Tuesday, February 17, 2009

“सत्ता सिर्फ बंदूक की नली से नहीं निकलती”

संसदीय राजनीति युवा तबके के जरिए अपनी पस्त पड़ती राजनीति को ढाल बनाना चाहती है। वहीं एक दौर में युवाओं के सपनों को हवा देने वाली वामपंथी समझ थम चुकी है। और इन सबके बीच अपनी जमीन को लगातार फैलाने का दावा करने वाली नक्सली राजनीति के पास वैकल्पिक व्यवस्था का कोई खाका नही है। कुछ ऐसी ही वैचारिक समझ लगातार उभर रही है, जिसमें पहली बार माओवादियों की चिंता अपने घेरे में उभर रही है कि उनकी समूची राजनीति व्यवस्था का बुरा असर उन पर भी पड़ा है। और इसकी सबसे बड़ी वजह विकल्प की स्थितियों को सामने लाने के लिये सकारात्मक प्रयोग की जगह राज्य से दो-दो हाथ करने में ही ऊर्जा समाप्त हो रही है। खासकर पिछड़े और ग्रामीण इलाकों के लोगों को जिन वजहों से सत्तर-अस्सी-नब्बे के दशक तक साथ में जोड़ा जाता था, अब वह सकारात्मक प्रयोग संगठन में समाप्त हो गये है।

वह दौर भी खत्म हो गया जब क्रांतिकारी कवि चेराबंडु राजू से लेकर गदर तक का साहित्य भी आम लोगों की जुबान में आम लोगों की परेशानियों को व्यक्त करता था। जिससे ग्रामीण आदिवासी खुद को अभिव्यक्त करने के लिये आगे आते थे। लेकिन गदर के गीत क्रांतिकारी गीतों की शृंखला में आखिरी साहित्य साबित हुये हैं। फिर जीने की परिस्थितियों में भी लगातार बदलाव हुआ है, इसलिये माओवादियों के सामने सबसे बड़ा संकट यही हुआ है कि वह किस तरह जमीन के सवालों को उठाये जिससे जमीन के लोग उनसे जुड़ते जाएँ।

चूँकि बैठक में एमसीसी और पीपुल्स वार के माओवादियों की मौजूदगी थी, जिनका पाँच साल पहले विलय हो चुका है। लेकिन दोनों ने अपनी जमीन बिहार-झारखंड और आंध्रप्रदेश-महाराष्ट्र की अगुवाई नहीं छोड़ी है, इस वजह से इन्हीं प्रदेशों में आम लोगों को साथ लाने के लिये साहित्य-गीत-कविता की स्थानीय महक को क्रांतिकारी मुलम्मे में चढ़ा कर कैसे रखा जाये, जिससे लोग जिन्दगी के साथ जुड़ते चले जाये - समूची बहस इसी पर आ टिकी। माओवादियों ने चेराबंडु राजू की उन कविताओं का जिक्र भी किया जो चंद लाइनों में व्यवस्था पर सवाल उठाता था। 1965 में लिखी उनकी कविता... मेरा मुकदमा ऐसा नहीं है कि उसका फैसला / काले कोट वालों को नीली करेंसी नोट देकर / किसी एक देस की किसी अदालत में हो जाये / मुझे गवाह के कटघरे में आने दो। या फिर 1968 में लिखी कविता जिसका पाठ उन्होंने तिरुपति के छात्रों के बीच किया था- ऐसी करुणा तेरी, / जो सूखी छाती से चिपकी रहे,/ बच्चों को न दे सके सांत्वना,/ भूखों मरने तक की हालत में, / यह उधार गहनों की चकाचौंध,/ क्या कहना! माँ भारती बोलो तो, / क्या तेरा लक्ष्य है? कैसा आदर्श है? बन्देमातरम्! बन्देमातरम्! नक्सलियों में सवाल यह भी उठ रहा है साहित्य और क्रांति को एक साथ लेकर चलने में स्थितियाँ कब-कैसे बदलती चली गयी, इस तरफ किसी ने ध्यान नहीं दिया।

हाल में साहित्योत्तर स्थितियों को दुबारा जगाने के लिये माओवादियों ने एक संगठन भी बनाया। लेकिन आंध्र प्रदेश के अलावा किसी राज्य में इस संगठन को चलने नहीं दिया गया और साहित्य से ज्यादा उसस जुड़े लोगों को नक्सली मान कर जेल में ठूँसा गया। जिससे हर आगे बढ़ा कदम पीछे हुआ।

