Sunday, March 24, 2019

धीरे धीरे बिसात पार्ट - 2 ..... संघ की चुनावी राजनीतिक सक्रियता



मोदी के सामने मुश्किल खूब है तो दूसरी तरफ सरसंघचालक मोहन भागवत की भी परिक्षा है । मोदी को एहसास है 2014 के दिखाये सपने अगर 2019 में पूरे हो नहीं पाये है तो फिर हवा उल्टी जरुर बहेगी और मोहन भागवत को भी एहसास है कि प्रचारक के बनने के बाद भी संघ के तमाम एंजेडा अगर मटियामेट हुये है तो फिर उनके पास दुबारा मोदी के लिये खडे होने के अलावे कोई विकल्प भी नहीं है । यानी 2019 के चुनाव में मोदी न कोई अलख नहीं जगायेगें न अपने उपर लगते आरोपो का जवाब देगें । यानी राफेल हो । बेरोजगारी हो । किसान का संकट हो । व्यापारियो की मुस्किल हो । मंहगाई की मार हो । घटता उत्पादन हो । शिक्षा-हेल्थ सर्विस का संकट हो । जवाब मोदी देगें नहीं । क्योकि चुनाव पांच साल के लिये मोदी ने लडा नहीं है बल्कि काग्रेस के वैचारिक जमीन कोखत्म कर संघ की जमीन को स्थापित करने का ही ये संघर्ष है और ये एहसास 2019 में संघ परिवार को भी करा दिया गया है या फिर उसे हो चला है कि हिन्दु राष्ट्र का जो भी रास्ता उसने देखा है वह काग्रेस को खत्म कर ही बन सकता है । और इसके लिये मोदी की चुनावी जीत जरुरी है । यानी सवाल तीन है । पहला , 2019 में मोदी-भागवत एक ही रास्ते पर है । यानी काग्रेस अगर संघ परिवार में मोदी को लेकर कोई भ्रम देख रही है तो ये काग्रेस का भर्म है । दूसरा , मोदी के अलाव संघ किसी दूसरे को नेतृत्व की सोच भी नहीं सकता है । यानी काग्रेस या विपक्ष अगर गडकरी या त्रिशकु जनादेश के वक्त मोदी माइनस बीजेपी को देख रहा है तो ये उसकी भूल होगी ।क्योकि उस हालात में भी बीजेपी के पीएम उम्मीदवार मोदी के पंसदीदा होगें । जो आज की तारिख में महाराष्ट्र के सीएम देवेन्द्र फडनवीस हो सकते है । तीसरा ,  संघ के कैडर को इसका एहसास है कि मोदी की सत्ता नहीं रही तो फिर उनके बुरे दिन शुरु हो जायेगे यानी वह सवाल दूर की गोटी है कि मोदी को लकर संघ कैडर में गाय से लेकर मंदिर तक के जो सवाल पाच बरस तक कुलाचे मारते रहे कि वह चुनाव में मोदी के खिलाफ जा सकते है । असल में संघ के सामने भी चुनावी जीत हार आस्तितव के संकट के तौर पर है इसका एहसास मोदी ने बाखूबी संघ को अपने संकट से जोड कर करा दिया है ।ऐसे में संघ ने पहली बार दो स्तर पर चुनावी प्रचार की रुपरेखा तय की है । जिससे कमोवेश देश की हर सीट तक उसकी पहुंच हो सके । और पहली बार स्वयसेवक किसी राजनतिक कार्यकत्ता की तर्ज पर चुनावी क्षेत्र में ना सिर्फ नजर आयेगे बल्कि सात चरण में सात जगहो पर नजर भी आयेगें । तरीके दो है ,  पहला, राज्यवार एक लाख स्वयसेवको का समूह सीट दर सीट घुमेगा । दूसरा , स्वयसेवक मोदी के बारे में कम काग्रेस के बारे में ज्यादा बात करेगें । यानी 2019 की राजनीति को ही संघ अपने हिसाब से गढने की तैयारी में जुट चुकी है जहा मोदी के पांच बरस र कोई चर्चा नहं होगी लेकिन काग्रेस के होने से क्या क्या मुश्किल देश के सामने आती रही है उसे परोसा जायेगा । और ये प्रचार कितना तीखा हो सकता है ये इससे भी समझा जा सका है एक तरफसाक्षी महाराज का बयान है तो दूसरीतरफ इन्द्रेश कुमार का । साक्षी कहत है मोदी जीते तो फिर ्गला चुनाव होगा ही नहीं त इन्द्रेश कुमार कहते ह कि मोदी बने रहे तो चंद बरस में लाहौर , कराची , रावलपिंडी में भी भरतीय जमीन खरीद सकते है । यानी स्वयसेवको में ये भ्रम ना रहे कि असंभव किया नहीं जा सका । तो मोदी को लारजर दैन लाइफ के तौर पर संघ के भीतर भी रखा जा रहा है जिसमें हिन्दुस्ता के लोकतंत्र का मतलब ही मोदी है तो दसरी तरफ अंखड भारत का सपना दिख कर हर दिन शाखा लगाने वाले स्वयसेवक मान लें कि पाकिसातन भी मोदी काल में भारत का हिस्सा होगा । यानी बिना समझ के सडक की भाषा या अवैज्ञानिक तरीके से संवैधानिक सत्ता को भी सडक के सामानातांतर ला दिया जाये तो सोच का पूरा पैराडोक्स ही बदल जायेगा ।
जारी...

