Sunday, October 19, 2014

मोदी के लिये पवार हथियार भी और ढाल भी

पवार का खुला समर्थन बीजेपी को सरकार बनाने के लिये गया क्यों। क्या बीजेपी भी शिवसेना से पल्ला झाड कर हिन्दुत्व टैग से बाहर निकलना चाहती है। या फिर महाराष्ट्र की सियासत में बालासाहेब ठाकरे के वोट बैंक को अब बीजेपी हड़पना चाहती है, जिससे उसे भविष्य में गठबंधन की जरुरत ना पड़े। या फिर एनडीए के दायरे में पवार को लाने से नरेन्द्र मोदी अजेय हो सकते है। और महाराष्ट्र जनादेश के बाद के समीकरण ने जतला दिया है कि भविष्य में पवार और मोदी निकट आयेंगे। यह सारे सवाल मुंब्ई से लेकर दिल्ली तक के राजनीतिक गलियारे को बेचैन किये हुये हैं। क्योंकि कांग्रेस से पल्ला झाड़ कर शरद पवार अब जिस राजनीति को साधने निकले है उसमें शिवसेना तो उलझ सकती है लेकिन क्या बीजेपी भी फंसेगी यह सबसे बड़ा सवाल बनता जा रहा है। हालांकि आरएसएस कोई सलाह तो नहीं दे रही है लेकिन उसके संकेत गठबंधन तोड़ने के खिलाफ है। यानी शिवसेना से दूरी रखी जा सकती है लेकिन शिवसेना को खारिज नहीं किया जा सकता। संयोग से इन्ही सवालो ने बीजेपी के भीतर मुख्यमंत्री को लेकर उलझन बढ़ा दी है। पंकजा मुंडे शिवसेना की चहेती है। देवेन्द्र फडनवीस एनसीपी की सियासत के खिलाफ भी है और एनसीपी के भ्रष्टाचार की हर अनकही कहानी को विधानसभा से लेकर चुनाव प्रचार में उठाकर नायक भी बने रहे है। इस कतार में विनोड तावडे हो या मुगंटीवार या खडसे कोई भी महाराष्ट्र की कारपोरेट सियासत को साध पाने में सक्षम नहीं है। ऐसे में एक नाम नितिन गडकरी का निकलता है जिनके रिश्ते शरद पवार से खासे करीबी है। लेकिन महाराष्ट्र के सीएम की कुर्सी पर नरेन्द्र मोदी बैठे यह मोदी और अमितशाह क्यो चाहेंगे यह अपने आप में सवाल है। क्योंकि
गडकरी सीएम बनते है तो उनकी राजनीति का विस्तार होगा और दिल्ली की सियासत ऐसा चाहेगी नहीं। लेकिन दिलचस्प यह है कि शरद पवार ने बीजेपी को खुला ऑफर देकर तीन सवाल खड़े कर दिये हैं। पहला शिवसेना नरम हो जाये। दूसरा सत्ता में आने के बाद बीजेपी बदला लेने के हालात पैदा ना करे। यानी एनसीपी पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपो को बीजेपी रेड कारपेट तले दबा दे। और तीसरा भविष्य में बीजेपी के खिलाफ तमाम मोदी विरोधी नेता एकजुट ना हो । यानी पवार के गठबंधन को बांधने की ताकत को नरेन्द्र मोदी बीजेपी के भविष्य के लिये भी मान्यता दे दे।

जाहिर है पवार के कदम का पहला असर शिवसेना पर पड़ने भी लगा है। शिवसेना के मुखपत्र सामना के संपादकीय बोर्ड में बदलाव के संकेत भी आने लगे। सामना की भाषा ने प्रधानमंत्री को सीधे निशाने पहले सामना पर लिखे हर शब्द से पल्ला झाड़ा अब संजय राउत की जगह सुभाष देसाई और लीलाधर ढोके को संपादकीय की अगुवाई करने के संकेत भी दे दिये। पवार के कदम का दूसरा असर देवेन्द्र फडनवीस पर भी मुंबई पहुंचते ही पड़ा। शाम होते होते देवेन्द्र जिस तेवर से एनसीपी का विरोध करते रहे उसमें नरमी आ गयी। और पवार के कदम का तीसरा असर बीजेपी के विस्तार के लिये एकला चलो के नारे को पीछे कर गठबंधन को विस्तार का आधार बनाने पर संसदीय बोर्ड में भी चर्चा होने लगी । यानी बीजेपी के नफे के लिये तमाम विपक्षी राजनीति को भी अपने अनुकूल कैसे बनाया जा सकता है यह नयी समझ भी विकसित हुई। यानी गठबंधन की जरुरत कैसे सत्ता के लिये विरोधी दलो की है यह मैसेज जाना चाहिये। यानी जो स्थिति कभी काग्रेस की थी उस जगह पर बीजेपी आ चुकी है। और क्षत्रपों की राजनीति मुद्दों के आधार पर नहीं बल्कि बीजेपी विरोध पर टिक गयी है। यानी "सबका साथ सबका विकास " का नारा राजनीतिक तौर पर कैसे बीजेपी को पूरे देश में विस्तार दे सकता है, इसके लिये महाराष्ट्र के समीकरण को ही साधकर सफलता भी पायी जा सकती है। यानी बिहार में तमाम राजनीति दलो की एकजुटता या फिर यूपी में मायावती के चुनाव ना लड़ने से मुलायम को उपचुनाव में होने वाले लाभ की राजनीति की हवा निकालने के लिये बीजेपी पहली बार महाराष्ट्र में सरकार बनाने के लिये होने वाले गठबंधन को महाप्रयोग के तौर पर आजमा चाह रही है। जिससे अगली खेप में झरखंड को भी पहले से ही साधा जा सके। और भविष्य में बिहार यूपी में विपक्ष की गठबंधन राजनीति को साधने में शरद पवार ही ढाल भी बने और हथियार भी। यानी जो पवार कभी हथेली और आस्तीन के दांव में हर किसी को फांसते रहे वही हथेली और आस्तीन को इस बार बीजेपी आजमा सकती है।

Friday, October 17, 2014

क्यों हर किसी को शह और मात देने की स्थिति में हैं मोदी ?

नरेन्द्र मोदी जिस राजनीति के जरिये सत्ता साध रहे हैं, उसमें केन्द्र की राजनीति हो या क्षत्रपों का मिजाज । दोनों के सामने ही खतरे की घंटी बजने लगी है कि उन्हे या तो पारंपरिक राजनीति छोड़नी पडेगी या फिर मुद्दों को लेकर पारपरिक समझ बदलनी होगी । लेकिन मजेदार सच यह है कि मोदी और आरएसएस एक लकीर पर कितनी दूर कैसे चले और दोनों में से कौन किसे कब बांधेगा यह देखना समझना दिलचस्प हो चला है। आरएसएसएस की ताकत है परिवार। और परिवार की ताकत है बीजेपी की सत्ता। आरएसएस के परिवार में बीजेपी भी है और किसान संघ से लेकर भारतीय मजदूर संघ समेत 40 संगठन। तो चालीस संगठनों को
हमेशा लगता रहा है कि जब स्वयंसेवक दिल्ली की कुर्सी पर बैठेगा तो उनके अनुकूल वातावरण बनेगा और उनका विस्तार होगा। लेकिन सत्ता को हमेशा लगता है कि सामाजिक शुद्दिकरण के लिये तो परिवार की सोच ठीक है लेकिन जब सियासत साधनी होगी तो परिवार को ही सत्ता के लिये काम करना चाहिये यानी उसे बदल जाना चाहिये। इस उहोपोह में एकबार सत्ता और संघ की कश्मकश उसी इतिहास को दोहरा रही है जैसे कभी अटल बिहारी वाजपेयी के दौर में हुआ था। प्रधानमंत्री मोदी ने सोच समझ कर दीन दयाल उपाध्याय के दिन को मजदूरों से जोडकर श्रमेव जयते का नारा दिया । और इस नारे को ही मजदूरों के बीच काम करने वाले संघ परिवार संगठन भारतीय मजदूर संघ ने खारिज कर दिया। बीएमएस के महासचिव ब्रजेश उपाध्याय की माने तो मजदूरो को लेकर प्रधानमंत्री ने मजदूर संगठनों से कोई बात की ही नहीं यहा तक की बीएमएस से भी नहीं तो फिर मजदूरों को लेकर समूचा रास्ता ही औघोगिक घरानों के हित साधने के लिये मोदी सरकार बना रही है।

