Sunday, June 17, 2018

कहे कौन सेवक राजा है !

सत्ता जिसकी चौखट पर या जो सत्ता की चौखट पर वही रईस बाकी सब रंक
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कॉरपोरेट-उद्योगपतियों को धन देंगे। उससे कारपोरेट-कारोबारी धंधा करेंगे। मुनाफा अपने पास रखेंगे। बाकि टैक्स या अन्य माध्यमों से रुपया सरकार के खजाने तक पहुंचेगा। कॉरपोरेट-उद्योगपतियों की तादाद ज्यादा होगी तो उनमें सरकार के करीब आकर धन लेने से लेकर लाइसेंस लेने तक में होड होगी । इस होड का लाभ सत्ता में बैठे लोग उठायेंगे। कोई मंत्री। कोई नौकरशाह।

सत्ताधारी पार्टी के नेता। या फिर डील कभी बड़ी हो गई तो वह पीएम के स्तर तक पहुंचेगी। यह क्रोनी कैपटलिज्म होगी। और बाकि हालात में बाजारन्मुख इक्नामी। यानी बाजार में जिस चीज की मांग उसी अनुरुप उनसे जुड़ी कंपनियों को लाभ। और कमोवेश हर क्षेत्र में इसी तरह जिस कारपोरेट को काम करना है करें। सरकार बैंकों के माध्यम से कारपोरेट-उघोगपतियों को कर्ज देगी। कर्ज लेकर वह ज्यादा इंटरेस्ट रेट पर लौटायेंगे। तो बैंक भी फलेंगे फूलेंगे। जनता को बैंकों में रकम जमा करने पर ज्यादा इंटरेस्ट भी मिलेगा। यानी देश इसी तरह चलता रहेगा। कोई बड़ी फिलोस्फी या थ्योरी इसमें है नहीं कि इक्नामी अगर बाजार के लिये खोल दी जाये तो कैसे कारपोरेट-उगोगपति ही देश की जरुरतो को पूरा करेंगे। और कैसे इन्फ्रास्ट्र्कचर से लेकर
शिक्षा-हेल्थ-घर-रोजगार तक में यानी हर क्षेत्र में भागीदारी होगी। लेकिन कोई कड़ी टूट जाये या फिर कई कड़ियां टूट जाये तो क्या होगा। सरकार अपने पसंदीदा कारपोरेट को लाभ पहुंचाने लगें क्योंकि वही कारपोरेट चुनाव में होने वाले खर्च में साथ देता है। कॉरपोरेट बैंक से कर्ज लेकर धन वापस ना करें। और सरकार बैंकों को कह दें कि वह अपने दस्तावेजों से कर्जधारक कारपोरेट-उघोगपतियो का नाम हटा दें। उसकी एवज में कुछ रकम सरकार बैंकों को देगी। बैंक रुपये का अवमूल्यन करने लगे। यानी जनता का जमा सौ रुपया बरस
भर बाद पच्चतर रुपये की कीमत का रह जाये। यानी एक तो जमा रकम पर इंटरेस्ट रेट कम हो जाये, दूसरी तरफ महंगाई या वस्तुओं की सीमित आपूर्ति बाजार में वस्तुओ के दाम बढ़ा दें।

और इस पूरी प्रक्रिया में सरकार-सत्ता खुद को हाशिये पर पड़े तबके से जोडने के लिये टैक्स का पैसा कल्याणकारी सोच के नाम पर बांटने लगे। या फिर दो जून की रोटी के लिये तरसते 70 फिसदी आवादी के घर में चुल्हा-रोटी-बैंकअकाउंट की व्यवस्था कराने में ये कहकर लग जाये कि देश तो यही है । तो जिस कारपोरेट को 100 खरब का लाभ हुआ उसने सरकार के कहने पर एक खरब हाशिये पर तबके के बीच बांट दिया। या फिर जिस 30 फीसदी के लिये सिस्टम बनाकर बाजार अर्थव्यवस्था सोची गई । उसी 30 फिसदी के उपर कमाई के सारे रास्ते रास्ते तले बोझ इतना डाल दिया जाये कि वह चिल्लाये तो 70 फिसदी गरीबो का रोना रोया जाये। या फिर कारपोरेट जो पंसदीदा है उसके लिये देश के तमाम खनिज संसाधनों की लूट के रास्ते खोल दिये जाये। और लूट के अक्स में विकास का राग ये कहकर गाया जाये कि जो उपभोक्ता दुनिया के किसी भी हिस्से से भारत को देखे उसे यहा की वही जमीन दिखयी दे जिसपर चल कर वह भी लूट में शामिल हो सकता हो । यानी भारत को
ङथियार चाहिये या बिजली । कोयला चाहिये या चीनी । बुलेट ट्रेन टाहिये या छोटे हवाई जहाज । सबकुछ बाहर से आयेगा । पूंजी उन्ही की । काम उन्ही का । उत्पाद उन्ही का । सरकार सत्ता सिर्फ उसके एवज में टैक्स लेगी । और अगर जितना लगाकर बहुर्ष्ट्रीय कंपनिया काफी ज्यादा कमा रही है तो फिर किसी आने दिया जाये या किसे रोका जाये । ये अधिकार सत्ता-सरकार के हाथ में होगा । तो फिर क्रोनी कैपटलिज्म का दूसरा चेहरा कमीशन के तौर पर भी उभरेगा और लाभ देकर लाभ उठाने के रास्तों की दिशा में भी जायेगा । यानी चाहे अनचाहे सत्ता सरकार है कौन । और जनता के नुमाइन्दों को कैसे देखा जाये। ये सवाल आपके जहन में आना चाहिये। क्योंकि अगर सरकार खुद को इस भूमिका में ले आये कि जनता ने उसे पांच बरस के लिये चुना है और पांच बरस तक उसकी हर थ्योरी पर जनता की मुहर है । तो फिर सत्ता खुद को लाभ के पद से जोडेगी ही। खुद को मुनाफा कमाने वाली मशीन मानेगी ही। यानी सरकार जिससे जुडे उसे मुनाफा। जो सरकार-सत्ता से जुडे उसे मुनाफा। और चूंकि इक्नामी को देखने समझने का नजरिया ही जब राष्ट्रीय स्तर पर मुनाफा बनाने का हो चला हो तो फिर सत्ता खुद को कैसे मानेगी। या फिर सत्ताधारी राजनीतिक पार्टी भी खुद को कैसे देखेगी। उसे लगेगा कि अगर वह माधुरी दीक्षित के घर गये तो माधुरी दीक्षित को लाभ। माधुरी दीक्षित को लगेगा सत्ता खुदचल कर उनके घर पहुंची है तो उन्हे भी लाभ।

क्योंकि सत्ता ही साथ है तो फिर कोई भी सिस्टम या सिस्टम के तहत कोई भी संस्थान कैसे खिलाफ में पहल कर सकता है। और सत्ता चूंकि हर संस्थान का प्रतीक है। यानी जिसकी सत्ता उसके सारे सस्धान वाली फिलास्फी जब उपर से नीचे तक चल पड़ी हो तो फिर न्यायपालिका हो या विधायिका। यानी मामला अदालत का हो या किसी संवैधानिक संस्था का। निर्णय तो सत्तानुकूल रहेंगे ही। और सत्ता को सत्ता में बने रहने के लिये हर क्षेत्र का साथ चाहिये। जो सरकारी है। संवैधानिक है। वह तो साथ खड़े होंगे ही। जो प्राइवेट है जब उन्हें भी जानकारी मिल जायेगी कि सत्ता के साथ रहे तो मुनाफा। और सत्ता साथ रही तो डबल मुनाफा। तो होगा क्या। हर स्कूल। हर अस्पताल। हर बिल्डर। हर दुकानवाला। हर तरह के धंधेवाला तो चाहेगा कि वह सत्ताधारियों तक कैसे पहुंचे या कैसे सत्ताधारी उसके दरवाजे तक पहुंच जाये। जो पैसे वाला होगा वह खर्च करेगा। जो समाज को प्रभाव करने वाला होगा वह अपने प्रभाव का प्रयोग सत्ता के लिये शुरु कर देगा। और जब सब तरफ सत्ताधारियों तक पहुंचने या नतमस्तक होने की होड़ हो जायेगी तो फिर सत्ताधारी खुद को पारस से कम तो समझेंगे नहीं। उन्हें लगेगा ही कि जिसे छू दिया वह सोना हो जायेगा। तो फिर क्या होगा । कमोवेश हर संस्धान और हर संवैाधानिक पद भी सत्ता की चौखट पर पड़ा होगा। सत्ता तय करेगी आज इसके दरवाजे पर चला जाये । या इस दरवाजे वाले को अपनी चौखट पर खडा किया जाये तो वह करेगा। और जनता-सत्ता के बीच संवाद बनाने वाली मीडिया भी फिर सत्ता की होगी। और सत्ता उन्ही के दरवाजे पर जायेगी या उन्हीं को अपने दरवाजे पर बुलायेगी जो सत्ता के सामने नतमस्तक को कर सवाल पूछे। फिर एक दिन सत्ता सोचेगी जब सबकुछ वहीं है। या वह नहीं तो फिर दूसरे को मुनाफा भी नहीं तो फिर सत्ता तय करेगी अब इस कौन कौन से दरवाजे को बंद कर दिये जाये। और चूंकि चुनावी लोकतंत्र ही जब सेवको के नाम पर मुनाफा देने-बनाने वाले धंधे में खुद को तब्दील कर लेता है तो फिर इस लोकतंत्र का सिरमौर यानी राजा क्या सोचेगा। वह चाहेगा हर जांच उसके अनुकूल हो । न्याय उसके अनुकुल हो। सिस्टम उसके लिये हो। और चौथा स्तम्भ भी उसका हो। और फिर राजा को जनता ने चुनाव है तो राजा की मनमर्जी जनता की मर्जी तो बतायी ही जा सकती है। तो फिर निर्णय होंगे। जो वस्तु दुनिया के बाजार में सस्ती है उसे देश में महंगा कर दिया जाये। दुनियाभर की सैर करते हुये देश को बताया जाये कि दुनिया कैसी है । शिक्षा-दीक्षा की परिभाषा पूजा-पाठ में बदल दी जाये। खान-पान के नियम कायदे धर्मयोग से जोड़ दिया जाये। वैचारिक सोच को राजधर्म के साये तले समेट दिया जाये। जो विरोध करें या फिर सवाल करें उसके दरवाजे पर कोई सतातधारी ना जाये। क्योंकि सिस्टम तो मिनाफे वाला है। मुनाफे का मतलब सत्ता के सामने नजमस्तक होकर कमाना है। तो जब पारस ना जायेगा तो लोहा लोहा रह जायेगा उसकी कोई कीमत ही नहीं होगी। फिर पांच बरस बीतने पर कोई दूसरा पारस होगा। उसके दूसरे चहते होंगे। पर सिस्टम तो यही होगा। सत्ता जिसकी चौखट पर या जो सत्ता की चौखट पर वही रईस बाकि सब रंक।

Friday, June 1, 2018

चेहरा , संगठन , रईसी सब कुछ है पर वोट नहीं ?

