Wednesday, January 11, 2017

अंधेरे में रौशनी की खोज करता हिन्दुस्तान

कोई कह रहा है-आर्थिक इमरजेन्सी । तो कोई फाइनेंशियल इमरजेन्सी तो कोई सुपर इमरजेन्सी भी कहने से नहीं चूक रहा है । तो क्या 1975 के आपातकाल के आगे के दौर को मौजूदा वक्त के खांचे में देखा जा रहा है । या फिर नोटबंदी प्रधानमंत्री मोदी का ऐसा राजनीतिक मास्टरस्ट्रोक है, जिसके दायरे में हर राजनीति सिमट गई है और हर तरह की राजनीति के केन्द्र में प्रधानमंत्री मोदी आ खड़े हुये हैं। या फिर इमरजेन्सी शब्द को विपक्ष अब इस तरह क्वाइन कर रहा है, जिससे इंदिरा गांधी की इमरजेन्सी के सामानांतर मोदी की इमरजेन्सी घुमडने लगे। याद कीजिये इमरजेन्सी के खिलाफ जेपी के संघर्ष को खारिज करने के लिये इंदिरा गांधी विनोबा भावे की शरण में गई थीं। और जेपी ने जब संपूर्ण क्राति का आंदोलन छेड़ा तो विनोबा भावे से कागज पर इमरजेन्सी को इंदिरा गांधी ने अनुशासन पर्व लिखवा लिया। लेकिन मौजूदा वक्त में ना तो जेपी सरीखा कोई संघर्ष है और ना ही नैतिक बल लिये विनोबा भावे । और 1975 में तो संघ परिवार भी जेपी के पीछे जा खडा हुआ था । और जिस बीजेपी के पास मौजूदा वक्त में सत्ता हैा उनके तमाम नेता इंदिरा की इमरजेन्सी में संघर्ष करते हुये ही पहचान बना पाये । तो क्या मौजूदा वक्त में जब कांग्रेस से लेकर ममता और मायावती से लेकर अखिलेश या केजरीवाल भी नोटबंदी के दायरे में इमरजेन्सी शब्द का जिक्र कर रहे हैं तो तीन सवाल हैं।

पहला क्या इमरजेन्सी शब्द मोदी की सत्ता के साथ टैग करने भर का सवाल है । दूसरा, क्या इमरजेंसी शब्द के जरीये भ्रष्टाचार और कालेधन को दबाना है । तीसरा , क्या इमरेन्सी शब्द के जरीये ही राजनीतिक सत्ता पलटी जा सकती है । जाहिर है तीनों हालात राजनीति कठघरा ही बनाते हैं। लेकिन जब इक्नामिक इमरजे्न्सी का जिक्र देश में चल पडा है तो याद कीजिये 1974-75 में इंदिरा गांधी के करप्शन के खिलाफ ही जेपी ने संघर्ष छेडा था । और मौजूदा वक्त में सत्ता के करप्शन का सवाल सुप्रीम कोर्ट के दायरे में ही खारिज हो रहा है । यानी एक वक्त जैन हवाला के पन्नों पर आडवाणी ने इस्तीफा दे दिया । तो सहारा-बिरला के दस्तावेजों को सुप्रीम कोर्ट ने नहीं माना । राजनीति में भी नैतिकता गायब हो गई । तो क्या करप्शन की परिभाषा भी मौजूदा दौर में बदल रही है । या करप्शन के खिलाफ कोई भी कार्रवाई राजनीतिक तौर इमरजेन्सी शब्द से जोडना आसान है ।मसलन ममता की सत्ता पर करप्शन के लगे दाग पर सीबीआई की कार्रवाई के खिलाफ टीएमसी राष्ट्रपति से मिलकर लौटती
है तो सुपर इमरजेन्सी शब्द उछालती है।

तो क्या नोटबंदी से मुश्किल में आती मोदी सरकार के सामने अब चुनी हुई सत्ता के करप्शन के खिलाफ कार्रवाई कर अपनी छवि साफ रखना जरुरी हो चला है । यानी इमरजेन्सी के हालात राजनीतिक टकराव के उस मुहाने पर देश को ले जा रहे है जहा अच्छे दिन का मतलब होता क्या है इसे हर कोई मिल जाये । और इसीलिये 2014 में अच्छे दिन का सपना मोदी ने दिखाया । क्योंकि मनमोहन की सत्ता भ्रष्ट हो चली थी । और 2017 की शुरुआत ही राहुल गांधी ने अच्छे दिन का सपना 2019 तक के लिये मुल्तवी कर दिया जब कांग्रेस सत्ता में आ जायेगी । तो क्या इमरेजन्सी शब्द के बाद अच्छे दिन का नारा भी एक ऐसा शब्द हो चुका है जो राजनीति सत्ता को चुनौती
दे सकता है । या फिर 2014 में जिन शब्दों ने सत्ता पलट दी अब वही शब्द सत्ता के लिये गले की हड्डी बन रहे है । या फिर अच्छे दिन की परिभाषा अपनी सुविधानुसार सत्ता और विपक्ष दोनों ही गढ रहे हैं। चिदंबरम घातक
मानते है तो जेटली एतिहासिक कदम । दोनों ही वित्त मंत्री । एक ही देश के लिये देखने का दो नजरिया है । तो ऐसे में सवाल इक्नामी का नही सियासत का ही ज्यादा होगा । और सियासत की इस चौसर में -कौन सा पांसा किस राजनीतिक दल को लाभ दे दें। या -कौन सा पांसा पंरपारिक राजनीति को ही उलट दें । या फिर कौन सा पांसा राष्ट्रनिर्माण के सपने तले वर्ग संघर्ष के हालात पैदा कर दें । यानी गरीबों के लिये इक्नामी में कौन सी भागेदारी रोजगार पैदा करती है इसका कोई विजन आजतक किसी सत्ता ने नहीं बताया । किसान को लागत से
ज्यादा देने का वादा सरकार क्यों नहीं कर पाती ये भी अबूझ पहेली है । और देश में असमानता की खाई कैसे कम होते हुये खत्म हो इसकी कोई दृश्टी किसी उक्नामिक प्रयोग में या बजट में उभर नहीं पाती है । तो क्या देश में अच्छे दिन शब्द भी सियासी सपने से ज्यादा कुछ नहीं है । क्या अच्छे दिन की चाहत में सिर्फ सत्ता बदलने का ख्वाब पालना देश का फेल होना है । क्योंकि अच्चे दिन का जिक्र चाहे 2014 में हुआ हो या 2017 में । दोनों
हालातों में ये समझान भी जरुरी है कि देश के संस्धानों को ही राजनीतिक सत्ता ने 2014 से पहले मनमोहन सिंह ने हड़पा और अब मोदी सरकार हडप रही है । और बीजेपी 2014 तक ये आरोप लगा रही थी । तो काग्रेस अब ये आरोप लगा रही है । यानी अच्छे दिन लाने के लिये देश में जिन संस्थानों को काम करना है दजब उन्ही संस्थानो का राजनीतिकरण राजनीतिक मुनाफे के लिये कर दिया जाता हो तो फिर अच्छे दिन किसके आयेगें । जाहिर है जनता के लिये तो अच्छे दिन हर सत्ता में मुश्किल है । और शायद उलझन इसी को लेकर है कि रास्ता देश का
सही है कौन सा । क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिस वक्त कारपोरेट के बीच बैठकर गुजरात वाइब्रेंट समिट में नीतियों और अर्थव्यवस्था में आमूलचूल बदलाव की वकालत कर रहे थे उस वक्त सिंगूर के किसान खासे खुश थे
कि अब उन्हे अपनी जमीन मिल जायेगी । तो क्या जिस बाजार इक्नामी के दायरे में एसईजेड बनाने की बात मनमोहन सिंह के दौर में हो रही थी । और जिस वक्त नैनो कार को सिंगूर में जगह नहीं मिली उसे गुजरात में जमीन तब सीएम रहते हुये मोदी ने ही दी । और अब सु्परीम कोर्ट ने जब 7 राज्यो को सेज पर नोटिस दे दिया है तो क्या इक्नामी का रास्ता हो क्या देश इसी में जा उलझा है । क्योकि एक तरफ वित्त मंत्री अरुण जेटली अपने ब्लॉग में लिखते है मोदी ने नोटबंदी के जरिए अर्थव्यवस्था में पीढ़ीगत बदलाव कर दिया है। और दूसरी तरफ दुनिया की तीन बड़े रेटिंग एजेंसियों में एक " फिच " ने कल ही कहा है कि बड़े फायदे के लिए कुछ देर का परेशानी का सरकार का दावा अनिश्चित है । तो न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे अखबार ने तो अपनी संपादकीय
टिप्पणी में यहां तक लिख दिया कि, " क्रूरतापूर्वक बनाए और लागू किए गए नोटबंदी के फैसले ने आम लोगों की जिंदगी को काफी कठिन बना दिया है। इसके बहुत कम सबूत हैं कि नोटबंदी से भ्रष्टाचार रोकने में मदद मिली है और ना इस बात की गारंटी है कि इस तरह के क्रियाकलापों पर भविष्य में रोक लग पाएगी,जब सिस्टम में कैश वापस आ जाएगा। और नोटबंदी के फैसले से देश की अर्थव्यवस्था पर प्रभाव पड़ा है। " तो बाईब्रेट गुजरात के जरीये इक्नामी को समझा जाये । या नोटबंदी से ढहती बाजार इक्नामी को सही माना जाये ।क्योंकि सच यही है किनोटबंदी से दिसंबर में वाहनों की बिक्री 18.66 फीसदी गिर गई। ये 16 साल में सबसे बड़ी गिरावट है । जनवरी से मार्च में बिजनेस कॉन्फिडेंस 65.4 दर्ज हुआ,जो आठ साल में सबसे कम है । दिसंबर तिमाही में 8 बड़े शहरों में घरों की बिक्री 44 फीसदी गिरी,जो आठ साल में सबसे कम है । डॉलर के मुकाबले रुपया मोदी सरकार के काल में सबसे निचले स्तर को छू रहा है । असंगठित क्षेत्र के 14 करोड़ लोगों के सामने रोजगार का संकट पैदा हुआ है,जिन्हें नौकरी वापस दिलाने को लेकर फिलहाल कोई योजना सरकार के पास नहीं है । यानी नोटबंदी के बाद के हालात ने नया सवाल ये तो खडा कर ही दिया है कि आखिर इक्नामी के रास्ते बाईब्रेट गुजारात की
चकाचौंध पर चलेंगे । या नोटबंदी के अंधेरे के बाद रोशनी आयेगी । या फेल होते सेज तले आखिर में देश को कार या सरकार पर नहीं किसानी पर ही लौटना पडेगा ।