अगर संघ परिवार के मजदूर संघठन के तेवर देखें तो ब्रजेश उपाध्याय बिलकुल उसी तर्ज पर सरकार की मजदूर नीतियों का विरोध कर रहे है जैसे 2001 में हंसमुखभाई दवे ने वाजपेयी सरकार के एफडीआई को लेकर किया था। या फिर वाजपेयी सरकार के वित्त मंत्री यशंवत सिन्हा का विरोध स्वदेशी जागरण मंच संभाले दत्तापंत ठेंगडी ने 2001-02 के दौरान इस हद तक खुलकर किया था कि तब सरकार को वित्त मंत्री बदलना पड़ गया था । लेकिन तब के स्वयंसेवक वाजपेयी के पीएम होने और अब के पीएम मोदी के होने का फर्क भी आरएसएस समझ रहा है। इसलिये बीएमएस का मजदूर नीतियों को लेकर विरोध या किसानों को लेकर सरकार की खामोश निगाहो से परेशान किसान संघ की खामोशी कोई गुल खिला सकती है यह सोचना भी फिलहाल चमकते हुये सूरज को विरोध का दीया दिखाने के ही समान होगा। क्योंकि जिस आरएसएस को लोग भूल रहे थे नरेन्द्र मोदी की पीएम बनने के बाद उसी आरएसएस को लेकर गजब का जुनुन देश में शुरु हुआ है। आलम यह हो चला है कि तीन साल पहले जहा आरएसएस की साइट पर सिर्फ दो से तीन हजार लोग ही दस्तक देते थे, वह आज की तारिख में हर महींने आठ हजार तक पहुंच गई है । असल में संघ से प्रेम की यह रफ्तार अयोध्या आंदोलन के दौर में भी नहीं थी। और यह भी कम दिलचस्प नहीं है कि जिस दौर में
अयोध्या आंदोलन समूचे देश की राजनीति को प्रभावित कर रहा था, उस वक्त आरएसएस का सदस्य बनने के बदले विश्व हिन्दू परिषद का सदस्य बनने की होड़ देश में लगी थी। और 1990-92 के दौरान ही दो लाख लोगों ने विहिप का दरवाजा खटखटाया था। इसी तरह 1996 से 1999 तक के दौरान बीजेपी को लेकर आम लोगों में गजब का जुनुन था और आरएसएस से ज्यादा बीजेपी के सदस्य बनने की होड़ देशभर में शुरु हुई थी। उस वक्त बीजेपी ने सदस्य बनाने की मुहिम भी शुरु की थी। तमाम राजनीतिक दल से अलग दिखने की सोच तब बीजेपी में थी लेकिन जब स्वयंसेवक प्रचारक वाजपेयी पीएम बने तो अलग दिखने की सोच सबसे पहले आरएसएस की ही ढही। लेकिन मौजूदा मोदी सरकार को लेकर आरएसएस की उड़ान सपनों के भारत को संजोने और बनाने की है। और पहली बार आरएसएस के भीतर के छुपे हुये राजनीतिक गुण को ही 2014 के लोकसभा चुनाव में उडान मिली है तो वह अब खुल कर राजनीतिक बिसात बिछाने से भी नहीं कतरा रहा है और यह संकेत देने भी देने लगा है कि बीजेपी की सत्ता के पीछे असल ताकत संघ परिवार की है।

इसलिये पहली बार आरएसएस का कार्यकारी मंडल लखनऊ में बैठकर यूपी की सियासी बिसात को समझना भी चाहता है और किस रास्ते हिन्दू वोटरों में अलख जगाना है और वीएचपी सरीखे संगठन के जरीये विराट हिन्दुत्व का समागम राजनीतिक तौर पर कैसी बिसात बिछा सकता है इसे भी टटोल रहा है। यानी पहली बार सामाजिक सांस्कृतिक संगठन आरएसएस खुद की सक्रियता चुनाव में वोटरों की तादाद को बढाने से लेकर हिन्दुत्व सक्रियता को राजनीतिक पटल पर रखने में जुटा है वही चौबिस घंटे तीनसौ पैसठ दिन राजनीति करने वाले तमाम राजनीतिक दल अभी भी चुनावी जीत हार को उसी खाके में रख रहे है जहां जीत हार सिर्फ संयोग है । और तमाम दल मान यही रहे हैं कि हर बार तो कोई जीत नहीं सकता है तो कभी काग्रेस जीती कभी बीजेपी कभी क्षत्रपों का राज आ गया। यानी राजनीति बदल रही है और पारंपरिक राजनीति छोडनी होगी, इसे राजनीतिक दल मान नहीं रहे हैं तो कोई दल या कोई नेता नरेन्द्र मोदी को चुनौती देने के हालात में भी नहीं आ पा रहा है। और बदलती राजनीति का खुला नजारा हर किसी के सामने है। क्योंकि पहली बार अपने बूते देश की सत्ता पर काबिज होने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने जिस तेवर के साथ गांव,किसान,मजदूर से लेकर कारपोरेट और औघोगिक घरानों को भी मेकइन इंडिया से जोडने की बात भी कही और राज्य के चुनाव का एलान होते ही महाराष्ट्र और हरियाणा के गली कूचों में रैली करनी शुरु की उसने अर्से बाद बदलती राजनीति के नये संकेत तो दे ही दिये। मसलन नेता सत्ता पाने के बाद सत्ता की ठसक में ना रहे बल्कि सीधे संवाद बनाना ही होगा। राष्ट्रीय नीतियों का एलान कर सरकार की उपलब्धियों का खांका ना बताये बल्कि नीतियों को आम लोगों से जोडना ही होगा और -विकास की परिभाषा को जाति या धर्म में बांटने से बचना होगा। ध्यान दें तो लोकसभा चुनाव के बाद महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव में हर बडे राजनेता या राजनीतिक दल का संकट यही हो चला है कि वोटर अपने होने का एहसास नेताओं के बात में कर नहीं पा रहा है जबकि मोदी वोटरों को जोडकर संवाद बनाने में लगातार जुटे हैं। यानी चुनावी जीत की मशीन भी कोई केन्द्र सरकार हो सकती है कोई पीएम हो सकता है, इसका एहसास पहली बार देश को हो रहा है। इससे कांग्रेस की मुश्किल है कि वह सेक्यूलर राग के आसरे अब सत्ता पा नहीं सकती है । क्षत्रपों की मुश्किल है जातीय समीकरण के आसरे वोटबैंक बना नहीं सकते हैं। राजनीतिक गठबंधन की मुश्किल है कि जीत के आंकड़ों का विस्तार सिर्फ राजनीतिक दलों के मिलने से संभव नहीं होगा । और यह तीनो आधार तभी सत्ता दिला सकते है जब देश के सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों को समझते हुये राजनीति की जाये ।

ध्यान दें तो नरेन्द्र मोदी ने बेहद बारीकी से अपने भाषणों में उस आर्थिक सुधार को ही निशाने पर लिया है, जिसने मंडल-कंमल की राजनीति को बदला। जिसने भारत को बाजार में बदल दिया । यानी बीते 20 बरस की राजनीति के बाद से भारत में हर सरकार की सियासी अंटी से सिर्फ घोटाले और भ्रष्ट्रचार ही राजनीति के बाजार में सबसे महत्वपूर्ण हो गये। और इस दौर का आक्रोष ही नरेन्द्र मोदी के चुनावी भाषणों में कुछ इस तरह से छलका जिससे लोगो में भरोसा जागा। और शायद राजनीतिक तौर तरीके यही से बदलने शुरु हो गये हैं। क्योंकि कांग्रेस ही नहीं बल्कि शरद पवार हो या चौटाला। उद्दव ठाकरे हों या फिर यूपी-बिहार के क्षत्रप । ध्यान दें तो बीते बीस तीस बरस की इनकी राजनीति में कोई अंतर आया नहीं है जबकि इस दौर में दो पीढियां वोटर के तौर पर जन्म ले चुकी हैं। और मोदी फिलहाल इसे साधने में मास्टर साबित हो रहे हैं, इससे इंकार किया नहीं जा सकता । ध्यान दें तो सत्ता संभालने के 140 दिनों के भीतर बतौर पीएम ऐलानो की झडी जिस अंदाज में कालाधन, गंगा सफाई,जजों की नियुक्ती,जनधन योजना, -ई गवर्नेस-, स्कील इंडिया, डिजिटल इंडिया, -मेक इन इंडिया,आद्रर्श गांव .स्वच्छ भारत और श्रमेवजयते की लगायी उससे मैसेज यही गया कि कमोवेश हर तबके के लिये कुछ ना कुछ । हर क्षेत्र को छूने की कवायद। बिगडे हुये सिस्टम को संवारने की सोच और सियासत साधने के तरीके। यानी मोदी ने हर नारे के आसरे पीछली सरकारों के कुछ ना करने पर अंगुली उठाकर अपने तरफ उठने वाली हर अंगुली को रोका भी। सवाल यह उठ रहे हैं कि नारों की जमीन क्या वाकई पुख्ता है या फिर पहली बार प्रधानमंत्री खुद ही विपक्ष की भूमिका निभाते हुये हर तबके की मुश्किलों
को उभार रहे है और कुछ करने के संकेत दे रहे हैं।

