Wednesday, May 1, 2019

मोक्ष नगरी में मोदी का मायावी संसार

खाक भी जिस ज़मी की पारस है, शहर मशहूर यह बनारस है। तो क्या बनारस पहली बार उस राजीनिति को नया जीवन देगा जिस पर से लोकतंत्र के सरमायेदारों का भी भरोसा डिगने लगा है। फिर बनारस तो मुक्ति द्वार है । और संयोग देखिये वक्त ने किस तरह पलटा खाया जो बनारस 2014 में हाई प्रोफाइल संघर्ष वाली लोकसभा सीट थी , 2019 में वही सीट सबसे फिकी लडाई के तौर पर उभर आई  । जी, देश के सबसे बडे ब्रांड अंबेसडर के सामने एक ऐसा शख्स खडा हो गया जिसकी पहचान रोटी - दाल से जुडी है । यानी चाहे अनचाहे नरेन्द्र मोदी का ग्लैमर ही काफूर हो गया जो सामने तेज बहादुर खडा हो गया । राजनीतिक तौर पर इससे बडी हार कोई होती नहीं है कि राजा को चुनौती देने के लिये राजा बनने के लिये वजीर या विरोधी नेता चुनौती ना दे बल्कि जनता से निकला कोई शख्स आ खडा हो जाये , और कहे मुझ राजा नहीं बनना है । सिर्फ जनता के हक की लडाई लडनी है ।  तो फिर राजा अपने औरे को कैसे दिखाये और किसे  दिखाये । कयोकि राजा की नीतियो से हारा हुआ शख्स ही राजा को चुनौती देने खडा हुआ है तो फिर राजा के  चुनावी जीत के लिये प्रचार  की हर हरकत अपनी जनता को हराने वाली होगी । जो जनता की नहीं राजा की हार होगी । और ये सच राजा समझ गया तो व्यवस्था ही ऐसी कर दी गई कि जनता से निकला शख्स सामने खडा ही ना हो पाये । तो सूखी रोटी और पानी वाले दाल की लडाई करने वाले तेजबहादुर का पर्चा ही उस चुनाव आयोग ने खारिज क दिया जो खुद राजा के रहनुमा पर जी रहा है । तो क्या ये मान लिया जाये कि ये बनारस की ही महिमा है जिसने मुक्ति द्वार खोल दिया है और मोक्ष के संदेश देने लगा है । क्योकि बनारस को पुराणादि ग्रंथो के आसरे परखियेगा तो पुराणकार बताते है कि काशी तीनो लोकों में पवित्रतम स्थान रखती है , ये आकाश में स्थित है तछा मर्त्यलोक से बाहर है....

वाराणसी महापुण्या त्रिषुलोकेषु विश्रुता । / अन्तरिक्षे पुरी सा तु मर्त्यलोक बाह्रात ।।
हे पार्वती ! तीनो लोको का सार मेरी काशी सदा धन्य है :

वाराणसीति भुवनत्रयसारभूता धन्या सदा ममपुरी गिरिराजपुत्री ।

लेकिन बनारस तो सियासी छल कपट । घोखा फरेब की सियासत में इस तरह जा उलझी है । जहा राजा एक राज्य  संभालते हुये चुनावी दस्तावेज में खुद को अविवाहित बताता है । लेकिन देश संभालने के वक्त खुद को विवाहित बताता है । शिक्षा करत हुये मिलने वाली डिग्री भी चुनाव दर चुनाव बदलती है । लेकिन राजा तो राजा है । इसलिये वसंतसेना भी जब पांच बरस में ग्रेजुएट से बारहवी पास हो जाती है तो भी  चुनाव आयोग को कुछ गलत नहीं लगता । और तो और देश भर में चुनाव लडने वालो में 378 उम्मीदवार आपराधी या भ्रष्ट्राचर के दायरे में है , लेकिन लोकतंत्र ऐसी खुली छूट देता है कि चुनाव आयोग उन्हे छू भी नहीं पाता । लेकिन जनता से निकला तेजबहादुर जब राजा की नीतियो पर रोटी का सवाल उठाकर शिंकजा कसता है तो पहले नौकरी से बर्खास्गी फिर लोकतंत्र की परिभाषा तले  चुनाव लडने पर ही रोक लगाने में समूचा अमला लग जाता है । जिससे राजा को कोई परेशानी ना हो कि आखिर वह जनता को क्या कहगा ..... जनता को हरा दो । मुस्किल है । तो फिर राजा काशी की महत्ता उसके सच को क्या जाने । वह तो आस्था को चुनावी भावनाओ की थाली में समेट पी लेना चाहता है । तभी तो काशी की पहचान को ही बदल दिया जाता है । ऐसे में  काशी की  वरुणा और अस्सी नदी तो दूर गंगा तक ठगा जा रहा है तो फिर अतित की काशी को कौन परखे कैसे परखे । एक वक्त माना तो ये गया कि वरुणा और अस्सी नदियो के बीच स्थित बनारस में स्नान , जप , होम, मरण और देवपूजा सभी अक्षय होते है । लेकिन गंगा का नाम लेकर सियासत इन्हे भूल गई और गंगा की पहचान बनारस में है क्या इस समझ को भी सत्ता सियासत समझ नहीं पायी । बनारस में गंगा का पानी भक्त कभी घर नहीं ले जाते । क्योकि बनारस में तो गंगा भी मुक्ति द्वार है । काशी के प्रति लोगो में आस्था इस हद तक बढी कि लोग विधानपूर्वक आग में जलकर और गंगा में कूदकर प्राण देने लगे , जिससे कि मृतात्मा सीधे शिव के मुख में प्रवेश कर सके । उन्नीसवी सदी तक लोग मोक्ष पाने के विचार से , यहा गंगा में गले में पत्थर बांधकर डूब जाते थे । आज भी इस विचार को समेटे लोगो के बनारस पहुंचने वाले कम नहीं है । लेकिन अब तो इक्किसवी सदी है । और गंगा मुक्ति नहीं माया का मार्ग है । इसीलिय तो बनारस की सडको पर मु्कित नहीं सत्ता का द्वार खोजने के लिये जब तीन लाख से ज्यादा लोगो को नरेन्द्र मोदी के प्रचार क लिये लाया गया और गंगा को समझे बगैर , बनारस की महत्ता जाने बगैर अगर मेहनताना लेकर सभी राजा के लिये नारा लगाते हुये आये और खामोशी से लोट गये तो फिर चाहे अनचाहे भगवान बुद्द याद आ ही जायेगें । भगवान बुद्द भी अपने धर्म का प्थम उपदेश देने सबसे पहले बनारस ही आये थे । उन्होने कहा था....

भेदी नादयितुं धर्म्या काशी गच्छामि साम्प्रतम ।
न सुखाय न यशसे आर्तत्राणाय केवलम् ।।

यानी धर्मभेरी बजाने के लिये इस समय मै काशी जा रहा हूं - न सुख के लिये और न यश के लिये, अपितु केवल आर्तो की रक्षा के लिये ।
तो हालात कैसे बिखरे है संस्कृति कैसे बिखरी है इसलिये बनारस की पहचान अब खबरो के माध्यम से जब परोसी जाती है तो चुनावी बिसात पर  बनारस की तहजीब, बनारस का संगीत , बनारस का जायका या फिर बनारस की मस्ती को खोजने में लगत है । और काशी की तुलना में दिल्ली को ज्यादा पावन बताने में कोई कोताही भी नहीं बरतता है ।
 लेकिन 2019 में नरेन्द्र मोदी और तेज बहादुर का सियासी अखाड़ा बनारस बना तो फिर बनारस या तो बदल रहा है या फिर बनारस एक नये इतिहास को लिखने के लिये राजनीतिक पन्नों को खंगाल रहा है। बनारस से महज १५ कोस पर सारनाथ में जब गौतम बुद्द ने अपने ज्ञान का पहला पाठ पढ़ा, तब दुनिया में किसी को भरोसा नहीं था गौतम बुद्द की सीख सियासतों को नतमस्तक होना भी सिखायेगी और आधुनिक दौर में दलित समाज सियासी ककहरा भी बौध धर्म के जरीये ही पढेगा या पढ़ाने की मशक्कत करेगा। गौतम बुद्ध ने राजपाट छोडा था। मायावती ने राजपाट के लिये बुद्द को अपनाया। इसी रास्ते को रामराज ने उदितराज बनकर बताना चाहा और समाजवादी पार्टी  ने तो गौतम बुद्द की थ्योरी को सम्राट अशोक की तलवार पर रख दिया। सम्राट अशोक ने बुद्दम शरणम गच्छामी करते हुये तलवार रखी और अखिलेश यादव ने तेजबहादुर के निर्दलिय उम्मीदवार के तौर पर पर्चा भरन के बाद समझा कि समाजवादी बनाकर संघर्ष करवा दिया जाये तो सियासत साधी जा सकती है । तो अखिलेश ने सत्ता गच्छामी करते हुये सियासी तलवार भांजनी शुरु की। पर बनारस तो मुक्ति पर्व को जीता रहा है फिर यहा से सत्ता संघर्ष की नयी आहट नरेन्द्र मोदी ने क्यो दी। मोक्ष के संदर्भ में काशी का ऐसा महात्म्य है कि प्रयागगादु अन्य तीर्थो में मरने से अलोक्य, सारुप्य तथा सानिद्य मुक्ती ही मिलती है और माना जाता है कि सायुज्य मुक्ति केवल काशी में ही मिल सकती है। तो क्या सोमनाथ से विश्वनाथ के दरवाजे पर दस्तक देने नरेन्द्र मोदी 204 में  इसलिये पहुंचे कि विहिप के अयोध्या के बाद मथुरा, काशी के नारे को बदला जा सके। या फिर संघ परिवार रामजन्मभूमि को लेकर राजनीतिक तौर पर जितना भटका, उसे नये तरीके से परिभाषित करने के लिये मोदी को काशी चुनना पड़ा। लेकिन 2019 में जिस तरह काशी को मोदी ने सियासी तौर पर आत्मसात कर लिया है उसमें मोदी कहीं भटके नहीं है । क्योंकि काशी को तो हिन्दुओं का काबा माना गया। याद कीजिये गालिब ने भी बनारस को लेकर लिखा,

 "  तआलल्ला बनारस चश्मे बद्दूर, बहिस्ते खुर्रमो फिरदौसे मामूर, इबादत खानए नाकूसिया अस्त, हमाना काबए हिन्दोस्तां अस्त। "

