सैनिक स्कूल में शिक्षा पाये डां आंबेडकर जीवनभर कहते रहे, बगैर शिक्षा के सारी लड़ाई बेमानी है। आंबेडकर को भी शिक्षा इसीलिये मिल गयी क्योंकि वह एक सैनिक के बेटे थे। और ईस्ट इंडिया कंपनी का यह नियम था कि सेना से जुड़ा कोई अधिकारी हो या कर्मचारी उनके बच्चों को अनिवार्य रुप से सैनिक स्कूल में शिक्षा दी जायेगी। आंबेडकर के पिता रामजी सकपाल सैनिक स्कूल में हेडमास्टर थे और रामजी सकपाल के पिता मालोंजी सकपाल सेना में थे। हालांकि 1892 में महारो के सेना में शामिल होने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। लेकिन इस कडी में आंबेडकर तो शिक्षा पा गये मगर दलित संघर्ष में शिक्षा प्रेम की यह लड़ाई मायावती तक पहुंचते पहुंचते कांशीराम के उस चमचा युग को ही जीने लगी है, जिसमें दलित ही सत्ता का चमचा हो जाये और दलित संघर्ष ही कमजोर हो।
आंबेडकर से मायावती वाया कांशीराम का यह रास्ता करीब सत्तर साल बाद दलित को उसी मीनार पर बैठाने पर आमादा है, जिस पर हिन्दुओं को बैठ देखकर आंबेडकर संघर्ष की राह पर चल पड़े थे। सत्ता कैसे चमचा बनाती है और कैसे किसे औजार बनाती है, इसे मायावती की सत्ता के अक्स में ही देखने से पहले औजार और चमचा की थ्योरी को समझना भी जरुरी है।
डा. आंबेडकर की पूना पैक्ट पर प्रतिक्रिया थी, यदि चिर-परिचित मुहावरों में कहना हो तो हिन्दुओं के लिहाज से संयुक्त निर्वाचक मंडल "एक सडा गला उपनगर" है, जिसमें हिन्दुओं को किसी अछूत को नामांकित करने का ऐसा अधिकार मिला हुआ है, जिसमें उसे अछूतों का प्रतिनिधि तो नाममात्र के लिये बनाये लेकिन असलियत में उसे हिन्दुओ का औजार बना सके। वहीं कांशीराम ने आंबेडकर की इसी प्रतिक्रिया को चमचा युग से जोड़ा । कांशीराम के मुताबिक , "चमचा एक देशी शब्द है जो ऐसे व्यक्ति के लिये प्रयुक्त किया जाता है जो अपने आप क्रियाशील नहीं हो पाता बल्कि उसे सक्रिय करने के लिये किसी अन्य व्यक्ति की आवश्यक्ता पड़ती है। वह अन्य व्यक्ति चमचे को सदैव अपने व्यक्तिगत उपयोग और हित में अथवा अपनी जाति की भलाई में इस्तेमाल करता है। जो स्वयं चमचे की जाति के लिये हमेशा नुकसानदेह होता है।"
मायावती इस सच को ना समझती हो ऐसा हो नही सकता । लेकिन बहुजन के संघर्ष से सर्वजन की सोशल इंजिनियरिंग का खेल मायावती की सत्ता कैसे औजार और चमचो में सिमटी है यह समझना जरुरी है । मायावती सत्ता चलाने में दक्ष है इसलिये अपने हर कदम को राज्य के निर्णय से जोड़कर चलती है । बुत या प्रतिमा प्रेम मायावती का नहीं राज्य का निर्णय है, इसलिये सुप्रीम कोर्ट भी मायावती की प्रतिमाओ को लगाने से नहीं रोक सकता । चूंकि आंबेडकर-कांशीराम-मायावती के बुत समूचे राज्य में अभी तक जितने लगे है, अगर उनकी जगहो पर आंबेडकर की शिक्षा पर जोर देने वाले सच के दलित उत्थान को पकड़ा जाता तो संयोग से राज्य में उच्च शिक्षा के लिये अंतर्राष्ट्रीय स्तर की तीन यूनिवर्सिटी और राज्य के हर गांव में एक प्राथमिक स्कूल खुल सकता था। लेकिन बुत लगाना कैबिनेट का निर्णय है और कैबिनेट राज्य की जरुरत को सबसे ज्यादा समझती है, क्योंकि जनता ने ही इस सरकार को चुना है, जिसकी कैबिनेट निर्णय ले रही है तो सुप्रीम कोर्ट क्या कर सकता है ।
लेकिन कैबिनेट का निर्णय अगर इतनी मोटी लकीर खिंचता है तो इसे मिटाने वाले के साथ सौदेबाजी का दायरा कितना बड़ा हो सकता है। मायावती की कैबिनेट ने ही राज्य के स्कूलो में फीस न बढ़ाने का निर्णय लेते हुये हर निजी स्कूल को चेताया की अगर उसने फीस बढ़ायी तो इसे लोकहित के खिलाफ और राज्य के निर्णय के खिलाफ उठाया गया कदम माना जायेगा। लेकिन देश के सबसे अव्वल निजी शिक्षा संस्थान होने का दावा करने वाले ऐमेटी इंटरनेशनल से लेकर करीब दर्जन भर निजी शिक्षा संस्थानों ने कैबिनेट के निर्णय को ताक पर रखकर ना सिर्फ फीस वसूलनी जारी रखी है, बल्कि उसमें वह एरियर भी जोड़ दिया जिसपर दिल्ली तक में रोक लगायी जा चुकी है।
सवाल है कि सुप्रीम कोर्ट कैबिनेट के निर्णय पर हाथ खड़े कर देता है और निजी शिक्षा संस्थान कैबिनेट के निर्णय को ढेंगा दिखा देते है । असल में मायावती का यही सलिका कांशीराम के दलित संघर्ष के तौर तरीको को ढेंगा दिखाते हुये सत्ता के लिये राजनीतिक चमचो से होते हुये सत्ता चलाने के लिये नौकरशाही चमचे तक पर जा सिमटा है। कांशीराम कहते है, कोई औजार,दलाल,पिठ्टू अथवा चमचा इसलिये बनाया जाता है ताकि उससे वास्तविक और सच्चे संघर्षकर्ता का विरोध कराया जा सके । बीसवीं शताब्दी की शुरुआत से ही दलित वर्ग छुआछुत और अन्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ उठ खड़ा हुआ था। शुरुआत मे उनकी उपेक्षा की गयी किन्तु बाद में जब दलित वर्गो का सच्चा नेतृत्व प्रबल और शक्तिसंपन्न हो गया तो उनकी उपेक्षा नहीं की जी सकती थी। इस मुकाम पर उच्च जातीय हिन्दुओं को दलित वर्गो के विरुद्द चमचों को उभारने की जरुरत महसूस हुई। मायावती ने कांशीराम के इस थ्योरी को बहुजन से सर्वजन के तौर पर उभार कर अपने बूते सत्ता पा कर दिखाला दी। लेकिन यहां कांशीराम की गढी राजनीतिक मायावती भी बूत ही निकली। क्योंकि मायावती ने कांशीराम के चमचा थ्योरी को अपनाया तो जरुर लेकिन दलितों का भला करने के लिये नहीं बल्कि अपने राजनीतिक कद को चमचों के बीच ऊंचा करने के लिये, जिसमें बिना चमचों के कद मायने नहीं रखेगा इस एहसास को मायावती ने दिल - दिमाग दोनो में समा लिया । इसलिये राजनीतिक तौर पर अगर चमचा भी नेता और नेता भी चमचा लगने लगा तो मायावती ने इसे अपनी पहली जीत मान ली । लेकिन सत्ता चलाने के तौर तरीको में मायावती नेता की जगह व्यवस्था बन गयी । यानी जिस मायावती को सत्ता में आने व्यवस्था को एक राजनीतिक दिशा देनी थी वही मायावती चमचो के धालमेल की तरह व्यवस्था और नेता के घालमेल में भी जा उलझी ।
समझ यही बनी जब मायावती का निर्णय कैबिनेट का निर्णय है तो मायावती सरीखा निर्णय ही राज्य का निर्णय है। इसलिये फीस बढोतरी रोकने के लिये कैबिनेट के निर्णय को लागू कराने का अधिकार हर जिला अधिकारी को सौपा गया । लेकिन जिला अधिकारी के टालमटोल रवैये से यह भी झलका कि इस निर्णय का मतलब निजी स्कूलो से धन की उगाही है। तो उसने कैबिनेट के निर्णय को खाली पोटली को भरने वाला मान लिया जाये। हालांकि ‘कार्रवाई होनी चाहिये’ वाला भाव जिला अधिकारी का भी रहा । शिक्षा निदेशक ने इसे कैबिनेट का निर्णय बताकर खामोश रहना ही बेहतर समझा । लेकिन जब कैबिनेट का निर्णय लागू होना चाहिये का सवाल उभरा तो शिक्षा निदेशक ने मायावती का आदेश ना मानने की गुस्ताखी करने वाले के खिलाफ मायावती के ही दरवाजे पर दस्तक देने की अपील की। जब यही सवाल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के मंत्री रंगनाथ मिश्रा से पूछा गया कि कैबिनेट के निर्णय का उल्लंघन कोई कैसे कर सकता है और उल्लंघन करने वाले के खिलाफ कार्रवाई कौन करेगा तो फिर सवाल उभरा कि यह तो मायावती का फैसला है । इसका उल्लघंन कोई कैसे कर सकता है। फिर जिलाधिकारी को तो तत्काल कार्रवाई करनी चाहिये। लेकिन आखिर में मंत्री के माध्यम से भी मामला बैठक और दिशा-निर्देश में ही खो गया।
सवाल है कि कैबिनेट का निर्णय भी मायावती का और लागू ना होने पर कार्रवाई भी मायावती ही करे...तो मायावती हैं कहां । मायावती ही व्यवस्था हैं,मायावती ही राज्य है । फिर राज्य चला कौन रहा है और कांशीराम ने जिस मायावती को गढ़ा वह मिशनरी है कांशीराम के चमचा युग की प्रतीक । क्योंकि दोनो का अंतर कांशीराम ने यह कहते हुये साफ किया था कि , " कुछ लोग मिशनरी व्यक्तियों को चमचा समझने की भूल कर बैठते हैं। जबकि दोनो विपरित ध्रुवों के होते है। किसी चमचे को उसके समुदाय के विरुद्द प्रयोग किया जाता है। जबकि किसी मिशनरी को उसके अपने समुदाय की भलाई के लिये प्रयोग किया जाता है। कह सकते है चमचा अपने समुदाय के सच्चे और वास्तविक नेता को कमजोर करता है और मिशनरी अपने समुदाय के सच्चे नेता को मजबूत करता है। "
जाहिर है कांशीराम के चमचा युग की थ्योरी तले मायावती का मिशन राजनीति की नयी विधा है यह सही है या गलत यह निर्णय उसी जनता को करना है जिसने मायावती को सत्ता तक पहुंचाया। क्योंकि सिर्फ दलित संघर्ष से जोडकर मायावती को देखने का मतलब है कैबिनेट का कोई ना कोई निर्णय जो कही हजारों करोडं रुपयों के बुत में उलझेगा या फिर करोडों रुपयों के जरीये कैबिनेट को ही खारिज करेगा ।
Monday, July 13, 2009
कांशीराम का चमचा युग और मायावती का मिशन
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Wednesday, July 8, 2009
वैकल्पिक राजनीति को खड़ा करता ममता का रेल बजट
माओवादियों को केन्द्र सरकार आतंकवादी करार दे चुकी है। जिन माओवादी प्रभावित इलाको में चार राज्यों में चार अलग अलग राजनीतिक दलों की सरकारें पहुंच नहीं पाती हैं और चारों सरकारें माओवादियों को विकास विरोधी करार दे रही हैं, वहां ममता बनर्जी के रेल बजट में पावर प्रोजेक्ट से लेकर रेलवे लाईन बिछाने और आदर्श रेलवे स्टेशन बनाने के ऐलान का मतलब क्या है?