ध्यान दें तो कांग्रेस अभी भी खुद को विपक्ष मानने के हालात में नही आया है । हो सकता है इतिहास में सबसे निचले पायदान पर पहुंची कांग्रेस अभी भी सदमें में हो या फिर इस खुशफहमी में हो कि उनकी नीतियों का नाम बदल कर नरेन्द्र मोदी दिलों को जीतना चाह रहे हैं। लेकिन समझना यह भी होगा कि प्रधनामंत्री मोदी बिना किसी बैग-बैगेज के पीएम बने है तो वह हर दबाब से मुक्त है इसलिये एलान करते वक्त नरेन्द्र
मोदी नायक भी है और एलान पूरे कैसे कब होंगे इसके लिये कोई ब्लू प्रिंट ना होने के कारण खलनायक भी है । लेकिन शरद पवार, उद्दव ठाकरे या चौटाला सरीखे नेता अगर मोदी को खलनायक कहेगें तो वोटरों के लिये तो मोदी नायक खुद ब खुद हो जायेगें क्योंकि मौजूदा वक्त में विपक्ष किसी भूमिका में है ही नहीं। शायद इसीलिये जब मजदूरो के लिये श्रममेव जयते का जिक्र पीएम मोदी करते है तो यह हर किसी को अनूठा भी लगाता है लेकिन मौलिक सवाल और कोई नहीं आरएसएस की शाखा बीएमएस यह कहकर उठाती है कि मजदूरों की मौजूदगी के बगैर श्रममेव जयते का मतलब क्या है । असल खेल यही है कि संघ परिवार ही मोदी की उस सियासत को साधेगा जिस सियासत में होने वाले हर एलान की जमीन पोपली है । और संघ चाहता है कि मोदी पोपली जमीन को भी पुख्ता करते चले। यानी पहली बार देश के बदले हुये राजनीति हालात के सामने कैसे हर राजनीति दल सरेंडर कर चुका है और जिस संघ ने मोदी को विजयी घोड़े पर बैठाया वहीं विरोध भी कर रहा है । तो संकेत साफ है पहली बार मोदी को राजनीतिक चुनौती देने वाला या चुनौती देते हुये दिखायी देने वाला भी कोई नहीं है इसलिये अब मोदी वर्सेस आल की थ्योरी तले गठबंधन के आसरे चुनावी जीत की बिसात को ही हर राज्य , हर राजनीति दल देख रहा है। और यही मोदी की जीत है।

Monday, October 13, 2014

प्यादे से वजीर बनने की लडाई

3 जनवरी 1969 को पहली बार नागपुर में बालासाहेब ठाकरे की मुलाकात तत्कालीन सरसंघचालक गुरु गोलवरकर और सरकार्यवाहक देवरस से हुई थी । उस वक्त बालासाहेब ठाकरे बंबई से गये तो थे नागपुर विघापीठ में विघार्थी संघ के सम्मेलन में भाषण देने । लेकिन सीपीएम की धमकी की ठाकरे नागपुर से जिन्दा वापस लौट नहीं पायेगें के बाद ही संघ हरकत में आया और नागपुर के महाल के टाउन हाउन में एक हजार स्वयंसेवक ठाकरे की सुरक्षा के लिये दर्शक बनकर बैठ गये । उस वक्त ठाकरे के साथ प्रमोद नवलकर, सुधीर जोशी और मनमोहर जोशी समेत 12 शिवसैनिक ठाकरे के बाडीगार्ड बन कर गये थे। और 45 बरस पहले टाउन हाल में दिये भाषण में ठाकरे ने जिस अंदाज में मराठी मानुष से लेकर हिन्दुराष्ट्रवाद का जिक्र किया उसके बाद से आरएसएस को कभी लगा ही नहीं बालासाहेब ठाकरे संघ के स्वयंसेवक नहीं है । वजह भी यही है कि महाराष्ट्र की सियासत का यह रंग बीते 45 बरस में इतना गाढ़ा हो चला कभी किसी ने सोचा ही नहीं कि दोस्ती के लिये लहराता भगवा परचम कभी दुश्मनी के दौर में भी लहरायेग । दरअसल महाराष्ट्र की राजनीति में दोस्ती-दुश्मनी के बीच लहराता भगवा परचम ही सत्ता के सारे समीकरण तय भी कर रहा है और बिगाड़ भी रहा है । बीजेपी अपने बूते महाराष्ट्र की सत्ता साध लें या फिर चुनाव के बाद शिवसेना और बीजेपी मिलकर सरकार बनाये यह सवाल आज भी संघ परिवार के भीतर लाख टके का सवाल है कि जबाब होगा क्या । क्योंकि महाराष्ट्र में स्वयंसेवक अगर बीजेपी के लिये सक्रिय होता है तो फिर संघ की शाखायें भी शिवसेना के निशाने पर आ सकती है , इसलिये स्वंयेसवक महाराषट्र में हिन्दू वोटरों को वोट देने के लिये निकालने को लेकर सक्रिय है। सीधे बीजेपी को वोट देने का जिक्र करने से बच रहे है ।  यानी महाराष्ट्र चुनाव मोदी-अमित शाह की जोडी के लिये ऐसा एसिड टेस्ट है जिसमें शिवसेना को लेकर संघ के हिन्दुत्व की साख दांव पर आ लगी है । और इस महीन राजनीति को उद्दव ठाकरे भी समझ रहे है और नरेन्द्र मोदी भी । इसीलिये उद्दव ठाकरे हिन्दुत्व का राग अलाप रहे है तो मोदी विकास का नारा लगा रहे हैं।

शिवसेना-बीजेपी किसी एक मुद्दे पर तलवार निकालने को तैयार है तो वह शिवाजी की विरासत है। और यह संघर्ष महाराष्ट्र की सियासत में कोई नया गुल खिला सकता है इससे इंकार  भी नहीं किया जा सकता । क्योंकि नरेन्द्र मोदी का मिजाज उन्हे अफजल खान ठहराने वाले को चुनाव के बाद की मजबूरी में भी साथ लेने पर राजी होगा , इसका जबाब बेहद मुश्किल है । यह हालात संघ परिवार के भीतर एक लकीर खिंच रहे है । आरएसएस के भीतर यह कश्मकश कही तेज है कि पार्टी, संगठन और विचार सबकुछ राजनीतिक जीत-हार के सही गलत नहीं देखे जाने चाहिये। लेकिन बीजेपी मोदी की अगुवाई में जिस रास्ते निकल पड़ी है उसमें संघ के सामने कोई विक्लप भी नहीं है और मोदी के सामने कोई चुनौती भी नहीं है ।  इसीलिय इस लकीर का सबसे ज्यादा मुनाफा किसी को है तो वह एनसीपी है।

एनसीपी के जो सरदार बीते पन्द्रह बरस की सत्ता में खलनायक हो चले थे वह झटके में अपनी पूंजी के आसरे नायक हो चले है । असल में शरद पवार की पार्टी हर जिले के सबसे ताकतवर नेताओ के आसरे ही चलती रही है । यानी संगठन या कार्यकर्ता की थ्योरी पवार की बिसात पर चलती नहीं है । रईस नेताओं के आसरे कार्यकर्ता खडा हो सकता है लेकिन कार्यकर्ताओ के आसरे नेता खड़ा नहीं होता । तो घोटालों की वह लंबी फेरहिस्त जिसका जिक्र बीजेपी हर दिन मोदी की तस्वीर के साथ दैनिक अखबारो में पन्ने भर के विज्ञापन के जरीये छाप रही है वह बेअसर हो चली है क्योकि काग्रेस एनसीपी की जाती हुई सत्ता पर किसी की नजर नहीं है , कोई बहस करने को तैयार नहीं है । वोटरों की नजर बीजेपी-शिवसेना के उस संघर्ष समीकरण पर आ टिकी है, जहां सत्ता दोनों में से किसके पास कैसे आयेगी यही मुद्दा सबसे महत्वपूर्ण हो चला है । यानी 70 हजार करोड़ का सिचाई घोटाला हो या आदर्श घोटाले की हवा में उड़ी कांग्रेसी सीएम अशोक चव्हाण की कुर्सी । कोई मायने नहीं रख रहे । महत्वपूर्ण बीजेपी शिवसेना के मुद्दे हो चले है । और चुनावी समीकरण का असल खेल यही से बन बिगड रहा है। मुंबई जैसी जगह पर भी गुजराती और मराठी मानुष टकरा जाये यह शिवसेना की जरुरत है और मराठी मानुष रोजगार और विकास को लेकर गुजरातियों के साथ चलने को तैयार हो जाये यह बीजेपी की जरुरत है । उद्दव ठाकरे इस सच को समझ रहे है कि बीजेपी दिल्ली की होकर नहीं रह सकती क्योंकि नरेन्द्र मोदी का पहला प्रेम गुजरात हो या ना हो लेकिन मुंबई और पश्चमी महाराष्ट्र में बसे गुजराती अब शिवसेना की ठाकरेगिरी पर नहीं चलेंगे। क्योंकि उन्हे दिल्ली की सत्ता पर बैठे गुजराती मोदी दिखायी दे रहे है।