 यानी हे परमात्मा, बनारस को बुरी दृष्टि से दूर रखना, क्योंकि यह आनंदमय स्वर्ग है। यह घंटा बजाने वालों अर्थात हिन्दुओ का पूजा स्थान है, यानी यही हिन्दुस्तान का काबा है।  तो फिर तेज बहादुर यहां क्यों पहुंचे। क्या तेज बहादुर काशी की उस सत्ता को चुनौती देने पहुंचे हैं, जिसके आसरे धर्म की इस नगरी को बीजेपी अपना मान चुकी है। या फिर तेजबहादुर के अक्स तले अखिलेश यादव को लगने लगा है कि राजनीति सबसे बड़ा धर्म है और धर्म सबसे बड़ी राजनीति। संघ परिवार धर्म की नगरी से दिल्ली की सत्ता पर अपने राजनीतिक स्वयंसेवक को देख रहा है। और अखिलेश यादव , तेजबहादुर यादव के जरीये काशी में नैतिक जीत से दिल्ली की त्रासदी से मुक्ति चाहने लगे ।  तो क्या सबे प्रचिन नगरी कासी को ही सियासत पंचतंत्र की कहानियो में तब्दिल करना चाहती है जिससे यहा की सासंकृतिक महत्ता खत्म हो जाये । क्योकि  बनारस की राजनीतिक बिसात का सच भी अपने आप में चुनौतीपूर्ण है। क्योंकि जितनी तादाद यहां ब्राह्मण की है, उतने ही मुसलमान भी हैं। करीब ढाई-ढाई लाख की तादाद दोनों की है। पटेल डेढ़ लाख तो यादव एक लाख है और जायसवाल करीब सवा लाख। मारवाडियों की तादाद भी ४० हजार है। इसके अलावा मराठी, गुजराती, तमिल , बंगाली, सिख और राजस्थानियों को मिला दिया जाये तो इनकी तादाद भी डेढ लाख से उपर की है। तो 17 लाख वोटरों वाले काशी में मोदी का शंखनाद गालिब की तर्ज पर हिन्दुओं का काबा बताकर मोदी का राजतिलक एक बार फिर कर देगा या फिर काशी को चुनौती देने वाले कबीर से लेकर भारतेन्दु की तर्ज पर तेजबहादुर की चुनौती स्वीकार करेगा। क्योंकि गालिब बनारस को लेकर एकमात्र सत्य नहीं है। इस मिथकीय नगर की धार्मिक और आध्यात्मिक सत्ता को चुनौतिया भी मिलती रही हैं। ऐसी पहली चुनौती १५ वी सदी में कबीर से मिली। काशी की मोक्षदा भूमि को उन्होंने अपने अनुभूत-सच से चुनौती दी और ऐसी बातों को अस्वीकार किया। उन्होंने बिलकुल सहज और सरल ढंग से परंपरा से चले आते मिथकीय विचारों को सामने रखा और बताया कि कैसे ये सच नहीं है। अपने अनुभव ज्ञान से उन्होने धार्मिक मान्यताओं के सामने एक ऐसा सवाल खड़ा कर दिया, जो एक ओर काशी की महिमा को चुनौती देता था तो दूसरी ओर ईश्वर की सत्ता को। उन्होंने दो टूक कहा-जो काशी तन तजै कबीरा। तो रामहिं कौन निहोरा। यह ऐसी नजर थी , जो किसी बात को , धर्म को भी , सुनी -सुनायी बातो से नहीं मानती थी। उसे पहले अपने अनुभव से जांचती थी और फिर उस पर भरोसा करती थी।
काशी का यह जुलाहा कबीर कागद की लेखी को नहीं मानता था, चाहे वह पुराण हो या कोई और धर्मग्रंथ। उसे विश्वास सिर्फ अपनी आंखो पर था। इसलिये कि आंखों से देखी बातें उलझाती नहीं थी…तू कहता कागद की लेखी, मै कहता आंखन की देकी। मै कहता सुरझावनहरी, तू देता उरझाई रे। वैसे बनारस की महिमा को चुनौती तो भारतेन्दु ने १९ वी सदी में भी यह कहकर दी…..देखी तुमरी कासी लोगों , देखी तुमरी कासी। जहां बिराजे विस्वनाथ , विश्वेश्वर जी अविनासी। ध्यान दें तो बनारस जिस तरह २०१४ का सियासी अखाडा बन रहा था 2019 के हालात ठीक उसके उलट है । 2014 में नेताओ के कद टकरा रह थे । 2019 में जनता के कद के आगे राजा का बौनापन है जो बनारस को जीता है और जीत भी सकता है । यानी 2014 में  सियासी आंकड़े में कूदने वाले राजनीति के महारथियो को जैसे जैसे बनारस के रंग में रंगने की सियासत भी शुरु हुई है। वह ना तो बनारस की संस्कृति है और ना ही बनारसी ठग का मिजाज। लेकिन अब तो वाकई काशी की जमीन पर गंवई अंदाज में काशी मे मुक्ति का सवाल है । और मुक्ति जीत पर भारी है । इसे दिल्ली का राजा चाहे ना समझे लेकिन काशी वासी समझ चुके है । पर उनकी समझ को भी राजा अपने छाती पर तमगे में टांगना चाहता है । पर राजा ये नहीं जानता कि काशी को जीत कर वह हार रहा है क्योकि राजा का लक्ष्य तो अमेरिका है । और बनारस को बिसमिल्ला खां के दिल को जीता है ।
बिस्मिल्ला खां ने अमेरिका तक में बनारस से जुड़े उस जीवन को मान्यता दी, जहां मुक्ति के लिये मुक्ति से आगे बनारस की आबो हवा में नहाया समाज है। शहनाई सुनने के बाद आत्ममुग्ध अमेरिका ने जब बिस्मिल्ला खां को अमेरिका में हर सुविधा के साथ बसने का आग्रह किया तो बिस्मिल्ला खां ने बेहद मासूमियत से पूछा, सारी सुविधा तो ठीक है लेकिन गंगा कहा से लाओगे। और बनारस का सच देखिये। गंगा का पानी हर कोई पूजा के लिये घर ले जाता है लेकिन बनारस ही वह जगह है जहा से गंगा का पानी भरकर घर लाया नहीं जाता । तो ऐसी नगरी में मोदी  किसे बांटेंगे या किसे जोड़ेंगे। वैसे भी घंटा-घडियाल, शंख, शहनाई और डमरु की धुन पर मंत्रोच्चार से जागने वाला बनारस आसानी से सियासी गोटियो तले बेसुध होने वाला शहर भी नहीं है। बेहद मिजाजी शहर में गंगा भी चन्द्राकार बहती है बनारस हिन्दु विश्वविघालय के ३५ हजार छात्र हो या काशी विघापीठ और हरिश्चन्द्र महाविघालय के दस -दस हजार छात्र। कोई भी बनारस के मिजाज से इतर सोचता नहीं और छात्र राजनीति को साधने के लिये भी बनारस की रंगत को आजमाने से कतराता नहीं। फिर बनारस आदिकाल से शिक्षा का केन्द्र रहा है और अपनी इस विरासत को अब भी संजोये हुये हैं। ऐसे में सेना के जवान हाथो में सूखी रोटिया और पानी की दाल का सच दिखाकर पहचान पाये है तो दूसरी तरफ गुजरात के राजधर्म और दिल्ली के लोकतंत्र पर चढाई कर नरेन्द्र मोदी बनारस में है । मोदी  की बिसात पर बनारसी मिजाज प्यादा हो नहीं सकता और  तेज बहादुर सियासी बिसात पर चाहे प्यादा साबित हो खारिज कर दिये गये लेकिन बनारसी मिजाज तो उन्हे मोक्ष दे रहा है । क्योकि मोदी वजीर बनने के लिये लालालियत है  और तेज बहादुर मुक्ति पाने की छटपटाहट में बनारस पहुंचे है । तो फिर बनारस का रास्ता जायेगा किधर। नजरें सभी की इसी पर हैं। क्योंकि बनारस की बनावट भी अद्भुत है….यह आधा जल में है । आधा मंत्र में है । आधा फूल में है । आधा शव में है । आधा नींद में है। आधा शंख में है । और काशी का आखरी सच यही है कि यहा सूई की नोंक भर भी स्थान नहीं है , जहा जाने वाले को मोक्ष ना मिले । और मोक्ष में लिंग जाति वर्ण वर्ग का कोई भेद नहीं होता । तो आप तय किजिये मोक्ष किसे मिलेगा या किसे मिलना चाहिये ।

Friday, April 19, 2019

स्वंयसेवक की चाय का कमाल...लोकतंत्र टूटने का भय और दिल्ली से मोदी के चुनाव लडने के संकेत


