Sunday, April 23, 2017

आखिर अंबेडकर को पीएम के तौर पर देखने की बात कभी किसी ने क्यों नहीं की ?

नेहरु की जगह सरदार पटेल पीएम होते तो देश के हालात कुछ और होते । ये सवाल नेहरु या कांग्रेस से नाराज हर नेता या राजनीतिक दल हमेशा उठाते रहे हैं। लेकिन इस सवाल को किसी ने कभी नहीं उठाया कि अगर नेहरु की जगह अंबेडकर पीएम होते तो हालात कुछ और होते । दरअसल अंबेडकर को राजनीतिक तौर पर किसीने कभी मान्यता दी ही नहीं। या तो संविधान निर्माता या फिर दलितों के मसीहा के तौर पर बाबा साहेब अंबेडकर को कमोवेश हर राजनीतिक सत्ता ने देश के सामने पेश किया । लेकिन इतिहास के पन्नों को अगर पलटे और आजादी से पहले या तुरंत बाद में या फिर देश के हालातों को लेकर अंबेडकर तब क्या सोच रहे थे और क्यों अंबेडकर को राजनीतिक तौर पर उभारने की कोई कोशिश हुई नहीं । और मौजूदा वक्त में भी बाबा साहेब अंबेडकर का नाम लेकर राजनीतिक सत्ता जिस तरह भावुक हो जाती है लेकिन ये कहने से बचती है कि अंबेडकर पीएम होते तो क्या होता ।

तो आईये जरा आंबेडकर के लेखन, अंबेडकर के कथन और अंबेडकर के अध्ययन को ही परख लें कि वह उस वक्त देश को लेकर वह क्या सोच रहे थे, जिस दौर देश गढ़ा जा रहा था । तो संविधान निर्माता की पहचान लिये बाबा साहेब अंबेडकर ने संविधान की स्वीकृति के बाद 25 नवंबर 1949 को कहा, " 26 जनवरी 1950 को हम अंतर्विरोधों के जीवन में प्रवेश करने जा रहे हैं । राजनीति में हम समानता प्राप्त कर लेंगे । परंतु सामाजिक-आर्थिक जीवन में असमानता बनी रहेगी। राजनीति में हम यह सिद्दांत स्वीकार करेंगे कि एक आदमी एक वोट होता है और एक वोट का एक ही मूल्य होता है । अपने सामाजिक और आर्थिक जीवन में अपनी सामाजिक और आर्थिक संरचना के कारण हम यह सिद्दांत नकारते रहेंगे कि एक आदमी का एक ही मूल्य होता है। कब तक हम अंतर्विरोधों का ये जीवन बिताते रहेंगे। कह तक हम अपने सामाजिक और आर्थिक जीवन में समानता को नकारते रहेंगे ? बहुत दिनो तक हम उसे नकारते रहे तो हम ऐसा राजनीतिक लोकतंत्र खतरे में डाल कर ही रहेंगे । जिसनी जल्दी हो सके हमें इस अंतर्विरोध को दूर करना चाहिये ।वरना जो लोग इस असमानता से उत्पीडि़त है वे इस सभा द्वारा इतने परिश्रम से बनाये हुये राजनीतिक लोकतंत्र के भवन को ध्वस्त कर देंगे। "   यानी संविधान के आसरे देश को छोड़ा नहीं जा सकता है बल्कि अंबेडकर असमानता के उस सच को उस दौर में ही समझ रहे थे जिस सच से अभी भी राजनीतिक सत्ता आंखे मूंदे रहती है या फिर सत्ता पाने के लिये असमानता का जिक्र करती है ।

यानी जो व्यवस्था समानता की होनी चाहिये, वह नहीं है तो इस बात की कुलबुलाहट अंबेडकर में उस दौर में इतनी ज्यादा थी कि 13 दिसंबर 1949 को जब नेहरु ने संविधान सभा में संविधान के उद्देश्यों पर प्रस्ताव पेश किया तो बिना देर किये अंबेडकर ने नेहरु के प्रस्ताव का भी विरोध किया । अंबेडकर की राइटिंग और स्पीचीज की पुस्तक माला के खंड 13 के पेज 8 में लिखा है कि आंबेडकर ने कितना तीखा प्रहार नेहरु पर भी किया। उन्होने कहा, " समाजवादी के रुप में इनकी जो ख्याती है उसे देखते हुये यह प्रसताव निराशाजनक है । मैं आशा करता था, कोई ऐसा प्रावधान होगा जिससे राज्यसत्ता आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक न्याय को यथार्थ रुप दे सके । उस नजरिए से मै आशा करता था कि ये प्रस्ताव बहुत ही स्पष्ट शब्दों में घोषित करे कि देश में सामाजिक आर्थिक न्याय हो । इसके लिये उघोग-धंधों और भूमि का राष्ट्रीयकरण होगा । जबतक समाजवादी अर्थतंत्र न हो तबतक मै नहीं समझता , कोई भावी सरकार जो सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय करना चाहती है वह ऐसा कर सकेगी । " तो अंबेडकर उन हालातों को उसी दौर में बता रहे थे जिस दौर में नेहरु सत्ता के लिये बेचैन थे और उसके बाद से बीते 70 बरस में यही सवाल हर नई राजनीतिक सत्ता पूर्व की सरकारों को लेकर यही सवाल खड़ा करते करते सत्ता पाती रही है फिर आर्थिक असमानता तले उन्हीं हालातों में को जाती है । यूं याद तो ठीक दो बरस संसद में संविधान दिवस मनाये जाने के दौर को भी याद किया किया सकता है, जब 26 नवंबर 2015 को संविदान दिवस मनाते मनाते कांग्रेस हो या बीजेपी यानी विपक्ष हो या सत्तादारी सभी ने एक सुर में माना कि अंबेडकर जिन सवालों को संविधान लागू होने से पहले उठा रहे थे , वही सवाल संविधान लागू होने के बाद देश के सामने मुंह बाये खड़े हैं।

ये अलग बात है कि कांग्रेस हो या बीजेपी दोनों ने खुद को आंबेडकर के सबसे नजदीक खड़े होने की कोशिश संसद में बहस के दौरान की । लेकिन दोनो राजनीतिक दलों में से किसी नेता ने यह कहने की हिम्मत नहीं की कि आजादी के बाद अगर अंबेडकर देश के पीएम होते तो देश के हालात कुछ और होते । क्योंकि अंबेडकर एक तरफ भारत की जातीय व्यवस्था में सबसे नीचे पायदान पर खडे होकर देश की व्यवस्था को ठीक करने की सोच रहे थे । और दूसरा उस दौर में अंबेडकर किसी भी राजनेता से सबसे ज्यादा सुपठित व्यक्तियो में से थे । जो अमेरिकी विश्वविघालय में राजनीति और सामाजिक अध्ययन करने के साथ साथ भारत की अर्थ नीति कैसे हो इसपर भी लिख रहे थे। यानी अंबेडकर का अध्ययन और भारत को लेकर उनकी स च कैसे दलित नेता के तौर पर स्थापना और संविधान निर्माता के तौर पर मान्यता तहत दब कर रह गई ये किसी ने सोचा ही नहीं । क्योंकि जिस दौर में महात्मा गांधी हिन्द स्वराज लिख रहे थे और हिन्द स्वराज के जरीये संसदीय प्रणली या आर्थिक हालातों का जिक्र भारत के संदर्भ में कर रहे थे । उस दौर में अंबेडकर भारत की पराधीन अर्थव्यवस्था को मुक्त कराने के लिये स्वाधीन इक्नामिक ढांचे पर भी कोलंबिया यूनिवर्सिटी में कह-बोल रहे थे । और भारत के सामाजिक जीवन में झांकने के लिये संस्कृत का धार्मिक पौराणिक और वेद संबंधी समूचा वाड्मंय अनुवाद में पढ़ रहे थे । और भोतिक स्थापनायें लोगों के सामने रख रहे थे । इसलिये जो दलित नेता आज सत्ता की गोद में बैठकर अंबेडकर को दलित नेता के तौर पर याद कर नतमस्तक होते है , वह इस सच से आंखे चुराते हैं कि आंबेडकर ब्रहमण व्यवस्था को सामाजिक व्यवस्था से आगे अक सिस्टम मानते थे । और 1930 में उनका बहुत साफ मानना था कि ब्राह्मण सिस्टम में अगर जाटव भी किसी ब्राह्मण की जगह ले लेगा तो वह भी उसी अनुरुप काम करने लगेगा, जिस अनुरुप कोई ब्राह्मण करता । अपनी किताब मार्क्स और बुद्द में आंबेडकर ने बारत की सामाजिक व्यवस्था की उन कुरितियों को उभारा भी और समाधान की उस लकीर को खींचने की कोशिश भी की जिस लकीर को गाहे बगाने नेहरु से लेकर मोदी तक कभी सोशल इंजिनियरिंग तो कभी अमीर-गरीब के खांचे में उठाते हैं। 1942 में आल इंडिया रेडियो पर एक कार्यक्रम में अंबेडकर कहते है , भारत में इस समय केवल मजदूर वर्ग की सही नेतृत्व दे सकता है । मजदूर वर्ग में अनेक जातियों के लोग है जो छूत-अछूत का भेद मिटाती है । संगठन के लिये जाति प्रथा को आधार नहीं बनाते । उसी दौर में अंबेडकर अपनी किताब , ' स्टेट्स एंड माइनरटिज " में राज्यो के विकास का खाक भी खिचते नजर आते है । जिस यूपी को लेकर ाज बहस हो रही है कि इतने बडे सूबे को चार राज्यों में बांटा जाना चाहिये । वही यूपी को स्पेटाइल स्टेट कहते हुये अंबेडकर यूपी को तीन हिस्से में करने की वकालत आजादी से पहले ही करते है ।

