Saturday, July 25, 2015

करोड़ों अकेले बेबस लोगों का देश

देश में अभी भी पचास करोड़ से ज्यादा वोटर किसी भी राजनीति दल के सदस्य नहीं हैं। और इतनी बडी तादाद में होने के बावजूद यह सभी वोटर अपनी अपनी जगह अकेले हैं। नहीं ऐसा भी नहीं है कि बाकि तीस करोड़ वोटर जो देश के किसी ना किसी राजनीतिक दल के सदस्य हैं, वे अकेले नहीं है। दरअसल अकेले हर
वोटर है। लेकिन एक एक वोट की ताकत मिलकर या कहे एकजुट होकर जब किसी राजनीतिक दल को सत्ता तक पहुंचा देती है तो वह राजनीतिक दल अकेले नहीं होता। उसके भीतर का संगठन एक होकर सत्ता चलाते हुये वोटरो को फिर अलग थलग कर देता है। यानी जनता की एकजुटता वोट के तौर पर नजर आये । और वोट की ताकत से जनता नहीं राजनीतिक दल मजबूत और एकजुट हो जाये । और इसे ही लोकतंत्र करार दिया जाये तो इससे बडा धोखा और क्या हो सकता है। क्योंकि राजनीतिक पार्टी को सत्ता या कहे ताकत जनता देती है। लेकिन ताकत का इस्तेमाल जनता को मजबूत या एकजूट करने की जगह राजनीतिक दल खुद को खुद को मजबूत करने के लिये करते हैं। एक वक्त काग्रेस ने यह काम वोटरों को बांट कर सियासी लाभ देने के नाम पर किया तो बीजेपी अपने सदस्य संख्या को ग्यारह करोड़ बताने से लेकर स्वयंसेवक होकर काम करने के नाम पर कर रही है ।

यानी सत्ता को लेकर जनता के सामने सबसे बडी पशोपेश यही है कि अगर वह सत्तादारी पार्टी के रंग में नहीं रंगती है तो फिर वह तादाद में कितनी भी ज्यादा हो लेकिन वह हमेशा अकेले ही रहेगी। और सत्ताधारी के लिये एक ऐसा सिस्टम बना हुआ है जो झटके में जनता का नाम लेकर सत्ता के लिये काम करता है। पुलिस जनता के लिये होकर भी सत्ताधारी के इशारे पर काम करेगी। तमाम संस्थान जनता के लिये बनाये गये लेकिन वह सत्ता के इशारे पर ही काम करेंगे। न्यायपालिका और संवैधानिक संस्थानो को सत्ता से अलग उनकी स्वायत्ता के आधार पर परिभाषित तो किया जायेगा। लेकिन संवैधानिक होकर इनके काम करने के तरीके भी बिना सत्ता के इशारे के चल नहीं सकते यह नियुक्ति से लेकर संस्थानो के आपसी तालमेल बनाकर काम करने के तरीकों को परखते ही सामने लगातार आ रहा है। यानी कोई सत्ता चाहकर भी जनता को उसके अपने दायरे में एक सोच से एकजुट कर नहीं सकती। क्योंकि सत्ता की एकजुटता जनता के बिखराव पर ही टिकी है। और जनता की एकजुटता सत्ता के विरोध पर टिकी है । तो तीन सवाल मौजूदा व्यवस्था को लेकर किसी भी आम जनता के जहन में उठ सकता है। पहला, जनता की सत्ता और राजनीतिक पार्टी की सत्ता में अंतर है। दूसरा, जो जनता की दुहाई देकर नीतिया लाते या लागू कराते है वह सत्ता की सोच होती है और उसका सभी वोटरों से तो नहीं ही बहुसंख्यक जनता के हित से भी कुछ भी लेना देना नहीं होता।

तीसरा, सत्ता मिलते ही राजनीतिक दल को एक ऐसी व्यवस्था मिल जाती है जिसे वह सत्ता को ताकत देने का खुला इस्तेमाल जनता के नाम पर कर सकता है। यानी जन और दल के बीच मौजूद सत्ता तक जन की पहुंच कभी हो नहीं सकती। लेकिन जन का नाम लेकर उसे भावानात्मक तौर पर सत्ता के विरोध में खड़ाकर सत्ता पाने के तरीके को ही देश में संघर्ष और आंदोलन का नाम दिया जाता रहा है। मौजूदा वक्त में नरेन्द्र मोदी और केजरीवाल इसकी एक बेहतरीन मिसाल है। केजरीवाल ने सत्ता का विरोध आंदोलन के जरीये किया तो नरेन्द्र मोदी ने सत्ता का विरोध चुनावी तौर तरीको से किया। केजरीवाल के संघर्ष में जनता भी सड़क पर उतरी । मुठ्ठी उसने भी कसी। नारे उसने भी लगाये। मोदी के संघर्ष में चुनावी बिसात सत्ता के विरोध में जन-आंकाक्षाओ के अनुरुप बनी तो जनता ने मोदी के हर राग में संगीत दिया। केजरीवाल ने स्वराज का राग अलापा तो मोदी ने
विकास और सुशासन का। दोनों ने सत्ता के लिये लकीर अलग अलग जरुर खींची। लेकिन दोनों के निशाने पर वही सत्ता रही जिस कभी जनता ने चुना। जनता की भावनाओं ने लुटियन्स की दिल्ली की रईसी को मोदी के गरीबो की नब्ज पकड़ने के हुनर तले ढहते देखा। तो केजरीवाल के आंदोलन तले राजनीतिक व्यवस्था बदलने के नारों के हुनर तले काग्रेस-बीजेपी के धुरंधरों को ढहते देखा। दोनों ही उस दिल्ली को पराजित कर दिल्ली पहुंचे जिस दिल्ली की सत्ता को डिगाने की ताकत पारंपरिक राजनीति में नहीं थी । या फिर हर राजनीतिक दल एक सरीखा हो चला था और जनता की आस, उम्मीद टूट रही थी। इसलिये मोदी में बीजेपी का अक्स किसी ने नहीं देखा और केजरीवाल में पारंपरिक राजनीति का अक्स किसी ने नहीं देखा। लेकिन दोनों सत्तावान बने तो संघर्ष अपनी सत्ता बचाने और दूसरे की सत्ता ढहाने के लिये उन्ही सांस्थानिक ढांचे का खेल शुरु हुआ जिसका कोई चेहरा तो होता नहीं। और झटके में दोनो ही इतने बचकाने हो गये कि सत्ता का खेल व्यवस्था को अपनी सत्ता के अनुकूल करने में ही खेला जाने लगा। पुलिस किसके पास रहेगी । संवैधानिक संस्थानो पर अपनो की नियुक्ति कैसे हो । सत्ता की सोच के अनुकूल दिल्ली ही नहीं देश भर के संसथान तभी काम करेंगे जब सत्ताधारी की सियासी सोच के रंग में रंगे अधिकारियों के हाथो में लगाम होगी। जांच एंजेंसी को अपनी नाक तले रखे बगैर कैसे भ्रष्टाचारियों को पकड़ा जा सकता है। अस्पताल, स्कूल, सड़क पानी, सस्ता खाना सबकुछ सियासी बिसात के मोहरे कैसे हो सकते हैं। और विकास के लिये विदेशी पूंजी से लेकर राजनीतिक दल चलाने के लिये जनता का चंदा। और इस राजनीतिक गोरखधंधे में पुलिस हो या नौकरशाह या फिर कोई अदना सा अधिकारी वह भी अपनी सुरक्षा के लिये सत्ता को ही देश मानने से क्यों हिचकेगा।  तो क्या वाकई कोई वैक्लिपक सोच किसी के पास नहीं है। या फिर वैकल्पिक सोच तभी लायी जा सकती है जब समूचा तंत्र सत्ताधारी के इशारे पर काम करने लगे ।

या फिर पहली बार देश के सामने सबसे बडी चुनौती यही है कि वह सत्ता की परिभाषा बदल दें। क्योंकि समूचा तंत्र ही जब सत्ता के इशारे पर काम करने लगता है तो होता क्या है यह भी किसी से छुपा नहीं है। गुजरात में पुलिस नरेन्द्र मोदी की हो गई था तो 2002 के दंगों ने दुनिया के सामने राजधर्म का पालन ना करने सबसे विभत्स चेहरा रखा । 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या को बडे वृक्ष के गिरने से हिलती जमीन को देखने की सत्ता की चाहत में खुलेआम नरसंहार हुआ। शिवराज सिंह चौहान ने मध्यप्रदेश में शिंकजा कसा तो लाखो छात्रों की प्रतियोगी परीक्षा धंधे में बदल गई। रमन सिंह ने छत्तीसगढ़ में शिंकजा कसा तो आदिवासियों के हिस्से का चावल भी सत्ताधारी डकारने से नहीं चूके। लेकिन वहीं नरेन्द्र मोदी गुजरात से दिल्ली आते हैं तो दिल्ली के जख्मो को दिल्ली पुलिस थाम नही सकती। लेकिन केन्द्रीय जांच एंजेसिया बीजेपी अध्यक्ष को रहस्मय तरीके से क्लीन चिट देने की दिशा में बढ़ने से नहीं कतराती है। तो केजरीवाल को लगता है कि दिल्ली पुलिस उनके मातहत आ जाये तो वह दिल्ली में कोई जख्म होने नही देंगे। पूर्ण राज्य का दर्जा दिल्ली को मिल जाये तो दिल्ली को स्वर्ग बना देंगे।