Tuesday, January 10, 2017

जय जवान जय किसान का नारा कैसे लगायें

अजीब संयोग है कि 11 जनवरी को देश के उसी प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की पुण्यतिथि है, जिसने देश को जय जवान जय किसान का नारा दिया। और शास्त्रीजी की 51वीं पुण्यतिथि के मौके पर ये सवाल उठ रहा है कि सीमा पर तैनात जवान को भी सूखी रोटी और नमक-हल्दी में रंगे पानी में दाल मिलती है और हर पांच घंटे में एक किसान खुदकुशी क्यों कर लेता है। तो कोई भी कह सकता है कि जय जवान जय किसान का नारा चाहे हिन्दुस्तान की रगों में आज भी दौ़ड़ता हो। और साढे तीन लाख जवानों की तादाद बीते 70 बरस में बढ़कर 47 लाख हो चुकी। और इसी तरह किसानों की तादाद भी 11 करोड़ से बढ़कर चाहे आज 21 करोड़ हो चुकी हो। लेकिन सच यही है ना तो जय जवान का नारा लगाते हुये बीते 70 बरस के दौर में कभी जवानों की जिन्दगी की भीतर झांकने की कोशिश किसी भी सरकार ने की और ना ही किसान को राहत पैकेज से आगे बढ़ाने की कोई
कोशिश बीते 70 बरस के दौर में किसी सरकार ने की। प्रति दिन प्रति जवान के भोजन पर 100 रुपये सरकार खर्च करती है। और प्रति किसान की औसत आय देश में प्रति दिन 40 रुपये से आगे बढ़ नहीं पायी है। यानी दुनिया के सबसे बडा लोकतांत्रिक देश के भीतर का सच कितना डराने वाला है, ये इससे भी समझा जा सकता कि एक तरफ किसान पीढ़ियों से पसीना बहाकर देश को अन्न खिला रहा है और जवान सीमा पर प्रहरी बनकर पिढियो से देश की रक्षा कर रहा है लेकिन जब आर्थिक-सामाजिक दायरे में जय जवान जय किसान का जिक्र होता है तो दोनों के ही परिवार गरीबी की रेखा के सामानातंर खडे नजर आते है । क्योकि देश में असमानता की खाई इतनी चौड़ी है कि एक तरफ औसतम प्रति व्यक्ति प्रति दिन आय 295 रुपये बैठती है। जबकि 35 रुपये रोज के दायरे देश के 37 करोड़ नागरिक आ जाते है।

और ऐसा नहीं है कि सरकारें समझती नहीं। चाहे सत्ता हो या विपक्ष। दोनों की बातो को सुनिये तो आप महसूस करेंगे कि गरीबों की किसान-मजदूरों के हालात भी सत्ता को पता है। और देश की संपत्ति चंद हथेलियों में सिमटी हुई है ये भी विपक्ष को पता है। बावजूद इसके ना जवान की हालत ठीक होती है ना किसान मालामाल होता है। तो ये समझना जरुरी है कि किसी भी सरकार ने बेसिक इन्फ्रास्ट्रक्चर पर कोई काम किया भी है या नहीं। क्योंकि जवानों का वेतन नौ हजार रुपये पार नहीं करता और किसानों की आय छह हजार से ज्यादा होती नहीं। और बीते 70 बरस के दौर में किसानी गले की फांस बनती है । तो किसान का बेटा ही सेना में जवान के तौर पर जाकर सीमा की रक्षा करता है। आंकडें बताते है कि सेना में 72 फिसदी जवान किसान परिवार से ही आते हैं। और संयोग देखिये पुंछ में तैनात जिस जवान ने खाने का कच्चा-चिट्टा मोबाइल में कैदकर देश को दिखा दिया। उसके पिता भी किसान हो और दादाजी सुभाषचन्द्र बोस की सेना में जवान थे। और उसके घर की माली हालात देखकर या सीमा पर तैनाती में मिलती रोटी- दाल देखकर अगर जय जवान जय किसान का नारा लगा सकते है तो लगाईये। लेकिन उससे पहले देश के सच को भी समझ लीजिये और फिर सोचिये कि जस जवान जय किसान तो दूर देश में जब न्यनतम इन्फ्रस्ट्रक्चर किसी भी क्षेत्र में नहीं है तो फिर जवान को कौन देखे या किसान का जिक्र कौन करें । क्योंकि 67 फिसदी जमीन पर सिंचाई होती नहीं। 72 फिसदी गांव में पीने का साफ पानी नहीं। 77 फिसदी देश को 24 घंटे बिजली का इंतजार आज भी है। सिर्फ 12 फिसदी आबादी को ढोने वाला पब्लिक ट्रास्पोर्ट सिस्टम खड़ा हो पाया है। 81 फिसदी आबादी के लिये सरकारी अस्पताल उपब्लध नहीं है। 72 फिसदी शहरी बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते नहीं। न्यूनतम मजदूरी कोई ठेकेदार देता नहीं। रोजगार है नहीं । तो क्या जिस इन्फ्रास्ट्रक्चर पर हर सत्ता को ध्यान को ध्यान देना चाहिये उसने उसी से आंखे मूंद रखी हैं। और नोटबंदी के बाद देश के सोशल इंडेक्स चाहे नीचे चला गया हो।

लेकिन उन हालातों को समझना जरुरी है कि आखिर क्यों नोटबंदी हो या कोई भी आर्थिक नीति देश को एक समान एक हालात में क्यों खड़ा नहीं कर सकती और करप्शन देश की रगों में क्यों दौड़ेगा। मसलन करप्शन भी जरुरत भी जीने के हालात से कैसे जोड़ दिया गया जब सरकार बेसिक इन्फ्रास्ट्रक्चर भी देश को नहीं दे पा रहे है तो सिचाई के लिये पंप चाहिये , बिजली के लिये जेनरेटर-इनवर्टर चाहिये, -इलाज के लिये प्राईवेट अस्पताल चाहिये, शिक्षा के लिये कान्वेंट स्कूल चाहिये , सफर के लिये निजी गाडी चाहिये, मजदूरी के लिये ठेकेदार की गुलामी करने पड़े तो न्यूनत मजदूरी कौन देगा । यानी जब सरकार ही जनता की न्यूनतम जरुरतो को पूरा करना तक अपनी जिम्मेदारी ना मान रही हो तब होगा क्या टैक्स चोरी,करप्शन ,ज्यादा कमाई के लिये किसी भी हद तक जाने की चाहत और देश के मिजाज में जब ये हालात जुड जायेंगे तो क्या सेना भी इससे अछूत रह पायेगी। ये सवाल इसलिये क्योकि जिस जवान ने रोटी-दाल के सच को उभारा उस रोटी दाल के पीछेका सच ये भी है कि सेना के लिये तो आर्मी सप्लाई कोर है। लेकिन पैरा मिलिट्री फोर्स के लिये गृह मंत्रालय हर सेक्टर को बजट की रकम देता है। यानी जवान जब सिनियर अधिकारियों की लूट का जिक्र कर रहा है। तो साफ है कि हर सेक्टर में बटालिनों के जवानो के लिये जो बजट आता है। उस बजट से अनाज खरीद हर सेक्टर के अधिकारी करते हैं। और सीएजी ने 2010 और 2016 में अपनी रिपोर्ट में सप्लाई की इसी चेन में गडबड़ी का जिक्र किया।


Wednesday, December 28, 2016

मीडिया के रेंगने के साल के तौर पर 2016 क्यों याद किया जाना चाहिये !