तो वाजपेयी जी गर्म चाय पिजिये और आप फंडिग या छापो की सियासत से आगे बढ नहीं पाये । लेकिन जहा से हमने बात शुरु की थी वही दोबारा लौट चलिये । सवाल सिर्फ हिन्दू आंतकवाद शब्द के आसरे संघ को राजनीति मैदार में प्रज्ञा क जरीये लाने भर की चौसर नहीं है । बल्कि उसी महीनता को फिर पकडिये कि कैसे बीजेपी ने कार्यकत्ताओ का दायरा कितना बडा कर लिया है । यानी संघ के सवयसेवको की तादाद भी छोटी पड गयी है दस करोड बीजेपी सदस्यता के सामने । और इस ताकत को संख्याबल पर मोदी-शाह संघ को भी आईना दिखाने की स्थिति में है या कहे पार्परिक बीजेपी का तानाबान अब कितना बदल चुका है जरा इसे भी समझना जरुरी है । कयोकि संवयसेवक बिना वेतन काम करता है लेकिन बीजेपी ने बूथ स्तर पर भीकार्यकत्ताओ की संख्या बल को जिस तरह सुविधा या कहे वेतन के जरीये जोडा उससे जीत नहं मिलती ये बात बीजेपी की नई सोच समझ नहीं पा रही है । लेकिन बीजेपी बदली है तो फिर संघ को भी बदलना होगा ।
क्यो , संघ का अपना रास्ता है
प्रोफेसर साहेब आप बार बार इ हकीकत को भूल रहे है कि कल तक संघ का इशारा बीजेपी सत्ता के लिये काफी होता था लेकिन मोदी काल में सत्ता का इशारा संघ के लिये जीवन-मरण का सवाल इसलिये बना दिया गया क्योकि संघ की नीतियों या विचारधारा से इतर सत्ता पर बने रहने को संघ की जीत के तौर पर भी इस दौर में स्वीकार कर लिया गया है ।
लेकिन बंधु क्या ये सच नहीं है कि जब जनसंघ का स्थिपना हो रही थी तब से लेकर 2019 तक की बीजेपी के हिन्दुत्व में बहुत अंतर आ गया है । और मोदी काल में हिन्दुत्व के नाम पर भी दो तरह के वोटर है । पहला जो शांत है पैसिव है । दूसरा जो वोकल है एक्टिव है । और जो वोकल है वह ज्यादा मध्य-उच्चवर्ग का तबका है । और उसके लिये मोदी भगवान सरीखे भी हो चले है ।
हा हा ...और आप इसे भक्त भी कहते है । क्यों
कह सकते है । जिस तरह स्वयसेवक बोले उसमें तंज भी था और मुश्किल हालात भी ।
मुझे बात ये कहकर आगे बढानी पडी कि अटल बिहारी वाजपेयी के दौर और मोदी के दौर में हिन्दुत्व को लेकर भी सोच बदल गई है ।
मेरे ये कहते ही स्वयसेवक महोदय बोल पडे । आपने उस नब्ज को पकडा है जिस नब्ज पर संघ भी ध्यान दे नहीं रहा है । क्योकि अटल बिहारी वाजपेयी बीजेपी का ट्रासफारमेशन काग्रेसी तर्ज पर कर रहे थे । इसलिये ध्यान दिजिये कि हिन्दु शब्द की गूंज वाजपेयी के सत्ता काल में नहीं थी । और धीर धीरे दलित-मुसलमान भी बीजेपी के साथ आ खडा ह रहा था । और मोदी इस सच को समझ नहीं पाते कि 2014 में मुसलमानो का वो भी बीजेपी को मिला और उसके पीछे वाजपेयी काल की खूशबू थी और मोदी काल को लेकर उम्मीद । लेकिन 2014 के बाद जिस तरह उग्र या कहे लुपंन हिन्दुत्व राजनीति के आसरे हिन्दु समाज में मो सत्ता ने सेंघ लगायी उसमें बीजेपी तो कही पीछे छूट ही गई । संघ को भी समझ नहीं आया कि वह कैसे हिन्दुत्व को सत्ता के नजरिये से इतर परिभाषित करें । असर इसी का है कि अब मुसलमान बीजेपी को वोट नहीं करेगा और संघ को साजिश के कटघरे में खडा कर ही देखेगा ।
ये आप कह रहे है ।
बिलकुल .... हालात को समझे 18 अप्रैल को जब दूसरे चरण का मतदान हो रहा था तब इन्देश कुमार दिल्ली में मुसलमानो को मोदी के गुण समझा रहे थे । और वोट देने की गुहार लगा रहे थे । सवाल यही है कि भोपाल मे साध्वी को और श्रीनगर में खालिद जहांगीर को टिकट देने भर से क्या होगा ।
तो क्या संघ इन हालातो को समझ रहा है ।
प्रोफेसर साहेब मुश्किल ये नहीं है कि संघ क्या समझ रहा है ...मुश्किल तो ये है कि जिस रास्ते बीजेपी निकल पडी है उसमें अगर मोदी चुनाव हार जाते है तो फिर बीजेपी 20 बरस पीछे चली जायेगी । क्योकि सत्ता विचारधारा हो नहीं सकती और जिस तरह मोदी का खौफ दिखाकर सबको समेटने की चाहत ही विचारधारा हो गई है उसमें ये सवाल तो कोई भी अब कर सका है कि वाकई मोदी चुनाव हार गये तो बीजेपी का होगा क्या । क्योकि चुनावी जीत विचारधारा हो नहीं सकती और जीत के लिये चुनावी मंत्र सोच हो नहीं सकती है । ऐसे में चुनावी हार हो जाये तो फिर कौन सी नई सोच या कौन सी विचारधारा बीजेपी के पास बचेगी ये सवाल तो है कि क्योकि वैचारिक तौर पर बीजेपी को चुनावी हार के बाद खडा करना अनुभवी नेता के ही बस में होता है । और जब अनुभव को पार्टी में मान्यता ही नहीं दी जा रही हैतो फिर बीजेपी को पटरी पर लायेगा कौन । ये सवाल भी है । जो पटरी पर ला सकते है उन्हे खारिज कर हाशिये पर ढकेल दिया गया । और इसी दौर में काग्रेस ने बीजपी या कहे संघ के ही उन मुद्दो को अपना लिया जिन मुद्दो के आसरे संघ हमेशा काग्रेस को खारिज करती रही ।
मसलन..
मसलन किसान की कर्ज माफी । मजदूरो को न्यूनतम आय । बेरोजगारो को राहत । कारपोरेट विरोध । और ध्यान दिजिये को मोदी कारपोरेट प्रेम में और पालेटिकल फंडिग में इतने आगे बढ चुके है कि बीजेपी कार्यकत्ताओ या संगठन की पार्टी है ये शब्द भी तो गायब हो गया है ।
 तो इसके मतलब मायने क्या निकाले जाये ।
हा हा .....खौफजदा शख्स ही खौफ पैदा करता है ।
तो क्या आप भी फंडिग या छापो या फिर संस्थानो को धराशाही करने केअक्स में ये देख रहे है ।
मेरे सवाल पर स्वयसेवक महोदय पहली बार बोले... हो सकता है लेकिन चार दिन पहले गुजरात में जब मोदी गुजरातियो को संबोधित करते हुये कहते है कि .... देख लेना काग्रेस के निशाने पर हो सभी .... तो संकेत कई है ।
आपने जब इतना कह ही दिया तो आखरी बात मै भी कह दूं...अचानक प्रोफेसर साहेब बोले ...
बिलकुल
तो अगर मोदी चुनाव जीत जाते है तो फिर उस नब्ज को भी समझने की कोशिश किजिये कि हिन्दुस्तान का लोकतंत्र कैसे चलता है । लोकतंत्र का मतलब है संविधान की वो कारिगरी जिसमें सारी व्यवस्थाये स्वायत्त भी है और एक बिंदु से आगे एक दूसरे पर निर्भर भी है । यही चैक एंड बैलेस हमारा लोकतांत्रिक अनुशासन है । विधायिका स्वायत्त है । वह कानून बनाये । नौकरशही स्वायत्त है कि वह उसे लागू करें । लेकिन विधायिका का  वह कानून खारिज भी हो सकता अगर न्यायापालिका की संवैधानिक कसौटी पर खरा नहीं उतरती हो । न्यायापालिका संविधान की रोशनी हर फैसला करने का अधिकार और सामर्थ्य रखती है लेकिन उसका कोई भी फैसला संसद पलट भी सकती है । रिजर्व बैक , कैग , सीबीआई, संसदीय समितिया , चुनाव आयोग , प्रसार भारती , मीडिया सभी के साथ यही सच है । 
तो इसमें गडबडी क्या है प्रोफेसर साहेब ...
यही कि मोदी सत्ता इनको अपनी सत्ता के आगे रोडा समझती है और इन्हे खत्म करने पर तुली है । इसलिये लोकतंत्र कमजोर पड रहा है । और यही दिशा आगे बढती चल गई तो लोकतंत्र ही टूट जायगा ।
अगर आप ऐसा सोच रहे है तो फिर ये भी समझ लिजिये .... मोदी सिर्फ बनारस से चुनाव नहीं लडेगें । खासकर तब जब प्रियकां के जरीये समूचा विपक्ष मोदी को घेर रहा है । और सच ये भी है कि 2014 में मोदी महज तीन लाख वोट से जीते थे । और तब मैदान में केजरीवाल के अलावे काग्रेस सपा बसपा सभी के उम्मीदवार मैदान में थे ।
तो क्या आप संकेत दे रहे है कि मोदी बनारस में निपट भी सकते है ।
जी नहीं प्रोफसर साहेब मै सकेत दे रहा दूं कि  मोदी आखिरी दम तक हार मानगें नहीं । इसलिये वह दूसरी सीट से भी चुनाव लड सकते है ।
और वो दूसरी सीट होगी कौन सी .....मेरी उत्सुकता जागी । तो स्वयसेवक महोदय ठहाका लगाते हुये बोले... सवाल तो सबसे बडा यही है ।
लेकिन आपको क्या लगता है । वह भी दक्षिण की कोई सीट......ना ना ये गलती मोदी नहीं करेगें ।
तो
तो क्या दिल्ली ।
क्या कह रहे है आप....
आप नहीं वाजपेयी जी ....दिल्ली का मतलब क्या होगा जरा समझे....
ये तो ब्रेकिग न्यूज होगी ।
हो सकता है ..... जी एक तीर से कई निशाने ..... लेकिन अभी सिर्फ हम सोच सकते है ।
कमाल है .... आप सोचने की बात कर रहे है । ये रणनीति तो वाकई कमाल की होगी....
पर अब प्रोफेसर साहेब ने मेरी तरफ देख कर कहा.....वाजपेयी जी...दिल्ली का सुल्तान या दिल्ली का ठग
क्यों आप ये क्यो कह रहे है .... समझे जरा दिल्ली वाटरलू भी साबित हो सकती है ।
और सुल्तान भी बना सकती है । स्वयसेवक महोदय ने कहते हुये जोरदार ठहाका लगाया......


Thursday, April 18, 2019

स्वयंसेवक जब कहे मोदी आखरी लडाई लड रहे है तो.....