लेकिन दिल्ली को स्वर्ग बनाने की दिशा में वह खुद को और पार्टी कार्यकर्ताओं को ही सबसे बडा देवता मान कर जिस राह पर चल पडते है, उसमें सुविधाओ को बटोरने की होड़ से लेकर आम से खास होकर सत्ता चलाने की नायाब जिद दिखायी पडती है। यह जिद बौद्दिक सहनशीलता को इस रुप में बार बार प्रकट करती है जिसमें सामने वाले को अंगुली उठाने का हक देना भर ही खुद को लोकतंत्रिक करार देने का निर्णय होता है। यानी करेंगे वही जो खुद के लिये सही होगा क्योंकि जनता ने बहुमत दिया है। तो केजरीवाल हो या मोदी अपने अपने घेरे में अपने कैडर को ही देशबाक्त मान कर सियासत साधने निकल पड़ते है। और यही से सवाल उठता है कि सत्ता किसी के पास हो या पिर सत्ता के लिये टकराते जो भू चेहरे वैचारिक तौर पर अलग अलग दिकायी देते हो लेकिन सत्ता ही सत्ता के लिये लडने वालो को एकजूट कर देती है और अस्सी करोड वोटर अपनी जगह अलग थलग होकर न्यूनतम की लड़ाई में ही उम्र गुजार देता है । लेकिन मौजूदा वक्त में सियासी चक्रव्यूह ने पहली बार मोदी और केजरीवाल के जरीये आम जनता में जिन आकांक्षाओं को जगाया है, असर उसी का बेचैनी हर किसी में है। आम आदमी की बैचेनी परेशानी से जूझते हुये है। खास लोगों की बैचेनी सत्ता सुख गंवाने के डर की है। विरोध में उठे हाथ गुस्से में हैं। गुस्सा जीने का हक मांग रहा है। सत्ता को यह बर्दाश्त नहीं है तो वह गुस्से में उठे हाथों को
चिढ़ाने के लिये और ज्यादा गुस्सा दिलाने पर आमादा है। तो गुस्सा सत्ता में भी है और सत्ता पाने के लिये बैचेन विपक्ष में भी। तो गुस्सा ही सत्ता है और गुस्सा ही प्यादा है। गुस्सा दिखाना भय की मार सहते सहते निर्भय होकर सत्ता को डराना भी है और सत्ता का गुस्सा भ्रष्टाचार और महंगाई में डूबी साख बनाने का खेल भी है।
आदिवासी, किसान, मजदूर और ग्रामीणो के संघर्ष का रास्ता इसी दौर में हाशिये पर है, जब गुस्से और संघर्ष का सबसे तीखा माहौल देश में बन रहा है। वही आवाज इस दौर में सत्ता को चेता पाने में गैर जरुरी सी लग रही है जो सीधे उत्पादन से जुड़ी थी। देश की भूख से जुड़ी थी। बहुसंख्यक समाज से जुड़ी थी। तो क्या पहली बार देश को यह समझ में आ रहा है कि सत्ता की परिभाषा बदलने का वक्त आ गया है। क्योंकि विदेशी पूंजी से विकास हो नहीं सकता। और संसद के ही नियंत्रण में अगर पंचायत रहे तो चौखम्मा राज जीया नहीं जा सकता। तो क्या उत्पादन को सबसे अहम देश में माना जा सकता है। जो किसान खेती से देश का पेट भर रहा है उस खेतीहर जमीन को राष्ट्रीय संपदा घोषित करने का वक्त आ गया है । उत्पादन से जुडे तबके को मजबूत करने से लेकर उसी के जरीये देश की नीतियों को लागू कराने के हालात देश में लाये जा सकते है। क्योंकि भारत की पहचान तो उसके हुनर से रही है । आजादी के वक्त भी देश में दो करोड से ज्यादा हाथ कुटिर और लघु उघोग से जुड़े थे । लेकिन मौजूदा वक्त में पारंपरिक हुनरमंद को खत्म कर आईटीआई के डिग्रीधारी व्यवस्था को ही स्कील इंडिया माना जा रहा है। क्योंकि गुस्से और संघर्ष की वही आवाज हमेशा की तरह आज भी सबसे तेज सुनायी दे रही है जो महानगरों से जुड़ी है। सर्विस सेक्टर से जुड़ी है। शिक्षा पाने के बाद बेरोजगारी से जुड़ी है। या रोजगार पाने के बाद हर जरुरत को जुगाड़ने के लिये भ्रष्टाचार के कटोरे में कुछ ना कुछ डाल कर ही जिये जा रही है। शहरी चमक-दमक से निकला संघर्ष चमक-दमक की दुनिया में सेंध लगाकर व्यवस्था बदलाव का सपना बीते साठ बरस से बार बार जगा रहा है। पत्रकार,शिक्षक, बाबू, वकील जैसे हुनर मंद मान चुके है कि अगर चोरों की व्यवस्था में हर किसी को दस्तावेज पर चोर बता दिया जाये तो चोर व्यवस्था बदल जायेगी। व्यवस्था बदलने की होड़ में शहरी गुस्सा इतना ज्यादा है कि राबर्ट वाड्रा हो या मुकेश अंबानी या फिर वसुंधरा राजे हो या शिवराज सिंह चौहाण इनके भ्रष्टाचार की कहानी के खिलाफ खुलासे की शुरुआत या अंत की कहानी में उस आम आदमी की भागेदारी कहा कैसे होगी, जहां उसका गुस्सा पेट से निकल कर पेट में ही समा रहा है। यह किसी को नहीं पता। सिर्फ आस है कि आज गुस्सा सड़क पर निकला तो कल पेट भी भरेगा। और सियासी घमाचौकड़ी का गुस्सा विकास के खिंची गई भ्रष्ट लकीर को भ्रष्ट ठहरा रहा कर नियम-कायदों को ठीक करने के लिये आम आदमी के गुस्से को सड़क पर दिखला कर वापस अपने घर लौट रहा है। दूरियां पट रही हैं या दूरिया बढ़ रही हैं। क्योंकि सवाल उस जमीन को खड़े आम लोगो के गुस्से का नहीं है, जिस जमीन को हड़पने या उसे बचाने का शहरी खेल संसद से सडक तक में हर कोई बार बार खेल रहा है। सवाल उन लोगों का है जिनकी जमीन उनका जीवन है। और पीढि़यो से खिलाती आई उसी जमीन को अब देश की संपत्ति बता कर खोखला बनाने की विकास नीति चौमुखी तौर पर स्वीकार कर ली गई है। सवाल उन लोगों का है, जिनके लिये संस्थानों का होना लोकतंत्र का होना बताया गया। लेकिन आधुनिक धारा में वहीं संस्थान लोकतंत्र को भी खरीद-बेच कर धनतंत्र में बदल गये। सवाल उन लोगों का है, जिनके लिये संसदीय धारा आजाद होने का नारा रहा। और अब वही संसदीय धारा गुलाम बना कर मुंह के कौर को भी छीनने पर आमादा है। क्या पेट में समाये इस गुस्से को भूमि-सुधार, खाद्य सुरक्षा बिल और राजनीतिक व्यवस्था के बंद दरवाजों के खोलने से खत्म किया जा सकता है। क्या वाकई देश के गुस्से को सही राह वही शहरी मिजाज देगा जिसने स्वदेशी का राजनीतिक पाठ किया और बाजार व्यवस्था
में गंवाने या पाने की तिकड़मो को समझने के बाद व्यवस्था बदलने का सवाल उठा दिया। क्यों वाकई देश के गुस्से को राह वही शहरी देगा, जिसने कानवेन्ट में पढ़ाई की और अब महात्मा गांधी के स्वराज को याद कर व्यवस्था बदलने का नारा लगाना शुरु कर दिया। या फिर लुटियन्स की दिल्ली की वह सियासी मशक्कत देश के गुस्से को शांत करेगी, जिसे राजनीतिक पैकेज में ही हर पेट के भीतर की कुलबुलाहट और भूख को बेच कर कॉरपोरेट के कमीशन से विकास दर का चढ़ता हुआ तीर चमकते हुये सूरज सरीखा दिखायी देता है। यानी संघर्ष और गुस्सा भी अगर लूट की भागीदारी या सत्ता संघर्ष का हिस्सा बन जाये तो फिर रास्ता है क्या। और रास्ता निकाला ना गया तो हर रास्ता उसी सत्ता को पाने की होड में शामिल होकर दुनिया के सपबसे बडे लोकतंत्र का राग ही गायेगा। जहां पचास करोड से ज्यादा वोटर अकेला है। और संसद से पंचायत तक यानी पीएमओ से मुखिया तक महज साढे पैतिस लाख लोगों की सत्ता ही देश है।

Friday, July 17, 2015

सलमान ने मोदी-नवाज से भाईजान देखने को क्यों कहा?

क्या आवाम की ताकत सत्ता और सेना को डिगा सकती है? खासकर भारत पाकिस्तान के संबंधों की जटिलता के बीच। जहां सत्ता बात करती है तो पाकिस्तानी सेना  हरकत अगले ही दिन सीमा पर दिखायी देने लगती है। लेकिन सिल्वर स्क्रीन पर अगर यह सपना परोसा जाता है कि आवाम की ताकत सत्ता और सेना को डिगा
सकती है तो फिर कई सवाल बजरंगी भाईजान के जरीये सलमान खान ने ईद के मौके पर पैदा कर दिये हैं। पहला सवाल क्या सेना और सत्ता ने ही भारत पाकिस्तान के संबंधों को उलझा कर रखा है। दूसरा सवाल अगर हिन्दुओं के कदम बढ़े तो वे समझ जायेंगे कि मस्जिद में कभी ताले नहीं लगते क्योंकि कोई भी कभी भी वहां आ
सकता है। तीसरा सवाल मानवीयता और सरोकार ही अगर मुद्दा बन जायें तो धर्म की कट्टरता भी खत्म हो जाती है।

दरअसल भारत पाकिसातन के संबंधों को लेकर सियासी नजरिये से फिल्में तो कई बनीं या कहें सियासी नजरिये को ही केन्द्र में रखकर फिल्म निर्माण खूब हुये हैं जो दोनो देशो के बीच युद्द और घृणा के खुले संकेत देकर फिल्म देखने वालो के खून गर्म कर देते हैं। लेकिन आंखों में आंसू भरकर लाइन ऑफ कन्ट्रोल को खत्म होते हुये देखने का कोई सुकून भी हो सकता है और पाकिस्तान की जो सेना चुनी हुई सत्ता से भी ताकतवर नजर आती हो वह आवाम के सामने यह कहकर झुक जाये कि हम तो आवाम के सामने तादाद छटाक भर है। इसलिये रास्ता छोड़ते हैं। यह सोच पाकिस्तान को लेकर कही फिट बैठती नहीं दिखती लेकिन यह सिल्वर स्क्रीन का नायाब प्रयोग ईद के मौके पर ही आया जब कबीर खान के निर्देशन में सलमान खान हनुमान भक्त होकर जय श्रीराम कहते हुये पाकिस्तान में चले जाते हैं और वहां की आवाम भी हनुमान भक्त के साथ खडे होकर जय श्रीराम बोलने में नहीं हिचकती। और हनुमान भक्त को भी दरगाह या मस्जिद जाने या टोपी पहनने में कोई हिचकिचाहट नहीं होती। तो क्या पाकिस्तान के साथ संबंधों को लेकर सिनेमा बदल रहा है या फिर सलमान खान ने अपने कद का लाभ उठाते हुये चाहे-अनचाहे में सिल्वर स्क्रीन पर एक ऐसा प्रयोग कर दिया जो दोनों देशों के सत्ताधारियों के जहन में कभी किसी बातचीत में नहीं उठा कि बर्लिन की दीवार की तर्ज पर भारत पाकिस्तान के बीच खड़ी दीवार को आवाम ठीक उसी तरह गिरा सकती है जैसे 9 नवंबर 1989 को बर्लिन में गिराया गया था।

