Tuesday, June 28, 2016

कश्मीर में गिलानी-यासिन से बाद की पीढ़ी का आतंक

श्रीनगर से 3 से 6 घंटे की दूरी पर कूपवाडा का केरन, तंगधार,नौ गाम और  मच्चछल ऐसे क्षेत्र है जहा से लगातार घुसपैठ होती है । पहली ऐसी घुसपैठ बांदीपुरा के गुरेज सेक्टर से होती थी । लेकिन सेना ने वहा चौकसी बढाई को घुसपैठ बंद हो गई । तो यह सवाल हर जहन में आ सकता है कि सेना चाहे तो ठीक उसी तरह इन इलाको में घुसपैठ रोक सकती है । लेकिन पहली बार वादी में सवाल सीमापार से घुसपैठ से कही आगे देश के भीतर पनपते उस गुस्से का हो चला है जिसकी थाह कोई ले नहीं रहा । और जिसका लाभ आंतकवादी उठाने से नहीं चूक रहे । क्योकि जिस तरह कूपवाडा में मारा गया आतंकवादी समीर अहमद वानी के जनाजे में शामिल होने के लिये ट्रको में सवार होकर युवाओ क् जत्थे दर जत्थे सोपोर जा रहे है । उसने यह नया सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या आंतक की परिभाषा कश्मीर में बदल रही है या फिर आतंक का सामाजिकरण हो गया है । क्योंकि नई पीढी को इस बात का खौफ नहीं कि मारा गया समीर आंतकवादी था और वह उसके जनाजे में शामिल होंगे तो उनपर भी आतंकी होने का ठप्पा लग सकता है । बल्कि ऐसे युवाओं को लगने लगा है कि उनके साथ न्याय नहीं हो रहा है । और हक के लिये हिंसा को आंतक के दायरे में कैसे रखा है।

जाहिर है यह एेसे सवाल है जो 1989 के उस आंतक से बिलकुल अलग जो रुबिया सईद के अपहरण के बाद धाटी में शुरु हुआ । दरअसल 90 के दशक में आंतक से होते हुये आलगाववाद की लकीर कश्मीरी समाज में खौफ पैदा भी कर रही थी । और आंतक का खौफ कश्मीरी समाज को अलग थलग भी कर रही था । लेकिन अब जिस तरह सूचना तकनीक ने संवाद और जानकारी के रास्ते खोले है । दिल्ली और धाटी के बीच सत्ता की दूरी कम की है । राजनीतिक तौर पर सत्ता कश्मीर के लिये शॉ़टकट का रास्ता अपना रही है । उसने धाटी के आम लोगो और सत्ता के बीच भी लकीर किंच दी है । और यह सवाल दिल्ली के उस नजरिये से कही आगे निकल रहा है जहा खुफिया एजेंसी सीमा पार के आंतक का जिक्र तो कर रही है लेकिन घाटी में कैसे आतंक को महज हक के लिये हिसां माना जा रहा है और उसी का लाभ सीमापार के आंतकवादी भी उठा रहे है इसे कहने से राजनीतिक सत्ता और खुफिया एजेंसी भी बच रही है । यानी घाटी गिलानी और यासिन मलिक के आंतक से कही निकल कर युवा कश्मीरियों के जरीये आतंक का सामाजिकरण कर रही है।

लेकिन दिल्ली श्रीनगर का नजरिया अभी भी घाटी में आंतक को थामने के लिये बंधूक की बोली को ही आखिरी रास्ता मान कर काम रहा है । इसीलिये कश्मीर को लेकर हालात कैसे हर दिन हर नयी धटना के साथ सामने आने लगे है यह कभी पंपोर तो कभी कूपवाडा तो कभी सोपोर से लेकर घाटी के सीमावर्ती इलाकों में गोलियों की गूंज से भी समझा जा सकता है और श्रीनगर में विधानसभा के भीतर बीजेपी विधायकों का पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में आतंकवादी कैपो पर हवाई हमले करने की तक की मांग से भी जाना जा सकता है । तो दिल्ली में गृहमंत्री राजनाथ सिंह की तमाम खुफिया एजेंसियों के प्रमुखो के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और गृह सचिव के बीच इन हालातों को लेकर मंथन की कैसे आतंकी हमलो से सीआरपीएफ बचे । और उपाय के तौर पर यही निर्णय लेना कि सीआरपीएफ भी बख्तरबंद गाडी में निकले । सेना के साथ घाटी में मूवमेंट करसे आगे बात जा नहीं रही है । तो क्या दिल्ली और श्रीनगर के पास घाटी में खड़ी होती आंतक की नयी पौघ को साधने के कोई उपाय नहीं है ।

या फिर घाटी को देखने समझने का सरकारी नजरिया अब भी 1989 के उसी आतंकी घटनाओं में अटका हुआ है जब अलगाववादी नेताओ की मौजूदा फौज युवा थी । यानी तब हाथों में बंदूक लहराना और आंतक को आजादी के रोमान्टिज्म से जोडकर खुल्ळम खुल्ला कानून व्यवस्था को बंधूक की नोक पर रखना भर था । अगर ऐसा है तो फिर कश्मीर में आतंक के सीरे को नहीं बल्कि आतंक से बचने के उपाय ही खोजे जा रहे है । और आतंक पर नकेल कसने का नजरिया हो क्या इसे लेकर उलझने ही ज्यादा है। क्योंकि विधानसभा में जम्मू कश्मीर की सीएम महबूबा पाकिस्तान से बातचीत की वकालत करती है । और सत्ता में महबूबा के साथ बीजेपी के विधायक रविन्द्र रैना पीओके के मिलिटेंट कैप पर हवाई हमले की मांग करते है । और दिल्ली में उसी बीजेपी की केन्द्र सरकार सीमा पर सेना को खुली कार्रवाई की इजाजत देने की जिक्र कर खामोश हो जाती है । यानी घाटी में जो पांच बड़े सवाल है उसपर कोई नहीं बोल रहा । क्योकि वह सत्ता के माथे पर शिकन पैदा करते है । पहला सवाल तो बढती बोरजगारी का है । दूसरा सवाल कश्मीर के बाहर कश्मीरियो के लिये बंद होते रास्तों का है । तीसरा सवाल दफ्न कश्मीरियो की पहचान का है। चौथा सवाल किसी भी आतंकी भेड़ के बाद उस इलाके के क्रेकडाउन का है जिसके दायरे में आम कश्मीरी फंसता है । और चौथा सवाल सेना से लेकर अद्दसेनिक बलो में श्रेय लेने की होड है । जिसमें मासूम फंसता है या आपसी होड कश्मीर को बंदूक के साये में ही देखना पसंद करती है । यह ठीक उसी तरह है जैसे कूपवाडा में दो आतंकवादियों को मारा किसने इसकी होड़ सेना और सीआरपीएफ में लग गई । दोनो की तरफ से ट्विट किये गये । लेकिन सीआरपीएफ ने जब विडियो फुटेज दिखायी तो सेना ने माना कि सीआरपीएफ ने ही आतंकवादियों को मारा । और इस बहस में यह सवाल गौण हो गया कि कैसे हमले से पहले आंतकवादी -पंपोर में हमले से पहले आतंकी करीब छह घंटे तक श्रीनगर शहर में घूमते रहे,जबकि पुलिस हाईअलर्ट पर थी । कैसे जिस कार में आतंकवादी सवार थे,उसने कई नाके क्रॉस किए लेकिन हमले के बाद कार मौका-ए-वारदात से फरार होने में कामयाब रही । कैसे सीआरपीएफ की रोड ओपनिंग पार्टी यानी आरओपी हाईवे को सुरक्षित करने में विफल रही और आतंकी हमले का जवाब नहीं दे पाई । कैसे सीआरपीएफ की बस,जिसमें जवान जा रहे थे,वो अलग थलग चल रही थी । कैसे सेना के काफिले में आगे और पीछे की गाड़ी में हथियारबंद जवानों का होना जरुरी है लेकिन ऐसा पर में नहीं हुआ । कैसे ट्रैफिक के दौरान सीआरपीएफ की गाड़ियां आगे-पीछे हो गई,जिसका मतलब है कि उनके बीच सामंजस्य नहीं था । यानी एक तरफ रवैया ढुलमुल तो दूसरी तरफ आधुनिक तकनीक के आसरे दुनिया से जुडता पढा लिखा कश्मीरी । जिसके सामने कश्मीर से बाहर दुनिया को जानने का नजरिया इंटरनेट या सोशल मीडिया ही है । जो भारत को कहीं तेजी से समझता है यानी दिल्ली जबतक कश्मीर को समझ उससे काफी पहले समझ लेता है।

