Tuesday, October 27, 2009

नक्सली, युद्धबंदी और सरकार

ये पहला मौका है जब माओवादी प्रभावित इलाकों में सरकार के खिलाफ लड़ेंगे और मरेंगे की तर्ज पर ग्रामीण आदिवासियों को तैयार किया जा रहा है। लड़ना सरकार से है और मरना सरकार के हाथों ही है। सरकार का मतलब पुलिस-सेना सबकुछ है। क्योंकि नैतिक तौर पर सरकार के किसी नुमाइन्दे में इतनी हिम्मत है नहीं कि वह ग्रामीण इलाकों में आकर ग्रामीण आदिवासियों के हालात देख सकें। जितनी सेना इन इलाको में भरी जा रही है, जितने आधुनिक हथियारों से लैस सुरक्षाकर्मियों की फौज लगातार क्षेत्र में घुल रही है, उसमें ग्रामीण आदिवासी क्या करें। वर्दीधारियों को आदिवासियों की भाषा समझ में आती नहीं है, उनके लिये सफलता का मतलब हर किसी को माओवादी ठहराकर या तो पकड़ना, मारना है या फिर गिरफ्तार करना है। यह समझने के लिये कोई तैयार नहीं है कि ग्रामीण आदिवासियों की रोजी रोटी कैसे चल रही होगी जब जमीन-जंगल सभी को रौंदा जा रहा है। प्राथमिक अस्पतालों में इलाज कराने गये लोगों को माओवादी बताकर अस्पताल के बदले सीधे थाने और जेल भेजा जा रहा है। यह परिस्थितियां युद्ध सरीखी नहीं है तो क्या हैं ?

यह जबाब लालगढ़ में माओवादियों की कमान संभाले कोटेश्वर राव उर्फ किशनजी का है। जिनसे मैंने सीधा सवाल किया था कि अपहर्त सब-इन्सपेक्टर की रिहायी के वक्त उसकी छाती पर पीओडब्ल्यू यानी प्रिजनर आफ वार यानी युद्दबंदी क्यों लिखकर टांगा गया। 26 महिलाओं की रिहायी के बाद क्या यह माओवादियों की रणनीति का हिस्सा बन गया है। नहीं, ऐसा हमने कभी नहीं कहा। लेकिन आपको यह भी समझना होगा कि बुद्ददेव सरकार ने 26 महिलाओं को क्यों छोड़ा।

