Tuesday, September 1, 2015

संघ-सरकार की बैठक में कौन मोदी को सच बतायेगा?

सवा बरस में पहला मौका होगा जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी संघ परिवार को सरकार की नीतियों के बारे में समझायेंगे, जिसे लेकर स्वयं सेवकों की एक जमात रुठी हुई है। और रुठी हुई यह जमात सिर्फ सरकार के कामकाज से ही नहीं बल्कि अपने उन वरिष्ठ स्वसंयेवकों से भी गुस्से में है जो मोदी सरकार की नीतियों पर खामोशी बरतकर संघ परिवार के भीतर यह संदेश दे रही है कि उनके सामने दूसरा कोई विकल्प नहीं है। तो 2 सितबंर की बैठक का मतलब होगा क्या । क्या पहली बार प्रधानमंत्री मोदी संघ परिवार को यह समझायेंगे कि सरकार की नीतियों के प्रचार प्रसार के लिये स्वयंसेवकों को भी जुटना होगा या फिर संघ के चालीस से ज्यादा संगठनो के प्रतिनिधि पहली बार सरकार को बतायेंगे कि सरकारी नीतियों उस जनमानस के खिलाफ जा रही है जिसके बीच वह काम करते हैं । ऐसे में रास्ता बीच का निकालना होगा। और मोदी कहेंगे कि बीच का रास्ता तो अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौर में निकालने की कोशिश हुई थी लेकिन उसके बाद ना तो बीजेपी के हाथ में कुछ बचा औरल संघ की हथेली भी ली ही रही । यूं सामान्य तौर पर स्वयंसेवकों में तल्खी होती नहीं है और नीतियों को लेकर कोई निर्णय इसलिये भी नहीं जाते जिससे लगे कि सरकार या संघ परिवार के सामने कोई अल्टीमेटम है। लेकिन सच यह भी है कि पहली बार प्रधानमंत्री मोदी भी इस सच को समझ रहे है कि विकास का जो खाका उन्होंने भूमि अधिग्रहण के जरिये खींचना चाहा उसपर संघ परिवार ने भी कभी कोई सहमति जतायी नहीं। यानी चाहे अनचाहे लगातार विकासपुरुष की जो छवि मोदी अपने लिये गढकर हिन्दुत्व के एजेंडे को हाशिये पर ले जाना चाहते रहे उसमें वह सफल हो नहीं पाये।

क्योंकि विकास की थ्योरी दुबारा 2013 के भूमि अधिग्रहण की उस फिलासफी तले आकर खडी हो गयी जहा दुनिया भर के निवेशक यह सवाल उठाये कि भारत में निवेश के रास्ते अभी भी किसानमजदूर के पेट की जरुरतो पर आ टिके है। जाहिर है भारत में आर्थिक सुधार का जो चेहरा मोदी लगातार दुनिया के सामने परोस रहे है वह विपक्ष की राजनीति तो दूर स्वयंसेवकों के सरोकार से ही टकरा कर टूटने लगता है। फिर भी मोदी का कोई विकल्प संघ परिवार के सामने नहीं है तो रास्ता होगा क्या और बनेगा क्या। यह सवाल अगले तीन दिनों की बैठक में कैसे उभरेगा इसी पर हर किसी की नजर है क्योंकि जिस तर्ज पर मौजूदा सामाजिक-राजनीतिक हालात बन रहे है उसमें एक बड़ा सवाल यह भी हो चला है कि संघ परिवार की भूमिका किसी भी राजनीतिक सत्ता को लेकर होनी क्या चाहिये । संघ को सामाजिक शुद्दिकरण की तरफ बढ़ना चाहिये या फिर सत्ता
की मदद से अपने सतही विस्तार को देखना चाहिये। मसलन दिल्ली में हिन्दुत्व के प्रचार प्रसार के लिये सरकार कोई इमारत बनवा दें। पैसा मुहैया करा दे। देश भर में शिशु भारती सेलेकर संघ के तमाम संगठनों के लिये ,सरकारी मदद का रास्ता खुलने लगे । सरकार के भीतर स्वयंसेवकों के पर राम राम कहने वालो की भर्ती होने लगे। हिन्दू राष्ट्र को लेकर साध्वी से साधु तक के बयान समाजिक तानेबाने में थिरकन पैदा करने और भगवाधारी यह महसूस करने लगे कि उसका कहा किसी तर्क का मोहताज नहीं क्योंकि दिल्ली में तो उसकी अपनी सरकार है। इन हालातों में संघ के सतही विस्तार को कौन रोक सकता है। क्योंकि स्वयंसेवक क तमगा अगर हर रोजगार पर भारी पड़े। दो जून की रोटी मुहैया कराने से लेकर वैचारिकी महत्वकांक्षा पूरी करता हो। और संघ परिवार इसी से खुश हो जाये तो पिर मोदी की सत्ता को कॉरपोरेट नीतियों को लेकर विरोध करने वाले भारतीय मजदूर संघ हो या किसान संघ या फिर स्वदेशी जागरण मंच के स्वयंसेवक हो तो उनका कुछ भी
बोलना क्या मायने रखता है।

इसी प्रक्रिया को राजनीतिक तौर पर समझे तो विरोध के बावजूद संतुष्ठी का भाव अगर बुजुर्ग राजनीतिक स्वयंसेवक लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी को हाशिये पर ढकेल ठहका लगाने वाला माहौलबनाता हो तो आने वाले वक्त की आहट क्या कोई संघ-सरकार की बैठक में सुन पायेगा कि विचार खत्म होते ही, विरोध के स्वर थमते ही, थोथे विस्तार को ही सच मानने पर तब क्या होगा जब सत्ता नहीं रहेगी। यह वाकई मुश्किल है कि संघ सरकार की बैठक में कोई हेडगेवार की तर्ज पर खड़ा होकर कह दे कि राजनीतिक सत्ता से सामाजिक जीवन में बदलाव नहीं आ सकता है इसके लिये सत्ता के सामानांतर सामाजिक सरोकार की सत्ता आरएसएस बनायेगी। तो क्या संघ के मुखिया मोहन भागवत उस अंतर्द्न्द में फंसे हुये है जहां उन्हें मोदी की सत्ता के बगैर संघ का विस्तार नजर रहा है या पिर सत्ता अगर स्वयंसेवक की ना रहे तो हिन्दु आतंक के नाम पर क दूसरी सत्ता कटघरे में खड़ा ना कर दें। और इसी का लाभ प्रधानमंत्री मोदी को भी मिल रहा है जो वह बेखौफ आर्थिक सुधार की एक ऐसी लकीर देश खिंचना चाह रहे हैं, जहां पूंजी विदेशी हो। तकनीक विदेशी हो। उत्पादन के पीछे स्किल इंडिया खड़ा हो। यानी देश की पूंजी श्रम और देसी तकनीक-शिक्षा कोई मायने न रखे । देसी आधरभूत ढांचे को मजबूती देने के बदले दुनिया के बाजार के अनुकूल खुद को बनाने की होड में उपभोक्ता समाज के लिये देश को ही बदल देने की ठान ली जाये। और संघ परिवार सुविधाओ की पोटली उठाये हर चुनाव में सक्रिय हो जाये। जाहिर है यह विचार भी संघ परिवार के भीतर पहली बार यह सवाल खड़ा
कर रहे है कि आने वाले वक्त में आरएसएस की भूमिका सिमट जायेगी। और क्या पहली बार सरकार को भी लग रहा है कि सामाजिक तौर पर अगर संघ के सरोकार सरकार की नीतियों के साथ खडे नहीं होते है तो उसकी सोच भी ढहढहा जायेगी। यानी पहली बार मोदी सरकार की जरुरत और संघ परिवार के रास्ते को एक साथ लेकर चला कैसे जाये यही सवाल बड़ा हो चला है। असर इसी का है दोनो ही अपने कहे बोल को चबाने से नहीं चूक रहे । विकास का अनूठा पाठ मोदी सरकार के जरीये भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को लेकर जो पढाया गया उसे संघ के भीतर के सवालो तले वापस ले लिया गया । और संघ के विस्तार की जरुरत तले मोदी सरकार की कारपोरेट नीतियो पर सहमति के साथ दत्तोपंत ठेंगडी के कामो का गुणगान भी किया गया तो संघ की ही संगठनों ने यह आवाज उठा दी कि दो अलग रास्ते कैसे एक सकते हैं । और शायद पहली बार संघ के मुखिया को भी समझ में आया कि मोदी की नीतियों के साथ खड़ा होते हुये अगर दत्तोपंत ठेंगडी के विचारों से स्वयंसेवकों को उत्साहित किया जाये तो सवाल स्वयंसेवक ही उठायेंगे। फिर मोदी भी इस सच को समझ रहे है कि अगर संघ उन्हीं के भरोसे रह गया या सत्ता पर ही आश्रित रह गया तो अभी तो गुजरात में पाटीदार समाज ने उन्हें चुनौती दी है आने वाले में कई समाज खड़े हो सकते है क्योंकि भारतीय समाज में राजनीतिक सत्ता के
सामानांतर सामाजिक सत्ता भी चाहिये जो शाक अब्जार्वर का काम करती है । और बीजेपी हार कर बार बार सत्ता में इसीलिये आती है क्योंकि उसके पास संघ परिवार है।

Friday, August 28, 2015

क्या पटेलों ने गुजरात मॉडल की नींव पर हथौड़ा मारा

गुजरात का जो सच लोकसभा चुनाव में उभर नहीं पाया क्या वह पटेल आरक्षण के जरीये सवा बरस बाद सतह पर आ गया है। क्योंकि गुजरात को लेकर यह सवाल हमेशा से हाशिये पर रहा कि विकास दर के मद्देनजर गुजरात के भीतर का सच है क्या। क्योंकि उद्योग, सड़क और इन्फ्रास्ट्रक्चर का जो चेहरा गुजरात में घूमते हुये किसी को भी नजर आयेगा वह गुजरात के विकास की कहानी कहेगा इससे इंकार नहीं किया जा सकता। लेकिन गुजरात के किसान, मजदूर, शिक्षक, छोटे व्यापारी, सरकारी कर्मचारी से लेकर पुलिसकर्मियों तक के हालात को परखें तो एक सवाल समूचे गुजरात में रेगता मिलेगा कि जमीनी धंधे से जुड़े तबके और विकास की चकाचौंध से उपजे धंधो के मुनाफा में भारी अंतर आया। किसानी घाटे का धंधा हो गया और खेती की जमीन पर खडा हुआ रियल इस्टेट मुनाफे वाला धंधा हो गया। स्कूल खोलना मुनाफे वाला धंधा बन गया लेकिन शिक्षक होकर जीना मुस्किल हो गया। अस्पताल खोलना आसान और कमाने वाला धंधा बना, तो डाक्टर होकर जीना मुश्किल हो गया। फैक्ट्री लगाने के लिये राज्य हर इन्फ्रास्ट्रक्चर देने के लिये पूंजीपतियों के सामने उपलब्ध रहता है लेकिन फैक्ट्री में काम करने वाले मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी भी मिल रही है कि नहीं इस दिशा में कोई कदम उठाने को ही विकास की थ्योरी से अलग माना जाता है।