संयोग ऐसा है कि जिस वक्त बर्लिन की दीवार गिरी उसी वक्त कश्मीर में आतंक की पहली बडी घुसपैठ भी शुरु हुई। महीने भर बाद 8 दिसबंर 1989 को रुबिया सईद के अपहरण के बाद सीमा पार से आतंक की दस्तक कुछ ऐसी हुई जिसने सबसे ज्यादा उसी आवाम को प्रभावित किया जिस आवाम के जरीये सिल्वर स्क्रीन बदलाव की रौ जगाना चाहता है। और वह कैसे अब एक नये युवा आंतक में बदल रही है यह घाटी में लहराते आईएसआईएस और फिलिस्तीन झंडों के लहराने से भी समझा जा सकता है। क्योंकि विदाई रमजान के दिन जिस तरह वादी में जामा मास्जिद की छत पर चढ कर फिलिस्तीन, पाकिस्तानी और आईएसआईएस के झंडे लहराये गये और झंडों के लहराने के बाद हर जुम्मे की नवाज के बाद जिस तरह सुरक्षाकरमियो पर पत्थर फेंके गये। झड़प हुई। पुलिस ने लाठिया भांजी। आसू गैस के गोले छोड़े । उसने सिर्फ कश्मीर घाटी के बदलते हालात को लेकर ही नये संकेत देने शुरु नहीं किये है बल्कि कश्मीर को लेकर नया सवाल आंतक से आगे आतंक को विचारधारा के तौर पर अपनाने के नये युवा जुनुन को उभारा। विचारधारा इसलिये क्योकि आईएसआईएस की पहचान पाकिस्तान से इतर इस्लाम को नये तरीके से दुनिया के सामने संघर्ष करते हुये दिखाया जा रहा है और घाटी में आज कोई पहला मौका नहीं था कि आईएसआईएस की झंडा लहराया गया। इससे पहले 27 जून को भी लहराया गया था और उससे पहले आधे दर्जनबार आईएसआईएस आंतक के नये चेहरे के तौर पर घाटी के युवाओ को आकर्षित कर रहा है यह नजर आया है। तो क्या आवाम को किस दिशा में ले जाना है यह सत्ता को भी नहीं पता है । और दिमाग या पेट से जुड़े आतंक को लेकर किसी सत्ता के पास कोई ब्लू प्रिट नहीं है। क्योंकि चंद दिनो पहले ही सेना की वर्दी में वादी के युवाकश्मीरियों के वीडियो ने कश्मीर से लेकर दिल्ली तक के होश फाख्ता कर दिये थे।

और दस दिन पहले सोशल मीडिया पर हथियारों से लैस युवा कश्मीरियो की इस तस्वीर ने घाटी में आंतक को लेकर नयी युवा सोच को लेकर कई सवाल खड़े किये थे। यानी घाटी की हवा में पहली बार पढ़ा लिखा युवा आतंक को महज सीमापार आतंकवादियों से नहीं जोड़ रहा है। बल्कि आईएसआईएस के बाद फिलिस्तीन का झंडा लहराकर अपने गुस्से को विस्तार दे रहा है। यानी आतंक की जो तस्वीर 1989 में रुबिया सईद के अपहरण के बाद कश्मीर के लाल चौक से लेकर लाइन आफ कन्ट्रोल तक हिसा के तौर पर लहराते हथियार और
नारों के जरीये सुनायी दे रहे थे ।और 1989 में जो कश्मीर आंतक की एक घटना के बाद दिल्ली से कट जाता था वही कश्मीर अब तकनीक के आसरे दिल्ली ही नहीं दुनिया से जुड़ा हुआ है। और घाटी ने बकायदा वोट डाल कर अपनी सरकार को चुना है। यानी 1989 वाले चुनाव दिल्ली के इशारे के आरोप भी अब नहीं है।


तो नया सवाल प्रधानमंत्री मोदी की नवाज शरीफ के साथ उफा की बैठक के मुद्दे और सिल्वर स्क्रीन पर बजरंगी भाईजान के जरीये रास्ता निकालने के बीच फंसे संबंधों का है। क्योंकि मौजूदा हालात घाटी में राजनीतिक आतंक की नई जमीन बना रहा है। जिसपर चुनी हुई सरकार का भी कोई वश नहीं है क्योंकि श्रीनगर हो या दिल्ली दोनो का नजरिया सीमा पार आंतक से आगे बढ नहीं पा रहा जबकि श्रीनगर के जामा मस्जिद पर लहराते झंडे संकेत दे रहे है कि सीरिया में सक्रिय आईएसआईएस ही नहीं बल्कि फिलिस्तीन के झंडे के जरीये इजरायल तक को मैसेज देने की कश्मीरी युवा सोच रहा है। यानी पहली बार यह सवाल छोटे पड़ रहे है कि कभी वाजपेयी को लाहौर बस ले जाने की एवज में करगिल युद्द मिला। तो -मोदी को उफा बैठक के बाद ड्रोन और सीमा पर फायरिंग मिली। यानी सियासत अगर हर बैठक के बाद उलझ जाती है तो पाकिस्तानी सेना की हरकत उभरती है । और आवाम अगर नफरत में जीती है तो आंतक के साये में धर्म को निशाने पर लिया जाता है । यानी दूरिया जिन वजहो से बनी है उन वजहों से आंख मूंद लिया जाये तो सिल्वर स्क्रीन का सपना सच हो सकता है। क्योंकि सलमान खान फिल्म में हिन्दुओं के उन तमाम जटिलताओं को जीते हुये इस्लाम की हदो में समाते है जो मौजूदा वक्त में संभव इसलिये नहीं लगता क्योकि धर्म की अपनी एक सत्ता है जो चुनी हुई सत्ता को बनाने और डिगाने की ताकत रखती है। और बजरंगी भाईजान भारत पाकिस्तान के संबंधों को लेकर धर्मसत्ता और आतंक दोनों सवालों पर मौन रहती है । यानी सवाल सिर्फ चुनी हुई सत्ता के सियासी तिकडमो और आवाम का हो तब तो लाइन आफ कन्ट्रोल का रास्ता निकाला जा सकता है । लेकिन जब सवाल सत्ता के लिये बातचीत और विचारधारा के लिये आंतक का हो चुका हो तब सरकार और सिल्वर स्क्रीन के बीच की दूरी कैसे मिट जाती है यह 10 जुलाई की उफा में बैठक के बाद के हालात और 17 जुलाई को बजरंगी भाईजान देखने के बाद कोई भी समझ सकता है कि आखिर सलमान खान ने ट्विट कर क्यों कहा कि प्रदानमंत्री मोदी और नवाज शरीफ को यह फिल्म जरुर देखनी चाहिये।

Friday, July 10, 2015

मोदी का रास्ता मोदी के लिये

ना सरकार का कामकाज रुका है ना पार्टी का। प्रधानमंत्री अपने कार्यक्रम पर हैं तो बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह पार्टी के विस्तार में लगे हैं। प्रधानमंत्री मोदी जहां फेल हो रहे हैं, वहां फेल की नई परिभाषा अमित शाह गढ़ रहे हैं और जहां चुनावी समीकरण डगमगाते हुये दिखायी दे रहा है या मोदी के जादू के ना चलने का डर समा रहा है वहां अमीत शाह साम दाम दंड भेद पर उतर आये हैं। और असर इसी का है कि जातीय राजनीति खारिज करने वाली बीजेपी के लिये अब मोदी ओबीसी के हो गये। साठ महीने सत्ता के मांगने वाले पीएम के वादों को पूरा करने के लिये अब और वक्त की मांग हो रही है । दागदार सीएम और मंत्रियों की बढ़ती फेहरिस्त पर खामोशी बरतकर खुद को अलग थलग पाक साफ बताने की बिसात भी खामोशी से बनायी जा रही है। वहीं आर्थिक नीतियों से लेकर पाकिस्तान तक के साथ रिश्तों को लेकर प्रधानमंत्री मोदी ने जिस तरह ट्रैक बदला है और बदले हुये ट्रैक को सही बताने-दिखाने की कोशिश बीजेपी अध्यक्ष कर रहे हैं, वह अपने आप में खासा दिलचस्प हो चला है। क्योंकि चुनाव जीतने के लिये जिन हालातों को प्रधानमंत्री मोदी ने भावनात्मक तौर पर खडा किया और सरकार चलाने के लिये जिस पटरी पर वह देश को दौड़ाना चाह रहे हैं, उसमें जमीन आसमान का अंतर है। इसलिये तीन नये सवाल मौजूदा वक्त के हैं।

पहला क्या प्रधानमंत्री मोदी अपनी ही पार्टी-सरकार के भीतर अपने विरोधियों को निपटाने में लगे हैं। दूसरा, क्या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सोच को नीतिगत तौर पर शामिल करना घाटे का सौदा है। और तीसरा क्या पाकिस्तान को लेकर कट्टर रुख को बदलने की जरुरत आ चुकी है। यह बदलाव कैसे आ रहा है और बदलाव के लिये कैसे अमित शाह शॉक ऑर्ब्जरवर की तरह काम कर रहे हैं, यह भी कम दिलचस्प नहीं हैं। जरा इस सिलसिले को समझें। राजस्थान की सीएम वसुंधरा ललित गेट में फंसी। मध्यप्रदेश के सीएम शिवराज सिंह चौहाण व्यापम घोटाले में फंसे। छत्तीसगढ़ के सीएम रमन सिंह घान घोटाले में फंसे। महाराष्ट्र के सीएम एयर
इंडिया रुकवाने से लेकर अपने दो मंत्रियों के फंसने पर क्लीन चीट देने पर फंसे। सुषमा स्वराज और स्मृति इरानी को लेकर सवाल उठे। और बेहद बारिकी से प्रधानमंत्री मोदी ना सिर्फ खामोश रहे। बल्कि अपने एजेंडे वाले मुद्दों पर खूब बोलते रहे। तो सवाल मोदी के बदले उन नेताओं को लेकर उठे जो अपने अपने घेरे में खासे
ताकतवर थे। तो क्या पहली बार अपने अपने दौर के कद्दावर इतने कमजोर हो चुके हैं कि उनकी कुर्सी हाईकमान के इशारे पर जा टिकी हैं या फिर इन कद्दावरों का कमजोर होना दिल्ली के पावर सेंटर 7 आरसीआर और 10 अशोक रोड को कहीं ज्यादा मजबूत बना रहा है। यानी प्रधानमंत्री मोदी की खामोशी ही इन कद्दावरों को कमजोर कर मोदी को ताकत दे रही है। क्योंकि बीजेपी के भीतर के सियासी समीकरण को समझें तो जो भी कद्दावर दागदार लग रहे हैं, कमजोर हो रहे हैं, वे हमेशा आडवाणी कैंप के माने जाते रहे। मोदी के पक्ष में खुलकर कभी नहीं रहे तो अपनी पहचान को ही अपनी ताकत बनाये रहे ।यानी झटके में पहली बार प्रधानमंत्री मोदी सरकार चलाते हुये कुछ उसी तरह पाक साफ दिखायी दे रहे है जैसे यूपीए के दौर में मनमोहन सिंह की छवि साफ दिखायी देती थी और उनके अपने मंत्री घोटालो में फंसते नजर आते थे।

