Friday, May 28, 2010

तपती जमीन तपते सवाल

पेड़ों को रखे आस-पास, तभी रहेगी मानसून की आस।

दिल्ली से रानीखेत की तरफ जाते पहाड़ के गांवों की दीवार पर लिखी इन पंक्तियों ने कई बार ध्यान खींचा। हर बार जेहन में यही सवाल उठा कि जो इलाके पेड़-जंगलों से घिरे हैं, जहां पहाड़ों की पूरी कतार है। वहां इन पंक्तियो के लिखे होने का मतलब कहीं भविष्य के संकट के एहसास के होने का तो नहीं है। क्योंकि समूचा उत्तर भारत जब लू के थपेड़ों से जूझता है, तब राहत के लिये उत्तराखंड के पहाड़ी इलाके ही एसी का काम करते हैं। पहाड़ पर मई-जून में भी मौसम गुलाबी ठंड सरीखा होता है, तो इसे महसूस करने बडी तादाद में लोगों का हुजुम वहां पहुंचता है। यही हुजुम पहाड़ की अर्थव्यवस्था को रोजगार में ढाल कर बिना नरेगा भी न्यूनतम जरुरत पूरा करने में समाजवादी भूमिका निभाता है। सामान ढोने से लेकर जंगली फलों को बेचने और होटलों में सेवा देने वालों से लेकर जंगलों में रास्ता दिखाने वालो की बन पडती है। सिलाई-कढाई से लेकर जंगली लकड़ी पर नक्कशी तक का हर वह हुनर जो महिलाओ के श्रम के साथ जुडता है, वह भी बाजारों में खूब बिकता है, और गरमियो का मौसम पहाड़ के लिये सुकुन और रोजगारपरक होकर कुछ यूं आता है कि पहाड़ का मुश्किल जीवन भी जमीन से जुड़ सा जाता है और अक्सर पहाड़ के लोग यही महसूस करते है कि जमीन पर आय चाहे ज्यादा है लेकिन सुकुन पहाड़ पर ज्यादा है। क्योंकि सुकुन की कीमत चुकाने में ही पहाड़ की रोजी रोटी मजे से चल जाती है।

लेकिन जमीन पर अगर आय असमान तरीके से बढ़े और सिर्फ एक तबके की बढ़े तो खतरा कितना बड़ा है, इसका एहसास जमीन पर रहते हुये चाहे थ्योरी के लिहाज से यही समझ में आता है कि देश के 10 से 15 करोड़ लोग अगर महीने में लाख रुपये से ज्यादा उड़ा देते हैं तो देश के 70 से 80 करोड़ लोगों की सालाना आय दस हजार रुपये भी नहीं है। करोड़ों परिवार के लिये एक रुपये का सिक्का भी जरुरत है और देश के पांच फीसदी लोगों के लिये दस-बीस रुपये का नोट भी चलन से बाहर हो चुका है। दिल्ली के किसी मंदिर पर भिखारी को एक रुपया देना अपनी फजीहत कराना है, पहाड पर एक रुपया किसी भी गरीब के पेट को राहत देने वाला है। लेकिन प्रैक्टिकल तौर पर पहाड़ में इसकी समझ पहली बार यही समझ में आयी कि जिस एक छोटे से तबके के लिये दस-बीस रुपये मायने नही रखते, वही छोटा सा तबका अपनी सुविधा के लिये जिस तरह जमीन पर सबकुछ हड़पने को आमादा है वैसे ही पहाड़ पर भी अपने सुकून के लिये वह सबकुछ हड़पने को तैयार हो चुका है और जो गर्मियां पहाड़ के लिये जीवनदायनी का काम करती हैं, चंद बरस में वही गरमी पहाड़ को भी गरम कर देगी और फिर पहाड़ का जीवन भी जमीन सरीखा हो जायेगा।