महिलाओं पर सिर्फ पेड़ काट कर रास्ते पर डालने और गड्डा खोदने का आरोप है। लेकिन इस आरोप के साथ माओवादियों को मदद देने और पुलिस कार्रवाई में बाधा पहुचाने का भी आरोप है। अगर आप सत्ता में है तो आरोप किसी भी स्तर पर लगा सकते है, बड़ी बात है कि अगर आदिवासी महिलायें सरकार के लिये इतनी ही घातक होती तो सरकार कभी उन्हें रिहा नहीं करती। अगर आप पुलिसवाले का अपहरण कर उसका सर तलवार की नोंक पर रखते है तो सरकार के पास विकल्प क्या बचेगा। ऐसा होता तो अभी तक सरकार का ध्यान अपनी पुलिस के बचाने में जाता । लेकिन नंदीग्राम से लालगढ़ तक पुलिसवालो को जनता के सामने सरकार ने झोंक दिया। दो दर्जन से ज्यादा पुलिस वाल मारे गये हैं। यहा सवाल युद्धबंदी पुलिसकर्मी का नही था बल्कि बुद्ददेव सरकार समझ रही थी कि अगर महिलाओं को माओवादी करार देकर जेल में बंद रखा गया तो ग्रामीण आदिवासियो में और अंसतोष आ जायेगा। सवाल है इससे पहले भी कई मौको पर नक्सली संगठनों ने पुलिसकर्मियों का अपहरण कर स्थानीय तौर पर प्रशासन-सरकार से सौदेबाजी की है , लेकिन यह पहला मौका है कि युद्धबंदी शब्द का प्रयोग किया गया। अस्सी के दशक में जब पीपुल्स वार के महासचिव सीतीरमैया ने आंध्रप्रदेश के सात विधायकों का अपहरण भी किया था तो उस दौर में भी रिहायी के लिये शर्त्ते रखी गयीं, जो पूरी हुई तो विधायकों को छोड़ दिया गया। उस वक्त सीतीरमैया ने कहा था कि अगर जरुरत हुई तो राजीव गांधी का अपहरण भी कर सकते हैं। उस दौर में पीपुल्स वार ग्रुप आंध्रप्रदेश में सिमटा था। लेकिन अपहरण राजनीतिक तौर पर नक्सलियो की रणनीति का हिस्सा हो सकता है, ऐसा बीते दो दशक में सामने आया नहीं। वहीं बिहार में एमसीसी ने भी कभी किसी का अपहऱण कर सरकार से किसी सौदेबाजी को अपनी रणनीति का हिस्सा नहीं बनाया। दोनों नक्सली संगठन अब एक साथ है और साथ होने के पांच साल पूरे होने के बाद झारखंड में जिस तरह एक पुलिसवाले का सर कलम किया गया और बंगाल में युद्दबंदी बता कर रिहायी की गयी उसने सरकार के सामने बडा सवाल खड़ा किया है कि अगर वाकई युद्द सरीखी कार्रवाई करनी पडी तो रेड कारीडोर का सच भी सामने आयेगा और जो विकास की उस जरजर जमीन को ही सामने रखेगा, जहा अभी भी पाषण काल है । तो क्या माओवादी रणनीति के तहत युद्ध की स्थिति पैदा कर रहे हैं। कोटेश्वर राव उर्फ किशनजी के मुताबिक युद्द का मतलब किसी आखरी लड़ाई से नहीं है, बल्कि उन परिस्थितियों को दुनिया के सामने लाना है, जिसके तले ग्रामीण आदिवासी जी रहे हैं। लालगढ़ को ही लें। वहां के बत्तीस गांव और उसके अगल-बगल के करीब पचास से ज्यादा गांव में एक भी स्कूल नहीं है। तीन प्राथमिक स्वास्थय केन्द्र हैं। पीने का साफ पानी तो दूर रोजी रोटी के लिये सरकार की कोई योजना इऩ गांवों तक नहीं पहुंची है। वह संयुक्त फोर्स की आवाजाही ने उस जमीन को भी बूटों तले रौंदना शुरु कर दिया है जिसके आसरे थोडी बहुत खेती होती थी । साथ ही मजदूरी के लिये कही भी आवाजाही गांववालो को बंद करनी पड़ी है क्योंकि गांव के भीतर पहुचने के लिये इन्हीं गांववालों को पुलिस हथियार बनाती है ।

लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में वामपंथी सरकार ने गांव-गांव का रसद-पानी जिस तरह बंद कर दिया है उसमें माड़-भात और आलू ही जब जीने का एकमात्र जरिया हो और अब उसके भी लाले पड़ने लगे हों , तो यह स्थिति उन शहरी लोगों को देखनी चाहिये जो सबकुछ कानून-व्यवस्था के जरिये ही सुलझाना चाहते हैं। असल में सरकार का संकट यही से शुरु होता क्योंकि एक तरफ गृहमंत्री पी चिदबंरम माओवादियों से आखिरी लडाई के मूड़ में हैं, वहीं राहुल गांधी एक देश में बनते दो देश का जिक्र कर माओवादी प्रभावित इलाको में गवरर्मेंस का संकट उभारते हैं। लेकिन सवाल है 12 राज्यों के 127 जिलों के रेडकारीडोर में कमोवेश हर राजनीतिक जल की सरकारें हैं। मसलन, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र में कांग्रेस की सरकार तो कर्नाटक,मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ में भाजपा की सरकार है।