शायद इसीलिये यह सवाल अब भी अनसुलझा है कि बीजेपी सासित राज्यो के सीएम से लेकर केन्द्रीय मंत्री तक जिस तरह आरोपों से घिर रहे हैं लेकिन उसका असर ना सरकार पर है ना पार्टी पर । लेकिन इससे मोदी का कद बढ़ गया यह भी पूरी तरह सही नहीं है। तो अगला सवाल है कि जो जनता सिर्फ मोदी को ही बीजेपी और सरकार माने हुये है उसके लिये तो अच्छे दिन के नारे अब कमजोर पड़ते दिखायी दे रहे हैं। और इसका असर बीजेपी कार्यकर्ताओं पर भी पड़ा है और उनमें भी निराशा है। तो यहां बीजेपी अध्यक्ष की भूमिका बड़ी हो जाती है और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह इस सच को समझ रहे हैं कि 2014 के लोकसबा चुनाव के वक्त के उत्साह और 2015 में खासा अंतर आ चुका है तो अमित शाह उस लकीर को नये तरीके से खिंचना चाह रहे है जिसे नरेन्द्र मोदी ने पांच बरस के लिये खींचा था। यानी अब मोदी के वादे पांच बरस में पूरे नहीं हो सकते बल्कि ज्यादा वक्त चाहिये। यानी वादों से बीजेपी अधयक्ष नहीं मुकर रहे है बल्कि वादों की मियाद से मुकर रहे है। और उसकी सबसे बडी वजह कार्यकर्ताओं के भीतर उम्मीद जगाये रखना है। क्योंकि कार्यकर्ताओ के भरोसे ही बिहार से लेकर यूपी चुनाव में कूदा जा सकता है । यानी अभी से चुनाव की तैयारी भी है और बाकी चार बरस के दौरान जिन आधे दर्जन राज्यो में चुनाव होने जा रहे है उसके लिये जमीन तैयार करने की मशक्कत भी हो रही है। क्योंकि मई 2014 में सत्ता के लिये साठ महीने यह कहकर मांगे थे कि हर गांव में पाइप से पानी पहुंचेगा/ हर राज्य में एम्स होगा/हर गांव इंटरनेट से जोड़ा जाएगा/हर व्यक्ति के पास पक्का मकान होगा/बुलेट ट्रेन शुरु की जाएगी/काला धन पैदा नहीं होने देंगे/ खाद्य सुरक्षा दी जाएगी यानी वादो के अंबार तले वोटरों ने दिल खोलकर मोदी का साथ दिया और मोदी ने भी जो अलघ जगाये वह संघ परिवार की जमीन पर खड़े होकर भावनाओ को उभारा। लेकिन नीतियों में तब्दील होते मोदी के वादो ने स्वदेसी जागरण मंच को झटका दिया । भारतीय मजदूर संघ को हलाल किया। किसान संघ को बाजार का रास्ता दिखा दिया। आदिवासी कल्याण आश्रम को विदेशी निवेश से विकास की लौ जगाने के सपने दिखा दिये। और बेहद बारिकी से आरएसएस के अखंड भारत या पीओके को कब्जे में लेने या बड़बोलेपन की हवा भी पाकिस्तान के साथ समझौतों को हवा देकर निकाल दी। इतना ही नहीं पाकिस्तान जाने का न्यौता उन हालातों के बीच स्वीकारा जिन हालातो के बीच 15 बरस पहले अटल बिहारी वाजपेयी बस लेकर लाहौर पहुंच गये थे। तो क्या नरेन्द्र मोदी 13 महीनों में सरकार चलाते चलाते उस मोड़ पर आ खडे हुये है जहां उन्हें परंपरा निभाते हुये पांच बरस काटने है। या फिर प्रधानमंत्री मई 2014 से पहले के हालात को नये तरीके से सरकार चलाते हुये देश के सामने रखना चाह रहे हैं। क्योंकि दर्जनभर सरकारी नारों को लागू कैसे किया जाये, इस बाबत नारो का कोई ब्लूप्रिंट अभी भी सामने आया नहीं है लेकिन नारों के प्रचार का खर्चा सरकारी खजाने से खूब लुटाया जा रहा है।

मसलन 2 अक्टूबर 2014 को स्वच्छ भारत के नारे पर 94 करोड़ खर्च हो चुके हैं। स्किल इंडिया के नारों के दौर में ही दो लाख बुनकरों से लेकर कुटिर इंडस्ट्री की कमाई तीस फिसदी से ज्यादा सिमटती दिखायी दे रही है। डिजिटल इंडिया के नारों के वक्त ही फोन काल ड्राप तक को रोकना मुश्किल हो चुका है। आलम इस हद तक बिखरा है कि मुंबई हमले के आरोपी को लेकर 10 दिन पहले विदेश मंत्री जो कहती हैं, उसके उलट पाकिस्तान से बात प्रधानमंत्री करते हैं और एलओसी पर बीएसएफ का जवान पाकिस्तानी फायरिंग में शहीद होता है और चंद घंटो बाद प्रधानमंत्री मोदी पाकिस्तान जाने के निमत्रंण को स्वीकारते हैं। और झटके में बीजेपी अध्यक्ष बताते है देश ने तेरह महीने पहले जिस शख्स को पीएम बनाया वह ओबीसी है।


Sunday, July 5, 2015

अक्षय नहीं रहा : खबरों में जिन्दगी जीने के जुनून में डोर टूटी या तोड़ी गई ?

अगर स्टेट ही टैरर में बदल जाये तो आप क्या करेंगे। मुश्किल तो यही है कि समूची सत्ता खुद के लिये और सत्ता के लिये तमाम संस्थान काम करने लगे तब आप क्या करेंगे । तो फिर आप जिस तरह स्क्रीन पर तीन दर्जन लोगों के नाम , मौत की तारीख और मौत की वजह से लेकर उनके बारे में सारी जानकारी दे रहे हैं उससे होगा क्या । सरकार तो कहेगी हम जांच कर रहे हैं । और रिपोर्ट बताती है कि सारी मौत जांच के दौरान ही हो रही हैं। इस अंतर्विरोध को भेदा कैसे जाये या यह सवाल उठाया कैसे जाये कि जांच सरकार करवा रही है । जांच अदालत के निर्देश पर हो रही है । जांच शुरु हो गई तो सीएम कुछ नहीं कर सकते। लेकिन जांच के साथ सरकार ही घेरे में आ रही है । एसाईटी और राज्य पुलिस किसी न किसी मोड़ पर टकराते ही हैं। एसआईटी से जुडे अधिकारी रह तो उसी राज्य में रहे हैं, जहां मौतें हो रही हैं। और हर मौत के साथ राज्य की पुलिस को तफ्तीश करनी है । और इसी दायरे में अगर तथ्यों को निकलना है तो कोई भी पत्रकार किस तरह काम कर सकता है । पत्रकार को उन हालातों से लेकर मौत से जुड़े परिवारो के हालातों को भी समझना होगा । सामाजिक-आर्थिक परिस्थियों को भी उभारना होगा ।

और अगर हर मौत राज्य के कामकाज पर संदेह पैदा करती है तो फिर उन दस्तावेजों का भी जुगाड़ करना होगा जो बताये कि मौत के हालात और मौत के बाद राज्य की भूमिका रही क्या । दिल्ली से देखें तो लगता तो यही है कि राज्य के सारे तंत्र सिर्फ राज्य सत्ता के लिये काम कर रहे है यानी सारे संस्थानों की भूमिका सिर्फ और सिर्फ सत्ता के अनुकूल बने रहने की है । तो फिर ग्राउंड जीरो पर जाकर उस सच के छोर को पकड़ा जाये । लेकिन सच इतना खौफनाक होगा कि ग्रांउड जीरो पर जाने के बाद अक्षय खुद ही मौत के सवाल के रुप में दिल्ली तक आयेगा। यह हफ्ते भर पहले की बातचीत में मैंने भी नहीं सोचा । क्योंकि व्यापम में 42वीं और 43वीं मौत के बाद के बाद अक्षय के सवाल ने मुझे भी सोचने को मजबूर किया था कि क्या कोई रिपोर्ट इस तरीके से तैयार की जा सकती है जहां स्टेट टेरर और स्टेट इनक्वायरी के बीच सच को सामने लाने की पत्रकारिता की चुनौती को ही चुनौती दिया जाये । काफी लंबी बहस हुई थी । और अक्षय ने यह सवाल उठाया कि जब हम दिल्ली में बैठकर
मध्यप्रदेश के व्यापम की चल रही जांच के दौर में लगातार हो रही संदेहास्पद मौतो पर रिपोर्टिंग को लेकर चर्चा कर रहे हैं तो क्या यह सवाल मध्यप्रदेश के पत्रकारो में नही उठ रहा होगा । और अगर उठ रहा होगा तो क्या सत्ता इतनी ताकतवर हो चुकी है जहां रिपोर्टर की रिपोर्ट सच ना ला पाये । या वह सच के छोर को ना पकड़ सके । अक्षय याद करो यही सवाल राडिया टेप के दौर में भी तुमने ही उठाया था। और मुझे याद है रात में “बड़ी खबर” करने से ऐन पहले एंकर ग्रीन रुम में मुझे देखकर तुमने पहली मुलाकात में मुझे टोका था कि आप तो पाउडर भी नही लगाते तो फिर आज यहां । मैंने कहा बाल संवारने आया हूं । और उसके बाद तुम्हारा सवाल था कि क्या आज  राडिया टेप में आये पत्रकारो का नाम “बड़ी खबर” में दिखायेंगे। और मैंने कहा था । बिलकुल । तब तो देखेंगे । और उस वक्त भी तुमने ही कहा था पत्रकार भिड जाये तो सच रुक नहीं सकता ।आज “बड़ी खबर” देखते हैं और “जी बिजनेस” वालों को कहते हैं आप भी देखो ।  और मैंने कहा था तो पत्रकार यह सोच लें कि खबर उसके इशारे पर रुक जायेगी या दबा दी जायेगी तो संकेत साफ है या तो रिपोर्ट दबाने वाला शख्स पत्रकार नहीं, सिर्फ नौकरी करने वाला है या फिर स्टेट ही टैरर में तब्दील हो चुका है । और मुझे लगता नहीं है कि मौजूदा दौर पत्रकारिता को दबा पाने में सक्षम है ।

दरअसल अक्षय से संवाद हमेशा तीखा और सपाट ही हुआ । चाहे जी न्यूज में काफी छोटी-मोटी मुलाकातों का दौर रहा हो या आजतक में कमोवेश हर दिन आंखों के मिलने पर किसी खबर को लेकर इशारा या किसी इशारे से खबरों को आगे बढ़ाने का इशारा । जो खबर दबायी जा रही हो । जिस खबर को सत्ता दबाना चाहती हो । जो सत्ता के गलियारे से जुडी खबर हो उस खबर को जानना और दिखाने का जुनून अक्षय में हमेशा में था यह तो बात बात में उसकी जानकारी से ही पता लग जाता । लेकिन यह पहली बार उसकी मौत के बाद ही पता चला कि अक्षय खबरों की संवेदनशीलता ही नहीं बल्कि स्टेट टैरर या कहे सत्ताधारियों के उस हुनर से भी सचेत रहता जिससे कवर करने वाली खबरें कही लीक ना हो जायें। संयोग से अक्षय की मौत की जानकारी उसके परिवार को देने गये तो हम चार पांच सहयोगी थे । लेकिन मुझे ही अक्षय की बहन को यह जानकारी देनी थी कि अब अक्षय इस दुनिया में नहीं रहा। और जैसे ही यह जानकारी उसकी बहन साक्षी को दी, वैसे ही साक्षी के भीतर अक्षय को लेकर पत्रकारिता का वह जुनून फूट पड़ा जिसकी जानकारी वाकई हमे नहीं थी। अक्षय घर में कभी बताकर नहीं गया कि वह किसी स्टोरी को कवर करने जा रहा है । उसने व्यापम को कवर करने की भी जानकारी नहीं दी । मां ने पूछा । तो भी प्रोफेशनल मजबूरी बताकर यह कर टाला की , हमें जानकारी नहीं देने को कहा जाता है " । अपनी पहचान खुले तौर पर सामने ना आये इसके लिये पहचान भी हमेशा छुपाये रखने के लिये पीटीसी भी नहीं करता । यानी टीवी में काम करते हुये भी अपने चेहरे को स्क्रीन पर दिखाने की कभी कोशिश तो दूर उसके उलट
यही कोशिश करता रहा कि स्क्रीन पर न आना पड़े । जिससे खबरों को जुगाड़ने में कभी कही कोई यह ना कह बैठे कि आप तो न्यूज चैनल में काम करते हैं। और जी न्यूज से डेढ बरस पहले आजतक में आने के बाद दीपक शर्मा के साथ जिस तरह की इन्वेस्टिगेंटिग खबरों की तालाश में अक्षय लगातार राजनीतिक गलियारो में भटकता रहा और जिन खबरो को लेकर आया और आजतक पर खुद मैंने उसकी कई खबरों की एंकरिंग की उसमें भी बतौर विशेष संवाददाता भी कभी चैट { चर्चा  } करने भी नहीं आया । लेकिन खबर चलने के बाद फोन कर ना सिर्फ खबर के बारे में चर्चा करता बल्कि चर्चा अगली खबर पर शुरु कर देता कि कैसे-किस तरह किस एंगल से खबर के छोर को पकड़ा जाये । और संयोग देखिये मौत की खबर आने से तीन दिन पहले अक्षय का जन्मदिन था और मां-बहन से वादा कर एक्सक्लूसिव रिपोर्ट तैयार करने निकला था कि लौट कर किसी खास जगह पर चलेंगे । वहीं जन्मदिन सेलीब्रेट करेंगे । और बहन साक्षी यह बताते-बताते रो पड़ी कि पिछले बरस भी
एक जुलाई को उसे रिपोर्टिंग के लिये बनारस जाना पडा तब भी यह कहकर निकला कि लौट कर जन्मदिन किसी खास जगह जाकर मनायेंगे । लेकिन जन्मदिन कभी मना नहीं और खबरों में जिन्दगी खोजने के जुनून में जिन्दगी की छोर टूटी या या तोड दी गई यह खबर आनी अभी बाकी है ।