बहुत धीरे धीरे बिछ रही है बिसात

मोदी की साख । राहुल का विस्तार । अमित शाह की चाणक्य नीति । प्रियंका का जादुई स्पर्श । अखिलेश और आयावती के आस्तितव का सवाल । तेजस्वी कीअग्निपरीक्षा । ममता के तेवर । पटनायक  और स्टालिन की लगेसी । और लोकतंत्र पर जनता का भरोसा या उम्मीद । 2019 की ये ऐसी तस्वीर है जिसमें राजनीतिक दलो  नाम गायब है । दूसरी कतार के नेताओ की चेहरो का महत्व गायब है । या कहे चंद चेहरो में ही लोकतंत्र का महापर्व कुछ इस तरह घुल चुका है जहा देश के  सामाजिक - आर्थिक हालात भी उस राजनीति पर जा
टिके है जिसके अपने सरोकार अपने ही नेताओ से गायब है । और इस कतार में जो सबसे महत्वपूर्ण है वह है संगठन की तादाद। हर बूथ तक पहुंचने के लिये पूंजी की पोटली । तकनीकी माध्यमो के उपयोग से वोटरो की
भावनाओ से जुडने का प्रयास । तो जरा कल्पना किजिये सात चरणो में देश के 90 करोड वोटरो तक कौन पहुंच
सकता है । यानी 543 सीटो पर किसकी पहुंच होगी जो 272के जादुई आंकडो को छू सकने के सपने को पा सके । इसमें सबसे बडी भूमिका आरएसएस की क्यो होगी इसे जानने से पहले जरा समझ लिजिये कि जो चेहरे मैदान में है या जिन चेहरो के भरोसे जीत के सपने संजोय जा रहे है उनकी ताकत है क्या या कितनी ताकत है उनमें मोदी के पास चुनावी इन्फ्रस्ट्रक्चर है और जनता से जुडने वाले सीधे संवाद के तरीके है । राहुल के पास मोदी पर  हमले का बेबाकपन भी है और मोदी से टूटे उम्मीद का पिटारा है । अखिलेश-मायावती के पास गठबंधन की ताकत है , तो ममता के पास बंगाल के समीकरण है यानी चाहे अनचाहे चुनाव को राज्यो को खाके में बांटकर देखेगें तो हो सकता है कि कही मोदी बनाम क्षत्रप नजर आये या फिर क्षत्रपो की ताकत को समेटे काग्रेस कागणित नजर आये या फिर कही बीजेपी और काग्रेस की सीधी टक्कर नजर
आये । लेकिन 2019 का चुनाव इतना सरल है ही नहीं कि हर प्रांत में चुनावी
प्लेयर खेलते हुये नजर आ जाये । या फिर विकास का ककहरा या जातिय समीकरण
का मिजाज विकास शब्द को ही हडप लें । दरअसल जिस स्थिति में देश आ खडा हुआ
हुआ है उसमें तीन तरीके हावी हो चले है ।पहला,  प्रचार प्रसार के जरीये हकीकत को पलट देना । दूसरा,  किसान व ग्रामिण भारत का मुखौटा लिये कारपोरेट के हाथो देश को सौप देना । तीसरा, कबिलाई राजनीति तले जातिय समीकरण में चुनावी जीत खोजना लेकिन इस बिसात पर पहली बार लकीरे इतनी मोटी खिची गई है कि दलित वोट बैक को ये एहसास है कि उसके वोट 2019 की सत्ता को बनाने या बिगाडने का खेल खेल सकते है तो वह अपने ही नेताओ को भी परखने को तैयार है । मसलन यूपी में मायावती कही जीत के बाद बीजेपी के साथ तो नहीं चली जायेगी तो  भीम आर्मी के चन्द्रशेखर सीधे मोदी को चुनौती देकर मायावती के प्रति शक पैदा हुये दलितो को लुभा रहा है । तो दूसरी तरफ देश के चुनावी इतिहास में पहली बार सत्ताधारी बीजेपी कोमुस्लिम वोट बैक की कोई जरुरत नहीं है इस एहसास को सबका साथ सबका विकास के बावजूद खुल कर उभरा गया । यानी मुस्लिम वोट उसी का साथ खडा होगा जो बीजेपी उम्मीदवार को हरायेगा । ये हालात कैसे अब गये इसके लिये बीजेपी के क भी मुस्लिम सांसद का ना होना या एक भी मुस्लिम को उम्मीदवार ना बनाने के हालात नहीं है बल्कि मुस्लिम चेहरा समेटे शहनवाज हुसैन तक के लिये एक सीट भी ना निकाल पाने की सियासी
जुगत भी है । और यही से शुरु होता है संघ और मोदी का वह सियासी काकटेल जो 2019 के चुनाव में कितना मारक होगा ये कह सकना आसान नहीं है । क्योकि एक तरफ मुद्दो का पहाड है तो दूसरी तरफ संघ की अनोखी सामाजिक पहुंच है ।

जारी.....


Sunday, February 24, 2019

क्या बेरोजगार युवाओ की फौज ही राजनीति की ताकत है ?

2019 के चुनाव का मुद्दा क्या है । बीजेपी ने पारंपरिक मुद्दो को दरकिनार
रख विकास का राग ही क्यो अपना लिया । काग्रेस का कारपोरेट प्रेम अब किसान
प्रेम में क्यो तब्दिल हो गया । संघ स्वदेशी छोड मोदी के कारपोरेट प्रेम
के साथ क्यो जुड गया । विदेशी निवेश तो दूर चीन के साथ भी जिस तरह मोदी
सत्ता का प्रेम जागा है वह क्यो संघ परिवार को परेशान नहीं कर रहा है ।
जाहिर है हर सवाल 2019 के चुनाव प्रचार में किसी ना किसी तरीके से
उभरेगा ही । लेकिन इन तमाम मुद्द के बीच असल सवाल युवा भारत का है जो
बचौर वोटर तो मान्यता दी जा रही है लेकिन बिना रोजगार उसकी त्रासदी
राजनीति का हिस्सा बन नहीं पा रही है और राजनीति की त्रासदी ये है कि
बेरोजगार युवाओ के सामने सिवाय राजनीति दल के साथ जुडने या नेताओ के पीछे
खडे होने के अलावा कोई चारा बच नही पा रहा है । यानी  युवा एकजुट ना हो
या फिर युवा सियासी पेंच को ही जिन्दगी मान लें , ऐसे हालात बनाये जा रहे
है । मसलन आलन ये है कि देश में 35 करोड युवा वोटर । 10 करोड बेरोजगार
युवा । छह करोड रजिस्ट्रट बेरोजगार । और इन आंकोडो के अक्स में ये सवाल उठ
