Thursday, February 16, 2017

बैलगाड़ी पर सवार देश में हर किसी को सत्ता चाहिये

54 बरस में भारत कहां से कहां पहुंच गया। 1963 में पहली बार इसरो को साइकिल के कैरियर में राकेट बांधकर नारियल के पेडो के बीच थुबा लांचिग स्टेशन पहुंचना पड़ा था। और आज दुनिया भर के सौ से ज्यादा सैटेलाइट को एक साथ लांच करने की स्थित में भारत के वैज्ञानिक आ चुके हैं। लेकिन अंतरिक्ष देखना छोड दें तो जमीन पर खडी साइकिल की स्थिति में कोई बदलाव आया नहीं है। यूं 1981 में बैलगाडी पर सैटेलाइट लादकर इसरो लाया गया था। और देश का मौजूदा सच साइकिल और बैलगाडी से आगे क्यों बढं नहीं पा रहा है इसे जानने से पहले राजनीतिक तौर पर सत्ता के लिये नेताओ के लालच को ही परख लें जो किसान मजदूर और गरीबी के राग से आगे निकल नहीं पा रहे हैं। यानी 2017 में भी बात गरीबों की होगी। किसानों की होगी। मजदूरों की होगी। भूखों की होगी। यानी बैलगाडी पर सवार देश के 80 फीसदी लोगों की रफ्तार साइकिल से तेज हो नहीं पा रही है। और इस सच को जानने के लिये यूपी चुनाव को नहीं बल्कि सत्ता संभाले सरकारों के सच को ही जान लें। तमिननाडु की सरकार दो रुपये के भोजन के वादे पर टिकी है।

छत्तीसगढ़ की सरकार दो रुपये चावल देने पर टिकी है। उडीसा की सरकार मुफ्त राशन देने पर टिकी है  पंजाब, राजस्थान, मद्यप्रदेश, बंगाल की सरकारें दो जून के मुफ्त जुगाड़ कराने पर टिकी है। यानी जो राजनीतिक सत्ता भूख मिटाने की लड़ाई लड़ रही है । जिस देश में वोट का मतलब गरीबी मुफलिसी के दर्द को उभार कर पेट भरने का सुकून दिलाने भर का सपना बीते 50 बरस से हर चुनाव में दिखाया जा रहा हो। वहां अंतरिक्ष की दौड को अगर पीएम अपनी सफलता मान लें और आगरा लखनऊ सड़क पर लडाकू विमान उतार कर सीएम खुश हो जाये तो इसका मतलब निकलेगा क्या । और ये संयोग हो सकता है कि 1963 में साइकिल पर रॉकेट लाया गया तब नेहरु ने देश को साइकिल युग से बाहर निकालने का खवाब देश को दिखाया था और 2017 में साइकिल की लडाई देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस भी यूपी में लड़ रही है। और जिक्र किसान का ही हो रहा है। यानी चाहे अनचाहे जिक्र बैलगाडी पर सवार देश का ही हो रहा है। तो आईये जरा ये भी देख लें कि सैटेलाइट की उडान से इतर भारतीय समाज अभी भी बैलगाड़ी पर सवार क्यों है। क्योंकि सच तो यही है कि बैलगाडी आज भी किसानी की जरुरत है। देश में एक करोड़ चालीस लाख बैलगाडी आज भी खेतों में चलती है। बाजार से खेत तक किसान सामान बैलगाडी से ही लाता है। और लकडी की इस बैलगाडी की कीमत है 10 से 14 हजार रुपये। लकड़ी के पहिये तो 10 हजार और टायर के पहिये तो 12 से 14 हजार। और देश के किसानों का हालात इतनी जर्जर है कि ट्रैक्टर खरीदने की स्थिति में भी देश के 88 फिसदी किसान नहीं है। प्रतिदिन 600 रुपये ट्रैक्टर किराये पर मिलते हैं, जिसे लेने की स्थिति में भी किसान नहीं होता। तो क्या वाकई देश बैलगाड़ी युग से आगे निकल नहीं पा रहा है और 1981 में जब इसरो के वैज्ञानिक बैलगाड़ी पर सैटेलाइट लाद कर पहुंचे थे तो दुनियाभर में
चाहे ये तस्वीर भारत की आर्थिक जर्जरता को बता रही थी। लेकिन अब वैज्ञानिकों की सफलता के आईने में क्या पीएम सीएम को भी सफल माना जा सकता है। क्योंकि बैलगाड़ी पर सवार हिन्दुस्तान का सच यही है कि 21 करोड किसान-मजदूर की औसत आय प्रतिदिन की 40 रुपये है। 12 करोड मनरेगा के मजदूरों को 5 लाख तालाब खोदने हैं। पढ़े लिखे रजिस्टर्ड बेरोजगार 18 करोड़ पार कर चुके हैं। लेकिन मुश्किल तो सत्ता पाने के लिये रैलियों का सपना या सत्ता का आंख मूंद कर सपनो में जीना।

क्योंकि जिस फसल बीमा योजना को प्रधानमंत्री मोदी सबसे सफल और एतिहासिक बताते हैं, उसी फसल योजना को हरियाणा के डेढ़ लाख से ज्यादा किसानों ने नहीं कराया। और हरियाणा में बीजेपी की ही सरकार है। वहीं के किसान फसल बीमा नहीं करा रहे तो क्या किसानों के हितों की बातें सिर्फ रैलियों तक सीमित है। क्योंकि बीजेपी के ही दो और राज्य है छत्तीसगढ़ और मद्यप्रदेश। एक तरफ छत्तीसगढ़ के दुर्ग और दूसरी मध्यप्रदेश के श्योपुर में किसानों की उपज खरीदने वाला कोई नहीं है। तो तमाम सब्जियां सड़क पर ही फैंक दी गई। दोनों ही राज्य सरकारें खुद को किसानों की हितैषी कहने से नहीं हिचकतीं लेकिन ऐसा कोई इंतजाम नहीं कर पाई कि किसानों को फसल के पर्याप्त दाम मिल पाएं। मजबूरन किसान अपनी सब्जियां मंडी ले जाने के बजाय सड़क पर फेक रहा है। तो जिस देश में किसान को उपज की कीमत ना मिल पाती हो। जिस देश में अनाज भंडारन की व्यवस्था तक ना हो। जिस देश कर्ज तले किसान खुदकुशी कर लेते हो । उस देश में पीएम या सीएम किसानो को लेकर सपनो का जिक्र करें तो ये बातें कैसे अच्छी लग सकती है । हो सकता है आज ये सुनने में अच्छा लगे कि इस बरस किसान रिकार्ड उत्पादन कर सकता है। करीब 279 मिलियन टन । तो समझना ये भी होगा कि हर बरस 259 मिलियन टन अनाज पैदा होता है। लेकिन सरकार के पास 40 मिलियन टन अनाज से भी कम भंडारन की व्यवस्था है। इसीलिये 44 हजार करोड़ रुपये का अनाज हर बरस पर्बाद हो जाता है। एफसीआई ने माना बीते दस बरस में 2 लाख मिट्रिक टन अनाज बर्बाद हो गया। तो क्या पीएम, सीएम या नेताओं के वादों को मतलब सिर्फ सत्ता के लिये रैलियों में किसानो का राग जपना है। और सत्ता के लिये किसानो को भाषणो में जिस तरह प्यादा बनाया जाता है वह हिन्न्दुस्तान की सबसे बडी त्रासदी है क्योकि अभी भी देश में हर तीन घंटे में एक किसान खुदकुशी कर रहा है। लेकिन देश के सबसे बडे सूबे में चुनाव के वक्त देश के हालातों से हर कोई कितना बेफिक्र है और गरीब गरीब कहते हुये कैसे देश मुनाफा कमाने में ही जा सिमटा है ये भी समझ लें। कल्पना कीजिये देश में शिक्षा बेची जा चुकी है। इलाज पैसेवालो के लिये हो चुका है। घर बनान बेचना सबसे बड़ा धंधा है। क्योंकि सच तो यही है कि सरकार का बजट स्कूलों को लेकर 46,356 करोड़ है। और निजी स्कूलों का धंधा 6 लाख 70 हजार करोड़ का है। यानी देश को कितने सरकारी स्कूल चाहिये। या कहें शिक्षा में किताना जबरदस्त अंतर है। और उसके बाद भी बात गरीबों की होती है। इसी तर्ज पर इलाज देना तो सरकार का पहला काम होना चाहिये। लेकिन सच ये है कि हेल्थ पर सरकार का बजट 48878 करोड रुपये का है । वहीं हेल्थ
इंड्सट्री करीब साढे छह लाख करोड़ पार कर चुकी है। यानी स्वास्थ्य दे पाने में सरकार कहां टिकती है या कहें आम जनता और निजी इलाज के बीच की दूरी कौन पाटेगा। ये कोई नहीं जानता । और जब प्रधानमंत्री मोदी हर किसी को घर देने का जिक्र कर चुके है। 2022 तक का टारगेट ले चुके हैं। तो ये भी समझ लें घर के लिये सरकार का सालाना बजट 23 हजार करोड़ का है। वहीं मकान बनाने का धंधा 6 लाख 30 हजार करोड का हो चला है। और कमोवेश देश की हालत यही है कि हर न्यूनतम जरुरत को ही मुनाफे के धंधे में बदलकर कमाई का रास्ता बनाया जा चुका है। फिर भी गरीबों की बात तो ठीक है ये चुनाव है।