Tuesday, June 30, 2015

सत्ता का नया पाठ, राजनीति कीजिये नौकरी पाइए

75 के आंदोलन में छात्रों ने जेपी की पीछे खड़े होकर डिग्री गंवाई। नौकरी गंवाई। 89 के आंदोलन में वीपी के पीछे खड़े होकर छात्रों ने आरक्षण को डिग्री पर भारी पाया। सत्ता के गलियारे में जातिवाद की गूंज शुरु हुई। 2013 में सत्ता ने पहले अन्ना आंदोलन को हड़पा और फिर 2015 में सत्ता ने ही छात्रों को रोजगार का सियासी पाठ पढ़ाया। यानी पहली बार खुले तौर पर छात्रों को यह खुले संकेत दिये जा रहे है कि अगर वह राजनीतिक दलों से जुड़ते है तो सत्ता में आने के बाद छात्रो की डिग्री पर उनकी राजनीतिक सक्रियता भारी पड़ेगी। यानी जो छात्र राजनीति से दूर रहते है या सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान देते हुये अच्छे नंबरो के लिये दिन रात एक किये होते है आने वाले वक्त में उसका कोई महत्व बचेगा नहीं। यह सवाल इसलिये डराने लगा है क्योंकि इससे पहले यूपी में समाजवादी पार्टी की सत्ता तले यादवों के भर्ती के किस्से खूब रहे हैं। संयोग से इतनी बडी तादाद में खुले तौर पर जातीय आधार पर नौकरी बांटी गई कि भर्ती घोटाला शब्द ही यूपी की सत्ता के साथ जुड़ गया। मध्यप्रदेश में शिवराज चौहाण सरकार के दौर में व्यापम ने नौकरी को पूंजी से जोड़ दिया। करोडों के वारे-न्यारे के खेल इतने खुले तौर पर हुये कि जब पोटली खुलनी शुरु हुई तो राजनेता, नौकरशाह, बिजनेसमैन और दलालों की नैक्सस भी सामने आ गया। लेकिन ताजा मिसाल तो उन दो नेताओं की सत्ता से जा टिका है, जिन्होंने सत्ता के लिये भावनात्मक तौर पर वोटरों के दिल-दिमाग को छुआ। अर्से बाद इन दो नेताओं के गुस्से से भरे भाषणों को सुनकर वोटरों में यह एहसास जागा कि बदलाव की घड़ी अब उनके दरवाजे पर दस्तक दे ही देगी। क्योंकि एक तरफ नरेन्द्र मोदी का लुटियन्स की दिल्ली की रईसी पर सीधी चोट करना था तो दूसरी तरफ अरविन्द केजरीवाल का सामाजिक ढांचे को ही बदलने का प्रण था। मोदी के भाषणों ने छात्रो को इस हदतक प्रभावित किया कि 26 मई 2014 के तुरंत बाद ही एडमिशन से लेकर नौकरी पाने के हकदार छात्रों के सामने जैसे ही नंबर होने के बावजूद कही आरक्षण तो कही डोमिसाइल के चक्कर में एडमिशन ना हो पाने का संकट उभरा तो हर किसी ने पीएम मोदी को ही याद किया। कइयों ने पीएमओ के नाम मेल किये तो कईयो ने सोशल मीडिया का सहारा लिया। कुछ ऐसा ही नौकरी पाने का हकदार होने के बावजूद कही पैरवी तो कही राजनीतिक खेल की वजह से नौकरी ना मिल पाने वाले छात्रों ने भी अपने अपने तरीके से पीएम को ही याद किया।

क्योंकि राजनीतिक सत्ता के भीतर के मवाद को निकालने की कसम मोदी ने पीएम पद के लिये चुनावी प्रचार के वक्त की थी। छात्रों को ऐसी ही आशा केजरीवाल से भी जागी। खासकर दिल्ली में पढने के लिये आने वाले छात्रो ने महसूस किया कि केजरीवाल पढे लिखे हैं । नौकरी छोड़कर नेता बने हैं। तो सत्ता मिलने के बाद दिल्ली में छात्रों को संकट से निजात मिलेगा। एडमिशन हो या पढाई के बाद नौकरी का सवाल दोनों दिशा में दिल्ली सरकार कदम जरुर उठायेगी। दोनों ही नेताओं को लेकर छात्रों में आस इस हद तक हुई कि प्रधानमंत्री मोदी के पद संभालते ही सारी मुश्किले छूमंतर हो जायेगी कुछ एसा ही 88 फीसदी नंबर पाने के बाद पूना में कहीं दाखिला ना होने पर य़श को लगा और उसने अगस्त-सितबंर 2014 में ही पीएमओ में मेल कर अपना गुस्सा निकाला। तो दिल्ली में जिस तरह राजस्थान छात्र को 92 फीसदी नेबर आने पर भी दिल्ली विश्वविघालय में नामांकन ना मिला उसने केजरीवाल और देश की शिक्षा मंत्री को मेल कर अपना गुस्सा निकला । मुश्किल गुस्सा निकालने भर की नहीं है । मुस्किल है कि राजनेताओं और राजनीति से गुस्से में आया युवा तबका ही तो 2011-12 में दिल्ली के जंतर-मंतर और रामलीला मैदान में जुटता था । और देखते देखते देश के शहर दर शहर में रामलीला मैदान ओऔर जंतर मंतर बनने लगे थे । जिससे पारंपरिक राजनीतिक सत्ता की चूले हिलेने लगी थी और उसी के बाद केजरीवाल हो या मोदी दोनों ने ही जनता के आक्रोष की इसी नब्ज को पकडा । पहली बार राजनीतिक भाषणो में बख्शा किसी को नहीं गया। मोदी ने गांधी परिवार से लेकर दामाद राबर्ट वाड्रा और किसान मजदूर से लेकर शिक्षा की खास्ता हालात पर जमकर अपनी जुबां से कोडे चलाये । अच्छा लगा । कोई नेता तो लग दिख रहा है । इसी तर्ज पर केजरीवाल ने भी बख्शा किसी को नहीं । जो भ्रष्ट थे । जो दागी
थे। जो मालामाल थे । जो लूट का नैक्सेस बनाये हुये देश को खोखला कर रहे थे। सभी को निशाने पर लिया । युवा साथ कड़े हुये क्योंकि यह जुबां बदलाव वाले थे । लेकिन सत्ता संभालने के साथ ही सच जिस खौफनाक तरीके से दस्तक देने लगा उसने उन्ही छात्रों-युवाओं के सामने अंधेरा कर दिया जो आस लगाये बैठे थो कि उनकी काबिलियत को तो मौका मिलेगा ही । सत्ता केजरीवाल के हाथ आई तो पहली नजर कैडर को ही नौकरी देने या दिल्ली सरकार में काम पर ल गाने की शिरी हुई। चूंकि केजरीवाल का कैडर पारंपरिक राजनीतिक कैडर से अलग था। आम आदमी पार्टी को संभालने वाले या तो केजरीवाल के एनजीओ के साथी है या फिर प्रोपेशनल्स की कतार जो राजनीति की मार तले बदलाव के लिये केजरीवाल में अपना अक्स देखने लगी।

और तीसरी कतार दिल्ली हरियाण के उम मुफलिसी में खोये छात्रों की है जो केजरीवाल के विस्तार के साथ अपना विस्तार भी देख रहे थे। तो उनके लिये किसी परिक्षा की तैयारी के सामान ही राजनीतिक संघर्ष करना। तो सीएम बनते ही सबसे पहले उसी कैडर को नौकरी पर लगाना प्राथमिकता बनी। दिल्ली में ही करीब दो से तीन हजार कैडर महीने की तयशुदा रकम पा कर दिल्ली सरकार की राजनीतिक नौकरी कर रहा है। यानी जो काम प्रोफेशनल्स के हाथ में होना चाहिये या जिस काम के लिये सत्ता को पढ़े लिके छात्रों के बीच समानता के साथ नौकरी दी जानी चाहिये उसमें प्राथमिकता या कहे समूचा रोजगार ही अपने कैडर में बांट दिया गया। जबकि दिल्ली का सच बेरोजगारी को लेकर कम डराने वाला नहीं है । दिल्ली में दो लाख से ज्यादा बेरोजगार ग्रेजुएट और पोस्ट-ग्रेजुएट हैं। औप पढ़े लिखे बेरोजगारो की तादाद तो 15 लाख के पार हैं। तो यह सवाल किसी भी जहन में आ सकता है कि सिर्फ अपने कैडर के काम के आसरे तो दिल्ली में राजनीति संघर्ष केजरीवाल ने खड़ा नहीं किया उसमे भ्रष्ट व्यवस्था की मार खाया युवा तबका भी होगा। तो उसका ख्याल कैन करेगा। या फिर सियासी आरक्षण तले अगर कैडर को ही सारी सुविधा मिलेगी तो फिर दूसरे नेता और पार्टी से केजरीवाल और आम आदमी पार्टी अलग कैसे हुई । यही सवाल नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद के हालात से समझा जा सकता है। देश के अलग अलग विश्वविद्यालयों औररिसर्च इस्टटीयूट में बीजेपी के छात्र संगठन अखिल बारतीय विघार्थी परिषद  में रहे छात्रों को प्रथमिकता मिलने लगी। मसलन हाल में एबीवीपी के तीस छात्रो को अलग अलग जगहो पर एडहोक तरीके से निटुक्त कर दिया गया । बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी में भी पांच एबीवीपी छात्रो को लेक्चरर की नौकरी मिल गई। इसके अलावे में झटके में केन्द्र में सरकार बीजेपी की बनी तो
संघ से जुडे तमाम इंसटीट्यूट को बजट से लेकर बाकी सुविधायें मानव संसाधन मंत्रालय से मिलने लगी। तो वहा भी संघ विचारधारा से जुडे छात्रों को रोजगार मिलने लगा। और नौकरी पाने के पायदान पर सबसे आगे खडा छात्र राजनीतिक कनेक्शन खोजने में भटकने लगा। जयपुर में तो बीजेपी का दफ्तर ही कैडर के रोजगार के लिये खुल गया। जो बीजेपी के साथ खड़ा है उसकी पर्ची पर रोर से लेकर उसके उम्मीदवार की ट्रांसफर पोस्टिग तक होने लगी। यानी छात्र हो या शिक्षक उसका राजनीतिकरण होना कितना जरुरी है यह केन्द्रीय विघालयों में गर्मी छुट्टियों के वक्त होने वाले ट्रांसफर-पोस्टिंग से भी समझा जा सकता है। हर शिक्षक को कम से कम दो या तीन बरस तो एक जगह गुजरना ही पता है। लेकिन बीजेपी के साथ जुड़े हैं। संघ के किसी स्वयंसेवक की चिट्टी है तो दो से तीम नहीने के भीतर ही इस बार मनमाफिक जगह पर ट्रांसफर कर दिया गया। बच्चों के एडमिशन का कोटा मानवसंसाधन मंत्रालय का साढे चार सौ छात्रो का है। लेकिन बीजेपी/संघ की सक्रियता का आलम यह है कि जून तक केन्द्रीय विद्यालयों को साढे चार हजार बच्चों के एडमिशन की पर्ची देश के हर स्कूल में जा चुकी है।