माओवादियो की यह बहस उन परिस्थितियों को भी टटोल रही थी कि आखिर जो सरकार एक दशक पहले तक नक्सलवाद को सामाजिक-आर्थिक समस्या के आईने में देखती थी, वही अब आंतकवाद के सामानांतर क्यों देख-समझ रही है। खासकर संसदीय राजनीति को लेकर आम वोटर जब सवाल कर रहा और राजनेताओं को कटघरे में खड़ा किया जा रहा है, तब माओवादियों की पहल किस तरह होनी चाहिये। क्योंकि बढ़ती आंतकवादी हिंसा के दौरान हर तरह की हिंसा को जब एक ही दायरे में रखा जा रहा है, तब कौन से तरीके होने चाहिये जो विकल्प का सवाल भी उठाये और विचारधारा के साथ राजनीति को भी जोड़े। माओवादियो के सामने वैचारिक तौर पर आर्थिक नीतियों को भी लेकर संकट उभरा है।

पिछले डेढ़ दशक के दौरान आर्थिक सुधार को लेकर सरकार पर हमला करने की रणनीति लगातार माओवादियो ने अपनायी। वामपंथी जब यूपीए सरकार में शामिल हुये तो बंगाल में ही माओवादियों ने अपनी जमीन मजबूत की। निशाना आर्थिक नीतियों को लेकर ही रहा। लेकिन आर्थिक नीतियों को लेकर जो फुग्गा या कहें जो सपना दिखाया गया बाजार व्यवस्था के ढहने से वह तो फूटा लेकिन माओवादियों के सामने बड़ा सवाल यही है कि आर्थिक नीतियों ने उन्हें आम जनता के बीच पहुँचने के लिये एक हथियार तो दिया था लेकिन अब विकल्प की नीतियों को सामने लाना सबसे बड़ी चुनौती है। इसका कोई मजमून माओवादियों के पास नहीं है। खासकर जिन इलाकों में माओवादियो ने अपना प्रभाव बनाया भी है, वहाँ किसी तरह का कोई आर्थिक प्रयोग ऐसा नहीं उभरा है, जिससे बाजार अर्थव्यवस्था के सामानांतर देसी अर्थव्यवस्था अपनाने का सवाल उठा हो। यानी खुद पर निर्भर होकर किसी एक क्षेत्र को कैसे चलाया जा सकता है, इसका कोई प्रयोग सामने नहीं आया है। नया संकट यह भी है कि अंतर्राष्ट्रीय तौर पर माओवादी आंदोलनों की कोई रुपरेखा ऐसी बची नही है जो कोई नया कौरिडोर बनाये। नेपाल में माओवादियों के राजनीतिक प्रयोग को लेकर असहमति की एक बड़ी रेखा भी इस बैठक के दौरान उभरी। लेकिन सामाजिक तौर पर माओवादियों के सामने बडा संकट उन परिस्थितियों में अपनी पैठ बरकरार है जहाँ राजनीतिक तौर पर उन्हें खारिज किया जा रहा है। संसदीय राजनीति से इतर किस तरह की व्यवस्था बहुसंख्यक तबके के लिये अनुकूल होगी, माओवादियों के सामने यह भी अनसुलझा सवाल ही बना हुआ है। इसीलिये जो चुनौती सामने है उसमें बड़ा सवाल यह भी उभर रहा है कि दो दशक पहले जिन इलाकों में माओवादियों ने अपना प्रभाव लोगो में जमाया अब उनके सवालों का जबाब देने से ज्यादा सवाल माओवादियों के सामने खुद को टिकाये रखने के हो गये है। इसलिये पहली बार इस असफलता को भी माना गाया कि राजनीतिक क्षेत्र में ट्रेड यूनियन का खात्मा होने से बाजार व्यवस्था के ढहने के बाद शून्यता पैदा हो गयी है। मजदूरों को लेकर एक समूची व्यवस्था जो वामपंथी मिजाज के साथ बरकरार रहती और राज्य व्यवस्था को चुनौती देकर बहुसंख्य्क जनता को साथ जोड़ती, इस बार उसी की अभाव है। पहली बार ग्रामीण और शहरी दोनों स्तर पर राज्य को लेकर आक्रोष है।

पहली बार अशिक्षित समाज और उच्च शिक्षित वर्ग भी विकल्प खोज रहा है। खासकर अपनी परिस्थितियों में उसके अनुकूल नौकरी से लेकर आर्थिक सहूलियत का कोई माहौल नहीं बच पा रहा, तो भी वामपंथी और माओवादियों दोनों इसका लाभ उठाने में चूक रहे हैं। माओवादियों के भीतर पहली बार इस बात को लेकर कसमसाहट कहीं ज्यादा है कि देश का बहुसंख्यक तबका विकल्प तलाश रहा है और दशकों से विकल्प का सवाल उठाने वालों के पास ही मौका पड़ने पर कोई विकल्प देने के लिये नहीं है।

13 comments:

संकेत पाठक... said...