ममता ने रेल बजट के जरीये माओवादी प्रभावित इलाको को लेकर एक ऐसा तुरुप का पत्ता फेंका है जो सफल हो गया तो संसदीय राजनीति की उस सत्ता को आईना दिखा सकता है जो विकास और बाजार अर्थव्यवस्था के नाम पर लाल गलियारे को लगातार आतंक का पर्याय बनाये हुये है। राजनीतिक तौर पर आंध्रप्रदेश से लेकर छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखंड और पं बंगाल में राजनीतिक दलों ने सत्ता के लिये माओवादियों से चुनावी समझौते किये लेकिन माओवाद प्रभावित इलाको में न्यूनतम के जुगाड़ को भी बेहद मुश्किल करार दिया। और इसको लिये माओवादियो को विकास विरोधी करार देने से सरकारें नहीं चूकीं।
झारखंड में माओवादियों से चुनावी समझौते करने के आरोप कांग्रेस-भाजपा और झमुमो विधायकों पर लगा । उसी का नया चेहरा इस बार लोकसभा में नजर आया जब माओवादी नेता बैठा चुनाव लड़कर सांसद बन गये। लेकिन नया सवाल ममता की उस राजनीति का है, जो सिंगुर से निकली है और वाममोर्चा को उसी की राजनीति तले सत्ता से बाहर करने की रणनीति को लगातार आगे बढ़ा रही है। वहीं कांग्रेस ममता को थामकर इस अंतर्विरोध का लाभ उठाकर विकास के अपने अंतर्विरोध को छुपाना चाह रही है। ममता के सिंगुर में टाटा की नैनो को बोरिया-बिस्तर समेटने के लिये मजबूर करने के आंदोलन और नंदीग्राम में इंडोनेशिया के कैमिकल हब को ना लगने देने के संघर्ष को बुद्ददेव सरकार ने कभी एक सरीखा नहीं माना।
वाम मोर्चा सरकार ने सिंगूर को विकास विरोधी तो नंदीग्राम को माओवादियो की बंदूक का आंतक बताकर खारिज भी किया। लेकिन ममता बनर्जी ने सिंगूर से लेकर नंदीग्राम और फिर लालगढ़ को भी उसी कडी का हिस्सा उस रेल बजट के जरीये बना दिया, जिसको लेकर कयास लगाये जा रहे थे कि बंगाल की राजनीति को ममता बतौर रेलमंत्री कैसे साध पायेगी। रेल बजट में ममता ने न सिर्फ सिंगूर से नंदीग्राम तक रेल लाइन बिछाने का ऐलान किया बल्कि लालगढ़ के उन इलाकों में जहां सेना को अभी भी जाने में मुश्किल का सामना करना पड़ रहा है, वहां भी रेल लाइन बिछाने का ऐलान किया। यानी अपनी राजनीतिक जमीन को पटरी दे दी है। रेल बजट में सालबोनी,झारग्राम और उस बेलपहाडी को भी रेलवे से जोड़ने का ऐलान किया गया जो झारखंड और बंगाल की सीमा पर माओवादियो का गढ़ माना जाता है और बुद्ददेव भट्टाचार्य मानते है कि माओवादियों की वहा सामानातंर सरकार चलती है। यह वही इलाका है, जहा बुद्ददेव को बारुदी सुरंग से उडाने की कोशिश इसी साल माओवादियों ने की थी। बंगाल की राजनीति को बिलकुल नये मुद्दे के आसरे अपनी राजनीतिक जमीन बनाने की जो पहल ममता बनर्जी कर रही है, उसमें राज्य के बारह जिलो के वह ग्रामीण पिछडे इलाके हैं, जहां विकास का मतलब आज भी सीपीएम कैडर से लाभ की दो रोटी का मिलना है। ममता इस हकीकत को समझ रही है कि राज्य के चालीस फिसदी इलाके ऐसे है, जहां वाम मोर्च्रा के तीन दशक के शासन के बाद भी जिन्दगी का मतलब दो जून की रोटी से आगे बढ़ नहीं पाया है इसलिये रेल बजट में इन चालीस फिसदी क्षेत्रों को रेलवे स्टेसनो के जरीये घेरने में ममता जुटी है। बजट में देश के जिन 309 रेलवे स्टेशन को आदर्श रेलवे स्टेशन बनाने की बता कही गयी है उसमें 142 सिर्फ बंगाल के है । आदर्श रेलवे स्टेशन का मतलब है, एक ऐसा इन्फ्रास्ट्रक्चर स्टेशन पर मौजूद रहना जो किसी भी इलाके के लोगों की जिन्दगी को संभाल सके। यानी रोजगार से लेकर न्यूनतम जरुरत का ढांचा रेलवे स्टेशन पर जरुर मौजूद रहेगा। इस कड़ी में ममता ने लालगढ़ स्टेशन को भी आदर्श स्टेशन बनाने के साथ इस इलाके में पावर प्लांट लगाने का ऐलान कर सीपीएम की उस कर उस रणनीति को सिर्फ पशिचमी मिदनापुर ही नहीं बल्कि बांकुडा, पुरुलिया, बीरभूम समेत आठ जिलों के उन ग्रामीण इलाकों को खुली हवा का एहसास कराया है, जिन्हें आज भी लगता है कि कैडर के साथ खडे हुये बगैर कुछ भी मिल नहीं सकता है।
असल में ममता जिस राह पर है वह एक वैकल्पिक राजनीति की दिशा भी है। क्योंकि सवाल सिर्फ बंगाल का नहीं है। छत्तीसगढ़ में जहां राज्य सरकार माओवादियों को आतंकवादी मानकर ग्रामीण आदिवासियो के जरीये ग्रामीण समाज का नया चेहरा बनाने में लगी है, वहां अभी भी विकास तो दूर न्यूनतम के लिये भी पहले माओवादियों के खिलाफ नारा लगाना पडता है। खासकर दांतेवाडा और मलकानगिरी के इलाके में पीने का पानी, प्राथमिक शिक्षा, प्राथमिक स्वास्थय केन्द्र से लेकर आवाजाही के लिये परिवहन व्यवस्था का कोई खांका आज तक खडा नहीं किया गया है । पूरा इलाका प्रकृतिक संसाधनो पर निर्भर है। यहां तक कि जल के स्रोत भी प्राकृतिक है। भाजपा की रमन सरकार के मुताबिक इस इलाके में सुरक्षा बल भी जब जाने से घबराते है तो विकास का कौन सा काम यहा जा सकता है। लेकिन ममता ने इस इलाके में रेलवे लाइन बिछाने का निर्णय लिया है। वहीं उड़ीसा का सम्बलपुर-बेहरामपुर और तेलागंना का मेडक-अक्कानापेट वह इलाका है, जहां माओवादियों ने बहुराष्ट्रीय कंपनियो के खिलाफ आंदोलन भी शुरु किया है और एक दौर में नक्सलियों का गढ़ भी रहा है।
आंध्रप्रदेश का अक्कानापेट में ही पहली बार एनटीआर ने अपनी राजनीतिक सभा में नक्सलियों को अन्ना यानी बड़ा भाई कहा था, जिसके बाद एनटीआर को समूचे तेलागंना के नक्सल प्रभावित इलाकों में दो तिहाइ सीटों पर जीत मिली थी। लेकिन उस इलाके में विकास की लकीर खिंचने की हिम्मत ना एनटीआर ने की न ही चन्द्रबाबू नायडू कर पाये, न ही अभी के कांग्रेसी मुख्यमंत्री वाय एसआर कर पा रहे हैं ।
हालांकि तेलागंना राष्ट्रवादी ने यहां के विकास का मुद्दा जरुर उठाया। लेकिन पहली बार वहा रेलवे लाइन बिछगी तो इसका असर यहा किस रुप में पड़ सकता है, इसका अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि इस पूरे इलाके में जंगल झांड, तेंदू पत्ता , और गड्डे खोदने वाली जवाहर रोजगार योजना ही जीने का आधार है । जबकि पूरा इलाका साल के जंगल से भरा पड़ा है। वहीं उड़ीसा के जिन इलाको में रेल लाइन बिछेगी वहां के प्रकृतिक संसाधनो पर बहुराष्ट्रीय कंपनियां दोहने के लिये सरकार से नो आब्जेक्शन सर्टीफिकेट ले चुकी है। यानी करीब पचास हजार करोड डॉलर से ज्यादा की परियोजनाओ को लेकर इन इलाको में सौदा सरकारी तौर पर किया जा चुका है। इन इलाकों के आदिवासियो ने अपने पारंपरिक हथियार उठाकर आंदोलन की शुरुआत यहां इसलिये कि क्योकि प्रकृति से हटकर उनके जीने का कोई दूसरा साधन पूरे इलाके में है नहीं। पहली बार किसी रेल मंत्री ने इस इलाके को भी मुख्यधारा से सीधे जोड़ने की सोची है। वहीं झांरखंड के संथाल परगना इलाके में माओवादियों ने खासी तेजी से दस्तक दी है। बंगाल की सीमा से सटे होने की वजह से भी यहा माओवादियो ने खुद को खड़ा किया है। जबकि दूसरी वजह यहां खादान और प्रकृतिक संसाधनों का होना है, जिसपर मुंडा की नजर मुख्यमंत्री रहने के दौरान सबसे ज्यादा लगी रहीं। संथाल आदिवासियो की बहुतायत वाल इस इलाके मे विकास का कोई सवाल राज्य बनने के बाद किसी भी मुख्यमंत्री ने नहीं किया । बाबूलाल मंराडी ने जबतक सड़के ठीक करायीं, उनकी गद्दी चली गयी । अर्जुन मुंडा ने देशी टाटा से लेकर कोरियाई कंपनी समेत एक दर्जन देशी विदेशी कंपनियो के साथ अलग अलग परियोजनाओ को लेकर की शुरुआती सौदेबाजी भी की । करीब पांच लाख करोड़ के जरीये पचास लाख करोड़ के प्रकृतिक संसाधनो की लूट का लाइसेंस भी इन कंपनियो को दे दिया । नंदीग्राम के आंदोलन के दौर में यहां के आदिवासी खुद खड़े हुये और सरकारी धंधे का खुला विरोध झंरखंड के नंदीग्राम से करने से नहीं चूके।
ममता इस इलाके में भी रेलवे के जरीये विकास की पहली रेखा खिंचने को तैयार है । ऐसे में सवाल यह नहीं है कि ममता माओवादी प्रभावित इलाको में रेलवे लाइन बिछाकर या फिर परियोजनाओ के जरीये ग्रामीण आदिवासियो को विकास के ढांचे से जोडते हुये वाम राजनीति का विकल्प बनना चाह रही है।
बड़ा सवाल यह है कि तमाम राजनीतिक दलो ने जिस तरह माओवाद को कानून व्यवस्था का सवाल मान लिया है, और उसके घेरे में करोड़ों ग्रामीण आदिवासियों को माओवादियों का हिमायती मानकर उनके खिलाफ कार्रवायी के जरीये अपनी सफलता दिखा रही है । ऐसे में आदिवासी जीवन बद से बदतर किया जा रहा है । सास्कृतिक आधारों को खत्म किया जा रहा है । गांवों को शहर बनाने के लिये विकास को चंद हाथों के मुनाफे के जरीये लुटाया जा रहा है। बाजार और सत्ता का संतुलन बनाने के लिये विकास और आंतक को अपने अनुकूल परिभाषित करने से ना राष्ट्रीय राजनीतिक दल कतरा रहे है, न ही क्षेत्रिय दल। जबकि अर्थव्यवस्था की हकीकत यही है कि जिन इलाको में ममता का रेल बजट असर दिखाने वाला है, अगर वहां माओवादियो पर नकेल कसने के नाम पर खर्च की गयी पूंजी को क्षेत्र के ग्रामीण-आदिवासियों के नाम मनीआर्डर भी कर दिया जाता तो हर आदिवासी परिवार दिल्ली में घर खरीद कर सहूलियत से रह सकता था । इतनी बड़ी तादाद में माओवाद प्रभावित इलाकों में केन्द्र और राज्य सरकारो ने खर्च किया है। वहीं ममता बनर्जी जब लालगढ़ में सुरक्षा बलो की जगह भोजन-पानी भिजवाने का सवाल खड़ा करती है तो कांग्रेस-वाम दोनो इसे ममता की नादानी बताते है । जाहिर है माओवाद प्रभावित रेड कारिडोर को लेकर राइट-लेफ्ट दोनो की राजनीति से इतर ममता का रेलबजट है । अगर यह सिर्फ बजट है तो इसका लाभ आखिरकार उसी राजनीति को मिलेगा जो विकास को बाजार से जोड़ रही है और अगर यह ममता की राजनीति है, तो यकीनन वैकल्पिक राजनीति की पहली मोटी लकीर है जो भविष्य का रास्ता तैयार कर रही है, बस इंतजार करना होगा ।