फिर अपनी किताब ' स्माल होल्डिग्स इन इंडिया " में किसानो के उन सवालों को 75 बरस पहले उठाते हैं, जिन सवालों का जबाब आज भी कोई सत्ता दे पाने में सक्षम हो नहीं पा रही है । अंबेडकर किसानों की कर्ज माफी से आगे किसानो की क्षमता बढाने के तरीके उस वक्त बताते है । जबकि आज जब यूपी में किसानो के कर्ज माफी के बाद भी किसान परेशान है । और कर्ज की वजह से सबसे ज्यादा किसानों की खुदकुशी वाले राज्य महाराष्ट्र में सत्ता किसानों की कर्ज माफी से इतर क्षमता बढाने का जिक्र तो करती है लेकिन ये होगा कैसे इसका रास्ता बता नहीं पाती । जबकि अंबेडकर 'स्माल होल्डिग्स " में तभी उपाय बताते हैं। और माना भी जाता है कि आंबेडकर ने नेहरु के मंत्रिमंडल में शामिल होने के िबदले योजना आयोग देने को कहा था। क्योंकि आंबेडकर लगातार भारत के सामाजिक - आर्थिक हालातों पर जिस तरह अध्ययन कर रहे थे , वैसे में उन्हें लगता रहा कि आजादी के बाद जिस इक्नामी को या जिस सिस्टम की जरुरत देश को है, वह उसे बाखूबी जानते समझते हैं। और नेहरु ने उन्हीं सामाजिक हालातों की वजह से ही नेहरु मंत्रिमंडल से त्यागपत्र भी दिया, जिन परिस्थितियों को वह तब ठीक करना चाहते थे। हिन्दू कोड बिल को लेकर जब संघ परिवार से लेकर , हिन्दुमहासभा और कई दूसरे संगठनों ने सड़क पर विरोध प्रदर्शन शुरु किया । तो संसद में लंबी चर्चा के बाद भी देश की पहली राष्ट्रीय सरकार को भी जब आंबेडकर हिन्दू कोड बिल पर सहमत नहीं कर पाये तो 27 सितंबर 1951 को अंबेडकर ने नेहरु को इस्तीफा देते हुये लिखा , " बहुत दिनों से इस्तीफा देने की सोच रहा था। एक चीज मुझे रोके हुये था, वह ये कि इस संसद के जीवनकाल में हिन्दूकोड बिल पास हो जाये । मैं बिल को तोड़कर विवाह और तलाक तक उसे सीमित करने पर सीमित हो गया थ। इस आशा से कि कम से कम इन्हीं को लेकर हमारा श्रम सार्थक हो जाये । पर बिल के इस भाग को भी मार दिया गया है । आपके मंत्रिमंडल में बने रहने का कोई कारण नहीं दिखता है । " दरअसल इतिहास के पन्नों को पलटिये तो गांधी, अंबेडकर और लोहिया कभी राजनीति करते हुये नजर नहीं आयेंगे बल्कि तीनों ही अपने अपने तरह से देश को गढना चाहते थे । और आजादी के बाद संसदीय राजनीति के दायरे में तीनों को अपना बनाने की होड़ तो शुरु हुई लेकिन उनके विचार को ही खारिज उनके जीवित रहते हुये उन्हीं लोगों ने किया जो उन्हे अपना बनाते या मानते नजर आये । इसलिये नेहरु या सरदार पटेल का जिक्र प्रशासनिक काबिलियत के तौर पर तो हो सकता है , लेकिन आजादी के ठीक बाद के हालात को अगर परखे तो उस वक्त देश को कैसे गढना हा यही सवाल सबसे बडा था । लेकिन पहले दिन से ही जो सवाल सांप्रदायिकता के दायरे से होते हुये कश्मीर और रोजगार से होते हुये जाति-व्यवस्था और उससे आगे समाज के हर तबके की भागेदारी को लेकर सत्ता ने उठाये या उनसे दो चार होते वक्त जिन रास्तो को चुना। ध्यान दें तो बीते 70 बरस में देश उन्ही मुद्दो में आज भी उलझा हुआ है । और राजनीतिक सत्ता ही कैसे जाति-व्यवस्था के दायरे से इतर सोच पाने में सक्षम नहीं है ।

तो इस सवाल को तो अंबेडकर ने नेहरु के पहले मंत्रिमडल की बैठक में ही उठा दिया था । इसलिये आंबेडकर पंचायत स्तर के चुनाव का भी विरोध कर रहे थे । क्योकि उनका साफ मानना था कि चुनाव जाति में सिमटेंगे । जाति राजनीति को चलायेगी । और असमानता भी एक वक्त देश की पहचान बना दी जायेगी । जिसके आधार पर बजट से लेकर योजना आयोग की नीतियां बनेंगी . और ध्यान दें तो हुआ यही । अंतर सिर्फ यही आया है कि आंबेडकर आजादी के वक्त जब देश को गढने के लिये तमाम सवालो को मथ रहे थे तब देश की आबादी 31 करोड थी । और आज दलितो की तादा ही करीब 21 करोड हो चली है । और शिक्षित चाहे 66 फिसदी हो लेकिन ग्रेजुएट महज 4 फिसदी है । इतना ही नहीं 70 फिसदी दलित के पास अपनी कोई जमीन नहीं है । और 85 फिसदी दलित की आय 5 हजार रुपये महीने से भी कम है । आबादी 16 फिसदी है लेकिन सरकारी नौकरियों में दलितों की तादाद महज 3.96 फिसदी है । और दलितो के सरकार के तमाम मंत्रालयों का कुल बजट यानी उनकी आबादी की तुलना में आधे से भी कम है । 2016-17 में शिड्यूल कास्ट सब-प्लान आफ आल मिनिस्ट्रिज का मजह 38,833 करोड दिया गया . जबकि आजादी के लिहाज से उन्हे मिलना चाहिये 77,236 करोड रुपये । पिछले बरस यानी 2015-16 में तो ये रकम और भी कम 30,850 करोड थी । यानी जिस नजरिये का सवाल आंबेडकर आजादी से पहले और आजादी के ठीक बाद उटाते रहे । उन सवालो के आईने में अगर बाबा साहेब आंबेडकर को देश सिर्फ संविधान निर्माता मानता है या दलितों की मसीहा के तौर पर देखता है तो समझना जरुरी है कि आखिर आजतक किसी भी राजनीतिक दल या किसी भी पीएम ने ये क्यों नहीं कहा कि अंबेडकर को तो प्रधानमंत्री होना चाहिये था। क्योंकि ये बेहद महीन लकीर है कि महात्मा गांधी जन सरोकार को संघर्ष के लिये तैयार करते रहे और अंबेडकर नीतियों के आसरे जनसरोकार के संघर्ष को पैदा करना चाहते रहे । यानी देश की पॉलिसी ही अगर नीचे से उपर देखना शुरु कर देती तो अंग्रेजों का बना ब या सिस्टम बहुत जल्द खत्म होता । यानी जिस नेहरु मॉडल को कांग्रेस ने महात्मा गांधी से जोडने की कोशिश की । और जिस नेहरु मॉडल को लोहिया ने खारिज कर समाजवाद के बीज बोने चाहे। इन दोनों को आत्मसात करने वाली राजनीतिक सत्ताओं ने आंबेडकर मॉडल पर चर्चा करना तो दूर आंबेडकर को दलितों की रहनुमाई तले संविधान निर्माता का तमगा देकर ही खत्म करने की कोशिश की । जो अब भी जारी है ।


Friday, April 7, 2017

हिन्दू राष्ट्र की दुहाई कौन दे रहा है ?