यानी छात्र सिर्फ पढलिखकर आगे बढना चाहे तो उसका राजनीतिक अज्ञान उसके सामने रोड़ा बनेगा। और अगर इस दिशा में बचे तो सामने कंपटिशन की परिक्षाओं में करोडों के वारे न्यारे करने वाला नैक्सस आकर खड़ा हो जायेगा। और असर इसी का है कि इस बार देशभर के साढे तेरह लाख से ज्यादा छात्रों के सामने यह सवाल खड़ा हो गया कि हर परीक्षा पेपर अगर लीक होगा तो फिर वे करेंगे क्या। क्योंकि सीबीएसई की
एआईपीएमटी की परीक्षा तो सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर फटाफट अगले हफ्ते कराया जा रहा है जिसमें साढे छह लाख छात्र परीक्षा देगें । लेकिन जरा कल्पना किजिये लेकिन एमयू की मेडिकल परीक्षा , इंजीनियरिंग परीक्षा ,
बीडीएस परीक्षा , यूपी की पीसीएस परीक्षा और पीएमटी परीक्षा  सभी तो इस बार रद्द होगई । क्योकि इसके पीछे का नैक्सेस बताता है कि जिनके पास पैसा है उनके लिये इन परिक्षाओ को पास करना कितना आसान बना दिया गया है । और हर रैकेट के तार उसी राजनीति से जा जुडते है जहा पैसो का लेन-देन नेताओं
के कद को बढा करता है और उसके बाद राजनीतिक सत्ता हासिल करने के लिये शिक्षा में सुधार या शिक्षा माफिया पर नकेल कसने के वादे कर पढने लिखने वाले छात्रो की भावनाओ को अपने साथ करने के लिये ईमानदार दिखने काराजनीतिक प्रहसन खुले आम होता है। क्योंकि किसी सत्ता के पास ना तो शिक्षा का और ना ही समाज को आगे ले जाने का कोई ब्लू प्रिंट है। सिवाय पूंजी बनाने और ज्यादा से ज्यादा उपभोक्ता पैदा कर देश को बाजार में बदलने की सोच हर सत्ता के पास के जरुर है । और असर इसी का है कि बढती
बेरोजगारी के बीच मलाईदार नौकरी का रास्ता जहा धंधे या कहे येन –केन प्रकारेण से हो जाये ओऔर वरदहस्त सत्ता का ही रहे तो फिर छात्रो का भविष्य ही नहीं बल्कि देश का भविष्य भी माफिया रैकेट में फंस रहा है इससे
इंकार कौन कैसे करेगा ।

Friday, June 26, 2015

सत्ता की ताकत तले ढहते संस्थान

याद कीजिये तो एक वक्त सीबीआई, सीवीसी और सीएजी सरीखे संवैधानिक संस्थानों की साख को लेकर आवाज उठी थी। वह दौर मनमोहन सिंह का था और आवाज उठाने वाले बीजेपी के वही नेता थे जो आज सत्ता में हैं। और अब प्रधानमंत्री मोदी की सत्ता के आगे नतमस्तक होते तमाम संस्थानों की साख को लेकर कांग्रेस
समेत समूचा विपक्ष ही सवाल उठा रहा है। तो क्या आपातकाल के चालीस बरस बाद संस्थानों के ढहने और राजनीतिक सत्ता की आकूत ताकत के आगे लोकतंत्र की परिभाषा भी बदल रही है। यानी आपातकाल के चालीस बरस बाद यह सवाल बड़ा होने लगा है कि देश में राजनीतिक सत्ता की अकूत ताकत के आगे क्यों कोई संस्था काम कर नहीं सकती या फिर राजनीतिक सत्ता में लोकतंत्र के हर पाये को मान लिया जा रहा है। क्योंकि इसी दौर में भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को लेकर संसद की स्टैंन्डिग कमेटी बेमानी साबित की जानी लगी। राज्य सभा की जरुरत को लेकर सवाल उठने लगे। और ऊपरी सदन को सरकार के कामकाज में बाधा माना जाने लगा।

न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर सत्ता ने सवाल उठाये। कोलेजियम के जरीये न्यायपालिका की पारदर्शिता देखी जाने लगी। कारपोरेट पूंजी के आसरे हर संस्थान को विकास से जोड़कर एक नई परिभाषा तय की जाने लगी। कामगार यूनियनें बेमानी करार दे दी गई या माहौल ही ऐसा बना दिया गया है जहां विकास के रास्ते में यूनियन का कामकाज रोड़ा लगने लगे। किसानो से जुड़े सवाल विकास की योजनाओं के सामने कैसे खारिज हो सकते है यह आर्थिक सुधार के नाम पर खुल कर उभरा। सत्ताधारी के सामने नौकरशाही चूहे में बदलती दिखी। और यह सब झटके में हो गया ऐसा भी नहीं है । बल्कि आर्थिक सुधार के बाद देश को जिस रास्ते पर लाने का प्रयास किया गया उसमें ‘ पंजाब, सिंध , गुजरात,मराठा / द्रविड, उत्कल बंग ...” सरीखी सोच खारिज होने लगी । क्योकि भारत की विवधता , भारत के अनेक रंगो को पूंजी के धागे में कुछ इस तरह पिरोने की कोशिश शुरु हुई कि देश के विकास या उसके बौद्दिक होने तक को मुनाफा से जोडा जाने लगा । असर इसी का है कि विदेशी पूंजी के बगैर भारत में कोई उत्पाद बन नहीं सकता है यह संदेश जोर-शोर से दी जाने लगी । लेकिन संकट तो इसके भी आगे का है ।

भारत को लेकर जो समझ संविधान या राष्ट्रगीत या राष्ट्रगान तक में झलकती है उसे सत्ता ने अपने अनुकूल विचारधारा के जरीये हडपने की समझ भी विकसित कर ली। असर इसी का हुआ कि बाजारवाद की विचारधारा ने विकास के नाम पर संस्थानों के दरवाजे बंद कर दिये। तो एक वक्त सूचना के अधिकार के नाम पर हर संस्थान के दरवाजे थोड़े बहुत खोल कर लोकतंत्र की हवा सत्ता के जरीये बहाने की कोशिश हुई। तो मौजूदा वक्त में जनादेश के आसे सत्ता पाने वालो ने खुद को ही लोकतंत्र मान लिया और हर दरवाजे अपने लिये खोल कर साफ संकेत देने की कोशिश शुरु की पांच बरस तक सत्ता की हर पहल देश के लिये है । तो इस घड़ी में सूचना का अधिकार सत्ता की पंसद नापंसद पर आ टिका। और सत्ता जिस विचारधारा से निकली उसे राष्ट्रीय धारा मान कर राष्ट्रवाद की परिकल्पना भी सियासी विचारधारा के मातहत ही परिभाषित करने की कोशिश शुरु हुई। इसी का असर नये तरीके से शुरु हुआ कि हर क्षेत्र में सत्ता की मातृ विचारधारा को ही राष्ट्र की विचारधारा मानकर संविधान की उस डोर को ही खत्म करने की पहल होने लगी जिसमें नागरिक के अधिकार राजनीतिक सत्ता से जुड़े बगैर मिल नहीं सकते। हर संस्थान के बोर्ड में संघ के पंसदीदा की नियुक्ती होने लगी। गुड गवर्नेंस झटके में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के आईने में कैसे उतारा गया यह किसी को पता भी नहीं चला या कहे सबको पता चला लेकिन इसे सत्ता का अधिकार मान लिया गया । बच्चों के मन से लेकर देश के धन तक पर एक ही विचारधारा के लोग कैसे काबिज हो सारे यत्न इसी के लिये किये जाने लगे। नवोदय विघालय हो या सीबाएसई बोर्ड। देश के 45 केन्द्रीय विश्विघालय हो या उच्च शिक्षा के संस्थान आईआईटी या आईआईएम हर जगह को भगवा रंग में रंगने की कोशिश शुरु हुई। उच्च शिक्षण संस्थानों की स्वायत्ता को सत्ता अपने अधिन लाने के लिये मशक्कत करने लगी। और विचारधारा के स्तर पर शिमला का इंडियन काउंसिल आफ हिस्टोरिकल रिसर्च रेसंटर हो या इंडियन काउंसिल आफ सोशल साइंस रिसर्च या पिर एनसीईआरटी हो या यूजीसी। बोर्ड में ज्ञान की परिभाषा विचारधारा से जोड़कर देखी जाने लगी। यानी पश्चमी सोच को शिक्षा में क्यो मान्यता दें जब भारत की सांस्कृतिक विरासत ने दुनिया को रोशनी दी। और राष्ट्रवाद की इस सोच से ओत प्रोत होकर तमाम संस्थानो में वैसे ही लोग निर्णय लेने वाली जगह पर नियुक्त होने लगे जो सांस्कृतिक राष्ट्वाद की बीजेपी या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नजदीक रहे। यानी यहा भी यह जरुरी नहीं हा कि वाकई जो संघ की समझ हेडगेवार से लेकर गोलवरकर होते हुये देवरस तक बनी उसकी कोई समझ नियुक्त किये गये लोगो में होगी या फिर श्यामाप्रसाद मुखर्जी या दीन दयाल उपाध्याय की राजनीतिक सोच को समझने-जानने वाले लोगो को पदों पर बैठाया गया ।