किन्हें नाज है मीडिया पर- पार्ट-3 [अंतिम]


आडवानी 35.00, खुराना 3.00, एसएस 18.94, के नाथ 7.00, एनडीटी 0.88,बूटा 7.50, एपी 5.00, एलपीएस 5,50, एस यादव 5.00, ए एम 30.00, एएन 35.00, डी लाल 50.00, वीसीएस 47.00, एनएस 8.00 .......और इसी तरह कुछ और शब्द। जिन के आगे अलग  अलग नंबर। यानी ना तो इनीशियल से पता चलता कि किसका नाम और ना ही नंबर से पता चलता कि ये रकम है या कुछ और। लेकिन पन्ने के उपर लिखा हुआ पीओई फ्राम अप्रैल 86 टू मार्च 90 । और सारे नामों के आगे लिखे नंबर को जोडकर लिखा गया 1602.06800 । और कागज के एक किनारे तीन हस्ताक्षर। और तीनों के नीचे तारीख 3/5/91 ..... तो इस तरह के दो पन्ने जिसमें सिर्फ नाम के पहले अक्षर का जिक्र। मसलन दूसरे पन्ने में एलकेए या फिर वीसीएस। और देखते देखते देश की सियासत गर्म होती चली गई कि जैन हवाला की डायरी का ये पन्ना है। जिसमें लिखे अक्षर नेताओं के नाम हैं । जिन्हें हवाला से पेमेंट हुई। और इस पन्ने को लेकर देश की सियासत कुछ ऐसी गर्म हुई कि लालकृष्ण आडवाणी ने ये कहकर लोकसभा सदस्यता से इस्तीफा दे दिया कि जब तक उनके नाम पर लगा हवाला का दाग साफ नहीं होता, वह संसद में नहीं लौटेंगे। बाकी कांग्रेस-बीजेपी के सांसद जिनके भी नाम डायरी के पन्नो पर लिखे शब्द को पूरा करते उनकी राजनीति डगमगाने लगी। और पूरे मामले की जांच शुरु हो गई। उस वक्त प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने सीबीआई के हवाले जैन हवाला की जांच कर दी। लेकिन बीस बरस पहले 1996 में डायरी का ये पन्ना किसी नेता ने हवा में नहीं लहराया। ना ही किसी सीएम ने विधानसभा में डायरी के इस पन्ने को लहराकर किसी से इस्तीफा मांगा। बल्कि तब के पत्रकारो ने ही डायरी के इस पन्ने के जरीये क्रोनी कैपटिलिज्म और नेताओ का जैन बंधुओं के जरीये हवाला रैकेट से रकम लेने की बात छापी। जनसत्ता ने नामों का जिक्र किया तो आउटलुक ने तो 31 जनवरी 1996 के अंक में कवर पेज पर ही डायरी का पन्ना छाप दिया। और जैन हवाला की इस रिपोर्ट ने बोहरा कमेटी की उस रिपोर्ट को भी सतह पर ला दिया, जिसमे 93 के मुंबई ब्लास्ट के बाद नेताओं के तार अपराध-आतंक और ब्लैकमनी से जुड़े होने की बात कही गई। लेकिन तब जिक्र मीडिया के जरीये ही हो रहा था। सवाल पत्रकार ही उठा रहे थे। मीडिया संस्थान भी बेखौफ सत्ता-सियासत के भीतर की काई को उभार रहे थे।

अतीत के इन पन्नो को जिक्र इसलिये क्योंकि मौजूदा वक्त में जिन कागजों को लेकर हंगामा मचा है, उसमें पहली बार कोई भी सवाल पूछ सकता है कि आखिर ये कौन सा दौर है कि जिस दस्तावेज को केजरीवाल ने दिल्ली विधानसभा में उछाला, जिन कागजो को राहुल गांधी हर रैली में दिखा रहे हैं और जिन कागज-दस्तावेज के आसरे वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खठखटा रहे हैं और अब 11 जनवरी को सुनाई होनी है। वह कागज मीडिया में पहले क्यों नहीं आये। आखिर ये कैसे संभव है कि नेता ही नेताओं के खिलाफ कागज दिखा रहे हैं लेकिन किसी पत्रकार ने इन दस्तावेजों को पहले अखबार में क्यों नही छापा। किसी न्यूजचैनल के किसी पत्रकार को ये खबर पहले क्यों नहीं पता लगी । और अब जब राहुल गांधी प्रधानमंत्री मोदी पर आरोप लगाते हुये भूकंप लाने वाले हालात का जिक्र कर हवा में आरोपों को उछाल रहे है तो क्या वाकई किसी पत्रकार को भूकंप लाने वाली खबर की कोई जानकारी नहीं है या फिर मौजूदा दौर में जानकारी होते हुये भी पत्रकार कमजोर पड़ चुके हैं। मीडिया संस्थान किसी तरह की कोई ऐसी खबर ब्रेक करना नहीं चाहते, जहां सत्ता ही कटघरे में खड़ी हो जाये। तो क्या मौजूदा दौर में मीडिया की साख खत्म हो चली है या फिर सत्ता ने खुद पुरानी हर सत्ता से इतर कुछ इस तरह परिभाषित कर लिया है कि सत्ता की साख पर बट्टा लगाना लोकतंत्र के किसी भी खम्भे के बूते से बाहर हो चला है। या फिर लोकतंत्र के नाम पर लोकतंत्र को ही हड़प कर देशभक्ति का राग जिस तरह देश में गाया जा रहा है, उसमें मीडिया को भी पंचतंत्र के उस बच्चे का इंतजार का है जो भोलेपन से ही बोले लेकिन बोले और राजा को नंगा कह दे।