 सकता है कि  ये आंकडे देश की
सियासत को हिलाने के लिये काफी है । जेपी से लेकर वीपी और अन्या आंदोलन
में भागेदारी तो युवा की ही रही । लेकिन अब राजनीति के तौर तरीके बदल गये
है तो युवाओ के ये
आंकडे राजनीति करने वालो को लुभाते है कि जो इनकी भावनाओ को अपने साथ जोड
लें , 2019 के चुनाव में उसका बेडा पार हो जायेगा । इसीलिये संसद में
आखरी सत्र में प्रदानमंत्री मोदी रोजगार देने के अपने आंकडे रखते है ।
सडक चौराहे पर रैलियो में राहुल गांधी बेरोजगारी का मुद्दा जोर शोर से
उठाते है और प्रधानमंत्री को बेरोजगारी के कटघरे में खडा करते है । और
राजनीति का ये शोर ये बताने के लिये काफी है कि 2019 के चुनाव के केन्द्र
में बेरोजगारी सबसे बडा मुद्दा रहेगा । क्योकि युवा भारत की तस्वीर
बेरोजगार युवाओ में बदल चुकी है । जो वोटर है लेकिन बेरोजगार है । जो
डिग्रीधारी है लेकिन बेरोजगार है । जो हायर एजुकेशन लिये हुये है लेकिन
बेरोडगार है । इसीलिये चपरासी के पद तक के लिये हाथो में डिग्री थामे
कितनी बडी तादाद में रोजगार की लाइन में देश का युवा लग जाता है ये इससे
भी समझा जा सकता है कि राज्य दर राज्य रोजगार कितने कम है । मसलन  आंकोडो
को पढे और कल्पना किजिये राज्सथान में 2017 में ग्रूप डी के लिये 35 पद
के लिये आवेदन निकलते है और 60 हजार लोग आवेदन कर देते है । छत्तिसगढ में
2016 में ग्रूप डी की 245 वेकेंसी निकलती है और दो लाख 30 हजार आवेदन आ
जाते है । मध्यप्रदेश में 2016 में ही ग्रूप डी के 125 वेकेंसी निकलती है
और 1 लाख 90 हजार आवेदन आ जाते है । पं बंगाल में 2017 में ग्रूप डी की 6
हजार वेकेंसी निकलती है और 25 लाख आवेदन आ जाते है । राजस्थान में साल भर
पहले चपरासी के लिये 18 वेकेंसी निकलती है और 12 हजार 453 आवेदन आ जाते
है । मुबंई में महिला पुलिस के लिये 1137 वेकेंसी निकलती है और 9 वाख
आवेदन आ जाते है । तो रेलवे ने तो इतिहास ही रच दिया जब ग्रूप डी के लिये
90 हजार वेकेंसी निकाली जाती है तो तीन दिन के भीतर ही आन लाइन 2 करोड 80
लाख आवेदन अप्लाई होते है । यानी रेलवे में ड्इवर , गैगमैन , टैक मैन ,
स्विच मैन , कैबिन मैन, हेल्पर और पोर्टर समेत देश के अलग अलग राज्यो में
चपरासी या डी ग्रू में नौकरी के लिये जो आनवेदन कर रहे थे या कर रहे है
वह कैसे डिग्रीधारी है इसे देखकर शर्म से नजरे भी झुक जाये कि बेरोजगारी
बडी है या एजुकेशन का कोई महत्व ही देश में नहीं बच पा रहा है । क्योकि
इस फेरहिस्त में 7767 इंजिनियर । 3985 एमबीए । 6980 पीएचडी । 991 बीबीए ।
करीब पांच हजार एमए या मए,, । और 198 एलएलबी की डिर्गी ले चुके युवा भी
शामिल थे । यानी बेरोजगारी इस कदर व्यापक रुप ले रही है कि आने वाले दिनो
में रोजगार के लिये कोई व्यापक नीति सत्ता ने बनायी नहीं तो फिर हालात
कितने बिगड जायेगें ये कहना बेहद मुस्किल होगा । पर देश की मुस्किल यही
नहीं ठहरती । दरअसल नीतिया ना हो तो जो रोजगार है वह भी खत्म हो जायेगा
और मोदी की सत्ता के दौर की त्रासदी यही रही कि अतिरक्त रोजगार तो दूर
झटके में जो रोजगार पहले से चल रहे थे उसमें भी कमी गई । केन्द्रीय
लोकसेवा आयोग , कर्मचारी चयन आयोग और रेलवे भर्ती बोर्ड में जितनी
नौकरिया थी वह बरस दर बरस घटती गई । मनमोहन सिंह के दौर में सवा लाख
बहाली हुई । तो 2014-15 में उसमें 11 हजार 908 की कमी आ गई । इसी तरह
2015-16 में 1717 बहाली कम हुई और 2016-17 में तो 10 हजार 874 नौकरिया कम
निकली । पर बेरोजगारी का दर्द सिर्फ यही नहीं ठहरता । झटका तो केन्द्रीय
सार्वजनिक उपक्रम में नौकरी करने वालो की तादाद में कमी आने से भी लगा ।
मोदी के सत्ता में आते ही 2013-14 के मुकाबले 2014-15 में 40 हजार
नौकरिया कम हो गई । और 2015-16 में 66 हजार नौकरिया और खत्म हो गई । यानी
पहले दो बरस में ही एक लाख से ज्यादा नौकरिया केन्द्रीय सार्वजिक उपक्रम
में खत्म हो गई । हालाकि 2016-17 में हालत संबालने की कोशिश हुई लेकिन
सिर्फ 2 हजार ही नई बहाली हुई । पर नौकरियो को लेकर देश को असल झटका तो
नोटबंदी से लगा । प्रदानमंत्री ने नोटबंदी के जरीये जो भी सोचा वह सब
नोटबंदी के बाद काफूर हो गया । हालात इतने बूरे हो गये कि बरस भर में
करीब दो करोड रोजगार देश में खत्म होगये । सरकार के ही आंकडो बताते है कि
दिसंबर 2017 में देश में 40 करोड 97 लाख लोग के पास काम था । और बरस भर
बाद यानी दिसंबर 2018 में ये घटकर 39 करोड 7 लाख पर आ गया । यानी ये सवाल
अनसुलझा सा है कि खिर सरकार ने रोजगार को लेकर कुछ सोचा क्यो नहीं । या
फिर देश में जो आर्थिक नीति अपनायी जा रही है उससे रोजगार अब खत्म ही
होगे या फिर रोजगार कैसे पैदा हो सरकार के पास कोई नीति है ही नहीं । ऐसे
में आखरी सवाल सिर्फ इतना है कि सियासत ने युवा को अगर अपना हथियार बना
लिया है तो फिर युवा भी राजनीति को अपना हथियार बना सकने में सक्षम क्यो
नहीं है ।