Thursday, February 9, 2017

"रेनकोट" तो हर किसी ने पहन रखा है साहेब !

रेनकोट तो हर किसी ने पहना है। क्या नेहरु। क्या इंदिरा। क्या राजीव गांधी। और क्या पीवी नरसिंह राव या फिर क्या वाजपेयी या क्या मनमोहन सिंह। हा किसी का रेनकोट खासा लंबा और किसी का रेनकोट खासा छोटा हो सकता है। लेकिन रेनकोट तो रेनकोट है, जो बाथरुम में शॉवर के नीचे खड़े होने से भी किसी को भी भीगने नहीं देता। लेकिन किसी पीएम ने अपने से पहले पीएम को ऐसा नहीं कहा जैसा पीएम मोदी ने पूर्व पीएम मनमोहन सिंह को कहा। लेकिन सवाल ये भी है कि मोदी ने गलत क्या कहा। रेनकोट तले खड़े होकर क्या वाकई मनमोहन सिंह कह सकते हैं कि करप्शन की बारिश में वह भीगे नहीं। क्योंकि 10 बरस की सत्ता के दौर में मनमोहन का रेनकोट खासा लंबा है। मसलन आयल फार फुड, सत्यम घोटाला, आईपीएल, 2 जी, कामनवेल्थ, आदर्श, इसरो, कोयला, एनएचआरएम, अगस्ता वेस्टलैंड और फेहरिस्त तो खासी लंबी है। जाहिर है पीएम मोदी ने कुछ गलत तो नहीं कहा। लेकिन अगला सवाल यह भी हो सकता है कि फिर मनमोहन ने पीएम रहते हुये पूर्व पीएम अटलबिहारी वाजपेयी को रेनकोट क्यो नहीं पहनाया। वाजपेयी का रेनकोट भी खासा लंबा था। बराक मिसाइल घोटाला हो या तेलगी स्कैम, तहलका आपरेशन हो या स्टाक मार्केट स्कैम। यूटीआई स्कैम हो या ताबूत घोटाला। पेट्रोल पंप बांटने का खेल हो या नेताओं के पैसे लेते हुये कैमरे पर धराना। और वाजपेयी ने पीएम रहते हुये अपने पूर्व पीएम नवरिंह राव को रेनकोट क्यों नहीं पहनाया। जबकि पीवी की तो सत्ता ही झारखंड मु्क्ति मोर्चो के रेनकोट को पहनकर हुई थी। और उस दौर में तो रेनकोट की लंबाई जमीन को छूने लगी थी। क्योंकि हर्षद मेहता स्कैम हो या इंडियन बैक स्कैम, शुगर इंपोर्ट घोटाला हो या लखूभाई या सुखराम घोटाला यूरिया घोटाला हो या हवाला घोटाला। तो पीएम रहते हुये वाजपेयी चाहते तो नरसिंह राव को रेनकोट पहना सकते थे। लेकिन वाजपेयी ने राव को रेनकोट नहीं पहनाया।

तो क्या रेनकोट भारत की संसदीय लोकतांत्रिक सत्ता का ऐसा अनूठा सच है जिसे हर किसी ने पहना। क्योंकि नेहरु के दौर में जीप स्कैंडल हो या साइकिल स्कैम। मुंदडा स्कैम हो या तेजा लोन स्कैम या प्रताप सिंह कैरो स्कैंडल। और इंदिरा के रेनकोट को कोई कैसे भूल सकता है। खासकर मारुति विवाद और अंतुले करप्शन। या फिर इंडियन आयल स्कैम। या चुरुहट लाटरी स्कैम। यू तो इंदिरा के करप्शन के खिलाफ ही जेपी ने देशभर में आंदोलन छेडा और तब संघ परिवार भी जेपी के साथ खड़ा हुआ। लेकिन रेनकोट तबभी किसी ने इंदिरा गांधी को नहीं पहनाया। और याद कीजिये तो राजीव गांधी के रेनकोट को बोफोर्स और सेंट किट्स तले कैसे वीपी सिंह ने घसीटा । यू तब सबमेरिन और एयर इंडिया घोटाला भी था। रेनकोट तो नहीं लेकिन घोटालों का जिक्र कर वीपी सत्ता में आये। लेकिन वह भी ना तो राजीव गांधी के रेनकोट को उतार पाये और ना ही खुद रेनकोट पहनने से बच पाये। 20 करोड के एयरबस घोटाले का रेनकोट वीपी ने भी पहना। लेकिन कहा किसी ने नहीं।

तो क्या रेनकोट का सिलसिला शुरु हुआ है और अब मान लिया जाये कि पीएम ही नही सीएम भी इसके दायरे में आयेंगे। क्योंकि रेनकोट तो हर सीएम ने भी पहना है। चाहे वह बीजेपी का हो या कांग्रेस का। अकाली का हो या समाजवादी पार्टी का। तो क्या परंपरा शुरु गई है कि रेनकोट अब हर किसी को पहना दिया जाये। क्योंकि रेनकोट तो कमोवेश हर सीएम ने पहना है। लेकिन कहे कौन । क्या खुद प्रधानमंत्री बीजेपी के सीएम वसुंधरा राजे शिवराज सिंह चौहान, और रमनसिंह को कह पायेंगे कि आपने भी तो रेनकोट पहन रखा है। और कांग्रेस के सीएम रावत, सिद्दरमैया और वीरभद्र को कब कहेंगे कि रेनकोट आपने भी पहना है। और क्या यूपी की चुनावी सभा में अब अखिलेश यादव को रेनकोट पहनाया जायेगा। और पंजाब में प्रकाश सिंह बादल को रेनकोट पहनाने में पीएम ने चूक क्यों कर दी।