साणंद में नैनो की फैक्ट्री लगी तो हर किसी को वह डेढ़ हजार जमींदार नजर आये जिनके पास जमीने थी और मुआवजे के तौर पर 28 लाख रुपये एकड़ तक मिले। लेकिन 15 हजार भूमिहिन किसानों की तरफ किसी ने नहीं देखा जो नैनो की फैक्ट्री लगने के बाद दो जून की रोटी के लिये मोहताज हो गये। क्योंकि काम बचा ही नहीं। दरअसल गुजरात की चकाचौंध के बीच आरक्षण का सवाल क्यों उठा और कैसे पटेल समाज के परिवार के परिवार आंदोलन का हिस्सा बनते चले गये समझना यह भी होगा और कैसे पहली बार सबसे संपन्न पटेल समाज की युवा पीढी में भी शिक्षा और रोजगार को लेकर यह सवाल उठ रहा है कि अगर धंधे से इतर वह कुछ भी करना चाहते है तो उनके लिये बराबरी का रास्ता क्यों नहीं है । और आर्थिक तौर पर कम संपन्न पाटीदार परिवार के बच्चो के सामने संकट है कि आईआईटी और आईआईएम ही नहीं बल्कि गुजरात विघापीठ में नामांकन के लिये भी किसी भी औसत से बेहतर छात्र तक को संघर्ष करना पडता है अगर वह आरक्षण के दायरे में नही आता । और जिस पाटीदार समाज को गुजरात का सबसे संपन्न तबका बताया जा रहा है उसमें भी सारी आर्थिक ताकत 15 से 17 फिसदी पाटीदारों में सिमटी हुई है । लेकिन यह सब हो क्यो रहा है और गुजरात के भीतर विकास को लेकर कसमसाहट क्यो तेजी से पनप रही है । जरा पटेलों के ही इलाको से शुरु करे तो हालात समझे । सौराष्ट्र के क्षेत्र जामनगर, जूनागढ और राजकोट में बीते 10 बरस में किसानों ने सबसे ज्यादा खुदकुशी की। वजह सिचाई की पुख्ता व्यवस्था है नहीं । बीते दस बरस में सिर्फ छह नहरे बनी । जबकि उससे पहले औसतन हर बरस 6 नहरे जरुर बनती थी । बारिश पह ही साठ फिसदी फसल निर्भर है। कई 265 कुंए सिचाई के लिये खोदी गई। लेकिन सरकारी बिजली कनेन्कशन सिर्फ दो फिसदी के पास तो बाकियो के लिये फसल उपजाना भी मंहगा हो गया । क्योकि औसतन तीस फिट गहरे कुअें से डिजल पंप से पानी निकालने का सालाना खर्चा ही पांच हजार लग जाते है । दो बरस पहले 65 बरस के उकाभाई रणमल ने बढते कर्ज को ना चुका पाने की वजह से खुदकुशी की । खास बात यह है कि गुजरात में अभी भी किसानो की खुदकुशी के बाद मदद को लेकर कोई नीति नहीं है । क्योकि गुजरात सरकार मानती ही नहीं है कि उनके राज्य में किसान खुदकुशी करता है । गुजरात में छोटे किसान मजदूर का संकट यह भी है कि वहा विकास की चकाचौंध तले सूखाग्रस्त इलाको को सरकार देखती नहीं । तो एलान भी नहीं होता । विधवा पेंशन को लेकर नीति तो है लेकिन किसान खुदकुशी कर ले तो विधवा के सामने मुस्किल आ जाती है कि वह कहे क्या । क्योकि खुदकुशी कहने पर मदद मिलती नहीं । बैको के कर्ज चुकाने को लेकर कोई माफी का तरीका भी नहीं है । वैसे नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आंकडो के मुताबिक 2003 से 2012 तक 5874 किसानो के खुदकुशी की । लेकिन गुजरात सरकार इसे नहीं मानती । इस त्रासदी की दूसरी तस्वीर साणंद की है ।

जहां नैनो कार की फैक्ट्री आने से पहले 15 हजार आदिवासी-ग्रामिणों के परिवार खेती से जुड़े थे। फैक्ट्री लगी तो सभी दिहाड़ी मजदूर हो गये। कोई सड़क बनाने वाला मजदूर हो गया तो कोई गटर साफ करने वाला । तो कोई सामान डोने वाला बन गया तो कोई मलबा उठाने वाला। वैसे कुछ रईस भी हो गये । जिनके पास जमीने थी। उन्हें मुआवजा मिला तो उनके मकान बडे हो गये। गाडियां घर के बाहर खड़ी हो गई। वैसे मोदी के दौर में गुजरात का सच यह भी है कि उद्योगों के लिये हजारों एकड जमीन का अधिग्रहण किया गया। साणंद में तो अच्छा मुआवजा मिला लेकिन हर जगह ऐसा नहीं हुआ । फिर उघोग लगे तो स्कील लेबर शहरो से आ गये। यानी खेती छूटी तो मजदूरी के तौर तरीके कैसे बदल गये यह किसान-मजदूर परिवारों के इस दर्द से समझा जा सकता है कि किसानी सरोकार को जिन्दा रखे थी लेकिन चकाचौंध तले औघगिक विकास सरोकार को ही खत्म कर देती है। सौराष्ट्र के सवांल भाई के मुताबिक, "खेत पर काम करने के वक्त जमीन मालिक पूरा ध्यान देता है। यानी हम खेत पर आते रहे इसके लिये अनाज, पानी, लकड़ी से लेकर बच्चो की कपड़े भी मिल जाते। लेकिन किसानी छूटी और मजदूर हो गये तो खाने के लिए भी उधार लेकर दुकान से ख़रीदना पड़ता है. यानी काम नहीं मिला तो उधारी ही एकमात्र रास्ता और पूछने वाला कोई नहीं कि हमारा दर्द है क्या। फिर नये लगते उघोगो में अनुपढ के लिये कोई काम नहीं। दिहाड़ी मजदूरी करने वालों के बच्चों के लिये कोई सस्ती शिक्षा। सस्ते इलाज तक की व्यवस्था नहीं। अब पाटीदार आरक्षण के लिये संघर्ष कर रहे है तो सरोकार के नये रास्ते संघर्ष के लिये खुल रहे है । और झटके में लगने लगा है कि एक तरफ आनंदीबेन की सरकार तो दूसरी तरफ पाटीदार बहुसंख्यक तबका और उसके साथ काम-धंधे में जुडे लोग। फिर जिन पुलिस वालो को लेकर हार्दिक पटेल आक्रोश निकाल रहे है। उन पुलिस वालो का भी कोई जुडाव गुजरात माडल से नहीं है । और पहली बार उन्हें भी समझ आ रहा है कि आंदोलन की जमीन गुजरात में बीते 15 बरस में इसलिये नहीं पनपी क्योंकि गुजराती अस्मिता का सवाल मोदी के जरीये लगातार केन्द्र सरकार से टकरा रहा था । लेकिन इस दौर में पुलिस की हालात अच्छे रहे ऐसा भी नहीं है । मौजूदा वक्त में ''पुलिस में नई भर्ती वालों को 2400 रुपए मिलते हैं, उनका गुज़ारा कैसे होगा? यह भी एक सवाल है । और इसी के सामानांतर गुजरात में भ्र्श्ट्रचार किस रुप में पनपा है यह भी गौरतलब है । पांच से छह हजार की सरकारी नौकरी के लिये दस से बीस लाख रुपये की रिश्वत देनी पडती है । फिर ऐसा भी नहीं है कि आरक्षण पाये तबके की जिन्दगी में खासा सुधार हो गया है । अनुसूचित जाति , जनजाति और ओबीसी समाज में भी एक क्रिमी लेयर पैदा हो चुका है जो सारी सुविधा, सारा मुनाफा
समेटने में माहिर हो चुका है । और उसके संबंध सत्ता से खासे करीबी है । यानी आरक्षण पाये तबके के सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियो में कोई अंतर आया हो ऐसा भी नहीं है । बहुसंख्यक तबके के हालात अभी भी दो जून की रोटी के संघर्ष में ही बीत रहा है तो आक्रोष उनके भीतर भी है । ऐसे में गुजरात के
भीतर घुसे तो मानवीय जरुरतो के संकट साफ नजर आते है . फलाइओवर चकाचक है लेकिन गांव के भीतर पीने के पानी का संकट है । स्कूल की इमारत बेहतरीन है लेकिन 7वी-8वी की पढाई कर रहे बच्चे लिखा हुआ पढ नहीं सकते । शिक्षको को वेतन पांच से साढे पांच रुपये से जेयादा मिलता नहीं । तो गुजारा कैसे
परिवार का चलता होगा यह भी सवाल है । फिर गांव से शहर आने के लिये सरकारी बसो के बदले जमीदांरो के वाहन चलते है । यानी इन्फ्र्सट्रक्चर पूरी तरह पैसो वालो के लिये पैसे वालो के जरीये खडा किया गया । इसीलिये गुजरात में सार्वजनिक वितरण प्रणाली या पीडीएस सिस्टम छत्तिसगढ से भी ज्यादा कमजोर
है । यह ऐेसे सवाल हो जो मौजूदा वक्त में आरक्षण आंदोलन के वक्त सतह पर आ भी सकते है क्योकि अर्से बाद समाज के भीतर एक तरह बैचेनी भी देखी जा रही है ।

और बैचेनी की सबसे बडी वजह उस युवा पीढी के भीतर उपजते वह सवाल है जो गुजरात माडल को लेकर ही खड़े हैं क्योंकि पाटीदार समाज के छात्रों के बीच भी यह सवाल लगातार चर्चा में आ रहा है कि पिछले बीस साल में गुजरात में सड़कें, बिजली आपूर्ति बेहतर हुई हैं यह सभी मानते हैं. लेकिन विकास के पैमाने पर गरीबी, शिक्षा, पोषण, स्वास्थ्य के क्षेत्र में गुजरात बहुत आगे नहीं है. तमिलनाडु, केरल, हिमाचल के आंकड़े भी गुजरात से कमज़ोर नहीं हैं। शिक्षा और स्वास्थय के क्षेत्र में निवेश नहीं हुआ । और इसी दौर में शिक्षा पाने के लिये नामाकंन से लेकर नौकरी पाने के लिये उन्हे जिस तरह आरक्षम पाये तबको से टकराना पडता है या कहे उन्ही से प्रतिस्पर्धा करनी पडती है जो कम नंबर से पास हुये तो उसको लेकर अलग से गुस्सा है । वैसे पटेल समाज के युवा पहली बार दो सवाल बहुत ही बारिकी से उठा रहे है । पहला विकास का चेहरा दूसरा जातिय राजनीति का
मोह । गुजरात के विकास को लेकर एक तबके का मानना है कि समाज की तरक्की हुई नहीं लेकिन विकास का ढोल जिस तरह पिटा गया उससे लगता है कि गाडी को ही घोडे से आगे बाँध दिया गया । और मोदी जी के सीएम रहते हुये गुजरात में कभी उनकी जाति को लेकर ना कोई बहस हुई ना किसी ने जिक्र किया लेकिन प्रधानमंत्री बनते ही घासी जाति और ओबीसी समाज को भी प्रधानमंत्री मोदी ने जोड दिया गया । वैसे जाट आरक्षण के समर्थन में मोदी सरकार के सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा दोबारा खटखटाने को भी पटेल समाज याद रखे हुये है । और उसके भीतर यह सवाल भी है कि 1985 में जब बीजेपी ने क्षेत्रिय, हरिजन, आदिवासी और मुस्लिम आरक्षण के विरोध में पटेल समाज का साथ दिया था तो फिर जातिय राजनीति अब क्यों बीजेपी को भाने लगा है । इन हालातो ने मोदी के दौर के उन नियमों को भी याद दिला दिया है जो पाटीदार समाज के खिलाफ गये। मसलन गुजरात में एक नियम के मुताबिक सात किलोमीटर के दायरे में रहने वाले किसानों को जमीन ख़रीदने का हक था, जिससे पाटीदार अधिक से अधिक भूमि के स्वामी बनते चले गए. लेकिन नियम  बदले तो अधिकांश भूस्वामी बिल्डर बन गए। बिल्डरो में बडी तादाद ओबीसी समाज की है। इसलिये हार्दिक पटेल ने जब अबहमदाबाद रैली में यह कहा कि “जिस गुजरात मॉडल से भारत और दुनिया परिचित है, वह सच नहीं है. जैसे ही आप गुजरात के गांवों में पहुंचेंगे, आपको असलियत का पता चल जाएगा. किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं, लोगों के पास बच्चों को पढ़ाने-लिखाने के पैसे नहीं हैं." तो गुजरात ही नहीं बल्कि दिल्ली तक हर किसी को लगा यही कि जिस गुजरात माडल के कंधे पर सवार होकर नरेन्द्र मोदी दिल्ली पहुंचे उसी माडल को पहली बार उसी गुजरात से चुनौती मिल रही है जिसकी अस्मिता का सवाल उठा कर मोदी ने गुजरात में भी 15 बरस राज किया ।

