद मिली । लेकिन नये हालात में सवाल रोहित वेमुला के जरीये दलित उत्पीडन का हो । या जेएनयू के जरीये राजद्रोह का हो । या फिर -हिन्दुत्व तले साप्रादियक लकीर खिंचे जाने का हो । तमाम राजनीतिक पार्टियो के सरोकार जनता से जुडते नजर नहीं आये लेकिन छात्र संघर्ष की कडिया हैदराबाद से निकलकर जेएनयू होते हुये कमोवेश देश के हर छात्रो को सडक पर लाकर संघर्ष करते हुये देश को दिखा जरुर गई । तो क्या छात्र संघर्ष का नया नजारा सिर्फ बुलबुला भर नहीं है या अतीत के आंदोलनो से अलग कही ज्यादा तीव्र है । क्योकि याद कीजिए गरीब-मजदूर-दलित और किसान के शोषण के खिलाफ नक्सलबाडी से नक्सल आंदोलन ने जोर पकड़ा तो उसमें शामिल होने आईआईटी के छात्र भी पहुंचे और मुंबई के अलफिस्टन कालेज के छात्र भी पहुंचे । नतीजा कांग्रेसी सिद्दाऱ्त शंकर रे की कुर्सी गई । सीपीएम सत्ता में आई । गुजरात में महंगाई और भ्रष्टाचार के खिलाफ नवनिर्माण आंदोलन शुरु हुआ तो छात्रों ने देश की राजनीति को सही दिशा में लाने के लिए जोर लगा दिया। नतीजा कांग्रेसी सीएम चिम्मनभाई को इस्तीफा देना पड़ा। इसी दौर में बिहार में जेपी आंदोलन परवान चढ़ा तो उसे मजबूत बनाने का जिम्मा में छात्र राजनीति में राजनीति का ककहरा सीख रहे छात्रों पर ही था। जिन्होने इंदिरा की गद्दी डिगा दी । वीपी ने बोफोर्स छेडा तो भ्र,्ट्रचार के खिलाफ छात्र नारे लगते हुये निकले । आरक्षण के विरोध में छात्र 90 के दशक में सड़क पर उतरे तो राम जन्मभूमि आंदोलन में भी छात्रों का बड़ा तबका कारसेवा के लिए अयोध्या पहुंचा। यानी हर दौर में राजनीतिक लीडरशीप छात्रों का इस्तेमाल कर रही थी । और सही मायने में थात्र राजनीति का सियासी अंदाज अगर तीन दशक पहले प्रभुल्ल मंहत के जरीये असम में नजर आया तो दो बरस पहले केजरीवाल के जरीये दिल्ली में भी नजर आया ।

लेकिन कन्हैया ने आंदोलन के ही नहीं बल्कि वैचारिक राजनीति की जमीन को भी पहली बार जिस तरह जेएनयू कैपस से ही हिलाया । उसने यह सवाल तो खडा कर दिया कि क्या वाकई छात्र संघर्ष मौजूदा राजनीति को बदल सकता है या फिर मौजूदा वक्त में राजनीतिक वकल्प को भरने की छटपटाहट भर है रोहित वेमुला के सवाल और कन्हैया के नारे ।