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Monday, July 6, 2009
फिल्म "न्यूयॉर्क" से रेड-कॉरिडोर तक
अमेरिका में 9/11 के बाद करीब तीन हजार लोगों को संदेह के आधार पर एफबीआई ने पकड़ा। जिसमें अस्सी फीसदी से ज्यादा मुस्लिम थे। इनमें से किसी के भी खिलाफ आंतकवादी होने का कोई सबूत एफबीआई को नहीं मिला। लेकिन जिन्हें भी पकड़ कर पूछताछ की गयी, रिहायी के बाद अधिकतर मानसिक तौर पर विक्षप्त सरीखे हो गये। ओबामा ने सत्ता में आने के बाद पहला काम यही किया कि यातना गृह ग्वातामालो को बंद करा दिया। फिल्म न्यूयार्क के आखरी सीन में जब स्क्रीन पर यह बयान छपे हुये उभरते हैं तो लगता है फिल्मकार जार्ज बुश के दौर की काली यादों को ओबामा के जनादेश से भुलाना चाह रहा है।
ओबामा जिस तरह मुस्लिम समाज के घावों पर मरहम लगा रहे हैं और दोस्ती का हाथ बढ़ा रहे हैं, उससे यह सवाल फिल्म न्यूयार्क के अंत को देखकर लगता है कि 9/11 के बाद आंतकवाद के खिलाफ जार्ज बुश की हर पहल आंतकवाद पर नकेल कसने की जगह आंतकवादियो की एक नयी खेप तैयार कर रही थी। जिनके जहन में अमेरिका की दादागिरी का आक्रोष इस हद तक बढ़ा कि बदले की भावना में वह आंतकवाद के हाथ में खिलौना होना ज्यादा पंसद करने लगे। यातना गृह से निकलने के बाद इनकी जिन्दगी का मकसद सिर्फ अपने खिलाफ हुये अत्याचार को याद रखना भर नहीं था बल्कि परेशानी का सबब यही था कि जिस राज्य के भरोसे उन्हें अपने होने का गुमान था उसी राज्य के आंतक के सामने वो अपाहिज हो गये।
जाहिर है ऐसे में जीने का कौन सा रास्ता चुना जाये, यह सवाल अगर 9/11 के बाद कोई मुस्लिम अमेरिकी नागरिक भी महसूस कर रहा था, तो यही सवाल भारत में माओवादी प्रभावित इलाकों में ग्रामीण-आदिवासियों के सामने हैं। सौ से ज्यादा जिलों के एक करोड से ज्यादा ग्रामीण आदिवासियों के सामने सबसे बडा संकट यही है कि उनकी भाषा, सस्कृति और जरुरतो को सरकार समझती नहीं है। जबकि उनकी जमीन पर पूंजी के माध्यम से कब्जा करने वालो के साथ सरकार की नीतिया खड़ी है। यह ग्रामीण अपने हक के लिये और जीने के लिये भी विरोध करते हैं तो इन्हे माओवादी मान लिया जाता है । वहीं माओवादी अपनी विचारधारा को जिस रुप में इन ग्रामीणों के सामने रखते है, उसमें ग्रामीणो के हक की बात होती है। शुरुआती दौर में माओवादी या तो बाहर से आते हैं या फिर ग्रामीणो के विरोध की क्षमता उन्हें बनी बनायी जमीन दे देती है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता। लेकिन धीरे धीरे यह ग्रामीण और फिर इलाके ही माओवादी करार देने में सरकार भी देर नही लगाती। क्योंकि यहीं से नीतियों के आंतक को ढक कर राज्य मानवीय चेहरा देना शुरु करते है। नीतियों का आंतक माओवादियों के आंतक तले ना सिर्फ दब सकता है बल्कि सभ्य समाज में बंदूक की थ्योरी के सामने हर नीति विकासपरख लगेगी, इससे कोई इंकार भी नहीं कर सकता है। लेकिन माओवादी प्रभावित इलाको में ग्रामीण आदिवासियो के नजरिये से अगर सामाजिक-आर्थिक हालात पर गौर पर करे तो राहुल गांधी के दो देश का नजरिया सामने आ सकता है। आंध्रप्रदेश के तेलागंना से लेकर बंगाल के मिदनापुर,बांकुडा,पुरुलिया तक के बीच महाराष्ट्र का विदर्भ,छत्तीसगढ का बस्तर,मध्यप्रदेश और उडिसा के बारह सीमायी जिलो में प्रतिव्यक्ति आय तीन हजार रुपये सालाना भी नहीं है जबकि देश के प्रतिव्यक्ति आय का आंकडा सरकारी तौर पर करीब तीन हजार रुपये महिने का है।
माओवादी प्रभावित इलाको में न्यूनतम जरुरत की लड़ाई कितनी पैनी है, इसका अंदाजा विकास की लकीर तो दूर जीने की पहली जरुरत की उपलब्धता से समझा जा सकता है। इन इलाकों में पीने का साफ पानी महज चार फीसदी उपलब्ध हैं। जबकि सरकारी तौर पर देश में यह आंकडा 35 फीसदी का है। शिक्षा के मद्देनजर प्राथमिक शिक्षा की स्थिति उन इलाकों में 17 फीसदी है, जो राष्ट्रीय तौर पर 58 फीसदी है । वहीं उच्च शिक्षा इन इलाको में सिर्फ 2 फीसदी है, जबकि पूरे देश का सरकारी आंकडा 41 फीसदी का है। हालात स्वास्थय सेवा को लेकर क्या है यह इस बात से समझा जा सकता है कि माओवादी प्रभावित इलाको में अगर एनजीओ का कामकाज को हटा दिया जाये तो सरकारी स्वास्थ्य सेवा दशमलव में आ जायेगी यानी एक फिसदी से भी कम।
लेकिन मुश्किल यह नहीं है कि न्यूनतम भी मुहैया अभी तक सरकार इन इलाकों में नहीं कर पायी है । मुश्किल सरकार का अपना नागरिकों को लेकर जीने देने के नजरिये का है । सरकार विकास की जो लकीर इन इलाको में खींचने को तैयार हो उससे न तो वह उसी जंगल-जमीन को खत्म कर देने पर आमादा है, जिसके भरोसे ग्रामीण-आदिवासी न्यूनतम न मिलने के बावजूद जीये जा रहे है । लेकिन माओवादी प्रभावित रेड-कारिडोर को लेकर पिछले दो दशको में यानी 1991 में आर्थिक सुधार की लकीर देश में खिंचने के बाद से नब्बे लाख करोड डॉलर से ज्यादा की पूंजी कई योजनाओ के जरीये लगाने के लिये बेताब है। जिसमें से सत्तर लाख करोड डॉलर का मामला निजी क्षेत्र का है । लेकिन इन योजनाओ का मतलब प्रकृतिक संपदा की ऐसी लूट है जिससे जंगल खत्म होगे । प्रकृतिक पानी के स्रोत सूख जायेगे । खेती से लेकर हर वह आधार खत्म हो जायेगे जो रोजगार ना मिलने के बाबजूद करोडों ग्रामिण-आदिवासियो को पीढियों से जिलाये हुये है । लेकिन सरकार की योजनाओं को अर्थव्यवस्था के जरीये राष्ट्हीत के नजरिये से भी परखे तो वह राष्ट्रविरोधी ही लगता है । क्योंकि एक आंकलन के मुताबिक नब्बे लाख करोड डॉलर की योजनाये जो पावर प्लांट से लेकर स्टील,सिमेंट, माइनिंग लेकर एसइजेड का खाका तैयार करेगी उसमें इन इलाको में मौजूद जो प्रकृतिक संसाधन लगेगे या नष्ट्र होगे , अंतर्राष्ट्रीय बाजार में उसकी कीमत कम से कम नब्बे लाख करोड डालर से दुगुनी होगी । वही यह माल योजनाओ के लिये कौडियो के मोल यानी 40 से 50 लाख डालर ही आंकी जा रही है । चूंकि रेड-कारिडोर को लेकर सरकारे पार्टियो से लेकर मंत्रालयो तक में बंटी हुई है इसलिये नीजि कंपनियो को सरकार को चूना लगाने में कोई दिक्कत भी नहीं आती । छत्तिसगढ,मध्यप्रदेश,बिहार,बंगाल में जिन पार्टियो की सरकारे हैं, वह केन्द्र सरकार से मेल नही खाती हैं। फिर केन्द्र के ही छह मंत्रालय जो रेड कारिडोर में विकास का खंचा खिंचने के लिये किसी को भी लाइसेंस देगे उनमें तालमेल नहीं है। पर्यावरण, खनन, उघोग, वाणिज्य, आदिवासी कल्याण मंत्रालय की समझ ही जब रेड-कारीडोर को लेकर अलग-अलग है नीतियों के लागू ना हो पाने का अंत कानून-व्यवस्था के दायरे में ही होगा । और आखिरी में गृह मंत्रालय की नीतिया यही से योजनाओ को मानवीय जामा पहनाने की पहल शुरु करती है । जिसमें रेड-कारीडोर में रहने वाला कोइ भी शख्स अगर अपने हक का सवाल खड़ा करता है तो वह पहले माओवादी करार दिया जाता था और अब आंतकवादी करार दिया जायेगा।
चूंकि गृह मंत्रालय की समझ रेड-कारीडोर को लेकर माओवाद और सत्ता बंदूक की नली से निकलती है कि थ्योरी को ही समझते हुये शुरु होती है तो इन इलाको में किसी भी योजना को अमली जामा पहनाने की पहली और आखरी पहल अर्धसैनिक बल से लेकर सेना के फ्लैग मार्च तक पर ही जा कर टिकती है । इसलिये सरकार योजनाओ के पूरा ना होने को ही रेड-कारीडोर के पिछडेपन से जोडती है । जबकि गौर करने वाली बात यह भी है कि बारह राज्यो से लेकर केन्द्र सरकार ने 1991 के बाद से लेकर अभी तक माओवादियो पर नकेल कसने के लिये सत्रह लाख करोड से ज्यादा का सीधा खर्च कर चुकी है । जो सुरक्षाबलो के आधुनिकी करण से जुडी है । लेकिन इसी दौर में गृहमंत्रालय की ही रिपोर्ट कहती है कि माओवादियों के प्रभावित उलाके में पचास फीसदी तक की बढोतरी हुई और तीस फीसदी ग्रमीण आदिवासियों ने हथियार उठाये। आंध्र प्रदेश और छत्तीसगढ की सीमा से सटे महाराष्ट्र के माओवादी प्रभावित चन्द्रपुर,गढचिरोली जिले को लेकर सरकार का नजरिया देखने लायक है। नक्सलियों पर नकेल कसने के लिये 80 और नब्बे के दशक में यहां के पांच सौ से ज्यादा आदिवासियो पर आंतकवादी कानून टाडा लगा दिया गया। इन्हें नक्सलियों का हिमायती बताया गया। जिनपर टाडा लगाया गया उसमें 7 साल की बच्ची से लेकर 80 साल तक के बुजुर्ग आदिवासी तक भी शामिल थे । 1995 में टाडा कानून निरस्त होने का बाद जब इन आदिवासियों के केस अदालतो में पहुंचे तो किसी में कोई सबूत पुलिस विशेष अदालतो में नहीं रख पायी।
हालांकि 69 आदिवासियो पर अब भी टाडा के 80 केस चल रहे हैं, लेकिन पांच से पन्द्रह साल तक जेल में गुजारने के बाद जब यह आदिवासी जेल से निकले तो माओवादी प्रभाव पूरे इलाके में इस कदर बढ चुका था कि नक्सल निरोधी अभियान के तहत कोई भी पुलिसवाला इस इलाके में आया तो उसने सबसे पहले नक्सलियो की मुखबिरी करने के लिये उन्ही आदिवासियो को फुसलाया जो पुलिस की ही गलत पहल की वजह से सालो साल जेल में रह चुके थे । नक्सलियो की मुखबरी ना करने पर दोबारा माओवादी करार देकर ठीक उसी तरह जेल में बंद करने की घमकी जी जाती है जैसे फिल्म न्यूयार्क में नील मुकेश को आंतकवादी जान अब्राहम के बारे में जानकारी हासिल करने के लिये यह कहते हुये धमकाया जाता है कि ना करने पर उसे आंतकवादी करार दिया जायेगा । और सारी जिन्दगी उसे जेल के अंधेरे बंद कमरे में यातना सहते हुये काटनी होगी ।