कैराना ,भंडारा –गोदिया , फूलपुर , गोरखपुर , अलवर ,अजमेर ,गुरुदासपुर , रतलाम । तो तो 8 सीट बीजेपी 2014 के बाद हार चुकी है । और शिमोगा-बेल्लरी लोकसभा सीट खाली पड़ी हैं । जहां जल्द ही उपचुनाव होंगे । तो 2014 में 282 से घटकर 272 पर आ गये । यानी लोकसभा के जादुई आंकड़े पर बीजेपी की सुई फिलहाल आ खड़ी हुई है । यानी 2019 की तरफ बढते कदम बताने लगे हैं कि बीजेपी अपने बूते सत्ता में आ नहीं पायेगी। तो उसे सहयोगी चाहिये। पर साथ खड़ी शिवसेना के सुर बताते है कि सबसे पुराना गठबंधन ही साथ रहना नहीं चाहता । तो क्या बीजेपी के लिये क्या ये खतरे की घंटी है कि 2019 का रास्ता बिना सहयोगियों के बनेगा नहीं । और सहयोगी ही गुस्से में है । मसलन नीतीश कुमार विशेष राज्य के मुद्दे पर नाराज हैं। रामविलास पासवान दलित मुद्दे पर गुस्से में हैं। दलित मुद्दे से लेकर दिल्ली के दलित बीजेपी संसाद उदितराज से लेकर यूपी के पांच बीजेपी सांसद तक नाराज है । तो क्या 2019 का रास्ता बीजेपी ने खुद अपने लिये ही मुश्किल भरा बना लिया है क्योंकि हिन्दुत्व का राग लिये वह मुस्लिम को अपना वोटर तक नहीं मानती । तो दलित के सामने बीजेपी अगड़ी और हिन्दू पार्टी हैं । और इन हालातों के बीच नया संदेश कैराना से लेकर गोदिया-भंडारा से निकला है। कैराना में गन्ना किसानों का सवाल भी था और एनकाउंटर में मारे जा रहे जाटों को लेकर भी है । 

सुंदर सिंह भाटी मारे गये । जो जाटो को लगा उनकी दबंगई पर भी हमला है । फिर ठाकुरवाद यूपी में इस तरह छाया है कि ऊंची जातियों में भी टकराव है । और महाराष्ट्र में शिवसेना भी टकरायी और गोदिया भंडारा में पटेल-पटोले एक साथ आ गये । तो क्या सिर्फ मोदी मोदी के नारे से काम चल जायेगा । या ये कहे कि यही वह शोर है जो नेता को लोकप्रिय चमकदार बनाता है । और पीछे दुनिया की सबसे बडी पार्टी बीजेपी है । संघ के स्वयंसेवकों की फौज है । तो फिर 2019 मुश्किल क्यों होगा । तो जिस बीजेपी के पास देश का सबसे चमकदार- सबसे लोकप्रिय चेहरा है । जिसका कोई विकल्प नहीं । और जो बीजेपी 10 करोड़ पार सदस्यों के साथ देश में सबसे बडा संगठन खड़ा कर चुकी है । कायदे से उसे तो हार मिलनी ही नहीं चाहिये। फिर एक के बाद प चुनाव में हार क्यों मिल रही है । तो क्या 2014 का चमकदार धारणा 2018 में ही बदलने लगी है। और 2019 की तरफ बढते कदम अभी से ये बताने लगे हैं कि संगठन या चेहरे के आसरे चुनाव लड़े जरुर जाते है । पर जीतने के लिये जो परसेप्शन होना चाहिये। वह परसेप्शन अगर जनता के बीच खत्म हो जाये तो फिर इंदिरा गांधी हो या राजीव गांधी या पिर अटल बिहारी वाजपेयी चमक काम देती नहीं है । कार्यकर्ता संगठन मायने रखता नहीं । क्योंकि इंदिरा गांधी तो नायिका थी . राजीव गांधी के पास तो दो तिहाई बहुमत था । और अटलबिहारी वाजपेयी की लोकप्रियता के वक्त शाइनिंग इंडिया था । सब तो धरा का धरा रह गया । पर परसेप्शन बदल क्यो रहा है । जब मोदी फर्राटे से भाषण देते है । अमित शाह पन्ना प्रमुख तक को सांगठनिक ढांचे को खडा कर चुके है । और बीजेपी के पास फंड की भी कोई कमी नहीं है । और बाकि सभी को भ्रष्ट कहकर मोदी सत्ता ने इसी परसेप्शन को बनाया कि वह ईमानदार हैं। तो मोदी को ईमानदार कहने वालों के जहन में ये सवाल तो है कि आखिर 2014 में सबसे करप्ट राबर्ट वाड्रा को 2018 तक भी कोई छू क्यों नहीं पाया । फिर बीजेपी का परप्शशन सिर्फ पुराने अक्स भर का नहीं है । चुनाव जीतने के लिये दागी विपक्ष के नेताओं को साथ लेना भी गजब की सोशल इंजीनियरिंग रही । मुकुल राय हो या नारायण राणे या फिर स्वामी प्रसाद मोर्य । बीजेपी ने इन्हे साथ लेने में कोई हिचक नहीं दिखायी । और परसेप्शन बदलता है तो गोदिया के बीजेपी सांसद नाना पटोले ने किसान के नाम पर बीजेपी छोडी । कुमारस्वामी ने भविष्य पर दांव लगाया और काग्रेस के साथ खडे हो गये । और संयोग देखिये जिस पालघर से बीजेपी जीती वहा पर भी बीजेपी का उम्मीदवार पूर्व काग्रेसी सरकार में मंत्री रहे हुये है । दरअसल सच तो यही है कि बीजेपी के वोट कम हो रहे है । और बारीक लकीर को पकड़ियेगा तो जिस चकाचौंध की लकीर को 2014 में बीजेपी ने जीत के लिये और जीत के बाद खिंचा उसका लाभ उसे मिला है । मसलन वोट कम हो रहे है पर नोट कम नहीं हो रहे । 

एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक 2017 में बीजेपी के पास फंडिग से 10 अरब 34 करोड 27 लाख रुपये आ गया । और देश की बाकि सभी पार्टियो के पास यानी काग्रेस समेत 38 राजनीतिक दलो के पास पंडिग हुई 8 अरब 45 करोड 93 लाख रुपये । यानी बीजेपी को लोकसभा में बहुमत मिला । राज्य दर राज्य बीजेपी को जीत मिलती चली गई तो देश के तमाम राजनीतिक दलो को मिलाकर हुई कमाई से भी दो अरब रुपये ज्यादा बीजेपी के फंड में आ गये । तो चुनावी जीत हार से इतर तीन सवालो का जवाब खोजिये । पहला , जो सत्ता में है उसे खूब पंड मिलता है । दूसरा , फंड देने वाले रुपये के बदले क्या चाहते होगें । तीसरा, इतना पैसा राजनीतिक दल करते क्या है । यानी हर चुनाव के बाद जब चुनाव आयोग ये बताता है कि उसने बांटे जा रहे सौ करोड जब्त कर लिये या कही हजार करोड जब्त हुये तो 2014 के बाद से देश में औसत नोटों की जब्ती हर चुनाव में 300 करोड तक आ बैठती है । यानी तीन अरब रुपये वोटरो को बांटने के लिये अलग अलग राजनीतिक निकले और जब्त हो गये । तो अगला सवाल है कि जो रुपया जब्त नहीं हुआ वह कितना होगा । और उससे आगे का सवाल जो सुप्रीम कोर्ट ने ही उठाया कि जो नोटो को बांटते हुये या ले जाते हुये पकडे गये लोगों के खिलाफ कार्रावाई क्यो नहीं होती । सजा क्यो नहीं मिलती । पर असल सवाल है कि 2014 के बाद से चुनाव का मतलब कैसे धनबल हो गया है यह चुनावी प्रचार के खर्च के आंकंड़ों से भी समझा जा सकता है और कारपोरेट समूह की राजनीति फंडिग और बैको से कारपोरेट समूह को कर्ज यानी एनपीए में तब्दिल होती रकम क्या ऐसा चक्रव्यूह है जिसमें भारतीय लेकतंत्र
फंस चुका है । क्योकि संयोग से जिन कॉरपोरेट हाऊस ने राजनीतिक दलों को चुनावी फंडिंग की या राजनीतिक दलो के खातों में दान दिया। उनमें से अधिकतर बैको से लोन लेकर ना लौटापाने के हालातों में आ चुके है। और बैंकों के घाटे को पूरा करने के लिये दो लाख करोड़ से ज्यादा सरकार दे चुकी है। तो क्या बैंकों का घाटा । 