दरअसल सत्ता के चापलूस या दरबारियो को ही संस्थानों में नियुक्त कर अधिकार दे दिये गये जो सत्ता या संघ का नाम जपते हुये दिखे । यानी पदों पर बैठे महानुभाव अगर सत्ता या संघ पाठ अविरल करते रहेंगे तो संघ का विस्तार होगा और सत्ता ताकतवर होगी यह सोच नये तरीके से विचारधारा के नाम पर विकसित हुई। जिसने उन संस्थानों की नींव को ही खोखला करना शुरु कर दिया जिन संस्थानों की पहचान दुनिया में रही। आईसीसीआर हो या पुणे का फिल्म इस्टीटयूट यानी एफटीआईई या पिर सेंसर बोर्ड हो या सीवीसी सरीखे
संस्थान, हर जगह दिन हाथो में बागडोर दी गई उनके काम के अनुभव या बौद्दिक विस्तार का दायरा उन्हें संस्थान से ही अभी ज्ञान अर्जित करने को कहता है लेकिन आने वाली पीढ़ियों को जब वह ज्ञान बांटेंगे तो तो निश्चित ही वही समझ सामने होगी जिस समझ की वजह से उन्हे पद मिल गया। तो फिर आने
वाला वक्त होगा कैसा या आने वाले वक्त में जिस युवा पिढी के कंघों पर देश का भविष्य है अगर उसे ही लंबे वक्त तक सत्ता अपनी मौजूदगी को श्रेष्ठ बताने वाले शिक्षकों की नियुक्ति हर जगह कर देती है तो फिर बचेगा क्या । यह सवाल अब इसलिये कही ज्यादा बड़ा हो चला है कि राजनीतिक सत्ता यह मान कर
चल रही है कि उसकी दुनिया के अनुरुप ही देश को ढलना होगा। तो कालेजों में उन छात्रों को लेक्चरर से लेकर प्रोफेसर बनाया जा रहा है,जो छात्र जीवन में सत्ताधारी पार्टी के छात्र संगठन से जुड़े रहे हैं। यानी मौजूदा वक्त बार बार एक ऐसी लकीर खींच रहा है जिसमें सत्ताधारी राजनीतिक दल या उसके संगठनों के साथ
अगर कोई जुड़ाव आपका नहीं रहा तो आप सबसे नाकाबिल हैं। या आप किसी काबिल नहीं है। मुस्किल तो यह है कि समझ का यह आधार अब आईएएस और आईपीएस तक को प्रभावित करने लगा है। बीजेपी शासित राज्यों में कलेक्टर, डीएम एसपी तक संघ के पदाधिकारियो के निर्देश पर चलने लगे है। ना चले तो नौकरी मुश्किल और चले तो सारे काम संघ के विस्तार और सत्ता के करीबियों को बचाने के लिये । तो क्या चुनी हुई सत्ता ही लोकतंत्र की सही पहचान है। ध्यान दें तो मौजूदा वक्त में भी मोदी सरकार को सिर्फ 31 फीसदी वोट ही मिले। वहीं जिन संवैधानिक संस्थानों को लेकर मनमोहन सिंह के दौर में सवाल उठे थे तब काग्रेस को भी 70 करोड़ वोटरों में से महज साढे ग्यारह करोड ही वोट मिले थे। बावजूद इसके कांग्रेस की सत्ता से जब अन्ना और बाबा रामदेव टकराये तो कांग्रेस ने खुले तौर पर हर किसी को चेतावनी भरे लहजे में वैसे ही तब कहा था कि चुनाव लड़कर जीत लें तभी झुकेंगे। लेकिन मौजूदा वक्त भारतीय राजनीति के लिये इसलिये नायाब है
क्योंकि जनादेश के घोड़े पर सवार मोदी सरकार ने अपना कद हर उस साथी को दबा कर बडा करने की कवायद से शुरु की जो जनादेश दिलाने में साथ रहा । और जो सवाल कांग्रेस के दौर में बीजेपी ने उठाये उन्ही सवालो को मौजूदा सत्ता ने दबाने की शुरुआत की। दरअसल पहली बार सवाल यह नहीं है कि कौन गलत है या कौन सही ।
सवाल यह चला है कि गलत सही को परिभाषित करने की काबिलियत राजनीतिक सत्ता के पास ही होती है । और हर क्षेत्र के हर संस्थान का कोई मतलब नहीं है क्योंकि विकास की अवधारणा उस पूंजी पर जा टिकी है जो देश में है नहीं और विदेश से लाने के लिये किसान मजदूर से लेकर उहोगपतियो से लेकर देसी कारपोरेट तक को दरकिनार किया जा सकता है। तो मौजूदा वक्त में सत्ता के बदलने से उठते सवाल बदलते नजरिये भर का नहीं है बल्कि सत्ता के अधिक संस्थानों को भी सत्ता की ताकत बनाये रखने के लिये कही ढाल तो कही हथियार बनाया जा सकता है । और इसे खामाशी से हर किसी को जनादेश की ताकत माननी होगी क्योंकि यह आपातकाल नहीं है।

Thursday, June 18, 2015

मौजूदा मीडिया बनाम आपातकाल के दौर की पत्रकारिता


क्या मौजूदा वक्त में मीडिया इतना बदल चुका है कि मीडिया पर नकेल कसने के लिये अब सरकारों को आपातकाल लगाने की भी जरुरत नहीं है। यह सवाल इसलिये क्योंकि चालीस साल पहले आपातकाल के वक्त मीडिया जिस तेवर से पत्रकारिता कर रहा था आज उसी तेवर से मीडिया एक बिजनेस मॉडल में बदल चुका है, जहां सरकार के साथ खड़े हुये बगैर मुनाफा बनाया नहीं जा सकता है। और कमाई ना होगी तो मीडिया हाउस अपनी मौत खुद ही मर जायेगा। यानी 1975 वाले दौर की जरुरत नहीं जब इमरजेन्सी लगने पर अखबार के दफ्तर में ब्लैक आउट कर दिया जाये। या संपादकों को सूचना मंत्री सामने बैठाकर बताये कि सरकार के खिलाफ कुछ लिखा तो अखबार बंद हो जायेगा। या फिर पीएम के कसीदे ही गढ़े। अब के हालात और चालीस बरस पहले हालात में कितना अंतर आ गया है।

यह समझने के लिये 40 बरस पहले जून 1975 में लौटना होगा। आपातकाल लगा तो 25 जून की आधी रात के वक्त लेकिन इसकी पहली आहट 12 जून को तभी सुनायी दे गई जब इलाहबाद हाईकोर्ट ने इंदिरागांधी के खिलाफ फैसला सुनाया और समाचार एजेंसी पीटीआई ने पूरे फैसले को जस का तस जारी कर दिया। यानी शब्दों और सूचना में ऐसी कोई तब्दिली नही की जिससे इंदिरागांधी के खिलाफ फैसला होने के बाद भी आम जनता खबर पढने के बाद फैसले की व्याख्या सत्ता के अनुकूल करें । हुआ यही कि आल इंडिया रेडियो ने भी समाचार एजेंसी की कापी उठायी और पूरे देश को खबर सुना दी कि, श्रीमति गांधी को जन-प्रतिनिधित्व कानून की धारा 123 [ 7 ] के तहत भ्रष्ट साधन अपनाने के लिये दोषी करार दिया गया । और प्रधानमंत्री को छह वर्षों के लिये मताधिकार से वंचित किया गया। और 600 किलोमीटर दूर बारत की राजधानी नई दिल्ली में इलाहबाद में दिये गये फैसले की खबर एक स्तब्धकारी आघात की तरह पहुंची। इस अविश्वसनीय खबर ने पूरे देश को ही जैसे मथ डाला। एक सफदरजंग मार्ग पर सुरक्षा प्रबंध कस दिये गये। ट्रकों में भरकर दिल्ली पुलिस के सिपाही पहुंचने लगे। दल के नेता और कानूनी विशेषज्ञ इंदिरा के पास पहुंचने लगे। घर के बाहर इंदिरा  के समर्थन में संगठित प्रदर्शन शुरु हो गये। दिल्ली परिवहन की कुल 1400 बसों में से 380 को छोडकर बाकी सभी बसों को भीड़ लाद लाद कर प्रदर्शन के लिये 1, सफदरजंग पहुंचाने पर लगा दिया गया । और यह सारी रिपोर्ट भी
समाचार एजेंसी के जरीये जारी की जाने लगी। असल में मीडिया को ऐसे मौके पर कैसे काम करना चाहिये या सत्ता को कैसे काम लेना चाहिये यह सवाल संजय गांधी के जहन में पहली बार उठा।

और संजय गांधी ने सूचना प्रसारण मंत्री इन्द्र कुमार गुजराल को बुलाकर खूब डपटा कि प्रधानमंत्री के खिलाफ इलाहबाद हाईकोर्ट के पैसले को बताने के तरीके बदले भी तो जा सकते थे। उस वक्त आल इंडिया रेडियो में काम करने वाले न्यूज एडिटर कपिल अग्निहोत्री के मुताबिक वह पहला मौका था जब सत्ता को लगा कि खबरें उसके खिलाफ नही जानी चाहिये। और पहली बार समाचार एजेंसी पीटीआई-यूएनआई को चेताया गया कि बिना जानकारी इस तरह से खबरें जारी नहीं करनी है। और चूंकि तब समाचार एजेंसी टिकी भी सरकारी खर्च पर ही थी तो संजय गांधी ने महसूस किया कि जब समाचार एजेंसी के कुल खर्च का 80 फिसदी रकम सरकारी खजाने से जाती है तो फिर सरकार के खिलाफ खबर को एजेंसियां क्यों जारी करती है । उस वक्त केन्द्र सरकार रेडियो की खबरों के लिये 20 से 22 लाख रुपये समाचार एजेंसी पीटीआई-यूएनआई को देती थी । बाकि समाचार पत्र जो एजेंसी की सेवा लेते वह तीन से पांच हजार से ज्यादा देते नहीं थे। यानी समाचार एजेंसी तब सरकार की बात ना मानती तो एजेंसी के सामने बंद होने का खतरा मंडराने लगता। यह अलग मसला है कि मौजूदा वक्त में सत्तानुकूल हवा खुद ब खुद ही एजेंसी बनाने लगती है क्योंकि एजेंसियों के भीतर इस बात को लेकर ज्यादा प्रतिस्पर्धा होती है कि कौन सरकार या सत्ता के ज्यादा करीब है । लेकिन दिलचस्प यह है आपातकाल लगते ही सबसे पहले आपातकाल का मतलब होता क्या है इसे सबसे पहले किसी ने महसूस किया तो सरकारी रेडियो में काम करने वालों ने ही । और पहली बार आपातकाल लगने के बाद सुबह तो हुई लेकिन मीडिया के लिये 25 जून 1975 की रात के आखरी पहर में ही घना अंधेरा छा गया । असल में उसी रात जेपी यानी जयप्रकाश नारायण को गांधी पीस फाउंडेशन के दफ्तर से गिरफ्तार किया गया और जेपी ने अपनी गिरप्तारी के वक्त मौजूद पत्रकारों से जो शब्द कहे उसे समाचार एंजेसी ने जारी तो कर दिया लेकिन चंद मिनटों में ही जेपी के कही शब्द वाली खबर किल..किल..किल कर जारी कर दी गई । और समूचे आपाकताल के दौर यानी 18 महीनों तक जेपी के शब्दो को किसी ने छापने की हिम्मत नहीं की । और वह शब्द था , “ विनाशकाले विपरीत बुद्दी “ । जेपी ने 25 की रात अपनी गिरफ्तारी के वक्त इंदिरा गांधी को लेकर इस मुहावरे का प्रयोग किया था कि जब विनाश आता है तो दिमाग भी उल्टी दिशा में चलने लगता है । कपिल अग्निहोत्री के मुताबिक वह रात उनके लिये वाकई खास थी । क्योंकि उनका घर रउफ एवेन्यू की सरकारी कालोनी में था। जो गांधी पीस फाउंडेशन के ठीक पीछे की तरफ थी । तो रात का बुलेटिन कर जब वह घर पहुंचे और खाने के बाद पान खाने के लिये मोहन सिंह प्लेस निकले तबतक उनके मोहल्ले में सबकुछ शांत था । लेकिन जब वापस लौटे को बडी तादाद में पुलिस की मौजूदगी देखी । एक पुलिस वाले से पूछा, क्या हुआ है। तो उसने जबाब देने के बदले पूछा, तुम किधर जा रहे है। इसपर जब अपने घर जाने की बातकही तो पुलिस वाले ने कहा देश में इमरजेन्सी लग गई है। जेपी को उठाने आये हैं। और कपिल अग्निहोत्री के मुताबिक उसके बाद तो नींद और नशा दोनों ही फाख्ता हो गये। स्कूटर वापस मोड़ रेडियो पहुंच गये। रात डेढ बडे न्यूज डायरेक्टर भट साहेब को फोन किया तो उन्होने पूछी इतना रात क्या जरुरत हो गई । जब आपातकाल लगने और जेपी की गिरफ्तारी अपनी आंखों से देखने का जिक्र किया तो भट साहेब भी सकते में आ गये। खैर उसके बाद ऊपर से निर्देश या कि सुबह आठ बजे के पहले बुलेटिन में आपातकाल की जानकारी और उस पर नेता, मंत्री , सीएम की प्रतिक्रिया ही जायेगी। इस बीच पीटीआई ने जेपी की गिरफ्तारी की खबर, विनाशकाले विपरित बुद्दी के साथ भेजी जिसे चंद सेकेंड में ही किल किया जा चुका था। तो अब समाचार एंजेसी पर नहीं बल्कि खुद ही सभी की प्रतिक्रिया लेनी थी तो रात से ही हर प्रतिक्रिया लेने के लिये फोन घनघनाने लगे। पहला फोन बूटा सिंह को किया गया। उन्हें जानकारी देकर उनकी प्रतिक्रिया पूछी तो जबाब मिला, तुस्सी खुद ही लिख दो, मैनू सुनाने दी जरुरत नही हैगी। मै मुकरुंगा नहीं। इसी तरह कमोवेश हर सीएम , नेता ने यही कहा कि आप खुद ही लिख दो। कपिल अग्निहोत्री के मुताबिक सिर्फ राजस्थान के सीएम सुखाडिया ने एक अलग बात बोली कि लिख तो आप ही दो लेकिन कड़क लिखना। अब कडक का मतलब आपातकाल में क्या हो सकता है यह कोई ना समझ सका। लेकिन सभी नेता यह कहकर सो गये ।