Friday, August 21, 2015

मोदी ट्विस्ट है डोभाल-अज़ीज़ मुलाकात


मोदी सरकार के लिये कल पहला दिन होगा जब पाकिस्तान के साथ कोई अधिकारिक स्तर की बातचीत का श्रीगणेश होगा। यानी सवा साल लग गये बातचीत की टेबल पर आने के लिये जबकि ताजपोशी के अगले ही दिन 27 मई 2014 प्रधानमंत्री मोदी ने दिल्ली के उसी हैदराबाद हाउस में डेढ़ घंटे तक पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से बात की थी, जिस हैदराबाद हाउस में कल पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सरताज अजीज से अजीत डोभाल मुलाकात करेंगे। तो यह सवाल हर जहन में कल जरुर उठेगा कि 27 मई 2014 और 23 अगस्त 2015 के दरम्यान दोनों देशो के बीच फासले कितने कम हुये। या फिर वह कौन से हालात है जिसने दोनो देशो को बातचीत की टेबल पर ला दिया। क्योंकि इस दौर में ऐसा कुछ भी नहीं बदला है जिसका जिक्र कर प्रधानमंत्री मोदी कह सके कि, “चुनाव से पहले पाकिस्तान को लेकर जो हम कहते थे अब उस रास्ते पर चल निकले हैं।“ हालात बिलकुल उलट हैं। फिर भी बातचीत होगी । हालात ही नहीं बल्कि मोदी सरकार ने ठीक साल भर पहले जिस हुर्रियत को वजह बनाकर विदेश सचिवों की बातचीत रद्द करने का निर्णय लिया था, वही हुर्रियत साल भर बाद यानी 23 अगस्त को ही कही ज्यादा बडे दायरे में दिल्ली में ही उन्ही सरताज अजीज के साथ मुलाकात करेगा जिन सरताज अजीज के साथ भारत के एनएसए अजीत डोभाल को बात करनी है। तो मोदी सरकार की पहली रणनीतिक हार कश्मीर के उन्हीं अलगाववादियों को लेकर हो गई जिसे खारिज कर पहले पाकिस्तान फिर जम्मू-कश्मीर चुनाव में अपनी जमीन तैयार करने का रास्ता तेवर के साथ दिखाया बताया गया। दूसरे हालात आतंकवाद को लेकर समझौता करने का है या आतंकवाद पाकिस्तान की स्टेट पालेसी नहीं है यह मानने का है। क्योंकि मुंबई हमलो के वक्त ही जब लश्कर-ए-तोएबा का फिदायीन अजमल कसाब जिन्दा पकड़ में आया था तो पहली आवाज भाजपा की ही संसद के भीतर उठी थी कि, “आतंकवाद पाकिस्तान की स्टेट पॉलिसी है और अब पाकिस्तान के साथ सारे राजनयिक रिश्ते तोड़ देने चाहिये। “ और संयोग देखिये कसाब के बाद जो दूसरा पाकिस्तानी आतंकवादी जिन्दा पकड में आया वह नवेद है। और पंजाब में गुरुदासपुर पर हमला हो या जम्मू-कश्मीर के उघमपुर में। दोनों हमलों को लेकर संसद में देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने जबाब यही दिया कि आतंकी हमला करने वाले पाकिस्तान से आये। फिर आंतकी नवेद से पूछताछ में जब यह सच भी सामने आ गया कि लश्कर ही नहीं बल्कि पाकिस्तान की खुफिया एंजेसी आईएसआई के आला अधिकारियो से भी नवेद की मुलाकात हुई ।

तो अगर सवाल फिर वहीं उठा कि आंतकवाद पाकिस्तान की स्टेट पालेसी है कि नहीं । और नवाज शरीफ की सत्ता और आईएसआई की सत्ता को दो अलग अलग ध्रूव मान कर क्या भारत को चलना चाहिये । तो क्या कल की मुलाकात पाकिस्तान को लेकर मोदी सरकार की दूसरी बडी रणनीतिक हार नहीं होगी । और तीसरे हालात कहीं ज्यादा भाजपा के दिल के निकट है । क्योकि सीमा पार से फायरिंग । सीज फायर का उल्लघन । सीमा पर मरते जवान । यह सारे सवाल तो सवा बरस पहले चुनाव में जय जवान जय किसान के नारे के साथ ही देश में चुनाव प्रचार के वक्त गूंजा करते थे । एक तरफ चुनावी रैलिया तो दूसरी तरफ संसद के भीतर भाजपा का पाकिस्तान को लेकर सीधा हमला। याद किजिये तो 2012 में जो भारत पाकिस्तान के बीच आखिरी अधिकारिक मुलाकात थी, जिसमें 50 आंतकवादियो के नाम और उनके खिलाफ आरोपों के सबूत पाकिस्तान को सौपे गये थे तब ससंद में भाजपा ने ही सवाल उठाया था कि जब पाकिस्तान लाहौर घोषणापत्र को नहीं मानता । सीमा पर हमारे जवानों के सिर काट लिये जाते है । ऐसे में पाकिस्तान के साथ बातचीत का मतलब है भारत मां की रक्षा के लिये जान गंवाने वाले जवान सपूतो के शहीद होने का मखौल उड़ाना। तो क्या पाकिस्तान को लेकर मोदी सरकार की यह तीसरी रणनीतिक कमजोरी है। क्योंकि हालात तो सीमा पर कहीं ज्यादा तेजी से बिगड़े हैं। सीजफायर उल्लघंन से आगे रिहाइश इलाको में भी गोलाबारी ने आम नागरिकों को अपने घर छोडने पर मजबूर किया है। यानी पाकिस्तानी सेना का रुख भारत के साथ बातचीत का नहीं है और यह बात आज भी भारत की ही खुफिया एजेंसी रॉ भी मान रही है । और इससे पहले भी मान रही थी। अंतर सिर्फ इतना आया है कि पहले विपक्ष में रहते हुये भाजपा ही नहीं आरएसएस भी एक सुर में पीओके पर हमला कर कश्मीर को वापस लाने की बोली बोलते रहे। और अखंड भारत के सपने को अपने जुबां पर जिलाये रहे। 26/11 के बाद संसद में ही भाजपा ने छह मौकों पर कहा कि सेना को पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में घुस जाना चाहिये। और सरसंघचालक मोहन बागवत ही दो बार दशहरा के मौके पर नागपुर में शस्त्र पूजा के बाद यह बोलने से नहीं चूके कि अंखड भारत ही असल भारत है। और इसके लिये सेना को युद्द करना होगा जिसके लिये दिल्ली में बैठी सरकारों में नैतिक बल नही है। सवाल पाकिस्तान के साथ युद्द का नहीं है बल्कि पाकिस्तान देश की सियासत। देश की भावनाओं के साथ खिलवाड़। और राष्ट्रवाद के जिस पराकाष्ठा को छूने के लिये उपयोग में लगातार लाया गया है और लाया
जा रहा है उसका कोई त या कोई शुरुआत किसी भी सरकार के पास क्यों नहीं है । क्योंकि भाजपा के लिये ही पाकिस्तान को लेकर सत्ता में आने के बाद हालात इस कदर बदले है कि कल की मुलाकात में माना यही जा रहा हैल कि अजीत डोभाल पीओके में चल रहे आतकी कैंपो के लोकेशन और समूची जानकारी पाकिस्तान के सरताज अजीज को सौपंगे। 2012 में 50 आतंकियों की लिस्ट सौपी गई थी। इस बार 65 आतंकियों की सूची सबूतो के साथ सौपने की तैयारी है । यानी रास्ता घूम-फिर कर उस डिपलोमेसी की तरफ जा रहा है जहा नई बहस यह शुरु हो जाये कि अब पाकिस्तान को लेकर मोदी सरकार देश की पुरानी – पारंपरिक नीतियो को बदल रही है । यानी पाकिस्तान से बातचीत को लेकर भारत की पालेसी बदल रही है ।

क्योकि बातचीत रोकने के बाद भी अगर कोई नतीजा बीते 30 बरस में नहीं निकल पाया है और पाकिस्तानी सरकार लगातार बातचीत बंद करने के लिये भारत पर ही दोष मढती रही है तो नया सवाल यह भी है कि क्या मोदी सरकार अब पाकिस्तान को कोई मौका देना नहीं चाहती है । जिससे अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में यह संदेश जाये कि भारत आंतकवाद को ढाल बनाकर बातचीत रोकता रहा है।  ध्यान दें तो मोदी सरकार की पाकिस्तान को लेकर पॉलिसी में कई स्तर पर बदलाव आया है। मसलन अब सीजफायर उल्लधन का जबाब सीमा पर दिया जा रहा है । टैरर अटैक में पाकिस्तानी आंतकवादी को जिन्दा पकड कर दुनिया के सामने लाने की नीति भी अपनायी जा रही है। और हुर्रियत को पाकिस्तान तरजीह दे लेकिन भारत कश्मीर में अलगाववादियो को महत्व नहीं देगा । लेकिन इससे होगा क्या। क्योंकि पाकिस्तान की बातचीत का आधार ही जब कश्मीर है और कश्मीर
में आतंक की नयी बिसात पढे-लिखे युवा कश्मीरियो के हाथों में लहराते आईएसआईएस के झंडे तले पनप रही है जिस पर पाकिस्तान में जमात-उल-दावा के मुखिया हाफिज मोहम्मद सईद गर्व करते है [ 14 अगस्त 2015 को लाहौर में भाषण ] । और पाकिस्तान के साथ आखिरी समझौते, लाहौर घोषणापत्र में जब इस बात का खुले तौर पर जिक्र किया गया कि पाकिस्तान अपनी जमीन पर आंतकवादियों को कोई जगह नहीं देगा तो फिर पाकिस्तान से बातचीत को लेकर पॉलिसी में बदलाव की वजह क्या हो सकती है। दरअसल भारत की सबसे बडी मुश्किल यही है कि सच और सत्ता के बीच विभाजन की त्रासदी आज भी सियासत करने से चूकती नहीं और कोई भी सत्ता इसी सच और मुश्किल से दो दो हाथ करने से कतराती है । मौलाना अब्दुल कलाम आजाद ने पाकिस्तान के बदले भारत में रहना चुना तो भी वह देश के नहीं बल्कि मुस्लिम नेता बने रहे इसके लिये नेहरु ने उन्हे कांग्रेस का टिकट रामपुर से दिया, जहां मुस्लिम बहुसंख्यक थे। और मौजूदा वक्त में एमआईएम सासंद असदुद्दीन औवेसी मोदी की सत्ता में इसलिये खलनायक हैं क्योंकि उनकी खलनायकी ही बहुसंख्यक हिन्दुओं के बीच भाजपा को चुनावी नायक बनाये रख सकती है। और राष्ट्रवाद की लौ पाकिस्तान से दो दो हाथ
करने की बात कहकर ही जगायी जा सकती है चाहे आंतकवाद का दायरा बढे या कश्मीर की युवा पीढी दिल्ली के जरीये ही हाशिये पर ढकेले जाने से हैरान-परेशान होकर आंतक की गलियो में भटकने कौ तैयार होती दिखी । यानी पाकिस्तान का सबसे सरल रास्ता बातचीत करने और बातचीत ना करने के फैसले के बीच आ खडा हुआ है इससे कौन इंकार कर सकता है । और सवा बरस पहले मोदी –नवाज की साडी-शांल की डिप्लोमेसी और सवा साल बाद डोभाल-अजीज की आंतकी कैप की लोकेशन और आंतकवादियो की नयी सूची सौपने की डिप्लोमैसी में वाकई कोई अंतर है । क्या इसका जबाब प्रधानमंत्री मोदी देश को दे पायेगें ।

Thursday, August 20, 2015

सांगठनिक अपराध में तब्दील हो गया सत्ता-मीडिया गठजोड़

आजादी के अडसठ बरस बाद यह सोचना कि मीडिया कितना स्वतंत्र है। यह अपने आप में कम त्रासद नहीं है। खासकर तब जबकि सत्ता और मीडिया की साठगांठ खुले तौर पर या तो खुशहाल जिन्दगी जीने और परोसने का नाटक कर रही हो या फिर कभी विकास के नाम पर तो कभी राष्ट्रवाद के नाम पर मीडिया को धंधे में
बदलने की बिसात को ही चौथा स्तंम्भ करार देने नहीं चूक रही हो। तो क्या सियासी बिसात पर मीडिया भी अब एक प्यादा है । और प्यादा बनकर खुद को वजीर बनाने का हुनर ही पत्रकारिता हो चली है। जाहिर है यह ऐसे सवाल है जिनका जवाब कौन देगा यह कहना मुश्किल है लेकिन सवालों की परतों पर उघाडें तो मीडिया का सच डरा भी सकता है और आजादी का जश्न सत्ता से मोहभंग कर भी सकता है। क्योंकि माना यही जाता है कि मीडिया के सामने सबसे बडी चुनौती आपातकाल में आई। तब दिखायी दे रहा था कि आपातकाल का मतलब ही बोलने-लिखने की आजादी पर प्रतिबंध है। लेकिन यह एहसास 1991 के आर्थिक सुधार के बाद धीरे धीरे काफूर होता चला गया कि आपातकाल सरीखा कुछ अब देश में लग सकता है जहा सेंसरशिप या प्रतिबंध का खुल्लम खुल्ला एलान हो।

