Sunday, July 24, 2016

सिल्वर स्क्रीन का डॉन "महानायक" क्यों ?

कबाली का अंदाज गुस्से का है । कबाली का अंदाज हाशिये पर पड़े व्यक्ति के चुनौती देने का है । कबाली का अंदाज सिस्टम से मार खाये नायक का है । कबाली का अंदाज खुद न्याय करने का है । सही मायने में ये अंदाज उस तलयवर का है जो आम आदमी का नायक है । और जब समाज में नायक बचे नहीं है तो सिल्वर स्क्रीन ही आम आदमी के दिलो में उतर कर एक एसा महानायक देता है जो सिस्टम को अपनी हथेली पर नचाता है । चकाचौंध की माफियागिरी को टक्कर देते हुये तीन घंटे में पोयटिक जस्टिस करता है । तो क्या रजनीकांत की उड़ान सिर्फ इतनी है । क्योकि याद किजिये सिल्वर स्क्रीन पर डॉन की भूमिका में पहली बार रजनी कांत दिखायी भी दिये तो बालीवुड स्टार अमिताभ बच्चन की फिल्म डॉन के रिमेक बिल्ला में । हर स्टाइल अमिताभ का । और 1980 में माना यही गया कि रजनीकांत तमिल फिल्मों के अमिताभ बच्चन हैं। लेकिन साढे तीन दशक
बाद सिल्वर स्क्रीन का वही तमिल नायक बालीवुड के नायकों को पीछे छोड़ इतना आगे निकल जायेगा कि मुंबई के सिनेमाघर भी उसकी फिल्म के लिये सुबह चार बजे खुल जायेंगे । या किसने सोचा होगा ।

वैसे याद किजिये तो एनटीआर ने भी अमिताभ बच्चन की डॉन के रिमेक के तौर पर युगान्धर फिल्म में बतौर डॉन की भूमिका को ही सिल्वर स्रिकन पर जिया । लेकिन बालीवुड को कभी छू भी नहीं पाये एनटीआर । और तमिल फिल्मो के लोकप्रिय एमजीआर तो दक्षिण भारत से आगे निकल ही नहीं पाये । कमाल हसन ने प्रयास जरुर किया लेकिन उनकी लोकप्रियता नायकन से आगे निकल नहीं पायी । तो रजनीकांत ने वह कौन सी नब्ज पकडी है जिसे बालीवड के खान बंधु हो या अमिताभ बच्चन वह भी इस नब्ज को पकड नहीं पाये । और समाज या राजनीति में भी नायक खत्म होते चले गये । तो समझना होगा कि निजी जिन्दगी में कुली बढई और कंडक्टरी करते हुये सिल्वर स्क्रीन के नायक बने रजनीकांत ने उस खोखले पन को हमेशा नकारा जो चकाचौंध और पावर तो देता है लेकिन आम आदमी से काट देता है । इसलिये उनके दरवाजे को जब भी राजनेताओं ने खटखटाया उन्हे ना ही सुनने को मिला । और रजनीकांत ने निजी जीवन से लेकर सिल्वर स्क्रीन पर भी उसी समाज से निकले उसी चरित्र को जीया जो समुदाय , जो समाज आज भी हाशिये पर है । इसीलिये तमाम तकनीकी माध्यमों से गुजरने वाली रजनीकांत की अदा सिल्वर स्किरन पर एक ईमानदार अदा बन जाती है । जो उन्हे आम जनता का नायक बना देती है ।

लेकिन सवाल यही कि आखिर डॉन का चरित्र ही नायक कैसे गढता है । वरदराजन मुदलियार ,हाजी मस्तान , दाउद , छोटा राजन ये नाम अंडरवर्लड डॉन के है । जाहिर है ये खलनायक है । लेकिन इन्ही डॉन की भूमिका को गढते हुये सिल्वर स्क्रीन पर जिस जिस कलाकार ने इसे जिया वह नायक बन गया । फिल्मों की कतार देखे । दीवार-, डॉन , दयावान , कंपनी-, सत्या , ब्लैक फ्राइडे , सरकार , अग्निपथ और वह सारी फिल्मे सफल हुई जो डॉन का ताना बाना बुनते हुये सिल्वर स्क्रिन पर आई और लोगो के दिमाग में छा गई । हिन्दी सिनेमा ही नहीं बल्कि दक्षिण की फिल्मो की फेरहसित देखे तो वहा भी हर वह फिल्म सफल हुई जो अ डरवर्ल्ड डॉन को लारजर दैन लाइफ बनाती । तमिल फिल्म बिल्ला , बाशा , जेमनी , अरिन्थुम अरियामुलुम , पुधुपेट्टई , पोक्किरी , मनकथा , सुदुकावुम और इसी कतार में अब कबाली का नाम भी लिया जा सकता है । जिसमें रजनीकांत डॉन की भूमिका में है । यानी लकीर बारिक है लेकिन डॉन का मतलब कही ना कही आम आदमी के हक में खड़ा शख्स होता है । जो सिल्वर स्किरन पर नायक । लेकिन कानून के नजर में अपराधी । तो क्या सिल्वर स्क्रीन का पोयटिक जस्टिस राजनीतिक न्याय  व्यवस्था पर भारी पडने लगा है । या फिर सिनेमा महज मनोरंजन है । ये सवाल इसलिये क्योकि सिनेमा में ज्यादातर डॉन दलित-पिछडे समाज से ही निकलते है । गरीबी और मुफलिसी में संघर्ष करते तबके में से कोई चुनौती देता है तो ही वह नायक बनता है । याद किजिये मुब्ई में वरदराजन मुदलियार डॉन के तौर पर तब खडा होता है जब लुंगी को मराठी मानुष की राजनीति चुनौती देती है ।
जीना मुहाल करती है ।और इसपर बनी फिल्म दयावान का नायक भी सिल्वर स्क्रीन पर कुछ इसी पहचान के साथ खड़ा होता है । तो क्या राजनीतिक तौर पर कोई नायक समाज को इसीलिये नहीं मिल पा रहा है क्योकि राजनीतिक न्याय व्यवस्था कानून के राज के बदले कानून पर ही राज करने लगती है । और समाज के भीतर का संघर्ष राजनीतिक सत्ता अपने अपने वोट बैक के नजरिये से हर जगह दबाती चली जाती है । ये सवाल इसलिये भी महत्वपूर्ण है जब मुनाफा और मार्केट इकनामी राजनीतिक सत्ता का भी मूलमंत्र बन चुका है तब समझाना होगा कि अंडरवर्ल्ड पर बनी फिल्मो का मुनाफा कमोवेश किसी भी सामान्य फिल्म की तुलना में 75 से 200 फिसदी ज्यादा होता है । और डॉन के चरित्र को लेकर बनी कबाली भी पहले ही दिन सारी फिल्मों की कमाई के सारे रिकार्ड तोड़ चुकी है ।