लेकिन मोदी का संकट दोहरा है एक तरफ वह महाराष्ट्र को बंटने ना देने की राजनीतिक कसम खा रहे हैं। लेकिन अलग विदर्भ के बीजेपी के नारे को छुपाना भी नहीं चाह रहे है । यानी वोटो का जो समीकरण बीजेपी के लिये विदर्भ को अलग राज्य बनाने के नारे लगाने से मिल सकता है वह खामोश रहने पर झटका भी दे सकता है । और नारा लगाने पर मुबंई से लेकर पश्चिमी महाराष्ट्र और मराठवाडा तक में मोदी हवा को पंचर भी कर सकता है । दरअसल लोकसभा चुनाव में मोदी हवा में विदर्भ के 62 सीटों में से बीजेपी-शिवसेना 59 सीटों पर आगे रही तो विदानसभा चुनाव में बीजेपी अपने बूते 45 सीट जीतने का ख्वाब संजोये हुये है और उसकी सबसे बडी बजह विदर्भ राज्य को बनवाने के वादा पूरा करने का है । लेकिन यह आवाज तेज होती है तो कोकंण और मराठवाडा की क्षेत्रीय ताकते यानी मराठा से लेकर कुनबी और ओबीसी की धारा बीजेपी से खिसक सकती है जो उसने बाला साहेब ठाकरे के साथ मिलकर प्रमोद महाजन और गोपीनाथ मुंडे के भरोसे बनाया । मोदी और अमित शाह इसीलिये चैक एंड बैलेंस का खेल खेल रहे है । मोदी नागपुर से चुनाव लड़ रहे देवेन्द्र फडनवीस की खुली तारीफ कर रहे हैं और अमित शाह पंकजा मुंडे का नाम ले रहे हैं। फडनवींस विदर्भ का राग अलाप रहे है और पंकजा महाजन-मुंडे की जोड़ी को याद कर मराठवाडा में बीजेपी की सोशल इंजीनियरिंग बरकरार रखने की जद्दोजहद कर रही हैं। वही शिवसेना भी सोशल इंजिनियरिंग के सच को समझ रही है तो भाषणों में महाजन-मुंडे के साथ रिस्तो की अनकही कहानी का प्रलाप उद्दव ठाकरे तक कर रहे हैं। क्योंकि निगाहों में मराठा, कुनबी और ओबीसी वोट बैंक हैं। इसके लिये मुंडे की तस्वीर तक को शिवसेना के नेता मंच पर लगाने से नहीं चूक रहे। और यह बताने से भी नहीं चुक रहे कि शिवसेना उस बीजेपी से नही लड़ रही जो बालासाहेब के दौर में साथ खडी थी बल्कि शिवसेना बीजेपी के उस ब्रांड एंबेसडर से लड़ रही है जिसने बीजेपी में रिश्ते निभाने वालों को भी सरेराह छोड़ दिया। यानी सत्ता की लडाई में साख पर सियासत कैसे हावी है यह भी कम दिलचस्प नहीं। नरेन्द्र मोदी जिस एनसीपी काग्रेस सरकार के १५ बरस के शासन को घोटालों और लूट के तराजू में रखकर पलटने का नारा लगातार रहे है, उस बीजेपी में ३७ उम्मीदवार काग्रेस-एनसीपी से ही निकल कर बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड रहे है । इसके अलावे १४ उम्मीदवार दूसरे राजनीतिक दलो से बीजेपी में घुसे है । वही शिवसेना को जिस बीजेपी से दो दो हाथ करने है, उसके टिकट पर बीजेपी के साथ रहे २७ नेता चुनाव लड़ रहे हैं। यहां तक की देवेन्द्र फडनवीस के करीबी मित्र और बीजेपी के कार्यकत्ता तोतवानी शिवसेना की टिकट पर देवेन्द्र फडनवीस के खिलाफ ही चुनाव लड़ रहे हैं। मुकाबला चौकोणीय है तो फिर तोतवामी का सिंधी होना विधानसत्रा क्षेत्र में १२ हजार सिंधी वोट के जरीये क्या गुल खिला सकता है और संघर्ष का पैमाना इस दौर में कहां आ पहुंचा है उसकी एक तासीर भर है यह समीकरण। सच तो यह है कि बीजेपी पर निर्भर शिवसेना ने ८९ विधानसभा क्षेत्र में कभी अपने संगठन की तरफ ध्यान दिया ही नहीं और शिवसेना पर निर्भर बीजेपी ने ६३ सीट पर कभी अपने कैडर को दाना-पानी तक नहीं पूछा। यानी इन सीटों पर कौन कैसे चुनावी संघर्ष करे यह पहली मुश्किल है तो दूसरी मुश्किल उम्मीदवारों के नाम के आगे से पार्टियों के नाम का मिटना है। महाराष्ट्र की ४७ सीट ऐसी हैं, जहां बीजेपी और कांग्रेस का भेद मुश्किल है । इसके अलावा ४१ सीट ऐसी हैं जहां शिवसेना
और एनसीपी के बीच भेद करना मुश्किल है । यानी राज्य की २८८ में से ८८ सीट नो मेन्स लैंड की तर्ज पर हर दल के लिये खुली है । इतना ही नहीं बीजेपी जिन ५९ सीटों का जिक्र बार बार शिवसेना से यह कहकर मांग रही थी कि वह कभी जीती नहीं तो उस पर तो उन पर शिवसेना ने किसी बाहरी को टिकट दिया नहीं और बीजेपी ने इन्ही ५९ सीट पर ११ एनसीपी के तो ९ कांग्रेस छोड़कर आये नेताओं को टिकट दे दिया । वहीं दूसरी तरफ गठबंधन के दौर में जिन २७ सीटो पर बीजेपी कभी जीती नहीं उसपर शिवसेना ने बीजेपी छोड शिवसेना के साथ आये ९ नेता को टिकट दे दिया । ध्यान दें तो बीते १५ बरस में कौन सा दल किससे अलग है यह सवाल ही गायब हो गया । उस्मानाबाद नगरपालिका में काग्रेस धुर विरोधी शिवसेना -बीजेपी के साथ मिल गयी। नासिक में राजठाकरे से शरद पवार ने हाथ मिला लिया । बेलगाम में काग्रेस बीजेपी एकसाथ हो गये । पुणे महाराष्ट्र यवतमाल में शिवसेना-बीजेपी के साथ एनसीपी खडी हो गयी । नागपुर महानगरपालितका में बीजेपी के साथ मुस्लिम लीग के दो पार्षद आ गये । जाहिर है ऐसे में लूट की हर कहानी में राजनीतिक बंदरबाट भी हर किसी ने देखा । को-ओपरेटिव हो या भूमि अधिग्रहण । मिहान प्रोजेक्ट हो या सिचाई परियोजना । लूट की हिस्सेदारी कही ना कही हर राजनीतिक दल के दामन पर दाग लगा ही गयी ।

असर इसी का हो चला है कि पहली बार वोटरों के सामने से हर मुद्दा गायब है। शरद पवार के सांप्रदायिकता के कटघरे में बीजेपी है शिवसेना नहीं है । शिवसेना के घोटालो के कटघरे में कांग्रेस है एनसीपी पर खामोशी है। लेकिन खलनायक मोदी है । बीजेपी के कटघरे में शरद पवार यानी एनसीपी है ,शिवसेना पर खामोशी है। गांधी नेहरु के प्रति प्रेम जताकर कांग्रेस के वोट बैंक को आकर्षित करने में मोदी लगातार लगे हैं। कांग्रेस के कटघरे में सिर्फ मोदी हैं, शिवसेना और बीजेपी भी पाक साफ हो चली है। तो बहुमत के जादुई आंकड़े को पाने के सस्पेंस पर टिके चुनाव का असल सच यह है कि कांग्रेस न जीत पाने की उम्मीद में लड़ रही है। एनसीपी सियासी सौदेबाजी में प्यादा से वजीर बनने के लिये लड रही है । शिवसेना किंग बनने के लिये लड़ रही है। और बीजेपी जीतती हुई लग रही है क्योंकि उसे विश्वास है कि उसके सिकंदर यानी मोदी का जादू सर चढ कर अब भी बोल रहा है तो वह जीत का नया इतिहास बनाने के लिये लड़ रही है।