दुनिया के सबसे पुराने लोकतांत्रिक देश अमेरिका में 16 फीसदी लोग किसी धर्म को नहीं मानते । लेकिन दुनिया के सबसे बडे लोकतांत्रिक देश भारत में सत्ता ही खुद को हिन्दू राष्ट्र बनाने मानने की कुलबुलाहट पाल रही है । ब्रिटेन में करीब 26 फीसदी लोग किसी धर्म को नहीं मानते । लेकिन भारत में सत्ताधारी पार्टी खुले तौर पर ये कहने से नहीं हिचक रही है कि भारत को हिन्दू राष्ट्र हो जाना चाहिये। यूरोप-अमेरिका के तमाम देशों में हर धर्म के लोगो की रिहाइश है। नागरिक हैं। लेकिन कहीं धर्म के नाम पर देश की पहचान हो ये अवाज उठी नहीं । दुनिया के एक मात्र हिन्दू राष्ट्र नेपाल की पहचान भी दशक भर पहले सेक्यूलर राष्ट्र हो गई। यानी जैसे ही राजशाही खत्म हुये। चुनाव हुये । संविधान बना । उसके बाद नेपाल के 80 फीसदी से ज्यादा नेपाल में रहने वाले हिन्दुओ ने ये अवाज दुबारा नहीं उठायी कि वह नेपाल को हिन्दु राष्ट्र बनाना चाहते हैं। और भारत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हो या हिन्दू महासभा, उसने भी नेपाल के हिन्दू राष्ट्र के तमगे को खूब जीया । इस हद तक की हिन्दुत्व का सवाल आने पर बार बार नेपाल का जिक्र हुआ । लेकिन नेपाल में भी जब राजशाही खत्म हुई और हिन्दू राष्ट्र का तमगा वहां की चुनी हुई सरकार ने खत्म किया तो फिर हिन्दुत्व के झंडाबरदरार संगठनों ने कोई आवाज उठाने की हिम्मत नहीं की । लेकिन भारत में सवाल तो इस लिहाज से उलझ पड़ा है । एक तरफ योदी आदित्यनाथ को हिन्दुत्व का झंडाबरदार दिखाया जा रहा है दूसरी तरफ मोदी इस पर खामोशी बरत रहे हैं। एक तरफ योगी के जरीये हिन्दू महासभा के उग्र हिन्दुत्व की थ्योरी की परीक्षा हो रही है। दूसरी तरफ आरएसएस गोलवरकर से लेकर शेषाद्री तक के दौर में भारत और भारतीय के सवाल से आगे बढ़ना नहीं चाह रहे हैं । एक तरफ योगी के सीएम बनने से पहले मोदी के लिये योगी भी फ्रिंज एलीमेंट ही थे । और मोदी ने पीएम उम्मीदवार बनने से लेकर अभी तक के दौर में बीजेपी के बाहर अपना समर्थन का दायरा इतना बड़ा किया कि वह पार्टी से बड़े दिखायी देने लगे ।

लेकिन मोदी के समर्थन के दायरे में ज्यादातर वही फ्रिंज एलीमेंट आये जो बीजेपी के सत्ता प्रेम में बीजेपी के कांग्रेसीकरण का होना देख मान रहे थे । और मोदी ने दरअसल दिल्ली कूच की तैयारी में बीजेपी के उस प्रोफेशनल पॉलिटिक्स को ही दरकिनार किया, जिसके आसरे सिर्फ चुनाव की जीत हार राजनीतिक मुद्दों पर टिकती । तो इन हालातो में सवाल तीन है । पहला क्या गोरक्षा के नाम पर अलवर में जो हुआ उस तरह की घटना के पीछे कहीं फ्रिंज एलीमेंट को कानूनी जामा तो नहीं पहनाया जा रहा है। दूसरा अगर कानून व्यवस्था के दायरे में फ्रिंज एलीमेंट पर नकेल कसी जायेगी, जैसी हिन्दू वाहिनी के रोमियो स्कावयड पर नकेल कसी जा सकती है तब योगी के महंत का औरा सीएम के संवैधानिक पद से कैसे टकरायेगा और उसके बाद हालात बनेंगे कैसे। और तीसरा योगी के हिन्दुत्व राग से उत्साही समाज से मोदी पल्ला कैसे झाडेंगे ।

ये ऐसे सवाल है जो मोदी और योगी को एक दौर के वाजपेयी और आडवाणी की जोडी के तौर पर बताये जा सकते हैं । लेकिन समझना ये भी होगा वाजपेयी-आडवाणी की जोड़ी चुनावी हिसाब-किताब को सीटो के लिहाज से नहीं बल्कि परसैप्शन के लिहाज से देश को प्रभावित करती थी । यानी वाजपेयी नरम हैं आडवाणी कट्टर है, ये परसेप्शन था । लेकिन मोदी नरम है और योगी कट्टर हैं ये परसैप्शन के आधार पर चल नहीं सकता क्योंकि योगी के हाथ में देश के सबसे बडे सूबे की कमान है। और वहां उन्हें गवर्नैंस से साबित करना है कि उनका रास्ता जाता किधर है। लेकिन समझना ये भी होगा कि एक वक्त जनसंघ के अधिवेशन में ही जब हिन्दू राष्ट्र की प्रस्तावना रखी गयी तो तब के सरसंघचालक गुरु गोलवरकर ने ये कहकर खारिज किया कि जनसंघ को संविधान के आधार पर काम करना चाहिये। और सच यही है कि उसके बाद ही दीन दयाल उपाध्याय ने एकात्म-मानवतावाद की थ्योरी को आत्मसात किया। और जनसंघ ने भी एकात्म-मानवतावाद को ही अपनाया। और तो और दत्तोपंत ठेंगडी ने भी इसी बात की वकालत की थी कि संघ को भी हिन्दुत्व से इतर उस रास्ते को पकड़ना होगा जिसपर हिन्दुत्व धर्म नहीं बल्कि जीवन पद्दति के तौर पर उभरे। यूं आरएसएस के पन्नों को पलटने पर ये भी साफ होता है कि पचास के दशक में हिन्दु राजाओं को भी सेकुलर के तौर पर ही गुरुगोलवरकर ने मान्यता दी । मसलन सम्राट अशोक को हिन्दू राजा नहीं बल्कि सेकुलर राजा के तौर पर ही माना जाता है। तो नया सवाल ये भी निकल सकता है कि फिर एक वक्त के फ्रिंज एलीमेंट माने जाने वाले योगी आदित्यनाथ को संवैधानिक पद, वह भी सीएम की कुर्सी पर क्यों बैठाया गया । क्या ये पहल गौरवशाली हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना तले पनपी । हो जो भी लेकिन 21 वीं सदी में जब भारत की पहचान एक बडे बाजार से लेकर उपभोक्ता समाज के तौर पर कहीं ज्यादा है । दुनिया के तमाम देशों में भारत के प्रफोशनल्स की चर्चा है । और उसके साथ ही शिक्षा से लेकर हेल्थ सर्विस और पीने के पानी से लेकर भूखे भारत का सच संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट तक में दिखायी दे रहा है और ऐसे मोड़ पर भारत में सत्ता के लिये चुनावी जीत उस सोशल इंजीनियरिग पर जा अटकी है, जो जाति-प्रथा को बनाये रखने पर जोर देती है। और वोटो का ध्रुवीकरण धर्म की उस सियासत पर जा टिका है, जहां 20 करोड़ मुसलमानों की कोई जरुरत सत्ता में रहने के लिये सत्ताधारी पार्टी को है ही नहीं । तो फिर आगे का रास्ता जाता किधर है । क्योंकि हिन्दुस्तान का वैभवशाली अतीत भी भारत को हिन्दू राष्ट्र के तौर पर कभी ना तो पहचान दे पाया और ना ही उसका प्रयास किया गया । और मुगलिया सल्तनत से लेकर अंग्रेंजों के दौर में भी हिन्दुओ की तादाद 80 फीसदी रही । लेकिन हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना को बदलने के बदले हर सत्ता ने यहां की जीवन पद्दति को अपनाया और संसाधनों की लूट के जरीये अय्याशी की । और राजनीति की इसी अय्याशी को लेकर आजादी के बाद महात्मा गांधी ने आजादी के बाद कांग्रेस की सत्ता को लेकर सवाल भी उठाये । लेकिन आजादी के बाद के 70 बरस के दौर में देश के हर राजनीतिक दल ने सत्ता भोगी। और गरीब हिन्दुस्तान पर लोकतंत्र की दुहाई देकर राज करने वाले नेताओ के सरोकार कभी आम जनता से जुडे नहीं। तो आखिरी सवाल यही है कि क्या हिन्दू राष्ट्र की दुहाई भारत की अंधेरे गलियों में अतीत की रोशनी भर देती है । या फिर सत्ता के सारे मोहरे चुक चुके हैं तो नारा हिन्दू राष्ट्र का है।

Tuesday, April 4, 2017

कर्जमाफी किसानों के लिये राहत है या राजनीति के लिये सुकून

तो देश की इकनॉमी का सच है क्या । क्योंकि एक तरफ 12 लाख 60 हजार करोड़ का कर्ज देशभर के किसानों पर है । जिसे माफ करने के लिये तमाम राज्य सरकारों के पास पैसा है नहीं । तो दूसरी तरफ 17 लाख 15 हजार करोड की टैक्स में माफी उद्योग सेक्टर को सिर्फ बीते तीन वित्तीय वर्ष में दे दी गई । यानी उघोगों को डायरेक्ट या इनटायरेक्ट टैक्स में अगर कोई माफी सिर्फ 2013 से 2016 के दौरान ना दी गई होती तो उसी पैसे से देशभर के किसानो के कर्ज की माफी हो सकती थी । तो क्या वाकई किसान और कारोबारियों के बीच मोटी लकीर खिंची हुई है । या फिर किसान सरकार की प्रथामिकता में कभी रहा ही नहीं । ये सवाल इसलिये क्योकि एक तरफ एनपीए या उगोगो को टैक्स में रियायत देने पर सरकार से लेकर बैंक तक खामोश रहते हैं। लेकिन दूसरी तरफ किसानों की कर्ज माफी का सवाल आते ही महाराष्ट्र से लेकर पंजाब तक के सीएम तक केन्द्रीय सरकार से मुलाकात कर पैसों की मांग करते हैं। और केन्द्र सरकार किसानों का मुद्दा राज्य का बताकर पल्ला झाड़ती है तो एसबीआई चैयरमैन किसानों की कर्ज माफी की मुश्किलें बताती है । तो किसान देश की प्राथमिकता में कहां खड़ा है । ये सवाल इसलिये जिस तरह खेती राज्य का मसला है, उसी तरह उद्योग भी राज्य का मसला होता है । और इन दो आधारों के बीच एक तरफ केन्द्रीय मंत्री संतोष गंगवार ने राज्यसभा में 16 जून 2016 को कहा , उघोगो को तीन बरस [ 2013-2016] में 17 लाख 15 हजार करोड रुपये की टैक्स माफी दी गई । तो दूसरी तरफ कृषि राज्य मंत्री पुरुषोत्तम रुपाला ने नंवबर 2016 में जानकारी दी किसानों पर 12 लाख 60 हजार रुपये का कर्ज है । जिसमें 9 लाख 57 हजार करोड रुपये कमर्शियल बैक से लिये गये है ।

