Wednesday, January 6, 2010

फिल्म और राजनीति में सरोकार का धंधा

चंदेरी के बुनकरों का सवाल आमिर खान जब थ्री इडियट्स के प्रचार के दौरान उठा रहे रहे थे, उस वक्त लोकसभा में मंहगाई को लेकर सांसद हंसते-मुस्कुराते चर्चा करते हुये चर्चा से बचना चाह रहे थे । आमिर खान सामाजिक सरोकार को प्रचार का हथकंडा बनाकर अपने धंधे में मुनाफा बढ़ाने की तरकीब अपनाये हुये थे तो लोकसभा में सांसद सामाजिक सरोकार को ही हाशिये पर ढकेल कर अपने मुनाफे को अमली जामा पहनाने में जुटे रहे। संसद ने आखरी दिन सासंदों को मिलने वाली हवाई यात्रा में बढोत्तरी पर सहमति का ठप्पा बिना चर्चा के लगा दिया और कृषि मंत्री मंत्री शरद पवार ने जले पर नमक यह कह कर छिड़क दिया की महंगाई से निजात तुरंत मिलना मुश्किल है।

वहीं थ्री इडियट्स में मुनाफे का आखिरी ठप्पा आमिर खान ने पांच हिन्दी राष्ट्रीय न्यूज चैनलों के संपादकों को इंटरव्यू के लिये चेन्नई आने का आमंत्रण दे कर लगाया और इडियट बाक्स भी थ्री इडियट्स के धंधे को आगे बढाने में जुट गया । एक तरफ सामाजिक सरोकार की संवेदनाओं को धंधे में बदलकर मुनाफा बनाने की पहल तो दूसरी तरफ सरोकार को हाशिये पर ढकेलकर एक नयी आर्थिक लीक खींचने की कोशिश। देश के जो सामाजिक-आर्थिक हालात हो चले हैं, उसमें पहली बार यह नया सवाल उभर रहा है कि सांसद सिल्वर स्क्रीन के नायक सरीखे हो चले हैं और सिल्वर स्क्रीन के नायक सांसदों की तर्ज पर मुद्दों को उठाकर जिस तरह मुनाफा बनाने में जुटे हैं, उसमें मिस्टर परफेक्शनिस्ट वही है, जो सलीके से समाज को धोखा देना जानता हो। क्योंकि सौ करोड़ से ज्यादा का मुनाफा थ्री इडियट्स के जरीये आमिर खान बना लेंगे और सांसदों की बढ़ी हवाई उडान से देश के खजाने पर सौ करोड़ से ज्यादा का भार पड़ेगा।

असल में आम आदमी की जरुरत और उसकी त्रासदी को फिल्मी तर्ज पर रखने का अनूठा प्रयास ही इस दौर में शुरु हुआ है और राजनीति इसे मापदंड बनाकर लोकतंत्र का राग अलापने से नहीं कतरा रही। अगर बीते पांच साल में संसद
, सिल्वर स्क्रीन और आम आदमी को एक तराजू में रखे तो एक साथ कई सवाल खड़े होते हैं। मसलन 2004 में लोकसभा के 156 सांसद करोड़पति थे और औसतन 545 सांसदों की संपत्ति ढाई करोड से ज्यादा की थी। वहीं 2004 में गरीबी की रेखा से नीचे वालों की तादाद 31 फीसदी थी। और साठ फिसदी से ज्यादा की आय बीस रुपये प्रतिदिन थी। वहीं 2009 में लोकसभा के 315 सांसद करोड़पति हो गये और औसतन 545 सांसदों की संपत्ति चार करोड़ अस्सी लाख हो गयी। जबकि 2009 में गरीबी की रेखा से नीचे वालों की तादाद बढ़कर 37 फीसदी हो गयी और बीस रुपये प्रतिदिन कमाने वाले बढ़कर 77 फीसदी तक जा पहुंचे। जबकि इसी दौर में सिल्वर स्क्रीन ने कमाल का उछाल मारा। 2004 में जहां बालीवुड सालाना नौ हजार करोड़ का धंधा कर रहा था, वह पांच साल में बढकर यानी 2009 में तीस हजार करोड़ पार कर गया। ऐसे में आमिर खान अगर यह कहें कि वह चंदेरी ना जाते तो बुनकरो की बदहाली सामने नहीं आती या फिर राहुल गांधी का यह कहना कि दलितों की त्रासदी का समूचा सच सामने नहीं आ पाता अगर वह किसी दलित के घर रात नहीं गुजारते। और सब कुछ दलित राजनीति के अंधेरे में खो जाता यानी मायावती के। यहीं से दूसरा सवाल खड़ा होता है कि दलित या ग्रामीणों की हालत से सरकार वाकिफ हैं। सारे आंकडे उसके पास हैं। जो नीतियां दिल्ली या राज्यों की राजधानियों में बनती है, वह गांव तक नहीं पहुंच पाती, इसे मंत्री और नौकरशाह दोनों जानते समझते हैं। लेकिन इसके बावजूद राहुल गांधी भारत भ्रमण आमिर खान की तर्ज पर करते हैं। वहीं, आमिर खान भी राहुल गांधी की तर्ज पर चंदेरी से लेकर बनारस की गलियो में और पंजाब से लेकर चेन्नई तक में अपनी इमेज बचाकर घूमते हैं। बनारस में आमिर खान नकली गंदे दांत और मुचराये कपड़ों के साथ कांख में किसी बाबू की तरह बैग दबाये दबे पांव ही पहुंचते हैं। लेकिन थ्री इडियट्स का धंधा उन्हें आमिर खान की इमेज को मीडिया में परोसकर ही आगे बढ़ता दिखता है।