Wednesday, July 20, 2016

देश के भीतर का सच

आतंकवाद, उग्रवाद, नक्सवाद में सुलगता देश

कश्मीर में आतंकवाद , नार्थ इस्ट में उग्रवाद तो मध्य भारत में नक्सलवाद। और बीते 16 बरस का सच यही कि कुल 45 हजार 469 लोगों की मौत हो चुकी है।तो कश्मीर के आतंकवाद के मद्देनजर पहले राज्यसभा फिर लोकसभा में चर्चा केदौरान जब कई सवालो का जिक्र उठा तो सवाल ये भी उठा कि कश्मीर नार्थ इस्टऔर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों को लेकर सरकार की नीति होनी क्या चाहिये ।क्योंकि तीनों जगहों पर सुरक्षाकर्मियों को लगातार उस हिंसा का सामना करना पड़रहा है, जिसके तार कहीं ना कही सीमा पार से भी जा जुड़े है। गृह मंत्रालयकी ताजा रिपोर्ट भी तीनों जगहों को लेकर उस चिता को ही उभारती है, जहांकश्मीर में आतंक के पीछे पाकिस्तान है । तो नार्थ इस्ट में उग्रवाद के पीछे चीन का होना और बांग्लादेश की जमीन के इस्तेमाल को करना है । और -नक्सलवाद के पीछे अंतराष्ट्रीय माओवादी विचारधारा से मिलती मदद का होना है । यानी तीनो जगहों में लगातार हो रही हिंसा के मद्देनजर केन्द्र की सत्ता बदली हो या राज्यो में सत्ता परिवर्तन हुआ हो । हालातों में कोई अंतर नहीं आया। क्योंकि बीते 16 बरस में केन्द्र की सत्ता भी 360 डिग्री में घूम कर बीजेपी के पास आ चुकी है। और राज्यों में भी  र राजनीतिक दल ने सत्ता भोगी है । और मौत के आंकडे तीनो जगहों पर डराने वाले है । कश्मीर में 21 हजार 63 मौतों के अगर बांट दें तो 5262 नागरिक मारे गये । 3335 सुरक्षा कर्मी शहीद हो गये और 12466 आतंकवादी मारे गये । लहुलूहान नार्थ इस्ट भी हुआ है। जहां का 90 फिसदी हिस्सा अंतराष्ट्रीय बार्डर है । और वहां उग्रवाद की वजहों से 12281 लोग मारे जा चुके हैं, जिसमें 5112 नागरिक मारे गये तो 1130 सुरक्षाकर्मी शहीद हो गये । और 6 हजार 39 उग्रवादी मारे गये । वही नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ, झारखंड,बिहार, उडिसा,महाराष्ट्र, आध्रप्रेदेश और तेलंगाना के 35 जिलों में बीते सोलह बरस में 12 हजार 125 लोग मारे जा चुके है । जिसमें 5900 नागरिक गरीब पिछड़े आदिवासी किसान रहे हैं । 5628 माओवादी मारे जा चुके हैं। और देश के भीतर की हिसा से जुझते ढाई हजार से ज्यादा सुरक्षाकर्मी मारे जा चुके हैं। और 48 घंटे पहले ही बिहार-झारखंड सीमा पर 10 सुरक्षाकर्मी मारे गये तो सुरक्षाकर्मी ही अपनी सुरक्षा और सुविधा को लेकर फूट पड़े । यानी सुरक्षाकर्मियो के सामने भी आंतक , उग्रवाद या नक्सली हिसा से जुझते हुये अपने अपने संकट है । कही राजनीति आडे आती है । कहीं राज्यों के आपसी टकराव सामने आते है । तो कही केन्द्र राज्य टकराते है । तो कही सुरक्षाकर्मियों को सारी सुविधायें नहीं मिल पाती हैं।

और इन तीन हिस्सों को लेकर ठोस नीति ना होने की वजह से ही सेना, सुरक्षाकर्मी या कहें पुलिस को ही हर परिस्थितियों से जूझना पड़ रहा है। आलम ये है कि देश के इन तीन जगहों पर करीब नौ लाख सुरक्षाकर्मियों की तैनाती है । यानी राजनीतिक सरोकार पीछे छूट रहे हैं और युद्द से हालात देश के भीतर आंतरिक सुरक्षा के मद्देनजर कैसे बनते चले जा रहे हैं, इस सच को कोई सरकार क्यों नहीं समझ रही है ये भी सवाल है । जाहिर है ऐसे में आतंकवाद , उग्रवाद और नक्सली हिंसा से प्रभावित देश के इन तीन क्षेत्रो का एक सच ये भी है कि यहा राजनीति फैसलो से ज्यादा राजनीतिक सत्ता ने सुरक्षाकर्मियो के आसरे ही हालात पर नियंत्रण को चाहा है । क्योकि इन इलाको के सियासी अंतर्विरोध को संभालने की हालात में कोई राजदनीतिक सत्ता कभी आ नहीं पाय़ी और देश में सेना हो या अद्दसैनिक बल या फिर राज्यो की पुलिस । सबसे ज्यादा तैनाती उन्हीं इलाकों में है । ग्लोबल सिक्यूरटी रिपोर्ट की माने तो सिर्फ इन तीन इलाकों में करीब नौ लाख सुरक्षाकर्मीयो की तैनैाती हा । जिसमें कशमीर में करीब 4 लाख सुरक्षाकर्मी , नार्थ इस्ट में करीब तीन लाख और नक्सलप्रभावित इलाको में 164 667 सुरक्षाकर्मी । और बीते सौलह बरस में सिर्फ इन्ही क्षेत्रो में 7062 सुरक्षारर्मी शहीद हो चुके है । और इन इलाको को लेकर लगातार यही सवाल बडा होता चला गया कि सुरक्षाकर्मियो के आसरे कैसे आंतकवाद पर या उग्रवाद पर या पिर माओवाद पर नकेल कसी जा सकती है ।

यानी सुरक्षाकर्मियो  क्या क्या उपलब्ध कराया जाये जिससे वहा के हालात का सामना सेना, इद्दसैनिक बल कर सके । महत्वपूर्ण है कि गृहमंत्रालय की ताजा रिपोर्ट में ही तैनात सुरक्षाकर्मियो को दी जाने वाली सुविधा, आधुनिकीकरण और मुआवजे को लेकर सवाल है । यानी सेना के आधुनिकरण के साथ साथ । तैनात सुरक्षाकर्मियो को दी जाने वाली सुविधा और शहीद होने के बाद परिनजनो की राहत की राशी बढाने का जिक्र किया गया है । यानी तीनो क्षेत्रो का सुरक्षा बजट बीते 16 बरस में 200 फिसदी तक बढ गया । लेकिन हालात फिर भी नियत्रंण में नहीं आ रहे है तो सवाल समाजिक-राजनीति समाधान के ना खोजने का है । क्योंकि याद कीजिए दंतेवाड़ा में जिस वक्त 76 सीआरपीएफ के जवानों को नक्सलियों ने खूनी भिडंत के बाद मार गिराया था-उस वक्त केंद्र में मनमोहन सरकार थी और उस वक्त बीजेपी ने यह कहते हुए कांग्रेस पर निशाना साधा था कि पूरी सरकार ही फेल है। और अब तो बीजेपी ही सत्ता में है । और बिहार -झारखंड सीमा पर नक्सली हिसा में 10 सुरक्षाकर्मी मारे जाते है तो सत्त खामोश हो जाती है । लेकिन सवाल सियासत का नहीं सवाल नहीं । सवाल सरकारो के फेल पास का नहीं । बल्कि सवाल हालातो पर नियंत्रण को लेकर किसी नीति के ना होने का है । और असर इसी का है कि 2014 में 1091 नक्सली घटनाओ में 310 मौते हुई । तो 2015 में 1088 नक्सली घटनाओ में 226 मौते हुई । जबकि सरकार के ही आंकडे बताते है कि मौजूदा वक्त में 10 से 15 हजार नक्सली है और डेढ़ लाख से ज्यादा सुरक्षा बल तैनात है । यानी एक नक्सली पर 10 सुरक्षाकर्मी । और सुरक्षाकर्मियो की तैनाती का आलम ये है कि सीआरपीएफ की 85 बटालियन , बीएसएफ की 15 बटालियन, आईटीबीपी और एसएसबी की पांच -पांच बटालियन नक्सलप्रभावित क्षेत्रो में है । तो सवाल यही कि क्या सुरक्षाकरमियो के आसरे ही सामाजिक-आर्थिक हालातो से राजनीति मुंह चुरा रही है । या फिर राजनीतिक चुनावो के अंतविरोधो की वजह से सरकारे कोई ठोस नीति बना नहीं पा रही है । या फिर नीतिया बनाकर भी अमल में ला नहीं पा रही है । और संसद में बार बार यही सवाल कश्मीर को लेकर भी उठा कि समाधान का रास्ता तो राजनीतिक तौर पर ही निकलना होगा । अन्यथा घायलों की बढती तादाद और मौत की बढती संख्या को ही हमेशा गिनना पडेगा ।