एनपीए की रकम । बट्टा खाते में डालने का सच सबकुछ चुनावी लोकतंत्र से जा जुडा है जहां पार्टी के पास पैसा होना चाहिये । खूब रुपया होगा तो प्रचार में कोई कमी नहीं आयेगी । यानी चुनाव के वक्त सबसे मंहगा लोकतंत्र सबसे रईस हो जाता है । क्योंकि सबसे ज्यादा काला-सफेद धन चुनाव के मौके पर बाजार में आता है । और ध्यान दीजिये तो 2019 के चुनावी बरस में कदम रखने की शुरुआत हो चुकी है तो मोदी सरकार के चौथा बरस पूरा होते ही राज्य सरकारों ने अपना खजाना खोल दिया है। धुआंधार विज्ञापन हर राज्य सरकार केंद्र के पक्ष में यह कहते हुए दे रही है कि मोदी सरकार की योजनाओं ने गरीब की जिंदगी बदल दी। दूसरी तरफ कॉरपोरेट बीजेपी के साथ है ही। बीजेपी को 53 फीसदी चंदा सिर्फ दो दानदाताओं से से मिला। सत्या इलेक्ट्रोरल ट्रस्ट ने 251 करोड़ रुपए । -तो भद्रम जनहित शालिका ट्रस्ट ने 30 करोड़ रुपए चंदे में दिए । दरअसल सत्या इक्ट्रोरल ट्रस्ट में दो दर्ज से ज्यादा कॉरपोरेट है । भारती एयरटेल से लेकर डीएलएफ और इनओक्स या टोरेन्ट से लेकर जेके टायर या ओरियन्ट सिमेनट या गुजरात पेट्रोकैमिकल लिं. तक । और ऐसा नहीं है कि इस ट्रस्ट ने सिर्फ बीजेपी को फंड दिया । काग्रेस को भी 15 करोड़ 90 लाख रुपये दिये । यानी ये ना लगे कि कारपोरेट बीजेपी के सामने नतमस्तक है तो काग्रेस को भी चंद रुपये दे दिये गये । पर सवाल तो यही है कि राजनीतिक दलो के तमाम कारपोरेट राजनीतिक पंड देकर कौन सा मुनाफा बनाते कमाते है । और जो फंड नहीं देता क्या उसका नुकसान उसे भुगतना पडता है या फिर जिसकी सत्ता रेह उसके अनुकुल हर कोरपोरेट को चलना पडाता है । तो आखिरी सवाल क्या बीजेपी ने चाहे अनचाहे एक ऐसे हालात विपक्ष के लिये बना दिये है जहा वह बिना पंड के काम करना सीखे और कैराना में विपक्ष की एकजुटता ने देश की सबसे रईस पार्टी को मात दे दी । यहीं से आखिरी सवाल है कि क्या 2019 को लेकर 2014 का परसेप्शन इतना बदल रहा है कि अब कॉरपोरेट भी फंडिग शिफ्ट करेगा।

Thursday, May 31, 2018

जनता के रुपयों पर पर नेताओं की हर दिन होली रात दीवाली

देश के जितने भी सांसद विधायक मंत्री और जितने भी पूर्व सांसद विधायक मंत्री है उनपर हर दिन 3 करोड 33 लाख रुपये खर्च हो जाते हैं। इसमें पीएम और सीएम के खर्चे नहीं जोड़े गये हैं। और 30 लाख रुपये प्रतिदिन देश के राज्यपालो की सुविधा पर खर्च हो जाते हैं और इन दोनो के बीच फंसा हुआ है एक पैसा । जो बुधवार को लगातार 17 दिन पेट्रोल डीजल की कीमतों के बढ़ने के बाद सस्ता किया गया । कैसा होता है एक पैसा । लोग तो ये भी भूल चुके होगें । पर मुश्किल तो ये भी है लोग नेताओं की रईसी भी भूल चूके हैं । क्योंकि जिस पेट्रोल-डीजल के जरीये अरबो-खरबो रुपये मोदी सरकार से लेकर हर राज्य सरकार ने बनाये। कंपनियों ने बनाये । उसकी मार से आहत जनता के लिये प्रति लीटर एक पैसा कैसे कम किया जा सकता है । वाकई ये अजीबोगरीब विडंबना है कि जिस पेट्रोल की कीमतों के आसरे देश के 60 करोड़ लोगों की जिन्दगी सीधे प्रभावित होती हैं, उसकी किमत में एक पैसे की कमी की गई । और जिन्हे देश के लिये नीतिया बनानी होती है वह बरसो बरस से अरबो खरबो रुपये रईसी में उडाते है । मसलन आंकडों के लिहाज से समझे देश में कुल 4582 विधायकों पर साल में औसतन 7 अरब 50 करोड़ रुपए खर्च होते हैं । इसी तरह कुल 790 सांसदों पर सालाना 2 अरब 55 करोड़ 96 लाख रुपए खर्च होते हैं । और अब तो राज्यपाल भी राजनीतिक पार्टी से निकल कर ही बनते है तो देश के तमाम राज्यपाल-उपराज्यपालों पर एक अरब 8 करोड रुपये सालाना खर्च होते हैं । तो खर्चो के इस समंदर में पीएम और तमाम राज्यो की सीएम का खर्चा जोड़ा नहीं गया है । फिर भी इन हालातो के बीच अगर हम आपसे ये कहे कि नेताओं को और सुविधा चाहिये । कैसी सुविधा इससे जानने से पहले जरा खर्च को समझे जो एक दिन में उड़ा दी जाती है या कमा ली जाती है ।


एक दिन में पेट्रोलियम पदार्थों पर एक्साइज ड्यूटी भर से केंद्र सरकार के खजाने में 665 करोड़ रुपए आ जाते हैं। राज्य सरकारों को वैट से 456 करोड़ की कमाई होती है। पेट्रोलियम कंपनियों को एक दिन में पेट्रोल-डीजल बेचने से 120 करोड़ रुपए का शुद्ध मुनाफा होता है। प्रधानमंत्री के एक दिन के विदेश दौरे पर 21 लाख रुपए खर्च होते हैं तो केंद्र सरकार का विज्ञापनों पर एक दिन का खर्च करीब 4 करोड़ रुपए है। कितने उदाहरण दें । सिर्फ एक दिन में मुख्यमंत्रियों के दफ्तर में चाय-पानी पर 25 लाख रुपए खर्च होते हैं। प्रदानमंत्री के रा,ट्र के नाम एक संदेश में 8 करोड 30 लाख रुपये खर्च हो जाते है । और जिस अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों का हवाला देकर सरकार महंगे पेट्रोल का बचाव करती रही-उसका नया सच यह है कि बीते पांच दिन में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में पांच डॉलर प्रति बैरल की कमी आ चुकी है । यानी जब कच्चा तेल महंगा था-तब पेट्रोल उसकी वजह से महंगा था, और अब सस्ता हो रहा है तो क्यों पेट्रोल-डीजल सस्ता नहीं हो रहा-इसका जवाब किसी के पास नहीं है। अलबत्ता-खजाने पर चोट न पड़ जाए-इसकी चिंता राज्य सरकारों से लेकर पेट्रोलियम कंपनियों और केंद्र सरकार तक सबको है। ऐसे में सवाल दो हैं । पहला, क्या पेट्रोल-डीजल के दामों में और कमी की अपेक्षा बेमानी है? दूसरा, अगर पेट्रोल-डीजल के दाम अब और नहीं बढ़ेंगे तो क्या अब जीएसटी में लाने से लेकर वैट या एक्साइज ड्यूटी कम करने जैसे कदम अब जनता भूल जाए? या सरकारों ने इस मंत्र को बखूबी समझ लिया है कि पेट्रोल-डीजल पर जनता भले अभी रोए लेकिन चुनावी बिसात पर वोट जाति-धर्म के आसरे ही पढ़ेंगे और चुनावी खेल जीतने के लिए साम-दाम-दंड-भेद की नीति ही अपनानी होगी। ऐसे में जनता को रोने दिया जाए या कभी कभार एक-दो पैसे का लॉलीपॉप पकड़ाकर पेट्रोल-डीजल की कीमतों को अपने आप स्थिर होने दिया जाए। 