दरअसल देश का नजरिया ही इस दौर में ऐसा बदला जहा मीडिया की परिभाषा बदलने लगी तो फिर सेंसरशिप सरीके सोच का मिजाज भी बदलेगा। शायद सीलिये पहला सवाल मीडिया को लेकर यह भी उभरा कि क्या वाकई मीडिया की आजादी का बोलने-लिखने से कोई वास्ता है। विकास के नाम पर बाजार व्यवस्था को विस्तार दिया गया। मीडिया पूंजी पर आश्रित होती चली जा रही है। तो बोलना-लिखना भी मीडिया संस्थानों के मुनाफे घाटे से जुड़ने लगा। यानी जो पत्रकारिता जनमानस के सवाल उठाकर सत्ता को बैचेन करती वही मीडिया सत्ता की उपलब्धि बताकर जनमानस को सत्ता के लिये अभयस्त करने में लग गई। असर इसी का हुआ कि व्यवस्था चलाते संवैधानिक संस्थानो की धार भी राजनीतिक सत्ता के सामने भोथरी होने लगी। ऐसे में अपनी नयी जमीन बनाते -तलाशते चौथे स्तम्भ को 2015 तक पहुंचते पहुंचते रास यही आने लगा कि रात के अंधेरे में सत्ता के साथ गलबहियां डाली जायें और सुबह सुबह अखबारो में या ढलती शाम के साथ चैनलों के प्राइम टाइम में राजनीतिक जमीन सत्ता के लिये मजबूत किया जाये। जिससे विकास की परिभाषा भूखे-नंगों के देश के बदले करोड़पतियों की बढ़ती तादाद पर टिके। विदेशी पूंजी या चुनिंदे मित्र कारपोरेट के साथ गलबहियां करते हुये इन्फ्रास्ट्रक्चर का राग अलाप कर क्रोनी कैपटलिज्म के अपराध को सांगठनिक व्यवस्था में बदल दिया जाये।

तो मीडिया का असल संकट पत्रकारिता के उस बदलाव से शुरु होता है जो सत्ता के विरोध और निगरानी के बदले खुद की सत्ता बनाने की जद्दोजहद को ही पत्रकारिता मान बैठी। यानी एक दौर में सत्ता से दो दो हाथ करते हुये सत्ता बदलने की ताकत को ही “जर्नलिज्म आफ करेज” माना गया तो एक वक्त पत्रकारिता की ताकत मीडिया हाउस शब्द पर जा टिकी। पत्रकारिता को किस महीन तरीके से मीडिया संस्थानो ने हड़पा और कैसे संपादक संपादकीय पेज से निकल कर संस्थानों के टर्न ओवर [ बैंलेस शीट ] में सिमटने लगा। और किस हुनर से मीडिया संस्थानो के टर्न-ओवर को अपनी मुठ्ठी में सत्ता ने कर लिया यह उपभोक्ताओ के हिन्दुस्तान में कोई समझ ही नहीं पाया। और असल भारत जबतक इस हकीकत को समझने की हालात में आता तब तक उपभोक्ता समाज को ही असल भारत करार देने में वही मीडिया जुट गया जिसके भीतर बदलते मीडिया के चेहरो से ही दो दो हाथ करने की बैचेनी थी। जिसे सत्ता पर निगरानी करनी थी। जिस अपनी रिपोर्टो से किसान-मजदूर के भारत की अनदेखी पर सवाल खड़े करने थे। क्योंकि जैसे ही जनमानस को लेकर किसी पत्रकार ने सवाल उठाये। जैसे ही किसी मीडिया हाउस के तेवर सत्ता को चिकोटी काटने लगे। वैसे ही सिस्टम सक्रिय होने लगा। जो मीडिया को बिके होने या विरोधी राजनीतिक दल या धारा का बताकर हमला करने लगा। सत्ता वहा सफल नहीं हुई तो हमला उस पूंजी पर ताले लगाने से शुरु हुआ जिसपर कभी अखबारी कागज के जरीये होता था । लेकिन अब लाइसेंस रद्द करने या विज्ञापनो पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने को लेकर होता है । अगर हाथ वहा भी फिसले तो फिर सत्ता को हिंसक होने में भी देर नहीं लगती। और यही से पत्रकार और मीडिया हाउस के बीच एक लकीर भी नजर आती है।

और पत्रकारिता का रास्ता बंद गली के आखिरी छोर पर दीवार से टकराते हुये भी नजर ता है क्योंकि पत्रकारों के हाथ में पूंजी पर टिके वह औजार होते नहीं है जिसके जरीये वह मीडिया में तब्दील हो सके या पत्रकारिता को ही मीडिया में बदल सके। मीडिया के लिये बनायी व्यवस्था मीडिया हाउस को ही पत्रकारिता का खिताब देती है। लेकिन मीडिया कैसे किस रुप में भटका इसे समझने से पहले बदलती राजनीतिक सत्ता और उसकी प्राथमिकता को भी समझना जरुरी है। क्योंकि आजादी के तुरंत बाद देश को किसी पार्टी की सरकार नहीं बल्कि राष्ट्रीय सरकार मिली थी। इसीलिये नेहरु के मंत्रिमंडल में वह सभी चेहरे थे जिन चेहरो के आसरे आज राजनीतिक दल सत्ता पाने के लिये टकराती है। यानी 68 बरस पहले 1947 में सवाल देश का था तो नेहरु की अगुवाई में देश के कानून मंत्री बी आर आंबेडकर थे। गृह मंत्री सरदार पटेल थे। तो शिक्षा मंत्री मौलाना अब्दुल कलाम आजाद और इंडस्ट्री-सप्लाई मंत्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी थे। इसी तर्ज पर अठारह कैबिनेट मंत्री अलग अलग जाति-सप्रदाय-धर्म-भाषा-सूबे के थे। जो मिलकर देश को दिशा देने निकले। तो पत्रकारिता भी देश को ले कर ही सीधे सवाल नेहरु की सत्ता से करने की हिम्मत रखती थी। असर इसी का था कि संसद के भीतर की बहस हो या सडक पर हिन्दु महासभा से लेकर समाजवादियो का विरोध । लोहिया के तीखे सवाल हो या गैर काग्रेसवाद का नारा लगाते हुये काग्रेस विरोधी संगठन और पार्टियों को लाने की कवायद। हर सोच के पीछे देश को समझने और भारत के हर सूबे-सप्रदाय-धर्म तक न्यूनतम जरुरतो को पहुंचाने की होड़ थी। यही हर राजनीतिक दल के घोषणापत्र का एलान था और यही समझ हर राजनेता के कद को बढाती कि उसे देश की कितनी समझ है। तब लड़ाई न्यूनतम जरुरतों को लेकर थी। यानी सिर्फ हिन्दू या मुस्लिम। या फिर आर्य-द्रविड कहने भर से काम नहीं चलेगा बल्कि सूबे-दर-सूबे न्यूनतम जरुरतो को कैसे पहुंचाया जा सकता है । खेत-मजदूर के सवाल देश के सवाल थे। आदिवासियो के सवाल थे । अल्पसंख्यकों की मुश्किलात का जिक्र था । देश के तमाम संस्थान देश को बांधने में लगे थे। तो पत्रकारिता के सामने सत्ता को लेकर सारे सवाल अवाम से जुडे थे।

क्योंकि राजनीतिक सत्ता के सारे राजनीतिक सरोकार पहले जनता से जुडे थे। इसीलिये मुद्दा सांप्रादियकता का हो या किसानों का। मुद्दा विकास का हो या इन्फ्रास्ट्रक्चर का । हर हालात देश के भीतरी माहौल से ही टकराते और उसी में रास्ता निकालने की कोशिश होती। यानी देश के सामाजिक-आर्थिक चेहेरे से इतर टाटा-बिडला सरीखे उघोगपति भी नहीं देख पाते और अखबारी पत्रकारिता और उसके संपादक की कलम भी आम जनता के सरोकार से जुडकर सवाल भी उठाती और सत्ता को प्रभावित करने वाली रिपोर्ट को लेकर सौदेबाजी का दायरा भी राजनीतिक दलाली की जगह सत्ता से टकराने का हुकूक दिखाने को तैयार हो जाता । यानी इस दौर तक संपादक,पत्रकार और मीडिया संस्थान अक्सर रिपोर्ट या लेखनी के जरीये बंटते भी और अलग अलग दिखायी भी देते। संजय गांधी की जनता कार यानी मारुति पर पहली रिपोर्ट टीएन निनान ने लिखी । लेकिन उसे बिजनेस स्टैन्डर्ड ने नहीं छापा। तो वह रिपोर्ट इंडिया टुडे में छपी। कमोवेश एक लंबा इतिहास रहा है जब किसी रिपोर्टर या किसी संपादक ने संस्थान इसलिये छोडा क्योकि उसकी रिपोर्ट सत्ता के दबाब में नहीं छपी। या फिर सत्ता ने संपादक को ही बदलवा दिया। जैसे कुलदीप नैयर को सत्ता के इशारे पर हटाया गया। लेकिन वह पत्रकारिता के हिम्मत का दौर था। वह राजनीतिक सत्ता के रिपोर्ट से खौफजदा होने का भी दौर था। यानी मीडिया का प्रभाव जनता में और जनता को प्रभावित कर सत्ता पाने की राजनीति। शायद इसीलिये हर कद्दावर राजनेता का लेखन या पत्रकारिता से जुडाव भी उस दौर में देखा जा सकता है। और संपादकों में संसद जाने की लालसा को भी देखा जा सकता था। एक लिहाज से समझे तो पत्रकारिता देश को जानने समझने के लिये ही नहीं बल्कि राजनेताओं को दिशा देने की स्थिति में भी रही। उस पर भी साहित्य और पत्रकारिता को बेहद नजदीक पाया गया। इसलिये विभन्न भाषाओ के साहित्यकार भी संपादक बने और राजनीतिक तौर पर किस दिशा में देश को आगे बढना है या संसद के कानून बनाने को लेकर किसी भी मुद्दे पर पत्रकारिता ने बडी लंबी लंबी बहस की । जिसने देश को रास्ता दिखाने का काम किया । क्योकि तब राजनीति का आधार और पत्रकारिता की पूंजी जनता थी । बहुसंख्यक आम जनता । लेकिन 1991 के बाद बाजार देश पर हावी हुआ। देश की सीमा पूंजी के लिये पिघलने लगी । उपभोक्ता और नागरिक के बीच लकीर दिखायी देने लगीं । भा-सरोकार सिमटने लगे। समाज के भीतर ही संवादहीनता की स्थिति बनने लगी ।नेहरु, शाश्त्री या इंदिरा गांधी आदिवासी गौंडी भाषा भी समझ लेते थी या फिर संवाद के लिये आदिवासियो के बीच एक द्विभाषिए को साथ ले जाते थे । पत्रकार आदिवासियों से संपर्क साध कर उनकी भाषा के जरीये उनके संवाद को कागज पर उकेरता। या फिर दंगों की रिपोर्टिंग या संपादकीय में पत्रकार दंगों से प्रभावित सच तक पहुंचने की जद्दोजहद करता नजर आता। उन रिपोर्ट को पढ़ने के बाद ही पता चलता कि कौन संपादक कितना बड़ा है और किस राजनीतिक दल या राजनेता के सरोकार दंगाईयों से रहे। एक चैक-एंड बैलेंस लगातार काम करते रहता। क्योंकि पत्रकारिता की पूंजी जनता की मान्यता थी। और पत्रकार की वहीं साख सत्ता को भी परेशान करती । लेकिन बाजार का मतलब पूंजी और पूंजी का मतलब मुनाफा हुआ तो देश का मतलब भी पूंजी पर टिका विकास हुआ । यानी 1991 के बाद राजनीतिक सत्ता ने जिस तेजी से अर्थव्यवस्था को लेकर पटरी बदली उसने झटके में उस सामाजिक बंदिशो को ही तोड दिया, जहां दो जून की रोटी के लिये तडपते लोगो के बीच मर्सिर्डिज गाडी से घूमने पर अपराध बोध होता । बंदिशें टूटी तो सत्ता का नजरिया भी बदला और पत्रकारिता के तौर तरीके भी बदले। बंदिशें टूटी तो उस सांस्कृतिक मूल्यों पर असर पडा जो आम जन को मुख्यधारा से जोडने के लिये बेचैन दिखती। लेखन पर असर पड़ा। संवैधानिक संस्थाये सत्ता के आगे नतमस्तक हुई और झटके में सत्ता को यह एहसास होने लगा कि वही देश है। यानी चुनावी जीत ने पांच साल के लिये देश की चाबी कुछ इस तरह राजनीतिक सत्ता के हवाले कर दी कि संविधान के तहत कार्यपालिका,न्यायपालिका और विधायिका जहा एक दूसरे को संभालते वहीं आधुनिक सत्ता के छाये तले सभी एक सरीखे और एक सुर में करार दे दिये गये। और इसी कडी में शामिल होने में मीडिया ने भी देर नहीं लगायी ।