ये सवाल इसलिये क्योंकि बीजेपी के तीन सीएम, राजस्थान की सीएम वसुंधरा राजे, मध्यप्रदेश के सीएम शिवराज सिंह चौहान और छत्तीसगढ़ के सीएम रमन सिंह। जरा इनके रेनकोट का माप देखिये। वसुंधरा बेदाग है लेकिन ललित मोदी स्कैंडल, 45 हजार करोड का खादान आवंटन, अरावली की पहाडियो में अवैध खनन, हाउसिंग बोर्ड का घपला और गहलोत के दौर से चला आ रहा एसपीएमएल इन्फ्रा लि को लाभ देने का सिलसिला थमा कहा है। कांग्रेस लगातार आरोप लगा रही है। इसी तर्ज पर मध्यप्रदेश के सीएम भी तो बेदाग है । जबकि उनके दौर में व्यापम घोटाले ने हर परीक्षा और रोजगार को कठघरे में खडा कर दिया। और उनके दौर में मामले तो उठते रहे चाहे वह गेंहू डंप करने का स्कैम, स्कॉलरशिप स्कैम हो या डंपर केस या फिर आईएएस अरविंद जोशी और टिनू जोशी की संपत्ति का मामला। इसी तर्ज पर रमन सिंह भी बेदाग हैं। चाहे सीएजी ने वीवीआईपी चापर अगस्तावेस्टलैंड को लेकर सवाल खड़े किये हों। या 36 हजार करोड का पीडीएस स्कैम हो या फिर नमक या सैनिटेशन स्कैम हो या राशन कार्ड का घपला। हर आरोप के कटघरे में कांग्रेस ने यहां सीएम को ही खड़ा किया। ठीक वैसे ही जैसे मनमोहन को हर घोटाले पर बीजेपी ने कटघरे में खडा किया । तो क्या पीएम मोदी बीजेपी के सीएम को रेनकोट पहना पायेंगे। या फिर अब सियासत रेनकोट तले कुछ इस तरह आयेगी कि चुनाव प्रचार में उत्तराखंड के सीएम हरीश रावत हो या यूपी के सीएम अखलेश यादव । दोनो को रेनकोट पहनाने की होड़ मचेगी। क्योंकि रावत बेदाग है। मगर उनके दौर में बाढ राहत में घपला हो गया। शराब घोटाला हो गया । जमीन घोटाला हो गया स्टिंग कराने में घपला हो गया पावर कॉरपोरेशन में घपला हो गया । यानी आरोपों
की फेरहिस्त से कैसे रावत बचेंगे। और अखिलेश खुद को बेदाग बताते हैं लेकिन रेनकोट के आरोप तो अखिलेश पर भी है। मसलन कुंभ मेले में घपला । जमीन कब्जा और बालू खनन । फिर अपने ही मंत्री को करप्ट बताकर अखिलेश ने ही बाहर का रास्ता दिखाया। लेकिन रेनकोट से वह कैसे बच सकते है । और रेनकोट की फेरहिस्त में तो कमोवेश हर राज्य के सीएम का चेहरा भी फिर दिखायी देना चाहिये । क्योंकि चारा में फंसे लालू को छोड़ दें तो कोई सीएम नहीं बचेगा। क्योंकि बीते 5 बरस में ही राज्यों के घोटाले घपले की रकम 90 लाख करोड़ से ज्यादा की है। यानी सियासी हमाम कह कर खामोश हुआ जाये। या रेनकोट तले हर किसी को खडा मानकर समूची संसदीय राजनीति को ही दागदार करार दे दिया जाये ।

Wednesday, February 8, 2017

यूपी में लोकतंत्र का राग कही मुस्लिमों के घाव पर नमक तो नहीं?

देश के सबसे बड़े सियासी सूबे के मुसलमानों का चुनावी दांव ही सियासी तिकडमों तले कैसे दांव पर लग चुकी है, ये कोई आज का सच नहीं है बल्कि आजादी के तुरंत बाद से ही ये तस्वीर बनाये रखी गईं। और मुस्लिमों की इस तस्वीर को बनाये रखने की जद्दोजहद में सियासत करने वाली पीढ़ियां खप गईं। देश के पहले चुनाव में मौलाना अब्दुल कलाम को भी मुस्लिमों का नुमाइन्दा बनाकर नेहरु ने मुस्लिम आबादी वाले रामपुर से ही चुनाव लड़वाया। और 65 बरस बाद आज भी समाजवादियों के लिये रामपुर की पहचान आजम खान से जा जुड़ी है। और यूपी में रेंगती सियासत का ही सच है कि जहां मुस्लिम आबादी सत्ता में पहुंचा दें वहां मुलायम ने मौलाना बनकर मुसल्लमानो को ही दांव पर लगाया। और इस बार मायावती की जीत हार भी बीएसपी के 97 मुस्लिम उम्मीदवारों पर ही जा टिकी है। यानी यूपी की सोशल इंजीनियरिंग में मंडल-कमंडल की प्रयोगशाला में भी मुस्लिम निशाने पर आकर भी हाशिये पर रहा और सांप्रदायिक हिंसा के खौफ तले सियासत ने मुज्जफरनगर दंगों से लेकर कैराना तक के केन्द्र में मुस्लिमों को ही रखा।