Tuesday, February 12, 2019

2019 की चुनावी बिसात पर राहुल की व्यूह रचना


2019 की दौड में नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी अगुवाई कर रहे है तो
अगुवाई करते नेता के पीछे खडे क्षत्रप की एक लंबी फौज है जो अपने अपने
दायरे में खुद की राजनीतिक सौदेबाजी के दायरे को बढा रहे है । इस कडी में
ममता , मायावती , अखिलेश , चन्द्रबाबू, चन्द्रशेखर राव, कुमारस्वामी ,
तेजस्वी , हेमतं सोरेन ,नवीन पटनायक सरीखे क्षत्रप है । लेकिन जैसे जैसे
वक्त गुजर रहा है वैसे वैसे तस्वीर साफ होती जा रही है कि राजनीतिक बिसात
बनेगी कैसी ।ध्यान दे तो नरेन्द्र मोदी की थ्योरी राष्ट्रवाद को लेकर रही
है । इसलिये वह चार मुद्दो को उटा रहे है । पहला विदेशो में मोदी की वजह
से भारत का डंका बज रहा है । दूसरा, डोकलाम में चीन को पहली बार मोदी की
कूटनीति ने ही आईना दिखा दिया । तीसरा , सर्जिकल स्ट्राइक के जरीये
पाकिस्तान धूल चटा दी । और चौथा हिन्दुत्व के रास्ते सत्ता चल रही है ।
और इसके लिये वह नार्थइस्ट में बांग्लादेशियो को खदेडने के लिये कानून
बनाने से भी नहीं चूक रही है । लेकिन राहुल गांधी की थ्योरी खुद को
राष्ट्रवादी बताते हुये अब मोदी के राष्ट्रवाद की थ्योरी तले इक्नामी के
अंधेरे को उभार रही है । राहुल गांधी का कहना है राष्ट्रवादी तो हम भी है
। और जहा तक हिन्दुत्व की बात है तो जनेउधारी तो हम भी है । लेकिन दुनिया
भर में डंका पिटने के बावजूद मोदी का राष्ट्रवादी गरीबो के लिये कुछ नही
कर रहा है ये सिर्फ कारपोरेट हित साध रहा है । यानी 2019 की तरफ बढते कदम
मोदी की व्यूह रचना में राहुल की सेंध को ही इस तरह जगह दे रहे है जैसे
एक वक्त की काग्रेस की चादर अब बीजेपी ने ओढ ली है और गरीब गुरबो का
जिक्र कर काग्रेस में समाजवादी-वामपंथी सोच विकसित हो गई है । यानी 2019
की बनती तस्वीर में क्षत्रपो के सामने संकट पाररंपरिक जाति और धर्म के
मुद्दे के हाशिये पर जाने से उभर रहा है । यानी आर्थव्.यवस्था को लेकर
जिस तरह काग्रेस सक्रिय हो चली है और राममंदिर को जिस तरह मोदी के साथ
संघ परिवार ने भी चुनाव तक टाल दिया है उसमें जातिय समीकरण के आधार पर
राजनीति करने वाले क्षत्रपो के सामने ये संकट है कि उनका वोट बैक भी उस
विकास को खोज रहा है जो उनके पेट और परिवार से जा जुडा है । इससे
क्षत्रपो की सौदेबाजी भी खासी कमजोर हो चली है । यानी इस तस्वीर का पहला
पाठ तो यही है बीजेपी क्षत्रपो को जीने नहीं देगी और काग्रेस क्षत्रपो को
अपनी शर्तो पर समझौता कराने की दिशा में ले जायेगी ।  राहुल प्रियका की
जोडी काग्रेस में आक्सीजन भर रही है या फिर क्षत्रपो के सामने जीवन मरन
का संकट खडा कर रही है । ये सवाल धीरे धीरे इसलिये बडा होता जा रहा है
क्योकि काग्रेस के कदम एकला चलो या फिर लोकसभा में ज्यादा से ज्यादा सीटो
पर चुनाव लडकर अपनी संख्या को बढाने के फार्मूले की तरफ बढ चुके है । और
ये सब कैसे हो रहा है ये देखना बेहद दिलचस्प है । क्योकि राहुल और
प्रियंका एक साथ जब चुनाव प्रचार के लिये उतरेगें तो इसका मतलब साफ है कि
यूपी बिहार झारखंड बंगाल, आध्र प्रदेश और उडीसा को लेकर साफ थेयोरी होगी
कि क्षत्रपो को राज्यो में अगुवाई की बात कहकर लोकसभाचतुनाव में ज्यादा
से द्यादा सीट खुद लडे । और मोदी विरोध की थ्योरी के सामानातंर पं बंगाल,
आध्रप्रेदश और उडिसा में किसी भी क्षत्रप के साथ समझौता ना करें । इस
थ्योरी को सिलसिलेवार समझे । यूपी में एक तरफ मायावती को लेकर मुस्लिम
समेत जाटव छोड बाकि दलित जातियो में ये सवाल अब भी है कि क्या चुनाव के
बाद मायावती सत्ता के लिये कही बीजेपी के साथ तो खडा नहीं हो जायेगी । तो
दूसरी तरफ अखिलेश के सामने यादव वोट बैक के अलावे ओबीसी जातियो के बिखराव
का संकट भी है और मायावती के साथ गठबंधन के बावजूद दलित वोट का ट्रासंभर
ना होने की स्थिति भी है । फिर काग्रेस को लाभ सीधा है । पहला, -काग्रेस
आर्थिक आधार पर अपने पारंपरिक वोट बैक को जोडने उतरेगी । तो दूसरा ,
महिला, युवा और अगडी जातियो के वोट को प्रियंका के आसरे जोडेगी । तो यूपी
से सटे बिहार झरखंड में काग्रेस अपनी सौदेबाजी के दायरे को बढा रही है
।इसलिये बिहार में तेजस्वी हो या झरखंड में सोरेन । दोनो के सामने
काग्रेस का प्रस्ताव साफ है , -तेजस्वी-सोरन सीएम बने लेकिन लोकसभा की
सीट ज्यादा काग्रेस के पास होगी । और ज्यादा सीटो पर चुनाव लडने का
फार्मूला ही पं बंगाल और आध्रपर्देश में काग्रेस को गटबंधन के बोझ से
मुक्त कर चुका है । उसलिये काग्रेस ने बंगाल में ममता बनार्जी के साथ तो
आध्र में चन्द्रबाबू के साथ मिलकर चुनाव ना लडने का फैसला किया है । यानी
काग्रेस इस हकीकत को बाखूबी समझ रही है कि लोकसभा चुनाव में जिसके पास
ज्यादा सीट होगी उसकी दावेदारी ही चुनाव के बाद पीएम के उम्मीदवार के तौर
पर होगी । और इसके लिये जरुरी है अपने बूते चुनाव लडना । तो ऐसे में
प्रियंका की छवि कैसे नरेन्द्र मोदी के औरे को खत्म करेगी इसपर काग्रेस
का ध्यान है । क्योकि 2014 में नरेन्द्र मोदी जिस हंगामे और जिस तामझाम
के साथ आये ये कोई कैसे भूल सकता है । और तब प्रचार में बीजेपी कही नहीं
थी सिर्फ मोदी थे । लेकिन इसके उलट प्रियंका गांधी की इंट्री बेहद खामोशी
से हुई । काग्रेस मुख्यालय में नेम प्लेट टांगने से लेकर कार्यकत्ताओ से
बिना हंगामे मिलने के तौर तरीके ने ये तो साफ जतला दिया कि प्रिंयका को
किसी प्रचार की जरुरत नहीं है । और काग्रेस का मतलब ही नेहरु गांधी
परिवार है । लेकिन बीजेपी यहा भी अपने ही कटघरे में फंस गई । जब उसने
खामोश प्रियका को खानदान और बिना हंगामे के राजनीति तले सिर्फ परिवार के
अक्स में देखना शुरु किया । यानी प्रिंयका की छवि बीजेपी ने ही अपनी
आलोचना से इतनी रहस्मयी और जादुई बना दिया कि प्रियका के बारे में जानने
के लिये वोटरो में भी उत्सुकता जाग गई । और काग्रेस ने प्रियंका की छवि
को मुद्दो को आसरे जिस तरह उभारने की कोशिश शुरु की है वह ना सिर्फ
प्रियाका को दिरा गांधी से जोड रही है बल्कि इंदिरा के दौर में जिस तरह
गरीबी हटाओ का नारा बुलंद हुआ । और जिसतरह मोदी के कारपोरेट प्रेम तले
किसान मजदूर का सवाल काग्रेस उटा रही है उसमें चाहे अनचाहे 2019 का चुनाव
अमीर बनाम गरीब की तरफ बढता जा रहा है । तो सवाल तीन है । पहला, क्या
प्रियका को सिर्फ यूपी तक सीमित रखा जायेगा । दूसरा , क्या प्रिंयका को
यूपी के सीएम के तौर पर प्रजोक्ट भी किया जायेगा ।  -तीसरा , क्या
प्रिंयका की छवि राहुल के लिये मुश्किल पैदा करेगा । पर इन सवालो का जवाब
भी काग्रेस के पास है । ध्यान से परखे तो  प्रिंयका गांधी को चुनावी
मैदान में तब उतारा गया जब राहुल गांधी की छवि पप्पू से इतर एक परिपक्व
नेता के तौर पर बनने लगी । फिर  राहुल गांधी ने अपनी राजनीति से मोदी को
कारपोरेट के साथ खडा करने में राजनीतिक सफलता पायी । और -तीसरा , किसान
और बेरजगारी के सवाल को जिस तरह राहुल ने मथा उसका ठीकरा मोदी सत्ता पर
फूटा । और इसी अक्स में प्रियका का राजनीतिक इन्ट्री ही राहुल गांधी ने
इस स्ट्रेटजी के साथ किया कि इंदरा की छवि में गरीबो के सावल को साथ लेकर
अगर प्रयका प्रचार मैदान में कूदेगी तो मोदी का औरा खत्म होगा ।


Tuesday, January 29, 2019

जिन्हे जार्ज ने खडा किया उन्होने ही जार्ज को धोखा दिया....

तारिख 2 अप्रेल 2009 । नीतीश कुमार ने रामविलास पासवान का साथ छोड़कर आये
गुलाम रसूल बलियावी का हाथ आपने हाथ में लेकर जैसे ही उन्हें जनतादल
यूनाईटेड में शामिल करने का ऐलान किया वैसे ही दीवार पर टंगे तीन बोर्ड
में से एक नीचे आ गिरा। गिरे बोर्ड में तीर के निशान के साथ जनतादल
यूनाइटेड लिखा था। बाकी दो बोर्ड दीवार पर ही टंगे थे, जिसमें बांयी तरफ
के बोर्ड में शरद यादव की तस्वीर थी तो दांयी तरफ वाले में नीतीश कुमार
की तस्वीर थी। जैसे ही एक कार्यकर्ता ने गिरे हुये बोर्ड को उठाकर शरद
यादव और नीतीश कुमार के बीच दुबारा टांगा, वैसे ही कैमरापर्सन के हुजूम
की हरकत से वह बोर्ड एकबार फिर गिर गया। इस बार उस बोर्ड को टांगने की
जल्दबाजी किसी कार्यकर्ता ने नहीं दिखायी। पता चला इस बोर्ड को 2 अप्रैल
की सुबह ही टांगा गया था। इससे पहले वर्षों से दीवार पर शरद यादव और
नीतीश कुमार की तस्वीर के बीच जॉर्ज फर्नांडिस की तस्वीर लगी हुई थी। और
तीन दिन पहले ही शरद यादव की प्रेस कॉन्फ्रेन्स के दौरान पत्रकारों ने जब
शरद यादव से पूछा था कि जॉर्ज की तस्वीर लगी रहेगी या हट जायेगी तो शरद
यादव खामोश रह गये थे।