क्योंकि सारी जरुरते पूंजी पर टिकी । मुनाफा मूल मंत्र बन गया। हर संवैधानिक संस्था को संभाले चौकीदार सत्ता के लिये बदलते दिखे। सीबीआई हो या कैग या सीवीसी। झटके में सभी दागदार या कहे सत्ता से प्रभावित दिखे। लेकिन उनकी संवैधानिक छवि ने उनकी आवाज को ही हेडलाइन बनाया। यानी सत्ता अगरखुद दागदार  हुई तो उसने सिस्टम के उन्ही आधारो को अपना ढाल बनाना शुरु किया जिन्हे सत्ता पर निगरानी रखनी थी। यानी सत्ता का कहना ही हेडलाइन बन गई। और सत्ता की हर क्षेत्र को लेकर परिभाषाये ही मीडिया की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट मान ली गई । और इस सत्ता का मतलब सिर्फ दिल्ली यानी केन्द्र सरकार भर ही नहीं रहा। बल्कि चौखम्भा राज सत्ता ने राष्ट्रीय अखबारो और न्यूज चैनलों से लेकर क्षेत्रिय और जिले स्तर के अखबार और टीवी चैनलो को भी प्रभावित किया। और इसकी सबसे बडी वजह यही रही कि जिस भी राजनीतिक दल को सत्ता मिलती है उसके इशारे पर समूची व्यवस्था खुद ब खुद चल पडती है। यानी एक वक्त कल्याणकारी राज्य की बात थी जो राज्यसत्ता की जिम्मेदारी थी। लेकिन अब बाजारवाद है तो खुद का खर्चा हर संस्थानों को खुद ही निकालना चलाना है। और खर्चा निकालने-चलाने में राज्यसत्ता की जहां जहा हरी झंडी चाहिये उसके लिये सत्ता के मातहत संस्थानों के नौकरशाह, पुलिस, अधिकारी निजी संस्थानो के लिये वजीर बने बैठे है । लेकिन सत्ता के लिये वही प्यादे है जो पूंजी बनाने कमाने के लिये शह-मात का खेल बाखूबी खेलते है । यानी मीडिया के सामने यबसे बडी चुनौती यही है कि वह या तो सत्ता की परिभाषा बदल दें या फिर सत्ता के ही रंग में रंगा नजर आये । क्योंकि समूचा तंत्र ही जब सत्ता के इशारे पर काम करने लगता है तो होता क्या है यह भी किसी से छुपा नहीं है। गुजरात में पुलिस नरेन्द्र मोदी की हो गई था तो 2002 के दंगों ने दुनिया के सामने राजधर्म का पालन ना करने सबसे विभत्स चेहरा रखा । 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या को बडे वृक्ष के
गिरने से हिलती जमीन को देखने की सत्ता की चाहत में खुलेआम नरसंहार हुआ। शिवराज सिंह चौहान ने मध्यप्रदेश में शिंकजा कसा तो लाखो छात्रों की प्रतियोगी परीक्षा धंधे में बदल गई। रमन सिंह ने छत्तीसगढ़ में शिंकजा कसा तो आदिवासियों के हिस्से का चावल भी सत्ताधारी डकारने से नहीं चूके। उत्तर प्रदेश में तो सत्ता चलाने और चलवाने का ऐसा समाजवाद दिखा की हर संस्था का रंग सत्ता के रंग में रंग दिया गया या फिर खौफ ने रंगने को मजबूर कर दिया । कलम चली तो हत्या भी हुई । और हत्या किसने की यह सवाल सियासी बिसात पर कुछ स तरह गायब किया गया जिससे लगे कि सवाल करने या जबाब पूछने पर आपकी भी हत्या हो सकती है । सिर्फ यूपी ही क्यों बंगाल में भी मां , माटी ,मानुष का रंग लाल हो गया । पत्रकार को गायब करना या निशाने पर लेने के नये हालात पैदा हुये । मध्यप्रदेश तो रहस्यमयी तरीके से पत्रकारिता को अपने चंगुल में फांसने में लगा । इसलिये व्यापम पर रिपोर्ट तैयार करने गये दिल्ली के पत्रकार की मौत को भी रहस्य में ही उलझा दिया गया । मुश्किल सिर्फ इतनी भर नहीं है कि पत्रकारिता और मीडिया हाउस सत्ता के लिये एक बेहतरीन हथियार बन चुके है मुश्किल यह भी है कि सत्ता कभी हथियार तो कभी ढाल के तौर पर मीडिया का इस्तेमाल करने से नहीं चुकती और मीडिया के सामने मजबूरी यह हो चली है कि उसने जिस बिजनेस माडल को चुना है वह सत्ता के किलाफ जाकर मुनाफा दिनाले में सक्षम नहीं है । वजह भी यही है कि झटके में कारपोरेट का कब्जा मीडिया पर बढ रहा है और मीडिया पर कब्जाकर कारपोरेट अपनी सौदेबाजी का दायरा सत्ता से सीधे करने वाले हालात में है । अब यहा सवाल यह उठ सकता है कि जब पत्रकार या मीडिया की साख उसकी विश्वसनीयता का आधार खबरों को लेकर इमानदारी ही है तो फिर सौदेबाजी पर टिके मीडिया हाउस को जनता देखेगी क्यो । तो इसका तो जबाब आसान है कि सभी को एक सरीखा कर दो अंतर दिखायी देंगे ही कहां। लेकिन जो सवाल मीडिया को विकसित करने के बिजनेस मॉडल के तहत दब जाता है उसमें समझना यह भी होगा कि एक वक्त के बाद संपादक भी कारपोरेट के रास्ते क्यों चल पडता है। मसलन टीवी 18 जिस तरह पत्रकार मालिकों के हाथ से निकल कर कारपोरेट के पास चला गया उसमें टीवी 18 की साख बिकी। न कि कोई बिल्डिंग। और पत्रकारों ने जिस मेहनत से एक मीडिया हाउस को खड़ा किया उसे कही ज्यादा रकम देकर अगर कोई कारपोरेट खरीद लेता है तो जिम्मेदारी होगी किसकी। यानी हमारे यहां इसकी कोई व्यवस्था ही नहीं है है कि किसी मीडिया हाउस में काम कर रहे पत्रकारों की मेहनत उन्हें कंपनी के शेयर में हिस्सादारी देकर ऐसा चेक-बैलेंस खडा कर दें जिससे कोई कारपोरेट हिस्सेदारी के लिये किसी संस्थान को खरीदने निकले तो उसे सिर्फ एक या दो पत्रकार मालिकों से नहीं बल्कि पत्रकारों के ही बोर्ड से दो दो हाथ करने पड़ें। या फिर मीडिया हाउस पत्रकारों के हाथ में ठीक उसी तरह रहे जैसे खबरों को लेकर पत्रकार मेहनत कर अपने संस्थान को साख
दिलाता है।

Friday, August 7, 2015

आतंक के बदलते चेहरे से कैसे निपटे भारत ?

कसाब फरीदकोट के ओकारा गांव का था। नावेद फैसलाबाद की शहरी कालोनी गुलाम मोहम्मद अबद का है। कसाब गरीब परिवार का था । नावेद मध्यम वर्ग के परिवार का है। कसाब पेट के लिये लश्कर के साथ जुड़ा। नावेद इस्लाम के नाम पर जमात-उल-दावा के साथ जुड़ा। कसाब के वक्त लश्कर की पूरी ट्रेनिग तालिबानी अंदाज में थी। नावेद के वक्त इस्लाम और आईएसआईएस की थ्योरी ने जमात उल दावा की तकरीर में जगह ले ली थी। कसाब के वक्त लश्कर चीफ हाफिज सईद कश्मीर की आजादी के नाम पर उसी तरह गरीब परिवारो से एक लड़का मांगा करता था जैसे अफगानिस्तान में तालिबान के लिये लश्कर समेत आंतक की कई तंजिमो ने पाकिस्तान के गरीब इलाको में तक को हील रोजगार और ताकत से जोड़ दिया था। वहीं नावेद के वक्त तक पाकिस्तान में तालिबान को लेकर मोहभंग होने लगा था। और आईएसआईएस के जरीय इस्लामिक राज्य को नये तरीके से परिभाषित करने की दिशा में तमात-उल-दावा के चीफ हाफिज सईद ने तकरीर शुरु कर दी थी। तो 1986 में बने लश्कर तोएबा के भारतीय संसद पर हमले के बाद ही 2002 में जमात-उल-दावा बनाकर हाफिज सईद ने आंतक को सामाजिक कार्यों से जोड़ कर खुद को विस्तार दे दिया। और पाकिस्तान मे भी किसी सरकार ने पहले लश्कर फिर जमात-उल-दावा को रोकने की कोशिश इसलिये नहीं की क्योंकि सामाजिक- आर्थिक तौर पर जिन बदनसीब हालातो का सामना पाकिस्तान का एक बड़ा तबका कर रहा है उसमें लश्कर ने अपनी फौज में भर्ती कर गरीब परिवारों के लिये रोजगार के अवसर भी खोले और इस्लाम को लेकर पाकिस्तान के रईसों के सामने चुनौती भी रखी। जब दुनिया भर में लश्कर-ए-तोएबा पर प्रतिबंध लगाया जाने लगा तो जमात-उल-दावा बनाकर आंतकी गतिविधियों के लिये सामाजिक-आर्थिक कार्यो को ढाल बनाया गया।