ये सवाल इसलिये बड़ा है क्योंकि जैन हवाला में तो सिर्फ निजी डायरी के पन्ने थे। लेकिन सहारा और बिरला के दस्तावेजों में बाकायदा खुले तौर पर या तो पूरे नाम हैं या फिर पद हैं। यानी किसी कंपनी की फाइल से निकाले गये कागज भर ही नहीं हैं बल्कि जिस अधिकारी ने छापा मार कागजों को जब्त किया उसके दस्तख्वत भी हैं। और चश्मदीद के तौर पर सहारा की तरफ से अधिकारी के भी हस्ताक्षर हैं। लेकिन मसला कागजों या दस्तावेजों से ज्यादा अपनी अपनी सुविधा से नेताओं का कागज का कुछ हिस्सा दिखाते हुये अपने अपने राजनीतिक लाभ के लिये कागजो की परिभाषा गढते हुये खुद को पाक साफ बताने या कहें सत्ता को कटघरे में खड़ाकर अपनी राजनीतिक जमीन बनाने की मशक्कत भी है। और मीडिया को लेकर असल सवाल यही से शुरु होता है कि जो भी देश का नामी अखबार या मीडिया हाउस आज की तारीख में राहुल गांधी के प्रधानमंत्री मोदी पर लगाये आरोपों को छापने-दिखाने की हिम्मत दिखा रहे हैं। क्या वाकई उन्हें पता ही नहीं था कि इस तरह के दस्तावेज भी हैं। या फिर ये कहें कि मौजूदाहालात ने हर किसी को इतना कमजोर बना दिया है कि वह सत्ता को लेकर कोई सवाल करना ही नहीं चाहता क्योंकि न्यायपालिका को लेकर भी उसके जहन में कई सवाल हैं। यानी ये भी सवाल है कि क्या न्याय का रास्ता भी सत्ता ने हड़प लिया है। क्योंकि प्रशांत भूषण भी जब सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस खेहर जो 3 जनवरी को चीफ जस्टिस बन जायेंगे । उन पर सुप्रीम कोर्ट में 14 दिसंबर को ये सवाल उठाने से नहीं चूकते कि , ‘ जब मामला पीएम को लेकर है और चीफ जस्टिस होने की फाइल पीएम के ही पास है तो उन्हें खुद को इस मामले से अलग कर लेना चाहिये।' तो क्या वाकई देश में ऐसा माहौल बन चुका है कि लोकतंत्र का हर पिलर पंगु हो चला है। लेकिन यहाx तो मामला लोकतंत्र के चौथे खम्भे यानी मीडिया का है। और चूंकि पहली बार केजरीवाल ने सहारा-बिरला के दस्तावेजों को नवंबर में विधानसभा में उठाया। नवंबर के शुरु में ही प्रशांत भूषण ने भी सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। और राहुल गांधी ने दस्तावेजों को दिसंबर में मुद्दा बनाकर प्रधानमंत्री मोदी पर निशाना साधना शुरु किया। लेकिन मीडिया का सच तो यही है कि सारे दस्तावेज जून में ही मीडिया के सामने आ गये थे। और ऐसा भी नहीं है मीडिया अपने तौर पर दस्तावेजो को परख नहीं रहा था। और ऐसा भी नहीं है कि देश के जो राष्ट्रीय मीडिया इमरजेन्सी से लेकर जैन हवाला तक के दौर में कभी भी खबरों को लेकर सहमे नहीं। सत्ता से लड़ते भिड़ते ही हमेशा नजर आये। और तो और मनमोहन सिंह के दौर के घपले घोटालों को भी जिस मीडिया हाउस ने खुलकर उभारा। वह सभी जून से नवंबर तक इन सहारा-बिरला के कागजों को दिखाने की हिम्मत दिखा क्यों नहीं पाये। जबकि सच यही है कि कागजों का पुलिंदा एक मीडिया हाउस के नकारने के बाद दूसरे मीडिया हाउस के दरवाजे पर दस्तक देता रहा। ऐसा भी नहीं है कि जून से नवंबर तक किसी मीडिया हाउस ने दस्तावेजों को परखा नहीं। हर मीडिया हाउस ने अपने खास रिपोर्टरों को दस्तावेजों के सच को जानने समझने के लिये लगाया। बोफोर्स घोटालों को उजागर करने वाले मीडिया संस्धान ने सहारा के कागजों की जांच कर रहे अधिकारी को जयपुर में पकड़ा। जानकारी हासिल की। लेकिन फिर लंबी खामोशी। तो इमरजेन्सी के दौर मे इंदिरा की सत्ता से दो दो हाथ करने वाले मीडिया संस्थान ने तो कागजों को देख कर ही मान लिया कि देश के पहले तीन को छोड़कर कुछ भी छापा जा सकता है। लेकिन उन्हें छुआ नहीं जा सकता। जैन हवाला की डायरी के पन्नों को छापकर रातों रात देश में पत्रकारिता की साथ ऊंचा करने वाले मीडिया संस्थान ने तो कागज पर दस्तख्त करने वाले इनक्म टैक्स अधिकारी से भी बात की और कांग्रेस के एक नेता के प्राईवेट सेकेट्री से भी बात कर कागजों की सच्चाई को परखा। लेकिन उसके बाद खामोशी ही बरती गई । एक रिपोर्टर ने तो वित्त मंत्रालय के भीतर सहारा के दस्तावेजों को लेकर चल क्या रहा है, उसे भी परखा । लेकिन अखबार के पन्नों पर कुछ भी नहीं आया। और तो और दस्तावेजों में जिन नेताओं को सहारा के जिन कारिंदो ने पैसा पहुंचाया, जब उनका नाम तक दर्ज है तो उन नामों तक भी कई मीडिया हाऊस पहुंचे। यानी सहारा के कागजों में सहारा के ही जिन नामों का उल्लेख है....जो अलग अलग नेताओं को ब्रीफकेस पहुंचा रहे थे। वह नाम भी असली है और कोई दिल्ली में तो कोई लखनऊ में तो कोई मुंबई में सहारा दफ्तर का कर्मचारी है ये भी सामने आया लेकिन जून से नवंबर तक किसी मीडिया हाउस ने खबर को छूआ तक नहीं। मसलन जो ब्रीफकेस पहुंचा रहे थे या जिनके निर्देश पर ब्रीफकेस देने का जिक्र सहारा के कागजो में है, उसमें उदय , दारा , सचिन , जैसवाल , डोगरा का ही जिक्र सबसे ज्यादा है । और ये सारे नाम लखनऊ में सहारा सेक्रटियट से लेकर दिल्ली दफ्तर और सहारा के मुंबई गिरगांव दफ्तर में काम करने वाले लोगों के नाम हैं । ये भी सच निकल कर आया। लेकिन फिर भी खबर मीडिया में क्यों नहीं आई। इतना ही नहीं मुंबई के एक मीडिया संस्थान ने भी दस्तावेजों को खंगाल कर मुंबई के जिस पते से करोड़ों रुपये खाते में आ रहे थे, उसे भी खंगाला। यानी कोई खास इन्वेस्टिगेटिव पत्रकारिता करने भी जरुरत नहीं रही। सिर्फ कागज में दर्ज उस पते पर रिपोर्टर पहुंचा। जानकारी हासिल की । लेकिन खबर कहीं नहीं आई। तो क्या मीडिया की लंबी खामोशी सिर्फ मौजूदा वक्त की नब्ज बताने वाली है या फिर पहली बार देश के सिस्टम को ही कागजों में दर्ज राजनीतिक हमाम में बदल दिया गया है। क्योंकि कागजों में तो राजनीतिक दलों को रुपया बांटने में समाजवाद बरता गया। यानी सहारा दफ्तर से कुछ हाथों से लिखे पन्ने। कुछ कंप्यूटर से निकाले गये पन्ने तो कुछ नेताओं के नाम वाले पन्नो के पुलिन्दे बताते हैं कि कैसे चिटफंड के जरीये अरबों का टर्नओवर जब कोई कंपनी पार कर मजे में है तो सिर्फ गरीबो के पैसो से सपने बेचने भर का खेल नहीं होता बल्कि राजनीतिक व्यवस्था ही उसके दरवाजे पर कतार लगाये कैसे खड़ी रहती है। ये दस्तावेज उसी का नजारा भर है। और यहीं से भारतीय मीडिया का वह सच उभरता है कि अगर जून से नवंबर तक तमाम मीडिया को अगर ये कागज फर्जी लग रहे थे तो नवंबर के बाद से राजनीतिक गलियारे में ही जब ये कागज हवा में लहराये जा रहे है तो कोई मीडिया ये कहने की हिम्मत क्यो नहीं दिखा पा रहा है कि उसकी जांच में तो सारे कागजात फर्जी थे । और चूंकि ऐसा हो नहीं रहा। होगा भी नहीं। तो क्या करप्शन या क्रोनी कैपटिलिज्म के कटघरे को ही देश का सिस्टम बना दिया गया है। और पहली बार मीडिया का मतलब सिर्फ मीडिया घराने नहीं बल्कि पत्रकारिता करते संपादक समूह भी अपाहिज सा हो चला है। या फिर देश में वातावरण ही 2014 के सत्ता परिवर्तन के बाद राजनीतिक शून्यता का कुछ ऐसा बना है कि जो सत्ता में है वह खुद को पूर्व तमाम सत्ता से अलग पेश कर राष्ट्रीय हित में सत्ता चलाने का दावा कर रहा है। सत्ता पार्टी या संवैधानिक संस्थाओं तक को खारिज कर मॉस कम्यूनिकेशन / सोशल मीडिया के जरीये जनता से सीधे संवाद कर इस एहसास को जनता के बीच जगा रही है जहॉ संस्थानों की जरुरत ही ना पड़े। और जनता की आवाज ही कानूनी जामा पहने हुये दिखायी दे। और मीडिया या उसमें काम कर रहे पत्रकारों को अगर ये लग भी रहा है कि सत्ता राष्ट्रीयता के नाम को ही भुना रही हैं तो भी उसकी आवाज नहीं निकल पा रही है क्योंकि या तो देश में कोई राजनीतिक विकल्प कुछ है ही नहीं । या फिर नैतिकता की जिस पीठ पर सवार हो कर सत्ता देश को हांक रही है उसमें बाजार व्यवस्था में लोकतंत्र के हर पाये ने बीते दौर में नैतिकता ही गंवा दी है तो वह कुछ बोले कैसे । ऐसे में लोकतंत्र मतलब ही यही है कि करप्शन देश का मुद्दा हो सकता है । करप्शन के नाम पर सत्ता पलट सकती है । जनता की भावनाओं को राजनीतिक दल अपने पक्ष में कर सकते है लेकिन जो भ्रष्ट हैं, वह सभी मिले हुये है । यानी एक सरीखे हैं। और लोकतंत्र का हर पाया भी दूसरे पाये की कमजोरियों को ढंकने के ही काम आता है । और लोकतंत्र की निगरानी रखने वाला मीडिया भी उसी कतार में जा खड़ा हुआ है। तो क्या 1996 के जैन हवाला के डायरी के पन्नों से निकली सियासत और मीडिया की बुलंद आवाज बीस बरस बाद 2016 में सहारा-बिरला के दस्तावेजों तले दफन हो चली है। यहां से आगे का रास्ता अब सिर्फ लोकतंत्र के राग को गाते हुये जयहिन्द बोलने भर का बचा है। ये सवाल है। मनाइये कि यह सवाल जवाब ना बन जाये। और इसके लिये 11 जनवरी 2017 का इंतजार करना होगा। क्योंकि इसी दिन सुप्रीम कोर्ट तय करेगा कि सहारा-बिरला वाले कागजात फर्जी है या जांच होनी चाहिये। लेकिन चाहे अनचाहे ये तो तय हो गया कि 2016 मीडिया के रेंगने के लिये याद किया जायेगा।

किन्हें नाज है मीडिया पर पार्ट-1

किन्हें नाज है मीडिया पर : पार्ट-2



Friday, December 23, 2016

मोदी जी नोटबंदी हो गई, लूटबंदी कब होगी ?