तो क्या यह माना जाये कि आमिर अपने रंग-ढंग से बनारस
, कोलकाता से लेकर लुधियाना और चेन्नई तक में रंग भेद का खेल नहीं खेलते । और राहुल गांधी जिन्हें मनमोहन सिंह का खुला आफर है कि वह जब चाहे सरकार में शामिल हो जाये और राहुल खुद चाहे तो मनमोहन को हटाकर पीएम की कुर्सी पर भी बैठकर गरीब-दलितों के घरो में रोशनी दिला सकते है तो भी सिर्फ राजकुमार की छवि के साथ वह आमिर खान जैसे अपनी इमेज से बचते क्यों हैं। और आमिर के चंदेरी के बुनकर और राहुल के बुंदेलखंड में अंतर क्या रखना चाहिये इसे कौन बतायेगा ।

आमिर की नजरों से देखें तो फिल्मों का नायक यूं ही नहीं होता

.....और अगर सिल्वर स्क्रीन से देश का सवाल जोड़ दिया जाये तो प्रधानमंत्री किसी नायक सरीखा लग सकता है। वहीं दूसरी तरफ आमिर के प्रचार की पहल राज्य को भाती है क्योंकि इससे बाजारवाद का नारा भी बुलंद रहता है और सामाजिक सरोकार भी जागे रहते हैं। और मनमोहन सिंह की इकनामिक्स को भी एक आधार मिलता है, जहा मुनाफा सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों को टटोल कर चलती हैं। आमिर खान का मानना है कि फिल्मी कलाकार अगर देश के मुद्दों को उठाये तो सरकार और सत्ता की नजर कहीं तेजी से इस पर पडती है । सरकार मानती है कि लोकप्रिय संस्थान अगर आम जनता के मुद्दों के साथ खुद को जोड़े तो आम आदमी ज्यादा जानकारी हासिल करता है। असल में कुछ इसी तरह का सवाल दो बीघा जमीन के नायक बलराज साहनी से पूछा गया था कि उनकी फिल्म के बाद क्या सरकार छोटे किसानो की त्रासदी पर ध्यान देगी। तो बलराज साहनी जबाब था कि फिल्म उसी व्यवस्था के लिये गुदगुदी का काम करती है जो इस तरह की त्रासदी को पैदा करती है। इसलिये फिल्मों को समाधान ना माने। यह महज मनोरंजन है। और मुझे चरित्र के दर्द को उभारने पर सुकून मिलता है। क्योंकि हम जिन सुविधाओं में रहते हैं उसके तले किसी दर्द से कराहते चरित्र को उसी दर्द के साथ जी लेना अदाकारी के साथ मानवीयता भी है।