तो ऐसे में जनता के लालीपाप के एवज में नेताओ को तमाम सुविधायें किस तरह चाहिये उसका एक नजारा ये भी है कि एक वक्त दिल्ली को राष्ट्र्रकवि दिनकर ने तो रेशमी नगर कहा था । और जेठ का अनूठा सच यही है कि जितनी बड़ी दिल्ली है उसे अगर खाली कराकर देश के नेताओ के हवाले कर कर दिया जाये । तो हो सकता है दिल्ली छोटी पड जाये । रईसी और ठाटबाट होते क्या है चलिये ये भी समझ लिजिये । लोकसभा राज्यसभा के 790 सांसद । देश भर के 4582 विधायक । देश के 35 राज्यपाल-उपराज्यपाल । देश भर के सीएम और एक अदद पीएम । देश भर हारे हुये या कहे पूर्व सीएम । नेताओ के नाम चलने वाले ट्रस्ट । यह फेरहिस्त लंबी भी हो सकती है । पर जरा समझ ये लिजिये कि इन्हे तमाम सुविधाओ के साथ जो रहने के लिये बंगला मिला हुआ है उस बंगले की जमीन को अगर जोड दें तो दिल्ली की साढ तीन लाख एकड जमीन भी छोटी पड सकती है । क्योकि यूपी में मायावती, अखिलेश यादव, मुलायम सिंह यादव, राजनाथ सिंह, कल्याण सिंह, नारायण दत्त तिवारी । बिहार में राबड़ी देवी, जीतनराम मांझी, जगन्नाथ मिश्र । झारखंड में बाबू लाल मरांडी, अर्जुन मुंडा, शिबु सोरेन, मधु कोड़ा, हेमंत सोरेन । राजस्थान में अशोक गहलोत, स्व जगन्नाथ पहाड़िया । मद्यप्रदेश में उमा भारती, दिग्विजय सिंह, कैलाश जोशी, बाबूलाल गौर । जम्मू कश्मीर में उमर अब्दुल्ला, गुलाम नबी आजाद । असम में तरुण गोगोई, प्रफुल्ल कुमार । मणीपुर में ओकराम इबोबी सिंह ये तो चंद नाम हैं उन पूर्व मुख्यमंत्रियों के जो सत्ता जाने के बाद भी सरकारी भवनों पर काबिज रहे और अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी इनमें से कई उन सरकारी भवनों में जमे रहने का रास्ता ढूंढ रहे हैं। कब्जे के इस खेल में न दलों का भेद है न दिलों का । और बात सिर्फ पूर्व मुख्यमंत्री के नाम पर बंटें बंगलों की ही नहीं। तमाम नेताओं ने ट्रस्ट बनाकर भी सरकारी भवनों पर कब्जों का जाल फैलाया हुआ है । अकेले उत्तर प्रदेश में ऐसे 300 ट्रस्ट और संस्थाएं हैं जिनके नाम पर सरकारी भवन बांटे गए हैं । तो ये सवाल आपके जहन में होगा कि नेता तो करोडपति होते है फिर भी ये सरकारी सुविधा क्यो चाहते है । और मुलायम सिंह व अखिलेश यादव जिनकी संपत्ति 24 करोड 80 लाख है वह भी सुप्रीम कोर्ट ये कहते हुये पहुंच गये कि फिलाहाल बंगला रहने दिया जाये क्योकि उनके पास दूसरी कोई छत नहीं है । वैसे रईस समाजवादियो के पास छत नहीं । ऐसा भी नहीं है । मुलायम सिंह के नाम लखनऊ के गोमती नगर में करीब 71 लाख का बंगला है । इटावा में 2.45 करोड़ की कोठी है । तो अखिलेश के पास लखनऊ में ही करीब डेढ़ करोड़ का प्लॉट है ।

पर सवाल सिर्फ बंगले का नहीं । सवाल तो ये है कि कमोवेश हर राज्य में नेताओ के पौ बारह रहते है । सत्ता किसी की रहे रईसी किसी की कम होती नहीं । और नेताओ ने मिलकर आपस में ही यह सहमति भी बना ली कि नेता जीते चाहे हारे उसे जनता का पैसा मिलते रहना चाहिये । जी , अगर आपने किसी सांसद या विधायक को हरा दिया । तो उसकी सुविधा में कमी जरुर आती है पर बंद नहीं होती । मसलन सासंद हार जाये तो भी हर सांसद को 20 हजार रुपए महीने के पेंशन मिलते है । दस एयर टिकट तो सेकेंड क्लास में एक साथी के साथ यात्रा फ्रि में । टेलिफोन बिल भी मिल जाता है । और हारे हुये विधायको के बारे राज्य सरकारे ज्यादा सोचती है तो और हर पूर्व विधायक को 25 हजार रुपए की पेंशन जिंदगी भर मिलती रहती है । सालाना एक लाख रुपये का यात्रा कूपन भी मिलता है । सफर हवाई हो या रेल या फिर तेल भराकर टैक्सी सफर ।

महीने का 8 हजार तीन सौ रुपये । और अगर कोई पूर्व सांसद पहले विधायक रहा तो उसे दोनों की पेंशन यानी हर महीने 45 हजार रुपए मिलते रहेंगे । यानी जनता जिसे कुर्सी से हटा देती है । जिसे हरा देती है । उसके उपर देश में हर बरस करीब दो सौ करोड रुपये से ज्यादा जनता का पैसा लुटाया जाता है । और जो सत्ता में रहते है उनकी तो पूछिये मत । दिन मे होली रात दीवाली हमेशा रहती है ।

Monday, May 28, 2018

चौथे बरस के जश्न तले चुनावी बरस में बढ़ते कदम

परसेप्शन बदल रहा है तो फिर चेहरा-संगठन कहां मायने रखेगा

चौथे बरस का जश्न आंकड़ों में गुजरा। तो क्या परसेप्शन खत्म और सफल बताने के लिये आंकड़ों के जरिए दावे। कमोवेश हर मंत्री ने दावे पेश किये कि देश में कितना काम हुआ। देश भर के अखबारो में विज्ञापन के जरिए कमोवेश हर क्षेत्र में चार बरस के दौर में सफलता के आंकड़े। तो क्या मोदी सरकार चौथे बरस में डिफेन्सिव है। यानी जो आक्रामकता 2013 में 15 अगस्त के दिन बकायदा तब के पीएम मनमोहन सिंह के लालकिले के प्रचीर से देश के नाम संबोधन के खत्म होते ही गुजरात में लालकिले का मॉडल बना कर सीएम मोदी ने भाषण देने के साथ शुरु किया, वह पहली बार 2018 में थमा है। तो क्या अब मोदी सरकार के सामने वाकई अपने कामकाज की सफलता बताने का वक्त आ गया है। कह सकते हैं, चुनावी वर्ष शुरु हो गया तो फिर पांच बरस के कामकाज का कच्छा-चिट्टा तो रखना ही होगा । पर चौथे बरस ने राजनीति की उस परिभाषा को बदलना शुरु किया है जिस पारंपरिक राजनीति को बीते चार बरस में बहलते हुये देश ने देखा । दरअसल मोदी के दौर ने उस दीवार को ढहा दिया जो जनता और राजनीतिक वर्ग को अलग करती थी। सत्ता किसी की भी रहे पर राजनीतिक तबके में एक इमानदारी रहती थी कि दूसरे पर आंच ना आये। और इस दीवार के गिरने ने उस जनता को ताकत जरुर दी जो अभी तक हर नेता से डरती थी। और मोदी सत्ता ने इसी परसेप्शन को बनाया और भोगा जहा वह ईमानदार की छवि अपने साथ समेटे रही। तो फिर गवर्नेंस का सवाल हो या किसी नीति या किसी पॉलिसी या किसी भी नारे का और उसकी एवज में जो भी कहा गया, उसे बहुसंख्य तबके ने सही माना। क्योंकि निशाने पर वह राजनीति थी। जिससे आम लोग अर्से से परेशान थे। लकीर किस महीनता से खिंची गई इसका एहसास इससे भी हो सकता है कि नोटबंदी ने राजनीतिक दलों की फंडिंग के साम्राज्य को ढहा दिया। सत्ता के इशारे पर संवैधानिक संस्थाओं ने विपक्ष की राजनीति को डरा दिया। बीते चार बरस में कॉरपोरेट समेत जितने रास्तों से राजनीतिक दलों की फंडिंग हुई उसका 89 फिसदी बीजेपी के खाते में गया। जितनी भी राजनीतिक फाइलें सीबीआई, ईडी, इनकम टैक्स या किसी भी संवैधानिक संस्धा के तहत खुली संयोग से उस कतार में बीजेपी के किसी नेता का नाम जिला स्तर तक भी ना आया । देश में सडक पर न्याय करने के एलान के साथ कानून को ताक पर रखकर भीडतंत्र जहा जहा सामने आया संयोग से उनमें भी किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई कानून करते हुये नजर नही आया । ये भी पहली बार नजर आया कि कोई मुख्यमंत्री अपनी पार्टी के नेता - मंत्री के खिलाफ दर्ज कानूनी मामलो को ही खत्म नहीं करा रहा है बल्कि अपने खिलाफ दर्ज मामलो में भी खुद को ही माफी दे रहा है और सबकुछ ऐलानिया हो रहा है । तो चौथे बरस ने दो तरह के परिवर्तन दिखाने शुरु किये । पहला , जनता का पर्सेप्शन मोदी सरकार की ताकत को आंकडों में देखने लगा । यानी सत्ता जादुई आंकडे 272 पर ही टिका है। और कर्नाटक के जादुई आंकडे के करीब पहुंचकर भी जब कुमारस्वामी सरीखे आठ मामलो के आरोपी को भी लगने लगा कि बीजेपी के साथ खडा होना भविष्य की राजनीति को खत्म करना होगा । तो फिर झटके में नया पर्सेपशन भी बनने लगा कि अब बीजेपी के साथ खडी पार्टियों में अंसतोष उभरेगा। ये सिर्फ चन्द्रबाबू नायडू या चन्द्शेखर राव के अलग होने या शिवसेना के विद्रोही मूड भर से नहीं समझा जा सकता । ना ही नीतीश कुमार का चौथे बरस नोटबंदी को लेकर सवाल खड़ा करने से उभरता है। बल्कि विपक्ष के जुडते तार तले संघर्ष के उस पैमाने से समझा जा सकता है जो पहली बार बिना पॉलिटिकेल फंड राजनीतिक संघर्ष कर रही है । तो दूसरा परिवर्तन टूटते पर्शप्सन के बीच आंकडो का सहारा लेकर अपनी सफलता दिखाने का है । यानी बीजेपी के पास मोदी सरीखा चेहरा है जिसकी कोई काट विपक्ष के किसी नेता में नहीं है । फिर भी सफलता के लिये आंकडे बताये जा रहे है । बीजेपी के पास सबसे बडा संगठन है दस करोड सदस्य पार । और बूथ से लेकर पन्ना प्रमुख तक के हालात । तो भी मंत्री दर मंत्री और बीजेपी अध्यक्ष उज्जवला योजना से लेकर मुद्दा योजना के आंकडों में अपनी सफलता के चार बरस गिना रहे है तो संकेत साफ है । परसेप्शन बदल रहा है । और यही से बीजेपी के लिये खतरे की घंटी है । क्योकि मोदी सत्ता ने विपक्ष के उस राजनीतिक वर्ग के खिलाफ तो मुहिम चलायी जो फंडिग के आसरे राजनीति नये सिरे से खडा कर सकता है । पर मोदी सत्ता ने अपने ही उस परसेप्शन को बदल दिया जहा बिना पूंजी या बिना फंडिग उसकी राजनीति पाक साफ दिखायी दे । और पूंजी पर टिकी सियासत जब कर्नाटक में हार गई या हाफंती दिखी तो नया सवाल ये भी पैदा हुआ कि क्या वाकई संघर्ष करने के माद्दे का आक्सीजन विपक्ष की राजनीति को मिल गया । या फिर बीजेपी के भीतर भी चुनावी बरस में सवाल उठेगें । क्योकि संगठन हो या फंडिग या फिर चेहरा वह मायने तभी रखता है जन परसेप्शन अनुकुल हो । क्योकि 2012-13 के दौर को भी याद कर लें तो मनमोहन सरकार के खिलाफ बनते परसेप्शन ने नरेन्द्र मोदी को जन्म दिया । फिर 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी को लेकर परसेप्शन खत्म हुआ तो बिना चेहरे ही हालात पलट गये । यानी चाहे अनचाहे चौथे बरस ने यह संदेश भी दे दिया कि जिस सोशल इंजीनियरिंग के आसरे एनडीए के गठबंधन को विस्तार मिला अब चुनावी बरस में वही सोशल इंजीनियरिंग यूपीए में शिफ्ट हो रही है। और हिन्दुत्व के एजेंडे पर बीजेपी लौटेगी तो फिर परसेप्शन हिन्दुत्व का बनेगा ना कि संगठन या चेहरे का । तो क्या आडवाणी का चेहरा और वाजपेयी के पीएम बनने के दौर को नये तरीके से संघ ने मोदी को लेकर जो प्रयोग किया उसकी उम्र पूरी हो गई है या फिर बीजेपी फिर आडवाणी युग यानी मंडल-कंमडल के दौर को नये तरीके से जीने को तैयार हो रही है । तो इंतजार कीजिये क्योंकि चौथे बरस के संकेत साफ है 2019 में या तो काग्रेस एकदम बदले हुये रुप में नजर आयेगी जहा उसका संघर्ष उसे मथ रहा है । या फिर बीजेपी सियासत के ककहरे को नये तरीके से ढाल देगी।