सत्ता में आने से पहले राजनीतिक लूट का जिक्र मोदी करते थे। और सत्ता जाने के बाद सियासत की आर्थिक लूट का जिक्र राहुल गांधी कर रहे हैं । तो आईये जरा देश के सच को परख लें कि आखिर लूट कहते किसे हैं और आजादी के बाद से 2014 तक जो घोटाले घपले किये उसकी कुल रकम 9 करोड10 लाख 6 हजार 3 सौ 23 करोड 43 लाख रुपये है । अगर डॉलर में समझें तो 21 मिलियन मिलियन डॉलर । यानी घोटाले दर घोटाले 1947 में आजादी के बाद से देश की राजनीतिक सत्ता के जरीये हुये । या फिर सत्ता की भागेदारी से । यानी लूट का सिलसिला थमेगा कैसे कोई नहीं जानता । और हर सत्ता के आते ही करप्शन । लूट का जिक्र ही सियासी बिसात पर वजीर का काम करने लगता है । और हमेशा जिक्र गरीब हिन्दुस्तान को चंद हथेलियों के आसरे लूट का ही होता है । तो क्या गरीब हिन्दुस्तान के नाम पर ही करप्शन होता है और करप्शन से लड़ने के ख्वाब देश के हर वोटर में भरे जाते हैं। जिससे सत्ता पलटे तो लूट का मौका उसके हाथ में आ जाये। ये सवाल इसलिये क्योंकि जब देश में इस सच का जिक्र सियासत करती है कि 80 करोड़ लोग दो जून की रोटी के लिये हर दिन संघर्ष कर रहे है । तो खामोशी इस बात पर बरती जाती है कि स्विस बैंक मे  1500 बिलियन डॉलर भारत के रईसों के ही जमा है । और ये रकम ब्लैक मनी है जिसे भारत के गरीबो से छुपायी गई है ।

विकिलिक्स की रिपोर्ट की मानें तो नेता, बड़े उघोगपति और नौकरशाहों की तिकड़ी की ही ब्लैक मनी दुनिया के बैंकों में जमा है । इसके अलावा सिनेमा के धंधे से लेकर सैक्स ट्रेड वर्कर और खेल के धंधेबाजों से लेकर हथियारो के कमीशनखोरो के कालेधन के जमा होने का जिक्र भी होता रहा है। तो क्या देश की लूट की रकम ही दुनिया के बैको में इतनी ज्यादा है कि दुनिया के बैको में जमा चीन, रुस, ब्रिटेन की ब्लैक मनी को मिला भी दिया जाये तो भारत की ब्लैक मनी कही ज्यादा बैठती है । और शायद इसीलिये पीएम बनने से पहले स्वीस बैक की रकम का जिक्र मोदी ने भी किया । और 15 लाख हर अकाउंट में जमा होने का जिक्र भी भाषण में किया । तो क्या लूट के इस सिलसिले को देखकर देश में बार बार कहा जाता है कि अंग्रेजों ने भारत को गुलाम बनाकर जितना नहीं लूटा उससे ज्यादा आजादी की खूशबू तले सत्ताधारियो ने देश को लूट लिया । और ये लूट का ही असर है कि आजादी के 70 बरस बाद भी 36 करोड़ लोग गरीबी की रेखा से नीचे हैं। देश में 6 करोड़ रजिस्टर्ड बेरोजगार है । सिंचाई सिर्फ 23 फिसदी खेती की जमीन तक पहुंच पायी है । उच्च शिक्षा महज साढे चार फिसदी को ही नसीब हो पाती है । और हेल्थ सर्विस यानी अस्पताल महज 12 फीसदी तक ही पहुंचा । तो हर जहन में ये सवाल उठ सकता है कि एक तरफ लूट की इक्नामी में भारत अव्वल नंबर पर है और दूसरी तरफ गरीबी भुखमरी में भी भारत अव्वल नंबर पर है ।

तो क्या देश के बजट में जो बेसिक इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिये 1947 से अब तक खर्च होना चाहिये था वह हुआ ही नहीं । और अगर नहीं हुआ तो क्या बजट तक का पैसा लूट लिया गया । ये सवाल इसलिये क्योकि 1950 से 67 तक जीडीपी का 4.4 फिसदी इन्फ्रास्ट्रक्चर पर खर्च हुआ । 1967 से 84 तक जीडीपी का 4.1 फिसदी इन्फ्रास्ट्रक्चर पर खर्च हुआ । 1984-91 तक जीडीपी का 5.9 फिसदी इन्फ्रास्ट्रक्चर पर खर्च हुआ । 1991--2010 तक जीडीपी का 4.5 फिसदी इन्फ्रास्ट्रक्चर पर खर्च हुआ यानी सिलसिलेवार तरीके से समझे तो 1947-48 वाले नेहरु के पहले 171 करोड के बजट में भी खाना-पानी-घर की जरुरत का जिक्र था और -2016-17 के मोदी के बजट में भी गरीबों की न्यूनतम जरुरतों पर ही समूचा बजट केन्द्रित कर बताने की कोशिश हुई । तो क्या जो काम देश में इन्फ्रास्ट्रक्चर के नाम पर होना चाहिये वह हुआ ही नहीं । या फिर जितना बजट बनाया गया उस बजट की लूट भी नेता-उघोगपति-नौकरशाह की तिकडी तले होती रही । यानी सिस्टम ही लूट का कुछ इस तरह बनाया गया कि लूट ही सिस्टम हो गया । यानी लूट होती क्या है ये बीपीएल के लिये मनरेगा और मिड-डे मिल की लूट से भी समझा जा सकता है और प्राइवेट क्षेत्र में शिक्षा के जरीये देश के शिक्षा बजट से दो सौ गुना से ज्यादा की कमाई से भी जा ना जा सकता है । और हर बरस खेती या सिंचाई के इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिये बडट की रकम जोडकर भी समझा जा सकता है । जिसे किसानों में ही बांट दिया जाता तो देश की खती की समूची जमीन पर सिचाई का इन्फ्रास्ट्रक्चर काम कर रहा होता । तो क्या देश में इक्नामिक व्यवस्था ही चंद हाथों के लिये चंध हाथों में सिमटी हुई है । क्योंकि जरा इस आंकडे को समझे। रियालंस इंडस्ट्री ( ₹ 3,25,828 करोड़ ) , टीसीएस ( ₹ 5,10,209 करोड़) , सन फार्मा ( ₹2,09,594 करोड़ ), एल एंड टी ( ₹1,69,558 करोड़ ) , अडानी ग्रुप ( ₹1,45,323 करोड़ ) यानी ये सवा लाख करोड से लेकर पांच लाख करोड से ज्यादा का टर्नओवर वाली भारत की ये टापमोस्ट पांच कंपनियां हैं । जाहिर है इन कंपनियों के टर्नओवर देखते वक्त कोई भी सोच सकता है कि इनकी सालाना आय करोडों में ही होगी । ज्यादा भी हो सकती है । और इसी अक्स में जब नेताओं की संपत्ति के बढ़ने की रफ्तार कोई देखे तो कह सकता है कि भारत तो बेहद रईस देश है। क्योंकि भारत जैसे गरीब देश मायावती के पास 2003 में महज 1 करोड संपत्ति थी । जो 2013 में बढ़कर 111 करोड़ हो गई । तो वित्त मंत्री की संपत्ति की रफ्तार तीन बरस में 80 करोज बढ़ गई और अमर सिंह की संपत्ति तो दो बरस में 37 करोड बढ़ गई । तो क्या भारत वाकई इतना रईस देश हो चुका है कि एक तरफ सरकार दावा करे कि प्रति व्यक्ति आय हन जल्द ही एक लाख रुपये कर देंगे। और मौजूदा वक्त में बीते एक बरस में देश में प्रति व्यक्ति आय की रफ्तार में 8 हजार रुपये की बढोतरी भी हो गई । और इसी दौर में बीपीएल परिवारों की लकीर प्रतिदिन 27 रुपये और 35 रुपये की बहस में ही जब अटकी रही । यानी जब देश में एक तरफ 40 करोड लोग सालाना 10 हजार रुपये से कम पाते हो । और दूसरी तरफ प्रति व्यक्ति आय सालाना 93,293 हजार रुपये आते हो । तो समझ लेना चाहिये कि देश में असमानता की खाई है कितनी चौडी । और जब देश में प्रधानमंत्री मोदी ने समाजवाद का सपना नोटबंदी के जरीये जगा ही दिया है । तो इस सोच के तहत क्या लोकतंत्र का मतलब सिर्फ हर व्यक्ति को एक बराबर एक वोट मान लिया जाना चाहिये । यानी एक तरफ देश का बजट । देश की नीतियां ही जब पूंजी से पूंजी बनाने के खेल में जा फंसी हो और सत्ता ङर किसी के बराबर वोट के नाम पर मिलती हो तो क्या नीतियो से लेकर व्यवस्था परिवर्तन की जरुरत नहीं है । क्योंकि जब राहुल कहते है -एक फीसदी के पास देश की 50 फीसदी संपत्ति है । तो वह गलत नहीं कहते । क्योंकि साल 2000 में देश के एक फीसदी अमीर लोगों के पास देश की 36.5 फीसदी संपत्ति थी,जो अब करीब 53 फीसदी हो चुकी है । लेकिन सवाल है कि इस असमानता को दूर करने की किसी ने सोची क्यों नहीं । और देश में जब हर बरस होने वाले चुनाव के जरीये ही अपनी नीतियो की हार-जीत सत्ता -विपक्ष आंकता है तो फिर वोट की ताकत भी गरीबों की ज्यादा क्यो नहीं हो जानी चाहिये। जिससे कंधे पर ढोते बीबी के शव। कंधे पर इलाज न मिलने पर दम तोड़ता बेटा । और नोटबंदी के दौर में कतारों में खड़े खडे मौत आ जाना। और सत्ता का उफ तक ना कहना। संकटकाल की आहट तो है ।

Wednesday, December 21, 2016

करप्शन की गंगोत्री राजनीति से निकलती है, अब तो मान लीजिए..