और अगली सुबह जब बुलेटिन चला तो पहली बार समाचार एजेंसी के रिपोर्टर आल इंडिया रेडियो पहुंचे। सारे नेताओ का प्रतिक्रिया लिखकर ले गये। और उसी वक्त तय हो गया कि अब देश भर में फैले पीआईबी और आलइंडिया रेडियो ही खबरों का सेंसर करेंगे। यानी पीआईबी हर राज्य की राजधानी में खुद ब खुद खबरों को लेकर दिशा-निर्देश बताने वाला ग्राउंड जीरो बन गया। यानी मौजूदा वक्त में पीआईओ के साथ खड़े होकर जिस तरह पत्रकार खुद को सरकार के साथ खडे होने की प्रतिस्पर्धा करते है वैसे हालात 1975 में नहीं थे। यह जरुर था कि सरकारी विज्ञापनों के लिये डीएवीपी के दप्तर के चक्कर जरुर अखबारो के संपादक लगाते। क्योंकि उस
वक्त डीएवीपी का बजट सालाना दो करोड़ रुपये का था। लेकिन अब के हालात में तो विज्ञापन के लिये सरकारों के सामने खबरो को लेकर संपादक नतमस्तक हो जाते हैं क्योंकि हर राज्य के पास हजारो करोड़ के विज्ञापन का बजट होता है। इसे एक वक्त हरियाणा के सीएम हुड्डा ने समझा तो बाद में राजस्थान मे
वसुधंरा से लेकर बिहार में नीकिश कुमार से लेकर दिल्ली में केजरीवाल तक इसे समझ चुके है। यानी अब खबरो को स्थायी पूंजी की छांव भी चाहिये। लेकिन अब की तुलना में चालिस बरस के कई हालात उल्टे भी थे। मसलन अभी संघ की सोच के करीबियों को रेडियो, दूरदर्शन से लेकर प्रसार भारती और सेंसर
बोर्ड से लेकर एफटीआईआई तक में फिट किया जा रहा है तो चालीस साल पहले आपातकाल लगते ही सरकार के भीतर संघ के करीबियों और वामपंथियों की खोज कर उन्हें या तो निकाला जा रहा था या हाशिये पर ढकेला जा रहा था । वामपंथी धारा वाले आंनद स्वरुप वर्मा उसी वक्त रेडियो से निकाले गये। हालांकि स
वक्त उनके साथ साम करने वालो ने आईबी के उन अधिकारियो को समझाया कि रेडियो में कोई भी विचारधारा का व्यक्ति हो उसके विचारधारा का कोई मतलब नहीं है क्योंकि खबरो के लिये पुल बनाये जाते हैं। यानी जो देश की खबरें जायेगी उसके लिये पुल वन, विदेशी खबोर क लिये पुल दू । और जिन खबरों को
लेना है जब वह सेंसर होकर पुल में लिखी जा रही है और उससे हटकर कोई दूसरी खबर जा नहीं सकती तो फिर विचारधारा का क्या मतलब। और आनंद स्वरुप वर्मा तो वैसे भी उस वक्त खबरों का अनुवाद करते हैं। क्योंकि पूल में सारी खबरें अंग्रेजी में ही लिखी जातीं। तो अनुवादक किसी भी धारा का हो सवाल तो अच्छे
अनुवादक का होता है। लेकिन तब अभी की तरह आईबी के अधिकारियों को भी अपनी सफलता दिखानी थी तो दिखायी गई। फिर हर बुलेटिन की शुरुआत प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने नाम से होनी चाहिये। यानी इंदिरा गांधी ने कहा है। और अगर किसी दिन कही भी कुछ नहीं कहा तो इंदिरा गांधी ने दोहराया है कि...,
या फिर इंदिरा गांधी के बीस सूत्री कार्यक्रम में कहा गया है कि.. । यानी  मौजूदा वक्त में जिस तरह नेताओ को सत्ताधारियों को कहने की जरुरत नहीं पडती और उनका नाम ही बिकता है तो खुद ब खुद ही अब तो नेताओं को खुश करने के लिये उनके नाम का डंका न्यूज चैनलों में बजने लगता है। वह चालीस बरस
पहले आपाताकाल के दबाब में कहना पड़ रहा था। फिर बडा सच यह भी है कि मौजूदा वक्त में जैसे गुजरात के रिपोर्टरों या पीएम के करीबी पत्रकारों को अपने अपने सस्थानो में जगह मिल रही है चालिस साल पहले आपातकाल के वक्त जेपी के दोलन पर नजर रखने के लिये खासतौर से तब बिहार में चाक चौबंद
व्यवस्था की गई। चूंकि रेडियो बुलेटिन ही सबकुछ होता था तो पटना में होने शाम साढे सात बजे के सबसे लोकप्रिय बुलेटिन के लिय़े शम्भूनाथ मिश्रा तो रांची से शाम छह बजकर बीस मिनट पर नया बुलेटिन शुरु करने के लिये मणिकांत वाजपेयी को दिल्ली से भेजा गया। फिर अभी जिस तरह संपादकों को अपने अनुकूल करने केलिये प्रधानमंत्री चाय या भोजन पर बुलाते हैं।

या फिर दिल्चस्प यह भी है कि चालीस बरस पहले जिस आपातकाल के शिकार अरुण जेटली छात्र नेता के तौर पर हुये वह भी पिछले दिनो बतौर सूचना प्रसारण मंत्री जिस तरह संपादकों से लेकर रिपोर्टर तक को घर बुलाकर अपनी सरकार की सफलता के प्रचार-प्रसार का जिक्र करते रहे। और बैठक से निकलकर कोई संपादक बैठक की बात तो दूर बल्कि देश के मौजूदा हालात पर भी कलम चलाने की हिम्मत नहीं रख पाता है । जबकि आपातकाल लगने के 72 घंटे के भीतर इन्द्र कुमार गुजराल की जगह विघाचरण शुक्ल सूचना प्रसारण बनते ही संपदकों को बुलाते हैं। और दोपहर दो बजे मंत्री महोदय पद संभालते है तो पीआईबी के प्रमुख सूचना अधिकारी डां. ए आर बाजी शाम चार दिल्ली के बडे समाचार पत्रा को संपादकों को बुलावा भेजते है। मुलगांवकर { एक्सप्रेस } ,जार्ज वर्गीज { हिन्दुस्तान टाइम्स },गिरिलाल जैन { स्टेटेसमैन  } , निहालसिंह {स्टेटसमैन }  और विश्वनाथ { पेट्रियाट  } पहुंचते हैं। बैठक शुरु होते ही मंत्री महोदय कहते है कि सरकार संपादकों के कामकाज के काम से खुश नहीं है। उन्हें अपने तरीके बदलने होंगे। इसपर एक संपादक जैसे ही बोलते हैं कि ऐसी तानाशाही को स्वीकार करना उनके लिये असम्भव है। तो ठीक है कहकर मंत्री जी भी उत्तर देते है कि , “ हम देखेगें कि आपके अखबार से कैसा बरताव किया जाये “ । तो गिरिलाल जैन बहस करने के लिये कहते हैं कि ऐसे प्रतिबंध तो अंग्रेजी शासन में भी नहीं लगाय़े गये थे। शुक्ल उन्हें बीच में ही काट कर कहते है , “यह अंग्रेजी शासन नहीं है । यह राष्ट्रीय आपातस्थिति है “।  और इसके बाद संवाद भंग हो जाता है। और उसके बाद अदिकत्र नतमस्तक हुये। करीब सौ समाचारपत्र को सरकारी विज्ञापन बंद कर झुकाया गया। लेकिन तब भी स्टेटसमैन के सीआर ईरानी और एक्सप्रेस के रामनाथ गोयनका ने झुकने से इंकार कर दिया। तो सरकार ने इनके खिलाफ फरेबी चाले चलने शुरु की । लेकिन पीएमओ के अधिकारी ही सेंसर बोर्ड में तब्दिल हो गये । प्रेस परिषद भंग कर दी गई । आपत्तिजनक सामग्री के प्रकाशन पर रोक का घृणित अध्यादेश 1975 लागू कर दिया गया । यह अलग बात है कि बावजूद चालिस साल पहले संघर्ष करते पत्रकार और मीडिया हाउस आपातकाल में भी दिखायी जरुर
दे रहे थे । लेकिन चालीस साल बाद तो बिना आपातकाल सत्ता झुकने को कहती है तो हर कोई सरकारों के सामने लेटने को तैयार हो जाता है।