नीति आयोग को क्यों लगा कि 5 पिछड़े राज्यों ने देश के विकास का बेड़ा गर्क कर दिया ?

बिहार, यूपी, एमपी, राजस्थान, छत्तीसगढ़। तो नीति आयोग की नजर में देश के पांच राज्यों के पिछड़ेपन ने देश के विकास का बेडागर्क कर रखा है। पर इन पांच राज्यों का मतलब है 47,78,44,887 नागरिक यानी एक तिहाई हिन्दुस्तान। दिल्ली की सत्ता तक पहुंचने का रास्ता यानी लोकसभा की 185 सीट। तो बेड़ा गर्क किसने किया। राजनीति ने या यहां के लोगों ने। और ये राज्य तो से है जो खनिज संपदा के लिहाज से सबसे रईस है पर औद्योगिक विकास के लिहाज से सबसे पिछड़े। 

देश के टाप 10 औगोगिक घराने जो खनन और स्टील डस्ट्री से जुडे हुये हैं, उन्हें भी सबसे ज्यादा लाभ इन्ही 5 राज्यों के उद्योगों से होता है। पर इन 5 राज्यों की त्रासदी यही है कि सबसे ज्यादा खनिज संपदा की लूट यानी 36 फिसदी यही पर होती है। सबसे सस्ते मजदूर यानी औसत 65 रुपये प्रतिदिन यही मिलते हैं। सबसे ज्यादा मनरेगा मजदूर यानी करीब 42 फीसदी इन्हीं पांच राज्यों में सिमटे हुये हैं। तो फिर दोष किसे दिया जाये। यूं इन पांच राज्यों का सच सिर्फ यही नहीं रुकता बल्कि एक तिहाई हिन्दुस्तान समेटे इन 5 राज्यो में महज 9 फिसदी उघोग हैं। देश के साठ फिसदी बेरोजगार इन्ही पांच राज्यों से आते हैं। तो फिर इन राज्यों को ह्यूमन इंडक्स में सबसे पीछे रखने के लिये जिम्मेदार है कौन। 

खासकर तब जब इन राज्यों से चुन कर दिल्ली पहुंचे सांसदों की कमाई बाकि किसी भी राज्य के सांसदों पर भारी पड़ जाती हो। एडीआर की रिपोर्ट कहती है, इन पांच राज्यों के 85 फीसदी सांसद करोड़पति हैं। पांच राज्यों के 72 फीसदी विधायक करोड़पति हैं। यानी जो सत्ता में हैं, जिन्हें राज्य के विकास के लिये काम करना है, उनके बैंक बैलेंस में तो लगातार बढ़ोतरी होती है पर राज्य के नागरिकों का हाल है, क्या ये इससे भी समझ सकते है कि पांचों राज्यों की प्रति व्यक्ति औसत आय 150 रुपये से भी कम है। यानी विकास की जो सोच तमाम राज्यो की राजधानी से लेकर दिल्ली तक रची बुनी जाती है और वित्त आयोग से नीति आयोग उसके लिये लकीर खींचता है। संयोग से हर नीति और हर लकीर इन पांच राज्यों में छोटी पड़ जाती है। सबसे कम स्मार्ट सिटी इन्हीं पांच राज्यों में है। सबसे ज्यादा गांव इन्हीं पांच राज्यों में हैं। सबसे कम प्रति व्यक्ति आय इन्ही पांच राज्यों में है। अगर इन पांच राज्यों को कोई मात दे सकता है तो वह झारखंड है। अच्छा है जो झारखंड का नाम नीति आयोग के अमिताभ कांत ने नहीं लिया। अन्यथा देश की सियासत कैसे इन राज्यों की लूट के सहारे रईस होती है और ग्रामीण भारत की लूट पर कैसे शहरी विकास की अवधारणा बनायी जा रही है वह कहीं ज्यादा साफ हो जाता । क्योंकि देश के जिन छह राज्यों को लेकर मोदी सरकार के पास कौन सी नीति है इसे अगर नीति आयोग भी नही जानता है तो फिर बिहार, यूपी, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ और झारखंड के इस सच को भी समझे की देश से सबसे पिछडे 115 जिले में से 63 जिले इन्ही छह राज्यों के है । और इन पिछड़े जिलों को नाम दिया गया है एस्परेशनल डिसट्रिक्ट। यानी उम्मीद वाले जिले। पर देश की त्रासदी यही नहीं रुकती बल्कि 1960 में नेहरु ने देश के जिन 100 जिलों को सबसे पिछड़ा माना था और उसे विकसित करने के लिये काम शुरु किया संयोग से 2018 आते आते वही सौ जिले डेढ़ सौ जिलो में बदल गये और उन्हीं डेढ़ सौ जिलों में से मोदी सरकार के 115 एस्पेशनल जिले हैं। तो आजादी के बाद से हालात बदले कहां हैं और बदलेगा कौन। ये सवाल इसलिये जिन 115 जिलो को उम्मीद का जिला बताया गया है । वही के हालात को लेकर 1960 से 1983 तक नौ आयोग-कमेटी ने अपनी रिपोर्ट सौपी । हर रिपोर्ट में खेती पीने का पानी, हेल्थ सर्विस और शिक्षा से लेकर ह्यूमन इंडक्स को राष्ट्रीय औसत तक लाने के प्रयास का ब्लू प्रिंट तैयार किया गया। और इन सबके लिये मशक्कत उघोग क्षेत्र, निर्माण क्षेत्र, खेती में आय बढाने से लेकर खनन के क्षेत्र में होनी चाहिये इसे सभी मानते रहे हैं। पर इस हकीकत से हर किसी ने आंखे मूदी कि ग्रमीण क्षेत्रो के भरोसे शहरी क्षेत्र रईसी करते है। यानी ग्रामीण भारत की लूट पर शहरी विकास का मॉडल जा टिका है। जो बाजारवाद को बढ़ावा दे रहा है और लगातार शहरी व ग्रामीण जीवन में अंतर बढ़ता ही जा रहा है। बकायदा नेशनल अकाउंट स्टेटिक्स की रिपोर्ट के मुताबिक देश की इक्नामी में ग्रामीण भारत का योगदान 48 फिसदी है। पर शहरी और ग्रामीण भारत में प्रति व्यक्ति आय के अंतर को समझें तो शहर में 281 रुपये प्रति व्यक्ति आय प्रतिदिन की है तो गांव में 113 रुपये। 