हफ्ते भर पहले ही चुनाव आयोग ने देश में रजिस्टर्ड राजनीतिक दलों की सूचीजारी की। जिसमें 7 राष्ट्रीय राजनीतिक दल और 58 क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का जिक्र है। लेकिन महत्वपूर्ण वो सूची है, जो राजनीतिक तौर पर जिस्टर्ड तो हो चुकी है और राजनीतिक दल के तौर पर रजिस्टर्ड कराने के बाद इस सूची में हर राजनीतिक दल को वह सारे लाभ मिलते है जो टैक्स में छूट से लेकर। देसी और विदेशी चंदे को ले सकते हैं। बीस हजार से कम चंदा लेने पर किसी को बताना भी नहीं होता कि चंदा देने वाला कौन है। और इस फेहरिस्त में अब जब ये खबर आई कि चुनाव आयोग 200 राजनीतिक दलों को अपनी सूची से बाहर कर रहा है। सीबीडीटी को पत्र लिख रहा है। क्योंकि ये पार्टियां मनीलान्ड्रिंग में लगी रहीं। तो समझना ये भी होगा कि चुनाव आयोग की इस फेहरिस्त में सिर्फ दो सौ या चार सौ राजनीतिक दल रजिस्टर्ड नहीं है जिन्होंने चुनाव नही लड़ा और सिर्फ कागज पर मौजूद है। बल्कि ऐसे राजनीतिक दलों की फेहरिस्त 13 दिसंबर यानी पिछले हफ्ते तक 1786 राजनीतिक दलों की थी। और इन राजनीतिक दलो की फेहरिस्त में इक्का दुक्का या महज दो सौ राजनीतिक दल नहीं है जो टैक्स रिटर्न तक फाइल नहीं करतीं। बल्कि चुनाव आयोग सूत्रों के मुताबिक एक हजार से ज्यादा रजिस्टर्ड राजनीतिक दल इनकम टैक्स रिटर्न फाइल नहीं करती। तो इस फेरहिस्त को देखकर कोई भी सवाल कर सकता है कि क्या राजनीतिक दल कालाधन खपाने के लिये बनाये जाते हैं। क्या चुनाव लड़ने वाली राजनीतिक पार्टियां अपने काले चंदे को खपाने के लिये भी पार्टियां बनाती है। क्योंकि चुनाव आयोग आर्टिकल 324 के तहत चुनावी प्रक्रिया पर कन्ट्रोल तो कर सकता है।

लेकिन चुनाव आयोग किसी राजनीतिक दल को अपने तौर पर हटा नहीं सकता। तो क्या जिन 200 राजनीतिक दलों के रजिस्ट्रेशन रद्द करने का जिक्र चुनाव आयोग अब कर रहा है उसके लिये  सीबीडीटी जांच जरुरी है। यानी राजनीति पाक साफ हो । इसके लिये पहल सरकार को ही करनी होगी। क्योंकि कायदे कानून अगर कड़े होंगे। राजनीतिक दलों के खिलाफ आरोप साबित होने पर कानून अपना काम करते हुये दिखे। जांच एजेंसियां स्वतंत्रता के साथ काम करने लगे। तो फिर चुनाव आयोग से राजनीति को पाक साफ करने की गुहार पीएम को भी करने की जरुरत पडेगी नहीं । क्योकि कानून सरकार को बनाना है। लागू जांच एंजोसियों को करना है। समझना होगा कि चुनाव आयोग सिर्फ पार्टियों को रजिस्टर्ड कर सकती हैं। रद्द करने का अधिकार उसके पास नहीं है। तो बड़ा सवाल यहीं से शुरु होता है कि क्या देश में भ्रष्टाचार की गंगोत्री राजनीतिक दल बनने के साथ ही शुरु होती है। तो आईये इसे भी परख लें। क्योंकि राजनीति का सच तो यही है कि कॉरपोरेट,कालाधन और दागियों ने भारतीय राजनीति को बंधक बना लिया है। या कहें कि भारतीय राजनीति की दशा-दिशा उसी कॉरपोरेट की मर्जी से तय होती है, जिसे विपक्ष में रहते हुए हर दल निशाने पर लेता है और सत्ता में आते ही खामोश हो जाता है । और सत्ता खिसक जाये तो सत्ता के करप्शन पर सीधे अंगुली उठती है ।यानी कालाधन इस राजनीति को वो ऑक्सीजन देता है,जो ईमानदारी के पैसे से मुमकिन ही नहीं। और दागी वो औजार हैं, जो संसदीय राजनीति की तमाम कमियों को ढाल बनाकर राजनीति के मायने ही बदल देते हैं। तो क्या ये इसलिए है क्योंकि देश की नीतियां कॉरपोरेट तय करता है। और कॉरपोरेट इसलिए तय करता है क्योंकि बीते 12 बरस में हुये तीन लोकसभा चुनाव में 2355 करोड़ रुपये कारपोरेट ने चंदे के तौर पर दिये। और कारपोरेट को टैक्स में छूट के तौर पर 40 लाख करोड़ से ज्यादा राजनीति सत्ता ने दिये ।

इसी तरह -बीते 10 बरस में विधानसभा चुनावो में कारपोरेट ने 3368 करोड टैक्स के तौर पर दिये। राज्यों ने कारपोरेट को योजनाओं के जरीये 50 लाख करोड़ से ज्यादा का लाभ दे दिया। तो राजनीति करप्ट है या देश में विकास के नाम पर जो भी काम कोई उघोगपति या कारपोरेट करना चाहता है मुनाफे के लिये उसे राजनीतिक सत्ता का आसरा लेना ही होता है। तो क्या राजनीतिक दल अगर करप्ट ना हो तो देश में विकास या इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर जितना खनिज संसाधन लुटाया जाता है वह सही मायने में देश को विकसित कर दें। यह सवाल इसलिये क्योंकि जब कैशलेस देश का जिक्र हो रहा है तो बीते दस बरस में 10 बरस में राष्ट्रीय राजनीतिक दलों ने 1039 करोड रुपये कैश में चंदे के तौर पर लिये। क्षेत्रीय पार्टियों ने 2107 करोड रुपये कैश में चंदे के तौर लिये। और असर इसी का है कि एनपीए यानी डुबा हुआ कर्ज लगातार बढ़ रहा है और मनमोहन सिंह के बाद प्रधानमंत्री मोदी के सत्ता में आने के बाद भी थमा नहीं है। आंकड़े बताते हैं कि 2014-15 में बैंकों का एनपीए 5.43 फीसदी था, जो अब बढ़कर 9.92 फीसदी हो चुका है। हद तो ये कि हाल में सरकार ने शीर्ष 100 विलफुट डिफाल्टरों में से 60 से अधिक पर बकाया 7,016 करोड़ रुपए के लोन को डूबा हुआ मान लिया । और अब विपक्ष में रहते हुए इस मुद्दे को अगर कांग्रेस उठा रही है, तो कांग्रेस का सच ये है कि कांग्रेस के कार्यकाल
में करीब 1 लाख करोड़ का कॉरपोरेट कर्ज माफ किया गया था । और कॉरपोरेट या बड़े उद्योगपतियों को सरकार की छाया का लाभ कैसे मिलता है-इसका पता इस बात से भी लग सकता है कि कालेधन पर विदेशी बैंकों के 627 खाताधारकों में इक्का दुक्का को छोड़कर आज तक सबके नाम सामने नहीं आए। और नाम सामने आने चाहिये इसके लिये अब राहुल गांधी कहते है नाम क्यों नहीं बताते और जब मनमोहन सिंह की सत्ता थी तो बीजेपी पूछती थी मनमोहन सिंह नाम क्यों नहीं बताते। तो राजनीतिक भ्रष्टाचार के सामने कैसे हर भ्रष्टाचार छोटा है ये अमेरिकी की नामी सर्वे कंपनी आईपीएसओएस के सर्वे में सामने आ गया तो दुनिया के 25 देशो के सामने मुख्य मुद्दा हो, कौन सा इसे लेकर किया गया ।भारत में नोटबंदी से एन पहले 25 अक्टूबर से 4 नवंबर तक जो सर्वे किया गया। उसमें सामने यही आया कि अमेरिका के सामने सबसे बडा मुद्दा आतंकवाद का है। रुस के सामने सबसे बडा मुद्दा गरीबी और समाजिक असमानता है। चीन के सामने सबसे बडा मुद्दा पर्यावरण का है। फ्रांस के सामने सबसे बड़ा मुद्दा रोजगार का है। लेकिन भारत के सामने सबसे बडा मुद्दा वित्तीय और राजनीतिक करप्शन है। और इस सर्वे में ये साफ तौर पर उभरा कि भारत के लोग आंतक, गरीबी,हेल्थ, शिक्षा या फिर अपराध से भी उपर पॉलिटिकल करप्शन को ही महत्वपूर्ण मानते हैं। सर्वे के मुताबिक 46 फिसदी लोगों की राय है कि पॉलिटिकल करप्शन ना हो तो हर हालात ठीक हो सकते हैं। तो क्या ये भी कहा जा सकता है कि राजनीति से बडा सांगठनिक अपराध और कोई नहीं है। या फिर राजनीतिक पार्टी का ठप्पा लगते ही कानून-व्यवस्था कोई मायने नहीं रखता। या राजनीति से बड़ा रोजगार और कोई नहीं है। क्योंकि मोदी सरकार ही जिस
कैशलेस व्यवस्था की दिशा में देश को ले जाना चाह रही है उसमें कोई राजनीतिक दल कहने को तैयार नहीं है कि अब कैश से एक पैसा भी चंदा नहीं लिया जायेगा और चंदा देने वाले को राजनीतिक सत्ता कोई लाभ नहीं देगी ।

Wednesday, December 14, 2016

तो क्या 30 दिसंबर को देश अफसल साबित होगा ?