बिल्कुल पुण्य प्रसून जी सत्ता सिर्फ़ बन्दूक की नली से नहीं निकलती, लेकिन इसमे बन्दूक का अहम रोल होता है. जहाँ तक माओवादियों और बहुसंख्यक तबके की बात है, तो अब दोनों अपने अपने विकल्प तलाशने लगे है.

niranjan said...

आज के दौर में सत्ता चलाने के लिए पैसे ,बन्दूक ,और नेता का अन्तिम आदमी जुराब सभियो आवशक हैं. लेकिन दूसरी बात यह भी की नेता बनने के लिए शायद अपराधी हिना भी आवश्यक हैं .becuse every politician is acriminal and every criminal is a politician

Sanjeet Tripathi said...

सही विश्लेषण।
क्या हिंसा विकल्प बन सकता है???

satyendra said...

sahi kaha aapne sar.......

कुमार आलोक said...

सामाजिक तौर पर नक्सल आंदोलन की भूमिका उन जैसों के लिये वरदान साबित हुइ जो समाज के निचली पंक्तियों में बसर कर रहे थे । चारु मजूमदार की बात करें या नक्सलपंथ के जन्म की ..बंगाल से शुरु हुआ इनका आंदोलन बंगाल में ही खत्म क्यूं हो गया ? बिहार में जब इनके पैर फैलें तो इनकी लडाइ जमींदारों से ना होकर सीमांत किसानों से हो गइ । भले ही एमसीसी हो या पीपुल्स वार सबके अपने अपने राजनैतिक आका रहें । चुनावों के परिणामों को अमुक दल की ओर मोडने में नक्सलवाद की अहम भूमिका रही। संसद सूअरबाडा है कुर्सी का बटवारा है का नारा देकर जनता के बीच गया नक्सलवाद का नारा बाद में उसी कुर्सी के लिये घमासान करने लगा। ८९ में आरा से सांसद सीपीआइ माले (आइपीएफ ) के सांसद हुए रामेश्वर प्रसाद । इसी तरह कइ विधायक भी जीत कर बिहार की विधानसभा में पहुंचे । इन्हें भी राजनैतिक मंच की उपयोगिता का अहसास हुआ। बंगाल ,त्रिपुरा और केरल की वामपंथी सरकारों को नक्सलपंथी हमेशा कोसते रहें । उन्हे बुर्जुआ वामपंथी कहते रहे। लालू प्रसाद जब पहली बार मुख्यमंत्री बनें तो उन्होने ऐलान किया कि गरीबों तुम गैरमजरुआ जमीनों पर कब्जा करों पुलीस गोली नही चलाएगी । किने एकड पर जमीन का कब्जा नक्सलियों के पास रहा । पूर्णिया में अजीत सरकार ने सैकडों एकड पर भूमिहीनों के द्वारा जमीनों पर कब्जा किया । क्या हाल हुआ अजीत सरकार का ये सभी जानते है। समाज का मध्यमवर्ग से लेकर खेत मजदूर सभी विकल्प की तलाश कर रहें है लेकिन विकल्प है कहां ..भारत के नक्सल मूवमेंट को नेपाली कम्युनिष्ट पार्टी से सबक लेनी चाहिये ।

Abhishek said...

Naksaliyon ko apne simit prasar par sakaratmak dhang se vichar karna chahiye. Unka hinsa ka formula ab flop ho chuka hai.

PCG said...

नही बाजपाई साहब !
वैसे मैं किसी भी तरह की हिंसा का समर्थन नही करता और मैं भली भांति समझता हूँ कि आपके इस लेख का आशय क्या है, आपका लेख दिनों दिन एक विकराल रूप लेती मावो और नक्श्ली समस्या से है, जिसके लिए वे सभी सामाजिक -आर्थिक कारक जो इस समस्या के साथ मौजूद हैं जिम्मेदार है और जिसके निवारण हेतु भी गंभीरता से प्रयास करना होगा निर्धनता,बेरोजगारी, सामाजिक अन्याय तथा भ्रष्ट राजनैतिक और प्रशासन व्यवथा ही वे मुख्य बीमारीयाँ हैं जिनका उपचार करके इस समस्या से निजात पाई जा सकती हैं और ऐसे कोई कारण नहीं हैं कि हम इस समस्या का हल निकाल नहीं सकते, लेकिन ;