इसकी पहली आहट सबसे गर्म साल के उस दिन {18 मई 2010 } मुझे महसूस हुई जब दिल्ली का तापमान सौ बरस का रिकार्ड पार कर रहा था और कमोवेश हर न्यूज चैनल से लेकर हर अखबार पर भेजा-फ्राई शब्द के साथ गर्मी-लू की रिकार्ड जानकारी दी जा रही थी। इस दिन रानीखेत की सड़कों पर भी कर्फ्यू सरीखा माहौल था। तापमान 33 डिग्री पार कर चुका था। पेड़ों की पत्तियां भी खामोश थीं। चीड़-देवदार के पेड़ों की छांव भी उमस से जुझ रही थी । बाजार खाली थे। सालों साल स्वेटर बेच कर जीवन चलाने वालो की दुकानों पर ताले पड़े थे। कपडे पर महीन कारीगरी कर कुरते बना कर बेचने वाली महिलायें के जड़े-बूटे देखने वाला कोई नही था। और तो और दुनिया के सबसे बेहतरीन गोल्फ कोर्स में से एक रानीखेत का गोल्फ कोर्स शाम सात बजे तक भी सूनसान पड़ा था। और यह सब इसलिये कहीं ज्यादा महसूस हुआ क्योंकि रानीखेत अभी भी खुद को रानीखेत ही मानता है, जहां गर्मियों में होने का मतलब है खुशनुमा धूप। ठंडी बयार। गुलाबी शाम । और इन सब के बीच घरो में कही कोई पंखा नहीं। घर ही नहीं होटल और सराय में भी पंखों की कोई जगह नहीं। वहां की छतें आज भी खाली ही रहती हैं। छतों की दीवारो की ऊंचाई जरुर आठ फीट से बठकर दस फीट तक पहुंची है। लेकिन कोई इस शहर में मानता ही नहीं कि प्रकृतिक हवा कभी तकनीकी हवा के सामने कमजोर पड़ेंगी या मशीनी हवा पर शहर को टिकना पडेगा।

लेकिन पहली बार बीच मई के महिने में अगर रानीखेत ने गर्मियो के आगे घुटने टेके और पहली बार यहां के बहुसंख्य लोगों की आय डगमगाती नजर आयी तो चिंता की लकीर माथे पर उभरी कि रानीखेत का मौसम अगर इसी तरह हो गया तो उनका जीवन कैसे चलेगा। पहली बार इसी रानीखेत में यह भी नजर आया कि जमीन पर अपनी सुविधा के लिये मौसम बिगाड़ चुका देश का छोटा सा समूह, जो सबसे ताकतवर है,प्रभावी है, किसी भी बहुसंख्यक समाज पर भारी पडता है, अब पहाड़ को भी अपनी हद में लेने पर आमादा है। कॉरपोरेट सेक्टर के घनाड्य ही नही बल्कि सत्ता की राजनीति करने वाले सत्ता-धारियों और विपक्ष की राजनीति करने वालो की पूरी फौज ही पहाड़ों को खरीद रही है। सिर्फ रानीखेत में ही तीन हजार से ज्यादा छोटे बडे कॉटेज हैं जिन पर मालिकाना हक और किसी की नहीं बल्कि उसी समूह का है, जो ग्लोबल वार्मिग को लेकर सबसे ज्यादा हल्ला करता है। पहाड़ पर नाजायज तरीके से जमीन खरीद कर अपने लिये सुविधाओं को कैद में रखने वालो में रिटायर्ड भ्रष्ट नौकरशाहों से शुरु हुआ यह सिलसिला अब के प्रभावी नौकरशाहों, राजनीतिज्ञों और बिचौलियों की भूमिका निभाकर करोड़ों बनाने वाले से होते हुये तमाम कारपोरेट सेक्टर के प्रभावी लोगो तक जा पहुंचा है। बाहर का व्यक्ति पहाड़ पर सिर्फ सवा नाल जमीन ही खरीद सकता है। जिसकी कीमत तीन साल में दस गुना बढकर 20-25 लाख रुपये हो चुकी है। लेकिन यहां रईसों के औसतन काटेज की जमीन पांच से आठ नाल तक की है। यानी जमीन ही करोड़ों की। चूंकि प्रकृति के बीच में काटेज के इर्द-गिर्द प्रकृतिक जंगल बनाने को ही पूंजी लुटाने का असल हुनर माना जाता है तो कॉटेज की इर्द-गिर्द जमीन पर प्रकृति का जितना दोहन होता है, उसका असर यही हुआ है कि रानीखेत में बीते पांच साल में जितना क्रंकीट निर्माण के लिये पहुंचा है, उतना आजादी के बाद के पचपन सालों में नहीं पहुंचा। इन कॉटेजो के चारों तरफ औसतन 75 से लेकर 160 पेड़ तक काटे गये। और कॉटेज जंगल और हरियाली के बीच दिखायी दे, इसके लिये औसतन 15 से 25 पेड़ तक लगाये गये । अगर इसी अनुपात में सिर्फ रानीकेत को ही देखे तो करीब दस लाख पेड काटकर पैंतालिस हजार पेड लगाये गये। लेकिन पहाड़ों को रईस तबका जिस तेजी से हड़पना चाह रहा है, उसका नया असर पेड़ों का काटने से ज्यादा आसान पूरे जंगल में आग लगाकर पेड खत्म करने पर आ टिका है। खासकर चीड के पेड़ों से निकलने वाले तेल को निकाल कर पेडो को खोखला बनाकर आग लगाने का ठेका समूचे कुमायूं में जिस तेजी से फैला है, उसका असर यही हुआ है कि बीते तीन साल में छोटे-बडे सवा सौ पहाड़ बिक चुके हैं और पहाड़ों को पेड़ों से मुक्त करने के ठेके से लेकर पहाड़ों के अंदर आने वाले सैकड़ों परिवारों को जमीन बेचने के लिये मनाने के ठेके को सबसे मुनाफे का सौदा अब माना जाने लगा है। रईसो के निजी कॉटेज से शुरु हुआ सिलसिला अब पहाड़ों के बीच काटेज बनाकर बेचने के सिलसिले तक जा पहुंचा है।