सवाल ना तो किसी चौराहे का है ना ही पीएम के वचन का। सवाल है कि आखिर 30 दिसंबर के बाद देश के सामने रास्ता होगा क्या। क्योंकि इन्फ्रास्ट्रक्चर जादू की छड़ी से बनता नहीं है। और नोट छापने से लेकर कैशलेस देश की जो परिभाषा बीते 36 दिनो से गढ़ी जा रही है, उसके भीतर का सच यही है कि मनरेगा से लेकर देशभर के दिहाड़ी मजदूर जिनकी तादाद 27 करोड पार की है उनकी हथेली खाली है। पेट खाली हो चला है। तीन करोड़ से ज्यादा छात्र जो घर छोड़ हॉस्टल या शहरों में कमरे लेकर पढ़ाई करते है उनकी जिन्दगी किताब छोड़ बैंक की कतारों में जा सिमटी है। मिड-डे मील की खिचड़ी भी अब गाव दर गांव कम हो रही है। और दुनिया में सबसे ज्यादा भूखे भारत की तादाद जो 19 करोड़ की है । अब इस कतार में 11 करोड़ से ज्यादा लोगों की तादाद शामिल हो चुकी है। गुरुद्वारों के लंगर में बीते 35 दिनो में तीस फीसदी का इजाफा हो चुका है । यानी आगरा मे गजक बनाने वाला हों या गया के तिलकुट बनाने वाले या फिर कानपुर में चमडे का काम हो या सोलापुर या सूरत में सूती कपडे का काम । ठप हर काम पड़ा है। पं बंगाल समेत नार्थ इस्ट में जूट का छिटपुट काम भी
ठप है और असम के चाय बगानो से मजदूरो से पहले अब ठेकेदार और बगान मालिकही मजदूरों को भुगतान के डर से भाग रहे हैं। तो सवाल ये नहीं है कि 30 दिसंबर के बाद क्या कोई जादू की छड़ी काम करने लगेगी। सवाल ये है कि जिस स्थिति में देश नोटबंदी के बाद आ खड़ा हो गया है, उसमें अब रास्ता है कौन सा। क्योंकि नोटो की मांग पूरी ना कर पाने के हालात कैशलेस का राग जप रहे हैं। तो दूसरी तरफ 65 फिसदी हिन्दुस्तान में मोबाईल-इंटरनेट-बिजली संकट है तो कैशलेस कैसे होगा। और एक कतार में हर नेता के निशाने पर प्रधानमंत्री मोदी का नोटबंदी का निर्णय है लेकिन रास्ता किसी के पास नहीं है। और ये कोई अब समझने को तैयार नहीं है कि 30 दिसंबर के बाद पीएम नहीं देश भी फेल होगा। लेकिन राजनीतिक बिसात आरोपों की है तो निर्णय भी अब घोटाले के अक्स में देखा जा रहा है। तो वाकई हालात बिगड़े हैं। या बिगड रहे हैं।

तो कोई भी कह सकता है तब 30 दिसंबर के बाद रास्ता होना क्या चाहिये। क्योंकि सवाल ना तो देश के सब्र में रहने का है ना ही एक निर्णय के असफल होने का। सवाल है कि अब निर्णय कोई भी सरकार क्या लेगी। क्योंकि नोटों के छपने का इंतजार रास्ता नहीं है। कैशलेस होने के लिये इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने तक के वक्त का इंतजार रास्ता नहीं है। बैंकिंग सर्विस के जरिये आमजन तक रोटी की व्यवस्था कराने की सोच संभव नहीं है। -लोगों की न्यूनतम जरुरतों को सरकार हाथ में ले नहीं सकती। शहरी गरीबो के लिये सरकार के पास काम नहीं है। और फैसले पर यू टर्न तो लिया ही नहीं जा सकता। अन्यथा पूरी इकनॉमी ही ध्वस्त हो जायेगी। तो क्या पहली बार देश उस मुहाने की तरफ जा रहा है जहा आने वाले वक्त में राजनीतिक सत्ता को ही बांधने की व्यवस्था राजनीतिक और संवैधानिक तौर पर कैसे हो अब बहस इसपर शुरु होगी। क्योंकि चुनावों की जीत-हार से कहीं आगे के हालात में देश फंस रहा है और असमंजस के हालात किसी भी देश को आगे नही ले जाते इसे तो हर कोई जानता समझता है। तो दो हालातों को समझना जरुरी है। पहला ढहती भारतीय व्यवस्था। दूसरी ढहती व्यवस्था के अक्स पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों को जनता की राय मान ली जाये। तो दोनों स्थिति त्रासदीदायक है क्योंकि एक तरफ जिस मनरेगा के आसरे देश के साढ पांच करोड़ परिवारों के पेट भरने की व्यवस्था 15 बरस पहले हुई उसका मौजूदा सच यही है कि नोटबंदी ने मनरेगा मजदूरों की रीढ़ तोड़ दी है। आलम ये है कि मनरेगा के तहत अक्टूबर के मुकाबले नवंबर में 23 फीसदी रोजगार घट गया।

और पिछले साल नवंबर की तुलना में तो इस बार मनरेगा में 55 फिसदी रोजगार कम रहा। और ये हाल अभी का है और इससे पहले का मनरेगा का सच ये था कि वित्तीय साल 2015-16 में कुल 5.35 करोड़ परिवारों ने मनरेगा के तहत रोजगार की मांग की लेकिन केवल 4.82 करोड़ परिवारों को ही रोजगार दिया जा सका यानी 9.9 फीसद परिवारों को मांग के बावजूद रोजगार नहीं हासिल हुआ। और ये रोजगार भी सिर्फ 100 दिन के लिए था । और अब हालात और बिगड़े हैं क्योंकि पैसा नहीं है। तो दो सवाल सीधे हैं कि देश के करोडो मजदूरों के पास अगर काम ही नहीं होगा तो वो जाएंगे कहां ? और अगर काम बिना खाली पेट सरीखे हालात बने तो क्या आने वाले दिनों में अराजकता का माहौल नहीं बनेगा? जवाब कम से कम सरकार के पास नहीं है अलबत्ता इंतजार चुनाव का ही हर कोई करने लगा है। क्योंकि देश चौराहे पर तो खड़ा है। एक तरफ नोटबंदी पर ईमानदारी के दावे । दूसरी तरफ नोटबंदी से परेशान कतार में खडा देश । तीसरी तरफ संसद के भीतर बाहर घोटाले की तर्ज
पर नोटबंदी को देखने मानने पर हंगामा। और चौथी तरफ पांच राज्यों के विधानसभा की उल्टी गिनती। और अब सवाल ये कि क्या यूपी, उत्तराखंड, पंजाब , गोवा और मणिपुर में चुनाव मोदी के नोटबंदी के फैसले पर ही हो जायेगा। क्योंकि हालात बताते हैं कि खरगोश से भी तेज रफ्तार से देश चल पड़े तो भी अप्रैल बीत जायेगा। और चुनाव आयोग संकेत दे रहा है कि चुनाव फरवरी में ही निपट जायेंगे। तो क्या प्रधानमंत्री मोदी का सबसे बडा जुआ या कहें दांव पर ही देश चुनाव में फैसला करेगा। यानी ईमानदारी का राग सही या गलत । भ्रष्टाचार राजनीति का ही पालापोसा बच्चा है या नहीं। नोटबंदी से क्रोनी कैपटिलिज्म की जमीन खत्म हो जायेगी या नहीं। नोट बदलने से ब्लैक-मनी खत्म हो जायेगी या नहीं। या फिर चुनाव की हार जीत से गरीब देश फिर हार जायेगा। यानी पहली बार देश की इकनॉमी से राजनीतिक खिलवाड़ हो रहा है और आज संसद तो कल विधानसभा चुनाव इसकी बिसात के प्यादा साबित होंगे। और परेशान देश में जीत उसी राजनीति की होगी जिसने देश को खोखला भी बनाया और खोखले देश को ईमानदारी से भरने का राग भी अलापा।

Tuesday, December 13, 2016

पहले सिस्टम करप्ट था अब करप्शन ही सिस्टम तो नहीं हो चला ?