ये कलयुग है और कलयुग में ना तो महाभारत संभव है ना ही गीता का पाठ । या फिर न्याय के लिये संघर्ष । जोडतोड की भी कलयुग में उम्र होती है । कलयुग में तो ताकत ही सबकुछ है और ताकत का मतलब ज्ञान नहीं बल्कि धोखा -फरेब के आसरे उस सत्ता का जुगाड है जिस जुगाड का नियम है खुद के साथ सबकुछ स्वाहा करने की ताकत । और जबतक ताकत है तबतक स्वाहा होते हालात पर कोई अंगुली नहीं उठाता । सवाल नहीं करता ।
स्वयसेवक साहेब का यह अंदाज पहले कभी नहीं था । लेकिन आप ये कह क्यो कह रह है और हम सभी तो चाय के लिये आपके साथ इसलिये जुटे है कि कुछ चर्चा चुनाव की हो जाये । लेकिन आज आप सतयुग और कलयुग का जिक्र क्यो कर बैठे है । मुझे टोकना पडा । क्योकि मेरे साथ आज प्रोफेसर संघ के भीतर की उस हकीकत को समझने आये थे जहा प्रज्ञा ठाकपर को भोपाल से उतारने के पीछे संघ है या बीजेपी । या फिर संघ अब अपने पाप-पुण्य का परिक्षण भी मोदी के 2019 के समर में कर लेना चाहता है ।
दरअसल प्रोफेसर साहेब के इसी अंदाज के बाद स्वयसेवक महोदय जिस तरह कलयुग के हालात तले 2019 के चुनाव को देखने लगे उसमें स्वयसेवक ने खुले तौर पर पहली बार माना कि मोदी-शाह की खौफ भरी बाजीगरी तले बीजेपी के भीतर की खामोश उथलपुथल। संघ का हिन्दु आंतक को लेकर प्रज्ञा क जरीये चुनाव परिक्षण । और जनादेश के बाद जीत का तानाबाना लेकिन हार के हालात में बीजेपी को जिन्दा रखने का कोई प्लान ना होना संघ को भी डराने लगा है ।
तो क्या संघ मान रहा है मोदी चुनाव हार रहे है । प्रोफेसर साहेब ने जिस तरह सीधा सवाल किया उसका जवाब पहली बार स्वयसेवक महोदय के काफी हद तक सीधा भी दिया और उलझन भी पैदा कर दी । ....मैने आपको कहा ना ये महाभारत काल नहीं है लेकिन महाभारत का कैनवास इतना बा है कि उसमें कलयुग की हर चाल समा सकती है । सिर्फ आपको अपनी मनस्थिति से हालात को जोडना है । और अब जो मै कहने जा रहा हूं उसे आप सिर्फ सुनेगे....टोकेगें नहीं ।
जी...मै और प्रोफेसर साहेब एक साथ ही बोल पडे ।
तो समझे ...संघ तो भीष्म की तरह बिधा हुआ युद्द स्थल पर गिरा हुआ है । संघ जब चाहेगा उसकी मौत तभी होगी । लेकिन मौजूदा हालात में संघ की जो ताकत बीजपी को मिला करती थी वह मोदी के दौर में उलट चुकी है । कल तक संघ अपने सामाजिक-सास्कृतिक सरोकारो के जरीये राजनीति का परिषण करता था । अब संघ को परिषण के लिये भी बीजेपी की जरुरत है । और इसकी महीनता को समझे तो काग्रेस की सत्ता के वक्त  हिन्दु आंतकवाद का सवाल संघ को नहीं बीजेपी को डरा रहा था । क्योकि बीजेपी को संघ की ताकत और समाज को प्रभावित करने की उसकी क्षमता के बारे में जानकारी थी । और राजनीतिक तौर पर संघ की सक्रियता के बगैर बीजेपी की जीत मुश्किल होती रही ये भी हर कोई जानता है । ऐसे में मोदी सत्ता काल में हिन्द आंतकवाद की वापसी का भय सत्ता जाने के भय के साथ जोड दिया गया ।
किसने जोडा....प्रोफेसर बोले नहीं कि ...संवयसेवक महोदय बोल पडे । प्रोफेसर साहेब पुरी बात तो सुन लिजिये..क्योकि आपका सवाल बचकाना है । अरे सत्ता जिसके पास रहेगी वह कतई नहं चाहेगा कि सत्ता उसके हाथ से खिसक जाये । तो सत्ता बररार रखने के लिय उसके अपने ही चाहे नीतियो का विरोध करते रहे हो लेकिन सभी को जोडने के लिये कोई बडा डर तो दिखाना ही पडेगा । तो हिन्दु आंतकवाद का भय दिखाकर संघ को सक्रिय करने की बिसात भी मौजूदा सत्ता की ही होगी । और उसी का परिणाम है कि प्रज्ञा ठाकुर को भोपाल से बीजेपी के टिकट पर उतारा गया है ।
लेकिन आप तो डर और खौफ को बडे व्यापक तौर पर मौजूदा वक्त में सियासी हथियार बता रहे थे ।
वाजपेयी जी आप ठीक कह रहे है लेकिन उसकी व्यापकता का मतलब पारंपरिक तौर तरीको को खारिज कर नये तरीके से डर की परिभाषा को भी गढना है और ये भी मान लेना है कि ये आखरी लडाई है ।
आखरी लडाई....
जी प्रोफेसर साहेब आखरी लडाई  ।
तो क्या चुनाव हारने के बाद मोदी-शाह की जोडी को संघ भी दकरिनार कर देगा ।
अब ये तो पता नहीं लेकिन जिस तरह चुनावी राजनीति हो रही है उसमें आप ही बताइये प्रोफेसर साहेब क्या क्या मंत्र अपनाये जा रहे है ।
आप अगर मोदी का जिक्र कर रहे है तो तीन चार हथियार तो खुले तौर पर है ।
जैसे
जैसे मनी फंडिग ।
मनी फडिग का मतलब ।
मतलब यही कि ये सच हर कोई जानता है कि 2013 के बाद से कारपोरेट फंडिग में जबरदस्त इजाफा हुआ है । आलम ये रहा है कि सिर्फ 2013 से 16 के बीच 900 करोड की कारपोरेट फंडिग हुई जिसमें बीजेपी को 705 करोड मिले । इसी तरह 2017-18 में अलग अलग तरीके से पालेटिकल फडिग में 92 फिसदी तक बीजेपी को मिले । यहा तक की 221 करोड के चुनावी बाड में से 211 करोड तो बीजेपी के पास गये । लेकिन जब बैक में जमा पार्टी फंड दिखाने की स्थित आई तो 6 अक्टूबर 2018 तक बीजेपी ने सिर्फ 66 करोड रुपये दिखाये ।  और जिन पार्टियो की फंडिग सबसे कम हुई वह बीजेपी से उपर दिके । मसलन बीएसपी ने 665 करोड दिखाये और वह टाप पर रही । तो सपा ने 482 करोड और काग्रेस ने 136 करोड दिखाये ।
तो इससे क्या हुआ ।
अरे स्वयसेवक महोदय क्या आप इसे नहीं समझ रहे हैकि जिस बीजेपी के पास अरबो रुपया कारपोरेट फंडिग का आया है अगर उसके बैक काते में सिर्फ 66 करोड है जो कि 2013 में जमा 82 करोड स भी कम है तो इसके दो ही मतलब है । पहला , चुनाव में खूब धन बीजेपी ने लुटाया है । दूसरा , फंडिग को किसी दूसरे खाते में बीजेपी के ही निर्णय लेने वाले नेता ने डाल कर रखा है । यानी कालेधन पर काबू करेगें या फिर चुनाव में धनबल का इस्तेमाल नहीं होना चाहिये । इसे खुले तौर खत्म करने की बात कहते कहते बीजेपी संभालने वाले इतने आगे बढ गये कि वह अब खुले तौर पर बीजेपी  के सदस्यो को भी डराने लगे है ।
कसे डराने लगे है ।
डराने का मतलब है कि बीजेपी के भीतर सत्ता संभाले दो तीन ताकतवर लोगो ने बीजेपी के पूर्व के  कद्दावर नेताओ तक को एहसास करा दिया दिया है कि उनके बगैर कोई चूं नहीं कर सकता । या फिर जो चूं करेगा वह खत्म कर दिया जायेगा । इस कतार में आडवाणी , जोशी या यशंवत सिन्हा सरीखो को शामिल करना जरुरी नहीं है बल्कि समझना ये जरुरी है कि मोदी सत्ता के भीतक ताकतवर वहीं हुये जिसनी राजनीतिक जमीन सबसे कमजोर थी । सीधे कहे तो हारे,पीटे और खारिज कर दिये लोगो को मोदी ने कैबिनेट मंत्रि बनाया । और धीरे धीरे इसकी व्यापकता यही रही कि समाज के भीतर लुपंन तबके को सत्ता का साथ मिला तो वह हिन्दुत्व का नारा लगाते हुये सबसे ताकतवर नजर आने लगा ।
तो दो हालात आप बता रहे है । वाजपेयी जी अपको क्या लगता है मोदी सत्ता ने जीत के लिये कौन से मंत्र अपनाया ।
स्वयसेवक मोहदय जिस अंदाज में पूछ रहे थे मुझे लगा वह भी कुछ बोलने से पहले हमारी समझ की थाह लेना चाहते है । बिना लाग लपेट मैने भी कहा । डर और खौफ का असल मिजाज तो छापो का है । चुनाव का एलान होने के बाद नौ राज्यो में विपक्ष की राजनीति करते नेताओ के सहयोगी या नेताओ के ही दरवाजे पर जिस तरह इनकम टैक्स के अधिकारी पहुंचे । उसने साफ कर दिया कि मोदी अब आल वर्सेस आल की स्थिति में ले आये है । इसलिये परंपरा टूट चूकी है क्योकि मोदी को एहसास हो चला है कि जीत के लिये सिर्फ प्रज्ञा ठाकुर सरीखे इक्के से काम नहीं चलेगा बल्कि हर हथियार को आजमाना होगा । और इसी का असर है कि मध्यप्रदेश , कर्नाटक , तमिलनाडु,यूपी, बिहार, कश्मीर , बंगाल, ओडिसा में विपक्ष के ताकतवर नेताओ के घर पर छापे पडे ।
तो क्या हुआ ....
हुआ कुछ नहीं बंधुवर ..अब मुझे स्वयसेवक महोदय को ही टोकना पडा । दरअसल हालात ऐसे बना दिये गये है कि सत्ता से भागेदारी करते तमाम सस्थानो के प्रमुख को भी लगने लगे कि मोदी हार गये तो उनके खिलाफ भी नई सत्ता कार्रवाई कर सकती है .... तो आखरी लडाई संवैधानिक संस्थाओ समेत मोदी सत्ता से डरे सहमे नौकरशाहो की भी है ।
तो क्या ये असरकारक होगी । कहना मुश्किल है । लेकिन मोदी का खेल इसके आगे का है इसलिये लास्ट असाल्ट के तौर पर इस चुनाव को देखा जा रहा है और संघ इससे हैरान-परेशान भी है ।
क्यो...
बताता हूं । लेकिन गर्म चाय लेकर आता हूं फिर ...
जारी ....