छत्तीसगढ में सलवा-जुडुम आंतक के खिलाफ आंतक की एक नयी परिभाषा भी है । लेकिन वहा भी संकट उसी ग्रामीण आदिवासी का है कि अगर वह सलवा-जुडुम का हिस्सा बनने से इंकार कर दे तो वह माओवादी करार दिया जायोगा और उसे एनकाउंटर में मरना ही होगा । अपनी कमजोरियों की वजह से सरकार आदिवासियों की जिन्दगी से किस तरह खिलवाड़ कर रही है, यह आदिवासी इलाकों में माओवादियों से निपटने के नाम पर आदिवासियो की पूरा जिन्दगी चक्र बदलना भी है । यूं ग्रामीण आदिवासियों को माओवादियों की मुखबरी अब सरकारी तौर पर आंध्र प्रदेश और छत्तीसगढ में सुविधा की पोटली दे कर भी उकसाया जाता है तो छत्तीसगढ,महाराष्ट्र,मध्यप्रदेश,उडिसा और झारखंड में आदिवासियो को बंदूक की नोंक पर रखकर माओवादियों के बारे में जानकारी लेने जबरदस्ती की जाती है। अगर बहुत पहले की स्थिति को छोड़ भी दे, तो नंदीग्राम और लालगढ़ का प्रयोग सामने है। शुरुआती दौर में नंदीग्राम को पुलिस और सुरक्षाबलों ने जिस तरह यातना गृह में तब्दील किया उसका असर लालगढ़ में आदिवासियों के हथियार उठाने से तो दिखा ही । वहीं नंदीग्राम में बलात्कार की शिकार महिलाओं ने लालगढ़ में जाकर महिलाओं को नंदीग्राम में जो हुआ जब उसे बताना शुरु किया तो वहां की महिलाओं के सामने संघर्ष के अलावे कोई दुसरा रास्ता नहीं बचा।
14 से 16 जून को लालगढ की कई सार्वजनिक सभाओ में नंदीग्राम की सकीना और नसीफा {नाम बदला हुआ } 6-7 नबंबर 2008 को उनके साथ जो हुआ उसे मंच से खुलकर कहा । नसीफा के ने जो कहा,वह इस तरह था , ''मै उन लोगो को अच्छा तरह पहचान सकती हूं,..वो लोग सीपीआईएम के हौरमण वाहिणी के लोग थे । और इसी गांव के लड़के है । मैं नाम भी बता सकती हूं...उनके नाम बच्चू, कानू है । मुझे रेप किया बच्चू ने और मेरी मझली बेटी को रेप किया कानू ने...और दूसरी बेटी को रेप किया कोनाबारी ने ..अब्दुल भी साथ था । '' कुछ इसी तरह से अपने साथ हुये हादसे को सकीना ने भी बताया । लेकिन हर सभा में यही सवाल उठा कि बलात्कार और लूटपाट की अधिकतर घटना पुलिस की मौजूदगी में हुई और सात महिने बाद भी सजा किसी को नहीं हुई है तो न्याय कैसे मिलेगा । वहीं नंदीग्राम के सीपीएम समर्थक ग्रामीणो को पुलिस कैडर और पुलिस दोनो ने उकसाया कि लह लालगढ जाकर वहा की मुखबरी करे । असल सवाल राज्य को लेकर यही से खडा होता है । माओवाद के नाम पर करोडो लोगो के अपने तरीके से जीने के हक को कैसे छिना जा सकता है । और राज्य की भूमिका ही जब माओवादियो के खिलाफ ग्रामिण-आदिवासियो को अपना प्यादा बनाकर आंशाका पैदा करने वाली हो तब आम ग्रामिण-आदिवासी क्या करें । सबसे बडी मुश्किल यही हो चली है कि रेड कारीडोर में रहने वालो को ढकेलते ढकेलते उस दीवार से सटा दिया गया है, जहां से और पीछे जाया नहीं जा सकता है और आगे बढने पर पहले उसे माओवादी कहा जाता अब आंतकवादी माना जायेगा । ऐसे में किस रास्ते इस ग्रामिण आदिवासी को जाना चाहिये जहां वह सम्मान के साथ जिन्दा रह सके । इसका रास्ता ना तो सरकार बता रही है ना ही माओवादियो का संघर्ष रास्ता बना पा रहा है ।
फिल्म न्यूयार्क के आखिरी डायलाग जब नील मुकेश एफबीआई अधिकारी को जब यह कहता है कि जान अब्राहम गलत नहीं था । तो एफबीआई अधिकारी कहता है , सभी सही थे...शायद वक्त गलत था । जिसमें मुल्क ने भी गलत रास्ता चुना । लेकिन अब हालात बदल चुके है । वहां बदले हालात से मतलब ओबामा के सत्ता में आने का था । तो क्या भारतीय परिस्थितयो में भी रेड-कारिडोर फिल्म तभी बन पायेगी, जब यहां भी कोई ओबामा सत्ता में आ जायेगा। और फिल्म में नायक यह कहने की हिम्मत जुटा पायेगा कि शायद वह वक्त गलत था, जिसमें मुल्क भी गलत रास्ते पर था।
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Sunday, June 28, 2009
बिन मानसून...संसद के मानसून सत्र का मतलब !
जवाहर लाल नेहरु से लेकर राजीव गांधी तक के दौर में यानी चीन युद्द से लेकर बाढ़ तक के दौर में अकसर तमाम प्रधानमंत्रियो ने सासंदो से यही गुहार लगायी है कि विपदा के वक्त सांसदों को अपने क्षेत्र में रहना चाहिए । इंदिरा गांधी ने 1975 में बिहार में आयी बाढ़ के वक्त कांग्रेसी सांसद को डपटा कि उन्हें दिल्ली में नहीं बिहार में होना चाहिये। आम जनता के बीच उनके दुख दर्द को समझते हुये उनकी जरुरत का इंतजाम देखना चाहिये।
लेकिन वक्त किस हद तक बदल चुका है, इसका अंदाजा संसद के मानसून सत्र को लेकर लगाया जा सकता है। एक तरफ मानसून की देरी ने सूखे की स्थिति देश में ला दी है, वहीं दूसरी तरफ संसद उसी दिल्ली में मानसून सत्र के लिये तैयार हैं, जहां 4 से बारह घंटे तक बिजली कटौती सरकारी आदेश पर की जा रही है। समूचे उत्तर भारत में बिजली-पानी के हाहाकार के बीच संसद के मानसून सत्र का मतलब दिल्ली के लिये क्या है, अगर इसे पहले समझें तो लुटियन की दिल्ली को रोशनी से जगमग और एसी से ठंडा करने के लिये दिल्लीवालो को कई स्तर पर कुर्बानी देनी होगी। फिलहाल, दिल्ली के पास सिर्फ 1575 मेगावाट बिजली है। केन्द्र के वितरण के जरीय भी दिल्ली को कमोवेश 1500 मेगावाट बिजली मिल जाती है । जबकि दिल्ली की जरुरत 4171 मेगावाट की है । लेकिन मानसून सत्र का मतलब है लुटियन की दिल्ली में करीब 175 मेगावाट की खपत। क्योंकि संसद और साढे सात सौ सांसदों में से कोई भी न तो अंधेरे में रह सकता है, न ही एसी बंद कर सकता है। इस 175 मेगावाट का मतलब है, दिल्ली में बिजली कटौती में कम से कम हर इलाके में दो से तीन घंटे की बढोतरी। वहीं जितना पानी समूचे दक्षिणी दिल्ली में लगता है, करीब उतना ही पानी संसद के मानसून सत्र को एक महीने तक चलाने के लिये चाहिये। तो पानी की किल्लत को भी दिल्ली को ही भुगतना है। लेकिन इस पर सवाल नहीं किया जा सकता क्योंकि यह सांसदों के विशेषाधिकार का मामला है। लेकिन मानसून सत्र है किसके लिये यह सवाल देश के मद्देनजर तो उठाया ही जा सकता है। सरकार खुद मान चुकी है कि उत्तर-पश्चिम भारत में इस बार औसत से 17 से 26 फीसदी कम बारिश होगी। औसत से कम बारिश के आंकडों में कुछ कम की स्थिति पूरे देश की है। यहां तक कि चेरापूंजी में भी औसत से कम बरसात होगी। यह संकेत सूखा के हैं। लेकिन सरकार सबकुछ कहते हुये भी सूखा शब्द से बच रही है । देश के हालात क्या है और सरकार वैकल्पिक नीतियों को लेकर कितनी सजग है, इसका अंदाजा हालात पर गौर करने से मिल सकता है। देश में कोई राज्य ऐसा नहीं है, जहां बिजली की सप्लाई और मांग एकसरीखी हो। औसतन हर राज्य में छह सौ मेगावाट बिजली की कमी है।
मानसून में देरी और आसमान चढ़ता पारा अगर एक हफ्ते यानी बजट के दिन यानी 6 जुलायी तक बरकरार रहा तो पानी से पैदा होने वाली बिजली में 45 फीसदी की और कमी आ जायेगी। मसलन भाखडा सरीखे डैम की स्थिति यह हो जायेगी कि जहां पिछले साल 44 बिलियन क्यूबिक मीटर पानी था, वह करीब 5 बिलियन क्यूबिक मीटर पर आ जायेगा। यानी चार राज्यों को जिस भाखड़ा से पानी मिलता है, वहा बिसलरी की बोतल भर भी पानी देना मुश्किल हो जायेगा। यह स्थिति हिमाचल के पोंग से लेकर गुजरात के साबरमती और राजस्थान के राणा सागर से लेकर दक्षिण के नागार्जुना सागर तक की है। यहां पिछले साल की तुलना में 75 फिसदी कम पानी है।
वहीं तमिलनाडु के कृष्णराजा सागर में, जहा पिछले साल 41 बिलियन क्यूबिक मीटर पानी था, इस वक्त समूचा डैम सूख चुका है। पानी की कमी और बढ़ती गर्मी के बीच बिजली की बढ़ती मांग ने अब यह सवाल भी खड़ा किया है कि सरकार के पास विकल्प है क्या। बिजली के निजीकरण को जिस तेजी से हरी झंडी दी गयी, उसके सात साल बाद अगर दिल्ली की ही हालत देख लें कि इस दौर में बिजली की मांग 1100 मेगावाट बढ़ गयी लेकिन निजी क्षेत्र से एक यूनिट बिजली नहीं आयी। 2010 तक बिजली आ जायेगी, यह कयास अब लगाये जा रहे हैं। कमोवेश यह हालात देश के बहुतेरे दूसरे राज्यों की भी है।लेकिन बिजली पानी का यह संकट देश के उन सत्तर फीसदी लोगों के लिये सीधे पेट से जुड़ा है,जिनकी जिन्दगी ही उस जमीन पर टिकी है, जो गर्मी और पानी न मिलने से फटी जा रही हैं।