तो सवाल तीन हैं। पहला, सिर्फ किसानों की दुगनी आय के नारे से ग्रामीणों की गरीबी दूर नहीं होगी । दूसरा, ग्रामीण भारत को ध्यान में रखकर नीतियां नहीं बनायी गई तो देश और गरीब होगा । तीसरा , विशेष राज्य का दर्जा या किसान-मजदूर-आदिवासी के लिये राहत पैकेज के एलान से कुछ नहीं होगा । यानी इक्नामी के जिस रास्ते को वित्त आयोग के बाद अब नीति आयोग ने पकड़ा है, उसमें पिछड़े जिले एस्पेशननल जिले तो कहे जा सकते है पर नाम बदल बदल कर चलने से पिछडे राज्य अगड़े हो नहीं जायेंगे और जब आधे से ज्यादा हिन्दुस्तान इसी अवस्था में है तो फिर चकाचौंध के बाजार या कन्जूमर के जरीये देश का ह्यूमन इंडेक्स बढ़ भी नहीं जायेगा । जिसकी चिंता नीति आयोग के चैयरमैन अमिताभ कांत ने ये कहकर जता दी कि दुनिया के 188 देशों की कतार में भारत का नंबर 131 है ।

Sunday, April 22, 2018

ना सिल्वर स्क्रीन पर नायक ना राजनीति में स्टेट्समैन

जब आधी दुनिया सो रही थी, तब नेहरु आजाद भारत के सपनो को हकीकत की जमी दे रहे थे । आजाद भारत के पहले नायक नेहरु थे । पर दूसरी तरफ महात्मा गांधी आजादी के जश्न से दूर कोलकत्ता के बेलियाघाट के अंधेरे कमरे में बैठे थे । पर नेहरु की सत्ता के चमक भी महात्मा गांधी के सामने फीकी थी । इसीलिये महात्मा गांधी महानायक थे। और आजाद भारत में नायकत्व का ये कल्ट सिनेमाई पर्दे पर मिर्जा गालिब से शुरु तो हुआ । पर गांधी ना रहे तो फिर सिनेमाई पर्दे पर ही गालिब की भी मौत हो गई। और सिल्वर स्क्रीन  कैसे नेहरु दौर में समाता चला गया इसका एहसास सबसे पहले राजकपूर ने ही कराया । और अपने नायकत्व को आवारा के जरीये गढा । “आवारा” कुलीनता के फार्मूले में कैद उस घारणा को तोडती है कि अच्छा आदमी बनाया नहीं जा सकता। वह पैदा होता है । और इसे गीत में राजकपूर पिरोते भी है । “बादल की तरह आवारा थे हम / हंसते भी रहे रोते भी रहे ...” और नेहरु के नायकत्व से टकराता राजकपूर का नायकत्व सिल्वर स्क्रीन पर नेहरु के सोशलिज्म को  चोचलिज्म कहने भी भी कतराता और सामाजवादी राष्ट्रवाद को नये तरीके सेगढता भी है। “ मेरा जूता है जापानी, पतलून इंग्लिशस्तानी, सर पर लाल टोपी रुसी फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी “ । तो सियासत में नेहरु और सिल्वर स्क्रीन पर राजकपूर के नायकत्व को कोई चुनौती नहीं थी । पर इस दौर में नायकत्व के सामानांतर लकीर खींचने के लिये खांटी समाजवादी राम मनमोहर लोहिया राजनीति के मैदान में थे । जो आजादी के 10 बरस बाद ही  सत्ता की रईसी और जनता की दरिद्रगी पर संसद में बहस करने के लिये तीन आना बनाम 16 आना की चुनौती नेहरु को ही दे रहे थे । तो सिल्वर स्क्रीन पर राजकपूर के नायकत्व को चुनौती देने के लिये दिलीप कुमार थे । और इस चेहरे का दूसरा रुप नेहरु की ही थ्योरी को सिल्वर स्क्रीन पर उतारने के लिये फिल्म नया दौर आई । मानव श्रम को चुनौती देती टेकनालाजी । पर ये दौर तो ऐसा था कि देश समाज और सिल्वर स्क्रीन भी नये नये नायको को खोज रहा था । 62 के युद्द ने नेहरु के औरे को खत्म कर दिया तो उससे पहले ही आजाद भारत में आधी रात को देखे गये नेहरु के सपनो के हिन्दुस्तान को गुरुदत्त ने सिल्वर स्क्रिन पर निराशा से देखा । और ये कहने से नहीं चूके 'ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है ..... ।

पर निराशा के इस दौर से लाल बहादुर शास्त्री ने “जय जवान जय किसान “ जरीये उभारा । इस नारे ने शास्त्री के ननायकत्व को राजनीति में कुछ इस तरह गढा कि समूचा देश ही राष्ट्रवाद की उस परिभाषा में समा गया जहा इंडिया फर्स्ट था । और सिल्वर स्क्रीन पर मनोज कुमार ने नायकत्व के इस धागे को बाखूबी पकडा । नायकत्व की परिभाषा बदल रही थी । पर हमारे पास नायक थे । शास्त्री के बाद इंदिरा गांधी की छवि तो दुनिया के नायको के कद से भी बड़ी हो गई । 1971 के युद्द ने इंदिरा को जिस रुप में गढा वह दुर्गा का भी था । और अमेरिका जैसे ताकतवर देश के सातवे बेडे को चुनौती देते हुये ताकतवर राष्ट्रध्यक्ष का भी था । पर 71 के बाद इंदिरा का नायकत्व फेल होता दिखा क्योकि करप्शन और सत्ता की चापलूसी के लिये बना दिये गये वैधानिक संस्थानो के विरोध में एक नये नायक जेपी का जन्म हुआ । जेपी सत्ता से टकराते थे । और इमरजेन्सी में भी 72 बरस के बूढे को लेकर धर्मवीर भारती ने जब “ मुनादी “ कविता लिखी तो ईमानदार संघर्ष की इस तस्वीर को सिल्वर स्क्रीन पर सलीम-जावेद की जोडी ने अमिताभ बच्चन को गढ़ा । सिल्वर स्क्रीन पर अमिताभ एक ऐसा नायक बना जो अपने बूते संघर्ष करता । न्याय दिलाने के लिये किसी हद तक जाता । और देखने वालो की शिराओ में दौ़डने लगता । और राजनीतिक हालात से पैदा होती सामाजिक – आर्थिक त्रासदियों को भोगती जनता को लगता वह खुद ही इंसाफ कर सकती है । क्योकि भ्रम तो कालेज छोड़ जेपी के पीछे निकले युवाओं का भी टूटा । और झटके में नायकत्व को जीने वाले देवआंनद से लेकर राजेश खन्ना युवाओ के जहन से गायब
हो गये ।

पर इसके बाद कि सामाजिक-राजनीतिक निराशा ने नायको की लोकप्रियता खत्म की । असर ये हुआ कि एक तरफ भारतीय राजनीति में गठबंधन की सरकारो को सत्ता दिलायी  तो सिल्वर स्क्रीन पर भी मल्टी स्टार यानी जोडी नायकों का खेल हो गया । याद कीजिये शोले , दोस्ताना ,काला पत्थर । और शायद यही वह दौर था जब राजनीति में क्षत्रपों का उदय हुआ तो दूसरी तरफ नायकी मिजाज सिल्वर स्क्रीन पर भी बदलता नजर आया । तो एक तरफ सिल्वर स्क्रीन के नायक सलमान/आमिर/शाहरुख/अजय देवगन/अक्षय कुमार /रितिक है तो दूसरी तरफ राजनीतिक मैदान में लालू /मायावती/मुलायम / नीतिश / चन्द्रबाबू /ममता नायक के तौर पर उभरे । ये वो चेहरे है जो अपने अपने वक्त के नायक रहे हैं । फिल्मी नायको की इस कतार ने अगर तीन पीढी की नायिकाओं के साथ काम लिया है