Sunday, April 7, 2019

स्वंयसेवक की चाय पार्ट-2 , सबसे मुश्किल वक्त का सबसे मुश्किल चुनाव है संघ के लिये


कभी कभी चुनाव जीत के लिये नहीं विस्तार के लिये भी होता है । और विस्तार के साथ जीत भी मिल जाये तो हर्ज ही क्या है । संघ सिर्फ चुनाव से प्रभावित नहीं होता लेकिन चुनाव को प्रभावित करने की स्थिति में संघ हमेशा रहता है । लेकिन पहली बार संघ के सामने भी यह चुनौती है कि वह संघ के मुद्दो पर कम और मोदी सत्ता के मुद्दो पर चुनाव में शिरकत करें । गर्म चाय देते देते लगभग बोलते हये स्वयसेवक महोदय संघ की उस सस्कृति से भी परिचित करा रहे थे जो सवाल हमारे सामने थे । और चाय की चुस्की लेते लेते प्रोफेसर साहेब भी बोल पडे , इसका मतलब है मोदी सत्ता ने संघ के सामने धर्म संकट पैदा कर दिया है कि वह खामोश रह नहीं सकती और बोलेगी तो संघ का समाज नहीं बल्कि मोदी का विकास निकलेगा ।
हा हा ... लगभग ठहाका लगाते हुये स्वंयसेवक महोदय बोले मुश्किल तो यही हो चली है कि मोदी का विकास , संघ के मुद्दो से मिसमैच कर रहा है । और संघ के सामने दूसरा कोई विकल्प नहीं है क्योकि जिस रास्ते बीजेपी को चलना था उस रास्ते को काग्रेस ने पकड लिया है और जिस बोली को मोदी ने कहना था वह शब्द राहुल गांधी ने अपना लिये है ।
समझा नहीं बंधु...मुझे टोकना पडा । कुछ साफ किजिये ।
वाजपेयी जी काग्रेस ने अपना पारंपरिक चेहरा ही बदल लिया है । ध्यान दिजिये काग्रेस कारपोरेट पर निशाना साध रही है । किसान काग्रेस के मैनीफेस्टो के केन्द्र में आ गया है । गरीब-मजदूर- बेरोजगारो की आवाज काग्रेस बनना चाह रही है । यूपी में गंठबंधन छोड अकेले चुनाव लडने के फैसले के साथ कार्यकत्ता के लिये काग्रेस राजनीतिक जमीन तैयार कर रही है । दिल्ली में गंठबंधन के लिये तो कई राज्यो में उम्मीदवारो के लिये कार्यकत्ताओ से फिड बैक लेकर उम्मीदवारो का एलान कर रही है । जबकि दूसरी तरफ पारंपरिक काग्रेस के तौर तरीको को बीजेपी ने अपना लिया है । बीजेपी में गांधी परिवार की तरह मोदी-शाह है । वही हाईकमान है उन्ही के इर्द गिर्द बीजेपी के नेताओ की पहचान है । मोदी का कारपोरेट प्रेम किसी से छुपा नहीं है । किसान की मुश्किल या रोजगार का दर्द भी युवाओ में कितनी गहरी पैठ जमा चुका है ये भी किसी से छुपा नहीं है । बीजेपी के कार्यकत्ता के सामने आसतित्व का संकट है क्योकि उम्मीदवार के लिये उससे पूछा हीं जाता और चुनावी जीत के सेहरा मोदी-शाह के सिर ही बंधता है । फिर बीजेपी में तीसरे नंबर के ताकतवर अरुण जेटली की पहचान लोकसभा चुनाव हारने वाली ज्यादा बनी हुई है बनिस्पत मोदी को बचाने वाली ।
अरे ये तो आप हमारी सोच को ही कह रहे है । क्या वाकई संघ के भीतर इस तरह का चिंतन है । मुझे ना चाहते हुये भी बीच में टोकना पडा ।
संघ कोई व्यक्ति नहीं है । या फिर संघ के भीतर उठते सवाल किसी एक व्यक्ति के विचार नहीं होते लेकिन समाज में जो हो रहा होता है या फिर देश की घटनाओ के असर स्वयसेवक पर भी सामान्य तरीके वैसे ही पडता है जैसे आप पर पडता होगा ।
तब तो बंधु ये भी बता दिजिये कि शिवराज सिंह चौहाण हो या रमन सिंह या फिर वसुंधरा राजे सिधिया । उनकी जरुरत क्या लोकसभा चुनाव में है ही नहीं ।
वाजपेयी जी यही बात तो मै भी कह रहा हूं कि आखिर मोदी काग्रेस से नही अपनो से लडकर उन्हे परास्त करने में ही लगे रहे है । तो चुनाव के वक्त जो वोटर या जनता जिन तीन नेताओ का जिक्र आपने किया उन्ही तीन राज्यो में बीजपी का वोटर क्या करेगा ।
क्या करेगा ....प्रोफेसर साहेब
याद रखिये राजस्थान , मध्यप्रदेश और छत्तिसगढ में लोकसभा की 25,29,11 सीट है यानी 65 सीट जिसमें 2014 में बीजेपी 62 सीट जीती थी । लेकिन तीनो राज्यो में बीजेपी का कोई चेहरा ना होना तो ठीक है लेकिन तीनो राज्यो के चेहरे को हो ही जब मोदी-शाह ने डंप कर किया तो झटके में बीजेपी को वोट कौन देगा ? और वोट जो भी देगा क्या उससे जीत मिल पायेगी ? इन वालो के अक्स में कोई भी कह सकता है कि बीजेपी तीनो राज्यो में आधी सीट पर आ जायेगी । लेकिन चुनाव सिर्फ हिसाब-किताब का खेल नहीं होता है । परसेप्शन क्या है नेता को लेकर । और कुछ यही हालात यूपी - बिहार के भी है । 2014 में सबसे सक्रिय राजनाथ सिंह 2019 में सिर्फ अपनी लखनउ सीट पर सिमट चुके है और 2014 में सिर्फ गोरखपुर में सक्रिय योगी आदित्यनाथ को भगवा पहनाकर पूरे देश में घुमाया जा रहा है । इससे होगा क्या ?
तब तो यहा भी सीटे आधी हो जायेगी ।
ठीक कह रहे है प्रोफेसर साहेब । और बिहार यूपी में 2014 की जीत की आधी सीट होने का मतलब है बीजेपी अपने बूते सत्ता में आ नहीं पायगी । और जब चुनाव बीजेपी लड ही नहीं रही है तो फिर चुनावी हार भी बीजेपी की नही मोदी-शाह की होगी । इसलिये मैने शुरु में ही कहा था कि 23 मई के बाद बीजेपी की सत्ता माइनस मोदी-शाह के कैसे बने हडकंप इस पर मचेगी ।
वक्त काफी हो चला है ऐसे में एक बात आखिर में कह दूं कि काग्रेस मुक्त भारत बनाते बनाते मोदी-शाह ने काग्रेस को पांच बरस के भीतर वह जमीन देदी जो जमीन वह मंडल-कंमडल के दौर में गंवा चुकी थी ।
एक बात और बता दिजिये बंधुवर...मैने भी चाय की आखरी चुस्की लेते हुये पूछा ।
क्या
यही की 2014 में लहर थी । 2019 क्या सामन्य चुनाव है ।
हा हा .... स्वयसेवक महोदय ने जिस तरह ठहाका लगाया उसमें अजब सा रस था । फिर बोले जी नहीं 2019 सामान्य चुनाव नही है और मान कर चलिये ये संघ के लिये सबसे मुश्किल वक्त का सबसे मुशकिल चुनाव है । 


Saturday, April 6, 2019

स्वंयसेवक की चाय का तूफान....मोदी को काग्रेस नहीं जनता हरा देगी



मोदी तो काग्रेस को 2014 में ही परास्त कर चुके थे । बीत पांच बरस से मोदी काग्रेस को नहीं बीजेपी और संघ परिवार को हरा रहे थे । इसलिये 2019 के चुनाव में काग्रेस से संघर्ष नहीं है बल्कि मोदी का संघर्ष बीजेपी और संघ परिवार से है । स्वयसेवक से इस तरह के जवाब की उम्मीद तो बिलकुल नहीं थी । लेकिन शनिवार की शाम चाय की चुस्क के बीच जब प्रोफेसर साहेब ने सवाल दागा कि इस बार काग्रेस अपनी जमीन पर दोबारा खडा होने की स्थिति मेंआ रही है तो स्वयसेवक ने पहली लाइन यही कही , बिलकुल काग्रेस 2019 में अपनी खोयी जमीन बना रही है । लेकिन उसके बाद स्वयसेवक ने जो कहा वह वाकई चौकाने वाला था ।

तो फिर काग्रेस को क्या संघ परिवार गंभीरता से नहीं ले रहा है । मेरे इस सवाल पर स्वयसेवक महोदय उचक से गये । काग्रेस की विचारधारा को संघ कैसे मान्यता द सकता है । लेकिन आप किसी दूसरे मैदान की लकीर किसी दूसरे मैदान पर खिंचना चाह रहे है । मतलब ?

मतलब यही कि नरेन्द्र मोदी के लिये 2019 का चुनाव आने वाले वक्त में मोदी की बीजेपी और मोदी का संघ हो जाये या फिर पूरी तरह उन्ही की सोच पर टिक जायेकुछ अंदाज यही है और संघ हो या बीजेपी दोने के पास दूसरा कोई विकल्प बच नहीं रहा है कि वह मोदी को मान्यता दें । उनकी सत्ता स्वीकार करें ।

लेकिन ये तो मोदी की जीत पर टिका है । और कलपना किजिये की मोदी चुनाव हार गये तो । प्रोफेसर साहब की इस बात पर गंभीर होकर कह रहे स्वयसेवक महोदय ने जोर से ठहाका लगाया और बोल पडे प्रोफेसर आप चाय की चुस्की ले कर बताइये कि मोदी हार गये तो आप बीजेपी और संघ को कहां देखते है ।

मै तो ये मान कर चल रहा हूं कि ओल्ड गार्ड के दिन चुनाव परिणाम के आते ही फिर जायेगें । क्योकि तब आवाज बीजेपी माइनस मोदी-शाह की उठेगी । और मौजूदा वक्त में बीजेपी की जो हालत है उसमें दूसरी कतार का कोई नेता है नहीं । जो कैबिनेट मंत्री के तौर पर बीते पांच बरस में दूसरी कतार में नजर भी आते रहे उनकी राजनीतिक जमीन कहीं है ही नहीं । यानी जो कही से जीत नहीं सकते उन्हे ही मोदी ने ताकत दी । जिससे अपनी ताकत में वह मोदी को ही देखते-ताकते रहे । और मोदी हारें तो फिर बीजेपी के नेता आडवाणी-जोशी-सुषमा के दरवाजे पर पहुंचेगें  ।

रोचक कह रहे है प्रोफेसर साहेब और संघ के बारे में क्या मानना है । संघ तो उसके बाद खुद को सामाजिक-सास्कृतिक तौर पर खुद की जमीन टटोलने निकलेगा । जहा उसके सामने अंतर्दन्द यह भी होगा कि वह बीजेपी को जनसंघ के तौर पर खत्म कर आगे बढने की सोचे । या फिर ठसक क साथ संघ के एंजेडे को ही बीजेपी के राजनीतिक मंत्र के तौर पर ओल्ड गार्ड को अपना लें ।