ऐसे में यूपी के मुसलमानों के सच को जानने के लिये देवबंद की गलियों में चले। आजमगढ़ की जमीन पर खड़े होकर सियासी बिगुल फूंके या फिर मुज्जफरनगर-शामली के रिलिफ कैंपों में रहने वाली रेप की शिकार महिलाओं के जख्म पर ये कहकर नमक छिड़के कि लड़ते लड़ते थक गई लेकिन न्याय ने कभी दस्तक नहीं दी। या फिर मु्स्लिमों की बिसात पर सत्ता की इमारत खड़ा करने के उस मिजाज को समझे, जिसके लिये मुस्लिम ना तो वोट बैंक हैं। ना ही मुस्लिम वोट की जरुरत है। और अयोध्या कांड का एक सच ये भी रहा कि अटल बिहारी वाजपेयी ने आडवाणी के रथयात्रा को नकारा भी और बाबरी ढांचे के विध्वस से एक रात पहले लखनऊ में जमीन समतल करने वाला भाषण भी दिया। और नये अंदाज में हैदराबाद के निजाम की गलियां छोड़कर औवैसी भी जब यूपी की जमीन पर सियासत के दाव चल रहे है, तो उनके लिए तीन तलाक का अंदाज भी नायाब है। जहां वह सपा, बसपा और बीजेपी से तीन तलाक लेने वाले भाषण देने से नहीं हिचकते। तो दर्द या त्रासदी हिन्दू-मुसलमानों की नहीं उस सामाजिक-आर्थिक कटघरे की है जिसपर सियासत ही कुंडली मार कर बैठी है। इसीलिये सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के सच को वही सत्ता कारपेट तले दबाने से नहीं हिचकती जो  कोर्ट तैयार कराती है। और यहीं से शुरु होता मुस्लिमों को लेकर ऐसा सच जिसके दायरे में यूपी वोटबैंक के तिराहे पर खड़ा नजर आता है । पहला, अखिलेश-राहुल मुस्लिमों को ही पुचकार रहे हैं। दूसरा, मायावती मुस्लिम-दलित के जोड़ को जीत का मंत्र बता रही है। तीसरा बीजेपी मुसलमानों के बंटने पर सत्ता के सपने संजो रही है। लेकिन सत्ता के लिये प्यादे बने मुस्लिम ही नहीं हिन्दुओं के सामने भी यह सवाल लोकतंत्र के नाम पर गुम कर दिया जाता है कि आखिर गंगा-जमुनी तहजीह का जिक्र करने वालों के ही दौर में ही यूपी में सबसे ज्यादा दंगे क्यो हुये। और क्या दलित। क्या मुस्लिम। क्या ओबीसी। और क्या ऊंची जाति। घायल हर कोई हुआ । और लाभ सियासत ने भरपूर उठाया। ऐसे में कोई ये कहे कि यूपी चुनाव तीन चेहरे अखिलेश, मायावती और मोदी पर जा टिका है तो फिर समझना होगा कि यूपी का सच ये तीन चेहरे नहीं बल्कि वोटबैंक में बांटे जा चुके यूपी के लोग हैं। जो गरीबी मुफलिसी में रहते हैं तो दलित कहलाते हैं। और उनकी तादाद 22 फीसदी है। जो सत्ताधारियो की किसी दंबग जाति से या फिर दलितों से जुड़ जाते हैं तो सत्ता की टोपी भी उछाल सकते हैं और सत्ता को टोपी पहना भी सकते हैं, वह मुसलमान करार दिये जा चुके हैं। जो 19 फीसदी हैं और जो दंबग है वह यादव हैं। उनकी तादाद है तो महज 8 फीसदी लेकिन सत्ता समीकरण में कही ओबीसी तो कही मुस्लिमो को साथ लेकर सोशल इंजिनियरिंग को ही सत्ता में बदलने की काबिलियत मुलायम ने दिखायी। और बिखरा हुआ ओबीसी 40 फीसदी तो बिखरी हुआ ऊंची जातियां 19 पिसदी होकर भी यूपी की बिसात पर प्यादा तो दूर हर चुनाव में रेगती नजर आई। और अक्सर कहा जाता है कि दंगों में ही पता चलता है कि आप कितने अकेले हैं और आपको क्यो समुदाय के साथ होकर वोट बैंक में बदल जाना चाहिये।

तो यूपी इसकी भी नायाब प्रयोगशाला है । क्योंकि चुनाव के मैदान में जा चुके यूपी का ये सच कितना डराने वाला है कि सांप्रदायिक हिसंसा में यूपी हर दूसरे दिन जलता नजर आया । 2013 से 2016 के दौर में यानी 1400 दिनो में जिस राज्य ने 700 घटनायें ऐसी देखी, जिसमें कही मुस्लिम तो कही हिन्दू। तो कहीं दलित तो कहीं ओबीसी और कही ऊंची जातियों के लोग । आहत हर कोई हुआ। क्योंकि 2013 में 247 घटनाये जिसमें 77 मौत हुई । तो 2014 में 133 घटनायें जिसमें 26 मौत । 2015 में 155 घटनाये जिसमें 22 मौत । और 2016 में 162 घटनाये जिसमें 29 मौत हो गई। और राज्यभर के दो हजार से लोग घायल हुये। यानी सवाल ये नही है कि कि हर जेहन में मुजफ्फरनगर दंगों और मथुरा कांड की याद इसलिये ताजा है क्योंकि ये राजनीतिक बिसात पर वोटों का खेल बना बिगाड़ सकता है। मुश्किल ये है कि यूपी के सामाजिक आर्थिक ताने बाने में ये सवाल दूर की गोटी हो चला है। इसीलिये सांप्रदायिक हिंसा का एक भी आरोपी दोषी साबित क्यों नहीं हुआ। दंगों के एक
भी आरोपी को सजा क्यो नहीं हुई कोई नहीं जानता। दंगों के पीडितों को कोई राहत क्यों नहीं मिली। और अब चुनाव में ही हर कोई राहत का जिक्र करने भी हिम्मत भी कैसे दिखा पा रहे हैं। क्योंकि सांप्रदायिक हिंसा के दायरे में अगर यूपी के सच को ही परख लें तो 20 करोड़ की जनसंख्या वाले राज्या में करीब 6 करोड की आबादी सांप्रदायिक हिंसा से प्रभावित हुई। लेकिन सियासी बिसात पर अगर यूपी को बांटा जा चुका है तो फिर हर कोई कैसे अकेला है ये पश्चिमी उत्तर प्रदेश के फगुना गांव में झांक कर देखा जा सकता है। पेशे से लुहार शकुर अहमद का गांव में इकलौता मुस्लिम परिवार है,जबकि दंगों से पहले गांव में 2500 मुस्लिम परिवार थे। लेकिन-दंगों के बाद कोई परिवार वास लौटने की हिम्मत नहीं जुटा पाया और सरकार उन्हें ये भरोसा नहीं दिला पाई कि अब कुछ नहीं होगा। जाहिर है ये दर्द हिन्दुओं का भी है । उनके भीतर भी आक्रोश है । जिन्होंने 2013 में मुज्जफरनगर दंगों में अपने घरों को जलते हुये देखा। यानी गुस्से में यूपी हो सकता है। लोगों के भीतर आक्रोश हो सकता है। लेकिन सियासत तो मुस्कुराती है। उसे पता है लखनऊ का रास्ता दिल्ली ले जायेगा। लेकिन यूपी के गांव गांव, शहर शहर आहत लोगों का पता है उनका. रास्ता उनके अपने चारदीवारी में ही कैद रखेगा।

Wednesday, January 25, 2017

गणतंत्र का लोकतंत्र जिन्दाबाद

संविधान लागू होते ही लोकतंत्र के जिस पाठ को देश ने पढ़ा, वह वोट देने कीबराबरी का ही था। 1950 में 17 करोड 32 लाख,12 हजार, 343 वोटर थे तो आज यानी 2017 में 83 करोड 40 लाख 82 हजार 814 वोटर हो चुके हैं। यानी दुनिया के सबसे बडे लोकतांत्रिक देश होने का तमगा लिये भारत का अनूठा सच ये भी है कि अपनी सत्ता खुद चुनने वाले देश में सत्ता ने चुनने वालो को ही जाति धर्म से लेकर महिला-युवा और गरीब-रईस में भी बांटा। अपना संविधान अपनी सरकार थी तो भी संविधान में दर्ज लोकतंत्र की धज्जियां जमकर उड़ायीं गईं। आपातकाल तो18 महीने रहा। लेकिन बरस दर बरस संसदीय चुनावी लोकतंत्र के राग को देश में हर सत्ता ने कुछ इस तरह गाया कि कि संविधान में दर्ज जनता के हक को देने या छिनने की राजनीति चुनावी मेनिफेस्टो में सिमट गई। और देश इतना गरीब होता चला गया कि 2017 में 1950 के हिन्दुस्तान से दोगुने नागरिक गरीबी की रेखा से नीचे खड़े नजर आये। शिक्षा-हेल्थ-पीने का पानी भी मुनाफे के धंधे में समा गया। खेती से उघोग और उघोग से खनिज संसाधनों की लूट सबसे बडी कमाई बन गई। लेकिन सत्ता उसी को मिली जिसने भूखी जनता
का पेट भरने का नारा दिया।