तो राजनीति के मैदान में बीते तीन दशक से ये चेहरे अपने अपनी बिसात पर नायक रहे हैं । इन नायकों में आपसी प्रतिस्पर्धा भी खूब रही है । सलमान-आमिर और शाहरुख की प्रतिस्पर्धा कौन भूल सकता है । और राजनीति में मुलायम मायावती , लालू नीतिश की प्रतिस्पर्धा कौन भूला सकता है । फिर अजय देवगन और अक्षय कुमार का कैनवास उतना व्यापक नहीं है । एक्शन को केन्द्र में रखकर संवाद कौशल से ही इन दोनो ने जगह बनायी । ठीक इसी तरह ,ममता बनर्जी और चन्द्रबाबू नायडू का भी कैनवास व्यापक नहीं रहा । दोनों ने अपनी राजनीतिक जमीन केन्द्र से टकराते हुये  क्षत्रपों के तौर पर गढी । एक लिहाज से नायको की कतार यही आकर थम जाती है । क्योकि इन चेहरो के आसरे सिनेमाघर में हाउस फूल होता रहा । और राजनीति के नायक क्षत्रपो के सामने राष्ट्रीय राजनीतिक दल काग्रेस या बीजेपी भी टिक नहीं पाये । पर ये नायकों का आखिरी दौर था । क्योकि इसके बाद की कतार में आकार्षण है पर नायक नहीं । मसलन , सिल्वर स्क्रिन पर  रणवीर कपूर /रणबीर सिंह / वरुण धवन /टाइगर श्राफ है तो राजनीतिक मैदान में अखिलेश यादव/तेजस्वी यादव /केजरीवाल/उद्दव ठाकरे / उमर अब्दुल्ला है । पर नायक नहीं है । तो क्या मौजूदा दौर में नायक गायब है । आकर्षण है । पर इनमें नायकत्व नहीं है जिसके आसरे कोई फिल्म हाउस फुल देदें । या फिर जिस नेता के आसरे देश में विकल्प नजर आने लगे । क्योकि इन तमाम चेहरो को देखिये और इनकी फिल्मो को याद किजिये तो सभी अचानक तेजी से चमके फिर गिरावट आ गई । आज फिर सभी संघर्ष के रास्ते पर है । यानी संघर्ष के आसरे सिल्वर स्क्रिन पर रणवीर कपूर या रणवीर सिंह या वरुण धवन सफल दिखायी दे सकते है । लेकिन सितारा आकर्षण इनके साथ अभी भी जुडा नहीं है। और यही हालत नये नेताओं की है । ये भी सफल होते है जैसे केजरीवाल तेजी से निकले पर नायक के तौर पर नहीं बल्कि संघर्ष करते हुये ठीक वैसे ही  जैसे फिल्मों के लिये अच्छी कहानी , सधा हुआ निर्देशन चाहिये । वैसे ही इन नेताओं को भी राजनीति गढने के लिये मुद्दा चाहिये । उसे सफल बनाने के लिये प्रचार-प्रसार और कैडर की मेहनत चाहिये । और सफल होने के लिये अखिलेश सरीखे नेता को भी पुरानी पीढी की सफल मायावती के साथ जुड़ना पडता है । यानी मौजूदा वक्त में नायक की कमी कैसे राजनीति की कमान संभालने वालो से लेकर सिल्वर स्क्रीन तक पर है, ये भी साफ है । या फिर ये कहा जाये कि मौजूदा वक्त ने नायक की परिभाषा ही बदल दी है । क्योकि सिल्वर स्क्रीन पर बाहुबली और देश में पीएम मोदी ने नायकत्व को नई परिभाषा तो दी है । बाहुबली का डायलाग “मेरा वचन ही मेरा शासन है “ संभवत नौजूदा राजनीतिक सत्ता की कहानी भी कहता है । तो क्या ये नये दौर के नायकत्व की पहचान है । एक तरफ बाहुबली बने प्रभाश .है । तो दूसरी तरफ गुजरात माडल लिये पीएम मोदी । बाहुबली के सामने बालीवुड के सितारे भी नहीं टिके । और मोदी के सामने उनकी अपनी पार्टी बीजेपी का ही कद छोटा हो गया । तो क्या ये बदलाव का दौर है । दक्षिण से बाहुबली जैसी फिल्म बनाकर कोई निर्देशक देश दुनिया में तहलका मचा सकता है । और बालीवुड का एक निर्देशक उसका वितरक बनकर ही खुश हो जाता है कि उसके करोडो के वारे न्यारे हो गये । तो दूसरी तरफ राष्ट्रीय नेताओ की कतार से इतर ही नही बल्कि हिन्दी पट्टी से दूर गुजरात से एक शख्स निकल कर देश की समूची राजनीति को ना सिर्फ बदल देता है बल्कि लोकतंत्र को नई परिभाषा भी दे देता है । और विपक्ष की समूची राजनीति एकतत्र होकर उसे हराने में ही अपनी जीत मानती है । यानी नायकत्व समेटे हालात क्या सिल्वर स्किर से लेकर राजनीति तक में बदल चुके है । क्योकि एक वक्त वाजपेयी नायक थे पर राजधर्म का पाठ जिन्हे पढाया आज वही शख्स नायक है । और एक दौर में जो बालीवुड मुगले आजम बनाता था । आज वही बालीवुड दक्षिण की तरफ देखने को मजबूर है ।

Sunday, April 15, 2018

38 बरस की बीजेपी को कैसे याद करें ?

38 बरस की बीजेपी को याद कैसे करें। जनसंघ के 10 सदस्यों से बीजेपी के 11करोड़ सदस्यों की यात्रा । या फिर दो सांसद से 282 सांसदों का हो जाना । या फिर अटल बिहारी वाजपेयी से नरेन्द्र मोदी वाया लाल कृष्ण आडवाणी की यात्रा । या फिर हिन्दी बेल्ट से गुजरात मॉडल वाली बीजेपी । या फिर संघके राजनीतिक शुद्दिकरण की सोच से प्रचारकों को बीजेपी में भेजना और फिर 2014 में बीजेपी के लिये हिन्दु वोटर को वोट डालने के लिये घर से को बाहर निकालने की मशक्कत करना । पर बदलते राजनीति परिदृश्य ने पहली बार इसके संकेत दे दिये है कि  2018 में बीजेपी का आकलन ना तो 1980 की सोच तले हो सकता है और ना ही  38 बरस की बीजेपी को आने वाले वक्त का सच माना जा सकता है । बीजेपी को भी बदलना है और बीजेपी के लिये सत्ता का रास्ता बनाते राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ को भी बदलना होगा ।  ये सवाल इसलिये क्योंकि तीन दशक की बीजेपी की सियासत में जितना परिवर्तन नहीं आया उससे ज्यादा परिवर्तन बीत चार बरस में मोदी काल में आ गया । इमरजेन्सी के गैर कांग्रेसवाद की ठोस हकीकत को जमीन पर विपक्ष की जिस एकजुटता के साथ तैयार किया । उसी अंदाज में मोदी दौर को देखते हुये विपक्ष एकजुट हो रहा है । सवाल ये नहीं है कि बीजेपी अध्यक्ष को मोदी की बाढ़ तले कुत्ता-बिल्ली, सांप-छछूंदर का एक होना दिखायी दे रहा है । सवाल है कि इंदिरा की  तानाशाही तले भी जनसंघ और वामपंथी एक साथ आ खडे हुये थे ।

पर तब सत्ता का संघर्ष वौचारिक था । सरोकार की राजनीति का मंत्र कही ना कही हर जहन में था । तो जनता पार्टी बदलाव और आपातकाल से संघर्ष करती दिखायी दे रही थी। पर अब संघर्ष वैचारिक नहीं है । सरोकार पीछे छूट चूके हैं। नैतिक बल नेताओं और राजनीतिक दलो में भी खत्म हो चुका है । तो फिर राजनीति का अंदाज उस आवारा पूंजी के आसरे जा टिका है जो अहंकार में डूबी है। सत्ता की महत्ता उस ताकत को पाने का अंदेशा बन चुकी है जिसके सामने लोकतंत्र नतमस्तक हो जाये । यानी लोकतंत्रिक मूल्यों को खत्म कर संवैधानिक संस्धाओ को भी अपने अनुकूल हांकने की सोच है । यानी संघ परिवार भी जिन मूल्यों के  आसरे हिन्दुत्व का तमगा छाती पर लगाये रही वह बिना राजनीतिक सत्ता के  संभव नहीं है ये सीख बीजेपी के 38 वें बरस में संघ प्रचारकों ने ही दे दी। और हिन्दुत्व की सोच एक आदर्श जिन्दगी जिलाये रखने के लिये तो चल सकती है पर इससे सत्ता मिल नहीं सकती ये समझ भी सत्ता पाने के बाद संघ प्रचारक ने ही आरएसएस को दे दी । इन हालातों बने कैसे और अब आगे रास्ता जाता किस दिशा में है । इसे समझने से पहले बीजेपी और मौजूदा वक्त की इस हकीकत को ही समझ लें के भारतीय राजनीति में जो बदलाव इमरजेन्सी या  मंडल-कंमडल पैदा नहीं कर पाया उससे ज्यादा बड़ा बदलाव 2014 के आम चुनाव के तौर तरीकों से लेकर सत्ता चलाने के दौर ने कर दिये। सिर्फ सोशल मीडिया या कहे सूचना तकनीक के राजनीतिक इस्तेमाल से बदलती राजनीतिक परिभाषा भर का मसला नहीं है । मुद्दा है जो राजनीतिक सरोकार 1952 से देश ने देखे वह देश के सामाजिक-आर्थिक हालातो तले राजनीति को ही इस तरह बदलते चले गये कि राजनीतिक सत्ता पाने का मतलब सत्ता बनाये रखने की सोच देश का संविधान हो गया । और सवा सौ करोड लोगों के बीच राजनीतिक सत्ता एक ऐसा टापू हो हो गया जिसपर आने के लिये हर कोई लालायित है ।  इसलिये अगर कोई बीजेपी को इस बदलते दौर में सिर्फ राजनीतिक जीत या संगठन के विस्तार या चुनावी जीत के लिये पन्ना प्रमुख तक की जिम्मदेरी के अक्स में देखता है तो वह उसकी भूल होगी । चाहे अनचाहे बीजेपी ही नहीं बल्कि संघ और कांग्रेस को भी अब बदलते हिन्दुस्तान के सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य तले राजनीतिक दलों के बदलते चेहरे और वोटरों की राजनीतिक भागेदारी के नये नये खुलते आयाम तले देखना ही होगा ।