Tuesday, October 7, 2014

चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले

दिन में पहरा । रात में ताले । हाथों में पहचान पत्र । मौत का खौफ । झेलम का प्रेम । डल लेक की रुहानी हवा । डाउन-टाउन की निगाहों का शक । जेनाकदम और सफा कदम पुल की दास्तां । सेना की छाया । कब्रगाह की धूप । घाटी में "हैदर" पहले भी था और आज भी है। पहले भी जिन्दगी के साथ खड़ा होने का
सुकून कश्मीरी पाले हुये था और आज भी जिन्दगी की गर्म हवा की आगोश में सबकुछ लुटाने को कश्मीरी तैयार है । यह आजादी का नारा नहीं बल्कि कश्मीर का ऐसा सच है जो नब्बे के दशक में खुले आसमान तले गूंजा करता था । अब दिलों में जख्म भर रिसता रहता है। दरअसल फिल्म " हैदर " झटके में उस एहसास को जगा देती है, जहां हालात कितने बदले है या फिर घाटी को देखने का नजरिया कितना बदला है या धाटी से संवाद भी सिनेमायी पर्दे के जरीये ही हो पा रहा है। क्योंकि कश्मीर को जीतने का ख्वाब धारा 370 तले लाया जा चुका है। कश्मीरी पंडितों के लिये घाटी में जमीन की तालाश दिल्ली का सुकुन बन चुकी है। इस्लामाबद कश्मीर के जरीये अपनी सियासत संभालने का ख्वाब पालना चाहता है।

पहली बार दुनिया के सियासी रंगमंच पर जनमत संग्रह का सवाल उठाकर पाकिस्तान अपने सियासी जख्मो पर मलहम लगाना चाहता है। और इन सब के बीच " हैदर " उस संवाद को जीवित करने की कोशिश करती है, जिसे दिल्ली की सियासी हवा में हर कोई भूल चुका था । तो क्या " हैदर " अबूझ पहेली बनकर ऐसे वक्त सामने आयी है जब झेलम के दर्द में डूबे कश्मीर से एक नये कश्मीर के निकलने का सपना हर कोई देख रहा था। हो सकता है । क्योंकि फैज का लाजिम है कि हम देखेगें...का सपना गुनगुनाने का अब क्या मायने है । क्या मायने है उस गजल को बार बार गुनगुनाना जिसके बोल कहे, चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले...असल में " हैदर " उस जख्म को हरा कर देती जिस जख्म को झेलम का पानी भी डुबो नहीं पाया । पानी उतर रहा है तो कब्रगाहों के पत्थर सतह पर आने लगे हैं। जो बर्फबारी में वादिया हसीन दिखायी देने लगती है उसका रंग कितना लाल है इस जख्म को भी " हैदर " कश्मीरी कैनवास पर विशाल भारद्वाज की कूची से , " मैं हू कौन " के नाम के साथ उभार देती है। लेकिन कश्मीर का दर्द उसके अपने " हैदर " में कैसे समाया हुआ है, इसे पहली बार सिल्वर स्क्रीन पर दिखाने का साहस किया गया। हर जख्म के पीछे धोखा-फरेब होता है और कश्मीर इससे आजाद नहीं है । कौन किसका गुनाह सामने ला रहा है या गुनाह की परिभाषा ही हर किसी के लिये कितनी अलग अलग होनी चाहिये कश्मीर इससे बिलकुल अलग नहीं है । सेना हो या सत्ता । आतंक हो या मानवता का चेहरा सभी को अगर एक ही कश्मीर में रहना हो तो फिर समाज कैसे बंटता है । रिश्तों में कैसे दरार आती है । सही कौन और गलत कौन ।

यह सारे सवाल ही जबाब बनकर उन जख्मों को दबा देते है जिन्हे कुरेदने वाला " हैदर " हो जाता है । यह सब " हैदर " के सिनेमायी पर्दे का अनकहा सच है । हिजबुल मुजाहिदिन में शामिल होकर बंदूक थामी जाये । या सेना के लिये मुखबरी करके इमानदार कश्मीर का रास्ता बनाया जाये । सत्ता पा कर न्याय करने का सपना

दिखाया जाये या चुनावी सत्ता को ढेगां दिखाकर सडक पर संघर्ष करते हुये खून बहाया जाये । घाटी का सच यही है कि कौन सही है कौन गलत इसके लिये सैकड़ों " हैदर " चाहिये । क्योंकि नब्बे के दशक का हैदर अब डाक्टर हिलाल मीर [ फिल्म में हैदर की भूमिका निभाने वाले नरेन्द्र झा ]की भूमिका में है । गजाला [ हैदर की मां यानी तब्बू ] अब फिदायिन बनने की हालत में नहीं है । रुहदार [ आतंकवादी बने इरफान खान ] को दिल्ली सीमापार पहुंचा चुकी है। या फिर वाकई घाटी में रुह बनकर खौफजदा कश्मीरियो के दर्द से हर क्षण रुबरु हो रहा है रुहदार। और खुर्रम यानी के के मेनन जिसकी नजरें ही फरेब पैदा करती है घाटी का नायाब सच है। तो फिर मौका मिले तो " हैदर " इसलिये देखिये क्योंकि आंतक और खौफ के बीच दर्द का गीत गुनगुना सकते हैं, गुलो में रंग भरे बादलो बहार चले.....चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले....।

Monday, October 6, 2014

"जिस दिन वोट पड़ेंगे, उस दिन हम उजड़ जायेंगे"

जिस दिन वोट पड़ेंगे उस दिन हम उजड़ जायेंगे। कोई नेता, कोई मंत्री, कोई अधिकारी इस गांव में झांकने तक नहीं आता। छह महीने पहले तक गांव में हर कोई आता था। छह महीने पहले चुनावी बूथ भी गांव में बना था। छह महीने पहले मिट्टी की दीवार पर लगा पंतप्रधान नरेन्द्र मोदी का पोस्टर तो अभी भी चस्पा है। लेकिन पीढ़ियों से जिस मिट्टी की गोद पर सैकड़ों परिवार पले बढे उनके पास सिर्फ १५ अक्टूबर तक का वक्त है। हमारी खेती छिन गयी। हमारा घर गया । बच्चो को लगता है घूमने जाना है तो वह अपनी कॉपी किताब तक को बांध रहे हैं। बुजुर्गो को लगता है उनकी सांस ही छिन गयी। तो जो हाथ कल तक समूचे परिवार को थाम लेते थे अब वह हाथ बेबस है । हर मां की आंखें नम है। हर पिता कांपते-लडखडाते पांव से घर के खपरैल तक को समेट रहा है। क्योंकि वोटिंग के दिन तक गांव खाली कर देना है। और जहां जाकर नये सिरे से जिन्दगी शुरु करनी है, वहां का ठिकाना बंजर जमीन पर मुआवजे की रकम से चाहरदिवारी खड़ी करनी है। वहीं नया गांव होगा। वहीं घर होगा। यह सच नागपुर से सटे भंडारा जिले के उस पाथरी गांव का है, जिसका जन्म संघर्ष के दौर में आंदोलन से हुआ और जिसकी मौत विकास की उस अविरल रेखा से होने जा रही है जो बांध परियोजना के नाम पर जमीन, जिन्दगी, गांव के गांव खत्म कर रहा है या आबाद इसकी परिभाषा कभी मुंबई-दिल्ली गढ़ नहीं पाये। पाथरी गांव की सरंपच रीना भूरे को भरोसा है सरकार बांध बनाने के लिये उजाड़ रही है तो बसायेगी भी। तो गांव में चाय की बैठकी का एकमात्र ठिहा चलाने वाले प्रभु लांजवार वोटिंग वाले दिन गांव वालों को आखिरी चाय पिलाकर जिन्दगी से ही विदा हो जाना चाहते हैं। वहीं हटवार परिवार की त्रासदी तो इनके नाम से
जुड़ी है। पीढियों से रहते आये ७२ बरस के रामदशरथ हटवार ने अपने पिता से लेकर अपने बच्चो के नाम के साथ पाथरी शब्द जोड़ दिया। खुद को वह रामदशरथ पाथरी कहते लिखते हैं। कौडू देशभुख महात्मा गांधी के साथ पग मिलाये और विनोबा भावे के साथ मध्यभारत की धूल भूदान आंदोलन के लिये फांकी । लेकिन अब हर रास्ता बंद है क्योंकि इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के सपने को पूरा करने के लिये गोसीखुर्द बांध परियोजना पांच जिलों की सियासत का ऐसा स्रोत बन चुका है जहां गांव के गांव उजड़ने का मतलब है करोडों के वारे न्यारे। इसलिये पाथरी गांव ही नहीं बल्कि गोसीखुर्द परियोजना के दायरे में आने वाले २३८ गांव आखिरी सांस ले रहे हैं। और इनकी बुझती सांस की एवज में जो सपना पाला गया है, वह भंडारा, नागपुर, चन्द्रपुर की ढाई लाख हेक्टेयर जमीन को सिचाई की व्यवस्था करना है।