वहीं बिहार में जदयू के साथ बीजेपी सत्ता में है तो उड़ीसा में बीजू जनता दल और बंगाल में वामपंथियों की सरकार है । यानी सरकारों के काम अगर वाकई लाल गलियारे तक नहीं पहुंची है तो इसके लिये किसी एक राजनीतिक दल को दोषी ठहराया भी नहीं जा सकता है। झारखंड में तो राष्ट्रपति शासन है यानी सीधे केन्द्र सरकार की निगरानी में है , लेकिन माओवादियो की सबसे बर्बर स्थिति झारखंड में ही उभर रही है । असल में राहुल गांधी की सोच गलत है भी नहीं कि गवर्मेंस फेल हो रहा है । सत्ता शहरों में सिमट गयी है । गरीब या ग्रामीणों को मौका नही मिलता है। लेकिन यह सोच अगर सही है तो सवाल मनमोहन सरकार पर उठेंगे। तब उनकी सोच को लागू करने निकले चिदबंरम की आखिरी लड़ाई भी बेमानी लग सकती है । यूं भी अगर सामाजिक आर्थिक नजरिये से अगर माओवादी प्रभावित इलाकों को देखे तो मुख्यधारा से कितनी दूर है यह , इसका अंदाज प्रतिव्यक्ति आय से भी लग सकता है । देस में प्रतिव्यक्ति आय 2800 रुपये प्रतिमाह है लेकिन लाल गलियारे में औसतन प्रतिव्यक्ति आय 1200 रुपये प्रतिमाह है । करीब तीन करोड़ ग्रामीणों का पलायन बीते एक दशक में इन क्षेत्रों में काम ना मिलने की वजह से हुआ है। यानी रोजी रोटी की तालाश में इतनी बडी तादाद जिला मुख्यालयों या शहरों में चली गयी। तो सरकारी योजनाओ की वजह से करीब दो करोड़ से ज्यादा लोग विस्थापित हो गये। माओवादी प्रभावित क्षेत्र में सरकार की जितनी परियोजनाये निर्धारित है अगर सभी पर काम शुरु हो जाये तो कम से कम 55 जिलों में एक लाख एकड़ से ज्यादा की खेती योग्य भूमि पूरी तरह खत्म हो जायेगी । इन जमीनो पर टिके कितने किसान-मजदूरों के सामने रोजी रोटी के लाले कैसे पड़ जायेंगे इसका अंदाजा भी सरकारी योजनाओ से मिने वाली नौकरियो की तादाद से समझा जा सकता है। औसतन इन 55 जिलों में प्रति सौ एकड खेती की जमीन पर पांच हजार परिवारो का पेट भरता है, वहीं औघोगिक योजनाओ के आने के बाद प्रति सौ एकड़ 40 से 50 परिवार को ही रोजगार मिलेगा ।

असल में रेडकारिडोर का सवाल सिर्फ विकास होने या करने से ही नहीं जुडा है । जो नयी राजनीतिक परिस्थितियां बन रही हैं, उसमें युद्धबंदी की राजनीति का मतलब एक ऐसे टकराव का पैदा होना है, जिसमें करोड़ों ग्रामीण आदिवासियों को झोंकना होगा। युद्धबंदी का सवाल सिर्फ विकास की सही स्थिति भर की नक्सली रणनीति भर से नहीं जुड़ा है। इसका दूसरा सच यह भी है कि देश के भीतर दो देश के आगे एक दूसरे के खिलाफ खड़े होने की स्थिति भी युद्ध की तर्ज पर की जा रही है ।

3 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

विचारणीय आलेख! इस पर देश की जनता सोचे या फिर सरकार।

काजल कुमार Kajal Kumar said...

निखिद्ध सरकार और गुंडई, दोनों का सम्मिश्रण है नक्सलवाद

jia raja banaras said...

पुण्य जी,
इस समस्या में कहीं पूरा काला नज़र आता है तो कहीं सब सफेद है। जब किसी पुलिस अधिकारी का सिर कलम किया जाता है तो लगता है ये लड़ाई किसी बददिमाग शख्स के दिमाग से उपजा फितूर लगने लगती है। वहीं जब ज़मीन की तस्वीर देखिए तो मामला सफेद नज़र आता है। बहरहाल, इस लड़ाई ने ये तो साफ किया है कि दोनों तरफ कई गैरइंसानी चेहरे भी हैं। नेताओं को इससे अलग कर दिया जाए क्योंकि ये बिना चेहरे वाले लोग हैं। हां आज राजधानी एक्सप्रेस को हाईजैक कर लिया गया। खबरें चल रही हैं "फिर सामने आया नक्सलियों का क्रूर चेहरा" फिलहाल ट्रेन को छोड़ा जा चुका है। खबरें चल रही है 'ट्रेन को मुक्त कराया गया।' बीच में ये भी खबर चली कि 'सरकार का ट्रेन पर कब्जा।' सरकार अपनी पीठ थपथपा रही है। इसे बड़ी सफलता मान रही है। पर मन इसे सरकार की किसी भी स्तर पर सफलता मानने से इंकार कर रहा है समझ नहीं आ रहा ऐसा क्यों हो रहा है।