दरअसल जनसंघ से बीजेपी के बनने के बीच वाजपेयी जिस ट्रांसफारमेशन के प्रतीक रहे उसी ट्रासंफारमेशन के प्रतीक मौजूदा वक्त में नरेन्द्र मोदी है । जनसंघ का खांटी हिन्दुत्व और बनिया-ब्राह्मण की सोच का होना । और 1980 में वाजपेयी ने बडे कैनवास में उतारने की सोच रखी । और अपने पहले भाषण में गांधीवाद-समाजवाद को समेटा । पर 84 में सिर्फ दो सीट पर जीत ने बीजेपी को सेक्यूलर इंडिया में खुले तौर पर हिन्दुत्व का नारा लगाते हुये देश के उन आधारो पर हमला करना सिखा दिया जो वोट का ध्रुवीकरण करते और चुनावी जीत मिलती । पर उसमें इतना पैनापन भी नहीं था कि बीजेपी पैन-इंडिया पार्टी बन जाती । दक्षिण और पूर्वी भारत में बीजेपी को तब भी मान्यता नहीं मिली । और याद कीजिये नार्थ ईस्ट में चार स्वयंसेवकों की हत्या के बाद भी तब के गृहमंत्री आडवाणी सिर्फ झंडेवालान में संघ हेडक्वाटर पहुंच कर श्रदांजलि देने के आलावा कुछ कर नहीं पाये ।  पर वाजपेयी जिस तरह गठबंधन के आसरे 2004 तक सत्ता खिंचते रहे उसने पहली बार ये सवाल तो खड़ा किया ही कि कांग्रेस और वाजपेयी की बीजेपी में अंतर क्या है । कांग्रेस की बनायी लकीर पर बीजेपी 2004 तक चलती नजर आई । चाहे वह आर्थिक नीति हो या विदेश नीति । कारपोरेट से किसान तक को लेकर सत्ता के रुख में ये अंतर करना वाकई मुश्किल है कि 1991 से लेकर 2014 तक बदला क्या । जबकि इस दौर में देश के तमाम राजनीतिक दलों ने सत्ता की मलाई का मजा लिया । फिर ऐसा 2013-14 से 2018 के बीच क्या हो गया जो लगने लगा है कि देश की राजनीति करवट ले रही है । और आने वाले वक्त में राजनीति बदलेगी । राजनीतिक दल बदलेंगे । और शायद नेताओं के पारंपरिक चेहरे भी बदलेंगे । क्योंकि इस दौर ने समाज-राजनीति के उस ढांचे को ढहा दिया, जहां कुछ छुपता था । या छुपा कर सियासत करते हुये इस एहसास को जिन्दा रखा जाता था कि दुनिया के सबसे बडे लोकतांत्रिक देश भारत में लोकतंत्र जिन्दा है । स की राजनीति ने इतनी पारदर्शिता ला दी कि विचारधारा चाहे वामपंथियो की या हिन्दुत्व की दोनो सत्ता के सामने रेगतें नजर आने लगे ।

देश में कारपोरेट की लूट हो या राजनीतिक सत्ता की कारपोरेट लूट दोनों ही एक थाली में लोटते नजर आये । किसान-मजदूर से हटकर देश का पढा लिखा युवा खुद को भाग्यशाली समझता रहा । पर पहली बार वोट बैंक के दायरे में सियासत ने दोनों को एक साथ ला खड़ा कर दिया । कल तक गरीबी हटाओ का नारा था। अब बेरोजगारी खत्म करने का नारा। पहली बार मुस्लिम देश में है भी नहीं ये सवाल गौण हो गया । यानी कल तक जिस तरह सावरकर का हिन्दुत्व और हेडगेवार का हिन्दुत्व टकराता रहा । और लगता यही रहा है मुस्लिमो को लेकर हिन्दुत्व की दो थ्योरी काम करती है । एक सावरकर के हिन्दुत्व तले मुस्लिमो की जगह नहीं है तो हेडगेवार के हिन्दुत्व में जाति धर्म हर किसी की जगह है । पर सत्ता के वोट बैंक की नई बिसात ने बीजेपी को मुस्लिम माइनस सोच कर सियासत करना सिखा दिया । पर देश के सामाजिक-आर्थिक हालात पारदर्शी हुये तो अगला सवाल दलितों का उठा और बीजेपी के सत्ताधारी गुट को लगा गलित माइनस हिन्दु वोट बैंक समेटा जा सकता है । पर देश की मुश्किल ये नहीं है कि राजनीति क्रूर हो रही है । मंदिरो में जा कर ढोगं कर रही है । और वोट बैंक की सियासत भी पारदर्शी हो तो सबकुछ दिखायी दे रहा है । कौन कहा खडा है । दरअसल मुश्किल तो ये है कि चुनावी लोकतंत्र एक ऐसे चक्रव्यूह में फंसता जा रहा है जहा राजनीति सत्ता पाने के लिये  ऐसा अराजक माहौल बना रही है, जिसके दायरे में संविधान-कानून का राज की सोच ही खत्म हो जाये । कांग्रेस ने इन हालातों को 60 बरस तक बाखुबी जिया इससे इंकार किया नहीं जा सकता है पर इन 60 बरस के बाद बीजेपी की सत्ता काग्रेस से नहीं बल्कि देश से जो बदला अपनी सत्ता बरकरार रखने के लिये उठा रही है उसमें वह कांग्रेस से भी कई कदम आगे बढ़ चुकी है । और इन हालातों ने  भारतीय राजनीति में नहीं बल्कि जन-मन में चुनावी लोकतंत्र को कटघरे में खड़ा कर दिया है । और ये सवाल इसीलिये बड़ा होते जा रहा है कि वाकई मौजूदा बीजेपी सत्ता काी कोई विकल्प नहीं है । दरअसल हम विकल्प नहीं बदलाव खोज रहे है तो फिर हथेली खाली ही मिलेगी । यहां विकल्प या बदलाव का मसला राहुल गांधी या विपक्ष से नहीं जुड़ा है । बल्कि उन सवालो से जुड़ा है जो वर्तमान का सच है और आने वाले वक्त में सत्ता के हर मोदी को उस रास्ते पर चलना होगा अगर उसके जहन में विक्लप का विजन नहीं है तो । मसलन, नेहरु से लेकर मनमोहन तक का पूंजीवाद उघोगपतियो और कारपोरेट का हिमायती रहा । पर मौजूदा वक्त में कारपोरेट और उघोगपतियों में लकीर खिंच गई । चंद कारपोरेट सत्ता के हो गये । बाकि रुठ गये । किसान-मजदूरों का सवाल उठाते उठाते चुनावी लोकतंत्र ही इतना महंगा हो गया कि चुनाव जनता के पेट भरने का साधन बन गया और राजनीतिक दल सबसे बडे रोजगार के दफ्तर । 1998 से 2009 तक के चार आम-चुनाव में जितना पैसा फंड के तौर पर राजनीतिक दल को मिला । उससे दुगुना पैसा सिर्फ 2013-14 से
2015-16 में बीजेपी को मिल गया । सरसंघ चालक भागवत जेड सिक्यूरटी के दायरे में आ गये तो आम जन का उनसे मिलना मनुस्किल हो गया और बीजेपी हेक्वाटर दिल्ली में सात सितारा को ही मात देने लगा तो फिर जन से वह कट भी गया और जन से खुद को सात सितारा की पांचवी मंजिल ने काट भी लिया । पांचवी मंजिल पर ही बीजेपी अध्यक्ष का दफ्तर है । जहा पहुंच जाना ही बीजेपी के भीतर वीवीआईपी हो जाना है । यानी सवाल ये नहीं कि कांग्रेस के दौर के घोटालो ने बीजेपी को सत्ता दिला दी । और बीजेपी के दौर में घोटालो की कोई पोल खुली नहीं है । सवाल है कि घोटालो के दौर में बंदरबांट था । जनता भी करप्ट इक्नामी का हिस्सेदार बन चुकी थी । और इक्नामी के तौर तरीके सामाजिक तौर पर उस आक्रोष को उभरने नहीं दे रहे थे जो भ्रष्टाचार को बढावा दे रहे थे । पर नये हालात उस आक्रोष को उभार रहे है जिसे रास्ता दिखाने वाला कोई नेता नहीं है । भगवा गमछा गले में डाल कानून को ताक पर रखकर अगर गौ-रक्षा की जा सकती है तो फिर नीला झंडा उठाकर शहर दर शहर दलित हिंसा भी हो सकती है । फिर तो दलितो पर निशाना साध उनके घरो पर हमला करते हुये कही ऊंची जाति तो कही हिन्दुत्व का नारा भी लगाया जा सकता है । और इसके सामांनातार जनता का जमा पैसे की लूट कोई कारोबारी कर भी सकता है । और सरकार कारोबारियों को करोडों अरबों की रियायत दे भी सकती है । असल में सामाजिक संगठनों की जरुरत इन्ही से पैदा होने वाले हालातो को काबू में रखने के लिये होते है । पर जब हर संस्धान ने सत्ता के लिये काम करना शुरु कर दिया । या सत्ता ही देश और लोकतंत्र हो जाये तो फिर संविधान कैसे ताक पर है ये सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के चार जजो के खुलकर चीफ जस्टिस के खिलाफ आने भर से नहीं उभरता ।

बल्कि देश का चुनावी लोकतंत्र ही कैसे लोकतंत्र के लिये खतरा हो चला है इस दिशा में भी मौन चिंतन की इजाजत दे ही देता है । और जब लोकतंत्र के केन्द्र में राजनीत हो तो फिर आने वाले वक्त की उस आहट को भी सुनना होगा जो अंदेशा दे रही है कि देश बदल रहा है । यानी बीजेपी में नेताओ की जो कतार 2013 तक सर्वमान्य थी वह मोदी के आते ही 2014 में ना सिर्फ खारिज हो गई बल्कि किसी में इतना नैतिक साहस भी नहीं बचा कि वह पूर्व  की राजनीति को सही कह पाता । और जिस लकीर को मौजूदा वक्त में मोदी खींच रहे है वह आने वाले वक्त की राजनीति में कहा कैसे टिकेगी खतरा यह भी है । और उससे भी बडा संकेत तो यही है कि चुनावी लोकतंत्र ही स्टेट्समैन पैदा करेगा जो मौजूदा राजनीति के चेहरो में से नहीं होगा । यानी बीजेपी के 38 बरस या कांग्रेस के 133 बरस आने वाले वक्त में देश के 18 से 35 बरस की उम्र के 50 करोड युवाओं के लिये कोई मायने नहीं रखते है । क्योंकि चुनाव पर टिका देश का लोकतांत्रिक माडल ही डगमग है । इसीलिये तो लोकसभा-राज्यसभा में बहुमत के साथ यूपी में बीजेपी की सत्ता होने के बावजूद राम मंदिर बनेगा नहीं । और 1980 में वाजपेयी का नारा अंधेरा छटेगा, कमल खिलेगा अब मायने रखता नही है । क्योकि 70 बरस बाद राष्ट्रीय राजनीति दलो की सत्ता तले चुनावी राजनीति ही चुनावी लोकतत्र का विकल्प खोज रही है ।