सवाल उठेगे कि आर्थिक सुधार की जो लकीर 1991 में बतौर वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने खिंची उसमें फसल बीमा या मानसून बीमा क्यों लागू नहीं किया गया। बाजार अर्थव्यवस्था ने पूंजी के जरीये मध्यम वर्ग की हैसियत और जरुरत का दायरा तो बढा दिया । लेकिन खेत में जब कुछ उगेगा ही नहीं तो मुनाफे की थ्योरी तले जमा की गयी पूंजी का होगा क्या । क्या वित्त मंत्री से प्रमोट होते होते प्रधानमंत्री बने मनमोहन सिंह यह मान चुके है कि एक देश के भीतर बन चुके दो देश में वित्त मंत्री या प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी एक देश को सभांलने की है, जिसका बैरोमिटर मानसून नहीं शेयर बाजार और बाजार अर्थव्यवस्था का वह खाका है, जहा उपभोक्ता बनना ही नागरिकता का धर्म निभाना है। और दुसरे भारत का वित्त मंत्री मानसून है। जिसके भरोसे बाजार नहीं बढ़ाया जा सकता। जबकि दुनिया के तमाम देशों में मानसून के बिगड़ने पर किसानों को इन्फ्रास्ट्रक्चर मुहैया करा कर विकास की गति को बरकरार रखा जाता है, इसे मनमोहन सिंह या तो मानते नहीं या फिर लागू करा पाने में सक्षम नहीं हैं। सवाल है आर्थिक सुधार ने न्यूनतम की लडाई को पूंजी से खरीदने की हैसियत तो बाजार अर्थव्यवस्था ने दे दी लेकिन न्यूनतम का विकल्प यह अर्थव्यवस्था नहीं दे पायी। इसका दागदार चेहरा राज्यों में मुख्यमंत्रियो की पहल से समझा जा सकता है। विकास के मद्देनजर बीजेपी के सबसे काबिल गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी और जमीन-किसान के दर्द को समझने वाले कांग्रेस के सबसे उम्दा आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री वाय एस आर रेड्डी ने भी मानसून की देरी में घुटने टेक कर मंदिर में पूजा पाठ का रास्ता अपना लिया। जबकि दोनों राज्यों में कृषि अर्थव्यवस्था को औघोगिक विकास से जोड़ने की बात दोनों ही नेताओ ने अपने पहले चुनाव को जीतने के साथ ही कही थी। यही हाल मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज शिंह चौहान और कर्नाटक के मुख्यमंत्री यदुरप्पा का हुआ । चौहान महाकाल के मंदिर पहुंच गये तो यदुरप्पा कुंभकोणम के मंदिर में। सभी ने इन्द्र देवता को खुश करने के लिये पूजा पाठ शुरु कर दी। किसी ने नहीं माना कि पर्यावरण से लगातार खिलवाड़ करने वाली आर्थिक नीतियो का विकल्प तैयार करने की जरुरत है। लेकिन देश का दर्द सांसद या मुख्यमंत्रियों के दरवाजे पर भी पहुंच पा रहा होगा, यह सोचना भी बेवकूफी होगी। क्योंकि आस्था के आसरे नेता खुद को आम जनता से जोड़ना तो चाहता है। लेकिन यही आस्था आम जनता के बीच सरकारों से भरोसा उठाकर निजी जद्दोजहद कैसे कराती है, इसका नजारा इलाहबाद में नजर आया, जहां रात में चांद की रोशनी में नग्न होकर महिलाये हल जोत रही हैं, जिससे इन्द्र देवता खुश हो जाये। यह परंपरा है इन्द्र को मनाने की है। जाहिर है यह दृश्य न न्यूज चैनल पकड़ सकते हैं, न ही सरकार की मुनाफे की अर्थव्यवस्था समझ सकती है । नग्न होकर हल चलाती महिलाओं की उस मानसिक स्थिति को भी वह सरकार कैसे समझ सकती हैं, जिसे न्यूक्लियर डील के आसरे हर समाधान का भरोसा है । जबकि यह महिलाये सबकुछ गंवाकर जीने की आखिरी लड़ाई में भी सरकार पर भरोसा नहीं कर पा रही हैं। इस दर्द को न तो मायावती का बुत समझ पायेगा, न ही राहुल का विकास मॉडल। क्योंकि राजनीतिक जमीन सींचने के लिये एक रात ग्वालिन या दलित के यहां बितायी जा सकती है। लेकिन हर रात दर्द से कराहते समाज के दर्द में शरीक नहीं हुआ जा सकता। दलित की बेटी का राजकुमारी हो जाना और राजकुमार का दलित के घर रात बिता देने में तब कोई फर्क नहीं आयेगा, जब तक घाव से रिसते मवाद को न देखा जाये । मानसून की देरी और गर्म हवा के थपेडो का दर्द गांव और छोटे शहरों में बिजली पानी के हाहाकार से कहीं आगे का है। जहां मवेशियों के लिये चारा नहीं है और दूधमुंहे बच्चों के लिये दूध नहीं है। गरीबी की रेखा से नीचे परिवारों के पास अन्न नहीं है, और सरकारी गोदामों में अन्न सड़ रहा है। सांसद विपदा की परिस्थितियों में ही हकीकत से रुबरु हो सकता है, इसका जिक्र कई बार इंदिरा गांधी ने किया। लेकिन नयी परिस्तितियो में विपदा से उभरे घाव से ज्यादा गहरा घाव तो सरकारी नीतियों के फेल होने का है। दिल्ली में फूड सिक्यूरटी का मामला सोनिया गांधी उठाती हैं। दिल्ली में नौकरशाह टारगेट से ज्यादा खादान्न दिखा भी देता है । लेकिन अन्न का वितरण कैसे हो और उसे सुरक्षित भंडारों में कैसे रखा जा सके, इसकी कोई व्यवस्था आजतक सरकार नहीं कर पायी है।
अर्थव्यवस्था के जरीये देश के साथ कैसा मजाक होता है, इसका नजारा मुद्रास्फीती की दर की शून्य के नीचे पहुंचने के दौर में ही मंहगाई के चरम पर पहुंचने से भी प्रधानमंत्री नहीं समझ पाते कि कही तो गडबडी है। असल में गड़बड़ी को विपदा के दौर में ही सांसद अपने अपने इलाको में रहते हुये महसूस कर सकते हैं। राहुल गांधी की कलावती से मुलाकात करने अगर आज कोई यवतमाल जिले के जालका गांव सडक के रास्ते जाये तो वह समझ जायेगा कि विदर्भ में किसान खुदकुशी क्यों करता है। पूरे इलाके में महाजनी सौ रुपये में जमीन-जोरु दोनो को अपने नाम करने से नहीं कतरा रही हैं। और जिन्दगी बचाने के लिये इससे कम या ज्यादा देने की हैसियत यहां के किसानों में बची नहीं है। आप कह सकते हैं मानसून सत्र का खास महत्व है, जिसमें बजट पेश किया जाना है। तो तकनीकी तौर पर इस बार बजट को स्टेडिंग कमेटी के पास तो जाना नहीं है और मानवीय तौर पर उस बजट से देश को क्या लेना देना है, जिसमें रुपया बनाने और खर्च करने की बाजीगरी होगी।
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Wednesday, June 24, 2009
कैसे हुआ भाजपा का बंटाधार
"जो लोग कल तक संघ की सभा और बैठकों में भौतिक इंतजाम करते थे। स्वंयसेवकों को भोजन कराकर, अपने घर में ठहराकर खुद को धन्य समझते थे । अब वही शीर्ष पर पहुंच गये हैं। भौतिक इंतजाम करना-करवाना पहले सरोकार की राजनीति करने वालो के प्रति श्रद्दा रखने समान था । अब भौतिक इंतजाम करवा पाना राजनीति का मूल मंत्र बन चुका है। पहले संघ की वैचारिक समझ के आसरे जनसंघ और फिर भाजपा की राजनीतिक जमीन बनाने की बात होती रही, अब भाजपा की राजनीतिक जमीन पर ही संघ की जगह नहीं बची है । सरोकार नहीं सुविधा के आसरे राजनीति खरीदी और बेची जा रही है,ऐसे में हम जैसे पुराने स्वसंसेवकों को तो नये मंत्रियो से मुलाकात का भी वक्त नहीं मिल पाता है।"
यह वक्तव्य गुजरात के स्वास्थ्य मंत्री से मुलाकात का इंतजार कर रहे गुरु गोलवरकर के दौर में प्रचारक की हैसियत से जुडे संघ के बुजुर्ग स्वयंसेवक का दर्द है। लेकिन यह दर्द सिर्फ मोहन भाई तक सिमटा हो ऐसा भी नहीं है। भाजपा ही नहीं संघ के भीतर भी जो पीढ़ी और जो सोच वाजपेयी सरकार के दौर में चूकती चली गयी और खामोश रहना उसकी फितरत बन गयी 2009 के जनादेश ने अचानक उन्हें जुबान दे दी है। सौराष्ट्र से लेकर नागपुर तक के बीच एक हजार किलोमीटर की लंबी पट्टी पर जनसंघ या भाजपा से लेकर संघ तक का वर्तमान का कोई ऐसा प्रमुख कार्यकर्त्ता या नेता या फिर स्वयंसेवक नही होगा, जिसने उस इलाके में काम नहीं किया हो।
लेकिन इस पूरे इलाके में संघ के स्वयसेवकों और भाजपा के कार्यकर्त्ताओं के भीतर झांकने पर साफ लगता है कि संघ ने जो राजनीतिक जमीन भाजपा के लिये दशकों की मेहनत से बनायी, उसे नेताओ के सत्ता प्रेम में ना सिर्फ गंवाया गया बल्कि संघ के भीतर भी नेता सरीखी एक नयी लीक तैयार हो गयी जो संघर्ष नही सुविधा टटोलने लगी। नागपुर के मनसुख भाई की मानें को भाजपा का मतलब मुद्दों को उठाकर भावनात्मक तौर पर संघ की सामाजिक जमीन पर राजनीतिक लाभ उठाना जरुर है लेकिन भाजपा में मुद्दों में बडे नेता हो गये और नेताओ के सामने संघ के स्वयंसेवक नकारे वोट बैंक भी नही बन पाये ।
नागपुर से सटे छिंदवाडा के राजन ने तो देवरस के उस प्रयोग को बेहद करीब से देखा जो जेपी के जरिये 1974 में रचा गया । लेकिन किसी चुनावी राजनीति को पहली और आखिरी बार सुन्दरलाल पटवा के साथ छिंदवाडा में देखा जब कांग्रेस की कभी न हारने वाली सीट पर भाजपा के पटवा कांग्रेस के कमलनाथ की पत्नी अलका कमलनाथ को चुनौती देने पहुंचे थे। पटवा जब छिंदवाडा में उतरे तो उनके पीछे चावल-गेंहू-आलू-प्याज से लदा एक ट्रक भी आया। दो महीने चुनावी मशक्क्त पटवा ने संघ के प्रचारको और सामूहिक सरोकार की राजनीति के जरीये छिदंवाडा में कुछ इस तरह रची कि जो भी पटवा के प्रचार मुख्यालय में पहुंचता, वहां लंगर में खाने का इंतजाम हर किसी के लिये हमेशा रहता। इस दौर में विचारों का आदान-प्रदान होता और सामाजिक संगठन बनाने की संघ की सोच को मूर्त रुप में कैसे लाया जा सकता है, इस पर हर किसी से पटवा चर्चा करने से नहीं चूकते । प्रचार की कमान पूरी तरह संघ के अलग अलग संगठनों ने संभाल रखी थी । राजन के मुताबिक चुनाव प्रचार में करीब ढाई लाख रुपये खर्च हुये, जिसमें लंगर का खाना भी शामिल था। जिसका खर्च सबसे ज्यादा डेढ़ लाख तक का था । लेकिन पटवा की जीत के बावजूद अगले ही चुनाव में छिंदवाडा में टिकट उसी को दिया गया जो कमलनाथ की पूंजी की सत्ता से टकरा सकता था।
जाहिर है कांग्रेस के तौर तरीको की राजनीति को भाजपा ने अपनाया, लेकिन संघ का साथ छूटता गया । असल में भाजपा ने चुनाव की राजनीति के जो तौर तरीके को अपनाया, उसमें संघ के तरीके फिट बैठ भी नहीं सकते थे । क्योंकि संघ का जोर संगठन के जरिये सामाजिक शुद्दीकरण के उस मिजाज को पकड़ना था, जिससे वोट डालने के साथ वैचारिक भागेदारी का सवाल भी वोटर में समाये। लेकिन भाजपा ने वोटर को सत्ता की मलायी से जोड़ने की राजनीतिक पहल न सिर्फ उम्मीदवारो के चयन को लेकर की बल्कि चुनावी घोषणापत्र से लेकर चुनाव प्रचार के दौरान वोटरों को लुभाने की ही जोर-आजमाइश की।
संघ के स्वयसेवको के मुताबिक चूंकि भाजपा को कोई भी वोटर संघ से इतर देखता नहीं तो सत्ता की मलाई का प्रचार संघ के भीतर भी समाया। यानी यह बात सामाजिक तौर पर बहस का हिस्सा बनी की भाजपा की सत्ता का मतलब संघ के लिये सुविधाओ की पोटली खुलना है। इससे संघ के प्रति आम लोगो का नजरिया भी बदला । सेवक भाव के बहले सुविधा भाव नये स्वयंसेवको में ज्यादा है। पुणे के बुजुर्ग रविन्द्र मानाटे के मुताबिक आरएसएस के आठ दशक के दौर की सामाजिक समझ को वाजपेयी सरकार के दौर में सबसे ज्यादा झटका लगा, इससे इंकार नहीं किया जा सकता। भाजपा के भीतर नेताओ की कतार की तरह संघ के भीतर भी नेताओं की कतार सत्ता से जुडने से नहीं चूकी। ऐसे में वह स्वयंसेवक हाशिये पर चले गये जो एक ऐसी राजनीतिक जमीन लगातार बना रहे थे, जिसका लाभ भाजपा को लगातार मिलता रहा ।