और इसी दौर में ब्रिक्स बैंक के प्रजीडेंट के वी कामत ने कहा कि 7 लाख करोड का एनपीए कमर्शियल बैंक पर है ।  यानी एक तरफ उघोगो को राहत । दूसरी तरफ उघोगों और कारपोरेट को कर्ज देने में किसी बैक को कोई परेशानी नहीं है। लेकिन किसानों के कर्ज माफी को लेकर बैंक से लेकर हर सरकार को परेशानी। जबकि देश का सच ये भी है कि जितना लाभ उठाकर उघोग जितना रोजगार देश को दे नही पाते, उससे 10 गुना ज्यादा लोग खेती से देश में सीधे जुड़े हैं। आंकड़ों के लिहाज से समझें तो संगठित क्षेत्र में महज तीन करोड रोजगार हैं। चूंकि खेती से सीधे जुड़े लोगों की तादाद 26 करोड है। यानी देश की इक्नामी में जो राहत उघोगों को, कारपोरेट को या फिर सर्विस सेक्टर में भी सरकारी गैर सरकारी जितना भी रोजगार है, उनकी तादाद 3 करोड़ है । जबकि 2011 के सेंसस के मुताबिक 11 करोड 80 लाख अपनी जमीन पर खेती करते है । और 14 करोड 40 लाख लोग खेत मजदूर है । यानी सवा करोड की जनसंख्या वाले देश की हकीकत यही है कि हर एक रोजगार के पीछ अगर पांच लोगों का परिवार माने तो संगठित क्षेत्र से होने वाली कमाई पर 15 करोड़ लोगों का बसर होता है। वहीं खेती से होने वाली कमाई पर एक सौ दस करोड़ लोगों का बसर होता है । और इन हालातों में अगर देश की इक्नामी का नजरिया मार्केट इक्नामी पर टिका होगा या कहे पश्चिमी अर्थवयवस्था को भी भारत अपनाये हुये है तो फिर जिन आधारों पर टैक्स में राहत उद्योगों को दी जाती है । या बैंक उद्योग या कारपोरेट को कर्ज देने से नहीं कतराते तो उसके पीछे का संकट यही है कि अर्थशास्त्री ये मान कर चलते है कि खेती से कमाई देश को नहीं होगी । उद्योगों या कारपोरेट के लाभ से राजस्व में बढोतरी होगी ।

यानी किसानों की कर्ज माफी जीडीपी के उस हिस्से पर टिकी है जो सर्विस सेक्टर से कमाई होती है । और देश का सच भी यही है खेती पर चाहे देश के सौ करोड़ लोग टिके है लेकिन जीडीपी में खेती का योगदान महज 14 फिसदी है । तो इन हालातो में जब यूपी में किसानों की कर्ज माफी का एलान हो चुका है तो बीजेपी शासित तीन राज्यों में हो क्या रहा है जरा इसे भी देख लें। मसलन हरियाणा जहा किसान का डिफॉल्टर होना नया सच है
। आलम ये कि हरियाणा के 16.5 लाख किसानों में से 15.36 लाख किसान कर्जदार हैं । इन किसानों पर करीब 56,336 करोड़ रुपए का कर्ज है, जो 2014-15 में 40,438 करोड़ रुपए था । 8.75 लाख किसाने ऐसे हैं, जिन्होंने कमर्शियल बैंक, भूमि विकास बैंक, कॉपरेटिव बैंक और आणतियों से कर्ज लिया हुआ है । और कर्ज के कुचक्र में ऐसे फंस गए हैं कि अब कर्ज न निगलते बनता है न उगलते।

किसानों की परेशानी ये है कि वो फसल के लिए बैंक से कर्ज लेते हैं। ट्रैक्टर, ट्यूबवैल जैसी जरुरतों के लिए जमीन के आधार पर भूमि विकास बैंक या कॉपरेटिव सोसाइटी से लोन लेता है। मौसम खराब होने या फसल बर्बादी पर कर्ज का भुगतान नहीं कर पाता तो अगली फसल के लिए आढ़तियों के पास जाते हैं। और फिर फसल बर्बादी या कोई भी समस्या न होने पर डिफॉल्टर होने के अलावा कोई चारा नहीं रहता। लेकिन-अब यूपी में जिस तरह किसानों का कर्ज माफ हुआ है, हरियाणा के किसान भी यही मांगने लगे हैं। और दूसरा राज्य है राजस्धान । जहा किसानो को कर्ज देने की स्थिति में सरकार नहीं है । लेकिन राजस्धान का संकट ये है कि एक तरफ कर्ज मांगने वाले किसानो की तादाद साढे बारह हजार है तो दूसरी तरफ वर्ल्ड बैंक से किसानो के लिये जो 545 करोड रुपये मिले लेकिन उसे भी सरकार खर्च करना भूल गई और इसी एवज में जनता का गाढ़ी कमाई के 48 करोड़ रुपए अब ब्याज के रुप में वसुधंरा सरकार वर्ल्ड बैंक को भरेगी । दरअसल वर्ल्ड बैंक के प्रोजेक्ट की शुरुआत 2008 में हुई थी,जब वसुंधरा सरकार ने राजस्थान एग्रीकल्चर कांपटिटवेसन प्रोजेक्ट बनाया था और
फंडिंग के लिए वर्ल्ड बैंक को भेजा गया था । वर्ल्ड बैंक के इस प्रोजेक्ट के तहत कृषि, बागवानी, पशुपालन, सिंचाई और भूजल जैसे कई विभागों को मिलकर किसानों को कर्ज बांटने की योजना थी । वसुंधरा सरकार गई तो कांग्रेस की गहलोत सरकार आई और उसने 2012 में फंडिंग के लिए 832 करोड़ रुपए का प्रोजेक्ट वर्ल्ड बैंक को दिया । वर्ल्ड बैंक ने 545 करोड़ रुपए 1.25 फीसदी की ब्याज दर पर राजस्थान सरकार को दे दिए. लेकिन 2016 तक इसमें से महज 42 करोड़ ही सरकार किसानों को बांट पाई ।यानी एक तरफ किसानों को कर्ज नहीं मिल रहा। और दूसरी तरफ वर्ल्ड बैंक के प्रोजेक्ट के तहत जो 545 करोड़ रुपए में से जो 42 करोड बांटे भी गये वह किस रुप में ये भी देख लिजिये । 17 जिलों में यंत्र, बीज और खाद के लिए सिर्फ 14 लाख 39 हजार रुपए बांटे गए । फल, सब्जी, सोलर पंप के लिए 3 लाख 13 हजार रुपए। जल संग्रहण के लिए 7 लाख दो हजार रुपए बांटे गए । पशुपालन के लिए 2 लाख 19 हजार रुपए दिए ।नहरी सिंचाई निर्माण के लिए 2 लाख 36 हजार रुपए दिए गए । और भू-जल गतिविधियों के लिए 11 लाख 50 हजार रुपए बांटे गए । यानी सवाल सरकार का नहीं सरोकार का है । क्योकि अगर सरकार खजाने में पैसा होने के  बावजूद जनकल्याण का काम सरकार नहीं कर सकती तो फिर सरकार का मतलब क्या है। और तीसरा राज्य महाराष्ट्र जहां बीते दस बरस से किसानो का औसत खुदकुशी का आलम यही है कि हर तीन घंटे में एक किसान खुदकुशी करता है । खुदकुशी करने वाले हर तीन में से एक किसान पर 10 हजार से कम का कर्ज होता है । हालात है कितने बदतर ये 2015 के एनसीआरबी के आंकडों से समझा जा सकता है । 2015 में 4291 किसानों ने खुदकुशी की । जिसमें 1293 किसानो की खुदकुशी की वजह बैक से कर्ज लेना था । जबकि 795 किसानो ने खेती की वजह से खुदकुशी की । यानी खुदकुशी और कर्ज महाराष्ट्र के किसानों की बड़ी समस्या है, जिसका कोई हल कोई सरकार निकाल नहीं पाई।

और अब यूपी में किसानों की कर्ज वापसी के बीच महाराष्ट्र के देवेन्द्र फडणवीस सरकार पर ये दबाव पड़ना तय है कि वो भी महाराष्ट्र के किसानों के लिए कर्जवापसी की घोषणा करें। क्योंकि विपक्ष और सरकार की सहयोगी शिवसेना लगातार ये मांग कर रहे हैं और महाराष्ट्र में कई जगह धरना-प्रदर्शन हो रहे हैं। यानी यूपी की कर्जमाफी किसानो के लिये राहत है या राजनीतिक के लिये सुकून । इसका फैसला भी अब हर चुनाव में होगा। .