Monday, June 27, 2016

क्यों चे-ग्वेरा नहीं है मेसी

जिस मेसी के इलाज के लिये एक वक्त अर्जेन्टीना के पास पैसे नहीं थे। जिस मेसी को अपने इलाज के लिये अर्जेन्टीना छोडना पड़ा। उसी मेसी ने अर्जेन्टीना की हार के बाद अंतरराष्ट्रीय फुटबाल को ही छोड़ दिया। महज 4 बरस की उम्र से फुटबाल को पांवों में घुमाने में माहिर मेसी जब 10 साल के हुये तो ग्रोथ हारमोन डेफिसिन्सी के शिकार हो गये। इलाज के लिये पिता के पास ना पैसे थे ना ही हेल्थ इश्योरेंस । मेसी के कल्ब ने पहले मदद की बात कही फिर मदद नहीं दी । और सन 2000 यानी 13 बरस की उम्र में इलाज के लिये पैसों का जुगाड़ भी हो जाये और मेसी फुटबाल भी खेलते रहे इसके लिये पिता जार्ज ने बार्सिलोना क्लब का दरवाजा खटखटाया। बार्सिलोना क्लब के बोर्ड डायरेक्टरों के विरोध के बावजूद सबसे कम उम्र के विदेशी खिलाडी मेसी को बार्सिलोना के टीम डायरेक्टर कार्लेस रेक्सेक ने साइन किया। और बार्सिलोना क्लब के डायरेक्टर को मेसी को साइन करने की इतनी जल्दबाजी थी कि कॉन्ट्रैक्ट किसी दस्तावेज पर नहीं ब्लिक पेपर नेपकिन पर ही साइन किया गया। और दो बरस बाद यानी 2002 में जब मेसी का इलाज पूरा हुआ तो उसके बाद मेसी रॉयल सेपनिश फुटबाल फेडरेशन का हिस्सा बने। यानी मेसी चाहते तो स्पेन की तरफ से ही खेल सकते थे। लेकिन स्पेन में रहते हुये स्पेन की तरफ से 2004 में खेलने के ऑफर को मेसी ने यह कहकर ठुकरा दिया कि वह अपने जन्मभूमि वाले देश की तरफ से ही खेलेंगे। और अगस्त 2005 में हंगरी के खिलाफ पहला इंटरनेशनल मैच खलते वक्त मेसी को 47 वें सेकेंड में ही रेडकार्ड दिखा दिया गया लेकिन मेसी अर्जेंटीना के सबसे सफल फुटबालर रहे। उन्होंने 55 गोल किये। इतने गोल मैराडोना ने भी नहीं किये। जिनकी अगुवाई में अर्जेंटीना आखिरी बार चैंपियन बना। लेकिन अर्जेंटीना को चैंपियन बनाने के दरवाजे पर मेसी एक बार नहीं तीन बार फाइनल में पहुंचे। 2014 में जर्मनी के एक्स्ट्रा टाइम में गोल कर किताब जीत लिया तो कोपा कप में तो जैसे इतिहास ही मेसी के खिलाफ हो गया। क्योंकि पिछले बरस 5 जुलाई 2015 और 27 जून 2016 में कुछ नहीं बदला। बदला यही कि पिछले बरस कोपा कप के फाइनल में पेनाल्टी शूटआउट में मेसी ने अर्जेंटीना की तरफ से गोल किया। और आज कोपा फाइनल के शूटआउट में अर्जेंटीना की तरफ से मेसी की पहली किक गोल पोस्ट में जाने की जगह हवा में उड़ गई। 2015 में चिली ने 99 बरस के कोपा कप के इतिहास में पहली बार चैंपियन बनी थी । तो सौवी वर्षगांठ मनाते हुये इस बार विशेष कोपा कप का आयोजन हुआ तो मैराडोना ने अर्जेंटीना की फुटबाल टीम से कहा , " जीत कर आना नहीं तो देश ना लौटना"।

और मेसी भी सोच कर निकले इस बार जरुर जीतेंगे। पहली बार कोपा कप के खत्महोने तक शेव ना करने की ठानी। अर्जेंटीना के कई और खिलाड़ियों ने भी शेव तक करना बंद कर दिया। मेसी हर मैच के बाद अर्जेंटीना को निखारते गये । हर किसी को लगा 1994 के बाद मेसी की अगुवाई में अर्जेंटीना जरुर जीतेगी । लेकिन पेनॉल्टी शूटआउट में मेसी ही पहला गोल करने में चूके और टूट गये । और यही पर मैराडोना हर किसी को याद आने लगे । क्योंकि मेसी पलटवार नहीं करते। जबकि मैराडोना चोट खाने के बाद भी लड़-झगड़कर खेलते थे। लेकिन मेसी संतुलन, ड्रिवलिंग स्किल, किसी भी एंगल से गोल करना, फ्री किक और शांत मिजाज़ के पहचान के साथ खेलते। इसी खेल ने मेसी को दुनिया का बेहतरीन खिलाड़ी बनाया है। और इसी खेल के भरोसे मेसी को पांच बार फीफा बैलन डि ओर खिताब मिला। तीन बार यूरोपिय गोल्डन शू का खिताब भी मैसी को मिला। लेकिन सवाल यही है कि मेसी रोजर फेडरर की तरह शांत रह गये।जबकि मेसी अर्जेंटीना के उसी रोसारियो शहर में पैदा हुये जहां चे-ग्वेरा का जन्म हुआ था।  लेकिन समझना होगा कि चे ग्वेरा और मेसी में सिर्फ इतनी ही समानता नहीं है कि दोनों का जन्म अर्जेंटीना के रेसारियो शहर में हुआ । दोनों का जन्म जून के महीने में हुआ । दोनो का वास्ता बचपन में गरीबी या आर्थिक मुशकिलात से पड़ा । दोनों की जिन्दगी में स्पेन का खास महत्व रहा। और दोनों ने ही 29 बरस में दुनिया को बता दिया कि उनका रास्ता भावनाओं से बनता नहीं बल्कि भावनाओ तले कमजोरबनाता है। चे-ग्वेरा का घर स्पेन में हुये गृहयुद्द के वक्त रिपब्लिकन्स के समर्थकों का अड्डा था। और स्पेन के बारसिलोना क्लब ने जब मेसी से कांट्रैक्ट किया तो जब जब मेसी के पिता जार्ज अर्जेंटीना लौटते तो उनके साथ कोई स्पेनिश दोस्त जरुर होता।