भाजपा ने काग्रेस की तर्ज पर जिस तरह की राजकरण व्यवस्था को अपनाते हुये नीतियो को अपनाया, उसका सबसे बडा झटका संघ को ही लगा। नयी आर्थिक नीतियो को लेकर भाजपा जिस तरह कारपोरेट घरानो का हित देखने लगी और विश्व बैक के निर्देशो का लागू कराने में कांग्रेस से कहीं ज्यादा तेजी दिखाने लगी उससे अचानक संघ के वह सभी संगठन भोथरे साबित होने लगे, जिनके भरोसे भाजपा की कभी पहचान बनी। किसान मंच, स्वदेशी जागरण मंच से लेकर आदिवासी कल्याण मंच सरीखे दर्जन भर से ज्यादा आरएसएस के संगठन पहले बेकार हुये और फिर बीमार। राजनीतिक तौर पर भाजपा और संघ के बीच नीतियों को लेकर टकराव इन्हीं संगठनों के जरीये ही उभरा । यानी जनता के बीच यह संवाद कभी नहीं गया कि भाजपा की नीतियो को संघ नहीं मानता। उल्टे स्वदेशी जागरण मंच के दत्तोपंत ठेंगडी ने जब भाजपा की आर्थिक नीतियों पर चोट की या फिर किसान संघ ने कृषि अर्थव्यवस्था को लेकर भाजपा की अनदेखी पर निशाना साधा तो आरएसएस रेफरी की भूमिका में ही आयी। आदिवासी कल्याण संघ ने भी जब आदिवासियो की जमीन और जंगल खत्म करने की बात उठा कर भाजपा पर हमला बोला तो आरएसएस बीच-बचाव की मुद्रा में ही नजर आयी । इससे आरएसएस को लेकर भी उस राजनीतिक जमीन के लोगों में उहापोह की स्थिति बनी, जो संघ के जरीये भाजपा को देखते थे। पुणे के किसानों ने जब एसइजेड को लेकर वैकल्पिक एसइजेड का फार्मूला खुद ही विकसित करने का आवेदन सरकार को दिया तो स्वदेशी जागरण मंच और किसान संघ तक को समझ नहीं आया कि उसकी भूमिका अब क्या होनी चाहिये।
स्वयंसेवक रविन्द्र के मुताबिक जो किसान पहले नयी आर्थिक नीतियों से परेशान होकर संघ की छांव में आते थे, नयी परिस्थितियों में वह संघ पर ही कसीदे गढ़ने लगे। नया असर यही है कि महाराष्ट्र में किसान राजनीतिक तौर पर भाजपा के साथ नहीं है और सामाजिक तौर पर आरएसएस को जगह नहीं देते। यहा तक की विदर्भ में शिवसेना की पहल को किसानो ने ज्यादा मान्यता दी है। चुनाव से ऐन पहले जब राजनाथ सिंह ने विदर्भ से किसान यात्रा शुरु की तो उसमें किसान की जगह भाजपा के शहरी कार्यकर्त्ता और किसानो को कर्ज देकर मुनाफा कमाने वाले भाजपायी ज्यादा थे । यवतमाल के नानाजी वैघ की उम्र 73 साल है । विश्व हिन्दू परिषद के गठन के वक्त ही संघ से वास्ता पड़ा लेकिन मंदिर मुद्दे पर जिस तरह का रुख वाजपेयी सरकार ने अपनाया और विहिप के विरोध के बावजूद आरएसएस ने महज रेफरी की भूमिका जिस तरह अपनायी, उससे आजिज आकर वैघ साहब ने संघ से रिटायरमेंट ले लिया । पूछने पर साफ कहने से नहीं चूकते कि संघर्ष सत्ता के लिये नहीं बेहतर समाज के लिये था। लेकिन अब सत्ता और नेता ही केन्द्र में हैं तो उसमें उनका क्या काम। राहुल गांधी यवतमाल के ही जालका गांव में जब कलावती से मिलने पहुचे थे, तो वैघ साहब वहीं मौजूद थे । नानजी वैघ के मुताबिक राहुल की यह राजनीतिक तिकडम हो सकती है कि वह कलावती का नाम लेकर खुद को देश के सुदूर हिस्सों से जोड़ रहे हों। लेकिन इससे सरोकार तो बना। संघ ने तो शुरुआत ही सरोकार से की थी और आठ दशकों से सरोकार की राजनीति को ही महत्व दिया। लेकिन भाजपा की सत्ता की मलाई की चाहत ने सभी नेताओ को कमरे में कैद कर दिया और दिल्ली में खूंटा गाढ़ दिया। वैघ का मानना है कि भाजपा कुछ न भी करे लेकिन उसके नेता लोगो से सरोकार तो बनाते, राजकरण में भाजपा ने सरोकार तो छोडा ही संघ को भी सरोकार की समझ के बदले बैठक और चिंतन से जोड दिया।
खास बात यह है कि सौराष्ट्र से नागपुर की पट्टी में जितने सवाल संघ के भीतर भाजपा को लेकर है, उतने ही सवाल भाजपा के कार्यकर्ताओ में संघ को लेकर भी है । नागपुर में संघ का मुख्यालय जरुर है लेकिन यहां भाजपा लोकसभा चुनाव जीत नही पाती है। और तो और जब इमरजेन्सी में सरसंघचालक देवरस नागपुर में बैठकर जेपी के जरीये राष्ट्रीय प्रयोग कर रहे थे तो उसके बाद हुये चुनाव में चाहे जनता पार्टी को दो तिहायी बहुमत मिल गया हो लेकिन नागपुर ही नहीं विदर्भ की सभी ग्यारह सीटों पर कांग्रेस जीत गयी थी। उस वक्त देवरस का इन्टरव्यू नागपुर से प्रकाशित तरुण भारत में छपा था। जिसमें उन्होंने विदर्भ में कांग्रेस की जीत पर यही कहा था कि संघ के सरोकार विदर्भ से नहीं जुड़ पाये हैं तो इसकी बडी वजह दलित राजनीति है। और आंबेडकर की राजनीतिक ट्रेनिंग है। लेकिन भाजपा के भीतर गोविन्दाचार्य की सोशल इंजीनियरिंग की वजह से कल्य़ाण सिंह का कद बढ़ना देखा गया और उत्तर प्रदेश में एक वक्त भाजपा की राजनीतिक सफलता को भी कल्याण सिंह से जोड़ा गया लेकिन वही कल्याण सिंह बाबरी मस्जिद ढहाने के बाद 1993 में जब पहली बार नागपुर आये थे तो संघ मुख्यालय में वह सिर्फ पांच मिनट ही रह पाये थे। इतनी छोटी मुलाकात के पीछे आरएसएस का ब्राह्माणवाद या दलित-पिछडा राजनीति को जगह ना देना भी माना गया। लेकिन संघ को लेकर कार्यकर्त्ताओ में कुलबुलाहट इतनी भर ही नही है कि संघ की राजनीतिक जमीन में भाजपा सत्ता पा नहीं सकती ।
बडा संकट यह है कि भाजपा में अपना आस्तितिव बनाने के लिये नेता संघ की चौखट पर माथा टेकता है और संघ में खुद को बड़ा दिखाने के लिये वरिष्ठ संघी भाजपा को राजनीतिक हिदायत देता है । ऐसे में बंटाधार दोनो का हुआ । उमा भारती खुल्लमखुल्ला आडवाणी से गाली गलौच कर संघ मुख्यालय पहुंच कर राम माधव के साथ ही तस्वीर खिंचवाती हैं, और संघ भी उन्हें पुचकार कर सेक्यूलर रेफरी बन जाता है। ऐसे में सत्ता की सहूलियत ने संघ को भी सरोकार से डिगाया और संघ के भीतर भाजपा सरीखा पतन भी हुआ । कभी वाजपेयी-आडवाणी को उम्र की दुहायी देकर रिटायर होने की बात कही गयी। तो जिन्ना मसले पर आडवाणी से इस्तीफा भी मांगा गया और प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाने पर हरी झंडी भी दी गयी। यानी रेफरी की ही भूमिका आरएसएस की बढ़ती रही। संघ के भीतर एक तबके ने ठीक उसी तरह राजनीतिक मान्यता ली जैसी मान्यता संघ को खारिज कर पैसे वाले उन समर्थको को मिली , जो एक दशक पहले संघ या भाजपा की बैठको में भौतिक जरुरतो का इंतजाम अपने पैसे से करते थे। यानी पैसे वाले समर्थक चुनावी टिकट पाकर नेता बन गये तो संघ के वरिष्ठ और प्रभावी राजनीतिज्ञ बनने लगे। सत्ता ने किस तरह भाजपा को सिमटाया है, इसका अंदाजा भाजपा के मुख्यमंत्रियो को देखकर भी लगाया जा सकता है । छत्तीसगढ में रमन सिंह और मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान जब मुख्यमंत्री बने थे तो उन्हें कोई पहचानाता नहीं था। लेकिन अब इन दोनो के अलावे दोनो राज्य में कोई और भाजपा नेता का नाम जुबान पर आता नहीं है। कमोवेश यही स्थिति राजस्थान में वसुंधरा राजे सिंधिया की है और तमिलनाडु में येदुरप्पा की है । यानी दूसरी लाइन किसी नेता ने बनने ही नही दी। गुजरात में नरेन्द्र मोदी ने तो दूसरी-तीसरी किसी लकीर पर नेताओं को नहीं रखा है। जबकि, मुख्यमंत्री बनने से पहले अहमदाबाद या राजकोट के सर्किट हाउस का अदना अधिकारी भी मोदी को ग्राउंड फ्लोर का वीवीआईपी कमरा नहीं देते हुये हड़का देता था। कहा जा सकता है यही संकट भाजपा के केन्दिय नेताओ का भी है। 2004 में हार के बावजूद बाजपेयी ने आडवाणी के लिये रास्ता नहीं खोला था। 2009 में आडवाणी हार के बावजूद किसी दूसरे के लिये रास्ता नहीं खोल रहे हैं। माना जाता है सरसंघचालक मोहन राव भागवत के लिये पिछले एक साल से सुदर्शन जी भी रास्ता नहीं खोल रहे थे । लेकिन भागवत ने रास्ता बना ही लिया । लेकिन राजनीतिक तौर पर सवाल अनसुलझा है कि संघ परिवार में जब अपनों के लिये ही रास्ता नहीं बनाया जाता तो जनता इस परिवार के लिये रास्ता कैसे बनायेगी।
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Monday, June 22, 2009
"लालगढ को लालगढ तक देखना वैसी ही भूल होगी जैसे माओवादियो को सिर्फ लालगढ में देखना "
माओवादी नेता कामरेड किशनजी से पुण्य प्रसून वाजपेयी की बातचीत
लालगढ़ में पुलिस और अर्धसैनिक बलों के आपरेशन शुरु होने के 72 घंटो बाद हालात कितने बदले हैं और माओवादियों की अगली पहल क्या होगी यह सवाल हर किसी के जहन में है। खासकर पहली बार सीपीएम लालगढ़ में माओवादियों के सफाये का सवाल उसी तरह उठा रही है, जैसा कभी नक्सलबाडी में किसानों ने जमींदारो को लेकर उठाया था । जब इन सवालो को मैंने कामरेड किशनजी के सामने रखा तो उनका पहला और सीधा सपाट जबाब यही आया कि "लालगढ को लालगढ तक देखना वैसी ही भूल होगी जैसे माओवादियो को सिर्फ लालगढ में देखना। " कामरेड किशन के इस जबाब के बाद मैने सवाल-दर-सवाल उठाये और जबाब भी बिना किसी लाग लपेट के इस तरह आया जैसे लालगढ युद्द में पुलिस का ऑपरेशन नहीं बल्कि कौई बौद्दिक क्लास चल रही हो।
सवाल- लालगढ को लालगढ तक देखना भूल होगी । इसका मतलब क्या क्या है ।