सवाल है तब यह बात कलाकार भी समझते थे और अब मीडियाकर्मी भी नहीं समझ पाते। दरअसल
, आमिर के प्रचार की जिस रणनीति को अंग्रेजी के बिजनेस अखबार बेहतरीन मार्केटिंग करार दे रहे हैं, वो सीधे सीधे लोगों की भावनाओं के साथ खेलना है। फिल्म के प्रचार के लिए लोगों की भावनाओं की संवेदनीशीलता को धंधे में बदलकर मुनाफा कमाते हुए अलग राह पकड़ लेना नया शगल हो गया है। लेकिन, यहीं एक सवाल फिर उठता है कि यहां एक लकीर से ऊपर पहुचते ही सब एक समान कैसे हो जाते हैं। चाहे वह फिल्म का नायक हो या किसी अखबार या न्यूज चैनल का संपादक या फिर प्रचार में आमिर के साथ खड़े सचिन तेंदुलकर। या फिर लोकसभा के हंसी ठठ्ठे में खोता मंहगाई का मुद्दा ।

बलराज साहनी से इतर अगर उत्पल दत्त की माने को मुबंई में वैसी ही फिल्म बनती हैं जैसे किसी जूते की फैक्ट्री में जूते । फिल्मकार और उसकी मार्केटिंग से जुडे लोग कहते रहते है लोग ऐसी ही फिल्म चाहते है, जबकि हकीकत में लोगों को सांस्कृतिक पराभव के लिये परिचालित किया जाता है । कह सकते हैं कभी जो जगह साम्राज्यवादियों ने छोडी सत्ताधारियो ने उस जगह को भरने का ही काम किया और फिल्मों के जरीये भी मुनाफे के उस खाली पडे तंत्र का सहारा फिल्मकारों ने ले लिया, जिसे राज्य ने खाली छोड़ दिया । यानी सरोकार की परिभाषा झटके में बदल दी गयी। और धुआंधार प्रचारतंत्र ने जनता को सांसकृतिक दिवालियेपन तक पहुंचा दिया। आमिर खान के तौर तरीके इस मायने में अलग हो सकते हैं कि वह फिल्म के प्रचार में ही सरोकार को मुनाफे में बदलना चाहते हैं । असल में फिल्मों से जुडा हर कलाकार हो या फिल्मकार, बॉलीवुड शब्द की जगह फिल्म इंडस्ट्री शब्द का प्रयोग करना चाहता है.....इसकी वजह सिर्फ यह नही है कि बालीवुड को उद्योग का दर्जा मिल जाये। बल्कि उस क्रिएटिविटी का चोला बाजार के सामने उतार फेंकना भी है जो सामाजिक सरोकार के जरीये सेंसर का ट्रिगर थामे रहता है। असल में तकनीक ने फिल्मों को सहारा सिर्फ फटाफट धंधा कर खुद को उघोग में बदलने भर का नहीं दिया है, बल्कि न्यूज चैनलो से लेकर रेडियो जॉकी और इंटरनेट का एक ऐसा साम्राज्य भी दे दिया है, जिसके आसरे धंधा चोखा भी हो जाये और मुनाफे का बंदरबांट कर हर कोई एक दूसरे की उपयोगिता से लेकर उसे जायज ठहराने में भी लगा रहे। यह आमिर खान के इंटरव्यू के आमंत्रण से आगे का रास्ता है। यह रास्ता आपको रामगोपाल वर्मा की फिल्म रण में नजर आ सकता है। फिल्म का नायक अमिताभ बच्चन न्यूज चैनलों के धंधे को समझता-समझाता दोनो है, लेकिन इस दौर में खुद भी धंधा कर निकल जाता है। मुश्किल यह है कि आमिर खान जिन सवालों को उठाते हुये अपनी फिल्म थ्री इडियट का प्रचार करते हैं। रामगोपाल वर्मा उन्हीं सवालो को उठाते हुये अमिताभ बच्चन के जरीये फिल्म ही बनाकर सीधे धंधा करने से नहीं चूकते। सरकार कह सकती है कि खुले बाजार की थ्योरी तो यही कहती है कि जिसे चाह अपना माल बेच लें...तरीका कोई भी अपना लें ।