लेकिन 30 मार्च को शरद यादव के बाद 2 अप्रैल को नीतीश की मौजूदगी में
जॉर्ज की जगह लगाया गया यह बोर्ड तीसरी बार तब गिरा, जब प्रेस
कॉन्फ्रेन्स के बाद नीतीश कुमार जदयू मुख्यालय छोड़ कर निकल रहे थे ।
मुख्यालय में यह तीनों तस्वीरें नीतीश के पहली बार मुख्यमंत्री बनने के
दौरान लगायी गयी थीं। उस दिन गुलाल और फूलों से नीतीश के साथ साथ जॉर्ज
और शरद यादव भी सराबोर थे। उस वक्त तीनों नेताओ को देखकर ना तो कोई सोच
सकता था कि कोई अलग कर दिया जायेगा या तीनों तस्वीरों को देख कर कभी किसी
ने सोचा नहीं था की जॉर्ज की तस्वीर ही दीवार से गायब हो जायेगी। और इसके
पीछे वही तस्वीर होगी, जिन्हें राजनीति के फ्रेम में मढ़ने का काम जॉर्ज
फर्नांडिस ने किया।

जार्ज फर्नांडिस कितने भी अस्वस्थ क्यों ना हों, लेकिन जो राजनीति देश
में चल रही है उससे ज्यादा स्वस्थ्य जॉर्ज हैं, यह कोई भी ताल ठोंक कर कह
सकता है। शरद यादव को जबलपुर के कॉलेज से राजनीति की मुख्यधारा में लाने
से लेकर लालू यादव की राजनीति को काटने के लिये नीतीश कुमार में पैनापन
लाने के पीछे जॉर्ज ही हैं। लेकिन जॉर्ज फर्नांडिस की जगह नीतीश कुमार को
वह जय नारायण निषाद मंजूर हैं, जो लालू यादव का साथ छोड़ टिकट के लिये
नीतीश के साथ आ खड़े हुये हैं।

सवाल जॉर्ज की सिर्फ एक सीट का नहीं है, सवाल उस राजनीतिक सोच का है
जिसमें खुद का कद बढ़ाने के लिये हर बड़ी लकीर को नेस्तानाबूद करना शुरु
हुआ है। और यह खेल संयोग से उन नेताओं में शुरु हुआ है, जो इमरजेन्सी के
खिलाफ जेपी आंदोलन से निकले हैं। हांलाकि सत्ता की राजनीतिक लकीर में
जॉर्ज ज्यादा बदनाम हो गये क्योंकि अयोध्या से लेकर गुजरात दंगो के दौरान
जॉर्ज बीजेपी को अपनी राजनीति विश्वनियता के ढाल से बचाने की कोशिश करते
रहे। लेकिन गुजरात दंगो के दौरान नीतीश और शरद यादव में भी हिम्मत नहीं
थी कि वह जॉर्ज से झगडा कर एनडीए गठबंधन से अलग होने के लिये कहते। दोनो
ही सत्ता में मंत्रीपद की मलाई खाते रहे।

असल में जार्ज अगर ढाल बने तो उसके पीछे उनकी वह राजनीतिक यात्रा भी है,
जो बेंगलूर के कैथोलिक सेमीनरी को छोड़ कर मुंबई के फुटपाथ से राजनीति का
आगाज करती है। मजदूरों के हक के लिये होटल-ढाबा के मालिकों से लेकर मिल
मालिकों के खिलाफ आवाज उठाकर मुंबई में हड़ताल-बंद और अपने आंदोलन से शहर
को ठहरा देने की हिम्मत जॉर्ज ने ही इस शहर को दी। 1949 में मुंबई पहुंचे
जॉर्ज ने दस साल में ही मजदूरों की गोलबंदी कर अगर 1959 में अपनी ताकत का
एहसास हडताल और बंद के जरीये महाराष्ट्र की राजनीति को कराया तो 1967 में
कांग्रेस के कद्दावर एस के पाटिल को चुनाव में हराकर संसदीय राजनीति में
नेहरु काल के बाद पहली लकीर खिंची, जहां आंदोलन राजनीति की जान होती है,
इसे भी देश समझे। जॉर्ज उस दौर के युवाओं के हीरो थे । क्योंकि वह रेल
यूनियन के जरीये दुनिया की सबसे बड़ी हडताल करते हैं। सरकार उनसे डरकर
उनपर सरकारी प्रतिष्ठानों को डायनामाइट से उड़ाने का आरोप लगाती है।
इसीलिये इमरजेन्सी के बाद 1977 के चुनाव में जब हाथों में हथकडी लगाये
जॉर्ज की तस्वीर पोस्टर के रुप में आती है, तो मुज्जफरपुर के लोगों के
घरों के पूजाघर में यह पोस्टर दीवार पर चस्पा होती है। जिस पर छपा था, यह
हथकड़ी हाथों में नही लोकतंत्र पर है। और नीचे छपा था- जेल का ताला
टूटेगा जॉर्ज फर्नाडिस छूटेगा।

जाहिर है बाईस साल पहले के चुनाव और अब के चुनाव में एक नयी पीढ़ी आ चुकी
है, जिसे न तो जेपी आंदोलन से मतलब है, न इमरजेन्सी उसने देखी है। और
जॉर्ज सरीखा व्यक्ति उसके लिये हीरो से ज्यादा उस गंदी राजनीति का प्रतीक
है, जिस राजनीति को जनता से नही सत्ता से सरोकार होते है। इस पीढी ने
बिहार में लालू का शासन देखा है और नीतीश को अब देख रहा है। नीतीश उसके
लिये नये हीरो हो सकते हैं क्योकि लालू तंत्र ने बिहार को ही पटरी से
उतार दिया था। लेकिन लालू के खिलाफ नीतीश को हिम्मत जॉर्ज फर्नाडिस से ही
मिली चाहे वह समता पार्टी से हो या जनतादल यूनाईटेड से। लेकिन केन्द्र
में एनडीए की सत्ता जाने के बाद बिहार में लालू सत्ता के आक्रोष को
भुनाने के लिये जो रणनीति नीतीश ने बनायी, उसमें अपने कद को बढाने के
लिये जॉर्ज को ही दरकिनार करने की पहली ताकत उन्होने 12 अप्रैल 2006 में
दिखा दी। लेकिन सियासत की बिसात कैसे महाभारत की चौसर पर भी भारी हो चुकी
है इसका एहसास तो तब शरद यादव को भी हो चुका होगा । जो 13 बरस पहले नीतिश
की बिसात पर वजीर बन कर जार्ज को मात देने के लिये तैयार हो गये । और बरस
भर पहले नीतिश ने सत्ता के लिये मोदी प्रेम तले शरद यादव को भी दरकिनार
कर दिया । तो 2006 को याद किजिये जार्ज के खिलाफ जब पार्टी अध्यक्ष चुनाव
में शरद यादव और जॉर्ज आमने सामने खड़े थे । बिलकुल गुरु और चेले की
भिंडत । मगर बिसात नीतिश की थी । जार्ज को 25 वोट मिले और शरद यादव को
413 । लेकिन चुनाव के तरीके ने यह संकेत तो दे दिये की नीतीश की बिसात पर
जॉर्ज का कोई पांसा नहीं चलेगा और जॉर्ज को खारिज करने के लिये नीतीश
अपने हर पांसे को जार्ज की राजनीतिक लकीर मिटाकर अपनी लकीर को बड़ा
दिखाने के लिये ही करेंगे ।