लेकिन नेता और सरकारों के विकास के नारों के बीच गोसीखुर्द बांध और पाथरी गांव एक ऐसी मिसाल है जो
लूट और मौत का खेल खेलती है। लूट इसलिये क्योंकि १९८३ में इंदिरा गांधी ने गोसीखुर्द का सपना ३७२ करोड़ रुपये में देखा था । इंदिरा गांधी की मौत ने सपने को लील लिया और राजीव गांधी ने सपने को पूरा करने वक्त १९९३ तक का निकाला। जो आज पाथरी गांव छोडने से अच्छा मौत को मानते है उन सभी ने चाहे वह लांजेवार हो या भूरे ने राजीव गांधी को नंगी आंखों से देखा और अपने कानो से यह कहते सुना कि किसान को खेती की जमीन मिलेगी। खेत-मजदूर को रोजगार मिलेगा। बच्चो को स्कूल और बुजुर्गो को घर। लेकिन राजीव गांधी की मौत के बाद सियासत इतनी पथरीली हो गयी कि गोसीखुर्द गांध भी देश को अभी तक नहीं मिला और जिस बांध को ३७२ करोड़ रुपये में पूरा होना था वह चीटी की रफ्तार से बनाता हुया हाथी की डकार लेने लगा। १९९५ में पीवी नरसिंहराव यहां पहुंचे तो गोसीखुर्ज ३७६८ करोड़ का हो गया। २००१ में अटल बिहारी वाजपेयी ने ८७३४ करोड़ कीमत लगायी । २००६ में मनमोहन सिंह ने १२ हजार करोड़ कीमत आंकी और सत्ता जाने से पहले २०१३ में गोसीखुर्द बांध की कीमत १५ हजार करोड़ पहुंच गयी।  हर पार्टी का नेता, मंत्री, विधायक , पार्षद गोसीखुर्द का ठेकेदार हो गया। हर ठेके में करोड़ों के वारे न्यारे हुये । साढे पांच हजार करोड अभी तक गोसीखुर्द डकार चुका है लेकिन सेन्द्रल वाटर कमीशन को कहना पड़ा कि जितना दिया गया जब उतना भी काम नहीं हुआ तो फिर बाकि साढे नौ हजार करोड़ क्यों दिये जायें। लेकिन मौका फिर चुनाव का है तो हर कोई उम्मीद जगाने में लगा है कि बाकि पैसा भी वह जीतते ही ले आयेगा और हर उजड़ने वाले की जिन्दगी संवार देगा ।

लेकिन उजड़ने वालों के बीछ ढांढस बंधाने वाले और संघर्ष के लिये तैयार करते समाजसेवी विलास भोंगाडे की माने तो गोसीखुर्द परियोजना के एलान के बाद तो दो पीढिया वोट डालने के लिये जन्म ले चुकी हैं। और जो पीढी १८ बरस की इस बरस हुई यानी पहली बार वोट डालेगी उसकी त्रासदी देख लीजिये। वही लड़ने तीस रुपये रोज पर रिक्शे पर लाउडस्पीकर पर माइक से चिल्लाते हुये घूम रहे हैं कि १५ तारीख वोटिंग का दिन है । और १५ तारीख गांव खाली करना है । इस बार पोलिंग बूथ पाथरी गांव में नहीं बनेगा बल्कि पुनर्वास गांव में बनेगा। यानी हर दिन तीस रुपये भी पीढ़ियो की जिन्दगी को चंद रुपयों के मुआवजे तले दफ्न करने को तैयार है। क्योंकि दूसरा कोई रास्ता नहीं है। लूट का अर्थशास्त्र सिर्फ गोसीखुर्द बांध परियोजना के ठेके पर नहीं टिका है
बल्कि मुआवजे का गणित भी हर किसी को एक-दो बरस से ज्यादा जीने का अधिकार देने को तैयार नहीं है। पाथरी गांव के इलाके में एक एकड केती की जमीन की कीमत है आठ से दस लाख रुपये। लेकिन मुआवजा दिया जा रहा है तीस से चालीस हजार रुपये। संजय देशमुख के पास साछे छह एकड़ खेती की जमीन थी। मुआवजा मिला दो लाख पचास हजार। घर मिट्टी का था तो उसकी एवज में चालीस हजार रुपये मिले। जो नयी जगह दी वहा घर बनाने में लग गये सवा लाख रुपये।


पानी के लिये ट्यूबवैल लगानी पड़ी जो पचास हजार में लगी। हाथ में बचे सवा लाख रुपये बैक को देकर छह लाख रुपये का ट्रैक्टर खरीद लिया । किसानी छोड़ अब ट्रैक्टर ड्राइवर होकर जीना है । बैक हो हर महीने तीन हजार रुपये देने है । और कमाई हर दिन की १२० रुपया है । यानी हर दिन ट्रैक्टर चलता रहे तो हर दिन बीस रुपये और छह सौ रुपये महीने में जिन्दगी चलानी है। इस अर्थसास्त्र से कौन सा गांव शहर होगा या कौन सा विकास रोजगार या जीने की सुविधा देगा। जबकि पहली बार समूचे महाराष्ट्र में हर राजनीतिक दल , हर उम्मीदवार विकास शब्द कुछ इस तरह रख रहा है मानो यह जादुई शब्द हर किसी की जिन्दगी संवार देगा। जबकि विकास की इसी अविरल धारा में सिर्फ गोसीखुर्द ही नहीं बल्कि २८ सिंचाई परियोजना तले सत्तर हजार करोड़ का घोटाला हो गया। और पाथरी गांव के चार सौ परिवार ही नहीं बल्कि समूचे महाराष्ट्र के तीन हजार गांव के दो लाख परिवार या तो मुआवजे का आखरी दाना खा कर मरने की कगार पर है या फिर पारंपरिक काम छोड़ शहरों की गलियो से लेकर सड़क तक पर एक जून की रोटी के जुगाड़ में खामोशी से मरे जा रहे हैं क्योंकि चुनावी लोकतंत्र को जिन्दा रखना है।

Saturday, September 27, 2014

कौन है गठबंधन तोड़ने वाले "खलनायक' !

कौन नहीं चाहता था गठबंधन । महाराष्ट्र की सियासत में लाख टके का सवाल अब यही हो गया है । शिवसेना कयास लगा रही है कि बीजेपी की राज्य इकाई को यह संकेत दिल्ली से आया। बीजेपी कयास लगा रही है उट्टव ठाकरे की कोटरी जिसमें सबसे शक्तिसाली रश्मी ठाकरे हैं, उनका संकेत था । आरएसएस के भीतर कयास लग रहे हैं कि बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को उपर का संकेत था यानी प्रधानमंत्री मोदी से। अगर कयास सही है तो संकेत साफ है कि शिवसेना-बीजेपी का गठबंधन हर हाल में टूटना था और दोनो तरफ से सबसे प्रभावी या कहे ताकतवर लोग ही नहीं चाहते थे कि गठबंधन रहे। क्योंकि शिवसेना प्रमुख की पत्नी रश्मी ठाकरे मौजूदा वक्त में सबसे ताकतवर है और गठबंधन टूटने के बाद बीजेपी के भीतर से लगातार यही आवाज आ रही है कि उद्दव ठाकरे की राजनीतिक महत्वकांक्षा को उड़ान देने के लिये परिवार की ही वह कोटरी है जो शिवसेना के हर निर्णय को लेने में सक्षम है। इस कोटरी में कोई बाहरी शिवसैनिक नहीं है बल्कि ठाकरे परिवार के ही सदस्य है। और उद्दव ठाकरे का हर निर्णय इससे प्रभावित होता है।

इसीलिये जो ठाकरे परिवार हमेशा किंगमेकर की भूमिका में रहा वह पहली बार किंग बनने का खुला ऐलान करने से नहीं कतरा रहा है। कमोवेश बीजेपी के गठबंधन टूटने के बाद ठाकरे परिवार की इसी महत्वकांक्षा का जिक्र संघ परिवार से किया। चूंकि संघ परिवार नहीं चाहता था कि महाराष्ट्र में गठबंधन टूटे तो बीजेपी की तरफ से आरएसएस को जानकारी भी यही दी गयी ही मौजूदा वक्त में ठाकरे परिवार की बडी हुई महत्वाकांक्षा का चेहरा बालासाहेब ठाकरे से अलग है। बालासाहेब ठाकरे दूर की सोच कर निर्णय लेते थे। लेकिन मौजूदा ठाकरे परिवार सिर्फ तत्काल को देख रहा है और बीजेपी की ताकत जब शिवसेना से ना सिर्फ ज्यादा है बल्कि साथ लड़ने पर बीजेपी के वोट का लाभ ही शिवसेना को मिलेगा तो फिर बीजेपी अपनी ताकत का लाभ शिवसेना को क्यों पहुंचाये । वहीं ठाकरे परिवार के भीतर बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को लेकर कहीं ज्यादा रार है। हालांकि चुनाव ऐलान से एन पहले अमित शाह मुबंई यात्रा के वक्त उद्दव ठाकरे से मिलने घर पर भी गये थे और बालासाहेब की समाधि पर पर भी गये थे।