Monday, July 11, 2016

जन्नत कैसे लाल हो गई ?

लाल चौक पर जब 1975 में शेख अब्दुल्ला ने जीत की रैली की तो लगा ऐसा कि समूची घाटी ही लाल चौक पर उमड पड़ी है। और 1989 में जब रुबिया सईद के अपहरण के बाद आतंकवाद ने लाल चौक पर खुली दस्तक दी तो लगा घाटी के हर वाशिंदे के हाथ में बंदूक है। और अब यानी 2016 में उसी लाल चौक पर आतंक के नाम पर खौफ पैदा करने वाला ऐसा सन्नाटा है कि किसी को 1989 की वापसी दिखायी दे रही है तो किसी को शेख सरीखे राजनेता का इंतजार है। वैसे घाटी का असल सच यही है कि कि लाल चौक की हर हरकत के पीछे दिल्ली की बिसात रही । और इसकी शुरुआत आजादी के तुरंत बाद ही शुरु हो गई । नेहरु का इशारा हुआ और 17 मार्च 1948 को कश्मीर के पीएम बने शेख अब्दुल्ला को अगस्त 1953 में ना सिर्फ सत्ता से बेदखल कर दिया गया बल्कि बिना आरोप जेल में डाल दिया  गया। और आजाद भारत में पहली बार कश्मीर घाटी में यह सवाल बड़ा होने लगा कि कश्मीर कठपुतली है और तार दिल्ली ही थामे हुये है। क्योंकि बीस बरस  बाद कश्मीर का नायाब प्रयोग इंदिरा गांधी ने शेख अब्दुल्ला के साथ 1974 में समझौता किया तो झटके में जो शेख अब्दुल्ला 1953 में दिल्ली के लिये खलनायक थे, वह शेख अब्दुल्ला 1975 में नायक बन गये। और पह  बार लाल चौक पर कश्मीरियों के महासमुद्र को उतरते हुये दुनिया ने देखा। और हर किसी ने माना अब कश्मीर को लेकर सारे सवाल खत्म हुये। और सही मायने में 1982 तक शेख अब्दुल्ला के जिन्दा रहते कश्मीर में बंदूक उठाने की जहमत किसी ने नहीं की। लेकिन 1989 की तस्वीर ने ना सिर्फ दिल्ली। बल्कि समूची दुनिया का ध्यान कश्मीर की तरफ ले गई। क्योंकि अफगानिस्तान से रुसी फौजें लौट चुकी थीं। तालिबान सिर उठा रहा था। पाकिस्तान में हलचल तेज थी। और दिल्ली के इशारे पर कश्मीर के चुनाव ने लोकतंत्र पर बंदूक इस तरह भारी कर दी। कि देश के गृहमंत्री की बेटी का अपहरण जेकेएलएफ ने किया ।

और पहली बार घाटी के सामने दिल्ली लाचार दिखी। तो लाल चौक पर लहराते बंदूक और आजादी के लगते नारो ने घाटी की तासिर ही बदल दी । और पहली बार जन्नत का रंग लाल दिखायी देने लगा। एक के बाद एक कर दर्जनों आतंकी संगठनों के दफ्तर खुलने लगे। रोजगार ही आतंक और आतंक ही जिन्दगी में कैसे कब बदलता चला गया इसकी थाह कोई ले ही नहीं पाया। आतंकी संगठनों की फेरहिस्त इतनी बढ़ी कि सरकार को कहना पड़ा कि आतंक के स्कूल हर समाधान पर भारी है । फेरहिस्त वाकई लंबी थी। हिजबुल मुजाहिदिन , लश्कर-ए-तोएबा , हरकत उल मुजाहिदिन , जैश-ए-मोहम्मद,जमात-उल मुजाजहिदिन ,हरकत - उल -जेहाद-अल-इस्लामी , अल-उमर-मुजाहिद्दिन , दुखतरान-ए-मिल्लत , लश्कर-ए-उमर , लश्कर -ए जब्बार , तहरीक उल मुजाहिद्दिन , जेकेएलएफ , मुत्तेहाद जेहाद काउंसिल के साथ दर्जन भर आंतकी संगठन । असर इसी का हुआ पहली बार गृह मंत्रालय ने माना कि घाटी में 30 हजार से ज्यादा आतंकवादी है । सेना ने मोर्चा संभाला तो घाटी ग्रेव यार्ड में बदली। 1990 से 1999 तक 20 हजार से लोग मारे गये । इनमें पांच हजार से ज्यादा सुरक्षाकर्मी थे। और इसके बाद घाटी में अमन चैन का दावा करने वाले हर प्रदानमंत्री के दौर को भी देख लें तो आंकडे डराते है
। क्योकि 1999 से 2016 यानी वाजपेयी से मोदी तक के दौर में 22504 लोग मारे गये । वाजपेयी के दौर में सबसे ज्यादा 15627 मौतें हुई. तो मनमोहन सिंह के दस बरस की सत्ता के दौर में 6498 लोगो की मौत हुई । तो मोदी के दो बरस के दौर में 419 लोगो की मौत हुई । यानी 22 हजार से मौत या कहें हत्या में नागरिक भी और सुरक्षा कर्मियो की लंबी फेरहसित भी और आतंकवादी भी । सेकिन इस सिलसिले् को रोके कौन और रुके कैसे यह सवाल दिल्ली के सामने इस दौर में बडा होता चला गया । तो कश्मीर की सियासत बिना दिल्ली के चल नही सकती इसका एहसास बाखूबी हर राजनीतिक दल को हुआ । कभी नेशनल कान्फ्रेंस तो कभी पीडीपी । बिना काग्रेस या बिना बीजेपी के दोनो सत्ता में कभी आ नहीं पाये । और कश्मीरी सियासत ने दिल्ली को ही ढाल बनाकर सत्ता भी भोगी और जिम्मेदारियो से मुंह भी चुराया । इसीलिये जो सवाल नेशनल कॉन्फ्रेंस की सत्ता के वक्त पीडीपी उठाती रही। वही सवाल अब पीडीपी की सत्ता के वक्त नेशनल कान्फ्रेंस उठा रही है । दोनो दौर में कश्मीरी राजनीति ने खुद को कैसे लाचार बताया या कहे बनाया। इसका अंदाजा इससे भी मिल सकता है कि फिलहाल घाटी में सडक पर सिर्फ सेना है । सीआरपीएफ है। पुलिस है । सीएम अपने मंत्रियों के साथ कमरे में गुफ्तगू कर दिल्ली की तरफ देख रही है । उमर अब्दुल्ला ट्वीट कर राजनीतिक समाधान खोजना चाह रहे है। और तमाम विधायक अपने घरों में कैद हैं। जो यह कह कर खुद को कश्मीरी युवकों के साथ खड़े कर रहे है कि बुरहान को जिन्दा पकड़ना चाहिये था । एनकाउंटर नहीं करना चाहिये था । तो क्या वाकई हालात 1989 वाले हो चले है । लेकिन घाटी में मरने वालो की फेहरिस्त देखें तो सड़क पर गुस्सा निकालते मारे गये 15 लड़कों का जन्म ही 1990 के बाद हुआ है। शब्बीर अहमद मीर [तंगपूरा बटमालू ] , अरफान अहमद मलिक [नेवा ], गुलजार अहमद पंडित [मोहनपोरा शॉपिया ], फयाज अहमद वाजा [ लिट्टर ], साकिब मंजूर मीर [खुंदरु अचाबल], खुर्शिद अहमद [हरवात, कुलवाम ] , सफीर अहमद बट [चरारीगाम ] ,अदिल बशीर [ दोरु ] , अब्दुल हमीद मौची [अरवानी ], दानिश अय्यूब शाह [ अचबल ], जहॉगीर अहमद गनी [ हासनपुरा, बिजबेहरा ] , अजाद हुसैन [ शॉपिया ] , एजाज अहमद ठॉकुर [ सिलिगाम, अनंतनाग ] , मो. अशऱफ डार [हलपोरा, कोकरनाग ] , शौकत अहमद मीर [ हासनपौरा, बिजबेहरा ] , हसीब अहमद गनई [डाईगाम, पुलवामा ] तो सभी का जन्म 1990 के बाद हुआ । हर की उम्र 18 से 26 के बीच और ये सभी बीते 72 घंटों में आंतकवादी बुरहान के मारे जाने के बाद सुरक्षाकर्मियो का विरोध करते हुये सडक पर निकले और मारे गये । तो क्या वाकई कश्मीर घाटी के हालात एक बार 1989 की याद दिलाने लगे है ।