तो लोकतंत्र की ताकत गरीबी में समायी। और सत्ता रईसी की कुर्सी बन गई। देश के संसधानो की लूट में गरीबों की हिस्सेदारी नहीं मिली। गरीबों के लिये पैकेज और कल्याण योजनाओं से होते हुये चुनावी मेनीफेस्टो ने भूखे भारत की तस्वीर ही राज्य दर राज्य रखी। वह भी सत्ताधारियो ने। इसी बार पंजाब में अकाली 10 बरस की सत्ता के बाद भी आटा, चावल गेंहू, दूध ही बांटते नजर आये और यही हालत 5 बरस सत्ता में रहने के बाद समाजवादी अखिलेश यादव की भी रही। तो सत्ता ने गरीबी बरकरार रखकर गरीबों को अपनी सत्ता पर आश्रित किया। और गरीबों ने लोकतंत्र के राग तले संविधान में दर्ज अपने अधिकार को ही जीने की न्यूनतम जरुरत पाने के लिये सत्ता तले बंधक मान दिया। असर इसी का हुआ कि नेहरु से लेकर मोदी तक के दौर में 60 फिसदी गरीब सबसे बडा एकमुश्त वोटर हो गया। तो 60 फिसदी संपत्ति-संसाधनों के मालिक बहुराष्ट्रीय कन्ज्यूमर हो गये। और सत्ताधारियों ने रईसी को निसाने पर लेकर खुद को गरीब से जोड़कर दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश का नेता खुद को मान लिया। लेकिन लोकतंत्र के इस मिजाजमें सत्ता पाने के लिए प्रचार प्रसार की चकाचौंध में पानी की तरह पैसा हर किसी ने कुछ बहाना शुरु किया । कि गरीबी सिर्फ चुनावी नारो में सिमटी और विकास शब्द लोकतंत्र पर भारी लगने लगा। और ऐसे में वोट के लिये नेताओं की जुबां जिस तरह कभी महिलाओं की खूबसूरती पर चोट तो कभी वोट और महिलाओं का घालमेल। किसी को तड़ीपार कहना तो किसी को करप्ट कहना। किसी को चोर तो किसी को डकैत तक कहना। तो क्या ये माना जाये कि गणतंत्र के लोकतंत्र में ये बोली वोट के लिये है।

ये अंदाज सत्ता पाने या गंवाने की उम्मीद बनने या टूटने के है। या फिर लोकतंत्र का मिजाज सत्ता पाने के लिये अब इतना अराजक हो चला है कि मर्यादा टूटेने का खतरा नहीं है बल्कि समाज की मर्यादा कौन कैसे कितने विभत्स तरीके से हवा में उछाल सकता है भीड़ उसी के हिस्से में आयेगी क्योंकि सवाल वोट बैक का है। और वोट भीडतंत्र से समेटे जा सकते है लोकतंत्र से नहीं। तो क्या जिस संसदीय चुनाव को संविधान लागू होने के बाद लोकतंत्र का सबसे बडा ककहरा माना गया वह मौजूदा वक्त में लोकतंत्र से ही दूर हो चला है। ये सवाल इसलिये क्योंकि एक तरफ गरीबी और भूखमरी देश की राजनीति को सत्ता तक पहुंचाती हैं। दूसरी तरफ चुनाव जीतने के लिये सबसे ज्यादा धन प्रचार प्रसार की चकाचौंध में ही बहाया जाता है। अगर यूपी के चुनाव को ही तोल लें। तो एक तरफ 12 करोड़ गरीब पिछड़े हाशिये पर जी रहा यूपी है। दूसरी तरफ करोड़ों-अरबों का प्रचार है। और प्रचार के आइडिया देने वाले करोड़ों ले रहे हैं। यानी सत्ता पाने के लिये सत्ताधारियों की कवायद को देख लीजिये। लखनऊ में चुनाव जीतने के लिये समाजवादियों का ये वार रुम हर आधुनिक तकनीक से लैस है। कमरे से ही पूरे यूपी के प्रचार पर नजर रखी जा सकती है। यही से चुनाव जीतने वाले नारे निकलेंगे। यानी
गरीबों को कैसे नारो और चकाचौंध से लोकतंत्र में गुम कर दिया जाये, इसके व्यवस्था वार रुम में से होगी। तो याद कीजिये 2014 के लोकसभा में भी मोदी का वार रुम कितना आधुनिक था। अत्याधुनिक तकनीक से लैस प्रचार प्रसार में तो पहली बार देश ने नेता की मौजूदगी को वर्चुअल पर देखा। यानी नेता नहीं है लेकिन नेता है। जो गरीबी पर बोल रहा है। जो करप्शन और कालेधन पर बोल रहा है। तो सवाल सिर्फ तकनीक या पढ़े लिखे लोगों का चुनाव जीतवाने का ठेका लेने वाले प्रचार तंत्र का नहीं है। सवाल तो लोकतंत्र का है। और लोकतंत्र कैसे इजाजत दे सकता है कि प्रचार में तीस हजार करोड़ फूंक दिया जाये। ये रुपया किसका है। कहां से आया है। कोई नहीं जानता क्योंकि एडीआर की रिपोर्ट ने कल ही जानकारी दी कि कांग्रेस हो या बीजेपी, समाजवादी पार्टी हो या अकाली दल। हर कोई अपने चंदे को छुपाता है। और औसतन हर राजनीतिक दल 60 फीसदी रकम बताते ही नहीं कि उनके पास फंड आया कहां से। तो वजह भी यही है कि मूल मुद्दों से इतर अब नेता इस जुबा पर उतर आये हैं। और देश की बहस इन्हीं मुद्दों में गुम हो चली है।

Thursday, January 19, 2017

लूट-घूस की सत्ता तले स्कूली बच्चो की मौत

इतनी खूबसूरत दुनिया के लिये भगवान तुम्हारा शुक्रिया / भोजन देने के लिये भगवान तुम्हारा शुक्रिया /पक्षी का इतना सुंदर गीत सुनाने के लिये भगवान तुम्हारा शुक्रिया / हर चीज जो तुमने दी भगवान उसका शुक्रिया