चे-ग्वेरा को बचपन से रग्बी का शौक था। तो मेसी फुटबाल खेलते । चे ग्वेरा को बचपन में ही अस्थमा हो गया। लेकिन उन्होंने खेलना नहीं छोड़ा । मेसी को बचपन में ही हारमोन्स के ना बढ़ने की बीमारी हो गई। लेकिन मेसी से फुटबाल नहीं छूटा। और संयोग देखिये चे ग्वेरा 20 बरस की उम्र में मेडिकल स्टूडेन्स के तौर पर जब दक्षिणी अमेरिका की यात्रा पर निकले तो वहां की गरीबी और वहा के मुश्किल हालात ने उन्हें कम्युनिस्ट धारा में बहा दिया। मेसी भी 19 बरस की उम्र में जब यूरोपियन क्लब में धूम मचाने की शुरुआत करते है तो फिर दुनिया को ही फुटबाल को नया पाठ पढ़ाते हैं। तो बीस बरस की उम्र में यानी 2007 में लियो मेसी फाउंडेशन का गठन कर अपने शहर में बच्चों का एक अस्पताल बनवाया बनवाते हैं। सीरियाई बच्चों की सहायता के लिए 2013 में अपनी कुल कमाई का एक तिहाई हिस्सा दान दे देते हैं। लेकिन दूसरी तरफ चे ग्वेरा वामपंथी विचारधार को गढ़ते हुये क्रांति के लिये बंदूक उठाने से नहीं कतराते। और महज 39 बरस की उम्र में क्यूबा में क्रांतिकारी बदलाव करते देखते हुये मारे जाते है। और मेसी सिर्फ 29 बरस की उम्र में अर्जेंटीना की हार से इतने व्यथित होते हैं कि अंतरराष्ट्रीय फुटबाल को बॉय बॉय कर देते है । और यही फैसला मेसी को चे-ग्वेरा से अलग करता है । और इसी जगह फुटबाल खेलते हुये मेसी से कही ज्यादा माराडोना चे-ग्वेरा लगते । जो पलटवार करते । त्रासद इसलिये मेसी को याद भी किया जायेगा तो पेले और मैराडोना के बाद। क्योंकि अंतरराष्ट्रीय मुकाब़ले में वह अपने देश को जिता नहीं सके। जिसका मलाल मेसी को जीवन भर रहेगा।

Wednesday, June 8, 2016

अमेरिकी मित्रदेश बनने की दिशा में भारत

तालियों की गूंज के बीच प्रधानमंत्री मोदी ने एसे वक्त अमेरिका के चुने हुये प्रतिनिधियों और सिनेटरो को संबोधित किया जब अमेरिका खुद अपने नये राष्ट्रपति की खोज में है । लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में जिस तरह दुनिया के सबसे पुराने और सबसे बडे लोकतांत्रिक देश के बीच बनते बढते प्रगाड होते संबंधो का जिक्र किया उसने इसके संकेत तो दे दिये कि भारत अमेरिका की दोस्ती एतिहासिक मोड़ पर है । लेकिन समझना यह भी होगा कि अमेरिकी काग्रेस को दर्जनों देशो के 117 प्रमुख संबोधित कर चुके हैं। मोदी 118 वें है । और इस फेहरिस्त में ब्रिटेन से लेकर जर्मनी, जापान से लेकर फ्रांस, और पाकिस्तान से लेकर इजरायल के राष्ट्राध्यक्ष तक शामिल हैं । लेकिन अमेरिकी काग्रेस को कभी चीन के किसी राष्ट्राध्यक्ष ने संबोधित नहीं किया । यानी जिस तरह अमेरिकी काग्रेस के स्पीकर की तरफ से प्रदानमंत्री मोदी को संबोधित करने का निमंत्रण मिला उस तरह बीते 70 बरस में कभी चीन को अमेरिका की तरफ से निमंत्रण नहीं भेजा गया । यानी 1945 में अमेरिकी काग्रेस को संबोधित करने की जो परंपरा चर्चिल के भाषण के साथ शुरु हुई उस कड़ी में कभी चीन के किसी राष्ट्राध्यक्ष को अमेरिका ने नहीं बुलाया। तो अंतराष्ट्रीय मंच पर अमेरिका और चीन के बीच दूरियां थीं । दोनो के बीच टकराव है।और अमेरिका के लिये भारत से निकटता उसकी जरुरत है । क्योकि एशिया में भारत के जरीये ही अमेरिका चीन के विस्तार को रोक सकता है ।

दूसरी तरफ चीन किसी भी तरह भारत को रोकने के लिये पाकिस्तान को हर मदद देगा । तो यह सवाल हर जहन में उठ सकता है भारत के जरिये अमेरिका और पाकिस्तान के जरीये चीन अपनी कूटनीति बिसात तो नहीं बिछा रहा है। क्योंकि आतंकवाद के मुद्दों पर भारत के लिये पाकिस्तान सबसे बड़ी मुश्किल है । लेकिन एक वक्त अमेरिका के संबंध पाकिस्तान के साथ अच्छे रहे तो नेहरु या इंदिरा गांधी को अमेरिका ने कांग्रेस को संबोधित करने का निमंत्रण नहीं भेजा बल्कि अमेरिकी कांग्रेस में पाकिस्तान के अय्यूब खान 1961 में ही संबोधित कर आये । लेकिन अफगानिस्तान में जब रुसी सैना हारी और 9/11 की घटना हुई तो भारत पाकिस्तान के बीच बैलेंस बनाने में ही अमेरिका लगा रहा । 1985 में पहली बार भारत के पीएम राजीव गांधी को अमेरिकी कांग्रेस में संबोधन के लिये निमंत्रण दिया गया तो 1989 में बेनजीर भुट्टो को अमेरिकी कांग्रेस में संबोधित करने का निमंत्रण मिला। जबकि भारत में आतंक की घुसपैठ बेनजीर के दौर से शुरु हुई । लेकिन मौजूदा वक्त में अमेरिका के लिये रणनीतिक तौर पर भारत सबसे अनुकूल है । और भारत के सामने भी चीन या पाकिस्तान को रोकने के लिये अमेरिका के साथ की जरुरत है तो अमेरिका के साथ सैन्य तंत्र के इस्तेमाल को लेकर लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरैंडम ऑफ़ ऐग्रीमेंट के नाम पर ऐसा समझौता हो रहा है जिसके तहत अमरीकी फ़ौजी विमान भारत और भारत के सैन्य अड्डों पर ईंधन या मरम्मत के लिए उतर सकते हैं । यानी भारत के गुटनिरपेक्ष इतिहास को देखते हुए ये एक बहुत बड़ा क़दम है और भारतीय अधिकारी इस पर बेहद संभलकर बयान दे रहे हैं लेकिन जानकारों के अनुसार दोनों देशों के बीच बढ़ते सैन्य रिश्तों के लिए ये एक ऐतिहासिक समझौता होगा. तो दूसरी तरफ जो सवाल भारत में न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप की सदस्यता को लेकर उठ रहे है उसका एक सच तो यह भी है कि एनएसजी की सदस्यता से बारत को लाभ यही होगा कि वह अन्य सदस्य देशों के साथ मिलकर परमाणु मसलों पर नियम बना सकेगा ।