Tuesday, March 21, 2017

मोदी नहीं योगी मॉडल चाहिये ?

तो क्या इतिहास बीजेपी सत्ता को दोहरा रहा है या फिर एक नया इतिहास गढ़ा जा रहा है। दरअसल वाजपेयी आडवाणी की जोडी और मौजूदा वक्त में मोदी योगी की जोड़ी एक समान लकीर भी खींचती है, जिसमें एक सॉफ्ट तो दूसरा हार्ड । लेकिन वाजपेयी आडवाणी के दायरे को मोदी योगी की जोड़ी एक विस्तार भी देतीहै क्योंकि यूपी सरीखे राज्य का कोई प्रयोग केन्द्र सरकार को वैसे ही डिगा सकती है जैसे एक वक्त कल्याण सिंह ने पीवी नरसिंह राव को तो मोदी ने गुजरात सीएम रहते हुये वाजपेयी को डिगाया। और मोदी जब 2002 से आगे निकलते हुये दिल्ली पहुंच गये तो क्या पहली बार योगी के सामने भी ऐसा मौका आ खड़ा हुआ है, जहां गोरखपुर से लखनऊ और लकनऊ से दिल्ली का रास्ता भी तय हो सकता है। फिलहाल ये सवाल है । लेकिन इस सवाल के गर्त में तीन सवाल छुपे ही हुये हैं। मसलन पहला सवाल क्या मोदी की छवि योगी की छवि तले
बदल जायेगी। दूसरा, क्या मोदी की तर्ज पर योगी अपनी छवि बदलने के बदले विस्तार देंगे। तीसरा , यूपी 2019 के लिये दिल्ली का रास्ता बनायेगा या रोकेगा । ये सारे सवाल इसलिये क्योकि योगी के सीएम बनते ही राम मंदिर ,यूनिफॉर्म सिविल कोड और तीन तलाक़ के मुद्दे भी छोटे हो गये । यानी भारतीय राजनीति में जिन सवालो को लेकर सत्ता लुकाछिपी का खेल खेलती रही वह सवाल योगी की पारदर्शी राजनीति और छवि के आगे सिमट भी गयी । यानी चाहे अनचाहे हर वह प्रयोग जिससे मोदी सरकार पल्ला झाड़ सकती है और योगी सवालों को मुकाम तक पहुंचाकर खुद को ही बड़ा सवाल बनते चले जाते है । तो कौन सी छवि चुनावी लाभ पहुंचाती है जब एसिड टेस्ट इसी का होने लगेगा तब विपक्ष की राजनीति कहा मायने रखेगी। और 2019 में मोदी हो या 2022 तक योगी ही मोदी बन चुके हो इससे किसे फर्क पड़ेगा । क्योंकि कट्टर हिन्दुत्व की छवि मोदी तोड चुके है । कट्टर हिन्दुत्व की छवि योगी की बरकरार है । और संयोग से राम मंदिर निर्माण पर अदालत से बाहर सहमति का सुझाव देकर सुप्रीम कोर्ट ने मोदी-योगी की तरफ देश को देखने के लिये मजबूर तो कर ही दिया है ।

तो क्या इतिहास फिर खुद को दोहरायेगा । कभी मोदी के आसरे गुजरात को हिन्दुत्व के मॉडल के तौर पर एक वक्त देश ने देखा । और अब योगी के आसरे यूपी का हिन्दुत्व के नये मॉडल के तौर पर देखने का इंतजार देश कर रहा है । मोदी ने विकास की चादर ओढ ली है तो योगी अभी भी भगवा ओढ़े हुये हैं। और मोदी की तमाम सफलताओ का मॉडल विकास पर जा टिका है और इंतजार अब योगी मॉडल का हो रहा है। इसीलिये मोदी के ढाई बरस के दौर में जिस योगी को फ्रिंज एलीमेंट माना गया । संघ ने उसी फ्रिंज एलीमेंट पर सीएम का ठप्पा लगाकर साफ संकेत दे दिये कि हिन्दू एजेंडा दरकिनार हो वह उसे मंजूर नहीं । यानी संघ ने मोदी-योगी की जोडी से सपने तो यही संजोये है कि , " आर्थिक समृद्धि और दोहरे अंकों के विकास दर के साथ हिंदू युग का स्वर्णिम काल दिखायी दे । " और मोदी हिन्दू युग के स्वर्मिम काल के प्रतीक बनना नहीं चाहेंगे। लेकिन योगी इस प्रतीक को अपने तरीके से जिन्दा कर सकते है । क्योंकि चाहे अनचाहे राम मंदिर पर राजनीतिक निर्णय का वक्त आ गया है । और मोदी सरकार की खामोश पहल और फ्रिंज एलीमेंट से सीएम बने योगी क खुली पहल के बीच संघ परिवार महसूस कर रहा है कि मोदी मॉडल सत्ता के लिये चाहिये । लेकिन योगी मॉडल हिन्दु युग के स्वर्णिम काल के लिये चाहिये । क्योंकि याद कीजिये पिछले बरस 2 मार्च तो गोरखपुर के मंदिर में जब संतो की बैठक हुई । और इससे संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी भी शामिल हुये तो कहा गया, "1992 में 'ढांचा' तोड़ दिया गया। अब केंद्र में अपनी सरकार है। सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला हमारे पक्ष में आ जाए, तो भी प्रदेश में मुलायम या मायावती की सरकार रहते रामजन्मभूमि मंदिर नहीं बन पाएगा। इसके लिए हमें योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाना होगा" यानी ठीक एक बरस संघ ने राम मंदिर के लिये योगी आदित्यनाथ को सीएम बनाने पर सहमति दे दी थी । जबकि संघ बाखूबी जानता समझता है कि योगी आदित्यनाथ संघ के स्वयंसेवक कभी नहीं रहे । तो क्या योगी मॉडल आने वाले वक्त में हिन्दुत्व को लेकर हिन्दू महासभा का वही मॉडल है, जिसपर एक वक्त राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भी सहमति नहीं थी । या फिर सत्ता और मंदिर के बीच अभी भी जब मोदी फंसे हुये है तो योगी को आगे कर संघ परिवार ने तुरुप का पत्ता फेंका है। ये सवाल इसलिये क्योकि राम मंदिर का सवाल हिन्दू महासभा ने पहले उठाया । रक्षपीठ के पूर्व मंहत दिग्विजय नाथ ने 1949 में ही राम जन्मभूमि का सवाल उठाया । आरएसएस ने 1964 में वीएचपी के जरीये हिन्दुत्व के सवाल उठाने शुरु किये । और सच यही है कि जिस दौर में हिन्दू महासभा के सदस्य बकायदा भारतीय रामायण महासभा के बैनर तले राम मंदिर का सवाल उठा रहे थे तब संघ परिवार की सक्रियता उतनी तीखी नहीं थी जितनी हिन्दु महासभा की थी । और दिग्विजय नाथ के निधन के बाद उनके शिष्य और आदित्यनाथ के गुरु अवैद्यनाथ ने आंदोलन को आगे बढ़ाया। विश्व हिन्दू परिषद की 1989 धर्म संसद में अवैद्यनाथ के भाषण ने ही इस आंदोलन का आधार तैयार किया था। जिसके बाद महंत अवैद्यनाथ बीजेपी में शामिल हुये । और राम मंदिर आंदोलन में अवैद्यनाथ की भूमिका का अंदाजा लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट से लगाया जा सकता है। आयोग की रिपोर्ट कहती है , ‘पर्याप्त मात्रा में पुख्ता सबूत दर्ज किए गए हैं... कि उमा भारती, साध्वी ऋतंभरा, परमहंस रामचंद्र दास, आचार्य धर्मेंद्र देव, बीएल शर्मा, ... महंत अवैद्यनाथ आदि ने भड़काऊ भाषण दिए.’ । तो इन्हीं अवैधनाथ के शिष्य आदित्यनाथ की तरफ संत समाज राम मंदिर बनाने के लिए टकटकी लगाए देख रहा है।

यानी राम मंदिर को लेकर इतिहास के पन्नो में एक परीक्षा प्रधानमंत्री मोदी की भी है । क्योंकि इससे पहले अयोध्या में राम मंदिर को लेकर जो भी पहल हिन्दू महासभा से लेकर विहिप या संघ परिवार ने की । हर दौर में केन्द्र में सत्ता कांग्रेस की थी । यानी हिन्दू संगठनों के आंदोलन ने बीजेपी को राजनीतिक लाभ पहुंचाया । हिन्दू वोट बैक बीजेपी के लिये ध्रुवीकरण कर गया । लेकिन अब बीजेपी की सरकार के वक्त हिन्दू संगठनों को निर्णय लेना है । संघ को निर्णय लेना है । और बीजेपी को भी राजनीतिक नफे नुकसान को तौलना है । क्योंकि दोनों तरफ बीजेपी भी खड़ी है । और संघ को मोदी नहीं राम मंदिर के लिये योगी भा रहे हैं। और सवाल यही है कि मोदी मॉडल का वक्त पूरा हुआ। अब योगी मॉडल का इंतजार है ।