लेकिन भारत के लिये यह सारे सवाल कोई मायने नहीं रखते है कि पाकिस्तान में किस तरह आंतक सामाजिक जरुरतों से जुड़ गया। लेकिन भारत सरकार यह अब भी नहीं समझ पा रही है कि पाकिस्तान ही नहीं दुनिया भर में आंतक की परिभाषा बदल रही है। और उसी की झलक हर शुक्रवार को जुमे की नवाज के बाद श्रीनगर ने निचले इलाके की जामा मस्जिद के बाहर आईएसआईएस के झंडे उसी तर्ज पर लहराते हैं, जैसे कभी पाकिस्तान के झंडे लहराया करते थे । अंतर सिर्फ झंडो का ही नही आया है बल्कि चेहरा ढक कर जो हाथ झंडे लहराते है और नारे लगाते है वह युवा चेहरे गरीब या अनपढ़ नहीं है बल्कि पढ़े लिखे है और अच्छे परिवारों से आते हैं। यानी कश्मीर में भी आतंकवाद का चेहरा बदल रहा है। अब कश्मीर का पढा-लिखा युवा मौजूदा मुफ्ती सरकार या दिल्ली की मोदी सरकार के खिलाफ नारे लगाते हुये अपनी मौजूदगी आतंक के साथ जोडने से नहीं कतरा रहा है । यानी एक तरफ लश्कर-ए-तोएबा और जमात-उल-दावा के साथ पाकिस्तान का पढा लिखा युवा जुड़ रहा है या कहें पहली बार पाकिस्तान के भीतर नजर यह भी आ रहा है कि कालेज और यूनिवर्सिटी तक में जमात-उल-दावा की तकरीर होती है । और जिस फैसलाबाद से नावेद निकला वहां के शहरी मिजाज और पाकिस्तान के तीसरे सबसे सपन्न जिले फैसलाबाद के कालेजों में भी हाफिज सईद बीते दो बरस में छह बार पहुंचे। यानी जिस नावेद का एक बाई कालेज में पढ़ाता है। एक भाई बिजनेस करता है । बहन यूनिवर्सिटी में पढ़ती है। उस परिवार से नावेद जमात-उल-दावा की तकरीर से प्रभावित होकर लश्कर से जुड़ता है। वही कश्मीर में डाक्टरी की पढाई करने वाले से लेकर इंजीनियर और पीएचडी करने वाले छात्र हाथो में बंधूक थाम कर जब खुद को आतंकवादी करार देने से नहीं कतराते और अपनी तस्वीर को सोशल मीडिया में शेयर करने से नहीं कतराते। तो संकेत साफ उभरते है कि युवाओं को मुख्यधारा से कैसे जोड़ा जाये या आंतकवाद को लेकर जो परिभाषा कश्मीर या दिल्ली की सरकारें अभी तक गढ़ती रही है और आतंकवाद पर नकेल कसने के लिये उसने जो भी उपाय किये है वह या तो फेल हो रहे है या उन्हीं तरीको को लेकर युवाओं में आक्रोश है।

पाकिस्तान की अपनी मजबूरी उसके पावर सेंटर को लेकर हो सकती है। क्योंकि पाकिस्तान में चुनी हुई सरकार के सामानांतर सेना और आईएआई की अपनी भूमिका ना सिर्फ बड़ी है बल्कि मौजूदा वक्त में तो नवाज शरीफ के हर कदम के उलट पाकिस्तानी सेना प्रमुख राहिल शरीफ ने पहल की है । लेकिन भारत में तो ऐसा बिलकुल नहीं है । चुनी हुई सरकार के साथ विदेश नीति को लेकर तो विपक्ष भी हम शा साथ खड़ा होता है। लेकिन पहली बार कश्मीर में पढे-लिखे युवा ही नहीं बल्कि कभी मुंबई, तो कभी हैदराबाद , कभी बैगलूर तो कभी केरल से किसी ना किसी युवा की आवाज आईएसआईएस को लेकर उभरती है तो नया सवाल यह होता है कि क्या आतंक की नई परिभाषा को गढते आईएस के लेकर युवा तबका समझ नहीं पा रहा है । कह सकते है कि आतंकवाद को लेकर बारत सरकार की पॉलसी हमेसा जीरो टालरेन्स की रही है। और पाकिस्तान के लिये आंतकवाद एक नेशवल पालेसी के तौर पर उभरती दिखायी देती है। जहां उसके कर्ता-धर्ता अलग अलग वक्त में अलग अलग प्लेयर हो जायें। क्योंकि आज अगर पाकिस्तानी सेना और आईएसआई भारत में तकवादियो की घुसपैठ करा रही है तो याद कीजिये मुशर्रफ के वक्त सरकार ही कश्मीर की आजादी की राग अलापने से नहीं कतरा रही थी । लेकिन फिर सवाल भारत की ही है। कश्मीर की सबसे बडी समस्या आज भी दिल्ली की नजर में आतंकवाद है। लेकिन इसके उलट अगर हकीकत को समझने का प्रयास करें तो कश्मीर का सबसे बडा संकट वह पढा लिखा है जिसके सामने आगे बढ़ने का कोई रास्ता है ही नहीं । क्योंकि कश्मीर को जब दिल्ली भी तक की जमीन के तौर पर देखती है तो वहां के युवा के लिये रास्ते खुद ब खुद बंद हो जाते हैं । जबकि होना तो यही चाहिये कि श्रीनगर देश के अलग अलग हिस्सो से वीकएंड स्पाट हो जाये । यानी दिल्ली , मुंबई, हैदराबाद या बैंगलूरु से शनिवार-रविवार रात गुजारने की जगह बन जानी चाहिये । विकास की जिस चकाचौंध को दिश में सरकार लाना चाहती हैल उतने ही जीने के विक्लप कश्मीरी युवाओं के पास होने चाहिये। यानी देश की मुख्यधारा में कश्मीरी खुद को जुड़ा आ कैसे महसूस करें और उसके भीतर कैसे यह एहसास जागे कि वह भारत से ना सिर्फ जुडा हुआ है बल्कि उसी के लिये उसे जीना-मरना है। यह मुश्किल इसलिये नहीं है क्योंकि घाटी में कल तक अलगाववादी पाकिस्तान के हक में खड़े थे तो युवा भी राजनीतिक विकल्प के साथ पाकिस्तान के हक में नारे लगाता था ।
लेकिन मौजूदा वक्त में पाकिस्तान के नहीं बल्कि आईएसआईएस और फिलिस्तीन के झंडे लेकर युवा लहराता है तो जुमे की नवाज के बाद हुर्रियत नेता उमर फारुक भी युवाओ के साथ खड़े हो जाते हैं। यानी अलगाववादियों को भी समझ में आ रहा है कि कश्मीर में आंतकवाद की 1989 वाली परिभाषा बदल रही है और अगर कश्मीरी युवा ही कोई लकीर खिंचना चाहता है तो वह उसके साथ चलेंगे।

अंतर सिर्फ यह नहीं आना चाहिये कि दिल्ली को लेकर कश्मीरी युवा का गुस्सा बरकरार रहे। तो अब सवाल तीन है । पहला क्या सरकार को कश्मीर समझने के लिये कश्मीरी युवाओं को समझना होगा । दूसरा क्या पाकिस्तान के साथ बातचीत को उस धरातल पर लाना होगा जहा पाकिस्तानी सत्ता के तीन ध्रुव भी उभरे और आंतक को लेकर उसकी स्टेट पॉलिसी भी दुनिया के सामने आये । और तीसरा पाकिस्तानी घुसपैठ करने वाले आंतकवादियो को मारने की जगह नावेद की तर्ज पर पकड़ कर संयुक्त राष्ट्र या दुनिया के अन्य मंचो को सबूत के तौर ऐसे जीवित आतंकवादियों को दिखाना चाहिये। यानी अभी तक पाकिस्तान और आंतकवाद को लेकर जो रास्ते अपनाये गये उन्हें बदलने की जरुरत है। क्योंकि मौजूदा हालात यह भी बताते है कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी पंजाब में खालिस्तान को फिर से जिवित करना चाहता है । और खालिस्तान को लेकर पाकिस्तान का के-टू यानी कश्मीर-टू फार्मूला कोई आज का नहीं है । बल्कि दो दशक पहल  ही इसकी बिसात बिछायी गई थी । लेकिन तब पंजाब पुलिस ने इसकी कमर तोड दी । लेकिन अभी पंजाब भी जिस तरह ड्रग का अड्डा है और वहा भी युवाओ के सामने मुख्यदारा को लेकर अंधियारी ज्यादा है । वैसे में गुरुदासपुर का हमला
चिंता का विषय तो है । और सबसे बडा सवाल यही है कि कश्मीर में अभी भी पाकिस्तानी घुसपैठ करने वाले आंतकवादियो को स्थानीय पनाह मिल रही है । नावेद के लिये सारे रास्ते अबु कासिम ने बनाये। लेकिन अबु कासिम के लिये कश्मीर में कौन रास्ते बताता रहा और कौन पनाह दिये हुये है यह भी सेना-पुलिस के पास जानकारी नहीं है । यानी नावेद तो रमजान के वक्त भारत में धुसा । लेकिन अबु कासिम तो 2008 में घुसा और कई आतंकी हिसा को अंजाम दिया । यानी किजिये तो 2013 में सेना के ट्रक पर किये गये हमले के पीछे भी अबु कासिम ही था, जिसमें 8 फौजी शहीद हो गये थे । ऐसे में आखिरी सवाल यही हाल कि जब 23 अगस्त को दिल्ली में पाकिस्तान के सुरक्षा सलाहकार सरताज अजीज बारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल से मिलेगें तो कसाब के तर्ज पर नावेद को लेकर भी सबूत और डोजियर सौपने का जिक्र होगा । या फिर भारत पहली बार जिन्दा तकवादी को पकडने के बाद भी बातचीत कर दुनिया को नया संदेश देगा कि अब पाकिस्तान क लेकर भारत का रवैया सिर्फ आंतक के मद्देनजर नहीं है बल्कि पाकिस्तान के भीतर का सच भी अब वह दुनिया के सामने ले कर आयेगा । इंतजार कीजिये क्योकि यह हर कोई जानता है कि पाकिस्तान पड़ोसी है जिसे बदला नहीं जा सकता।

Saturday, July 25, 2015

करोड़ों अकेले बेबस लोगों का देश

देश में अभी भी पचास करोड़ से ज्यादा वोटर किसी भी राजनीति दल के सदस्य नहीं हैं। और इतनी बडी तादाद में होने के बावजूद यह सभी वोटर अपनी अपनी जगह अकेले हैं। नहीं ऐसा भी नहीं है कि बाकि तीस करोड़ वोटर जो देश के किसी ना किसी राजनीतिक दल के सदस्य हैं, वे अकेले नहीं है। दरअसल अकेले हर
वोटर है। लेकिन एक एक वोट की ताकत मिलकर या कहे एकजुट होकर जब किसी राजनीतिक दल को सत्ता तक पहुंचा देती है तो वह राजनीतिक दल अकेले नहीं होता। उसके भीतर का संगठन एक होकर सत्ता चलाते हुये वोटरो को फिर अलग थलग कर देता है। यानी जनता की एकजुटता वोट के तौर पर नजर आये । और वोट की ताकत से जनता नहीं राजनीतिक दल मजबूत और एकजुट हो जाये । और इसे ही लोकतंत्र करार दिया जाये तो इससे बडा धोखा और क्या हो सकता है। क्योंकि राजनीतिक पार्टी को सत्ता या कहे ताकत जनता देती है। लेकिन ताकत का इस्तेमाल जनता को मजबूत या एकजूट करने की जगह राजनीतिक दल खुद को खुद को मजबूत करने के लिये करते हैं। एक वक्त काग्रेस ने यह काम वोटरों को बांट कर सियासी लाभ देने के नाम पर किया तो बीजेपी अपने सदस्य संख्या को ग्यारह करोड़ बताने से लेकर स्वयंसेवक होकर काम करने के नाम पर कर रही है ।

यानी सत्ता को लेकर जनता के सामने सबसे बडी पशोपेश यही है कि अगर वह सत्तादारी पार्टी के रंग में नहीं रंगती है तो फिर वह तादाद में कितनी भी ज्यादा हो लेकिन वह हमेशा अकेले ही रहेगी। और सत्ताधारी के लिये एक ऐसा सिस्टम बना हुआ है जो झटके में जनता का नाम लेकर सत्ता के लिये काम करता है। पुलिस जनता के लिये होकर भी सत्ताधारी के इशारे पर काम करेगी। तमाम संस्थान जनता के लिये बनाये गये लेकिन वह सत्ता के इशारे पर ही काम करेंगे। न्यायपालिका और संवैधानिक संस्थानो को सत्ता से अलग उनकी स्वायत्ता के आधार पर परिभाषित तो किया जायेगा। लेकिन संवैधानिक होकर इनके काम करने के तरीके भी बिना सत्ता के इशारे के चल नहीं सकते यह नियुक्ति से लेकर संस्थानो के आपसी तालमेल बनाकर काम करने के तरीकों को परखते ही सामने लगातार आ रहा है। यानी कोई सत्ता चाहकर भी जनता को उसके अपने दायरे में एक सोच से एकजुट कर नहीं सकती। क्योंकि सत्ता की एकजुटता जनता के बिखराव पर ही टिकी है। और जनता की एकजुटता सत्ता के विरोध पर टिकी है । तो तीन सवाल मौजूदा व्यवस्था को लेकर किसी भी आम जनता के जहन में उठ सकता है। पहला, जनता की सत्ता और राजनीतिक पार्टी की सत्ता में अंतर है। दूसरा, जो जनता की दुहाई देकर नीतिया लाते या लागू कराते है वह सत्ता की सोच होती है और उसका सभी वोटरों से तो नहीं ही बहुसंख्यक जनता के हित से भी कुछ भी लेना देना नहीं होता।