वेल्लूर 24 करोड़ तो दिल्ली 15 करोड़ 65 लाख। चेन्नई 10 करोड़ तो चित्रदुर्ग 5 करोड़ 70 लाख। गोवा डेढ़ करोड़ और उसके बाद मुंबई से लेकर कोलकाता और जयपुर से लेकर पुणे तक और गाजियाबाद से लेकर गपडगांव यानी गुरुग्राम तक लाखों के नये नोट जब्त किये गये हैं। और देश के सिर्फ 16 हीनहीं बल्कि 32 जगहों से जो अवैध नये नोटों को पकड़ने का सिलसिला जारी है या कहे 500 और 2000 के नये नोट निकल कर सामने आये हैं, उसमें सवाल यही बड़ा है कि पकड़ने वालों की पीठ थपथपायी जाये या फिर नोट पहुंचाने वालों को सजा दी जाये। संयोग से जिन्होने नोट पहुंचाये और जिन्होंने नोट पकड़े दोनों ही सरकारी मुलाजिम हैं। या कहें उसी सिस्टम का हिस्सा है जिस सिस्टम पर भरोसा कर देश को कैशलेस बनाकर बैकिंग सर्विस से जोडकर करप्शन मुक्त या कालाधन मुक्त होने का सपना देखा दिखाया जा रहा है। तो क्या ये वाकई सपना है। क्योंकि नोटबंदी से पहले जो सिस्टम था वही करप्ट था और नोटबंदी केबाद जिस साफ सिस्टम की वकालत की जा रही है उसी में करप्शन है और बैंकिंग  सर्विस में भ्रष्टाचार है, इसे पीएमओ भी अगर मान रहा है और उसे स्टिंग करानेकी जरुरत पड़ रही है तो देश के तीन सच से आंखे किसी को नहीं मूंदनी चाहिये।

पहला, सिस्टम ठीक तभी होगा जब देश में इन्फ्रास्ट्रक्चर होगा। दूसरा, इन्फ्रास्ट्रक्चर तभी होगा जब जनता सिस्टम का हिस्सा होगी। तीसरा, जनता सिस्टम में शामिल तभी होगी जब सत्ता जनता के बीच होगी। और ध्यान दें तो अभी तक सत्ता का मिजाज जनता को सरकार के रहमोकरम पर रखने वाला है। यानी देश का किसान मानामाल नहीं हो सकता। देश का मजदूर दो जून के लिये भटकना छोड़ नहीं सकता। 70 करोड़ की आबादी के लिये सरकार के पास सिर्फ मदद या राहत पैकेज है जिसे वही सरकारी कर्मचारी या संस्थान पहुंचाते है, जो करप्ट है। तो फिर नोटबंदी के बाद सिस्टम का दायरा जब बैंकिंग सर्विस और तकनीक पर आ टिका है और नोटों के उत्पादन से ज्यादा नोटों की मांग है तो फिर सिस्टम को और ज्यादा करप्ट होने से कौन सा सिस्टम रोक पायेगा। क्योंकि नोटबंदी से पहले सिस्टम करप्ट था। नोटबंदी के बाद करप्शन ही सिस्टम हो रहा है। क्योंकि देश के एक लाख तीस हजार बैंक शाखाओं में से पांच सौ बैंकों में स्टिंग और किसी ने नहीं पीएमओ ने कराया। और खबर आ गई कि जहां जहां स्टिंग हुआ वहां वहां गड़बड़ी हुई है। तो अब उन्हें बख्शा नहीं जायेगा। यानी जो भ्रष्टाचार होना नहीं चाहिये था, वह भ्रष्टाचार देश की सफाई के लिये उठाये गये सबसे बडे कदम के दौर में वही बैक कर रहा है, जिस बैंकिंग सर्विस पर सरकार को भरोसा है कि आने वाले वक्त में यही तरीका देश को बचा सकता है । यानी भ्रष्टाचार खत्म कैसे हो इसका उपाय किसी के पास नहीं। तो क्या देश स्टिंग आपरेशन के आसरे चल सकता है। ये सवाल कल भी था और आज भी है। कल केजरीवाल के लिये ये हथकंडा था और प्रधानमंत्री मोदी के लिये।

तो ये मान भी लिया जाये कि हर जगह कैमरा लगा होगा । हर जगह पर सीधे सत्ता नजर रखेगी । यानी कोई भ्रष्ट ना हो या बैक इस तरह कैश ना बांटे जैसा स्टिंग ऑपरेशन में नजर आया होगा । तो अगला सवाल है कि कैशलेस करप्शन पर रोक के लिये कौन सा स्टिंग होगा । क्योंकि जनता का ही बैंकों में जमा रुपया कारपोरेट को बांटा गया। जो कैश नहीं चैक या खातों में ट्रांसफऱ कर दिखाया जाता है और उसी कड़ी में नॉन परफोर्मिंग एसेट यानी एनपीए की राशि बीते 10 बरस में 10 लाख करोड़ से ज्यादा की हो चुकी है। तो क्या जिन बैंक मैनेजरों ने जिन राजनेताओं के कहने पर जिन कारपोरेट को करोड़ों रुपया कर्ज दिया । और जो कारपोरेट जिन राजनेताओ के कंघे पर सवार होकर बैंकों को कर्ज की रकम नहीं लौटा रहे हैं, क्या वह करप्शन नहीं है। और है तो उसके लिये कौन सा कानून किस तरह देश में काम कर रहा है। यानी मौजूदा वक्त में भी करीब सवा लाख बैंकों में क्या हो रहा है-इसका सरकार को कुछ पता नहीं या कहें कि सरकार चाहकर भी कुछ कर नहीं सकती। और अगर सरकार ये सोच रही है कि आने वाले वक्त में बैकिंग सर्विस के दायरे में समूचा दगेश होगा और बैकिंग सर्विस पर निगरानी रखकर उक्नामी के करप्शन को खत्म किया जा सकता है। तो ये नजरिया कब कैसे पूरा होगा कोई नही जानता। क्योंकि फिलहाल 97 बैंकों की 1लाख 30 हजार शाखायें देश भर में हैं और 10 बरस पहले यानी 2005 में 284 बैंकों की 70373 शाखायें देश भर में थीं। यानी दस बरस में करीब दुगनी शाखायें देश भर में खुलीं। लेकिन देश का सच यही है कि 93 फिसदी ग्रामीण भारत में बैंक है ही नहीं । शहरो में प्रति बैक शाखा औसतन 10 हजार लोग हैं। और मौजूदा वक्त में प्रतिदिन नोट बांटने की कैपिसिटी प्रति शाखा सिर्फ 500 लोग है। यानी मौजूदा सिस्टम को ही पटरी पर लाने के लिये जो इन्फ्रास्ट्रक्चर चाहिये उसमें कई गुना सुधार की जरुरकत है। और ये जरुरत कितने दिनों में कैसे पूरी होगी कोई नहीं जानता।

तो अगला सवाल ये हो सकता है कि क्या स्टिंग ऑपरेशन सिर्फ ये बताने के लिये है कि सरकार काम कर रही है । क्योंकि सरकार को बखूबी मालूम है कि उसके पास वक्त सिर्फ 30 दिसंबर तक का है,क्योंकि फिर दांव पर प्रधानमंत्री मोदी का वचन होगा। ऐसे में अगर पीएम मोदी संसद में कहेंगे तो क्या कहेंगे और अगर राहुल गांधी ही संसद में कहेंगे तो क्या कहेंगे। जाहिर है बैकिंग सर्विस,तकनालाजी और कैशलेस पेमेंट के जरीये कालेधन, भ्रष्टाचार पर नकेल से आगे पीएम क्या कह सकते हैं। और राहुल गांधी नये हालातो में इन्ही सब से पैदा हुये मुश्किल हालात से आगे क्या कहेगें। यूं जब रैलियो में पीएम के तेवर के अक्स में संसद में मोदी के कहने के इंतजार करें तो मोदी सीधे देश के बिगडे हालात के लिये नेहरु गांधी परिवार को कटघरे में खडा कर सकते हैं। भ्रष्टाचार और कालेधन को आश्रय देने वाली व्यवस्था के लिये गांधी परिवार को सबसे भ्रष्ट बता सकते हैं। वहीं दूसरी तरफ राहुल गांधी मुश्किल हालात में प्रदानमंत्री मोदी को नीरो करार दे सकते हैं। जो देश के जलने पर ईमानदारी की बांसुरी बजा रहे हैं । क्योंकि देश के राजनेताओ की भाषा तो फिलहाल यही हो चली है । लेकिन सवाल यह भी है कि संसद में क्या कोई नेता ये कहने की हिम्मत दिखा   गा कि संसद ही जिस जमीन पर खड़ी है और उसमें बैठकर देश के नाम संबोधन का जो जुमला हर राजनीतिक दल गढ रहा है क्या उस जमीन से जमता का वाकई कुछ लेना देना है । यानी सवाल सिर्फ प्रदानमंत्री मोदी या राहुल गांधी भर का नहीं है । सवाल है कि बीते 34 दिनो में क्या किसे ने इमानदारी से संसद में बताया कि उनकी राजनीतिक पार्टी चलती कैसे है । कारपोरेट को अरबो रुपये की टैक्स रियायत क्यो दी जाती है । और गरीबो के लिये सिर्फ सरकारी पैकेज ही क्यों चलता -दौडता है ।यानी जिस कालेधन और भ्रष्टाचार की खोज नोटबंदी के बाद कतारो में खडे लोगो के मुशकिलो में टटोला जा रहा है उसके भीतर का सच यही है कि राजनीतिक व्यवस्था ने खुद को जनता के प्रति जिम्मेदार माना ही नहीं है । कारपोरेट या निजी पूंजी की इक्नामी का इन्फ्रास्ट्रक्रचर ही देश चला रहा है । सत्ता पूंजी के आसरे व्यवस्था चलाती है ना कि मानव-संसाधन के आसरे । यानी भ्रष्टाचार कौन करता है ये बताने के लिये किसी सिस्टम की जरुर नहीं है और कालाधन किसके पास है ये जानने के लिये बैंकिंग सर्विस की जरुरत भी नहीं है । जरुरत सिर्फ इस सच के साथ खड़े होने की है कि कानून और संवैधानिक संस्धान अपनी जगह अपना काम करे  । जो है नहीं तो करप्शन ही सिस्टम कैसे हो जाता है ये कहां किसी से छुपा है ।