तो ये एक स्टेटस और प्रतिष्ठा की बात है ना कि इसकी कोई ज़रूरत है क्योंकि भारत को साल 2008 में ही परमाणु पदार्थों के आयात के लिए सहूलियत मिली हुई है । लेकिन साथ ही अगर भारत को एनएसजी की सदस्यता मिल जाती है तो सबसे बड़ा फ़ायदा उसे ये होगा कि उसका रूतबा बढ़ जाएगा । क्योकि याद किजिये न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप वर्ष 1974 में भारत के परमाणु परीक्षण के अगले ही साल 1975 में बना था. यानी जिस क्लब की शुरुआत भारत का विरोध करने के लिए हुई थी, अगर भारत उसका मेंबर बन जाता है तो ये उसके लिए एक बड़ी उपलब्धि होगी । लेकिन इसके आगे का सवाल बारत के लिये महत्वपूर्ण है कि ओबामा के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति हिलेरी हो या ट्रंप , क्या उनसे भी बारत की निकटकता बरकार रहेगी । क्योकि
ओबामा ने भारत को लेकर डेमोक्रिटेस की छवि भी बदल दी इससे इंकार किया नहीं जा सकता है । क्योकि अभी तक माना तो यही जाकता रहा कि डेमोक्रेट्स के मुकाबले रिपब्लिकन कम एंटी-इंडियन रहे हैं। तो क्या हेलेरी का आना भारत के लिये अच्छा होगा । या फिर ट्रंप । यह सवाल है , क्योकि हेलेरी पारंपरिक तौर पर कश्मीर को लेकर भारत के साथ खडी होगी . तो ट्रंप पाकिस्तानी जेहाद को निशाने पर लेने से नहीं चूकेंगे । यानी मौजूदा वक्त में चीन और पाकिस्तान जिस तरह भारत के रास्ते में खड़े हैं वैसे में पहली नजर में कह सकते है ट्रप का आना भारत के अनुकूल होगा । क्योंकि हिलेरी ट्रंप की तर्ज पर इस्लामिक देशो के खिलाफ हो नहीं सकतीं । क्योंकि क्लिंटन फाउंडेशन को तमाम इस्लामिक देशों से खासा फंड मिलता रहा है । लेकिन उसका अगला सवाल यह भी है कि ट्रंप जिस तरह अमेरिका में नौकरी कर रहे भारतीय नागरिकों के खिलाफ हैं, वह मोदी के लिये मुश्किल खड़ा कर सकता है । लेकिन दूसरी तरफ ट्रप ने जिस तरह भारत में रियल इस्टेट में इनवेंस्ट किया है तो ट्रंप का आना भारत में निवेश करने के अनुकूल माहौल बना सकता है । लेकिन महत्वपूर्ण सवाल तो ट्रंप के एच-1बी वीजा पर अंकुश लगाने की थ्योरी का है । इससे भारतीय आईटी इंडस्ट्री क ही नहीं बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को भी  झटका लग सकता है । क्योंकि भारत को इस वक्त विदेशों में काम करने वाले भारतीयों से करीब 71 बिलियन डॉलर हर साल मिलता है-जो देश की जीडीपी का करीब 4 फीसदी है। इनमें बड़ा हिस्सा आईटी इंडस्ट्री में काम करने वाले भारतीय भारत भेजते हैं। लेकिन ऐसा भी नहीं है ओबामा ने भारतीय आईटी सेक्टर को मदद ही की हो। -एच-1बी वीजा फीस को ओबामा के दौर में ही बढ़ायी गई यानी और हिलेरी इसे कम करेंगी-ऐसा नहीं लगता। लेकिन हिलरी क्लिंटन भारतीय अधिकारियों के लिए एक जाना पहचाना चेहरा है। आठ सालों तक वह अमेरिका की फर्स्ट लेडी रही हैं, उसके बाद आठ साल अमेरिकी सेनेटर रही हैं  और चार साल से सेक्रटरी ऑफ स्टेट हैं। भारत को लेकर उनके विचार और व्यवहार अब तक दोस्ताना रहे हैं। लेकिन भारत को लेकर अमेरिका की जो एक निर्धारित पॉलिसी है, उसके दायरे में रहकर ही हिलरी काम करेंगी। जबकि ट्रंप की विदेश नीति में भारत के लिए खास जगह हो सकती है लेकिन सवाल यही है कि ट्रंप पर भरोसा कैसे किया जाए। क्योंकि एक तरफ वो मोदी की तारीफ करते नहीं थकते तो भारतीयों का मजाक उड़ाने में भी नहीं हिचकते। यानी ट्रंप या हिलेरी में जो भी राष्ट्रपति बने-भारत के लिए एकदम से हालात अच्छे नहीं होंगे । और ना ही ओबामा की तर्ज पर मोदी का याराना हेलेरी या ट्रंप से हो पायेगा । यानी ओबाना के बाद अंतर्ष्ट्रीय कूटनीति बदलगी इससे इंकार नहीं किया जा सकता ।

Wednesday, June 1, 2016

कैसे बदलेगी राहुल गांधी की कांग्रेस?

नेहरु खानदान की चौथी पीढ़ी अगर यह सोचकर कांग्रेस की कमान संभालने की तैयारी कर रही है कि वह देश की कमान भी संभाल लेगी या जनता राहुल गांधी के हाथ में देश की बागडोर सौप देगी तो इससे ज्यादा बड़ा कोई सपना मौजूदा वक्त में हो नहीं सकता है। क्योंकि कांग्रेसियों को नहीं पता है कि उसे सर्जरी करनी भी है तो कहां करनी है। वोट बैंक तो दूर खुद बिखरे कांग्रेसियों को ही कांग्रेस कैसे जोड़े इस सच से वह दूर है। फिर आजादी के दौर के बोझ को लिये कांग्रेस मौजूदा सबसे युवा देश को कैसे साधे इसके उपाय भी नहीं है । इसीलिये कांग्रेस को लेकर सारी बहस कमान संभालने पर जा ठहर रही है। यानी सोनिया और राहुल के बीच फंसी कांग्रेस। यानी अभी सोनिया गांधी के हाथ में कमान है तो गंठबंधन को लेकर कांग्रेस लचीली है। सहयोगी भी सोनिया को लेकर लचीले हैं। अगर राहुल गांधी के हाथ में कमान होगी तो राहुल का रुख सहयोगियों को लेकर और सहयोगियों का कांग्रेस को लेकर रुख बदल जायेगा। तो क्या कांग्रेस के भीतर राहुल गांधी से बड़ा कोई सवाल नहीं है। और राहुल गांधी के सामने कांग्रेस के सुनहरे युग को लौटाने के लिये खुद के प्रयोग की खुली छूट पाने के अलावा कोई बड़ा सवाल नहीं है। या फिर पहली बार गांधी परिवार फेल होकर पास होने के उपाय खोज रहा है । यानी गांधी परिवार को लेकर कांग्रेस में इससे पहले कोई सवाल नेहरु इंदिरा या राजीव के दौर में जो नहीं उठा वह सोनिया के दौर में राहुल गांधी को लेकर उठ रहे हैं। तो यह कांग्रेस की नही गांधी परिवार के परीक्षा की घड़ी है । लेकिन सवाल ये है कि क्या वाकई कांग्रेस बदलने को तैयार है। राहुल गांधी भी कांग्रेस के संगठन में ऐसा कोई परिवर्तन करने को तैयार है जिससे में नये चेहरे,नयी सोच, नये विजन का समावेश हो। क्योंकि कांग्रेसी कद्दावर नामों को ही देखिये। चिदंबरम, एके एंटोनी ,कपिल सिब्बल ,जयराम रमेश,आनंद शर्मा, अंबिका सोनी , गुलाम नबीं आजाद , आस्कर फर्नाडिस, चिरंजीवी, रेणुका चौधरी, पीएल पूनिया, व्यालार रवि। यह सभी चेहरे मनमोहन सिंह के दौर में उनके कैबिनेट मंत्री रहे हैं। और सभी मौजूदा वक्त में राज्य सभा में हैं। तो फिर कांग्रेस में बदला क्या है या बदलेगा क्या।

क्योंकि एक तरफ सत्ता में रहते हुये गांधी पारिवार बदलते हिन्दुस्तन की उस नब्ज को पकड़ नहीं पाया जहा जनता की नुमाइन्दगी करते हुये जनता के प्रति कोई जिम्मेदारी कांग्रेसी नेता-मंत्रियों की होनी चाहिये। तो दूसरी तरफ जनता के बीच गये बगैर गांधी परिवार के घर या किचन के चक्कर लगाकर कैसे मंत्री बनकर कद बढाया जाता है इस सिद्धांत को कांग्रेस ने पाल पोसकर बढा कर दिया । और असर उसी का हुआ कि पसीना बहाकर कांग्रेस के लिये गांव गांव में खडा हुआ वोट क्लेक्टर कांग्रेस से ही निराश हो गया । नेता के पीछे कार्यकर्ता गायब हुआ तो 10 जनपथ की चाकरी से ही नेता को कद मिलने लगा । गांधी परिवार के इर्द-गिर्द का काकस सबसे ताकतवर कांग्रेसी नेता हो गया । यानी जो सवाल बार बार हर कांग्रेसी को परेशान करता है कि आखिर गांधी परिवार का औरा खत्म क्यों हो गया। या देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस का सूपड़ा प्रांत दर प्रांत साफ क्यों होते चले जा रहा है। वह उन सवालो के मर्म से दूर है कि आदिवासी, दलित, अल्पसंख्यक या किसानों के भीतर भी बदलाव आया लेकिन कांग्रेस नहीं बदली। कांग्रेस के पांरपरिक वोटर के सरोकार सूचना तकनालाजी से बदल गये। लेकिन कांग्रेस नहीं बदली। यानी नेहरु की चौथी पीढ़ी राहुल गांधी के तौर पर सामाजिक-आर्थिक आधारो पर नहीं बदली लेकिन देश के किसान मजदूर, दलित अल्पसंख्यकों की चौथी पीढी ना सिर्फ बदली बल्कि मुख्यधारा में आने की उसकी छटपटाहट कहीं तेज हो गई। लेकिन कांग्रेस के भीतर विरासत की सत्ता से आगे राजनीति निकल नहीं पायी। इसीलिये यह सवाल बड़ा है कि क्या वाकई कांग्रेस का ट्रांसफारमेशन सोनिया से राहुल के पास सत्ता जाने भर से हो जायेगा । या फिर यब ऐसा दांव है जिसे खेलना मजबूरी है। ना खेलना कमजोरी है। तो इंतजार कीजिये राहुल एरा की शुरुआत का। क्योंकि उसकी पहली परीक्षा तो यूपी में होगी। और माना तो यही जा रहा है कि यूपी चुनाव से पहले राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष बन जायेंगे और यूपी की बिसात पर मोदी और राहुल के शह-मात का खेल 2019 के चुनाव की लकीर तय कर देगा।