लेकिन इसे महीन तरीके से समझने के लिये फिल्मों के बदलते रंग को समझना होगा जो वाकई सत्ताधारियों का अक्स है। नाचगानो और फंतासियों के बीच नायक जब विलेन की जमकर मरम्मत करता है तो यह सिर्फ अच्छाई पर बुराई या पोयटिक जस्टिस भर का मसला नहीं होता बल्कि जीवन के लिये रोजमर्रा की समस्या पर पर्दा डालने तथा जनता को उसी परिलोक में झोंक देने की चाल भी होती है, जिसमें सारे अन्याय का इलाज है हीरो का मुक्का । जिसके लगते ही खलनायक का ह्रदय परिवर्तन होता है और वह गरीब-गुरबा की मदद करने लगता है । यहीं सवाल उठता है कि न्यूज चैनलों के धंधे को भी फिल्म रण बताती है और थ्री इडियट का आमिर का प्रचार भी बुनकरों के सवाल को उठाता है। जबकि बुनकर का हुनर नायिका की गोरी चमड़ी पर भी ठहर नहीं पाता। सामधान क्या है, यह रास्ता तुरंत बताना मुश्किल जरुर है
,लेकिन मामला माध्यम को चुनना भी है । इसलिये रास्ता यही है कि जनता को जीत कर वापस लाना जरुरी है। व्यवसायिक रुप से भ्रष्ट उन लोगों के विरुद्ध मानव मस्तिष्क के लिये अनवरत संघर्ष जरुरी है, जो पूरे मीडिया को नियत्रित करते हैं और अखबारों, रेडियो तथा टीवी के माध्यम से लगातार झूठ और धोखे की बमबारी करते रहते हैं। इन सबके उपर है सरकार , जिसके सदस्य खुलेआम मध्ययुगीन अंधविश्वासों का प्रसार करते हैं और आम जनता के बीच विकास की अनूठी लीक बनाने के लिये सबकुछ पने ही हाथ में रखने में जुटे रहते हैं। जिसे लोकतंत्र का नाम भी दिया जाता है। इसे तोड़ने में संघर्ष तीखा और लगातार का है। जिसके लिये जरुरी है फिल्मों को फैशनेबुल समझ कर देखने वाले दिवालिया मध्यमवर्गीय बुद्दिजिवियों के कोटरो में निवृत होने के बजाय वास्तविक जनता के पास जाया जाये। लेकिन तरीका थ्री इडियट या रण का ना हो। और शायद ना ही करोड़पतियो की लोकसभा का।

8 comments:

Deepak Kumar said...

यहां सभी दो दो चेहरे लगाए हुए है। एक असली और दूसरा दिखाने के लिए। जो चेहरा दिखाने के काम आता है, वो मानवीय दिखना चाहिए ताकि उसके पीछे असली (दानवीय) चेहरे को छिपाया जा सके। जहां आम आदमी आलू तक खरीदने से पहले हिम्मत जुटाता दिखाई दे रहा है वहीं अपनी सुख सुविधाओं में बढोतरी के मुदृदे पर समस्त शासक वर्ग एकजुट नजर आता है। हां कहीं किसी रोज किसी गरीब की कुटिया में रात गुजार कर अपना मानवीय चेहरा भी ये शासक वर्ग दिखा देता है।

ਗੁਲਾਮ ਕਲਮ said...

फिल्मों को फैशनेबुल समझ कर देखने वाले दिवालिया मध्यमवर्गीय बुद्दिजिवियों के कोटरो में निवृत होने के बजाय वास्तविक जनता के पास जाया जाये।.....रास्ता यही है कि जनता को जीत कर वापस लाना जरुरी है।

Manoj said...