बिल्डरो की जो फौज जमीन पर घरों का सपना दिखाकर मध्यम तबके के जीवन में खटास ला चुकी है, अब वह भी पहाड़ों पर शिरकत कर रइसों के सपनों को हर कीमत पर हकीकत का जामा पहनाने में जुटा है। और पहाड़ के समाज को तहस-नहस करने पर आ तुला है। जिस तरह सेज के लिये जमीन हथियाने का सिलसिला जमीन पर देखने में या और सैकड़ों सेज परियोजना को लाइसेंस मिलता चला गया, कुछ इसी तर्ज पर पहाड़ों पर बिल्डरों की योजनाओं को मान्यता मिलने लगी है। और पहाड़ी लोगों को मनमाफिक कीमत दी जा रही है, लेकिन इस मनमाफिक रकम की उम्र किसानी और जमीन मालिक होने का हक खत्म कर मजदूर में तब्दील करती जा रही है। सैकड़ों कॉटेज की रखवाली अब वही पहाड़ी परिवार बतौर नौकर कर रहे हैं, जिस जमीन के कभी वो मालिक होते थे । रानीखेत से 40 किलोमीटर दूर भीमताल के करीब एक बिल्डर ने अगर समूचा पहाड़ खरीद कर सवा-सवा करोड के करीब पचास कॉटेज बेचने का सपना पैदा किया है तो अल्मोडा के करीब एक बिल्डर का सपना हेलीकाप्टर से काटेज तक पहुंचाने का है। यानी जहां सड़क न पहुंच सके, उस इलाके के एक पहाड को खरीद कर अपने तरीके से कॉटेज बना कर सवा दो करोड में एक कॉटेज बेचने का सपना भी यहीं बसाया जा रहा है। लेकिन वर्तमान का सच रइसों की सुविधा तले कितने खतरनाक तरीके से पहाड़ों के साथ जीवन को भी खत्म कर रहा है, यह पहाड़ पर कब्जे और काटेज की सुविधा को साल में एक बार भोगने से समझा जा सकता है, जहां कॉटेज का मतलब है दो से तीन लोगों के रोजगार का आसरा बनना और औसतन 25 से 50 लोगों का रोजगार छीनना।