यानी जिस आरक्षण के सवाल ने यूपी की राजनीति में कांग्रेस और बीजेपी को हाशिये पर ढकेल दिया। मुलायम-मायावती के सामाजिक समीकरण को तोड पाने में असफल हो गये । 25 बरस बाद उसी यूपी की राजनीति बिसात पर बीजेपी-कांग्रेस को बताना है कि वह कैसे एक दूसरे से बडे राजनीतिक दल है और मोदी-राहुल को दिकानाहै कि वह कैसे मुलायम-मायावती से बडे क्षत्रप हैं। ध्यान दें तो यूपी में मोदी की बिसात बिछने लगी है। जिसमें पिछडी जाति के मौर्य प्रदेश अध्यक्ष तो ब्रहमण शिवप्रताप शुक्ला राज्यसभा और जाट मेता भूपेन्द्र सिंह को विधान परिषद में भेजा। अगली कड़ी में शिवप्रताप शुक्ला के धुर विरोधी योगी आदित्यनाथ को केन्द्र में मंत्री बनाने की तैयारी हो रही है तो राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह के जरीये यूपी में टिकटो पर आखरी मुहर की कवायद । यानी बीजेपी सोशल इंजीनियरिंग के हर उस माप दंड को परख रही है जिसे एक वक्त गोविन्दाचार्य ने उठाया और जिसे कल्याण सिंह ने आजमाया। तो दूसरी तरफ राहुल गांधी कांग्रेस संगठन को ही मथने के लिये तैयार है। कांग्रेस महासचिव , सचिव , राज्य प्रमुख और विभाग प्रमुख को बदलने के लिये तैयार है । पंचमडी शिविर की तर्ज पर मंथन शिविर की तैयारी यूपी चुनाव से पहले यूपी में ही करने की तैयारी है । लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या वाकई राहुल गांधी अब वोटरो से सीधा सरोकार चाहते है । क्योकि कांग्रेसी कार्यकर्ता तो सडक पर निकलने को तैयार है लेकिन वह बिना आधार वाले या भ्रष्ट कांग्रेसियो के पीछे भीड के रुप में खडे होने को तैयार नहीं है । तो आखरी सवाल यही कि जिस दौर में हिन्दुस्तान सबसे युवा है उस दौर में राहुल ही कांग्रेस में एकमात्र युवा रहेंगे या कांग्रेस भी युवा होगी ।

Tuesday, May 31, 2016

पिछले दरवाजे से सियासी लूट का लोकतंत्र

रेल मंत्री सुरेश प्रभु हैं महाराष्ट्र के लेकिन इनका नया ठिकाना आंध्रप्रदेश का हो गया । शहरी विकास मंत्री वेकैंया नायडू हैं आंध्र प्रदेश के लेकिन अब ये राजस्थान के हो गये । वाणिज्य मंत्री निर्मला सीतारमण हैं तो आंध्रप्रेदश की लेकिन अब कर्नाटक की हो गई । संसदीय राज्य मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी हैं तो यूपी के लेकिन अब इनका नया पता झारखंड का है । यानी चारों मंत्री को नये राज्यो में किराये पर घर लेना होगा या घर खरीदना होगा । फिर उसी पते के मुताबिक सभी का वोटिंग कार्ड बनेगा । यानी जो सवाल कभी पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लेकर बीजेपी उठाती थी कि जिन्हें असम का अ नहीं पता वह असम से राज्यसभा में कैसे और क्यो । तो सवाल सिर्फ इतना नहीं कि मंत्री बने रहे तो घर का पता और ठिकाना ही मंत्री का बदल जाये । और वह उस राज्य में पहुंच जाये जहा के बारे में जानकारी गूगल से आगे ना हो । तो दूसरा सवाल यह भी है कि जब देश के किसी भी हिस्से में रहने वाला वाला किसी नये प्रांत में जनता से कोई सरोकार रखे बगैर भी वहां से राज्यसभा सदस्य बनकर मंत्री बन सकता है तो उसकी जबाबदेही होती क्या है । और बिना चुनाव लड़े या चुनाव हारने के बावजूद अगर  किसी सरकार में मंत्रियो में फेहरिस्त राज्यसभा के सदस्यों की ज्यादा हो तो फिर लोकसभा सदस्य मंत्री बनने लायक नहीं होते या राज्यसभा सदस्य ज्यादा लायक होते हैं यह सवाल भी उठ सकता है । क्योंकि मौजूदा वक्त में मोदी सरकार को ही परखे तो दर्जन भर कैबिनेट मिनिस्टर राज्यसभा सदस्य है । फेहरिस्त देखें । वित्त मंत्री अरुण जेटली , रक्षा मंत्री पर्रिकर, शहरी विकास मंत्री वेकैंया नायडू, वाणिज्य मंत्री निर्मला सीतारमण, रेल मंत्री सुरेश प्रभु, मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी , ग्रामीण विकास मंत्री चौधरी वीरेन्द्र सिंह, उर्जा मंत्री पियूष गोयल, पेट्रोलियम मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान अल्पसंख्यक मंत्री नजमा हेपतुल्ला , संचार मंत्री रविसंकर प्रसाद, स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा, संसदीय राज्य मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी सभी राज्यसभा सदस्य । और महत्वपूर्ण यह भी है कि अरुण जेटली और स्मृति ईरानी गुजरात का प्रतिनिधित्व करते हैं । तो उडीसा के धर्मेन्द्र प्रधान बिहार का प्रतिनिधित्व करते हैं। और नजमा हेपतुल्ला यूपी की हैं लेकिन वह मध्यप्रदेश का प्रतिनिधित्व करते हैं। यानी हर पांच बरस में लोकसभा चुनाव के जरीये सत्ता बदलने का एलान चाहे हो ।

लेकिन सत्ता चलाने वाले ज्यादातर राज्यसभा सदस्य हैं, जिन्हें जनता पांच बरस के लिये नहीं बल्कि पार्टियां ही अपनी वोटिंग से छह बरस के लिये चुनती है। और पांच बरस बाद देश में सत्ता चाहे बदल जाये लेकिन राज्यसभा सदस्यों पर सत्ता बदलने की आंच नहीं आती । वजह भी यही है कि मौजूदा वक्त में कांग्रेस के राज्यसभा सदस्यो की संख्या बीजेपी से ज्यादा है ।लेकिन ऐसा भी नहीं है कि यह खेल मोदी सरकार में ही पहली बार हुआ । याद कीजिये मनमोहन सरकार में डेढ दर्जन कैबिनैट मिनिस्टर रासज्यसभा सदस्य थे । तो सवाल तब भी सवाल अब भी । तो क्या बीजेपी का भी कांग्रेसीकरण हो चुका है इसलिये जनता के सामने यह सवाल है कि उसे कुछ बदलता नजर नहीं आता चाहे सवाल राबर्ट वाड्रा का है । चाहे सवाल यूपी की बिसात का हो या फिर सवाल महंगाई का हो ।