Monday, March 20, 2017

धर्म से बड़ी कोई राजनीति नहीं...राजनीति से बड़ा कोई धर्म नहीं

"धर्म से बड़ी कोई राजनीति नहीं .....और राजनीति से बड़ा कोई धर्म नहीं" यूं ये बात तो लोहिया ने कही थी। और लोहिया का नाम जपकर समाजवाद के नाम पर सत्ता चलाने वालो को जब यूपी के जनादेश ने मटियामेट कर दिया। और पहली बार किसी धार्मिक स्थल का प्रमुख किसी राज्य का सीएम बना है तो ये सवाल उठना जायजा है कि क्या वाकई धर्म से बड़ी कोई राजनीति नहीं और राजनीति से बड़ा कोई धर्म नहीं। क्योंकि जो शख्स देश के सबसे बड़े सूबे यूपी का मुखिया बना है वह गोरक्ष पीठ से निकला है। शिव के अवतार महायोगी गुरु गोरक्षनाथ के नाम पर स्थापित मंदिर से निकला है। नाथ संप्रदाय का विश्वप्रसिद्द गोरक्षनाथ मंदिर से निकला है। जो हिंदू धर्म,दर्शन,अध्यात्म और साधना के लिये विभिन्न संप्रदायों और मत-मतांतरों में नाथ संप्रदाय का प्रमुख स्थान है । और हिन्दुओं के आस्था के इस प्रमुख केन्द्र यानी गोरक्ष पीठ के पीठाधीश्वर महतं आदित्यनाथ जब देश के सबसे
बडे सूबे यूपी के सीएम हो चुके हैं, तब इस पीठ की पीठाधीश्वर मंहत योगीनाथ को लेकर यही आवाज है, "संतो में राजनीतिज्ञ और राजनीतिज्ञो में संत आदित्यनाथ"।

तो क्या आस्था का ये केन्द्र अब राजनीति का भी केन्द्र बन चुका है। क्योकि अतीत के पन्नो को पलटे तो गोरक्षनाथ मंदिर हिन्दू महासभा का भी केन्द्र रहा और हिन्दु महासभा ने कांग्रेस से लेकर जनसंघ की राजनीति को भी एक वक्त हिन्दू राष्ट्रवाद के दायरे में दिशा दी । तो क्या योगी आदित्नाथ के जरीये हिन्दू राष्ट्रवाद की उस अधूरी लकीर को ही मौजूदा वक्त में पूरा करने का ख्वाब भी संजोया जा रहा है। या फिर अतीत की राजनीति के दायरे में योगी आदित्यनाथ को पऱखना भूल होगी। ये सवाल इसलिये क्योंकि 1921 में कांग्रेस के साथ हिन्दू महासभा राजनीति तौर पर जुड़ी। जो 16 बरस तक जारी रहा। आलम ये भी रहा कि मदन मोहन मालवीय एक ही वक्त कांग्रेस की अध्यक्षता करते हुये हिन्दू महासभा को भी संभालते नजर आये। फिर हिन्दू महासभा से निकले श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1951 में जनसंघ की  स्थापना की। तो क्या अतीत के इन पन्नों के आसरे योगी आदित्यनाथ को आने वाले वक्त में हिन्दू राष्ट्रवाद के दायरे में यूपी की सत्ता चलाते हुये देखा जायेगा । या फिर पहली बार सावरकर की हिन्दुसभा और हेडगेवार की  आरएसएस की दूरियां खत्म होगी । पहली बार संघ परिवार और बीजेपी की राजनीति की लकीर मिटेगी। पहली बार अयोध्या से आगे गोरखपुर की गोरक्ष पीठ हिन्दुत्व की प्रयोगशाला बनेगी। क्योकि कल तक गोरखनाथ मठ के महंत के तौर पर जाने जाने वाले सांसद योगी आदित्यनाथ अब मंदिर छोड बतौर सीएम लखनउ में मुख्यमंत्री निवास में रहेंगे। और 96 बरस से सक्रिय राजनीतिक तौर पर गोरखनाथ मठ की सियासी सत्ता की नींव सीएम हाउस में पड़ेगी। तो क्या यूपी महज जनादेश के आसरे एक नये सीएम आदित्यनाथ को देखेगा और बतौर सीएम आदित्यनाथ भी महज पारंपरिक गवर्नेस को संभालेंगे। जहां किसानों की कर्ज माफी से लेकर 24 घंटे बिजली का जिक्र होगा। जहां कानून व्यवस्था से लेकर रोजगार का जिक्र होगा य़ा फिर जहां गो हत्या पर पाबंदी से लेकर मंदिर निर्माण का जिक्र होगा। यकीनन जनादेश का आधार कुछ ऐसा हो सकता है लेकिन योगी आदित्यनाथ जिस छवि के आसरे राजनीति को साधते आये है और पहली बार संघ परिवार से लेकर प्रधानमंत्री मोदी ने योगी आदित्यनाथ की राजनीति को मान्यता दी है। तो आने वाले वक्त में तीन राजनीति के तीन तरीके उभरेंगे ही।

पहला, विकास शब्द को हिन्दू सांस्कृतिक लेप के साथ परोसा जायेगा। दूसरा, किसानी या गरीबी को मिटाने के लिये हिन्दुत्व जीवन पद्धति से जोड़ा जायेगा। त सरा, कानून व्यवस्था का दायरा पुरानी तुष्टिकरण की नीति को पलट देगा। कह सकते हैं यूपी को चलाने के लिये हर समुदाय के लिये जो राजनीतिक कटघरा मायावती या मुलायम ने यूपी में खड़ा किया, वह कटघरा योगी आदित्यनाथ के वक्त 180 डिग्री में उलटा दिखायी देगा। लेकिन योगी को सिर्फ महंत से सीएम बनते हुये देखने से पहले यह योगी की उस राजनीतिक ट्रेनिंग को समझना होगा जो गोरखनाथ मठ की पहचान रही। महज दिग्विजय ने 1949 में संघ के स्वयंसेवकों को गोरखनाथ मंदिर से बाहर भी किया। 1967 में हिन्दू महासभा के टिकट से महंत दिग्विजय ने चुनाव भी लड़ा। 1989 में महंत अवैधनाथ ने हिन्दू महासभा की टिकट पर चुनाव लड बीजेपी को भी हराया । यानी हिन्दुत्व या राम मंदिर के नाम पर जो लकीर संघ खींचता आया है उसे हिन्दू महासभा ने हमेशा बेहद कमजोर माना । और जब बीजेपी को इसका अहसास हुआ कि हिन्दू महासभा के मंहत अवैधनाथ को साथ लाये बगैर हिन्दुत्व के ठोल पीटे नहीं जा सकते । या राम मंदिर का सवाल आंदोलन में बदला नहीं जा सकता तो 1991 में मंहज अवैधनाथ को मान मनौवल कर बीजेपी के टिकट से गोरखपुर में लड़ाया गया । यानी हिन्दुत्व के सवाल पर संघ और हिन्दू महासभा के बीचे दूरियो का रुख ठीक उसी तरह रहा जैसे एक वक्त हिन्दू रक्षा के सवाल पर गुरुगोलवरकर और सावरकर से लेकर मंहत दिग्विजय तक में भिन्नता थी। विभाजन के दौर में जब देश दंगो में झुलस रहा था तब हिन्दु महासभा का संघ पर आरोप था कि वह कबड्डी खेलने में व्यस्त है । यानी हिन्दु रक्षा की जगह सेवा भाव में ही संघ रहा । इसी लिये जिस वक्त अयोध्या आंदोलन उग्र हुआ तब महंत अवैधनाथ बीजेपी के साथ आये। और आज भी योगी आदित्यनाथ ये मानते है कि राम मंदिर निर्माण को सत्ता ने टाला। लेकिन हिन्दुत्व की योगी आदित्यनाथ की शैली क्या प्रधानमंत्री मोदी के लिये राहत है । ये सवाल इसलिये बड़ा हो चला है क्योकि गोरखपुर में योगी आदित्यनाथ का राजनीतिक मॉडल उस दबंग राजनीति पर टिका है, जिस अंदाज को हिन्दू रक्षा के लिये एक वक्त सावरकर ने माना और यूपी में मंहज दिग्विजय ने अपनाया भी। यानी योगी के दौर में यूपी में कानून व्यवस्था की परिभाषा भी बदल जायेगी। क्योंकि जिस राजनीतिक मॉडल को योगी आदित्यनाथ ने गोरखपुर में अपनाया। उसका सच ये भी है कि हिन्दू संघर्ष वाहिनी का अपने इलाके में अलग खौफ है। गोरखपुर में सांस्कृतिक सवालों के जरीये वाहिनी की दंबगई के आगे कानून व्यवस्था मायने नही रखती। खुद योगी आदित्यनाथ ने गोऱखपुर के कई ऐतिहासिक मुहल्लों के नाम मुस्लिम विरोध के बीच बदलवा दिए। उर्दू बाजार हिन्दी बाजार बन गया। अलीनगर आर्यनगर हो गया। मियां बाजार मायाबाजार हो गया। यानी योगी का अपना एजेंडा रहा-और उस एजेंडे में कानून अभी बाधा नहीं बना।