या फिर आंतक को जिस तरह अब के युवा आजादी के सवालो से जोडते हुये रोमान्टिीसाइज कर रहे है वह 1989 के आतंक से कही आगे के हालात है। क्योंकि आजादी के नारे तले जो विफलता बार बार दिल्ली की रही और जो सियासत घाटी में खेली जाती रही। असर उसी का है कि घाटी के अंदरुनी हालात इतने तनावपूर्ण हैं कि हर छोटी सी चिंगारी उसमें भयानक आग की आशंका पैदा कर रही है । और ये चिंता इसलिए ज्यादा है क्योंकि नारे लगाने या पत्थर चलाने वाली पीढ़ी आधुनिक तकनालाजी के दौर की पीढी है । पढी लिखी पीढी है । विकास और चकाचौंध को समझने वाली पीढी है । और उसके सरोकार लोकतंत्र की मांग कर रहे है । जाहिर है ऐसे में याद महात्मा गांधी को भी कर लेना चाहिये । क्योंकि बंटवारे के ऐलान के साथ जिस वक्त देश में सांप्रदायिक हिंसा का दौर शुरु हो गया था-कश्मीर घाटी में शांति थी। या कहें लोगों में ऐसा मेलजोल था कि महात्मा गांधी भी दंग रह गए। 1 अगस्त 1947 को कश्मीर पहुंचे बापू ने उस वक्त अपनी प्रार्थना सभा में कहा भी- -"जब पूरा देश सांप्रदायिक हिंसा की आग में झुलस रहा है, मुझे सिर्फ कश्मीर में उम्मीद की किरण नजर आती है" या विभाजन के बाद सजिस तरह देश सांप्रदायिक हि्सा में जल रहा था उस वक्त जिस कश्मीर की शांति में गांधी को एकता की उम्मीद दिखी और जिस कश्मीर की संस्कृति में उन्हें हिन्दू मुसलमान सब एक लगे-वो घाटी आजादी के 68 साल बाद एक ऐसे मोड़ पर है,जहां गांधी की सोच बेमानी लग रही है या कहें कि सरकारों ने जिस तरह घाटी को राजनीति की बिसात पर मोहरा बना दिया-उसमें मात गांधी के विचारों की हो गई। क्योंकि-आज का सच यही है कि कश्मीर जल रहा है। आज का सच यही है कि घाटी में एक आतंकवादी के पक्ष में हुजूम उमड़ रहा है। और आज का सच यही है कि घाटी में आजादी के नारे भी लग रहे हैं और लोग सेना के सामने आकर भिड़ने से नहीं घबरा रहे। और सबके जेहन में एक ही सवाल है कि कश्मीर का होगा क्या। वैसे यही सवाल महात्मा गांधी से भी पूछा गया था कि आजादी के बाद कश्मीर का क्या होगा। तो गांधी ने जवाब दिया था "-कश्मीर का जो भी होगा-वो आपके मुताबिक होगा। " इतना ही नहीं, 27 अक्टूबर 1947 को महात्मा गांधी ने एक सभा में कहा-, " मैं आदरपूर्वक कहना चाहता हूं कि कश्मीर को राज्य में लोकप्रिय शासन लाना है। ऐसा ही हैदराबाद और जूनागढ़ के मामले में भी है। कश्मीर के वास्तविक शासक कश्मीर के लोग होने चाहिए। " यानी गांधी ने कश्मीर के लोगों की इच्छा को सर्वोपरि माना लेकिन सरकारों ने लोगों को ही हाशिए पर डाल दिया। नतीजा इसी का है कि घाटी के भीतर एक झटपटाहट है, और बुरहान उस आक्रोश को निकालने की तात्कालिक वजह।

Saturday, July 9, 2016

स्मृति इरानी के पर किसने कतरे?

संघ नाराज है स्मृति को हटाया क्यों?