लेकिन, इसका अंदाजा किसी को नहीं था कि इस तिगडी की काट वही राजनीति
होगी, जिस राजनीति के खिलाफ आंदोलन खड़ा करने की बात तीनों ने ही अपने
राजनीतिक कैरियर की शुरुआत में की थी । इसीलिये जॉर्ज को अस्वस्थ बताकर
मुज्जफरपुर से टिकट काटने के बाद नीतीश ठहाका लगा रहे थे कि बिना उनके
समर्थन के जॉर्ज चुनाव मैदान में कूदकर अपनी भद ही करायेंगे । वहीं,
जॉर्ज अपना राजनीतिक निर्वाण लोकसभा चुनाव लड़कर ही चाहते हैं। इसीलिये
जॉर्ज ने पर्चा भरने के बाद अपने मतदाताओं से जिताने की तीन पन्नो की जो
अपील की है, उसका सार यही है कि जिस तरह गौतम बुद्द के दो शिष्यों में एक
देवदत्त था, जो बुद्ध को मुश्किलों में ही डालता रहा, वहीं उनके दोनों
शिष्य ही देवदत्त निकले । आनंद जैसा कोई शिष्य जार्ज को तब मिला नहीं और
अनथक विद्रोही नेता उसके बाद धीरे धीरे भूलने वाली बिमारी की चपेट में आ
गये । अल्जाइमर ने गिरफ्त में लिया तो जार्ज भूल गये नीतिश कौन है । शद
यादव कौन है । इंदिरा गांधी कौन थी । बाल ठाकरे कौन थे । अच्छा है इस दौर
में उनकी यादश्त नहीं थी वर्ना प्रधानमंत्री मोदी को देख गुजरात दंगो के
दौर में वाजपेयी के राजधर्म को याद करते और अब के राजधर्म को नकारने के
लिये निकल पडते । लंबी खामोशी के बाद जार्ज के निधन की खबर भी जिस खामोशी
के साथ आई उसने निद्रा में समायी मौजूदा सियासत को सिर्फ मौत की सूचना भर
से जगाया । अच्छा है एनडीए के पांच सारथियो में से वाजपेयी और जार्ज का
निधन हो चुका है । दोनो ही आखरी दिनो में सबकुछ भूल चुके थे ।  जसवंत
सिन्हा भी सबकुछ भूल चुके है  [ अल्जाइमर से ग्रसित ]  । आडवाणी और मुरली
मनोहर जोशी को खामोश किया जा चुका है ।  तो अस्वस्थ जार्ज के निधन की खबर
भी अस्वस्थ सियासत तले दब गई ।


Sunday, January 27, 2019

स्वंयसेवक की कडक चाय : कैप्टन के हाथों जहाज गडमगाने लगा है ...तो हलचल शुरु हो गई !


कडक चाय कितना मायने रखेगी जब चाय पिलाने वाला स्वयसेवक हो और झटके में कह दें अब तो जेटली भी चुनाव के बाद के हालात में अपनी जगह बनाने में जा जुटे है । तो क्या मोदी का जादू खत्म । सवाल खत्म या जारी रहने का नहीं है , जरा समझने की कोशिश किजिये जेटली हर उस कार्य से पल्ला झाड रहे है जो उन्ही के देखरेख में शुरु हुआ । सिर्फ सीबीआई या ईडी या इनकमटैक्स भर का नहीं है जो कि चंदा कोचर के मामले में उनका दर्द सामने आ गया । तो ये दर्द है ऐसा माना जाये......हा हा , बिलकुल नहीं , बल्कि खुद को चुनाव बाद के हालात में फिट करने की कोशिश है ।