और योगी की दबंगई ही उनका यूएसपी है,जो गोरखपुर में लोगों को उनका मुरीद भी बनाता रहा।यानी योगी की गोरखपुर की पहचान का अगर विस्तार बतौर सीएम यूपी में होगा तो दंबग जातियों को दब कर चलना होगा। हिन्दू रक्षा के लिये कानून व्यवस्था अब काम करती दिखेगी। दबंग राजनेताओ की राबिन हुड छवि खत्म होगी । और मुस्लिम दबंगई पर तो बहस बेमानी है। यानी योगी की राजनीतिक धारा की दबंगई खुद ब खुद कानूनी मान्यता पायेगी और सड़क पर दंबग राजनीति में नयापन दिखायी देगा। ये तय है । ऐसे में जो हिन्दुत्व या राम मंदिर के अक्स तले योगी को समझना चाहते है तो फिर याद किजिये साल भर पहले यानी 2 मार्च 2016 को गोरखनाथ मंदिर में भारतीय संत सभा की चिंतन बैठक हुई थी, जिसमें आरएसएस के बड़े नेताओं की मौजूदगी में संतों ने कहा था---"1992 में 'ढांचा' तोड़ दिया। अब केंद्र में अपनी सरकार है. सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला हमारे पक्ष में आ जाए, तो भी प्रदेश में मुलायम या मायावती की सरकार रहते रामजन्मभूमि मंदिर नहीं बन पाएगा। इसके लिए हमें योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाना होगा"

Saturday, March 18, 2017

शाह को शह देकर योगी के आसरे संघ का राजनीतिक प्रयोग


ये बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को संघ की शह-मात है । ये नरेन्द्र मोदी की कट्टर हिन्दुत्व को शह-मात है । ये मुस्लिम तुष्टीकरण राजनीति में फंसी सेक्यूलर राजनीति को संघ की सियासी समझ की शह-मात है । ये मोदी का हिन्दुत्व राजनीति के एसिड टेस्ट का एलान है । ये संघ का भगवा के आसरे विकास करने के एसिट टेस्ट का एलान है । ये हिन्दुत्व सोच तले कांग्रेस को शह मात का खेल है, जिसमें जिसमें योगी आदित्यनाथ के जरीये विकास और करप्शन फ्री हालात पैदा कर चुनौती देने का एलान है कि विपक्ष खुद को हिन्दू विरोधी माने या फिर संघ के हिन्दुत्व को मान्यता दे। तो यूपी के नये सीएम के एलान के साथ कई थ्योरियों ने जन्म तो ले ही लिया है। और हर थ्योरी पहली बार उस पारंपरिक राजनीति से टकरा रही है, जिसे अभी तक प्रोफेशनल माना गया । लेकिन योगी आदित्यनाथ के जरीये राजनीतिक बदलाव की सोच पहली बार उसी राजनीति को शह मात दे गई जिसके दायरे में लगातार बीजेपी के कांग्रेसीकरण होने से संघ परेशान था । और संघ के भीतर सावरकर थ्योरी से हेडगेवार थ्योरी टकराने की आहट से बीजेपी परेशान रहती थी । तो जरा योगी आदित्यनाथ के जरीये इस सिलसिले को समझें कि आखिर बीजेपी अध्यक्ष ने ही सबसे पहले गवर्नेंस के नाम पर केन्द्रीय मंत्री मनोज सिन्हा के नाम पर मुहर लगायी। और संघ के पास सहमति के लिये मनोज सिन्हा का नाम भेजा। और ये मान कर भेजा कि संघ मनोज सिन्हा के नाम पर अपना मूक ठप्पा लगा देगा ।

क्योंकि संघ राजनीतिक फैसलों में दखल नहीं देता । लेकिन इस हकीकत को अमित शाह भी समझ नहीं पाये कि जिस तरह की सोशल इंजीनियरिंग का चुनावी प्रयोग यूपी में बीते तीन बरस के दौर में शामिल हुये बाहरी यानी दूसरे दलों से आये करीब सौ से ज्यादा नेताओं को बीजेपी का टिकट दिया गया । और यूपी के आठ प्रांत प्रचारकों से लेकर दो क्षेत्रवार प्रचारको की भी नहीं सुनी गई उसके बावजूद स्वयंसेवक यूपी में बीजेपी की जीत के लिये जुटा रहा तो उसके पीछे कही ना कही संघ और सरकार के बीच पुल का काम कर रहे संघ के कृष्ण गोपाल की ही सक्रियता रही, जिससे उन्होंने राजनीतिक तौर पर स्वयंसेवकों को मथा और चुनावी जीत के लिये जमीनी स्तर पर विहिप से लेकर साधु-संतों और स्वयंसेवकों को जीत के लिये गाव गांव में तैयार किया। ऐसे में मनोज सिन्हा के जरीये दिल्ली से यूपी को चलाने की जो सोच प्रोफनल्स राजनेताओं के तौर पर बीजेपी में जागी उस शह-मात के जरीये संघ ने योगी आदित्यनाथ का नाम सीधे रखकर साफ संकेत दे दिये सफलता संघ की सोच की है। और जनादेश जब संघ से निकले नेताओं की सोच में ढल रहा है तो फिर संकेत की राजनीति के आसरे आगे नहीं बढा जा सकता है ।

और यूपी के जो तीन सवाल कानून व्यवस्था, करप्शन और मुस्लिम तुष्टिकरण के आसरे चल रहे है, उसे हिन्दुत्व के बैनर तले ही साधना होगा । और अमित शाह के प्रस्ताव को संघ ने खारिज किया तो मोदी संघ के साथ इसलिये खड़े हो गये क्योंकि मंदिर से लेकर गौ हत्या और मुस्लिम तुष्टीकरण से लेकर असमान विकास की सोच को लेकर जो सवाल कभी विहिप तो कभी संघ के दूसरे संगठन या फिर सांसद के तौर पर साक्षी महाराज या मनोरंजन ज्योति उठाते रहे उनपर खुद ब खुद रोक आदित्यनाथ के आते ही लग जायेगी या फिर झटके में हिन्दुत्व के कटघरे से बाहर मोदी हर किसी को दिखायी देने लगेगें । और इसी के सामानांतर जब ये सवाल उठेगें कि मुस्लिम तो हिन्दु हो नही सकता लेकिन दलित या अन्य पिछड़ा तबका तो हिन्दु है तो फिर उसके पिछडेपन का इलाज कैसे होगा । तो विकास के दायरे में केशव प्रसाद मोर्य को डिप्टी सीएम बनाकर उसी राजनीति को हिन्दुत्व के आसरे साधा जायेगा जैसा राम मंदिऱ का शीला पूजन एक दलित से कराया गया था । यानी हिन्दुत्व के उग्र तेवर उंची नहीं पिछडी जातियों के जरीये उभारा जायेगा। और जो सवाल आरएसएस के भीतर सवारकर बनाम हेडगेवार के हिन्दुत्व को लेकर उग्र और मुलायम सोच तले बहस के तौर पर लगातार चलती रही उसपर भी विराम लगा जायेगा ।

क्योंकि योगी आदित्यनाथ की पहचान तो हिन्दु महासभा से जुडी रही है । और एक वक्त कट्टर हिन्दुत्व के आसरे ही योगी आदित्यनाथ ने बीजेपी की राजनीति को चुनौती अलग पार्टी बनाकर दी थी । और 50 के दशक में तो गोरखपुर  मंदिर तक नानाजी देशमुख को इसलिये छोड़ना पडा था क्योकि तब गोरखपुर मंदिर में हिन्दू महासभा के स्वामी दिग्विजय से वैचारिक टकराव हो गया था । और तभी से ये माना जाता रहा कि हिन्दुत्व को लेकर जो सोच सावरकर की रही उससे बचते बचाते हुये ही संघ ने खुद का विस्तार किया । लेकिन राम मंदिर का सवाल जब जब संघ के भीतर उठा तब तब उसके रास्ते को लेकर सावरकर गुट के निशाने पर बीजेपी भी आई । यानी मोदी की योगी आदित्यनाथ के नाम पर सहमति कही ना कही सरसंघचालक मोहन भागवत को भी शह मात है। और इन तमाम राजनीतिक धाराओं का सच ये भी है कि जिस तरह मोदी-संघ ने यूपी की राजनीति को जनादेश से लेकर विचार के तौर पर झटके में हजल दिया है । उसमें अगर कोई सामान्य तौर पर ये मान रहा है कि पिछड़ी जातियों की राजनीति या मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति में उभार आ जायेगा । तो फिलहाल कहा जा सकता है कि ये भूल होगी । लेकिन इतिहास के गर्त में क्या छुपा है और आने वाला वक्त कैसे यूपी को सियासी प्रयोगशाला बनाकर मथेगा । इसका इंतजार हर किसी को करना ही होगा । क्योंकि यूपी सिर्फ सबसे बड़ा सूबा भर नहीं है । बल्कि ये संघ की ऐसी प्रयोगशाला है जिसमें तपकर या तो देश की राजनीति बदलेगी या फिर हिन्दुत्व की राजनीति को मान्यता मिलेगी ।

Friday, March 17, 2017

मुस्लिम-दलित-किसान कैसे फिट होगा "सबका साथ सबका विकास" तले ?