और वाजपेयी जी आपको क्या लगता है । स्वयसेवक महोदय ने जिस अंदाज में पूछा ..... उसमें पहली बार लगा यही कि कोई बडी महत्वपूर्ण बात कहने से पहले स्वयसेवक हमें परख लेना चाहते है  । तो बिना हिचक मैने तीन वाकये का जिक्र कर दिया । पहला , अहमदाबाद में लालजी भाई मिले थे , वह कह रहे थे कि मोदी जी तो संघ के प्रचारक कभी रहे ही नहीं । ओटीसी की कोई परिक्षा उन्होने पास ही नहीं की । दूसरा , भोपाल में शिवकुमार यानी ककाजी जो कि किसान संघ से जुडे रहे है उनका कहना है कि काग्रेस राक्षस जरुर है लेकिन इस बार बडे राक्षस को हराना है । तीसरा , जयपुर के घनश्याम तिवाडी से बात  हुई । दशको तक संघ के पुराने स्वयसेवक रहे । दशको तक बीजेपी में रहे लेकिन अब बीजेपी छोड काग्रेस में शामिल हो गये है तो उन्होने कहा जिस तरह मोदी शाह चल निकले है उसमें बीजेपी-संघ के बारे में बात करना भी अपराध है । तो बाकि आप बताइये । स्वयसेवक महोदय को शायद ऐसे जवाब और फिर ऐसे सवाल की उम्मीद ना थी । तो बिना लाग लपेट के सीधे बोल पडे ।

वाजपेयी जी आपके उदाहरण ने ही सारे सवालो का जवाब दे दिया । दरअसल मोदी-शाह अपनो को ही पटकनी देत देते इतने आगे निकल चुके है कि उन्हे काग्रेस नहीं  हरायेगी बल्कि उन्हे बीजेपी-संघ से जुडा समाज ही हरा देगा । और अर्से बाद किसी सत्ताधारी के सामने कोई रानीतिक दल या उसका नेता महत्वपूर्ण उसके अपने राजनीतिक संगठन या राजनीतिक समझ की वजह से नहीं है । बल्कि जनता के बीच का जो बडा दायरा संघ परिवार का रहा है या फिर दशको से राजनीति करती बीजेपी की रही है वहा नरेन्द्र मोदी हार रहे है । और जिस संगठन या 11 करोड कार्यकत्ताओ के आंकडे के आसरे बीजेपी का इन्फ्रस्ट्कचर अमित शाह खडा कर सभी को डरा रहे है वह ताश के पत्तो की तरह ढहढहा जायेगा ।

क्यो ? आपको ऐसा क्यो लगने लगा है ।  मेरे टोकते है स्वयसेवक महोदय बोल रहे । खामोशी से सुनिये । चितंन किजिये । फिर पूछिये ।
जी ...
दरअसल 2019 की बीजेपी कभी ऐसी थी ही नहीं । या फिर 2019 का आरएसएस भी कभी ऐसा था ही नहीं । जो अब हो चला है । और बदलाव की बडा वजह विचारधारा का गायब होना है । एंजेडा का बदल जाना है । समाज में जुडे रहने के तौर तरीको में बदलाव लाना है । और सत्ता के लिये जिस तरह मोदी-शाह चुनाव प्रचार में निकल रहे है क्या वह प्रचार है । दरअसल ध्यान दिजिये वह किसी शिकारी की तरह चुनाव प्रचार में निकलते है । जाल फेकते है । और पांच बरस तक जनता से लेकर सस्थान और नौकरशाह से लेकर नेता तक इसमें फंसते रहे । लेकिन अब चुनाव है तो कोई जाल में फंस नहीं रहा है । और जो तीन बातो को तीन स्वयसेवको के जरीये आपने जिक्र किया उसकी जमीन तो है ।
यानी ? क्या वाजपेयी जी ने जो लालजी भाई की जानकारी बताई वह सही है कि नरेन्द्र मोदी ने ओटीसी भी पास नहीं की थी । झटके में प्रोफेसर साहेब  जिस तरह बोले उसपर बेहद शांत होकर स्वयसेवक महोदय बोले ..... आपको नहीं लगता कि स्वयसेवक अतिप्रतिक्रियावादी नहीं होता । स्वयसेवक बडबोला नहं होता ।
तो फिर आरएसएस को ये समझ में क्यों नहीं आया.... 
हा हा ...यही तो खास बात है । पर इसके लिये मोदी को नहीं संघ की कमजोरी को भी समझना चाहिय...उसे क्या चाहिये ये उसे पता है कि नहीं...
पर संघ तो मोदी को जिताने की तैयारी कर रहे है । बकायदा टोली बनाकर सीट दर सीट या कहे पहले चरण से लेकर सातवें चरण तक की योजना तैयार कर ली है ।
ये भी ठीक है.....लेकिन संघ मोदी के लिये नहीं समाज के लिये है ये भी समझना होगा...
यानी  ?
यानी कुछ नहीं इशारा नहीं समझे तो ...मै  और चाय लेकर आता हूं ...ये चाय ठंडी हो गई है । 
जारी...   