तो बात राबर्ट वाड्रा से शुरु करें । दामादश्री यानी राबर्ट वाड्रा। और राबर्ट पर लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी ने आरोप सीधे लगाये कि वह घोटालो का बादशाह है । देश का सौदागर है । किसानों का अपराधी है । और माना यही गया कि दिल्ली में सत्ता बदली नहीं कि राबर्ट वाड्रा जेल में ही नजर आयेगे । लेकिन मोदी सरकार के दो बरस पूरे होने के बाद भी राबर्ट वाड्रा खुल्लम खुल्ला घूम रहे हैं और आरोपों के फेहरिस्त में एक नया नाम राबर्ट वाड्रा से जुडा कि लंदन में कथित संपत्ति है । और संबंध हथियारों के विवादित सोदेबाज से है। तो सवाल यही है कि राबर्ट वाड्रा का फाइल खुलती क्यों नहीं और अगर जमीनो को लेकर हरियाणा और राजस्थान में खुलती हुई दिखती है तो फिर राबर्ट वाड्रा के खिलाफ कानूनी कार्रवाई अभी तक शुरु हुई क्यो नहीं है। तो क्या कानूनी कार्रवाई हुई तो फिर मुद्दा ही खत्म हो जायेगा । क्याोंकि 2012 में दिल्ली और आसपास की जमीनो की खरीद में राबर्ट वाड्रा का नाम आया। हरियाणा में तब के कांग्रेसी सीएम हुड्डा पर राबर्ट वाड्रा और डीएलएफ के जमीन खरीद में लाभ पहुंचाने का आरोप लगा । राजस्थान में गहलोत सरकार पर वाड्रा के लिये जमीन हथियाने का आरोप लगे । और राबर्ट वाड्रा के तमाम कच्चे चिट्ठे के साथ 27 अप्रैल 2014 को रविशंकर प्रसाद, जेपी नड्डा और बीकानेर से सांसद अर्जुन राम मेघवाल ने 'दामादश्री' नाम की एक आठ मिनट की फ़िल्म दिखायी । फिल्म देखकर और नेताओं के वक्तव्य सुनकर दो बरस पहले ही लगा था कि अगर यह सत्ता में आ गये तो फिर राबर्ट वाड्रा का खेल खत्म । यानी तो दो बरस पहले बीजेपी ने कांग्रेस शासित राज्य सरकारों पर वाड्रा के 'महल को खड़ा करने में सहयोग' देने का आरोप लगाया था । लेकिन दो बरस बाद भी हुआ क्या । सत्ता पलट गई । नेता मंत्री बन गये । और राबर्ट वाड्रा के खिलाफ कोई कार्रावाई हुई नहीं । दूसरा सवाल यूपी की बिसात का । जब
कांग्रेस की सत्ता थी तब राहुल गांधी यूपी के दलित के साथ रोटी खाते हुये नजर आते थे । अब बीजेपी की सत्ता है तो अमित शाह दलित के घर पर साथ बैठकर रोटी खाते नजर आते थे । लेकिन जिस यूपी को राजनीतिक तौर पर अपनी अपनी प्रयोगशाला बनाकर काग्रेस और बीजेपी ने सोशल इंजीनियरिंग शुरु की उसका एक सच यह भी है कि यूपी में दलितों उत्पीडन के मामलो में ना तो कमी आई ना ही उनकी जिन्दगी में कोई बदलाव आया । क्योंकि 2010 से 2015 के बीच का दलित उतपीडन के सबसे ज्यादा मामले यूपी में ही दर्ज हुये ।आर्थिक तौर पर सबसे पिछडे यूपी के ही दलित रहे । शिक्षा के क्षेत्र में यूपी के ही दलित बच्चो ने सबसे कम स्कूल देखे । तो क्या राजनीति इसी का नाम है । या वोट बैक में बदली जा चुके जातियो को लेकर सियासत इसी का नाम है । हो जो भी लेकिन सोशल इंजीनियरिंग तले यूपी को नापने की तैयारी हर किसी की ऐसी ही है । और अब बीजेपी भी कांग्रेस की तर्ज पर उसी रास्ते पर । मसलन पिछड़ी जाति के वोट बैंक में सेंध लगने के लिये ही केशव प्रसाद मोर्या यूपी बीजेपी का अध्यक्ष बनाया गया । ब्राह्मणों को साधने के लिये शिव प्रताप शुक्ला को राज्यसभा भेजा गया । उनके धुर विरोधी योगी आदित्यनाथ को मोदी कैबिनेट में लाने की तैयारी हो रही है । इसी बीचे 94 जिला अध्यक्ष और नगर अध्यक्षो में से 44 पर पिछड़ी और अति पिछड़ी जाति । तो 29 ब्राह्मण, 10 ठाकुर, 9 वैश्य और 4 दलित समाज से है । चूकि बीजेपी समझ चुकी है कि यूपी में यादव,जाटव और मुस्लिम मिलाकर 35 प्रतिशत हैं, जिनके वोट उन्हें मिलेंगे नहीं तो बीजेपी की नजर बाकि 65 प्रतिशत पर है। और बीजेपी के सोशल इंजीनियर्स को लगता हैं पिछड़ी और अगड़ी जातियों का समन्वय के आधार पर यूपी में बीजेपी की बहार आ सकती है । तो बीजेपी की नजर निषाद वोट बैंक से लेकर राजभर समाज में सेंध लगाने की है । झटका मायावती को देना है तो बीजेपी ने बौद्ध भिक्षुक की ब्रहम् चेतना यात्रा की शुरआत भी कर दी, जो अक्टूबर तक चलेगी । लेकिन यूपी में बीजेपी का चेहरा होगा कौन यह सवाल बीजेपी के माथे पर शिकन पैदा करता है क्योंकि सोशल इंजीनियरिंग वोट दिला सकते है लेकिन यूपी का चेहरा कैसे दुरस्त हो यह फार्मूला किसी के पास नहीं है । क्योंकि यूपी का सच खौफनाक है । 12 करोड़ लोग खेती पर टिके हुये । 6 करोड़ लोग गरीबी की रेखा से नीचे है । 3 करोड़ दलितों को दो जून की रोटी मुहैया नही है । 20 लाख से ज्यादा रजिस्टर्ड बेरोजगार हैं । लेकिन सबकुछ सियासी खेल की छांव में इसलिये छुप जाता है क्योकि देश को लगता यही है कि यूपी को जीत लिया तो देश को जीत लिया और दिल्ली का रास्ता यूपी से होकर ही निकलता है । इसलिये पहली बार जनता की जेब से कैसे सरकार अपना खजाना भर रही है यह भी हर कोई देख रहा है लेकिन आवाज कही नहीं निकलती । 1 जून से दो जून की रोटी को महंगा करने वाली कई सेवाओं पर आधा फीसदी कृषि कल्याण सेस लागू हो गया । इससे सर्विस टैक्स 14.5 फीसदी से बढ़कर 15 फीसदी हो गई । यानी सारी चीजें महंगी हो गई । लेकिन समझना यह भी होगा कि सरकार कृषि सेस के जरिए कृषि और किसानों की योजनाओं के लिए पांच हजार करोड़ रुपए जुटाना चाहती है । लेकिन-कृषि सेस से कमाई को कही ज्यादा होगी । ठीक वैसे ही जैसे स्वच्छ भारत सेस समेत तमाम तरह के सेस से सरकार को हर साल करीब 1 लाख 16 हजार करोड़ रुपए की कमाई हो रही है । सिर्फ पेट्रोल-डीजल पर सेस से बीते साल सरकार को 21,054 करोड़ रुपए मिले । और मोदी सरकार के राज में अप्रत्यक्ष कर के जरिए खजाना भरने का खेल इस तरह चल रहा है कि एक तरफ सर्विस टैक्स सालाना 25 फीसदी की दर से बढ़ रहा है । तो दूसरी तरफ सेस और सर्विस टैक्स के जरिए इनडायरेक्ट टैक्स का बोझ लोगों पर इस कदर बढ रहै है कि जनता ने पिछले बरस अप्रैल में 47417 करोड अप्रत्यक्ष टैक्स दिया तो इस बरस अप्रैल में 64 394 करोड । यानी देश की समूची राजनीति ही जब जनता की लूट में लगी हो तो फिर सत्ता किसी की हो फर्क किसे पडता है ।