लेकिन शिवसेना के साथ कितनी सीदो पर चुनाव लड़ना है, इस पर खुलकर कोई बातचीत करने की जगह तब भी सिर्फ इतना ही कहा था कि बीजेपी की राज्य इकाई से बातचीत के बात ही फैसला होगा। यानी दिल्ली के हर फैसले का आधार राज्य ईकाई की रिपोर्ट होगी इसका जिक्र तभी कर दिया गया था । लेकिन शिवसेना की मुश्किल दिल्ली में मोदी सरकार के आने के बाद कही ज्यादा तेजी से मुंबई में बढ़ी इसके संकेत शिवसेना के दादर दफ्तर के भीतर पार्टी के लिये मिलने वाले दान में आयी कमी या कहे वसूली से भी देखा गया। और इसकी वजह गुजरातियों का शिवसेना की जगह सीधे दिल्ली में मोदी सरकार से संपर्क साधना माना गया । ध्यान दें तो मुबंई में गुजरातियो के धंधे कहीं ज्यादा है। सूरत के हीरो के कारोबार का तो सबसे बडा बाजार ही मुबंई है, जहां हर डायमंड मर्चेट का दफ्तर है। और मुबंई से ही दुनिया भर में हीरों का व्यापार होता है। शिवसेना के साथ गुजराती व्यापारियों का लेन-देन  बालासाहेब ठाकरे के दौर का है। लेकिन दिल्ली में मोदी सरकार के आने के बाद अमित साह के बीजेपी अध्यक्ष बनते ही मुंबई के गुजरातियों का रास्ता भी बदला और गुजरात से मुबंई की दूरी झटके में दिल्ली की तुलना में ज्यादा हो गयी। शिवसेना के लिये यह सबसे बड़ा झटका माना गया। इसीलिये चुनाव से पहले ही सीएम पद पर दावेदारी टोकं कर उद्दव ने बीजेपी से दो दो हाथ करने का मन भी बनाया और पार्टी के भीतर इसके संकेत भी दिये कि महाराष्ट्र में सत्ता की लगाम तो ठाकरे परिवार के पास ही रहेगी।

तो फिर चुनाव के बाद सारे संकट निपट जायेंगे। वैसे भी उद्दव यह दांव ना खेलते तो शिवसेना की ताकत कम ही होती क्योकि पहली बार बालासाहेब ठाकरे की 50 बरस की सियासत पर मोदी मंत्र भारी है यह बीजेपी मान कर चल भी रही है और उसे भरोसा भी है कि महाराष्ट्र की राजनीति में उसके बिना शिवसेना हाशिये पर जा चुकी है। हालांकि एक सच यह भी है कि बालासाहेब ठाकरे ने कभी नरेन्द्र मोदी की तारीफ इस रुप में नहीं कि की वह पीएम बन सकते हैं। और जब बीजेपी के भीतर पीएम पद को लेकर संघर्ष चल भी रहा था तब बालासाहेब ने मोदी का नहीं सुषमा स्वराज का नाम लिया था। वैसे शिवसेना ही नहीं बल्कि बीजेपी के भीतर का एक बड़ा तबका मानता है कि प्रधानमंत्री मोदी कभी चाहते ही नहीं थे कि शिवसेना से गठबंधन रहे। क्योंकि लोकसभा जीत के बाद अपने बूते महाराष्ट्र जीता जा सकता है यह पाठ बीजेपी के भीतर दिल्ली से मुबंई तक बार बार पढ़ा गया। सवाल सिर्फ इस पाठ को परीक्षा में उतारने का था। और इसके लिये दिन वही चुना गया जब प्रधानमंत्री मोदी अमेरिका रवाना हो जाये । इसलिये 25 सिंतबर की शाम 4 बजे प्रदानमंत्री मोदी के दिल्ली से  न्यूयार्क रवाना होने से ठीक दस मिनट पहले मुबंई में बीजेपी नेता खुलकर सामने आ गये और शिवसेना से गठबंधन टूटने के खुले संकेत दे दिये । हिन्दुत्व का राग अलापते अलापते महाराष्ट्र में बने इस गठबंधन के टूटने का खुला संकेत संघ परिवार के भीतर यही गया कि दिल्ली नहीं चाहता ता कि शिवसेना के साथ मिलकर चुनाव लडे तो गठबंधन टूट गया। हालांकि दिल्ली की थ्योरी में शिवसेना से मोदी या अमित शाह के ना पटने से कहीं ज्यादा जीत का पक्का भरोसा जताना रहा। राज्य ईकाई के आंकड़ों का जिक्र कर बीजेपी ने अपने बूते सवा सौ सौट जीतने का जिक्र किया। जिसमें विदर्भ की 62 में 45 सीटों, मराठवाडा की 47 में से 17 , उत्तर महाराषट्र की 47 सीटे में से 30 सीट, पश्चिम महाराष्ट्र की 58 में 17 और मुबंई की 36 में से 15 सीटें पर पक्की जीत का दावा किया गया। यानी आधार कही ना कही लोकसभा चुनाव की सफलता को ही रखा गया। खास बात यह भी है कि बीजेपी के इन आंकडों पर संघ के भीतर अब यह कसमसाहट है कि लोकसभा चुनाव के वक्त तो संघ का हर स्वयंसेवक वोट मांगने निकला था। राजनीतिक सक्रियता पैदा करने निकला था ।

लेकिन महाराष्ट्र चुनाव के वक्त तो संघ का कोई स्वयंसेवक नहीं निकलेगा तो खुद ही तय हो जायेगा कि बीजेपी का आधार है कितना मजबूत। वहीं गठबंधन टूटने के पीछे की वजहों की कयास में महाराष्ट्र की उस तिकड़ी का नाम भी है जो आधार वाले नेता हैं। पैसे वालों के बीच खासे लोकप्रिय हैं। और अपनी अपनी सियासत के घेरे में सबसे ताकतवर भी हैं। इनमें पहला नाम शरद पवार का है । जो कांग्रेस के किसी हालत में पनपने देना नहीं चाहते हैं। दूसरे राजठाकरे हैं । जो गठबंधन के दौर में हर सौदेबाजी के दायरे से बाहर हो जाते । और तीसरे नीतिन गडकरी है । जो महाराष्ट्र में बीजेपी के सबसे ताकतवर चेहरे हैं। लेकिन गठबंधन बरकरार रहता तो इनकी जरुरत किसी को ना होती । और संयोग ऐसा है कि यह तीनों के आपसी संबंध भी है । और तीनो चुनाव के बाद किसी भी सरकार को बनाने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभायेंगे। यह किसी से छुपा भी नहीं है। तो गठबंधन का टूटना अपनी अपनी बिसात पर खुद को प्यादे से वजीर बनाने या मानने की खूबसूरत कवायद से इतर कुछ भी नहीं। असल वजीर तो चुनावी के बाद की बिसात पर सरकार बनाने वाले की चाल से तय होगा। फिलहाल तो हर नजर में दूसरे को लेकर शक-शुबहा है।

Wednesday, September 24, 2014

जो आज सही है वह 2035 में गलत हो सकता है !

21 बरस गुजर गये। देश ने पांच प्रधानमंत्रियों को देख लिया। और इस दौर में कमोवेश देश के हर राजनीतिक दल ने सत्ता का स्वाद चखा। लेकिन कभी किसी ने राष्ट्रीय संपदा कोयला की लूट पर कोई सवाल नहीं उठाया।  जिन 214 खादानों के आंवटन को रद्द किया गया है, उनमें से पीवी नरसिंह राव के दौर में 5 खादान का आबंटन हुआ। 4 खादानों का आबंटन देवेगौडा के दौर में हुआ । आईके गुजराल पीएम बने तो उस दौर में कोई खादान आबंटन नहीं हुआ । लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी के दौर में 30 खादानो का आबंटन हुआ । और जिस दौर को सीएजी ने एक लाख 86 हजार करोड़ के राजस्व के चूना लगने की बात अपनी रिपोर्ट में कही वह मनमोहन सिंह का दौर था। उस दौर में 1759 खादान आंवटित किये गये । जिनमें से 175 खादानों के आंवटन को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया है। यानी सरकारें आती रही जाती रही और जैसे ही देश में पावर प्रोजेक्ट सबसे बडे मुनाफे के धंधे में बदला वैसे ही कोयला खादानों की लूट का सिलसिला भी इस तरीके से चल पड़ा कि सरकार के हर करीबी रईस ने अपने नाम कोयला खादान करवाना चाहा। असर इसी का हुआ कि जिन कंपनियो को ना तो
कोयला खदानो का कोई अनुभव था या फिर जिनके पास ना पावर प्लांट था उन्होंने कोयले की भारी मांग को देखते हुये कोयला खादान मुनाफा बनाने- कमाने के लिये अपने नाम करवा लिया। ऐसी 24 कंपनियां हैं, जिनके पास कोई पावर प्रोजेक्ट का नहीं है । लेकिन उन्हे खादान मिल गयी । 42 कंपनिया एसी है जिन्होंने खादानो की तरफ कभी झांका भी नहीं। लेकिन खादान अपने नाम कर खादान बेचने में लग गयी। यानी लूट हुई है इसपर पहली अंगुली सीएजी ने उठायी तो अब फैसला सुप्रीम कोर्ट ने दे दिया। लेकिन असल सवाल यही है कि सरकार की अगर कोई नीति बीस बरस बाद आदालत के निर्देश पर खारिज होती है । या फिर सरकार को बीते 20 बरस के फैसले रद्द करने पड़ते हैं तो फिर जिन निवेशकों ने सरकारी नीति के तहत पूंजी लगायी वह अब क्या करेंगे। जिन बैकों ने पावर प्लांट के लिये कंपनियो को उधारी दी अब उन्हें वापस पैसा कैसे मिलेगा। और जिन्होने कोयला खादान मिलने पर पावर प्लांट लगा लिया उनकी पूंजी का क्या होगा।