28/29 जून को दिल्ली में भैयाजी जी जोशी के साथ स्मृति इरानी की शिक्षा नीति पर लंबी बातचीत होती है। 30 जून को स्मृति ईरानी ने एमएमयू मुद्दे पर एटॉर्नी जनरल से बातचीत करती है। 1 जुलाई को अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी पर स्मृति ईरानी हलफनामा तैयार करती है और सुप्रीम कोर्ट में इसे दाखिल भी किया जाता है। और 5 जुलाई मंत्रिमंडल विस्तार से ठीक पहले पीएमओ से नागपुर फोन जाता है। पीएमओ भैयाजी जोशी जानकारी देता है कि एचआरडी मिनिस्टर यानी स्मृति इरानी को बदला जा रहा है। यानी एक तरफ पीएमओ ने आखरी लम्हे में तय किया कि स्मृति इरानी को एचआरडी मनिस्टर से हटाया जायेगा। तो दूसरी तरफ राष्ट्रीय स्वयं सेवक  संघ आखरी वक्त तक स्मृति ईरानी शिक्षा मंत्री है और बनी रहेगीं के आसरे शिक्षा को लेकर अपनी रणनीति बनाने में ही लगा रहा । तो सवाल तीन है । पहला क्या स्मृति का हटना संघ के लिये भी झटका है । दूसरा, क्या शिक्षा नीति को लेकर संघ-सरकार टकरायेगें । और तीसरा क्या एचआरडी मंत्रालय में सिर्फ चेहरा बदला है बाकि सब स्मृति के दौर का ही रहेगा । जाहिर है तीसरा सवाल सबसे बडा है । क्योकि स्मृति ईरानी को मानवसंसाधन मंत्रालय से हटाने की सिर्फ जानकारी ही संघ को दी गई । उससे मैसेज यही गया कि सरकार के फैसले के आगे संघ की चलती नहीं । और स्मृति ईरानी की तरह कोई भी मंत्री अगर ये सोच कर काम कर रहा है कि संघ उसके साथ खड़ा है तो फिर स्मुति की तर्ज पर उसका पत्ता भी कभी भी कट सकता है और संघ चाहे ताकतवर दिखे लेकिन अमित शाह के सुझाव और मोदी के फैसले के आगे उसकी चलती नहीं है। खास बात तो ये भी है कि ना सिर्फ एएमयू का अल्पसंख्यक दर्जा या भारतीय शिक्षा नीति बल्कि स्मृति इरानी ने संघ के कहे मुताबिक ही सारी नियुक्ति कीं। चाहे वह नेशनल बुक ट्रेस्ट में बलदेव शर्मा हो या फिर आईसीएचआर में वाई सुदर्शन राव । और कमोवेश देश की हर यूनिवर्सिटी में वीसी की नियुक्ति में संघ की ही चली ना कि बीजेपी की। बीएचयू, डीयू और जेएनयू तक में वीसी की नियुक्ति के पीछे संघ ही ज्यादा सक्रिय रहा। यानी जो स्मृति इरानी संघ के इशारे पर देश की शिक्षा नीति बनाती रहीं अब उनके बदले प्रकाश जावडेकर आये तो क्या नीतियो में कोई परिवर्तन आयेगा या फिर संघ खामोश रहेगा या टकराव बढेगा । इन सवालों के मद्देनजर सरकार ने संध को कहा क्या महत्वपूर्ण यह भी है ।

लेकिन उससे पहले समझना ये भी होगा कि स्मृति इरानी नहीं बल्कि संघ ही शिक्षा मंत्रालय को कैसे चला रहा था ये 18 जून को दिल्ली के यूनिवर्सिटी एरिया में पटेल चेस्ट हासपिटल के एडिटोरियम में तब नजर आया जब एएमयू के अल्संपख्यक दर्जे की मान्यता खत्म करने को लेकर आरक्षण का सवाल उठाया गया । इस सभा में सवाल एएमयू का उठा लेकिन एएमयू के अल्पसंक्यक दर्जे को चुनौती देते हुये आंबेडकर की दलित नीति पर चर्चा हुई। और आरक्षण नीति के आसरे कैसे अल्पसंख्यक दर्जे को खारिज किया जा सकता है। इस पर बाखूबी चर्चा हुई और इसमे संघ, बीजेपी और सरकार के बीच तालमेल भी मानव संसाधन मंत्रालय के जरीये ही बनाया गया। यानी संध के लिये कितना महत्वपूर्ण है मानव संसाधन मंत्रालय यह इससे भी पता चलता है कि एएमयू की चर्चा में संघ और सरकार के बीच तालमेल बैठाने के लिये नियुक्त कृष्ण गोपाल के साथ बलवीर पुंज। सासंद कमलेश पासवान। और प्रो राजकुमार फलवारिया पहुंचे जिन्होंने एएमयू से आरक्षण जोडने का सवाल उठाकर किताब लिख डाली और इसे ही आधार बनाकर स्मुति इरानी ने हलफनामा तैयार कर दाखिल किया गया और अब 11 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट सुनवाई करेगा। लेकिन इस सभा में साक्षी महराज, विजय सोनकर, यूपी बीजेपी के अद्यक्ष केशव मोर्या, संगठन महामंत्री राम लाल । सांसद मूपेन्द्र यादव समेत यूपी बीजेपी के 50 विधायक तो करीब इतने ही सांसद जुटे। और मेघवाल जी का भाषण तो इतना जबरदस्त रहा कि उन्हें मोदी मंत्रीमंडल में जगह मिल गई। लेकिन इन सबसे इतर संघ के भीतर तो सवाल यही है कि जब स्मृति इरानी उनके कहे मुताबिक काम कर रही थी तो फिर उन्हे शिक्षा मंत्री के पद से हटाया क्यों गया। और सबसे महत्वपूर्ण यही है कि प्रकाश जावडेकर को कैबिनेट और डा महेन्द्र नाथ पांडे को राज्यमंत्री बनाकर कही ना कही संघ से टकराव ना हो इसे ध्यान में रख कर पैसला किया गया । क्योंकि सरकार की भीतर माना यही गया कि पुणे के प्रकाश जावडेकर अगर मराठी मानुष होकर नागपुर को समझा सकते है तो बीएचयू के डा पांडेय सरकार से तालमेल बनाने के लिये नियुक्त संघ के कृष्ण गोपाल को साध सकते है ।

लेकिन खामोश हालातों में भी संघ हो या सरकार दोनो की नजरे इसी पर टिकी है कि स्मृति इरानी अब कपड़ा मंत्री बनकर किसे निशाने पर लेगी। क्योंकि बनारस समेत समूचे पूर्वी यूपी में बड़ा सवाल बुनकरों का है। और माना जा रहा है कि स्मृति इरानी अब बुनकरो को साध कर बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को अपनी राजनीतिक समझ और ताकत दोनो दिखानी चाहती है। क्योंकि स्मृति के करीबियों का मानना है कि यूपी की नेता स्मृति इरानी ना बन पाये इसलिये बीजेपी अध्यक्ष ने उनके पर कतरे हैं।

Tuesday, July 5, 2016

जात ही पूछो नेता की

अजय टम्टा, कृष्णा राज, रमेश जिगजिनेगी , अर्जुन मेघवाल, रामदास आठवले । राजनीतिक तौर पर इन सभी की पहचान दलित नेता के ही तौर पर है । यानी मोदी मंत्रिमंडल में 19 नये चेहरों में पांच चेहरे दलित राजनीति को साधने वाले। यानी यूपी में 20 फिसदी दलित वोट बैंक को लेकर मायावती की राजनीतिक हवा कैसे निकाली जा सकती है, इस पर मोदी मंत्रिमंडल का ध्यान होगा ही इसे कैसे कोई इंकार करे। अगर और राजनीति की इस लकीर को मंत्रिमंडल के नये चेहरो तले खीचेंगे तो अनुप्रिया पटेल कुर्मी वोट बैंक में सेंध लगाने वाली लगेंगी। यानी नीतीश कुमार जिस तरह यूपी में चुनावी बिगुल कुर्मी वोट बैक को साथ समेटे नजर आने लगे हैं और समाजवादी पार्टी जिस तरह बेनी प्रासद वर्मा को साथ ले आई है, उन्हें अनुप्रिया पटेल के जरीये खारिज किया जा सकता है। यानी यूपी में 8 फीसदी कुर्मी वोट बैंक के लिये अनुप्रिया पटेल मोदी मंत्रिमंडल में शामिल हो गई है। तो प्रशांत किशोर जिस तरह काग्रेस को यूपी में बिखरे 13 फिसदी ब्राह्मण वोट बैक के अपने साथ लाने के लिये किसी ब्राह्मण चेहरे को सामने लाने की वकालत कर रहे हैं तो फिर चंदौली के सांसद महेन्द्र नाथ पांडे कांग्रेस की बिसात को ध्यान    रखकर मोदी मंत्रिमंडल में शामिल किये गये हैं। गुजरात में भी 2017 नवंबर में विधानसभा चुनाव होने हैं। और हार्दिक पटेल का आंदोलन गुजरात की सीएम आनंदी बेन से लेकर दिल्ली में बैठे अमित शाह और प्रधानमंत्री मोदी की नींद उड़ा रहा है तो करुअ पटेल पुरुषोत्तम रुपाला को मोदी मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है। जिससे पाटीदार समाज भी बंटे या फिर रुपाला केपी छे खडा हो जाये । और लेउवा पटेल का समाज मनसुख मांडविया के पीछे खड़ा हो जाये। यानी गुजरात की राजनीति के लिये रुपाला और मनसुख भाई फिट बैठते हैं । यानी सामाजिक समीकरण में ही कैसे मंत्रिमंडल फिट हो जाये इसके लिये आदिवासी नेता के तौर पर गुजरात में पहचान बना चुके जंसवत सिंह भभोर हो या मध्यप्रदेश के फग्गन सिंह कुलस्ते। दोनों मोदी मंत्रिमडल में जगह पा गया ।