Friday, May 20, 2016

जब बात हिन्दू-मुसलमान की नहीं इंसान की होगी तब कांग्रेस-बीजेपी भी नहीं होगी

निगाहों में सोनिया गांधी और निशाने पर राहुल गांधी। वार भी चौतरफा। कहीं अंड़गा लगाने वालों की हार का जिक्र तो कहीं कांग्रेस मुक्त भारत का फलसफा। कोई अखक्कडपन से नाराज। तो कोई बदलते दौर में कांग्रेस के ना बदलने से नाराज। किसी को लगता है सर्जरी होनी चाहिये। तो कोई फैसले के इंतजार में। लेकिन क्या इससे कांग्रेस के अच्छे दिन आ जायेंगे। यकीनन यह सवाल हर कांग्रेसी को परेशान कर रहा है होगा कि चूक हो कहां रही है या फिर कांग्रेस हाशिये पर जा क्यों रही है। तो सवाल तीन हैं। पहला,क्या बदलते सामाजिक-आर्थिक हालातों से कांग्रेस का कोई जुडाव है। दूसरा, क्या सड़क पर सरोकार के साथ संघर्ष के लिये कद्दावर नेता बचे हैं। तीसरा, क्या एक वक्त का सबसे महत्वपूर्ण कार्यकत्ता "वोट क्लेक्टर " को कोई महत्व देता है। यकीनन गांधी परिवार के सियासी संघर्ष में कोई बडा अंतर नहीं आया। लेकिन गांधी परिवार यह नहीं समझ पाया कि समाज के भीतर का संघर्ष और तनाव बदल चुका है । राजनीति को लेकर जनता का जुडाव और राजनीति के जरीये सत्ता की समझ भी आर्थिक सुधार के बाद यानी 1991 के बाद यानी बीते 25 बरस में खासी तेजी से बदली है। और इस दौर में कांग्रेस इतनी ही बदली है कि बुजुर्गों को सम्मान देने और युवाओं के पसीने को महत्व देने की कांग्रेसी परंपरा ही कांग्रेस से समाप्त हो चुकी है।

दिल्ली के सियासी गलियारे के प्रभावशाली कांग्रेस के बड़े नेता मान लिये गये। और 10 जनपथ के भीतर झांक कर बाहर निकलनेवाला सबसे ताकतवर कांग्रेसी माना जाने लगा । तो कांग्रेस का मतलब अगर गांधी परिवार हो गया तो समझना यह भी होगा कि कांग्रेस का संगठन । कांग्रेस का कैडर । कांग्रेस का नेतृत्व ।चाहे पंचायत स्तर पर हो या जिले स्तर पर या फिर राज्य स्तर पर । कमान किसी के भी हाथ में हो । कमान थामने वाला अपनी जगह राहुल गांधी या सोनिया गांधी ही है । यानी काग्रसी ना तो गांधी परिवार के औरे से बाहर आ पाया है और ना ही आजादी के संघर्ष के उस नोस्टालजिया से बाहर निकल पाया जहा बात हिन्दू, मुस्लिम, दलित, आदिवासी से बाहर निकल कर इंसान का सवाल सबसे बड़ा हो जाये। और इंसान को एक समान मानकर राजनीतिक सवाल देश में उठने चाहिये इससे भी सियासी दलो ने परहेज किया तो वजह राष्ट्रीय राजनीति का दिल्ली में सिमटना हो गया। क्योंकि दिल्ली की केन्द्रीय सत्ता काम कैसे करती है और सत्ता के लिये कैसी
सियासत होती है यह इससे भी समझा जा सकता है कि दिल्ली में असम की जीत को लेकर बीजेपी के जश्न का आखिरी सच यह भी है कि अगर एजीपी और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट ना होता तो वहा बीजेपी सरकार भी ना होगी। और कांग्रेस अगर एआईयूडीएफ के साथ गठबंधन कर लेती तो इतना निराश भी ना होती ।

लेकिन सवाल असम की जीत हार का नहीं बल्कि सवाल बीजेपी और कांग्रेस को अब जीत के लिये क्षेत्रीय सहयोगियों की जरुरत लगातार बढ रही है यह मौजूदा दौर का सच है । क्योंकि सही मायने में बीजेपी ने अपने बूते हरियाणा, गुजरात, राजस्थान , मध्यप्रदेश, छत्तिसगढ और गोवा यानी छह राज्यों में सरकार बनायी है। तो कांग्रेस ने अपने बूते कर्नाटक, हिमाचल, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम में सरकार बनायी है । और देश के बाकि राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियों के सहयोग के साथ ही कांग्रेस बीजेपी है। या फिर क्षेत्रीय पार्टियों ने अपने बूते सरकार बनायी है। यानी बीजेपी हो या कांग्रेस। सच तो यही है कि दोनों ही राष्ट्रीय पार्टियां धीरे धीरे क्षेत्रिय पार्टियों के आसरे होती चली जा रही हैं। और क्षेत्रीय पार्टियो की ताकत यही है वह अपने इलाके को वोटरों को दिल्ली से उनका हक दिलाने से लेकर खुद अपने सरोकार भी वोटरों से जोड़ते हैं। यानी बीजेपी चाहे खुद को पैन इंडिया पार्टी के तौर पर देखे। या कांग्रेस चाहे खुद को आजादी से पहले की पार्टी मान कर खुद ही भारत से जोड़ ले। लेकिन सच यही है कि बीजेपी और कांग्रेस दोनो आपसी टकराव में सिमट ही रही है और चुनावी जीत के लिये क्षेत्रिये पार्टियों के कंधे पर सवार होकर एक दूसरे के साथ शह-मात का खेल खेल रही है । और इस खेल में वोटर कैसे ठगा जाता है और सत्ता कैसे बनती है यह मुसलिम बहुल टाप चार राज्यों से समझा जा सकता है क्योंकि जम्मू कश्मीर में 68.3 फिसदी मुसलमान है । और पीडीपी के साथ बीजेपी सरकार चला रही है । असम में 34.2 फीसदी मुसलमान है और एजीपी व बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट के साथ मिलकर सरकार बनाने जा रहे है । फिर बंगाल और केरल में करीब 27 फिसदी मुसलमान हैं और पहली बार दोनों ही राज्यो में बीजेपी उम्मीदवारो ने चुनावी जीत की दस्तक दी है । तो सवाल कई है । मसलन , क्या बीजेपी को मुस्लिम विरोधी बताना बीजेपी को ही लाभ पहुंचाना है । क्या खुद बीजेपी चाहती है कि वह हिन्दुत्व के रंग में दिखे जिससे मुस्लिम विरोध की सोच बरकरार रहे । या फिर वोटर धर्म-जाति में बंटता है लेकिन सत्ता का चरित्र हिन्दु-मुस्लिम , दलित आदिवासी नहीं देखता । क्योकि सारा खेल वोट बैंक बनाकर सत्ता तक पहुंचने का है और सत्ता का गठबंधन वोट बैंक की थ्योरी को खारिज कर कामन मिनिमम प्रोग्राम पर चलने लगता है । तो हो सकता है कि वाक़ई आज लगभग 68 साल बाद कांग्रेस देश में अपने राजनीतिक सफ़र के आख़िर पड़ाव पर हो। और बीजेपी बुलंदी पर। लेकिन सवाल ये भी है कि बीजेपी की ये बुलंदी कहीं उसके भी ख़ात्मे की शुरूआत तो नहीं। क्योंकि 1984 में में बीजेपी अगर लोकसभा में 2 सीट पर सिमट के रह गई तो कांग्रेस के पास 403 सीटें थीं। आज तस्वीर उलट चुकी है। लेकिन जिस तरह से कांग्रेस को जनता ने आज नकार दिया है।