यानी मुसीबत दोहरी है। एक तरफ सरकारों की लूट है तो दूसरी तरफ विकास की नीति फेल है । और यह हालात बताते है कि सरकारें यह मान कर चलती है कि कारपोरेट या उङोगपति सरकारी लूट का हिस्सा बनते है तभी उन्हे मुनाफा मिलता है और कौडियों के मोल राष्ट्रीय संपदा की लूट होती है। यानी बनाना रिपब्लिक की तर्ज पर कोयला खादान नीति बीते 21 बरस से देश में चलती रही और हर किसी ने आंखें मूंदी रखी। पूंजीपति उगोगपतियों को सरकार की नीति से लाभ होता है तो ही वह पैसा लगाते हैं और जब नीतियां ही फ्रॉड साबित हो जाये तो फिर विकास की नयी नीति के तहत खड़े होने से नहीं कतराते। इसलिये यह कोई समझ नहीं पा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद पावर प्रोजेक्ट के लिये दिये गये 3 लाख करोड़ का बैक को चूना लगेगा। पावर कंपनियो को करीब 2.86 लाख करोड़ का नुकसान होगा। तो फिर यह हालात आये कैसे और कैसे विकास की लहर में भारत खुला बाजार बन गया। तो याद कीजिये 1979 में बनी फिल्म कालापत्थर को। जिसमें कोयला खदानो से मुनाफा बनाने के लिये निजी मालिक मजदूरो की जिन्दगी दांव पर लगाता है। असल में यह फिल्म भी झारखंड की उस चासनाला कोयला खादान के हादसे पर बनी थी, जिसमें कोयला निकालते सैकड़ों मजदूरों की मौत खादान में पानी भरने से हुई थी। और जांच रिपोर्ट में यह पाया गया था कि कोयला निकालने का काम खादान में जारी रखने पर पानी भर सकता है, इसकी जानकारी भी पहले से खादान मालिक
को थी। असल में निजी कोयला खादानो में मजदूरों के शोषण को देखकर ही 1972 में इंदिरा गांधी ने कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण किया। और 1973 से लेकर 1993 तक कोई खानाद निजी हाथों में सौपी नहीं गयी । और 1993 तक कोयला निकालने का अधिकार सिर्फ कोल इंडिया को ही था।

लेकिन 1993 में बतौर वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने कोल इंडिया के सामने यह लकीर खींच दी कि सरकार कोल इंडिया को अब मदद नहीं देगी बल्कि वह अपनी कमाई से ही कोल इंडिया चलाये तो 1993 से कोल इंडिया भी ठेकेदारी पर कोयला खादान में काम कराने लगा और मजदूरों के शोषण या ठेकेदारी के मातहत काम करने वाले मजदूरों के हालात कितने बदतर है, यह आज भी झारखंड, बंगाल, उड़ीसा, छत्तीसगढ, मध्यप्रदेश में देखा जा सकता है। यानी आर्थिक सुधार की बयार में यह मान लिया गया कि कोयला खदानों के राष्ट्रीयकरण से सरकार को कोई लाभ मनमोहन की इक्नामिक थ्योरी तले देश को हो नहीं सकता। यानी देश के खदान मजदूरों को लेकर जो भी खाका सरकार ने खींचा, वह खुली अर्थव्यवस्था में फेल मान लिया गया। क्योंकि ठेकेदारी प्रथा ज्यादा मुनाफा देने की स्थिति में है। और यही से शुरु हुआ निजी हाथो में कोयला खादान की बंदरबाट । 10 अगस्त 1993 में बंगाल के सरीसाटोली की खादान आरपीजी इंडस्ट्री और सीईएससी लिमिटेड को साझा तोर पर दी गयी। उसके बाद दूसरी खादान 24 फरवरी 94 को उडीसा के तालाबिरा में हिडाल्को को  दी गयी। और उसके बाद सरकारें बदलती रही लेकिन कोयला खादान आवंटन में कोई रोक नहीं लगी। मनमोहन सिंह के पीएम बनने के बाद तो खादान बांटने में गजब की रफ्तार आयी। 342 खदानों के लाइसेंस बांटे गये, जिसमें 101 लाइसेंसधारको ने कोयला का उपयोग पावर प्लांट लगाने के लिये लिया। लेकिन इन दौर में इन्हीं कोयला खादानो के जरीये कोई पावर प्लांट नया नही आ पाया। और इन खदानो से जितना कोयला निकाला जाना था, अगर उसे जोड़ दिया जाये तो देश में कही भी बिजली की कमी होनी नहीं चाहिये। लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

देश का हाल समझे तो खादान का लाइसेंस लेने वालों में म्यूजिक कंपनी से लेकर अंडरवियर-जांघिया बेचने वाली कंपनियां भी हैं और अखबार निकालने से लेकर मिनरल वाटर का धंधा करने वाली कंपनी भी। इतना ही
नहीं दो दर्जन से ज्यादा ऐसी कंपनियां हैं, जिन्हें न तो पावर सेक्टर का कोई अनुभव है और न ही कभी खादान से कोयला निकालवाने का कोई अनुभव। कुछ लाइसेंस धारकों ने तो कोयले के दम पर पावर प्लांट का भी लाईसेंस ले लिया और अब वह उन्हें भी बेच रहे हैं। मसलन सिंगरैनी के करीब एस्सार ग्रुप तीन पावर प्लांट को खरीदने के लिये सौदेबाजी कर रही है, जिनके पास खादान और पावरप्लाट का लाइसेंस है, लेकिन वह पावर सेक्टर को व्यापार के जरीये मुनाफा बनाने का खेल समझती है। वहीं बंगाल, महाराष्ट्र,छत्तीसगढ, मध्यप्रदेश, गोवा से लेकर उड़ीसा तक कुल 9 राज्य ऐसे हैं, जिन्होंने कामर्शियल यूज के लिये कोयला खदानों का लाइसेंस लिया है। और हर राज्य खदानों को या फिर कोयले को उन कंपनियों या कारपोरेट घरानों को बेच रहा है, जिन्हें कोयले की जरुरत है। इस पूरी फेहरिस्त में श्री बैघनाथ आयुर्वेद भवन लिं, जय बालाजी इडस्ट्री लिमेटेड, अक्षय इन्वेस्टमेंट लिं, महावीर फेरो, प्रकाश इडस्ट्री समेत 42 कंपनियां ऐसी हैं, जिन्होंने कोयला खादान का लाइसेंस लिया है लेकिन उन्होंने कभी खदानों की तरफ झांका भी नहीं। और इनके पास कोई अनुभव न तो खादानों को चलाने का है और न ही खदानों के नाम पर पावर प्लांट लगाने का। यानी लाइसेंस लेकर अनुभवी कंपनी को लाईसेंस बेचने का यह धंधा भी आर्थिक सुधार का हिस्सा है। ऐसे में मंत्रियों के समूह के जरीये फैसला लेने पर सरकार ने हरी झंडी क्यों दिखायी । और अब जब सुप्रीम कोर्ट ने खादान आवंटन को गलत मान कर हर आवटंन रद्द कर दिया है तो फिर इसके दोषियों को क्या सजा होगी । क्या कोई जेल जायेगा । क्योकि हर निर्णय ग्रूप आफ मिनिस्टर ने लिये । यानी सरकारें की अपराध कर रही थी तो फिर आने वाले वक्त में कौन यह मान कर चले कि अभी जो विकास की चकाचौंध विदेशी-देशी निवेश से दिखायी जा रही है कल वह भी गलत साबित नहीं होगी। यानी मोदी सरकार की नीतिया भी 20135 में गलत साबित हो सकती है ।
तो फिर इस देश में कौन पैसा लगायेगा या फिर हर कोई पैसा इसीलिये लगायेगा क्योंकि नीतियां चाहे गलत हो। राजस्व की लूट चाहे हुई हो । दोषी कोई होता नहीं। सजा किसी को होती नहीं।