dear prasun !
sab dhandha hai, aur jahir hai ganda bhi hai...parantu pathak aapse apeksha rakhta hai ki aap barabari ka dristikon rakhenge..aamir ya netaon ko to janta se aaj nahi to kal rubaru hona hi hota hai lekin kukurmutte ki tarah uge media walon ka kya kia jaye jo kabhi aamiron dwara ya netaon dwara kharide jaate hai aur use apni khabar bana kar dikhate aur likhte hai. Aap un patrakaron se kyun nahi puch pa rahe hai jinhone aamir ke aamantran par unka aatithya grahan kiya aur unke aur unki film ke yaso gaan karte hue tv par interview liya aur blogs bhi likhe...bina kahi ye batate hue ki ye khabar ...% prayojit hai.
Samajik sarokar se sambandhit aapka lekhan hamesha pathniya hota hai, lekin shayad samay aa gaya hai ki tathakathit satya ke alambardar patrakaron aur channelon ki hakeekat se parda uthane ka prayas kiya jaya..aur aap jaise varishtha se ye apeksha hai ki aap kuch to karenge.
dhanyabad

अंशुमाली रस्तोगी said...

नाक को चाहें इधर से पकड़ें या उधर से। मतलब माल बिकना चाहिए। केवल फिल्मों में ही नहीं किताबों में भी सामाजिक सरोकारों को बेचा रहा है ताकि मुनाफा कमाया जा सके।
अब आमिर को लगता है कि फिल्म के जरिए वेबकूफी बिक सकती है तो वह उसे बेच रहे हैं। उनका समाज और सरोकार ठीक उस दिन समाप्त हो जाएंगे जिस दिन फिल्म को कोई बड़ा मान-सम्मान मिल जाएगा। ठीक यही सब तो हमारे हिंदी साहित्य में भी हो रहा है।

newspostmartem said...

आदरणीय प्रसून जी प्रणाम मैं आपका ईमेल पता नहीं कर सका इसलिये संपर्क के लिये यह तरीका अपना रहा हूं आशा है क्षमा करेंगें
मैं आपको उस खबर की जानकारी देना चाह रहा हूं जो मीडिया जगत के लिये खबर होकर भी खबर नहीं बन सकी तो डींगे हांकने वाले आला अधिकारी भी खामोश बैठे है. यह मामला सतना जिला अस्पताल की एक ऐसी महिला चिकित्सक का है जो बच्चों की गहन चिकित्सा ईकाई (एससीएनयू)में नियुक्त रही और उसने एक जिंदा नवजात को सिर्फ इस लिये मृत्यु प्रमाण पत्र जारी कर दिया क्योंकि उसे अपने नर्सिंग होम जाना था और उसे लग रहा था कि जल्द ही वह बच्चा मर जायेगा. हालांकि इसके लिये नर्सिंग स्टाफ द्वारा मना भी किया गया लेकिन उसने यह कह दिया कि बच्चे को बचना तो है नहीं. तुम परेशान मत होओ. यह कह कर वह चली गई. तब अन्य डाक्टरों को बुलाया गया और उसका उपचार प्रारंभ किया गया और स्थिति नियंत्रण में आने पर उसे मेडिकल कालेज रिफर किया गया .
इस मामले को दबाने के जहां पूरे उपाय किये गये तो कलेक्टर के संज्ञान में आने के बाद भी इस मामले में खामोशी ही ओढ़ रखी गयी है. वहीं प्रदेश के स्वास्थ्य सचिव श्री मोहंती भी इनके काफी क्लोज बताये जाते हैं.
अब अपने आप में स्पष्ट है कि इतना गंभीर मामला होकर भी कोई कार्यवाही क्यों नहीं हो रही.
मेरा आप सबसे निवेदन है कि इस मामले को यदि देश प्रदेश स्तर पर उठा सकते हैं तो शायद चिकित्सा जगत व दीन हीन मरीजों पर उपकार होगा. यह घटना अभी एक माह के अंदर की ही है.
आपकी जरूरतों के लिये मैं संबंधित मोबाइल नम्बर भी दे रहा हूं.
सिविल सर्जन जिला अस्पताल सतना - डॉ प्रमोद पाठक 09425810372
सीएमएचओ सतना - डॉ. आर.एस. दण्डोतिया 09826448899
एससीएनयू इंचार्ज - डॉ. आर.पी.पटेल 09826136160
कलेक्टर सतना - सुखबीर सिंह 9893738222


- newspostmartem.blogspot.com

aakhar.org said...

aap ka lekh http://aakhar.org par bhi dekhe...chandrapal@aakhar.org

abhivyakti said...