18 करोड़ मुस्लिम। 20 करोड़ दलित। खेती पर टिके 70 करोड़ लोग। और ऐसे में नारा सबका साथ सबका विकास। तो क्या प्रधानमंत्री मोदी के सामने सबसे बड़ी चुनौती मुस्लिम-दलित-गरीब-किसान-मजदूर को नई राजनीति से साधना है। या फिर मुख्यधारा में सभी को लाना है। जरा सिलसिलेवार तरीके से इस सिलसिले को परखें तो आजादी के साथ विभाजन की लकीर तले मुस्लिमों की ये तादाद हिन्दुस्तान का ऐसा सच है जिसके आसरे राजनीति इस हद तक पली बढ़ी कि सियासत के लिये मुस्लमान वजीर माना गया और सामाजिक-आर्थिक विपन्नता ने इसे प्या  बना दिया। लेकिन जो सवाल बीते 70 बरस में मुस्लिमों को लेकर सियासी तौर पर नहीं वह सवाल आज की तारीख में सबसे ज्वलंत है कि क्या मोदी राज में मुस्लिम खुद को बदलेंगे। या फिर मुस्लिम सियासी प्यादा बनना छोड़ अपनी पहचान को भी बदल लेंगे। ये सवाल इसलिये क्योंकि जब 1952 के पहले चुनाव से लेकर 2014 के लोकसभा चुनाव और 2017 के यूपी चुनाव तक में मुस्लिम को वोट बैक मान कर राजनीति अलग अलग धारा में बंटी। और जीत हार के बाद भी सवाल सिर्फ मुस्लिमों को लेकर ही खड़े किये जा रहे हैं। ऐसी आवाजें कई स्तर पर कई मुस्लिम नेताओं के जरीये यूपी चुनाव परिणाम के बाद सुनी जा सकती है। तो सवाल तीन हैं। पहला क्या मुस्लिम नेता के सरोकार आम मुस्लिम नागरिक से जुडे हुये नहीं है। दूसरा क्या नुमाइन्दी के नाम पर हमेशा मुस्लिम ठगे गये। तीसरा, क्या मुस्लिम समाज के भीतर की कसमसाहट अब मुस्लिम नेताओं से अलग रास्ता तलाश रही हैं। क्योंकि यूपी चुनाव का सच तो यही है कि बीजेपी बहुमत के साथ जीती। करीब 40 फीसदी वोट उसे मिले। लेकिन कोई मुस्लिम उसका उम्मीदवार नहीं था। और पहली बार यूपी विधानसभा में सबसे कम सिर्फ 24 विधायक मुस्लिम हैं। पिछली बार 69 मुस्लिम विधायक थे। यानी जो समाजवादी और मायावती मुस्लिमों को टिकट देकर खुद को मुस्लिमों की नुमाइन्दी का घेरा बना रही थी, मुस्लिमो ने उसी समाजवादी और मायावती के बढते दायरे को कटघरा करार दे दिया। असर इसी का हुआ कि सपा के 16 तो बीएसपी के 5 और कांग्रेस के 2 मुस्लिम उम्मीदवार विधायक बन पाये। तो इसके आगे के हालात ये भी है कि क्या चुनावी जीत हार के दायरे में ही मुस्लिम समाज को मुख्यधारा में लाने या ना ला पाने की सोच देश में विकसित हो चली है। क्योंकि ट्रिपल तलाक पर बीजेपी के विरोध के साथ मुस्लिम महिलायें वोट देने के लिये खडी हुई लेकिन ट्रिपल तलाक बरकरार है। वाजपेयी के दौर में मदरसों के आधुनिकीकरण के साथ मुस्लिम खड़े हुये लेकिन मदरसों के हालात जस के तस है। कांग्रेस के दौर में बुनकर से लेकर हज करने तक में बड़ी राहत दी गई। लेकिन दोनों सवाल आज भी जस के तस हैं। 

मुलायम-मायावती के दौर में मुस्लिमों को वजीफे से लेकर तमाम राहत दी गई। लेकिन रहमान कमेटी से लेकर कुंडु कमेटी और सच्चर कमेटी तक में मुस्लिम समाज के भीतर के सवालों ने एक आम मुस्लिम की जर्जर माली हालत को ही उभार दिया। तो फिर मौजूदा वक्त में प्रधानमंत्री मोदी के सामने भी ये सवाल है और मुस्लिम समाज के भीतर भी ये सवाल है कि अखिर मुख्यधारा से सरकार की नीतिया मुस्लिम समाज को जोड़ेगी या फिर मुस्लिम अपनी पहचान छोड जब एक आम नागरिक हो जायेगा तो वह मुख्यधारा से जुड़ेगा क्योंकि अगला सवाल दलितो का है। 20 करोड़ दलित का। और राजनीति ने दलित को एक ऐसे वोट बैक में तब्दील कर दिया,जहां ये सवाल गौण हो गया कि दलित मुख्यधारा में शामिल कब और कैसे होगा। यानी आंबेडकर से लेकर कांशीराम और मायावती तक के दौर में दलितो का ताकत देने के सवाल कांग्रेस की राजनीति से टकराता रहा। और कांग्रेस नेहरु से लेकर राहुल गांधी तक के दौर में दलितों के हक का सवाल दलितों के दलित पहचान के साथ जोड़े रही। तो क्या यूपी चुनाव के जनादेश ने पहली बार संकेत दिये कि दलित नेताओं की नुमाइन्दगी तले दलित खुद को ठगा हुआ मान रहा है। यानी दलित नेताओ के सरोकार दलितों के सामाजिक-आर्थिक उत्थान से जुडे नहीं तो दलितों ने रास्ता अलग पकडा यानी जो सवाल मुस्लिमो की पहचान को लेकर उठा कि मोदी को लेकर मुस्लिम बदलेगें उसी तर्ज पर दलित भी अब अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान छोड कर मोदी सरकार के साथ खडे होगें । 

लेकिन संकट वहीं है कि क्या चुनावी जीत -हार तले दलितों की मुशिकल हालात सुधरेंगे । या फिर दलितो के लिये नीतिया मुख्यधारा में शामिल करने के अनुकूल बनेगी यानी मोदी के सामने दोहरी चुनौती है। एक तरफ मुस्लिम अपनी राजनीतिक पहचान छोड़े दूसरी तरफ दलितों को सत्ता मुख्यधारा की पहचान दें। यानी सारे हालात बार बार सरकार की उन आर्थिक सामाजिक नीतियों की तरफ ले जाती है जो असमानता पर टिका है। और प्रधानमंत्री मोदी के सामने सबसे बडी चुनौती यही है कि वह कैसे असमान समाज के भीतर सबका साथ सबके विकास की अलघ जगाये। क्योंकि बीजेपी के अपने अंतर्विरोध हिन्दुत्व और हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना को भी जीते हैं। यानी जाति और धर्म से टकराती हुये संघ से लेकर बीजेपी भी नजर आती है। ऐसे में अगला सवाल तो देश की असमानता के बीच सबका साथ सबका विकास तले गरीब किसान मजदूर का है। क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषणों में अब बीजेपी के वो पारंपरिक मुद्दे नज़र नहीं आते, जिनके आसरे कभी बीजेपी ने अपनी पहचान गढ़ी थी। अलबत्ता गरीब-किसान-मजदूर-दलित-शोषित-वंचित की बात करते हुए मोदी खुद को लीक से अलग ऐसे राजनेता के रुप में पेश करने की कोशिश में हैं,जिसके लिए हाशिए पर पड़े शख्स की जिंदगी को संवारना ही पहला और आखिरी उद्देश्य है।लेकिन देश की विपन्नता सबका साथ सबका विकास की समानता पर सवाल खड़ा करती है । क्योंकि देश का सच यही है कि सिर्फ एक फीसदी रईसों के पास देश की 58 फीसदी संपत्ति है । और दलित-मुस्लिम-किसान जो 80 फिसदी है उसके पास 10 फिसदी संसाधन भी नहीं है। यानी अर्थव्यवस्था के उस खाके को देश ने कभी अपनाया ही नहीं जहा मानव संसाधन को महत्व दिया जाये । यानी जो मानव संसाधन चुनाव जीतने के लिये सबसे बडा हथियार है। वहीं मानव संसाधन विकास की लकीर खींचे जाते वक्त पगडंडी पर चलने को मजबूर हैं। और उसके लिये किसी सरकार के पास कोई नीति है ही नहीं। यानी देश के हाशिए पर पड़ा समाज आज भी मूलभूत की लड़़ाई लड़ रहा है, और सबका साथ सबका विकास आकर्षक नारा तो बन जाता है लेकिन जमीन पर इसे अमलीजामा कैसे पहनाया जाए-इसका रोड़मैप किसी सरकार के पास कभी नहीं दिखा।