और इसी तर्ज पर राजस्धान में जाट आरक्षण के राजनीतिक आंदोलन के सिरे को पकड़ने के लिये पूर्व नौकरशाह या शिक्षक के तौर पर पहचान बनाने वाले सीआर चौधरी की पहचान जाट राजनीति को थामने वाली हो गई। और उन्हें मोदी मंत्रिमंडल में जगह मिल गई। यानी चुनावी राजनीति कुछ इस तरह सत्ता चलाने तक पर हावी हो चुकी है कि पहली नजर वोट बैक को साधने के लिये उसी समाज के नेता को मंत्री पद देकर होती है। और दूसरी नजर नेता रहित किसी समुदाय केआंदोलन को सियासी नेता मंत्री बना कर देने की होती है। यानी सवाल यह नहीं कि सरकारें काम कर क्या रही है। सवाल यही है कि सरकार हो तो आने वाले वक्त में कहां कौन चुनाव जीतना है उसके लिये मंत्रिमंडल को ही हथियार बना लिया जाये। और अगर वाकई मंत्रिमंडल विस्तार के जरीये नजरें यूपी चुनाव पर ही हैं। तो नरेन्द्र मोदी, मायावती. मुलायम सिंह यादव और प्रियंका गाधी की पहचान है क्या। जाहिर है चारों को या तो देश का नेता होना चाहिये या फिर किसी प्रदेश का। लेकिन चुनाव के खेल में सत्ता के लिये देश हो या प्रदेश। हर नेता की पहचान उसके वोट बैंक से चाहे अनचाहे इस तरह जोड़ दी गई कि हर किसी की जाति ही उसकी पहचान है। और आलम ये हो चला है कि देश के प्रधानमंत्री मोदी को ओबीसी कहने में बीजेपी अध्यक्ष को भी हिचक नहीं होती। और पीएम के ओबीसी होने का जिक्र हर राज्य के चुनाव में बीजेपी ने लगातार किया । तो आप लोहिया को याद कर कह सकते हैं कि जाति तो देश का सच है इसे झुठलाया कैसे जाये। लेकिन क्या जाति के आसरे देश या प्रदेश आगे बढ़ सकता है। क्योंकि बीते 25 बरस से यूपी में कभी मायावती बतौर दलित नेता । तो कभी मुलायम बतौर यादवो के ऐसे सेकुलर नेता जिके साथ मुसलमान जुड़ जायें तो सत्ता मिल जाये। यानी मायावती के राज में दलित घर से बाहर निकलता है,बेखौफ होता है । तो मुलायम के दौर में यादव दबंग हो जाता है । और मुसलिम दोनो ही के दौर में खुद सत्ता के करीब पाकर भी वोट बैक की सहुलियत पाने से आगे बढ़ नहीं पाता। ऐसे में एक नजर प्रियंका गांधी पर भी जा सकती है। क्योंकि प्रियंका की पहचान जाति या धर्म से नहीं बल्कि गांधी परिवार से है।

और यही वजह है कि यूपी चुनाव में जब राष्ट्रीय पार्टी बीजेपी मंडल की राह पर है और यूपी की बिसात पर जितने भी खिलाड़ी हैं सभी जाति की पहचान के साथ ही अपना अपना वोट बैंक देख रहे हैं। तो प्रियंका गांधी के आसरे कांग्रेस नेहरु इंदिरा से लेकर राजीव तक की छवि को यूपी में भुनाने के लिये तैयार हो रही है। तो क्या इससे कांग्रेस को सत्ता मिल जायेगी। या फिर जिस राष्ट्रीय शंखनाद के साथ प्रधानमंत्री मोदी ने 2014 में राष्ट्रीय पहचान बनायी अब वह छोटे छोटे नेताओं के वोट के आसरे बीजेपी को यूपी में सत्ता पाते हुये देख रहे हैं। या बीजेपी की राष्ट्रीय छवि को राज्यों की राजनीति के आसरे बंटते हुये देखना चाह रहे हैं । क्योकि इसी से सत्ता मिलती है तो देश के हर चेहरे के आसरे सवाल यही बड़ा है कि सत्ता के लिये सभी देश को वोट बैंक में बांट रहे हैं। या फिर मंडल पार्ट टू की एसी थ्योरी देश में चल पड़ी है कि देश को स्टेट्समैन नहीं दांव-पेच कर सत्ता पाने वाला नेता ही चाहिये।

पढ़ा लिखा युवा गढ़ रहा है आतंक की नयी परिभाषा

9/11 यानी अमेरिका के ट्विन टावर पर अटैक । और बगदाद में दो दिन पहले दो धमाके । यानी बीते 15 बरस में आतंक के साये में दुनिया ही कुछ इस तरह आई कि 12 लाख से ज्यादा मौत आतंकी हिसा में हो गई । पचास लाख से ज्यादा लोगघायल हो गये । और ये सवाल बड़ा होने लगा कि क्या आतंक दुनिया को अपने मेंसमेटने वाला सबसे बडा धर्म और अर्थतंत्र तो नहीं बन रहा है । क्योंकि आतंकके मद्देनजर संयुक्त राष्ट्र से ही पांच स्थायी सदस्य देशों की हथियारलॉबी ने बीते 15 बरस में नब्बे लाख करोड का सीधा मुनाफा बनाया । धंधाकितने का हुआ और कुल लाभ कितना हो सकता है इसका कोई आंकड़ा कहीं नहीमिलेगा । लेकिन इसी आतंक ने दुनिया में तेल की राजनीति और कीमत दोनों परअसर डाल दिया । और दुनिया में अमेरिका , चीन रुस और यूरोपिय देशों के बीच नये गठबंधन बाजार अर्थव्यवस्था को लेकर अपरोक्ष तौर पर बने । लेकिन किसआतंक के खिलाफ कौन किसके साथ खडा है इसपर संबंध सीधे बने । और शायद आतंकके ग्राउंड जीरो एक नये पहचान के साथ उभरे ।