पहली कक्षा में इस कविता को पढ़ने वाला बच्चा अब इस दुनिया में नहीं है। सड़क किनारे जमीन पर बिखरे किताब कॉपी। टिफिन बाक्स। बस्ते में उस बच्चे के मांस के लोथडे भी हैं, जो किताबो को पढ़ पढ़ कर भगवान की बनायी दुनिया में जीने और बड़े होने के सपनों को जीता रहा। और इस कविता के जरीये भगवान को शुक्रिया कहता रहा जिसने जमी, आसमान, पक्षी बनाये। वातावरण में ही जिन्दगी के रस को घोल दिया। लेकिन इस बच्चे को कहां पता था जो किताबों में लिखा हुआ है। या जिन कोमल हाथों से पन्नों को उलटते हुये वह मैडम के
कहने पर भगवान तुम्हारा शुक्रिया कर अपने सपनो को जीता उसे इतनी खौफनाक मौत मिलेगी जो भगवान ने नहीं बल्कि भगवान बन देश चलाने वालों ने दी। हर बैग के भीतर ऐसी ही किताब -कापी में दर्ज बच्चों के सपने हैं। वह सपने जिसे बच्चो ने पालना और सीखना ही तो शुरु किया था। और अंधेरे में उठकर मा बच्चे के टिफिन को भरने में लग जाती तो बाप स्कूल यूनिफार्म पहनाने से लेकर किताब-कापी को सहेज सहेज कर बैग में ऱखता। गले में टाई लटकाता। जूतो के फीते बांधता । लेकिन सडक पर बिखरे इस मंजर ने सिर्फ मां बाप के दिलो में ही सन्नाटा नहीं बिखेरा बल्कि उस अपराधी समाज के समाने अपनी बेबसी को भी रो रो कर घो दिया, जिसने नियम कायदो को ताक पर रख भगवान को शुक्रिया कहने तक की स्थिति की हत्या कर दी। तो क्या ये हादसा नहीं हैं। ये महज कोहरे में लिपटे वातावरण की देन भी नहीं है। ये सिर्फ बच्चों की मौत नहीं है। ये उस व्यवस्था का खौफनाक चेहरा है, जो हर रुदन को लील लेने पर हमेशा आमादा रहती है। क्योंकि बस बिना परमिट के चल रही थी। ट्रक अवैध रुप से बालू ले जा रहा था। स्कूल बंद करने के आदेश के बावजूद चल रहा था। गांव में अस्पताल नहीं सामुदायिक हेल्थ सेंटर था। तो क्या मौत होनी ही थी। और ऐसी ही कई मौत का इंतजार हर मां बाप को ये जानते समझते हुये करना ही होगा। क्योंकि सिस्टम प्राईवेट स्कूल के अलावे कुछ दे नहीं सकता। प्राईवेट स्कूल मुनाफे की शिक्षा के अलावे कुछ देख नहीं सकते। मुनाफे तले कही बसो के परमिट घूस देकर दब जाते है। या घूस देकर बच निकलते हैं। अवैध खनन के बाद बालू को लेजाते ट्रक भी घूस देकर सडक पर सरपट दौडने का लाइसेंस पा लेते है । और जब टुर्धना हो जाये तो बिना इन्फ्रास्ट्रक्चर के जीते गांव दर गांव में इलाज के लिये अस्पताल तक नहीं होता। तो ये हादसा नहीं। हत्या है ।

ये वातावरण का कोहरा नहीं । सिस्टम और सियासत पर छाया कोहरा है। ये सिर्फ बच्चों की मौत नहीं बल्कि विकास के नाम पर होने वाली सियासत की मौत है। और मां-बाप की रुदन महज बेबसी नहीं बल्कि सत्ता के भगवान होने का खौफ है। और संयोग ऐसा है कि जिस लखनऊ की सियासत को साध कर दिल्ली की सत्ता पर काबिज होने का ख्वाब सिस्टम साधने वाले नेता पाले हुये है। उस दिल्ली लखनऊ के ठीक बीच एटा के अलीगंज ब्लाक का असदपुर गांव है। और हर कोई इस सच से आंख मूंदे हुये है कि यूपी में 20 हजार प्राइवेट स्कूल बिना पूरे इन्फ्रास्ट्रक्चर के चलते हैं। 12 हजार सरकारी स्कूल तो बिना ब्लैक बोर्ड बिना पढे लिखे शिक्षक के चलते है। 30 हजार से ज्यादा ट्रक अवैध बालू ढोते हुये यूपी की सडको पर सरपट दौडते है । सड़क पर सुरक्षा के नाम पर पुलिस की तैनाती होती ही नहीं। और सडक पर अवैध तरीके से सिर्फ ट्रको से अवैध वसूली की रकम सिर्फ यूपी में हर दिन की 8 लाख रुपये से ज्यादा की है। और बिना परमिट दोडते स्कूल बसों से वसूली हर महीने की 50 लाख से ज्यादा की है । इतना ही नहीं प्राइवेट स्कूल खोलने के लिये जितनी जगहो से एनओसी चाहिये होता है, उसमें स्कूल खोलने वाले जितनी घूस अधिकारियों से लेकर पुलिस और नेताओं को देते है वह प्रति स्कूल 40 लाख से ज्यादा का है। यानी सरकारी स्कूल खोलने का बजट 2 लाख और प्राइवेट स्कूल खोलने के लिये घूस 40 लाख । तो कौन सा सिस्टम कौन सी सरकार इस तरह बच्चो की मौत पर मातम मनाती है। ये सोचने का वक्त है या पिर समझने का कि बच्चो ने तो जिन्दगी देने के लिये भगवान का शुक्रिया करने वाला पाठ पढ़ा। लेकिन अपने अपने कठगरे में सत्ताधारियों ने भगवान बनने के लिये ये मौत दे। और 24 बच्चो की मौत का कोई दोषी नहीं।


Wednesday, January 11, 2017

अंधेरे में रौशनी की खोज करता हिन्दुस्तान

कोई कह रहा है-आर्थिक इमरजेन्सी । तो कोई फाइनेंशियल इमरजेन्सी तो कोई सुपर इमरजेन्सी भी कहने से नहीं चूक रहा है । तो क्या 1975 के आपातकाल के आगे के दौर को मौजूदा वक्त के खांचे में देखा जा रहा है । या फिर नोटबंदी प्रधानमंत्री मोदी का ऐसा राजनीतिक मास्टरस्ट्रोक है, जिसके दायरे में हर राजनीति सिमट गई है और हर तरह की राजनीति के केन्द्र में प्रधानमंत्री मोदी आ खड़े हुये हैं। या फिर इमरजेन्सी शब्द को विपक्ष अब इस तरह क्वाइन कर रहा है, जिससे इंदिरा गांधी की इमरजेन्सी के सामानांतर मोदी की इमरजेन्सी घुमडने लगे। याद कीजिये इमरजेन्सी के खिलाफ जेपी के संघर्ष को खारिज करने के लिये इंदिरा गांधी विनोबा भावे की शरण में गई थीं। और जेपी ने जब संपूर्ण क्राति का आंदोलन छेड़ा तो विनोबा भावे से कागज पर इमरजेन्सी को इंदिरा गांधी ने अनुशासन पर्व लिखवा लिया। लेकिन मौजूदा वक्त में ना तो जेपी सरीखा कोई संघर्ष है और ना ही नैतिक बल लिये विनोबा भावे । और 1975 में तो संघ परिवार भी जेपी के पीछे जा खडा हुआ था । और जिस बीजेपी के पास मौजूदा वक्त में सत्ता हैा उनके तमाम नेता इंदिरा की इमरजेन्सी में संघर्ष करते हुये ही पहचान बना पाये । तो क्या मौजूदा वक्त में जब कांग्रेस से लेकर ममता और मायावती से लेकर अखिलेश या केजरीवाल भी नोटबंदी के दायरे में इमरजेन्सी शब्द का जिक्र कर रहे हैं तो तीन सवाल हैं।

पहला क्या इमरजेन्सी शब्द मोदी की सत्ता के साथ टैग करने भर का सवाल है । दूसरा, क्या इमरजेंसी शब्द के जरीये भ्रष्टाचार और कालेधन को दबाना है । तीसरा , क्या इमरेन्सी शब्द के जरीये ही राजनीतिक सत्ता पलटी जा सकती है । जाहिर है तीनों हालात राजनीति कठघरा ही बनाते हैं। लेकिन जब इक्नामिक इमरजे्न्सी का जिक्र देश में चल पडा है तो याद कीजिये 1974-75 में इंदिरा गांधी के करप्शन के खिलाफ ही जेपी ने संघर्ष छेडा था । और मौजूदा वक्त में सत्ता के करप्शन का सवाल सुप्रीम कोर्ट के दायरे में ही खारिज हो रहा है । यानी एक वक्त जैन हवाला के पन्नों पर आडवाणी ने इस्तीफा दे दिया । तो सहारा-बिरला के दस्तावेजों को सुप्रीम कोर्ट ने नहीं माना । राजनीति में भी नैतिकता गायब हो गई । तो क्या करप्शन की परिभाषा भी मौजूदा दौर में बदल रही है । या करप्शन के खिलाफ कोई भी कार्रवाई राजनीतिक तौर इमरजेन्सी शब्द से जोडना आसान है ।मसलन ममता की सत्ता पर करप्शन के लगे दाग पर सीबीआई की कार्रवाई के खिलाफ टीएमसी राष्ट्रपति से मिलकर लौटती
है तो सुपर इमरजेन्सी शब्द उछालती है।