“फिल्म और राजनीति मेँ सारोकार का धँधा!” अच्छा लिख लेते हैँ आप! लेकिन सारोकार का ये धँधा कहाँ नहीँ है? फिर सिर्फ फिल्म और राजनीति को ही दोष क्योँ?
आज नीँद नहीँ आ रही ! एक आवाज़ बार-बार कानोँ मेँ गूँज रही है ! “सर कुछ कीजिये” यही कहा था उसने मुझे, जब खबरोँ से ऊब कर मैँ न्यूज़्र रूम से बाहर निकला था ! बाहर कडाके की सर्दी थी! सामने की दुकान से चाय पी कर सर्दी को कम करने की नाकाम कोशिश कर रहा था कि मेरे फोन की घँटी बज उठी! एक अंजान सा नँबर देख कर मैने कुछ देर रुक कर फोन उठाया! “सर आलोक ने क्या आपसे मेरे बारे मेँ बात की?” आलोक ! मेरे पिछले सँस्थान का क्राईम रिपोर्टर है! मैने कहा “कल आलोक ने फोन पर मुझ से बात तो की थी लेकिन आपका कोई ज़िक्र नही किया!” सर आपने अभी जिस चैनल मेँ जोईन किया है, कुछ दिन पहले तक मैँ भी वहीँ काम कर रहा था, लेकिन अब मुझे निकाल दिया गया है! ना कोई नोटिस ना कोई कारण! बस अचानक एक दिन मुझे कहा गया हमेँ अब आपकी सेवा नहीँ चाहिये! सर मैँ तो सडक पर आ गया! बिना अप्रोच के यहाँ कोई बात करने को तैयार नहीँ! कहीँ नौकरी नहीँ मिल रही! ये सोच कर मीडिया मेँ आया था कि समाज की सेवा करूँगा! लेकिन अपने बूढे माँ-बाप के लिये भी कुछ नहीँ कर पाया! पत्रकारिता मेँ मेरी रुचि के चलते उनहोँने अपनी गाढी कमाई खर्च कर मुझे नामी मीडिया कालेज मेँ दाखिला दिलवाया था! कालेज से निकलने के बाद एक साल तक इँटर्नशिप के नाम पर मुझसे अलग-अलग मीडिया सँस्थानोँ ने बेगारी कराई ! बडी मुश्किल से ये नौकरी मिली थी! मेरे साथ मीडिया स्कूल मेँ पढने वाले ज़्यादातर लडके जो अमीर घरानोँ से थे वो आज बडे चैनलोँ मेँ बडे पैकेज पर काम कर रहे हैँ! मैने मीडिया स्कूल मेँ टाप किया था लेकिन मुझे एक साल तक कोई नौकरी नहीँ मिली! एक साल बाद जो नौकरी मिली तो लगा मुझे मेरा मकसद मिल गया! लेकिन अब नौकरी छिन जाने के बाद लग रहा है मानो सारे रास्ते बँद हो गये हैँ! सर आप कुछ कीजिये प्लीज़!
लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ कहे जाने वाले इस खोखले मीडिया की नँगी तस्वीर फिर मेरे सामने थी! “तुम अपना रिज़्यूम मुझे मेल करो, और हिम्मत मत हारो, जल्द ही सब ठीक हो जायेगा!” ये कह कर मैँने उसका हौसला बढाने की कोशिश नाकाम कोशिश की! लेकिन दिमाग मेँ यही सवाल था नियम और कानून का हल्ला मचाने वाला हमारा ये मीडिया खुद किस कानून से सँचालित होता है? समझ नहीँ आता “अनफेयर लेबअर प्रेक्टिस” करने वाले इन चैनलोँ के मालिकोँ को न्यूज़ चैनल खोलने के लाइसेँस कैसे मिल जाते हैँ? क्या सूचना और प्रसारण मँत्रालय मेँ इस हद तक भ्रष्टाचार हावी हो गया है? ये कैसी प्रेस की आज़ादी है? जहाँ कोई नियम ही नहीँ? जब पत्रकारोँ की भर्ती और उनकी सेवा समाप्ति किसी कानून और नियम के मुताबिक ही नहीँ होती तो काहे के पत्रकार हैँ हम? क्या पत्रकारिता से हमारा कोई सारोकार है? या हम कार्पोरेट के हाथोँ मेँ खेलने वाली कठपुतलियाँ मात्र हैँ? जिसे जब जिस तरह चाहा फायदे के लिये उपयोग किया और जब चाहा निकाल कर दूसरी सस्ती कथपुतली नचाना शुरु कर दिया! लाखोँ की सेलरी लेकर शीशे से दुनिया देखने वाले चँद पत्रकारोँ(चाटुकारोँ) को छोड देँ तो क्या किसी पत्रकार की सोशल सिक्योरिटी है? सरकारी दफ्तर मेँ काम करने वाले एक अदने से चपरासी को भी सोशल सिक्योरिटी हासिल होती है लेकिन अफसोस इस देश मेँ लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ कहे जाने वाले काबिल पत्रकारोँ की दशा मज़दूरोँ से भी बदतर है ! काश्मीर मेँ हुई मुठभेड मेँ न्यूज़24 के एक कैमरामेन को भी गोली लगी थी! इस चैनल ने अपने कैमरामेन और उसके परिवार को किस तरह मरने के लिये छोड दिया ये बताने की ज़रूरत नहीँ है! सहारा ने किस तरह हज़ारोँ पत्रकारोँ और उनके परिवारोँ को सडकोँ पर ला दिया क्या ये किसी से छिपा है? लेकिन वो तो सहाराश्री हैँ! दौलत के आगे सारे कानून पानी भरते हैँ! और हम खुद को पत्रकार कहते हैँ! क्या सच मेँ हम पत्रकार हैँ ये सारोकार का धँधा तो हर जगह जारी है वाजपायी जी! स्टार न्यूज़ और आपका ज़ी न्यूज़ क्या कर रहे हैँ ये किसी से छिपा नहीँ है! सब धँधा ही तो कर रहे हैँ अगर ऐसा नहीँ होता तो क्या आपको सहारा छोडना पडता? ज़रा सोचिये? (अगर मेरी बात से सहमत ना होँ तो इस महा टिप्पणी को आप अपने ब्लोग से हटा सकते हैँ!)