तो क्या जेटली को लग चुका है कि बीजेपी दुबारा सत्ता में नहीं लौटगी । प्रोफेसर साहेब ने घुमा कर पूछा तो स्वयसेवक महोदय ने भी घुमा कर कहा राजनीति में कुछ भी संभव है लेकिन ये समझने की कोशिश किजिये कि जो सबसे ताकतवर है उसी से पल्ला झाडने का अंदाज विकसित क्यो हो रहा है । मसलन, मुझे पूछना पडा ।
मसलन क्या वाजपेयी साहेब , गडकरी ने तब उस कारपोरेट के हक में कहा जब मोदी सत्ता माल्या और नीरव मोदी को चोर कहने से नहीं चुक रही थी । पर गडकरी ने चोर शब्द पर ही एतराज कर दिया । फिर आपने कल परेड क वक्त राहुल गांधी के बगल में बैठे नीतिन गडकरी की बाडी लैक्वेज नहीं पढी ।
तो आप बाडी लेग्वेज पढने लगे है .....प्रोफेसर की इस चुटकी पर स्वयसेवक महोदय बोल पडे....ना ना यारी नहीं समझी । दरसल गडकरी काग्रेस के हिमायती या राहुल गांधी के प्रशसंक नहीं है । लेकिन गडकरी किसी से वैसी दुशमनी नहीं करते जैसी मोदी सत्ता कर रही है । और ध्यान दिजिये राहुल से बातचीत कर गडकरी राहुल को कम मोदी को ज्यादा देख रहे होगें ।
अब ये तो मन की बात है ...इसे आप कैसे पढ सकते है । मेरे टोकते ही अब प्रोफेसर साहब बोल पडे...इसमें पढना क्या है  हालात समझे । हर कोई अपनी अपनी पोसचरिंग ही तो कर रहा है । लेकिन हर के निशाने पर सत्ता का कैप्टन है ।
वाह कमाल है प्रोफेसर साहेब आप बाहर सs कैसे सब पढ ले रहेहै ।
पढ नही रहा हूं बल्कि नंगी आंखो से देख रहा हूं ।
कैसे ...मुझे ही टोकना ।
देखिये मोदी सत्ता के तीन पीलर में से एक तो जेटली है ....और बजट से एन पहले उनके ब्लाग जो बयान कर रहे है वह क्या दर्शाता है । राजनीति टाइमिंग का खेल है । इसे स्वयसेवक साहेब शायद ना समझे लकिन हम बाखूबी समझते है । क्यो स्वयसेवक महोदय जरा आप ही इसे डि-कोड किजिये ।
क्या .. अचानक स्वयसेवक महोदय अब चौक पडे ।
यही की न्यूयार्क से जेटली सत्ता के रोमान्टिज्म पर सवाल खडा करते है । इधर , बीजेपी के पोस्टर ब्याय योगी आदित्यनाथ संदेश देते है कि राम मंदिर तो चौबिस घंटे में वो बनवा सकते है । फिर सुब्रहमण्यम स्वामी लिखते है , राम मंदिर बनाने में क्या है एक बार वीएचपी को खुला छोड दिजिये बन जायेगा राम मंदिर । और उससे पहले याद कर लिजिये विएचपी के कोचर महोदय कह गये राममंदिर को काग्रेस ही बनायेगी । और फिर संघ मेंदूसरे नंबर के भैयाजी जोशी ये कहने से नहीं चुकते कि लगता है राम मंदिर 2025 में ही बनेगा । तो इसका क्या मतलब निकाला जाये ।
स्वयसेवक महोदय ने बिना देर किये प्रोफेसर साहेब की नजरो से नजर मिलायी और बोल पडे ..डिकोड क्या करना है ...बीजपी में सभी को समझ में आ रहा है कि कैप्टन अब जहाज को आगे ले जाने की स्थिति में नहीं है तो हाबसियन स्टेट की हालात बन रही है ।
यानी
यानी यही कि प्रोफेसर साहेब जिसे मौका मिल रहा है वह कैप्टन पर हमला कर खुद को भविष्य का कैप्टन बनाने की दिशा में जाना चाह रहा है । सुब्हमण्य स्वामीबता रहे है कि रहे है कि जेटली ही सबसे बडे अपराधी है । योगी कह रहे है कि मोदी तो कभी राम मंदिर बनाना ही नहीं चाहते है । गडकरी इशारा कर रहे है कारपोरेट उनके पीछे खडा हो जाये तो मोदी माइनस बीजेपी को सत्ता में वह ला सकते है । फिर संघ भी समझ रहा है कि जहाज डूबेगा तो उनकी साख कैसे बची रहे । लेकिन इस हालात को बनाते वक्त हर कोई ये भुल रहा है कि जिस कटघरे को सभी मिल कर राहुल गांधी के लिये बना रहे थे वह अब उन्ही के लिये गले की हड्डी बन रही है ।
वह कैसे ...
वाजपेयी जी आप हालात परखे । मोदी ने शुरु से चाहा कि देश प्रेजिडेन्शियल इलेक्शन की तरफ बढ जाये जिससे एक तरफ लोकप्रिय मोदी होगें तो दूसरी तरफ पप्पू समझे जाने वाले राहुल गांधी । लेकिन धीरे धीरे कैसे हालात पलट रहे है ये समझे ।
वह कैसे अब प्रोफेसर साहेब मुखातिब हुये ....
वह ऐसे प्रोफेसर साहब ...बेहद प्यार से स्वयसेवक महोदय जिस तरह बोले उससे हर कोई ठहाका लगाने लगा....
समझे...जो प्रेसिडिनेशियल इलेक्शन का चेहरा था अब वही बीजेपी के नेताओ या कहे जेटली तक के निशाने पर है । और बीजेपी जो सांगठनिक पार्टी है । जिसका संगठन हर जगह है । फिर संघ की भी जमीन बीजेपी को मजबूती देती है । लेकिन मोदी-शाह ने जिस तरह खुद को लारजर दैन लाइफ बनाने की कोशिश की उसमें अब अगर वह हारेगें तो सिर्फ वह नहीं ढहेगें बल्कि बीजेपी संघ दोनो की जमीन भी खत्म होगी । वही दूसरी तरफ काग्रेस का संगठन सभी जगह नहीं है , लेकिन धीरे धीरे जिस तरह राहुल गांधी का कद साख के साथ बढ रहा है वह चाहे अनचाहे प्रसिडेन्शियल उम्मीदवार बन रहे है । और इसका लाभ सीधे काग्रेस को मिलेगा । या कहे मिल रहा है ।
तो क्या ये मान लिया जाये कि चुनाव मोदी बनाम राहुल गांधी होने से लाभ काग्रेस को है ।
जी वाजपयी जी ......और उसपर प्रियका गांधी के मैदान में उतरने से प्रसेडेशियल इलेक्शन में काग्रेस को एक नया आयाम मिल जायेगा ।
 वह कैसे...अब प्रोफेसर साहेब बोले...
वह दक्षिण भारत में नजर आयेगा ...जहा इंदिरा गांधी खासी लोकप्रिय थी । वहा इंदिरा का अक्स लिये जब प्रियका गांधी पहुंचेगी तो बीजेपी का संगठन या संघ का शाखा भी कुछ कर नही पायेगी ।
तो बीजेपी को अपनी रणनीति बदल लेनी चाहिये...
प्रोफेसर साहेब ....जब बीजेपी का मतलब ही मोदी हो तब रणनीति कौन बदलेगा । तब तो सिर फुट्ववल ही होगा । जिसकी शुरुआत हो चुकी है । और फरवरी शुर तो होने दिजिये तब आप समझ पायेगें कि कैसे धीरे धीरे टिकट की मारामारी भी बीजेपी को उसी के चक्रव्यू में फंसा कर खत्म कर देगी ।
पर टिकट की ये मारामारी तो सपा-बसपा में भी होगी ।
बिलकुल होगी क्या है ....मायावती को ही अब भी टिकट के बदले करोडो चाहिये । तो रुपये-पैसे वाले ही बसपा का टिकट पायेगें । फिर उसके काउंटर में सपा की जो सीटे बसपा के पास चली गई है वहा सपा का उम्मीदवार क्या करेगा । और क्या वहा गठबंधन के बावजूद वो ट्रासभर नहं होगा । इसका लाभ बीजेपी को मिल जायेगा कयोकि चाहे अनचाहे मुकाबला हर जगह त्रिरोणिय हो जायेगा । दरअसल यही वह फिलास्फी है जिसके आधार पर शाह की सियासी गोटिया चल रही है । लेकिन काग्रेस कैसे डार्क हार्स हो चली है ये किसी को समझ नहीं आ रहा है । और चुनाव का समूचा मिजाज ही अगर मोदी का चेहरा देखते देखते अब ताजा-नये चेहरे को खोज कर राहुल-प्रियका को देख रहा है तो फिर सवाल जातिय समीकरण या गठबंधन का कहा बचेगा ।
स्वयसेवक महोदय आप तो काग्रेसी हो चले है ।
क्यो प्रोफेसर साहेब
क्योकि आप राहुल गांधी को खडा किये जा रहे है
ना ना प्रोपेसर साहेब सिर्फ लकीर खिंच रहे है ...मुझे बीच में कूदना पडा ।  क्योकि पप्पू से करीशमाई नेता के तौर पर मान्यता पाते राहुल के पिछे उनकी कार्यशौली की सीधी लकीर है । जो कही जुमला या तिरछी नहीं होती है । याद किजिये भूमि अधिकग्रहण , सूट बूट की सरकार , किसान संकट , नोटबंदी , जीएसटी की जल्दबाजी और फिर राज्यो में जीत के साथ ही किसान कर्ज माफी ।
वाजपयी जी इसमें एक बात जोडनी होगी कि मोदी सत्ता को सच बताने वाला कोई बचा ही नहीं ।
हा हा हा हा ....आप इशारा क्या है ।
मै आपकी तरफ इशारा नहीं कर रहा हूं ..बल्कि हकीकत समझे...मै दो दिन पहले  ही एक अग्रेजी के राष्ट्रीय चैनल पर चुनावी सर्वे को देख रहा था । उस सर्व में यूपी का सर्वे खासा महत्वपूर्ण था । बकायदा एससी-एसटी , ओबीसी और उच्च जाति में काग्रेस को 19 से 26 फिसदी के बीच वोट दिखाये गये । लेकिन आखिर में बताया गया कि काग्रेस के हिस्से में सिर्फ 12 फिसदी वोट है । यानी एडिटर चवाइस पर रिजल्ट निकाला जा रहा है कि आका खुश हो जाये । और आका को सिर्फ रिजल्ट देखने की फुरसत है क्योकि वह शुशी देता है तो जमीनी सच है क्या ...इसे प्रधान सेवक भी कैसे समझेगें ।
तो क्या साहेब हवा में है ....
ना ना ...जो उन्हे बताया जा रहा है वह उसे ही सच मान रहे है । और बताने वाले झूठ क्यो बोले जब साहेब को सिर्फ जीत ही सुननी है । फिर ध्यान दिजिये उनके तमाम भाषणो में अब सपने नहीं दिखाये जाते बल्कि काग्रेस-विपक्ष गठबंधन को कोसा जाा है ।
और कोसने का अंदाज भी एसा है जिससे सहानुभूति के वोट उन्हे मिल जाये ....
वाह प्रोफेसर साहेब..बडी पैनी नजर है आपकी साहेब पर....

 

Saturday, January 26, 2019

रौशन है लोकतंत्र....क्योकि जगमग है रायसिना हिल्स की इमारते !