तो क्या नोटबंदी से मुश्किल में आती मोदी सरकार के सामने अब चुनी हुई सत्ता के करप्शन के खिलाफ कार्रवाई कर अपनी छवि साफ रखना जरुरी हो चला है । यानी इमरजेन्सी के हालात राजनीतिक टकराव के उस मुहाने पर देश को ले जा रहे है जहा अच्छे दिन का मतलब होता क्या है इसे हर कोई मिल जाये । और इसीलिये 2014 में अच्छे दिन का सपना मोदी ने दिखाया । क्योंकि मनमोहन की सत्ता भ्रष्ट हो चली थी । और 2017 की शुरुआत ही राहुल गांधी ने अच्छे दिन का सपना 2019 तक के लिये मुल्तवी कर दिया जब कांग्रेस सत्ता में आ जायेगी । तो क्या इमरेजन्सी शब्द के बाद अच्छे दिन का नारा भी एक ऐसा शब्द हो चुका है जो राजनीति सत्ता को चुनौती
दे सकता है । या फिर 2014 में जिन शब्दों ने सत्ता पलट दी अब वही शब्द सत्ता के लिये गले की हड्डी बन रहे है । या फिर अच्छे दिन की परिभाषा अपनी सुविधानुसार सत्ता और विपक्ष दोनों ही गढ रहे हैं। चिदंबरम घातक
मानते है तो जेटली एतिहासिक कदम । दोनों ही वित्त मंत्री । एक ही देश के लिये देखने का दो नजरिया है । तो ऐसे में सवाल इक्नामी का नही सियासत का ही ज्यादा होगा । और सियासत की इस चौसर में -कौन सा पांसा किस राजनीतिक दल को लाभ दे दें। या -कौन सा पांसा पंरपारिक राजनीति को ही उलट दें । या फिर कौन सा पांसा राष्ट्रनिर्माण के सपने तले वर्ग संघर्ष के हालात पैदा कर दें । यानी गरीबों के लिये इक्नामी में कौन सी भागेदारी रोजगार पैदा करती है इसका कोई विजन आजतक किसी सत्ता ने नहीं बताया । किसान को लागत से
ज्यादा देने का वादा सरकार क्यों नहीं कर पाती ये भी अबूझ पहेली है । और देश में असमानता की खाई कैसे कम होते हुये खत्म हो इसकी कोई दृश्टी किसी उक्नामिक प्रयोग में या बजट में उभर नहीं पाती है । तो क्या देश में अच्छे दिन शब्द भी सियासी सपने से ज्यादा कुछ नहीं है । क्या अच्छे दिन की चाहत में सिर्फ सत्ता बदलने का ख्वाब पालना देश का फेल होना है । क्योंकि अच्चे दिन का जिक्र चाहे 2014 में हुआ हो या 2017 में । दोनों
हालातों में ये समझान भी जरुरी है कि देश के संस्धानों को ही राजनीतिक सत्ता ने 2014 से पहले मनमोहन सिंह ने हड़पा और अब मोदी सरकार हडप रही है । और बीजेपी 2014 तक ये आरोप लगा रही थी । तो काग्रेस अब ये आरोप लगा रही है । यानी अच्छे दिन लाने के लिये देश में जिन संस्थानों को काम करना है दजब उन्ही संस्थानो का राजनीतिकरण राजनीतिक मुनाफे के लिये कर दिया जाता हो तो फिर अच्छे दिन किसके आयेगें । जाहिर है जनता के लिये तो अच्छे दिन हर सत्ता में मुश्किल है । और शायद उलझन इसी को लेकर है कि रास्ता देश का
सही है कौन सा । क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिस वक्त कारपोरेट के बीच बैठकर गुजरात वाइब्रेंट समिट में नीतियों और अर्थव्यवस्था में आमूलचूल बदलाव की वकालत कर रहे थे उस वक्त सिंगूर के किसान खासे खुश थे
कि अब उन्हे अपनी जमीन मिल जायेगी । तो क्या जिस बाजार इक्नामी के दायरे में एसईजेड बनाने की बात मनमोहन सिंह के दौर में हो रही थी । और जिस वक्त नैनो कार को सिंगूर में जगह नहीं मिली उसे गुजरात में जमीन तब सीएम रहते हुये मोदी ने ही दी । और अब सु्परीम कोर्ट ने जब 7 राज्यो को सेज पर नोटिस दे दिया है तो क्या इक्नामी का रास्ता हो क्या देश इसी में जा उलझा है । क्योकि एक तरफ वित्त मंत्री अरुण जेटली अपने ब्लॉग में लिखते है मोदी ने नोटबंदी के जरिए अर्थव्यवस्था में पीढ़ीगत बदलाव कर दिया है। और दूसरी तरफ दुनिया की तीन बड़े रेटिंग एजेंसियों में एक " फिच " ने कल ही कहा है कि बड़े फायदे के लिए कुछ देर का परेशानी का सरकार का दावा अनिश्चित है । तो न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे अखबार ने तो अपनी संपादकीय
टिप्पणी में यहां तक लिख दिया कि, " क्रूरतापूर्वक बनाए और लागू किए गए नोटबंदी के फैसले ने आम लोगों की जिंदगी को काफी कठिन बना दिया है। इसके बहुत कम सबूत हैं कि नोटबंदी से भ्रष्टाचार रोकने में मदद मिली है और ना इस बात की गारंटी है कि इस तरह के क्रियाकलापों पर भविष्य में रोक लग पाएगी,जब सिस्टम में कैश वापस आ जाएगा। और नोटबंदी के फैसले से देश की अर्थव्यवस्था पर प्रभाव पड़ा है। " तो बाईब्रेट गुजरात के जरीये इक्नामी को समझा जाये । या नोटबंदी से ढहती बाजार इक्नामी को सही माना जाये ।क्योंकि सच यही है किनोटबंदी से दिसंबर में वाहनों की बिक्री 18.66 फीसदी गिर गई। ये 16 साल में सबसे बड़ी गिरावट है । जनवरी से मार्च में बिजनेस कॉन्फिडेंस 65.4 दर्ज हुआ,जो आठ साल में सबसे कम है । दिसंबर तिमाही में 8 बड़े शहरों में घरों की बिक्री 44 फीसदी गिरी,जो आठ साल में सबसे कम है । डॉलर के मुकाबले रुपया मोदी सरकार के काल में सबसे निचले स्तर को छू रहा है । असंगठित क्षेत्र के 14 करोड़ लोगों के सामने रोजगार का संकट पैदा हुआ है,जिन्हें नौकरी वापस दिलाने को लेकर फिलहाल कोई योजना सरकार के पास नहीं है । यानी नोटबंदी के बाद के हालात ने नया सवाल ये तो खडा कर ही दिया है कि आखिर इक्नामी के रास्ते बाईब्रेट गुजारात की
चकाचौंध पर चलेंगे । या नोटबंदी के अंधेरे के बाद रोशनी आयेगी । या फेल होते सेज तले आखिर में देश को कार या सरकार पर नहीं किसानी पर ही लौटना पडेगा ।