Friday, April 5, 2019

कैसे मनाये बीजेपी का 40वां जन्मदिन


दिल्ली के 11 अशोक रोड पर खडे होकर आज भी कोई महसूस कर सकता है कि बीजेपी का मतलब था क्या । वाजपेयी की सादगी जो हर किसी का स्वागत करती । आडवाणी की मनन मुद्रा जो हंसी ठहाके के बीच गंभीर खामोशी ओढ लेती । मुरली मनोहर जोशी का चिंतन जो बिना किसी रैफरेन्स के बात ही नहीं करते । भैरो सिह शोखावत का गले लगाने का अंदाज । जसवंत सिंह का हाथ मिलाकर हाथ दबाते हुये आंखो से इशारो में समझाने की अदा । खुराना का बात बात पर ठहाके लगाना । 1989 में छलाग लगाकर 85 सीटो पर कब्जा करने का जश्न हो या फिर 1990 में आडवाणी का सोमनाथ से अयोध्या तक राम की मुद्रा में भ्रमण कर संघ परिवार को एकजूट कर उग्र हिन्दुत्व का सुलगाने का प्रयास । अशोक रोड तो हर बात का गवाह रहा है । और 1992 में बाबरी मस्जिद की भूमि को समतल करने के एलान और 1996 में 13 दिन में भी बहुमत ना जुटा पाने के बाद वाजपेयी का कथन, '"विपक्षी कहते है वाजपेयी तो अच्छा है पर बीजेपी ठीक नही है "। अशोक रोड ने हर बयान , हर कथन के पहले और बाद के हालात उसके झंझावतो को भी बाखूबी महसूस किया है । और महसूस तो वाजपेयी सत्ता के खिलफ दत्तोपंत ठेंगडी का स्वदेश राग हो या फिर अर्थनीति को विश्वबैक और आईएमएफ के गुलाम बनाने के तौर तरको को खुला विरोध , हर बात का गवाह अशोक रोड का बीजेपी हडक्वाटर रहा है । और तो और 2014 का मोदी जश्न भी 11, अशोक रोड को बाखूबी याद है । लेकिन 2019 की आहट से पहले 11, अशोक रोड पर सन्नाटा है । कौवो की आवाज है । लोगो की आवाजाही ठहरी हुई है । क्योकि 2019 के जनादेश को देखने क चाहत दिल्ली के ही दीनदयाल उपाध्याय मार्ग पर बने पांच मंजिला लेकिन सात सितारा इमारत से हो चल है । जहां हेडक्वाटर को देखने के लिये सिर उठाना पडता है । नजरो का सीधा मेल यहा किसी का किसी से नहीं होता । चूंकि मार्ग दीन दयाल उपाध्याय के नाम पर है तो भरोसा जागना चाहिये था कि बीजेपी हेडक्वाटर जाते आते मौजूदा वक्त के बीजेपी के चेहर कम से कम आखरी व्यक्ति तक पहुंचने का प्रयास तो करेगें । लेकिन बीजेपी हेडक्वाटर तो आडवाणी-जोशी सरीखे अपने पहले लोगो से ही कट गया । तो क्या बीजेपी की उम्र 39 बरस की ही थी । जो 2019 में पूरी हो गई । क्योकि 2019 में चुनाव बीजपी नहीं लड रही है । 2019 के चुनाव में बीजेपी की विचारधारा को लेकर कोई चर्चा नहीं है । संघ परिवार जिन सांस्कृतिक मूल्यो का जिक्र करते हुये अपनी विचारधारा को वाजपेयी की सत्ता के दौर में भी उभारती रही वह भी 2019 के चुनाव में लापता है । यानी सत्ता ही विचारधारा हो जाये । और सत्ता पाने के तरीके ही संघ परिवार के सरोकार हो जाये तो फिर कोई भी सवाल कर सकता है कि बीजेपी है कहां । और 2019 में अगर मोदी चुनाव हार गये तो फिर बीजेपी होगी कहां । अशोका रोड लौटना चाहेगी या फिर सात सितारा पांच मंजिला लाल पत्थर में दफ्न हो जायेगी । शायद यही सवाल आडवाणी ने अपने ब्लाग में उठाया है । पहला संकेत तो यही दिया कि वह इशारो में बात कर रहे है तो मोदी समझ जाये कि उम्र उनपर हावी हुई नहीं है और वह अब भी जिन्दा है । दूसरा संकेत साफ है कि बीजेपी के भीतर भी लोकतंत्र खत्म हो चला है । यानी बीजेपी की विचारधारा को मोदी सत्ता ने हडप लिया है । और जब आडवाणी जिक्र करते है कि किसी को देशद्रोही करार देना या राजनीतिक तौर पर विपक्ष को दुशमन मान कर कार्रवाई करना बीजेपी की धारा नहीं रही है तो फिर अब समझने के जररत यह भी है कि 2019 के बाद क्या वाकई बीजेपी का पुनर्जन्म होगा या फिर बीजेपी फिर से 1980 में पहुंच जायेगी जब वाजपेयी जनसंघ के हिन्दु-मुस्लिम से निकल कर बीजेपी को गांधीवादी समाजवाद की थ्योरी तले ले कर आये । हालाकि 1984 में महज दो सीट की जीत ने बीजेपी के भीतर उग्र हिन्दुत्व के उभार को हथियार माना । इसलिये अयोध्या का राग विहिप ने पकडा और 1989 के चुनाव में 85 सीटो की जीत ने बीजेपी के भीतर इस उम्मीद को भर दिया कि वह कमंडल के राग तले और ज्यादा सफल हो सकती है । आडवाणी की रथयात्रा । बाबरी मस्जिद विध्वसं और फिर उग्र हिन्दुत्व के राग ने भी बीजेपी को अपने बूते सत्ता दिलायी नहीं । 1998-99 में 182 सीटो से आगे बीजेपी बढ नहीं सकी । और हो सकता है कि भारत के लोकतांत्रिक मिजाज को आडवाणी के उसके बाद ही समझा और बलाग के जरीये मोदी को सीख देनी चाही कि भारत तो लोकतंत्र के रंग में ना सिर्फ रंगा हुआ है बल्कि भारत की हवाओ में भी लोकतंत्र समाया हुआ है ऐसे में नरेन्द्र मोदी के कामकाज का तरीका अगर लोकतंत्र विरोधी है तो फिर वह बीजेपी नहीं है । यानी संकेत साफ है कि लोकसभा चुनाव के बाद आडवाणी-जोशी फिर बीजेपी नेताओ के कन्द्र में होगें । लेकिन संकेत यह भी है कि जब मोदी मुश्किल दिनो में अपने साथ खडे आडवाणी को हाशिये पर ढकेल सकते है तो आने वाले दिनो में मोदी का भी कोई प्रिय ताकतवर होते ही मोदी को भी हाशिये पर ढकेल देगा । यानी बीजेी के भीतर की नई पंरपरा और संघ परिवार के राजनीतिक शुद्दीकरण का ये नया  मिजाज क्या बीजेपी का सच हो चुका है ।
दरअसल बीजेपी को परखते हुये अब नरेन्द्र मोदी को समझना भी जरुरी है और इसके लिये आपको चलना होगा सन् 2000 में जब अटलबिहारी वाजपेयी अमेरिका की यात्र पर थे और वहा रह रहे मोदी के मित्र जो कि वाजपेयी जी को भी जानते थे उन्होने तब वाजपेयी जी से अमेरिका मे मुलाकात कर मोदी के बारे में वाजपेयी जी को जानकारी दी थी । पत्रकार विजय त्रिवेदी की किताब "हार नहीं मानूगां" में अपनी रिपोटिंग का जिक्र करते हुये वह लिखते है कि मोदी के मित्र से उनकी मुलाकात हुई और उन्होने बताया कि किस तरह वाजपेयी के पास जाकर उन्होने कहा कि नरेन्द्र मोदी भी अमेरिका में है । आपके कार्यक्रम से दूर है । लेकिन आप उनसे मिलना चाहेगें क्या ।  इसपर वाजपेयी जी बोले बिकुल । और जब वाजपेयी से मिलने मोदी पहुंचे तो वाजपेयी जी ने मोदी से कहां , " ऐसे भागने से काम नहीं चलेगा , कब तक यहा रहोगे ? दिल्ली आओ...  " । और फिर गुजरात । गुजरात में गोधरा कांड । दंगो का होना । वाजपेयी का राजधर्म का पाठ । कोई कैसे भूल सकता है लेकिन अब जब आडवाणी का ब्लाग सामने आता है और बीत पांच बरस में मोदी कार्यकाल समझते हुये बीजेपी की विचारधारा या उसके तार को मोदी के काम के जरीये खोलने की कोशिश करने की इच्छा हो तो गुजरात के मोदी काल को समझना चाहिय । कैसे गोधरा के जरीये क्रिया की प्रतिक्रिया तले दंगो को हिन्दुत्व की थ्योरी तले परिभाषित  किया गया । कैसे उसके बाद गुजराती अस्मिता के जरीये 6 करोड गुजरातियो के साथ क्षेत्रियता का भाव परिभाषित किया गया । कैसे बाइब्रेंट गुजरात के जरीये विकास के माडल को देश के लिये परिभाषित किया गया । और उसी कडी में कैसे देशभक्ति को अब दिल्ली की कुर्सी से परिभाषित किया जा रहा है । सबकुछ सामने है । और अब जब 6 अप्रैल 2019 को बीजेपी के 39 बरस पूरे हो रहे है तो फिर 40 वा बरस कैसे लगेगा इसके लिये 23 मई का इंतजार करना होगा जब तय होगा कि दिल्ली के लाल दीवारो में कैद सात सितारा बीजेपी हेडक्वाटर ही बीजेपी है या फिर बीजेपी को 11, अशोक रोड लौटना होगा । क्योकि वाजपेयी ने अशोक रोड में सांसे लेती बीजेपी के दौर में सत्ता नाम की कविता लिखा थी जो अब कागज से उतर कर कैसे गुजरात से होते हये पूरे देश में समा चुका है , और इनसे लडते वाजपेयी किन भावनाओ को जी रहे थे तो अटल बिहारी वाजेयी की कविता सत्ता को एक बार आप भी पढ लिजिये....मासूम बच्चों  / बूढी औरतों   / जवां मर्दो  /  कि लाशों के ढेर पर चढकर  / जो सत्ता के सिहासन तक पहुंचना चाहते है / उनसे मेरा एक सवाल है  / क्या मरने वालो के साथ  / उनका कोई रिश्ता ना था    / म सही धर्म का नाता,/ क्या धरती का भी संबंध नहीं था ?  / अर्थवेद या यह मंत्र    /  क्या सिर्फ जपने के लिये है  / जीने के लिये नहीं ?   / आग में जले बच्चे,   / वासना की शिकार औरतें,  / राख में बदले घर   / न सम्यता का प्रमाणपत्र है    / न देशभक्ति का तमगा..   / वे यदि घोषमापत्र है तो पशुता का, / प्रमाण हो तो पतितावस्था का  /  ऐसे कपूतों से  / मां का निपूती रहना ही अच्छा था.. 