तो 70वें गणतंत्र दिवस को भी देश ने मना लिया । और 26 जनवरी की पूर्व संध्या पर भारत को तीन " भारत रत्न " भी मिल गये । फिर राजपथ से लेकर जनपथ और देश भर के राज्यो में राज्यपालो के तिरगा फहराने के सिलसिले तले देश के विकास और सत्ता की चकाचौंध को बिखराने के अलावे कुछ हुआ नहीं तो गणतंत्र दिवस भी सत्ता के उन्ही सरमायदारो में सिमट गया जिनकी ताकत के आगे लोकतंत्र भी नतमस्तक हो चुका है । संविधान लागू हुआ तो 1952 में आम चुनाव संपन्न हुआ । तब चुनाव आयोग का कुल दस करोड रुपया खर्च हुआ । और गणतंत्र बनने के 70वें बरस जब देश चुनाव की दिशा में बढ चुका है तो हर उममीदवार अपनी ही सफेद-काली अंटी को टटोल रहा है कि चुनाव लडने के लिये उसके पास कितने सौ करोड रुपये है । पर आज इस बात को दोहराने का कोई मतलब नहीं है लोकतंत्र कहलाने के लिये देश का चुनावी तंत्र पूंजी तले दब चुका है । जहा वोटो की किमत लगा दी जाती है । और हर नुमाइन्दे के जूते तले आम लोगो की न्यूनतम जरुरते रेंगती दिखायी देती है । और जब नुमाइन्दे समूह में आ जाये तो पार्टी बन कर देश की न्यूनतम जरुरतो को भी सत्ता अपनी अंटी में दबा लेती है । यानी रोजगार हो या फसल की किमत । शिक्षा अच्छी मिल जाय या हेल्थ सर्विस ठीक ठाक हो जाये । पुलिस ठीक तरह काम करें या संवैधानिक संस्थान भी अपना काम सही तरीके से करें । पर ऐसा तभी संभव है जब सत्ता माने । सत्ताधारी समझे । और नुमाइन्दो का जीत का गणित ठीक बैठता हो । यानी देश किस तरह नुमाइन्दो की गुलामी अपनी ही जरुरतो को लेकर करता है ये किसी से छुपा नहीं है । हां, इसके लिये लोकतंत्र के मंदिर का डंका बार बार पीटा जाता है । कभी संसद भवन में तो कभी विधानसभाओ में । और नुमाइन्दो की ताकत का एहसास इससे भी हो सकता है मेहुल चोकसी देश को अरबो का चूना लगाकर जिस तरह एंटीगुआ के नागरिक बन बैठे वैसे बाईस एंटीगुआ का मालिक भारत में एक सासंद बन जाता है । यानी संसद में तीन सौ पार सासंदो की यारी या ठेंगा दिखाकर माल्या , चौकसी या नीरव मोदी समेत दो दर्जन से ज्यादा रईस भाग चुक है और संसद इसलिये बेफिक्र है क्योकि अपने अपने दायरे में हर सांसद कई माल्या और कई चौकसी को पालता है और अपने तहत आने वाले 22 लाख से ज्यादा वोटरो का रहनुमा बनकर संविधान की आड में रईसी करता है ।  जी, एंटिगुआ की कुल जनसंख्सया एक लाख है और भारत में ेक सांसद के तहत आने वाे वोटरो क तादाद 22 लाख । सच यही है कि दुनिया में भारत नंबर एक का देश है जहा सबसे ज्यादा वोटर एक नुमाइन्दे के तहत रहता है । 545 सासंदो वाली लोकसभा में हर एक सासंद के अधिन औसतन  बाईस लाख बीस हजार 538 जनता आती है । और चीन जहा की जनसंख्या भारत से ज्यादा वहां नुमाइन्दो की तादाद भारतसे करीब छह गुना ज्यादा है । यानी चीन के एक सांसद के तहत 4 लाख 48 हजार 518 जनसंख्या आती है क्योकि वहा सांसदो की तादाद 2987 है । और अमेरिका में एक सांसद के उपर 7 लाख 22 हजार 636 जनसंख्या का भार होता है तो रुस में तीन लाख 18 हजार जनसंख्या एक नुमाइन्दे के अधिन होती है । तो पहला सवाल तो यही है कि क्या छोटे राज्यो के साथ साथ अब देश में सासंदो की तादाद भी बढाने की जरुरत है । लेकिन जिन हालातो में दुनिया के सबसे बडे लोकतांत्रिक देश की लूट में लोकतंत्र के प्रतिक बने नुमाइंदे ही शामिल है उसमें तो लूट की भागीदारी ही बढेगी । यानी चोरो और अपराधियो की टोली ज्यादा बडी हो जायेगी । मसलन अभी 545 सासंदो मेंसे 182 ऐसे दागी है जो भ्रष्ट्रचार और कानून को ताक पर रख अपना हित साधने के आरोपी है । तो फिर जनता के लिये कितना मायने रखता है लोकतंत्र का मंदिर । और लोकतंत्र के मंदिर के सबसे बडे मंहत की आवाज भी जब उनके अपने ही पंडे दरकिनार कर दे तो क्या माना जाये । मसलन , देश के प्रधानसेवक लालकिले के प्रचीर से आहवान करते है कि एक गांव हर सासंद को गोद ले ले । क्योकि उसे हर बरस पांच करोड रुपये मिलते है तो भारत में औसतन एक गांव का सालाना बजट विकास के लिये सिर्फ 10 लाख का होता है तो कम से कम वह तो विकास की पटरी पर दौडने लगे । पहले बरस होड लग जाती है । लोकसभा-राज्यसभा के 796 सांसदो में से 703 गांव गोद भी ले लेते है । अगले बरस ये घटकर 461 परआता है । 2017 में ये घटकर 150 पर पहुंच जाता है और 2018 में ये सौ के भी नीचे आ जाता है । लेकिन सवाल सिर्फ ये नहीं ह कि गांव तक गोद लेने मेंसांसदो की रुची नहीं रही । सवाल तो ये है कि 2015 में ही जिन 703 गांव को गोद लिया गया उसके 80 फिसदी गांव की हालत यानी करीब 550 गांव की हालात गोद लेने के बाद और ही जर्जर हो गई । ये सोच है पर देश के सामने तो लूट तले चलती गवर्नेस  का सवाल ज्यादा बडा है । और इसके लिये रिजर्व बैक के आंकडे देखने समझने के लिये काफी है । जहा जनता का पैसा कर्ज के तौर पर  कोई कारपोरेट या उहोगपति बैक से लेता है । उसके बाद देश के हालात ऐसे बने है कि ना तो उघोग पनप सके । ना ही कोई धंधा या कोई प्रजोक्ट उडान भर सके । लेकिन इकनामी का रास्ता लूट का है तो फिर बैकिंग सिस्टम को ही लूट में कैसे तब्दिल किया जा सकता है ये भी आंकडो से देखना कम रोचक नहीं है । मसलन 2014-15 में कर्ज वसूली सिर्फ 4561 करोड की हुई और कर्ज माफी 49,018 करोड की हो गई । 2015-16 में 8,096 करोड रुपय कर्ज की वसूल की गई तो 57,585 करोड रुपये की कर्ज माफी हो गई । इसी तरह 2016-17 में कर्ज वसूली सिर्फ 8,680 करोड रुपये की हुई तो 81,683 करोड की कर्ज माफी कर दी गई । और 2017-18 में बैको ने 7106 करोड रुपये की कर्ज वसूली की तो 84,272 करोड रुपये कर्ज माफी हो गये । यानी एक तरफ अगर किसानो की कर्ज माफी को परखे तो सत्ता के पसीने छूट जाते है कर्ज माफी करने में । लेकिन दूसरी तरफ 2014 से 2018 के बीच बिना हंगामे क 2,72,558 करोड रुपये राइटिग आफ कर दिये गये । यानी बैको के दस्तावेजो से उसे हटा दिया गया जिससे बैक घाटे में ना दिखे । कमाल की लूट प्रणाली है । लेकिन लोकतंत्र का तकाजा यह है कि सत्ता ही संविधान है तो फिर गणतंत्र दिवस भी सत्ता के लिये । इसीलिये लोकतंत्र की पहरीदारी करने वाले सेवक, स्वयसेवक, प्रधानसेवक सभी खुश है कि रायसीना हिल्स की तमाम इमारते रौशनी में नहायी हुई है । तो लोकतंत्र इमारतो में बसता है और उसकी पहचान अब उसका काम या संविधान की रक्षा नहीं बल्कि एलईडी की चमक है ।