क्या कल को इन्हीं हालात पर बीजेपी नहीं पहुंच सकती है। इसकी बहुत बड़ी वजह ये है बीजेपी और कांग्रेस की राजनीति का लगभग एक सा होना। क्योंकि दोनों ही पार्टियों ने अपने राजनीतिक सफ़र में फूट डालो शासन करो नीति को ही अपनाया। 1989 में विश्व हिन्दू परिषद के रामजन्मभूमि शिलान्यास आंदोलन के दौरान भागलपुर में दंगे हुए। तो बिहार में शासन कांग्रेस का था। 1992 में बीजेपी की अगुवाई में बाबरी मस्जिद ढहाई गई थी तो केन्द्र में कांग्रेस थी। 1992 में महाराष्ट्र में शिवसेना के भड़काने पर दंगे हुए तो केन्द्र और महाराष्ट्र में शासन कांग्रेस का था। श्रीकृष्णा रिपोर्ट ने बाल ठाकरे और शिवसेना को दंगों के लिये दोषी माना लेकिन कांग्रेस सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की। ऐसे ही ना जाने कितने उदाहरण है जिसमें साफ़ है कि दंगे अगर बीजेपी या उसके सहयोगियों के भड़काने पर हुए तो कांग्रेस ने समाज को बांटने वाले इन दर्दनाक हादसों पर रोक लगाने के लिये सही कदम नहीं उठाए। समाज बंटता गया और कांग्रेसी सत्ता चलती रही। जब तक चल सकी। आज बीजेपी भी उसी राह पर है। अफ़वाहों के दम साप्रदायिक हिंसा । बीफ़ के नाम पर हत्याएं। केन्द्र की ख़ामोशी। नारों की कसौटी पर देश द्रोह और देश भक्ति का तय होना। इतिहास को दोबारा लिखे जाने की कोशिश। और इसके बर अक्स हर साल 1 करोड़ दस लाख नौजवानों का रोज़गार के बाज़ार में उतरना और उसमें से ज़्यादातर का बेरोज़गार रह जाना। शिक्षा के क्षेत्र में जीडीपी के 6 फ़ीसदी के आबंटन की मांग। तो स्वास्थ्य के क्षेत्र में तय किये गए जीडीपी के 1.2 फ़ीसदी हिस्से को लगभग दोगुना करने की दरकार। और देश की बड़ी आबादी पर सूखे का क़हर....। जाहिर है विकास के अकाल से लेकर पानी के सूखे से जूझते लोगों को नारा नहीं नीर चाहिये। कांग्रेस समाज को बांटने का काम छुप कर करती थी। बीजेपी की सियासत खुली है तो वह कमोबेश खुल कर रही है। और आखरी सवाल बीजेपी को लेकर इसलिये क्योकि कश्मीरी पंडितो के सवाल धाटी में अब भी अनसुलझे है । जबकि सत्ता में पीडीपी के साथ बीजेपी ही है । तो बात कांग्रेस से शुरु हुई और खत्म बीजेपी पर हुई तो समझना होगा कि आने वाले वक्त में कांग्रेस या बीजेपी की गूंज से ज्यादा क्षेत्रिय दलो का उभार इसलिये होगा क्योकि धीर धीरे बात हिन्दु - मुसलमान की नहीं इंसान की होगी



















Friday, May 13, 2016

दो धमाके , दो धर्म , दो जांच

तो जश्न मनाइये आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता । लेकिन धर्म के आसरे राजनीति का आंतक जरुर होता है । क्योंकि 8 सितंबर 2006 को मालेगांव के हमीदिया मस्जिद के पास हुये धमाके में जिन नौ लोग नूरुलहुदा समसूद दोहा, शब्बीर अहमद मशीउल्लाब, रईस अहमद रज्जब अली, सलमान फ़ारसी, फारोग़ इक़बाल मक़दूमी, शेख़ मोहम्मद अली आलम शेख़, आसिफ़ ख़ान बशीर ख़ान और मोहम्मद ज़ाहिद अब्दुल मजीद को पकडा गया संयोग से सभी मुस्लिम थे । और 29 सितंबर 2008 को मालेगाव के अंजुमन और भीकू चौक पर जो धमाके हुये उसमें जिन 16 लोगो साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, शिव नारायण कलसंगरा, श्याम भंवरलाल साहू, प्रवीण तक्कल्की, लोकेश शर्मा, धन सिंह चौधरी , रमेश शिवाजी उपाध्याय, समीर शरद कुलकर्णी, अजय राहिरकर, जगदीश शिन्तामन म्हात्रे, कर्नल प्रसाद श्रीकांत पुरोहित, सुधाकर धर द्विवेदी, रामचंद्र कलसंग्रा और संदीप डांगे को पकड़ा गया संयोग से सभी हिन्दू थे । 2006 के धमाके में जब जब मुस्लिमो को पकड़ा गया तो बीजेपी के कुछ नेताओं ने , " आतंकवाद और मुस्लिम समुदाय को एक तराजू में रखने में कोई कोताही नहीं बरती । " और जब 2008 के मालेगाव घमाके में साध्वी प्रज्ञा और कर्नल श्रीकांत पुरोहित समेत दर्जन लोगो को पकडा गया तो काग्रेस ने " हिन्दू टैररइज्म का सवाल उठाकर संघ परिवार और बीजेपी को लपेटे में ले लिया । "

और संयोग देखिये क्या हिन्दू क्या मुस्लिम । क्या 2006 के आतंकी धमाके में मारे गये 37 नागरिक और क्या 2008 का घमाके में मारे गये 6 नागरिक । और दोनो धमाकों में घायल दो सौ से ज्यादा लोग । दोनों की ही जांच शुरु में महाराष्ट्र आतंकवाद विरोधी दस्ते ने की । और बाद में मामला एनआईए के पास चला गया । लेकिन आतंकी हमला 2006 का हो या फिर 2008 का एनाईए को जांच में कुछ मिला नहीं । तो 2006 के सभी 9 अभियुक्त जेल से छूट गये । और 2008 के 16 अभियुक्तो में से 6 अभियुक्त [ साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, शिव नारायण कलसंगरा, श्याम भंवरलाल साहू, प्रवीण तक्कल्की, लोकेश शर्मा, धन सिंह चौधरी ] को एनाईए ने अपनी फाईनल चार्जशीट में मासूम करार दिया और सभी पर से मकोका हटाने की सिफारिश कर दी । यानी चंद दिनों में मुबंई की विशेष अदालत साध्वी प्रज्ञा समेत छह अभियुक्तों को रिहा कर देंगे ।

तो यह सवाल किसी के भी जहन में आ सकता है कि मालेगांव में दो अलग अलग आंतकी धमाको में जो 43 नागरिक मारे गये । दो सौ से ज्यादा घायल हो गये । करोडों की संपत्ति का नुकसान हुआ सो अलग । घायलों में कुछ की हालात आज भी अंपग वाली है । तो फिर इनका गुनाहगार है कौन । क्योंकि चार्जशीट चाहे 2006 के घमाके को लेकर हो या 2008 के घमाके को लेकर हो दोनो ही चार्जशीट में महाराष्ट्र एटीएस के दर्ज किये गये इकबालिया बयानों तक को खारिज कर दिया गया । यानी बीते 8 से 10 बरस तक जो भी जांच हुई । जांच को लेकर पुलिस-सुरक्षा से जुड़े चार विभागों के दो सौ से ज्यादा अधिकारियों ने जो भी जांच की वह सब खारिज हो गई । हालांकि कुछ राहत की बात यह हो सकती है कि 2008 के धमाकों को लेकर एजेंसी ने अदालत से बाकि 10 अभियुक्तों के खिलाफ तफ्तीश जारी रखने की अनुमती मांगी है । और इन दस अभियुक्तों में कर्नल श्रीकांत पुरोहित और संदीप डांगे भी हैं । लेकिन मकोका इनपर से भी हटाने की सिफारिश की गई है । यानी एटीएस चीफ करकरे की जांच में जो दोषी थे । वह एनआईए की जांच में दोषी नहीं है।