तीसरा, सत्ता मिलते ही राजनीतिक दल को एक ऐसी व्यवस्था मिल जाती है जिसे वह सत्ता को ताकत देने का खुला इस्तेमाल जनता के नाम पर कर सकता है। यानी जन और दल के बीच मौजूद सत्ता तक जन की पहुंच कभी हो नहीं सकती। लेकिन जन का नाम लेकर उसे भावानात्मक तौर पर सत्ता के विरोध में खड़ाकर सत्ता पाने के तरीके को ही देश में संघर्ष और आंदोलन का नाम दिया जाता रहा है। मौजूदा वक्त में नरेन्द्र मोदी और केजरीवाल इसकी एक बेहतरीन मिसाल है। केजरीवाल ने सत्ता का विरोध आंदोलन के जरीये किया तो नरेन्द्र मोदी ने सत्ता का विरोध चुनावी तौर तरीको से किया। केजरीवाल के संघर्ष में जनता भी सड़क पर उतरी । मुठ्ठी उसने भी कसी। नारे उसने भी लगाये। मोदी के संघर्ष में चुनावी बिसात सत्ता के विरोध में जन-आंकाक्षाओ के अनुरुप बनी तो जनता ने मोदी के हर राग में संगीत दिया। केजरीवाल ने स्वराज का राग अलापा तो मोदी ने
विकास और सुशासन का। दोनों ने सत्ता के लिये लकीर अलग अलग जरुर खींची। लेकिन दोनों के निशाने पर वही सत्ता रही जिस कभी जनता ने चुना। जनता की भावनाओं ने लुटियन्स की दिल्ली की रईसी को मोदी के गरीबो की नब्ज पकड़ने के हुनर तले ढहते देखा। तो केजरीवाल के आंदोलन तले राजनीतिक व्यवस्था बदलने के नारों के हुनर तले काग्रेस-बीजेपी के धुरंधरों को ढहते देखा। दोनों ही उस दिल्ली को पराजित कर दिल्ली पहुंचे जिस दिल्ली की सत्ता को डिगाने की ताकत पारंपरिक राजनीति में नहीं थी । या फिर हर राजनीतिक दल एक सरीखा हो चला था और जनता की आस, उम्मीद टूट रही थी। इसलिये मोदी में बीजेपी का अक्स किसी ने नहीं देखा और केजरीवाल में पारंपरिक राजनीति का अक्स किसी ने नहीं देखा। लेकिन दोनों सत्तावान बने तो संघर्ष अपनी सत्ता बचाने और दूसरे की सत्ता ढहाने के लिये उन्ही सांस्थानिक ढांचे का खेल शुरु हुआ जिसका कोई चेहरा तो होता नहीं। और झटके में दोनो ही इतने बचकाने हो गये कि सत्ता का खेल व्यवस्था को अपनी सत्ता के अनुकूल करने में ही खेला जाने लगा। पुलिस किसके पास रहेगी । संवैधानिक संस्थानो पर अपनो की नियुक्ति कैसे हो । सत्ता की सोच के अनुकूल दिल्ली ही नहीं देश भर के संसथान तभी काम करेंगे जब सत्ताधारी की सियासी सोच के रंग में रंगे अधिकारियों के हाथो में लगाम होगी। जांच एंजेंसी को अपनी नाक तले रखे बगैर कैसे भ्रष्टाचारियों को पकड़ा जा सकता है। अस्पताल, स्कूल, सड़क पानी, सस्ता खाना सबकुछ सियासी बिसात के मोहरे कैसे हो सकते हैं। और विकास के लिये विदेशी पूंजी से लेकर राजनीतिक दल चलाने के लिये जनता का चंदा। और इस राजनीतिक गोरखधंधे में पुलिस हो या नौकरशाह या फिर कोई अदना सा अधिकारी वह भी अपनी सुरक्षा के लिये सत्ता को ही देश मानने से क्यों हिचकेगा।  तो क्या वाकई कोई वैक्लिपक सोच किसी के पास नहीं है। या फिर वैकल्पिक सोच तभी लायी जा सकती है जब समूचा तंत्र सत्ताधारी के इशारे पर काम करने लगे ।

या फिर पहली बार देश के सामने सबसे बडी चुनौती यही है कि वह सत्ता की परिभाषा बदल दें। क्योंकि समूचा तंत्र ही जब सत्ता के इशारे पर काम करने लगता है तो होता क्या है यह भी किसी से छुपा नहीं है। गुजरात में पुलिस नरेन्द्र मोदी की हो गई था तो 2002 के दंगों ने दुनिया के सामने राजधर्म का पालन ना करने सबसे विभत्स चेहरा रखा । 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या को बडे वृक्ष के गिरने से हिलती जमीन को देखने की सत्ता की चाहत में खुलेआम नरसंहार हुआ। शिवराज सिंह चौहान ने मध्यप्रदेश में शिंकजा कसा तो लाखो छात्रों की प्रतियोगी परीक्षा धंधे में बदल गई। रमन सिंह ने छत्तीसगढ़ में शिंकजा कसा तो आदिवासियों के हिस्से का चावल भी सत्ताधारी डकारने से नहीं चूके। लेकिन वहीं नरेन्द्र मोदी गुजरात से दिल्ली आते हैं तो दिल्ली के जख्मो को दिल्ली पुलिस थाम नही सकती। लेकिन केन्द्रीय जांच एंजेसिया बीजेपी अध्यक्ष को रहस्मय तरीके से क्लीन चिट देने की दिशा में बढ़ने से नहीं कतराती है। तो केजरीवाल को लगता है कि दिल्ली पुलिस उनके मातहत आ जाये तो वह दिल्ली में कोई जख्म होने नही देंगे। पूर्ण राज्य का दर्जा दिल्ली को मिल जाये तो दिल्ली को स्वर्ग बना देंगे।

लेकिन दिल्ली को स्वर्ग बनाने की दिशा में वह खुद को और पार्टी कार्यकर्ताओं को ही सबसे बडा देवता मान कर जिस राह पर चल पडते है, उसमें सुविधाओ को बटोरने की होड़ से लेकर आम से खास होकर सत्ता चलाने की नायाब जिद दिखायी पडती है। यह जिद बौद्दिक सहनशीलता को इस रुप में बार बार प्रकट करती है जिसमें सामने वाले को अंगुली उठाने का हक देना भर ही खुद को लोकतंत्रिक करार देने का निर्णय होता है। यानी करेंगे वही जो खुद के लिये सही होगा क्योंकि जनता ने बहुमत दिया है। तो केजरीवाल हो या मोदी अपने अपने घेरे में अपने कैडर को ही देशबाक्त मान कर सियासत साधने निकल पड़ते है। और यही से सवाल उठता है कि सत्ता किसी के पास हो या पिर सत्ता के लिये टकराते जो भू चेहरे वैचारिक तौर पर अलग अलग दिकायी देते हो लेकिन सत्ता ही सत्ता के लिये लडने वालो को एकजूट कर देती है और अस्सी करोड वोटर अपनी जगह अलग थलग होकर न्यूनतम की लड़ाई में ही उम्र गुजार देता है । लेकिन मौजूदा वक्त में सियासी चक्रव्यूह ने पहली बार मोदी और केजरीवाल के जरीये आम जनता में जिन आकांक्षाओं को जगाया है, असर उसी का बेचैनी हर किसी में है। आम आदमी की बैचेनी परेशानी से जूझते हुये है। खास लोगों की बैचेनी सत्ता सुख गंवाने के डर की है। विरोध में उठे हाथ गुस्से में हैं। गुस्सा जीने का हक मांग रहा है। सत्ता को यह बर्दाश्त नहीं है तो वह गुस्से में उठे हाथों को
चिढ़ाने के लिये और ज्यादा गुस्सा दिलाने पर आमादा है। तो गुस्सा सत्ता में भी है और सत्ता पाने के लिये बैचेन विपक्ष में भी। तो गुस्सा ही सत्ता है और गुस्सा ही प्यादा है। गुस्सा दिखाना भय की मार सहते सहते निर्भय होकर सत्ता को डराना भी है और सत्ता का गुस्सा भ्रष्टाचार और महंगाई में डूबी साख बनाने का खेल भी है।
आदिवासी, किसान, मजदूर और ग्रामीणो के संघर्ष का रास्ता इसी दौर में हाशिये पर है, जब गुस्से और संघर्ष का सबसे तीखा माहौल देश में बन रहा है। वही आवाज इस दौर में सत्ता को चेता पाने में गैर जरुरी सी लग रही है जो सीधे उत्पादन से जुड़ी थी। देश की भूख से जुड़ी थी। बहुसंख्यक समाज से जुड़ी थी। तो क्या पहली बार देश को यह समझ में आ रहा है कि सत्ता की परिभाषा बदलने का वक्त आ गया है। क्योंकि विदेशी पूंजी से विकास हो नहीं सकता। और संसद के ही नियंत्रण में अगर पंचायत रहे तो चौखम्मा राज जीया नहीं जा सकता। तो क्या उत्पादन को सबसे अहम देश में माना जा सकता है। जो किसान खेती से देश का पेट भर रहा है उस खेतीहर जमीन को राष्ट्रीय संपदा घोषित करने का वक्त आ गया है । उत्पादन से जुडे तबके को मजबूत करने से लेकर उसी के जरीये देश की नीतियों को लागू कराने के हालात देश में लाये जा सकते है। क्योंकि भारत की पहचान तो उसके हुनर से रही है । आजादी के वक्त भी देश में दो करोड से ज्यादा हाथ कुटिर और लघु उघोग से जुड़े थे । लेकिन मौजूदा वक्त में पारंपरिक हुनरमंद को खत्म कर आईटीआई के डिग्रीधारी व्यवस्था को ही स्कील इंडिया माना जा रहा है। क्योंकि गुस्से और संघर्ष की वही आवाज हमेशा की तरह आज भी सबसे तेज सुनायी दे रही है जो महानगरों से जुड़ी है। सर्विस सेक्टर से जुड़ी है। शिक्षा पाने के बाद बेरोजगारी से जुड़ी है। या रोजगार पाने के बाद हर जरुरत को जुगाड़ने के लिये भ्रष्टाचार के कटोरे में कुछ ना कुछ डाल कर ही जिये जा रही है। शहरी चमक-दमक से निकला संघर्ष चमक-दमक की दुनिया में सेंध लगाकर व्यवस्था बदलाव का सपना बीते साठ बरस से बार बार जगा रहा है। पत्रकार,शिक्षक, बाबू, वकील जैसे हुनर मंद मान चुके है कि अगर चोरों की व्यवस्था में हर किसी को दस्तावेज पर चोर बता दिया जाये तो चोर व्यवस्था बदल जायेगी। व्यवस्था बदलने की होड़ में शहरी गुस्सा इतना ज्यादा है कि राबर्ट वाड्रा हो या मुकेश अंबानी या फिर वसुंधरा राजे हो या शिवराज सिंह चौहाण इनके भ्रष्टाचार की कहानी के खिलाफ खुलासे की शुरुआत या अंत की कहानी में उस आम आदमी की भागेदारी कहा कैसे होगी, जहां उसका गुस्सा पेट से निकल कर पेट में ही समा रहा है। यह किसी को नहीं पता। सिर्फ आस है कि आज गुस्सा सड़क पर निकला तो कल पेट भी भरेगा। और सियासी घमाचौकड़ी का गुस्सा विकास के खिंची गई भ्रष्ट लकीर को भ्रष्ट ठहरा रहा कर नियम-कायदों को ठीक करने के लिये आम आदमी के गुस्से को सड़क पर दिखला कर वापस अपने घर लौट रहा है। दूरियां पट रही हैं या दूरिया बढ़ रही हैं। क्योंकि सवाल उस जमीन को खड़े आम लोगो के गुस्से का नहीं है, जिस जमीन को हड़पने या उसे बचाने का शहरी खेल संसद से सडक तक में हर कोई बार बार खेल रहा है। सवाल उन लोगों का है जिनकी जमीन उनका जीवन है। और पीढि़यो से खिलाती आई उसी जमीन को अब देश की संपत्ति बता कर खोखला बनाने की विकास नीति चौमुखी तौर पर स्वीकार कर ली गई है। सवाल उन लोगों का है, जिनके लिये संस्थानों का होना लोकतंत्र का होना बताया गया। लेकिन आधुनिक धारा में वहीं संस्थान लोकतंत्र को भी खरीद-बेच कर धनतंत्र में बदल गये। सवाल उन लोगों का है, जिनके लिये संसदीय धारा आजाद होने का नारा रहा। और अब वही संसदीय धारा गुलाम बना कर मुंह के कौर को भी छीनने पर आमादा है। क्या पेट में समाये इस गुस्से को भूमि-सुधार, खाद्य सुरक्षा बिल और राजनीतिक व्यवस्था के बंद दरवाजों के खोलने से खत्म किया जा सकता है। क्या वाकई देश के गुस्से को सही राह वही शहरी मिजाज देगा जिसने स्वदेशी का राजनीतिक पाठ किया और बाजार व्यवस्था
में गंवाने या पाने की तिकड़मो को समझने के बाद व्यवस्था बदलने का सवाल उठा दिया। क्यों वाकई देश के गुस्से को राह वही शहरी देगा, जिसने कानवेन्ट में पढ़ाई की और अब महात्मा गांधी के स्वराज को याद कर व्यवस्था बदलने का नारा लगाना शुरु कर दिया। या फिर लुटियन्स की दिल्ली की वह सियासी मशक्कत देश के गुस्से को शांत करेगी, जिसे राजनीतिक पैकेज में ही हर पेट के भीतर की कुलबुलाहट और भूख को बेच कर कॉरपोरेट के कमीशन से विकास दर का चढ़ता हुआ तीर चमकते हुये सूरज सरीखा दिखायी देता है। यानी संघर्ष और गुस्सा भी अगर लूट की भागीदारी या सत्ता संघर्ष का हिस्सा बन जाये तो फिर रास्ता है क्या। और रास्ता निकाला ना गया तो हर रास्ता उसी सत्ता को पाने की होड में शामिल होकर दुनिया के सपबसे बडे लोकतंत्र का राग ही गायेगा। जहां पचास करोड से ज्यादा वोटर अकेला है। और संसद से पंचायत तक यानी पीएमओ से मुखिया तक महज साढे पैतिस लाख लोगों की सत्ता ही देश है।