हमारे जैसे लोकतंत्र में, जहाँ लोग आजादी के ६०-६२ सालो के बाद, आज भी बड़ी ईमानदारी के साथ उन गुलामी की रस्मो को निभाते आ रहे है जो कभी अंग्रेजो ने हम पर थोंपी थी, वहाँ पर यह कहना कि सत्ता सिर्फ़ बन्दूक की नली से नहीं निकलती, सरासर एक भूल है ! क्षमा करे, मगर आपने शायद अपना यह लेख स्टूडियो में बैठ कर लिखा है, इसलिए आप ऐंसा कह रहे है ! एक आम नागरिक की हैसियत से ( न्यूज़ रिपोर्टर या पत्रकार की हैसियत से नही) ज्यादा दूर नही, जरा देश की राजधानी दिल्ली से सिर्फ़ ३०-४० किलोमीटर बाहर निकल कर देखिये, आपको पता चल जाएगा कि सत्ता सिर्फ़ और सिर्फ़ बन्दूक की ही नली से निकलती है !

वक्त और परिस्थितियों के हिसाब से बन्दूक की नलिया भिन्न -भिन्न किस्म की हो सकती है, लेकिन टिका सब कुछ बन्दूक की ही नली पर है ! मसलन, बाहुबली नली, मावो नली, बाम नली, नक्श्ली नली, भगवा नली, दलित नली अल्पसंख्यक नली इत्यादि, इत्यादि ! यह कहना भी ग़लत होगा कि यह सब पैसे के बल पर ही चलता है, अगर ऐसा होता तो हमारे देश के पूंजीपति टाटा, बिडला और अम्बानी बंधू का पुरा खानदान सत्ता पर काबिज होता, उनके पास भी अपार धन सम्पदा थी , मगर उनके पास नही थी तो वह थी बन्दूक की नली ! सत्ता पर काबिज राहुल गांधी, सचिन पायलट, सिंधिया इत्यादि- इत्यादि के पास कोई ख़ास योग्यता नही थी कि जो इतनी कम उम्र में सत्ता पर काबिज हो जाते, उन्हें सत्ता पर काबिज किया बन्दूक की नली ने, हमारे सुरक्षा तंत्र की बन्दूक की नलियों ने ! यह इस देश के आम आदमी की अज्ञानता और भ्रम मात्र ही है जोकि निहित स्वार्थो वाले उस बंदूकधारी के बहकावे में आकर कहता है कि देश में लोकतंत्र की, यानि उसकी, उसके लिए, उसके द्वारा चुनी हुई सरकार चल रही है, जो इसे सत्ता तक पहुचने का एक मोहरा मात्र समझता है !

धन्यवाद !
गोदियाल

vipin dev tyagi said...

सवाल ये है कि असल, जमीनें मुद्दे लेकर आज चल कौन रहा है..आदिवासी..गरीब जनता के हक की लड़ाई लड़ने का दम भरने वाले नक्सलियों के तमाम दावों की हवा निकलती जा रही है..उनका आंदोलन जबरन उगाई..गरीबों की पुलिस से रक्षा के नाम पर खाने-पीने,पैसों के इंतजाम से लेकर शोषण तक की खबरें अकसर सामने आती रहती हैं...अगर बात मुख्यधारा की राजनीति की करें..तो कोई भी सियासी दल हो...चाहे धर्म और मंदिर का चोला ओढ़ा हो या...एफडीआई,परमाणु को देश के लिये खतरा बताने वाले लाल ज्ञानी पुरूष ...या फिर खुद को सेक्यलूर, आम आदमी के साथ हाथ पकड़कर खड़े रहने का दम भरने वाले लोग हों..गरीबों के साथ निवाला खाने वाला..विरासत के पंख लगाये फरिश्ता भी जानता है कि सिस्टम को बदल पाना आसान नहीं है...मौजूदा व्यवस्था इतनी जड़ हो चुकी है..कि ना कोई बदलने का माद्दा रखता है..और ना ही कोई खुद को बदलना चाहता भी है..जैसा चल रहा है..सब राम भरोसे...उसी में सब जीये जा रहे हैं...ऱोजमर्रा के नमक-प्याज से फुर्सत नहीं...तो नक्सली आंदोलन...को समझने,जानने,सोचेने,या फिर समाजिक परिवर्तन या स्वंय को बदलने के लिये समय किसके पास है..मुझ जैसे को तो इतना ही समझ में आ रहा है..

Rahul kundra said...