क्योंकि अफगानिस्तान , सिरिया और इराक में आतंक ने ऐसे पैर पसारे कि सिर्फइन तीन देसो में 11 लाख से ज्यादा मौतें हुई । तीस लाख से ज्यादा लोग घायलहो गये । और इन तीन देशो में आतंक पर नकेल कसने के लिये दुनिया के तमामताकतवर देश कुछ इस तरह कूदे कि आतंक ने पहली बार दुनिया को ही बांट दिया। क्योंकि 9/11 के आतंकी हमले ने सम्यताओं के टकराव के तौर पर अगर दुनियाको बांटा । तो बीते 15 बरस में रंगो में बांटी जा रही दुनिया में यह सवाल बड़ा होने लगा है कि क्या आतंक दुनिया को बांट देगा । जहा एक तरफ ईसाई 2 अरब 20 करोड़ है तो मुस्लिम एक अरब 60 करोड़ । और हिन्दू एक अरब । लेकिन टकराव धर्म के आदार पर नहीं बल्कि अर्थतंत्र की लडाई को ज्यादा उम्मीद से देख रही है । इसीलिये आतंक की पीठ पर सवार बाजार को महत्व देने वालीइक्नामी को संभाले दुनिया के सामने नया संकट खत्म होते विक्लपो का है । तो ध्यान दिजिये 2001 से पहले अगर आतंकवाद गरीबो के जरीये दुनिया में पैर पसार रहा था । तो 9/11 के बाद घार्मिक कट्टरता और पश्चिमी सम्यता के विकल्प की सोच लिये आतंकवाद को थामने वाला युवा आधुनिक शिक्षा-समाज-बाजार
सबसे जुडा है । संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की रिपोर्ट ही बताती है कि बीते 15 बरस में दुनिया भर में 2 हजार से ज्यादा आतंकी हिंसा हुई । इसमें शामिल 58 फीसदी आतंकवादी उच्च शिक्षा लिये हुये थे । 48 फिसदी तमाम सुख सुविधाओ को भोग चुके युवा थे । और 72 पिसदी कभी छात्र राजनीति या किसी ट्रेड यूनियन से इससे पहले कभी नहीं जुडे थे । यानी आतंक को लेकर जो चौकाने वाला सच 9/11 के वक्त पहली बार मिस्र के मोहम्मद अता के जरीये सामने आया कि जो हैम्बर्ग में उच्च शिक्षा लेने के बाद आतंक से जुडा । वह सच 2016 आते आते दुनिया की हकीकत बन जायेगा यह किसने सोचा होगा । क्योकि बीते एक महीने में यानी रमजान के दौर में ही अगर दुनिया के नक्शे पर जार्डन,लेबनान , यमन टर्की, बांगलादेश और इराक में हुये आतंकी हमलो में शामिल 60 फिसदी युवा उस परिवेश से निकला जिसे आधुनिक विकास के दायरे में आतंक से डरना चाहिये था । लेकिन इन युवा आतंकवादियो ने धर्म को भी अपने आतंक से परिभाषित किया । लेकिन परखना इस सच को भी होगा कि आखिर क्यो पढा लिखा और रईसी में जीने वाले आतंक के राह पर क्यो आ गये । क्योकि फेरहिस्त खासी लंबी है । मसलन ओसामा बिन लादेन, अल जवाहिरी , मोहम्मद अता ,अनवर अल अवलाकी ,निदाल हसन, बगदादी , जेहादी जॉन । यानी अलकायदा से लेकर आईएस तक के आतंकवादी गरीबी से नहीं बल्कि रईसी से निकले । उच्च सिक्षा के साथ निकले । और ढाका में ही जिन युवा आतंवादियों के क्रूरता के साथ हत्या की । वह भी उच्चतर समाज के हिस्सा रहे है । याद कीजिए 9-11 के हमले के बाद नोबेल पुरस्कार विजेता एलि वेसेल ने तर्क दिया था कि , " शिक्षा के जरीये आतंक पर नकेल कसी जा सकती है । " तो 9-11 के बाद आतंकवाद ने पढ़े लिखे और संपन्न परिवारों के युवाओं को लुभाना क्यो शुरु किया इसका जबाब किसी ने नहीं दिया । क्योंकि गौर कीजिए तो ढाका में खूनी खेल खेलने वाले आतंकियों ने न केवल जवानी की दहलीज पर कदम रखा था बल्कि अच्छी यूनिवर्सिटी से पढ़े लिखे थे।

आतंकवादी निब्रस , ढाका की नॉर्थ साउथ यूनिवर्सिटी से पढ़ने के बाद मलेशिया के मोनाश यूनिवर्सिटी गया। तो आतंकवादी मुबाशीर, ढाका के टॉप  इंग्निश मीडियम स्कूल में पढ़ा लिखा।और आतंकवादी रोहन इम्तियाज के तो पिता ही अवामी लीग के नेता हैं। और घर में हर सुविधा । समाज में हर मान्यता । यानी पढ़े लिखे रईस परिवार के युवा आतंक की राह चल रहे तो सच यही है कि समस्या की जड़ें कहीं गहरी हैं। दरअसल, समाजशास्त्रियो की नजर में छह वजहे है । पहला अलग अलग देशो के राजनीतिक अतंरविरोध का लाभ आतंक को मिलता है । दूसरा, आतंक को लेकर संयुक्त राष्ट्र की परिभाषा भी अलग अलग है । तीसरा आतंक और विद्रोही हिंसा के बीच लकीर राजनीतिक है । चौथा , राजनीतिक सत्ता से मोहभंग की स्थिति में युवा कही ज्यादा है । पांचवा, राजनीतिक विचारधाराओ का खत्म होना आतंकवाद के लिये अच्छा साबित हो रहा है । छठा विकास में लोगो से ज्यादा पूंजी की बढती भागेदारी मोहभंग पैदा कर रही है । वजह भी यही है कि जॉर्डन,मोरक्को,पाकिस्तान और टर्की में 2004 में एक एक सर्वे में पढ़े लिखे नौजवानों ने अमेरिका और पश्चिमी देशों के खिलाफ आत्मघाती हमलों की ज्यादा वकालत की बनिस्पत उन लोगों ने,जिनकी शिक्षा कम थी। कम पढ़े लिखे लोगों ने नो ओपनियन यानी कोई राय नहीं वाला विकल्प चुना। तो पढ़े लिखे युवा रेडिकलाइज हो रहे हैं-इससे इंकार किया नहीं जा सकता, और कोई सरकारें इन युवाओं की बेचैनी को साध नहीं पा रही-ये दूसरा सच है।

Tuesday, June 28, 2016

कश्मीर में गिलानी-यासिन से बाद की पीढ़ी का आतंक

श्रीनगर से 3 से 6 घंटे की दूरी पर कूपवाडा का केरन, तंगधार,नौ गाम और  मच्चछल ऐसे क्षेत्र है जहा से लगातार घुसपैठ होती है । पहली ऐसी घुसपैठ बांदीपुरा के गुरेज सेक्टर से होती थी । लेकिन सेना ने वहा चौकसी बढाई को घुसपैठ बंद हो गई । तो यह सवाल हर जहन में आ सकता है कि सेना चाहे तो ठीक उसी तरह इन इलाको में घुसपैठ रोक सकती है । लेकिन पहली बार वादी में सवाल सीमापार से घुसपैठ से कही आगे देश के भीतर पनपते उस गुस्से का हो चला है जिसकी थाह कोई ले नहीं रहा । और जिसका लाभ आंतकवादी उठाने से नहीं चूक रहे । क्योकि जिस तरह कूपवाडा में मारा गया आतंकवादी समीर अहमद वानी के जनाजे में शामिल होने के लिये ट्रको में सवार होकर युवाओ क् जत्थे दर जत्थे सोपोर जा रहे है । उसने यह नया सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या आंतक की परिभाषा कश्मीर में बदल रही है या फिर आतंक का सामाजिकरण हो गया है । क्योंकि नई पीढी को इस बात का खौफ नहीं कि मारा गया समीर आंतकवादी था और वह उसके जनाजे में शामिल होंगे तो उनपर भी आतंकी होने का ठप्पा लग सकता है । बल्कि ऐसे युवाओं को लगने लगा है कि उनके साथ न्याय नहीं हो रहा है । और हक के लिये हिंसा को आंतक के दायरे में कैसे रखा है।