Friday, July 17, 2015

सलमान ने मोदी-नवाज से भाईजान देखने को क्यों कहा?

क्या आवाम की ताकत सत्ता और सेना को डिगा सकती है? खासकर भारत पाकिस्तान के संबंधों की जटिलता के बीच। जहां सत्ता बात करती है तो पाकिस्तानी सेना  हरकत अगले ही दिन सीमा पर दिखायी देने लगती है। लेकिन सिल्वर स्क्रीन पर अगर यह सपना परोसा जाता है कि आवाम की ताकत सत्ता और सेना को डिगा
सकती है तो फिर कई सवाल बजरंगी भाईजान के जरीये सलमान खान ने ईद के मौके पर पैदा कर दिये हैं। पहला सवाल क्या सेना और सत्ता ने ही भारत पाकिस्तान के संबंधों को उलझा कर रखा है। दूसरा सवाल अगर हिन्दुओं के कदम बढ़े तो वे समझ जायेंगे कि मस्जिद में कभी ताले नहीं लगते क्योंकि कोई भी कभी भी वहां आ
सकता है। तीसरा सवाल मानवीयता और सरोकार ही अगर मुद्दा बन जायें तो धर्म की कट्टरता भी खत्म हो जाती है।

दरअसल भारत पाकिसातन के संबंधों को लेकर सियासी नजरिये से फिल्में तो कई बनीं या कहें सियासी नजरिये को ही केन्द्र में रखकर फिल्म निर्माण खूब हुये हैं जो दोनो देशो के बीच युद्द और घृणा के खुले संकेत देकर फिल्म देखने वालो के खून गर्म कर देते हैं। लेकिन आंखों में आंसू भरकर लाइन ऑफ कन्ट्रोल को खत्म होते हुये देखने का कोई सुकून भी हो सकता है और पाकिस्तान की जो सेना चुनी हुई सत्ता से भी ताकतवर नजर आती हो वह आवाम के सामने यह कहकर झुक जाये कि हम तो आवाम के सामने तादाद छटाक भर है। इसलिये रास्ता छोड़ते हैं। यह सोच पाकिस्तान को लेकर कही फिट बैठती नहीं दिखती लेकिन यह सिल्वर स्क्रीन का नायाब प्रयोग ईद के मौके पर ही आया जब कबीर खान के निर्देशन में सलमान खान हनुमान भक्त होकर जय श्रीराम कहते हुये पाकिस्तान में चले जाते हैं और वहां की आवाम भी हनुमान भक्त के साथ खडे होकर जय श्रीराम बोलने में नहीं हिचकती। और हनुमान भक्त को भी दरगाह या मस्जिद जाने या टोपी पहनने में कोई हिचकिचाहट नहीं होती। तो क्या पाकिस्तान के साथ संबंधों को लेकर सिनेमा बदल रहा है या फिर सलमान खान ने अपने कद का लाभ उठाते हुये चाहे-अनचाहे में सिल्वर स्क्रीन पर एक ऐसा प्रयोग कर दिया जो दोनों देशों के सत्ताधारियों के जहन में कभी किसी बातचीत में नहीं उठा कि बर्लिन की दीवार की तर्ज पर भारत पाकिस्तान के बीच खड़ी दीवार को आवाम ठीक उसी तरह गिरा सकती है जैसे 9 नवंबर 1989 को बर्लिन में गिराया गया था।

संयोग ऐसा है कि जिस वक्त बर्लिन की दीवार गिरी उसी वक्त कश्मीर में आतंक की पहली बडी घुसपैठ भी शुरु हुई। महीने भर बाद 8 दिसबंर 1989 को रुबिया सईद के अपहरण के बाद सीमा पार से आतंक की दस्तक कुछ ऐसी हुई जिसने सबसे ज्यादा उसी आवाम को प्रभावित किया जिस आवाम के जरीये सिल्वर स्क्रीन बदलाव की रौ जगाना चाहता है। और वह कैसे अब एक नये युवा आंतक में बदल रही है यह घाटी में लहराते आईएसआईएस और फिलिस्तीन झंडों के लहराने से भी समझा जा सकता है। क्योंकि विदाई रमजान के दिन जिस तरह वादी में जामा मास्जिद की छत पर चढ कर फिलिस्तीन, पाकिस्तानी और आईएसआईएस के झंडे लहराये गये और झंडों के लहराने के बाद हर जुम्मे की नवाज के बाद जिस तरह सुरक्षाकरमियो पर पत्थर फेंके गये। झड़प हुई। पुलिस ने लाठिया भांजी। आसू गैस के गोले छोड़े । उसने सिर्फ कश्मीर घाटी के बदलते हालात को लेकर ही नये संकेत देने शुरु नहीं किये है बल्कि कश्मीर को लेकर नया सवाल आंतक से आगे आतंक को विचारधारा के तौर पर अपनाने के नये युवा जुनुन को उभारा। विचारधारा इसलिये क्योकि आईएसआईएस की पहचान पाकिस्तान से इतर इस्लाम को नये तरीके से दुनिया के सामने संघर्ष करते हुये दिखाया जा रहा है और घाटी में आज कोई पहला मौका नहीं था कि आईएसआईएस की झंडा लहराया गया। इससे पहले 27 जून को भी लहराया गया था और उससे पहले आधे दर्जनबार आईएसआईएस आंतक के नये चेहरे के तौर पर घाटी के युवाओ को आकर्षित कर रहा है यह नजर आया है। तो क्या आवाम को किस दिशा में ले जाना है यह सत्ता को भी नहीं पता है । और दिमाग या पेट से जुड़े आतंक को लेकर किसी सत्ता के पास कोई ब्लू प्रिट नहीं है। क्योंकि चंद दिनो पहले ही सेना की वर्दी में वादी के युवाकश्मीरियों के वीडियो ने कश्मीर से लेकर दिल्ली तक के होश फाख्ता कर दिये थे।

और दस दिन पहले सोशल मीडिया पर हथियारों से लैस युवा कश्मीरियो की इस तस्वीर ने घाटी में आंतक को लेकर नयी युवा सोच को लेकर कई सवाल खड़े किये थे। यानी घाटी की हवा में पहली बार पढ़ा लिखा युवा आतंक को महज सीमापार आतंकवादियों से नहीं जोड़ रहा है। बल्कि आईएसआईएस के बाद फिलिस्तीन का झंडा लहराकर अपने गुस्से को विस्तार दे रहा है। यानी आतंक की जो तस्वीर 1989 में रुबिया सईद के अपहरण के बाद कश्मीर के लाल चौक से लेकर लाइन आफ कन्ट्रोल तक हिसा के तौर पर लहराते हथियार और
नारों के जरीये सुनायी दे रहे थे ।और 1989 में जो कश्मीर आंतक की एक घटना के बाद दिल्ली से कट जाता था वही कश्मीर अब तकनीक के आसरे दिल्ली ही नहीं दुनिया से जुड़ा हुआ है। और घाटी ने बकायदा वोट डाल कर अपनी सरकार को चुना है। यानी 1989 वाले चुनाव दिल्ली के इशारे के आरोप भी अब नहीं है।


तो नया सवाल प्रधानमंत्री मोदी की नवाज शरीफ के साथ उफा की बैठक के मुद्दे और सिल्वर स्क्रीन पर बजरंगी भाईजान के जरीये रास्ता निकालने के बीच फंसे संबंधों का है। क्योंकि मौजूदा हालात घाटी में राजनीतिक आतंक की नई जमीन बना रहा है। जिसपर चुनी हुई सरकार का भी कोई वश नहीं है क्योंकि श्रीनगर हो या दिल्ली दोनो का नजरिया सीमा पार आंतक से आगे बढ नहीं पा रहा जबकि श्रीनगर के जामा मस्जिद पर लहराते झंडे संकेत दे रहे है कि सीरिया में सक्रिय आईएसआईएस ही नहीं बल्कि फिलिस्तीन के झंडे के जरीये इजरायल तक को मैसेज देने की कश्मीरी युवा सोच रहा है। यानी पहली बार यह सवाल छोटे पड़ रहे है कि कभी वाजपेयी को लाहौर बस ले जाने की एवज में करगिल युद्द मिला। तो -मोदी को उफा बैठक के बाद ड्रोन और सीमा पर फायरिंग मिली। यानी सियासत अगर हर बैठक के बाद उलझ जाती है तो पाकिस्तानी सेना की हरकत उभरती है । और आवाम अगर नफरत में जीती है तो आंतक के साये में धर्म को निशाने पर लिया जाता है । यानी दूरिया जिन वजहो से बनी है उन वजहों से आंख मूंद लिया जाये तो सिल्वर स्क्रीन का सपना सच हो सकता है। क्योंकि सलमान खान फिल्म में हिन्दुओं के उन तमाम जटिलताओं को जीते हुये इस्लाम की हदो में समाते है जो मौजूदा वक्त में संभव इसलिये नहीं लगता क्योकि धर्म की अपनी एक सत्ता है जो चुनी हुई सत्ता को बनाने और डिगाने की ताकत रखती है। और बजरंगी भाईजान भारत पाकिस्तान के संबंधों को लेकर धर्मसत्ता और आतंक दोनों सवालों पर मौन रहती है । यानी सवाल सिर्फ चुनी हुई सत्ता के सियासी तिकडमो और आवाम का हो तब तो लाइन आफ कन्ट्रोल का रास्ता निकाला जा सकता है । लेकिन जब सवाल सत्ता के लिये बातचीत और विचारधारा के लिये आंतक का हो चुका हो तब सरकार और सिल्वर स्क्रीन के बीच की दूरी कैसे मिट जाती है यह 10 जुलाई की उफा में बैठक के बाद के हालात और 17 जुलाई को बजरंगी भाईजान देखने के बाद कोई भी समझ सकता है कि आखिर सलमान खान ने ट्विट कर क्यों कहा कि प्रदानमंत्री मोदी और नवाज शरीफ को यह फिल्म जरुर देखनी चाहिये।