लेकिन फ़िर भी आज-कल उसी को नेता बनने के काबिल माना जाता है जिस पर ज्यादा से ज्यादा क्रिमिनल केस हो।

SWAPNILA said...

VIKALHIN SIRF MAWOWADI NAHI HAI. YE LOKTANTR HAI ,AUR ISLIYE ITANI AAWAJE BHI HAI. UDAHARAN KE TAUR PAR IS LEKH KE SANDARBH ME JITANI BHI TIPPARIA AAI HAI WO SABH ALAG MAT RAKHTI HAI PAR DURBHAGYA KI.. VIKALP INME BHI TALASNE SE NAHI MILEGA. PATA NAHI KYO..PAR AAJ JO BHI LIKHA JATA HAI, MAHAJ LIKHNE KE LIYE. AAJ BHALE HI NAKSLI KARWAHI KO AATANKWADI GATIBIDHIO KE SAMANANTAR RAKHA JAAYE PAR UNKE UDDESY ME JAAYE TO BEJA NAHI HAI. JAGAH BADALTI HAI TO SHAYD NAJRIYA BHI BADAL JAATA HAI AUR YAHI HAL METRO CITY KE LOGO KA HAI. ANYATHA JIS JAMIN PAR AISI GATIBIDHIYA UTPANN HOTI HAI..WAHA KE HALAT AISA KARNE KO LOGO KO MAJBOOR KARATE HAI. MAI UNKA NAM BHUL RAHI HU, PAR WO PRINT MEDIA SE TALOOK RAKHTE THE,YAHI KARIB 70 KE AAS PAS KE HONGE....NAKASAL PRABHAWIT CHETRA KO BYAA KARTE HUYE UNKI AAKHE BHAR AAI THI. UNHONE APIL KI KI ACHHA HOGA YADI HAM NAKSALWAD KO KOSNE KE BAJAY UNKI DASA KO DEKHE, SARKAR KI PRATARANA KO DEKHE, JAHA LOKTANTR HOTE HUYE BHI VOTE DENE KA ADHIKAR CHIN LIYAA GAYA HAI. BADALTE SAMAY ME SABKUCH BADALA HAI TO NAKSALI AANDOLAN KISI AUR DISA ME JA RAHA HAI..TO US PAR AASCHRAYA KAISA. JAB UDDESY HI MAR RAHO HO TO SANGHTAN KE KHADE HONE KA MATLAB RAH NAHI JAATA PAR AB BHI NAKSALI ITANE BEBAS NAHI JITANE KI PRNAB HO GAYE HAI, JINHE KUCH NAHI SUJHA TO YAHI KAH DIA AB SABKUCH AGLI SARKAR PAR, AISI VICHARSUNYATA AUR VIKALPHINTA KAHA HOGI?

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

हाँ! साजिश और बहकावे से भी निकलती है.

Kapil said...

पहली बात यह कि माओ के उद्धरण को अक्‍सर अधूरे संदर्भों के साथ इस्‍तेमाल किया जाता है। सत्‍ता सिर्फ बंदूक की नली से निकलती है। समाज और प्रकृति दोनों में परिवर्तन के लिए बल की जरूरत का सिद्धांत यह बताता है।

दूसरी बात, कि किसी आंदोलन की आलोचना करने से पहले उसके बारे में लोगों को थोड़ा जानना-समझना चाहिए। आज बेशक नक्‍सली आंदोलन गतिरोध का शिकार हो लेकिन उनकी कुर्बानियों या आमूलचूल सामाजिक परिवर्तन के उनके लक्ष्‍य के औचित्‍य से इंकार नहीं किया जा सकता।

उनके गतिरोध के इतिहास भी इस आंदोलन के जन्‍म से ही जुड़ा हुआ है। शुरू से ही इस आंदोलन में दुस्‍साहसवाद और जनदिशा की उपेक्षा की लाईन हावी रही है। नतीजे आज ठहराव के रूप में स्‍पष्‍ट दिख रहे हैं। लेकिन जरूरत से चीजें होती हैं। पूंजीवादी व्‍यवस्‍था बहुसंख्‍यक आबादी को अच्‍छा जीवन देने में विफल हो रही है, इसलिए अगर लोगों को विकल्‍प की तलाश है तो रास्‍ते भी जरूर निकलेंगे।

गुस्ताख़ said...

भारत में वामपंथियों ने अपनी विचारधारा के बीज को ही गलत तरीके से फलने फूलने दिया। वर्ग संघर्ष की बजाय वामपंथियों ने वर्ण संघर्ष को हवा दी और इसी से समस्याएं पैदा हुईं।