Rajeev Ranjan, Ph. D. BHU said...

प्रसून साहब(वाकई सुनें, तो), आप ने आमीर को घाटा पहुँचाया है। आपकी अर्जित प्रतिष्ठा का कद्र करते हुए उन्होंने आपको न्योता, और उलटे आपने उनको राजा हरिश्चन्द्र स्टाईल में ‘कटिस’ कह दिया। यह सरासर नाइंसाफी है, जनाब! आज गरीबी का ‘फीवर’ कवरेज में अधिक स्पेस पा रहा है। हर पत्र-पत्रिका, चैनल और बुद्धिजीवी कुनबा उन्हीं की रोटी सेंक रहा है। विचारों की यह मलाई ‘आप बनाओ, आप चखो’ माफिक है। सत्तासीन जन, चाहे वो राहुल हो या कोई गुमनाम सांसद सभीे भद्रलोकवासी हैं। उनको आप-सा फुरसतिया दिमाग नहीं, और न ही मुझ सा पढ़कर कमेंट करने का साउंज कि वो वस्तुस्थिति का चिरफाड़ और उसका आकलन-मूल्यांकन कर सके। पवार परिवार से ले कर राहुल तक गरीब और गरीबी के ही इर्द-गिर्द परिक्रमा कर रहे हैं। कुछ भी हो प्रभावी मीडिया को अपने हिसाब से इस्तेमाल कर ‘मि0 परफेक्शनिस्ट’ ने माहिर बाज़ीगर होने का सबूत तो दिया ही है। आप जैसे इक्का-दुक्का लोग भले छूट जाते हों, लेकिन वो मान लेंगे कि शायद यह आयोजन चेन्नई की जगह कहीं और होता, तो आप जरूर हामी भरते। आप जैसे मीडिया महारथियों खातिर एकरसपन ठीक नहीं होता। चलिए, अगली यात्रा के लिए तैयार रहिए।