Tuesday, January 10, 2017

जय जवान जय किसान का नारा कैसे लगायें

अजीब संयोग है कि 11 जनवरी को देश के उसी प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की पुण्यतिथि है, जिसने देश को जय जवान जय किसान का नारा दिया। और शास्त्रीजी की 51वीं पुण्यतिथि के मौके पर ये सवाल उठ रहा है कि सीमा पर तैनात जवान को भी सूखी रोटी और नमक-हल्दी में रंगे पानी में दाल मिलती है और हर पांच घंटे में एक किसान खुदकुशी क्यों कर लेता है। तो कोई भी कह सकता है कि जय जवान जय किसान का नारा चाहे हिन्दुस्तान की रगों में आज भी दौ़ड़ता हो। और साढे तीन लाख जवानों की तादाद बीते 70 बरस में बढ़कर 47 लाख हो चुकी। और इसी तरह किसानों की तादाद भी 11 करोड़ से बढ़कर चाहे आज 21 करोड़ हो चुकी हो। लेकिन सच यही है ना तो जय जवान का नारा लगाते हुये बीते 70 बरस के दौर में कभी जवानों की जिन्दगी की भीतर झांकने की कोशिश किसी भी सरकार ने की और ना ही किसान को राहत पैकेज से आगे बढ़ाने की कोई
कोशिश बीते 70 बरस के दौर में किसी सरकार ने की। प्रति दिन प्रति जवान के भोजन पर 100 रुपये सरकार खर्च करती है। और प्रति किसान की औसत आय देश में प्रति दिन 40 रुपये से आगे बढ़ नहीं पायी है। यानी दुनिया के सबसे बडा लोकतांत्रिक देश के भीतर का सच कितना डराने वाला है, ये इससे भी समझा जा सकता कि एक तरफ किसान पीढ़ियों से पसीना बहाकर देश को अन्न खिला रहा है और जवान सीमा पर प्रहरी बनकर पिढियो से देश की रक्षा कर रहा है लेकिन जब आर्थिक-सामाजिक दायरे में जय जवान जय किसान का जिक्र होता है तो दोनों के ही परिवार गरीबी की रेखा के सामानातंर खडे नजर आते है । क्योकि देश में असमानता की खाई इतनी चौड़ी है कि एक तरफ औसतम प्रति व्यक्ति प्रति दिन आय 295 रुपये बैठती है। जबकि 35 रुपये रोज के दायरे देश के 37 करोड़ नागरिक आ जाते है।

और ऐसा नहीं है कि सरकारें समझती नहीं। चाहे सत्ता हो या विपक्ष। दोनों की बातो को सुनिये तो आप महसूस करेंगे कि गरीबों की किसान-मजदूरों के हालात भी सत्ता को पता है। और देश की संपत्ति चंद हथेलियों में सिमटी हुई है ये भी विपक्ष को पता है। बावजूद इसके ना जवान की हालत ठीक होती है ना किसान मालामाल होता है। तो ये समझना जरुरी है कि किसी भी सरकार ने बेसिक इन्फ्रास्ट्रक्चर पर कोई काम किया भी है या नहीं। क्योंकि जवानों का वेतन नौ हजार रुपये पार नहीं करता और किसानों की आय छह हजार से ज्यादा होती नहीं। और बीते 70 बरस के दौर में किसानी गले की फांस बनती है । तो किसान का बेटा ही सेना में जवान के तौर पर जाकर सीमा की रक्षा करता है। आंकडें बताते है कि सेना में 72 फिसदी जवान किसान परिवार से ही आते हैं। और संयोग देखिये पुंछ में तैनात जिस जवान ने खाने का कच्चा-चिट्टा मोबाइल में कैदकर देश को दिखा दिया। उसके पिता भी किसान हो और दादाजी सुभाषचन्द्र बोस की सेना में जवान थे। और उसके घर की माली हालात देखकर या सीमा पर तैनाती में मिलती रोटी- दाल देखकर अगर जय जवान जय किसान का नारा लगा सकते है तो लगाईये। लेकिन उससे पहले देश के सच को भी समझ लीजिये और फिर सोचिये कि जस जवान जय किसान तो दूर देश में जब न्यनतम इन्फ्रस्ट्रक्चर किसी भी क्षेत्र में नहीं है तो फिर जवान को कौन देखे या किसान का जिक्र कौन करें । क्योंकि 67 फिसदी जमीन पर सिंचाई होती नहीं। 72 फिसदी गांव में पीने का साफ पानी नहीं। 77 फिसदी देश को 24 घंटे बिजली का इंतजार आज भी है। सिर्फ 12 फिसदी आबादी को ढोने वाला पब्लिक ट्रास्पोर्ट सिस्टम खड़ा हो पाया है। 81 फिसदी आबादी के लिये सरकारी अस्पताल उपब्लध नहीं है। 72 फिसदी शहरी बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते नहीं। न्यूनतम मजदूरी कोई ठेकेदार देता नहीं। रोजगार है नहीं । तो क्या जिस इन्फ्रास्ट्रक्चर पर हर सत्ता को ध्यान को ध्यान देना चाहिये उसने उसी से आंखे मूंद रखी हैं। और नोटबंदी के बाद देश के सोशल इंडेक्स चाहे नीचे चला गया हो।

लेकिन उन हालातों को समझना जरुरी है कि आखिर क्यों नोटबंदी हो या कोई भी आर्थिक नीति देश को एक समान एक हालात में क्यों खड़ा नहीं कर सकती और करप्शन देश की रगों में क्यों दौड़ेगा। मसलन करप्शन भी जरुरत भी जीने के हालात से कैसे जोड़ दिया गया जब सरकार बेसिक इन्फ्रास्ट्रक्चर भी देश को नहीं दे पा रहे है तो सिचाई के लिये पंप चाहिये , बिजली के लिये जेनरेटर-इनवर्टर चाहिये, -इलाज के लिये प्राईवेट अस्पताल चाहिये, शिक्षा के लिये कान्वेंट स्कूल चाहिये , सफर के लिये निजी गाडी चाहिये, मजदूरी के लिये ठेकेदार की गुलामी करने पड़े तो न्यूनत मजदूरी कौन देगा । यानी जब सरकार ही जनता की न्यूनतम जरुरतो को पूरा करना तक अपनी जिम्मेदारी ना मान रही हो तब होगा क्या टैक्स चोरी,करप्शन ,ज्यादा कमाई के लिये किसी भी हद तक जाने की चाहत और देश के मिजाज में जब ये हालात जुड जायेंगे तो क्या सेना भी इससे अछूत रह पायेगी। ये सवाल इसलिये क्योकि जिस जवान ने रोटी-दाल के सच को उभारा उस रोटी दाल के पीछेका सच ये भी है कि सेना के लिये तो आर्मी सप्लाई कोर है। लेकिन पैरा मिलिट्री फोर्स के लिये गृह मंत्रालय हर सेक्टर को बजट की रकम देता है। यानी जवान जब सिनियर अधिकारियों की लूट का जिक्र कर रहा है। तो साफ है कि हर सेक्टर में बटालिनों के जवानो के लिये जो बजट आता है। उस बजट से अनाज खरीद हर सेक्टर के अधिकारी करते हैं। और सीएजी ने 2010 और 2016 में अपनी रिपोर्ट में सप्लाई की इसी चेन में गडबड़ी का जिक्र किया।