जाहिर है यह एेसे सवाल है जो 1989 के उस आंतक से बिलकुल अलग जो रुबिया सईद के अपहरण के बाद धाटी में शुरु हुआ । दरअसल 90 के दशक में आंतक से होते हुये आलगाववाद की लकीर कश्मीरी समाज में खौफ पैदा भी कर रही थी । और आंतक का खौफ कश्मीरी समाज को अलग थलग भी कर रही था । लेकिन अब जिस तरह सूचना तकनीक ने संवाद और जानकारी के रास्ते खोले है । दिल्ली और धाटी के बीच सत्ता की दूरी कम की है । राजनीतिक तौर पर सत्ता कश्मीर के लिये शॉ़टकट का रास्ता अपना रही है । उसने धाटी के आम लोगो और सत्ता के बीच भी लकीर किंच दी है । और यह सवाल दिल्ली के उस नजरिये से कही आगे निकल रहा है जहा खुफिया एजेंसी सीमा पार के आंतक का जिक्र तो कर रही है लेकिन घाटी में कैसे आतंक को महज हक के लिये हिसां माना जा रहा है और उसी का लाभ सीमापार के आंतकवादी भी उठा रहे है इसे कहने से राजनीतिक सत्ता और खुफिया एजेंसी भी बच रही है । यानी घाटी गिलानी और यासिन मलिक के आंतक से कही निकल कर युवा कश्मीरियों के जरीये आतंक का सामाजिकरण कर रही है।

लेकिन दिल्ली श्रीनगर का नजरिया अभी भी घाटी में आंतक को थामने के लिये बंधूक की बोली को ही आखिरी रास्ता मान कर काम रहा है । इसीलिये कश्मीर को लेकर हालात कैसे हर दिन हर नयी धटना के साथ सामने आने लगे है यह कभी पंपोर तो कभी कूपवाडा तो कभी सोपोर से लेकर घाटी के सीमावर्ती इलाकों में गोलियों की गूंज से भी समझा जा सकता है और श्रीनगर में विधानसभा के भीतर बीजेपी विधायकों का पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में आतंकवादी कैपो पर हवाई हमले करने की तक की मांग से भी जाना जा सकता है । तो दिल्ली में गृहमंत्री राजनाथ सिंह की तमाम खुफिया एजेंसियों के प्रमुखो के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और गृह सचिव के बीच इन हालातों को लेकर मंथन की कैसे आतंकी हमलो से सीआरपीएफ बचे । और उपाय के तौर पर यही निर्णय लेना कि सीआरपीएफ भी बख्तरबंद गाडी में निकले । सेना के साथ घाटी में मूवमेंट करसे आगे बात जा नहीं रही है । तो क्या दिल्ली और श्रीनगर के पास घाटी में खड़ी होती आंतक की नयी पौघ को साधने के कोई उपाय नहीं है ।

या फिर घाटी को देखने समझने का सरकारी नजरिया अब भी 1989 के उसी आतंकी घटनाओं में अटका हुआ है जब अलगाववादी नेताओ की मौजूदा फौज युवा थी । यानी तब हाथों में बंदूक लहराना और आंतक को आजादी के रोमान्टिज्म से जोडकर खुल्ळम खुल्ला कानून व्यवस्था को बंधूक की नोक पर रखना भर था । अगर ऐसा है तो फिर कश्मीर में आतंक के सीरे को नहीं बल्कि आतंक से बचने के उपाय ही खोजे जा रहे है । और आतंक पर नकेल कसने का नजरिया हो क्या इसे लेकर उलझने ही ज्यादा है। क्योंकि विधानसभा में जम्मू कश्मीर की सीएम महबूबा पाकिस्तान से बातचीत की वकालत करती है । और सत्ता में महबूबा के साथ बीजेपी के विधायक रविन्द्र रैना पीओके के मिलिटेंट कैप पर हवाई हमले की मांग करते है । और दिल्ली में उसी बीजेपी की केन्द्र सरकार सीमा पर सेना को खुली कार्रवाई की इजाजत देने की जिक्र कर खामोश हो जाती है । यानी घाटी में जो पांच बड़े सवाल है उसपर कोई नहीं बोल रहा । क्योकि वह सत्ता के माथे पर शिकन पैदा करते है । पहला सवाल तो बढती बोरजगारी का है । दूसरा सवाल कश्मीर के बाहर कश्मीरियो के लिये बंद होते रास्तों का है । तीसरा सवाल दफ्न कश्मीरियो की पहचान का है। चौथा सवाल किसी भी आतंकी भेड़ के बाद उस इलाके के क्रेकडाउन का है जिसके दायरे में आम कश्मीरी फंसता है । और चौथा सवाल सेना से लेकर अद्दसेनिक बलो में श्रेय लेने की होड है । जिसमें मासूम फंसता है या आपसी होड कश्मीर को बंदूक के साये में ही देखना पसंद करती है । यह ठीक उसी तरह है जैसे कूपवाडा में दो आतंकवादियों को मारा किसने इसकी होड़ सेना और सीआरपीएफ में लग गई । दोनो की तरफ से ट्विट किये गये । लेकिन सीआरपीएफ ने जब विडियो फुटेज दिखायी तो सेना ने माना कि सीआरपीएफ ने ही आतंकवादियों को मारा । और इस बहस में यह सवाल गौण हो गया कि कैसे हमले से पहले आंतकवादी -पंपोर में हमले से पहले आतंकी करीब छह घंटे तक श्रीनगर शहर में घूमते रहे,जबकि पुलिस हाईअलर्ट पर थी । कैसे जिस कार में आतंकवादी सवार थे,उसने कई नाके क्रॉस किए लेकिन हमले के बाद कार मौका-ए-वारदात से फरार होने में कामयाब रही । कैसे सीआरपीएफ की रोड ओपनिंग पार्टी यानी आरओपी हाईवे को सुरक्षित करने में विफल रही और आतंकी हमले का जवाब नहीं दे पाई । कैसे सीआरपीएफ की बस,जिसमें जवान जा रहे थे,वो अलग थलग चल रही थी । कैसे सेना के काफिले में आगे और पीछे की गाड़ी में हथियारबंद जवानों का होना जरुरी है लेकिन ऐसा पर में नहीं हुआ । कैसे ट्रैफिक के दौरान सीआरपीएफ की गाड़ियां आगे-पीछे हो गई,जिसका मतलब है कि उनके बीच सामंजस्य नहीं था । यानी एक तरफ रवैया ढुलमुल तो दूसरी तरफ आधुनिक तकनीक के आसरे दुनिया से जुडता पढा लिखा कश्मीरी । जिसके सामने कश्मीर से बाहर दुनिया को जानने का नजरिया इंटरनेट या सोशल मीडिया ही है । जो भारत को कहीं तेजी से समझता है यानी दिल्ली जबतक कश्मीर को समझ उससे काफी पहले समझ लेता है।