Monday, April 1, 2019

मीडिया मंच पर भी पीएम गलत तथ्य रखे तो फिर मीडिया को सच बताना चाहिये

किसी भी मीडिया हाउस के लिये ये उपलब्धी हो सकती है कि उसके उद्धाटन में
प्रधानमंत्री आ जाये । ठीक वैसे ही जैसे 31 मार्च 2019 को दिल्ली में एक
न्यूज चैनल के उद्धाटन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पहुंच गये । एतराज
किसी को होना हीं चाहिये । कयोकि न्यूज चैनल की शुरुआत ही अगर देश के
सबसे बडे ब्रांड की मौजूदगी के साथ ह रही है तो फिर बात ही क्या है ।
लेकिन इसका ये अर्थ भी कतई नहीं होना चाहिये प्रधानमंत्री की मौजूदगी में
पत्रकारिता करना भूल जाया जाये । और वह भी तब जब देश लोकसभा चुनाव की तरफ
बढ चुका हो । नोटिफिकेशन जारी हो चुका है । 10 दिन बाद पहले चरण की
वोटिंग हो । दरअसल पत्रकारिता तलवार की धार पर चलने के समान है और यही
चूक बार बार मीडियाकर्मियो से हो रही है । ऐसे मौके पर पत्रकारिता का
मिजाज क्या कहता है । ये सवाल कोई भी कर सकता है । खासकर जो पत्रकार इस
दौर में समझ नहीं पा रह है कि सत्ता के करीब रहा जाये या सत्ता से दूर ।
पत्रकारिता करने के लिये सत्ता से करीब या दूर होना कोई मायने नहीं रखता
है बल्कि पत्रकारिता तो तथ्यो के साथ सत्ता पर भी निगरानी रखती है और
सत्ता को राह भी दिखाती है कि वह गलत बयानी कर बच नहीं सकती । यानी सवाल
ये नहीं है कि प्रधानमंत्री मोदी प्रेस कान्फ्रेस नहीं करते है या फिर
न्यूज चैनलो में एकतरफा भाषण देकर चले जाते है । सवाल है कि प्रधानमंत्री
मोदी बतौर पालेटिशन अपना पोजिशनिंग करते है । लेकिन मीडिया खुद की
पोजेशनिंग बतौर पत्रकार क्यों नहीं कर पाते । यानी पीएमने जो कहा वह सच
है भी नहीं ये तो मीडिया बता ही सकता है । यानी  रियल टेस्ट प्रधानमंत्री
के भाषण के बाद होना चाहिये । कोई चैनल अगर शुरु ही प्रधानमंत्री के भाषण
से हो रहा है तो फिर अगला कार्यक्रम ना सही लेकिन शाम के प्राईम टाइम में
तथ्यो के साथ चैनल को ये बताने की समझ तो होनी चाहिये कि प्राधानमंत्री
जो कह गये वह कितना सही है । क्योकि देश में जब सत्ताधारी राजनीतिक दल ही
नहीं बल्कि कैबिनेट स्तर के मंत्री और खुद प्रधानमंत्री भी कोई भी आंकडे
रखकर अपने छाती ठोंकते हुये चले जाते है तो फिर सवाल ये नहीं कि सत्ता ने
गलत क्यो बोला । सवाल ये है कि पत्रकार ने सच या सही क्यो नहीं बताया ।
तो न्यूज चैनल के उद्धाटन में पीएम मोदी ने अपने भाषण में कालेधन पर नकेल
कसने का जिक्र किया । बैकिंग प्रणाली को कितना मजबूत किया है इसके
विस्तार से जिक्र किया ।और यही से सवाल उठा कि प्रधानमंत्री जो भी कह गये
क्या उस पर सवाल नहीं उठना चाहिये । मोदी बोले कि सप्रीम कोर्ट ने उनके
पीएम बनने से  तीन साल पहले से कह रखा था कि कालेधन पर एसआईटी बनाइये ।
लेकिन मनमोहन सरकार ने नहीं बनाया और सत्ता मेंआते ही पहली कैबिनेट में
उन्होने एसआईटी बनाने का निर्णय ले लिया । जबकि हकीकत ये है कि सप्रीम
कोर्ट ने 2011 कालेधन को लेकर मनमोहन सत्ता क्या कर रही है इसका जवाब
मांगा था । और साफ तौर पर कहा था कि विदेशो में कितना कालाधन है इसका कोई
आंकडा बताने की स्थिति में सरकार कब आ पायगी । और तब के वित्त मंत्री
प्रणव मुखर्जी ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि जब तक दुनिया के तमाम देशो
के साथ ये समझता नहीं हो जाता है कि वहा के बौको में जमा  भारतीय नागरिको
के कालेधन की जानकारी दें तब तक मुश्किल है । और समझना होगा कि एसआईटी
बानने का जिक्र सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2014 में किया । बकायदा आरटीआई
एक्ट के तहत आरटीआई को बनाने क लिये कहा ।  और तब मनमोहन सरकार को लगा कि
देश में चुनाव होने वाले है तो फिर चुनाव के बाद जिसकी सरकार बनेगी वह
एसआईटी बनाये तो बेहतर होगा । और 27 मई 2014 को मोदी ने अपने पही कैबनेट
में एसआईटी बनाने का एलान कर दिया । यानी सवाल तीन साल का नहीं था ।
लेकिन इसके साथ ही एक दूसरा सच जो पीएम मोदी हमेशा छुपा लेते है  कि
एसआईटी तो आरटीआई कानून के तहत बना है तो सारी जानकारी जनता को मिलनी
चाहिये और इसी प्रक्रिया में एसआईटी बनने के बाद 28 अक्टूबर 2014 को
सुप्रीम कोर्ट ने बकायदा मोदी सत्ता को निर्देश दिया की 24 घंटे के भीतर
वह बताये कि विदेशी बैको में किन भारतीयो का कालाधन जमा है । और हालात
देखिये उसके बाद साढे चार बरस बीत गये लेकिन आजतक मोदी सत्ता ने उन नामो
का खुलासा नहीं किया जिनका कालाधन विदेशी बैको में जमा है । तो क्या
कालेधन पर पीएम के बयान से ही एक रिपोर्ट तथ्यो के साथ दिखायी नहीं जानी
चाहिये ।
खैर अपने भाषण में पीएम मोदी सबसे ज्यादा बैको को लेकर बोले कि कैसे
उन्होने पांच बरस के भीतर डूबती बैकिग प्रणाली  को ठीक कर दिया । तो क्या
न्यूज चैनल का काम सिर्फ मोदी का भाषण अपने मंच से दिलवाना भर ही होना
चाहिये । या फिर चैनल को इससे सुनहरा अवसर नहीं मिलता कि उनके मंच पर आकर
पीएम कुछ भी कहकर नहीं जा सकते । यानी शाम के प्राईम टाइम में तो बकायदा
पांच बरस में कैसे बैको का बंटाधार हुआ है इसको लेकर घंटे भर का
कार्यक्रम तक बनाया जा सकता है । और खबर का पेग पीएम का भाषण ही है ।
क्योकि ये पहली बार हुआ कि कि बैको में जमा जनता की कमाई की रकम की लूट
को छुपाने के लिये मोदी सत्ता ही सक्रिय हो गई । हालात इतने बुरे हो गये
कि सत्ता मेंआने के बाद बरस दर बरस बैको क फाइल साफ सुधरी दिखायी दे उसके
लिये सिलसिलेवार तरीके से लूट की रकम को रिटन आफ किया गया । जबकि रिकवरी
ना के बराबर हुई । मसलन 2014-15 में 49,018 करोड रिटन आफ किया गया और
रिकवरी हुई सिर्फ 5461 करोड । 2015-16 में रिटन आफ किया गया 57,585 करोड
और रिकवरी की गई महज 8096 करोड । 206-17 में रिटन आफ किया गया 81,683
करोड और रिकवरी हुई 8680 करोड । 2017-18 में रिटन आफ किया गया 84,272
करोड रुपये और रिकवरी हुई महज 7,106 करोड रुपये । यानी पहले चार बरस में
बैको की फाइलो में कर्ज लेकर लूट लिये गये 2,72,558 करोड रुपये नजर ना
आये इसकी व्यवस्था की गई । जबकि बैको की सक्रियता इन चार बरस में रिकवरी
कर पायी सिर्फ 29,343 करोड रपये । तो फिर बैको में कैसे सुधार मोदी सत्ता
के दौर में आ गया क्योकि अनूठा सच तो ये भी है कि करीब 90 फिसदी एनपीए
रिटन आर कर दिया गया । और अगर बैको के जरीये हालात को समझे तो 2014 से
2018 के बीच यूको बैक ने कोई रकवरी की ही नहीं जबकि कर्ज दे दिया 6087
करोड जिसे मोदी सरकार ने रिटन आफ कर दिया । देश के सबसे बडे बैक स्टेट
बैक आफ इंडिया ने इन चार बरस में कर्ज की रिकवरी की सिर्फ 10,396 करोड और
जो रिकवरी नहीं हो पायी वह रकम है 1,02,587 करोड रुपये । और इस रकम को
बैको के फाइलो से रिटन आफ कर दिया  । और ये बकायदा रिजर्व बैक के जरीये
जारी कि गई 21 बैको की सूची है जो साफ साफ बताती है कि आखिर जो एनपीए
2014 में सवा दो लाख करोड का था वह 2019 में बञते बढते 12 लाख करोड भी
पार कर चूका है और एनपीए का बढना महज इंटरेस्ट रेट नहीं होता है बल्कि इस
दौर में कर्ज देकर लूट को बढाने की सिलसिला भी कैसे सिस्टम का हिस्सा का
हिस्सा हो गया ।
और लूट को रोकने का जो दावा प्रधानमंत्री चैनल के उदधाटन भाषण में कर गये
उस पर तो चैनल को अलग से रिपोर्ट तैयार कर बताना चाहिये कि कैसे बीचे
पांच बरस के दौर में बैक फ्राड के मामले हवाई गति से बढे है । जरा इसके
सिलसिले को परखे एसबीआई [2466], बैंक आफ बड़ौदा [782] ,बैंक आफ इंडिया
[579], सिंडीकेट बैंक [552],सेन्ट्रल बैंक आफ इंडिया [527], पीएनबी
[471], यूनियन बैंक आफ इंडिया [368], इंडियन ओवरसीज बैंक[342],केनरा बैंक
[327], ओरियंट बैंक आफ कामर्स[297] , आईडीबीआई [ 292 ], कारपोरेश बैंक[
291], इंडियन बैंक [ 261],यूको बैंक [ 231],यूनिईटेड बैंक आफ इंडिया [
225 ], बैंक आफ महाराष्ट्र [ 170],आध्रे बैंक [ 160 ], इलाहबाद बैंक [
130 ], विजया बैंक  [114], देना बैंक [105], पंजाब एंड सिंघ बैंक [58]
..ये बैंकों में हुये फ्रॉड की लिस्ट है। 2015 से 2017 के दौरान बैंक
फ्रॉड की ये सूची साफ तौर पर बतलाती है कि कमोवेश हर बैंक में फ्रॉड हुआ।
सबसे ज्यादा स्टेट बैंक में 2466। तो पीएनबी में 471 । और सभी को जोड
दिजियेगा तो कुल 8748 बैंक फ्रॉड बीते तीन बरस में हुआ । यानी हर दिन
बैंक फ्रॉड के 8 मामले देश में होते रहे । पर सवाल सिर्फ बैंक फ्रॉड भर
का नहीं है। सवाल तो ये है कि बैंक से नीरव मोदी मेहूल चौकसी और माल्या
की तर्ज पर कर्ज लेकर ना लौटाने वालों की तादाद की है। और अरबों रुपया
बैंक का बैलेस शीट से हटाने का है। और सरकार का बैंको को कर्ज का अरबो
रुपया राइट आफ करने के लिये सहयोग देने का है । यानी सरकार बैंकिंग
प्रणाली के उस चेहरे को स्वीकार चुकी है, जिसमें अरबो रुपये का कर्जदार
पैसे ना लौटाये । क्योकि क्रेडिट इनफारमेशन ब्यूरो आफ इंडिया लिमिटेड
यानी सिबिल के मुताबिक इससे 1,11,738 करोड का चूना बैंकों को लग चुका है।
और 9339 कर्जदार ऐसे है जो कर्ज लौटा सकते है पर इंकार कर दिया। और पिछले
बरस सुप्रीम कोर्ट ने जब इन डिफाल्टरों का नाम पूछा तो रिजर्व बैंक की
तरफ से कहा गया कि जिन्होने 500 करोड से ज्यादा का कर्ज लिया है और नहीं
लौटा रहे है उनके नाम सार्वजनिक करना ठीक नहीं होगा। अर्थव्यवस्था पर असर
पड़ेगा। तो ऐसे में बैंकों की उस फेरहिस्त को पढिये कि किस बैंक को कितने
का चूना लगा और कर्ज ना लौटाने वाले है कितने।
तो एसबीआई को सबसे ज्यादा 27716 करोड का चूना लगाने में 1665 कर्जदार
हैं। पीएनबी को 12574 करोड का चूना लगा है और कर्ज लेने वालो की तादाद
1018 है। इसी तर्ज पर बैंक आफ इंडिया को 6104 करोड़ का चूना 314 कर्जदारो
ने लगाया। बैंक आफ बडौदा को 5342 करोड का चूना 243 कर्जदारों ने लगाया।
यूनियन बैंक को 4802 करोड का चूना 779 कर्जदारों ने लगाया। सेन्ट्रल बैंक
को 4429 करोड का चूना 666 कर्जदारों ने लगाया। ओरियन्ट बैंक को 4244 करोड
का चूना 420 कर्जदारो ने लगाया। यूको बैंक को 4100 करोड का चूना 338
कर्जदारों ने लगाया। आंध्र बैंक को 3927 करोड का चूना 373 कर्जदारों ने
लगाया। केनरा बैंक को 3691 करोड का चूना 473 कर्जदारों ने लगाया।
आईडीबीआई को 3659 करोड का चूना 83 कर्जदारों ने लगाया। और विजया बैंक को
3152 करोड़ का चूना 112 कर्जदारों ने लगाया । तो ये सिर्फ 12 बैंक हैं।
जिन्होंने जानकारी दी की 9339 कर्जदार है जो 1,11,738 करोड नहीं लौटा रहे
हैं। फिर भी इनके खिलाफ कोई कार्रवाई हुई नहीं है उल्टे सरकार बैंकों को
मदद कर रही हैं कि वह अपनी बैलेस शीट से अरबो रुपये की कर्जदारी को ही
हटा दें।
जाहिर है पीएम को उद्धाटन में बुलाकर चैनल मे अपनी धाक जमा ली । लेकिन
पीएम के कथन के पीछे के सच को अगर चैनल दिखाने की हिम्मत रखता तो वह वाकई
भारतवर्ष कहलाता अन्यथा रायसीना हिल्स और लुटियनस की दिल्ली में बसे चमके
इंडिया की कहानी तो रेड कारपेट है । जिसपर चलते हुये दिखने का शौक अब हर
मीडियाकर्मी को हो चला है । और शायद इसीलिये अब तथ्यों पर उतना ध्यान ना
राजनीति देती है ना ही मीडिया । क्योकि सभी की नजर सत्ता की कुर्सी पर
रहती है इसीलिये जन-सरोकार पीछे छूट रहे है ।