जबाव- लालगढ पश्चिमी मिदनापुर का हिस्सा है । और इस वक्त मिदनापुर के करीब साढे सोलह हजार गांवो में आदिवासी ग्रामीण सीपीएम सरकार के खिलाफ लड़ाई लड़ने को तैयार है । इन ग्रामीणों की हालत ऐसी है, जहां इनके पास गंवाने के लिये कुछ भी नही है । इन गांवो में खाना या पीने का पानी तक सरकार मुहैया नहीं करा पायी है । सरकारी योजनाओ के तहत मुफ्त अन्न हो या कुएं का पानी । इसके लिये इन्हे सीपीएम काडर पर ही निर्भर रहना पड़ता है । गांव की बदहाली और सीपीएम काडर की खुशहाली देखकर यही लगता है कि इलाके में यह नये दौर के जमींदार है । जिनके पास सबकुछ है। गाड़ी, हथियार, धन-धान्य सबकुछ । लालगढ के कुछ सीपीएम काडर के घरों में तो एयरकंडीशन भी मिला। पानी के बड़े बड़े 20-20 लीटर वाले प्लास्टिक के टैंक मिले । जबकि गांव के कुंओं में इन्होने कैरोसिन तेल डाल दिया जिससे गांववाले पानी ना पी सके । और यह सब कोई आज का किस्सा नहीं है । सालो-साल से यह चला आ रहा है । किसी गांववाले के पास रोजगार का कोई साधन नहीं है । जंगल गांव की तरह यहा के आदिवासी रहते है । यहां अभी भी पैसे से ज्यादा सामानो की अदला-बदली से काम चलाया जाता है । इसलिये सवाल माओवादियों का नहीं है । हमनें तो इन्हे सिर्फ गोलबंद किया है । इनके भीतर इतना आक्रोष भरा हुआ है कि यह पुलिस-सेना की गोली खाने को भी तैयार है । और गांव वालो का यह आक्रोष सिर्फ लालगढ़ तक सीमित नही है ।
सवाल- तो माओवादियो ने गांववालो की यह गोलबंदी लालगढ़ से बाहर भी की है ।
जबाब- हम लगातार प्रयास जरुर कर रहे है कि गांववाले एकजुट हों। वह राजनीतिक दलों के काडर के बहकावे में अब न आये । क्योकि उनकी एकजुटता ही इस पूरे इलाके में कोई राजनीतिक विकल्प दे सकती है । हमारी तरफ से गोलबंदी का मतलब ग्रामीण आदिवासियों में हिम्मत पैदा करना है, जिन्हें लगातार राजनीतिक लाभ के लिये तोड़ा जा रहा था । सीपीएम के काडर का काम इस इलाके में सिर्फ चुनाव में जीत हासिल करना ही होता है। पंचायत स्तर से लेकर लोकसभा चुनाव तक में सिर्फ चुनाव के वक्त गाववालों को थोड़ी राहत वोट डालने को लेकर मिलती क्योकि इलाके में कब्जा दिखाकर काडर को भी उपर से लाभ मिलता । लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव में हमने चुनाव का बांयकाट कराकर गाववालो को जोडा और सीपीएम काडर पर निशाना साधा। उससे सीपीएम उम्मीदवार जीता जरुर, लेकिन उनकी पार्टी में साफ मैसेज गया कि मिदनापुर में सीपीएम की पकड खत्म हो चुकी है । जिसका केन्द्र लालगढ़ है ।
सवाल--तो क्या ममता बनर्जी अब अपना कब्जा इस इलाके में देख रही हैं । इसीलिये वह आपलोगों को मदद कर रही हैं ।
जबाब- ममता बनर्जी क्या देख रही है या क्या सोच रही है, यह तो हम नहीं कह सकते । लेकिन ममता ने नंदीग्राम के आंदोलन में जो सवाल उठाये उसपर हमारी सहमति जरुर है । लेकिन लालगढ में आंदोलन ममता को राजनीतिक लाभ पहुचाने के लिये हो रहा है, ऐसा सोचना सही नहीं होगा । ममता को लेकर हमें यह आशा जरुर है कि वह ग्रामीण आदिवासियो की मुश्किलो को समझते हुये अपने ओहदे से सरकार को प्रभावित करेंगी । लेकिन संघर्ष का जो रास्ता यहा के आदिवासियो ने पकड़ा है, उसे राजनीतिक तौर पर हम राजनीतिक विकल्प के तौर पर देख रहे हैं क्योकि बंगाल की स्थितिया इतनी विकट हो चली है कि लालगढ़ आंदोलन को पूरे राज्य में बेहद आशा के साथ देखा जा रहा है । वामपंथी विचारधारा को मानने वाला आम शहरी व्यक्ति इसमें नक्सलबाडी का दौर देख रहा है ।
सवाल---नक्सलबाडी से लालगढ़ को जोड़ना जल्दबाजी नहीं है।
जबाब---जोड़ने का मतलब हुबहू स्थिति का होना नहीं है । जिन हालातों में सीपीएम बनी और जनता ने कांग्रेस को खारिज कर सीपीएम को सत्ता सौपी । चालीस साल बाद ना सिर्फ उसी जनता के सपने टूटे है, बल्कि सीपीएम भी भटक चुकी है । क्योंकि जिस जमीन-किसान के मुद्दे के आसरे वाममोर्चा तीस साल से सत्ता में काबिज है और जमीन पर खडा किसान लहूलुहान हो रहा है तो उसका आक्रोष कहां निकलेगा । क्योंकि इन तीस सालो में भूमिहीन खेत मजदूरो की तादाद 35 लाख से बढकर 74 लाख 18 हजार हो चुकी है । राज्य में 73 लाख 51 हजार भूमिहीन किसान है । इस दौर में चार लाख एकड़ जमीन भूमिहीनो में बांटने के लिये अधिग्रहित भी की गयी । लेकिन अधिग्रहित जमीन का 75 फिसदी कौन डकार गया, इसका लेखा-जोखा आजतक सीपीएम ने जनता के सामने नहीं रखा । छोटी जोत के कारण 90 फिसदी पट्टेदार और 83 फिसद बटाईदार काम के लिये दूसरी जगहो पर जाने के लिये मजबूर हुये । इसमें आधे पट्टेदार और बटाईदारो की हालत नरेगा के तहत काम मिलने वालों से भी बदतर हालत है। इन्हें रोजाना के तीस रुपये तक नहीं मिल पाते। लेकिन नया सवाल कही ज्यादा गहरा है, क्योकि एक तरफ राज्य में 11 लाख 75 हजार ऐसी वन भूमि है, जिसपर खेती हो नहीं सकती। और कंगाल होकर बंद हो चुके उद्योगों की 40 हजार एकड जमीन फालतू पड़ी है । वहीं किसानी ही जब एकमात्र रोजगार और जीने का आधार है तो इनका निवाला छीनकर सरकार खेती योग्य जमीन में ही अपने आर्थिक विकास को क्यों देख रही है । यही हालात तो नक्सलबाडी के दौर में थे ।
सवाल- लेकिन बुद्ददेव सरकार अब माओवादियो पर प्रतिबंध लगाकर कुचलने के मूड में है ।
जबाव- आपको यह समझना होगा कि सीपीएम का यह दोहरा खेल है । बंगाल में माओवादियों के खिलाफ सीपीएम सरकार का रुख दूसरे राज्यों से भी कड़ा है । हमारे काडर को चुन चुन कर मारा गया है । तीस से ज्यादा माओवादी बंगाल के जेलों में बंद है । अदालत ले जाते वक्त इनका चेहरा काले कपडे से ढक कर लाया-ले जाया जाता है ...जैसा किसी खूखांर अपराधी के साथ होता है । दमदम जेल में बंद माओवादी हिमाद्री सेन राय उर्फ शोमेन इसका एक उदाहरण है । प्रतिबंध लगाना राजनीतिक तौर पर सीपीएम के लिये घाटे का सौदा है क्योकि लालगढ सरीखी जगहों पर गांव के गांव माओवादी हैं। क्या प्रतिबंध लगाकर बारह हजार गांववालो को जेल में बंद किया जा सकता है । लेकिन चुनाव के वक्त चुनावी सौदेबाजी में यह गांववाले सीपीएम को भी वोट दे देते है क्योकि हम चुनाव लड़ते नहीं है । अगर प्रतिबंध लगता है तो गांव के गांव जेल में बंद तो कर नहीं सकते लेकिन पुलिस को अत्याचार करने का एक हथियार जरुर दे सकते है । जिससे सीपीएम के प्रति राजनीतिक तौर पर गांववालो में और ज्यादा विरोध होगा ही । अभी तो आंदोलन के वक्त ही पुलिस अत्याचार होता है । नंदीग्राम में भी हुआ और लालगढ में भी हो रहा है । महिलाओ के साथ बलात्कार की कई धटनाये सामने आयी है । लेकिन प्रतिबंध लगने के बाद पुलिस की तानाशाही हो जायेगी इससे इंकार नहीं किया जा सकता है ।
सवाल- लेकिन काफी गांववाले माओवादियों से भी परेशान है, वह पलायन कर रहे हैं।
जबाब- हो सकता है...क्योकि पलायन तो गांव से हो रहा है । लालगढ़ में जिस तरह सीपीएम और माओवादियो के बीच गांववाले बंटे हैं, उसमें पुलिस आपरेशन शुरु होने के बाद सीपीएम समर्थक गांववालो का पलायन हो रहा है...इससे इंकार नहीं किया जा सकता । लेकिन इसकी वजह हमारा दबाब नही है बल्कि पुलिस कार्रवायी सीपीएम कैडर की तर्ज पर हो रही है । जिसमें गांव के सीपीएम समर्थको के इशारे पर माओवादी समर्थकों पर पुलिस अत्याचार हो रहा है । इसलिये अब गांव के भीतर ही सीपीएम समर्थक ग्रमीणो का विरोध हो रहा है । उन्हें गांव छोडने के लिये मजबूर किया जा रहा है । जो गांव छोड रहे हैं, उनसे दस रुपये और एक किलोग्राम चावल भी गांव में बचे लोग ले रहे है । जिससे संघर्ष लंबे वक्त तक चल सके ।
सवाल--आप ग्राउंड जीरो पर है । हालात क्या है लालगढ़ के ।
जबाब-- लालगढ टाउन पर पुलिस सीआरपीएफ ने कैप जरुर लगा लिये हैं । लेकिन गांवो में किसी के आने की हिमम्त नहीं है । आदिवासी महिलाए-पुरुष बच्चे सभी तो लड़ने मरने के लिये तैयार हैं । लेकिन हम खुद नही चाहते कोई आदिवासी - ग्रामीण मारा जाये । इसलिये यह सरकारी प्रचार है कि हमने गांववालो को मानव ढाल बना रखा है । पहली बात तो यह कि गांववाले और माओवादी कोई अलग नही हैं। माओवादी बाहर से आकर यहा नही लड़ रहे । बल्कि पिछले पांच साल में लालगढ में गांववाले सरकार की नीतियो के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं । फिर हमारी तैयारी ऐसी है कि पुलिस चाह कर भी गांव तक पहुंच नहीं सकती है। जंगल में गुरिल्ला युद्द की समझ हमे पुलिस से ज्यादा है । इसलिये पुलिस वहीं तक पहुच सकी है, जहा तक बख्तरबंद गाडियां जा सकती है । उसके आगे पुलिस को अपने पैरो पर चल कर आना होगा ।
आखिरी सवाल- कभी यह अतिवाम सीपीएम में ही थी, अब आमने सामने आ जाने की वजह ।
जबाव--अच्छा किया जो यह सवाल आपने आज पूछ लिया । क्योंकि आज 21 जून को ही बत्तीस साल पहले 1977 में ज्योति बाबू मुख्यमंत्री बने थे । पहली बार जब 1967 मे संयुक्त मोर्चे की सरकार में ज्योति बसु उपमुख्यमंत्री बने । लेकिन 1964 में जो सवाल भूमि को लेकर वाम आंदोलन खडा कर रहा था उसे संयुक्त मोर्चा की सरकार ने जब सत्ता में आने के बाद टाला तो अतिवाम ने सीपीएम के खिलाफ आंदोलन की पहल की । उस वक्त जमीन के मुद्दे पर ज्योति बसु सरकार ने सीपीआई एमएल पर या आरोप लगाया था कि उन्हें अतिवाम धारा ने नीतियो को लागू कराने का वक्त नहीं दिया । अब हमारा सवाल यही है कि जिन बातों को ज्योति बसु ने 42 साल पहले कहा था जब आजतक वही पूरे नहीं हो पाये तो अब और कितना वक्त दिया जाना चाहिये ।
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Thursday, June 18, 2009
लालगढ़ के राजनीतिक प्रयोग में ममता प्यादा भर हैं
किसने हमारे कुंओं में कैरोसिन तेल डाला?...... नये जमींदार ने। किसने चावल में जहर भरी दवाई मिला दी? .. नये जमींदार ने। किसने हमें हमारी जमीन से उजाड़ा?... नये जमींदार ने। पुलिस किसकी है.? नये जमींदार की। सेना किसके लिये है?... नये जमींदार के लिये। तो अब लड़ाई किससे है ?.. नये जमींदार से। यह नारे लालगढ के हैं । 16 जून को लालगढ़ टाउन के बीच मैदान में करीब छह सौ गांव के पन्द्रह हजार से ज्यादा लोग जमा हुये तो मंच से यही नारे लग रहे थे। मंच से आवाज आती... नये जमींदार पर निशाना है और हजारो की तादाद में जमा लोग इस आवाज को आगे बढाते हुये कहते.... या खुद निशाना बन जाना है।
वाममोर्चा के तीस साल के शासन में पहली बार माओवादियो का रुख वामपंथियो के खिलाफ ठीक उसी तरह है, जैसे चालीस साल पहले कांग्रेस के खिलाफ वामपंथियो ने हथियार उठाकर कांग्रेस को जमींदार और फासिस्ट करार दिया था। वहीं चालीस साल बाद अब संघर्ष से निकल कर सत्ता में पहुची सीपीएम को फासिस्ट और जमींदार का तमगा माओवादी दे रहे है। पश्चिम बंगाल में वाम राजनीति का चक्का एक सौ अस्सी डिग्री में किस तरह घूम चुका है, इसका अंदाजा सीपीआई माओवादी की सीधी पहल से समझा जा सकता है।
16 जून को लालगढ़ टाउन के मैदान की सभा को संबोधित करने और कोई नहीं, उसी आंदोलन से निकले नेता पहुंचे थे, जिन्होंने साठ के दशक में नक्सलबाडी में हथियार उठाकर कांग्रेस के शासन के खिलाफ बिगुल फूंका था । और आंदोलन की आग उस वक्त इतनी तेज हुई थी कि सीपीआई में दो फाड़ हो गया था। और तीन साल बाद यानी 1967 में ही पहली बार गैर कांग्रेसी संयुक्त मोर्चा सरकार बनी, जिसमें ज्योति बसु उप-मुख्यमंत्री थे। लेकिन साठ के दशक में नक्सलबाडी की आग ने वामपंथियो को यह सीख जरुर दे दी की बंगाल की जमीन वामपंथियो के भटकाव को भी बर्दाश्त नहीं करेगी। उस वक्त वजह भी यही रही कि सीपीआई के भटकाव से टूट कर निकली सीपीएम ने जंगल-जमीन से जुड़े मुद्दो को ही अपनी राजनीति का पहला आधार बनाया। नक्सलबाडी की इस आग ने संसदीय राजनीति में चाहे सीपीएम को सफलता दे दी लेकिन आंदोलन की कमान उस दौर जिन एमएल और एमसीसी संगठनों ने थाम रखी थी, पहली बार यही दोनो धारायें एक साथ सीपीएम के खिलाफ बंगाल में हथियार उठाये हुये हैं।
राजनीतिक तौर पर सीपीआई एमएल पीपुल्स वार और एमसीसीआई 2004 में एक साथ हुये। लेकिन विलय के बाद बने सीपीआई माओवादी के लिये बीते पांच साल में यह पहला मौका है, जब राजनीतिक तौर पर वह सीधे सीपीएम को जमींदार और फासिस्ट करार दे कर हथियारबंद संघर्ष के जरीये चुनौती देने को तैयार है । जाहिर है सीधे राज्य के खिलाफ इस तरह हथियारबंद संघर्ष नक्सलबाडी के बाद प्रयोग के तौर पर कहीं हुआ तो वह आंध्र-प्रदेश है । जहां नक्सली संगठन पीपुल्स वार ने राज्य को चुनौती दी तो संसदीय राजनीति में कांग्रेस से लेकर एनटीआर और 2004 में तेलगंनाराष्ट्वादी पार्टी ने चुनावी लाभ भी उठाया । लेकिन बंगाल की स्थिति इस बार सबसे ज्यादा जटील है। नंदीग्राम की आग को राजनीतिक तौर पर ममता बनर्जी ने सीधे किसी सोच के तहत ढाल नहीं बनाया। बल्कि पिछले चालीस साल की जो राजनीतिक ट्रेनिग बंगाल में सत्ताधारी वामपंथियो ने ही जनता को दी है, उसका असर यही हुआ कि जब वाममोर्चा सरकार जंगल-जमीन से जुडे मुद्दो को बिना सुलझाये ही आगे बढी तो सुलगते नंदीग्राम का राजनीतिक असर वामपंथी जनता में खुद-ब-खुद हुआ। और ममता बनर्जी को इसका चुनावी लाभ मिला। लेकिन ममता बनर्जी की राजनीतिक ट्रेनिंग वाम राजनीति के जरीये नहीं हुई है, इसलिये लालगढ़ की हिंसा के बीच जब ममता बनर्जी बंगाल में इस बात का ऐलान करती है कि हिंसा के जरीये समाधान नहीं हो सकता है और लालगढ में हथियार नहीं उठाये जाने चाहिये तो प्रतिक्रिया में कहीं ज्यादा हिंसा इस बात का भी संकेत दे रही है कि माओवादी ममता के जरीये वाममोर्चा के खिलाफ अपनी राजनीतिक लडाई को महज ढाल बनाना चाहते है न कि ममता के अनुकूल राजनीतिक परिस्थितियों की लड़ाई लडना चाहते हैं । वही ममता बनर्जी उस राजनीतिक माहौल को तो सूंघ पा रही है, जिसमें सीपीएम के खिलाफ ग्रामीण इलाको में तेजी से आक्रोष उभर रहा है मगर उस आक्रोष को कोई राजनीतिक जामा नहीं पहना पा रही है।
इस लडाई में ममता का संकट दोहरा है। एक तरफ वैचारिक तौर पर तृणमूल कांग्रेस की कोई पहचान नहीं है, सिवाय कांग्रेस के टूट कर दल बनाने से और दूसरी तरफ ममता ने उसी कांग्रेस का हाथ थाम रखा है, जिसके साथ सीपीएम से फूटा गुस्सा जा नहीं सकता है। यानी पहले नंदीग्राम और अब लालगढ से निकले मुद्दे ममता की राजनीति को साध रहे है । ममता भी राजनीतिक भाषा में वाम लहजे का इस्तेमाल कर रही हैं, जो जमीन-जंगल से जुडे किसान-मजदूर-आदिवासी और गांववालों को अछ्छी लग रही है। लेकिन बंगाल की जमीन पर वाम और अतिवाम की लडाई में ममता महज प्यादा हैं, इससे इंकार नहीं किया जा सकता है । क्योंकि सीपीएम जिस नयी पीढी का सवाल उठाकर आर्थिक सुधार की दिशा में कदम बढा रही है, वह पीढी मंदी के दौर में देश में रोजगार छिनने वाले माहौल को बकायदा देख रही है। बंगाल की इस युवा पीढी का लालन-पालन भी वामसमझ वाले परिवार और माहौल में हुआ है । इसलिये बंगाल में नये सवाल देश के दूसरे हिस्सो की तुलना में कहीं तेजी से उठते हैं। खासकर मुद्दों को अगर राजनीतिक पंख लग जाये तो बंगाल की एकजुट समझ भी खुल कर सडकों पर ही निकलती है । इसका असर सामाजिक तौर पर किस तेजी से हो रहा है, यह लालगढ के परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है। जहां सीआरपीएफ के बासठ कैंप गांव और जंगल में चुनाव के बाद से ही लगा दिये गये थे । लेकिन जब नारे लगे की पुलिस -सेना जमींदार के लिये है तो गांव से सुरक्षाकर्मियों को 12 कैंप इसलिये समेटने पड़े क्योंकि गांववालों ने खाना-पानी बंद देना और कैंप तक पहुंचने देना भी बंद कर दिया । इसका असर शहर में भी दिखायी दिया खासकर उन जिलो में जहा राशनिंग लूट हुई थी। सीआरपीएफ को देख कर शहरों में यह सवाल तेजी से घुमड़ने लगा कि अगर वाममोर्चा विकास के नाम पर खेत और जमीन को खत्म कर देगे तो मुश्किल और बढेगी । वहीं किसान-मजदूर अगर मारा जायेगा तो खेती करेगा कौन।
राज्य के सत्रह जिले ऐसे हैं, जहां खेती न हो तो जिन्दगी की गाड़ी चल नहीं सकती है । इन जिलों में गरीबों की तादाद का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि साठ फिसद घरों में बीपीएल कार्ड है और निन्यानवे फिसद परिवारो के घर राशन का ही चावल-गेंहू आता है । और सत्ताधारी वामपंथियो के लिये कैडर बनाने और जुटाने की सौदेबाजी का आधार भी पेट भरने के साधन जुटाने पर आ टिकता है। यानी बीपीएल कार्ड सीपीएम कैडर के पास होगा ही । राशन की लूट में उसी कैडर को अन्न मिलेगा जो सत्ता के लिये काम कर रहा होगा। जाहिर है जब वाम राजनीति पेट की परिभाषा पर टिकी होगी तो जिसमें बल होगा वहीं असल वामपंथी भी हो जायेगा। चूंकि राज्य की सत्ता की ताकत के सामने हर कोई बौना है और राज्य के आंतक के सामने हर आंतक छोटा है तो ऐसे में सत्ताधारी अगर कमजोर होगा तो पेट की जरुरत वैचारिक आधार बदलने में कितनी देर लगायेगी । असल में नंदीग्राम और लालगढ की राजनीति से बंगाल की सामाजिक-आर्थिक स्थिति सीधे जुड़ी हुई है । इसलिये चुनाव में जैसे ममता बनर्जी मजबूत हुई हैं, सीपीएम का कैडर ममता के साथ हथियार लेकर खड़ा होने से नहीं कतरा रहा है। वहीं ममता की यही जीत सीपीएम को कमजोर करने से ज्यादा माओवादियो को मजबूत कर रही है, क्योकि बंदूक तले वह राज्य की पुलिस से दो दो हाथ कर रहे है और जिले-दर-जिले ममता के साथ जुड़ने वाला सीपीएम कैडर प्रमोशन पाकर पेट के लिये कहीं ज्यादा लाभ समेट रहा है। वाममोर्चा के कैडर के चक्रव्यू को भेंदते हुये लालगढ से माओवादी कोलकत्ता तक अब नक्सलबाडी की तर्ज पर उस राजनीति को हवा देने में लग गये हैं, जहां राज्य मान ले कि हथियार जनता ने उठा लिये हैं।
चूंकि गांव समिति से लेकर जिला कमेटी तक के स्तर पर कामकाज देखने वाले कैडर के पास हथियार रहते हैं और चुनाव से पहले इलाको के कब्जे की राजनीति इसी हथियार के भरोसे चलती है, इसे हर राजनीतिक दल का कैडर जानता सतझता है । चूकि सत्ताधारी सीपीएम कैडर के पास सबसे ज्यादा हथियार हो सकते है, इसी आधार पर माओवादियो ने अपनी रणनीति के तहत गांव वालों को उकसाना भी शुरु किया है जिससे सीपीएम दफ्तरों और नेताओं के घरो में आग लगा कर हथियार समेटे जा रहे है । लालगढ के इलाके में अगर सीपीएम कैडर का पूरी तरह सफाया हुआ है तो उसकी बडी वजह उनके हाथों से हथियारों का जाना भी है और ग्रामीणो का हाथ में हथियार उठाकर माओवादियो की सभा में नारा लगाना भी।
ऐसे में सवाल सिर्फ लालगढ के जरीय माओवादियो के हथियारबंध संघर्ष के नारे भर का नहीं है। बल्कि मुश्किल परिस्थितयाँ उस आने वाले टकराव को लेकर बन रहे राजनीतिक माहौल की हैं, जो प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर इलाकों में लूट के लिये बड़े कारपोरेट घरानों को लाइसेंस दे रही हैं और चार फसली खेती योग्य जमीन पर उद्योग लगा कर रोजगार पैदा करने का स्वांग रच रही हैं। जबकि बंगाल का सच यही है कि वहां वो नारे भी दम तोड चुके हैं, जिसके भरोसे कांग्रेस रोजगार क्रांति का सपना संजोये है। क्या ऐसे में बंगाल में वामपंथियों और माओवादियों का संघर्ष देश की राजनीति को साध पायेगा, यह नया सवाल बंगाल की जमीन पर वाम राजनीति को समझने वाला बौद्धिक तबका खड़ा कर रहा है क्योंकि उसे लगने लगा है जब प्रतिक्रियावादी ममता बनर्जी की सलाहकार नक्सली महाश्वेता देवी हो सकती हैं, तो भविष्य में नयी राजनीतिक जमीन माओवादियो के लिये कुछ नयी परिस्थितियाँ पैदा भी कर सकती है।
Posted by
Punya Prasun Bajpai
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7:01 AM
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