पहाड़ के रईसों के इस जीवन का नया सच यह भी है कि इन काटेज में पंखे भी है और एसी भी। यानी पहाड़ पर जमीन सरीखा जीवन जीने की इस अद्भभुत लालसा का आखिरी सच यह भी है कि पहाड का सुकुन अगर जमीन पर ना मिले तो भी पहाड पर जमीन सरीखा जीवन जीने में हर्ज क्या है। लेकिन संकट पहाड़ को भी जमीन में तब्दील करने पर आ टिका है जो मौत के एक नये सिलसिले को शुरु कर रहा है। क्योंकि पहाड़ पर गर्मी का मतलब जमीन पर आकर रोजगार तलाशना भर नहीं है बल्कि पारंपरिक जीवन खत्म होने पर मरना भी है। पहाड़ पर औसतन जीने की जो उम्र अस्सी पार रहती थी अब वह घटकर सत्तर पर आ टिकी है और बीते साल साठ पार में मरने वाले पहाड़ियों में 18 फीसदी का इजाफा हुआ है। इन परिस्थितियों में आर्थिक सुधार की थ्योरी नयी पीढियों के जरीये अब बुजुर्ग पहाड़ियों की सोच पर आन पड़ी है, जहा पहाड़ी भी मानने लगा है कि सबकुछ खरीदना और मुनाफा बनाना ही महत्वपूर्ण है। त्रासदी यह भी है कि पहाड़ों पर अब जिक्र वाकई दो ही स्लोगन का होता है। पहला , जब सोनिया गांधी कौसानी में अपना काटेज बना सकती है, तो दूसरे क्यों नहीं। और जब सरकार पेड़ काट कर विकास का सवाल उठा सकती है तो जंगल जला कर दुसरे क्यों नहीं। लेकिन पहाड़ों पर बारह महीने सालो साल रहने वाले अब एक ही स्लोगन लिखते है, पेडो को रखे आस-पास,तो ही रहेगी मानसून की आस।

12 comments:

मिहिरभोज said...

बहुत सही कहा......ये विकास है या विनाश....मैं कहूं तो विनाश ही है....एसी,कारें हमारे जीवन को सुविधापूर्ण तो वना रही हैं पर सुखी नहीं......पर लगता है ये अब बिना ब्रैक और फिक्स स्टैयरिंग वाली गाङी बन चुकी है जो धीरे धीरे खाई की तरफ बढ रही है......सार्थक लेखन के लिए साधुवाद

sangeeta swarup said...

बहुत अच्छा लेख...जागरूकता देने वाला .

डॉ .अनुराग said...

एक हफ्ते पहले हरियाणा की जी टी रोड के हाई वे पर गुजरते वक़्त मै यही सोच रहा था के पूरा बचपन बिना ए सी के गुजर गया ....बिना इनवर्टर के .साइकिलो पे जवानी पे पैर रखा था.. अब क्या सूरज बदल गया है ...या हमारी टेम्परामेंट..सडक पे इत्ती गाड़िया है ..इत्ते ए.सी ...पौधे कम है ....जगह जगह फ्लेट बने है ...कुछ समझदार लोग चिल्ला रहे है पर पैसे वाले भ्रम में है...सोचते है आसमान को थाम लेंगे

Rajeev Pathak said...

प्रसून जी मै सौभाग्य वश आपके गाँव तक गया हूँ और आपके बारे में थोडा बहुत जाना भी है.सवाल अपने जीवन में आये परिवर्तन से ही खड़ा होता है.आज आप चाह कर भी फिर अपने ग्रामीण जीवन में नहीं जा सकते.क्यों की भारतीय समाज की ये सामान्य सोच है कि जहा से चलना शुरू किया उसे याद नहीं रखते.नहीं तो प्रकृति और गाँव भारत में ऐसे उपेक्षित नहीं होते.

Rajeev Pathak said...

पूर्वोत्तर को जानिए :- http://pathakpathak.blogspot.com/ पर.

Parul said...

ranikhet.........pichle saal gaye thai......aur man vahin choot gaya tha..par aaj aapka lekh padhkar malum ho gaya..pyas itni badh kyon gayi hai.. :)

आदर्श युवा मंच said...

पुण्य प्रसून जी,
आलेख अच्छा है। सुबह जब जनसत्ता में आपका यह आलेख पढ़ रहा था तो कई चीजें दिमाग में घुमड़ने लगी- मसलन लोगों की आय में जमीन-आसमान का अंतर। पेड़ काटे जाने और लगाए जाने की संख्या में अंतर। जयराम रमेश सामने आएं तो पर्यावरण की ये चिंता उनके सामने भी अवश्य रखें।
- आदर्श कुमार इंकलाब

बेचैन आत्मा said...

उम्दा पोस्ट.
दो वर्ष पूर्व ..मनाली से रोहतांग दर्रे जाते वक्त सर्पीली सड़कों पर चीटियों के लंबे काफिले की तरह दिख रहीं थी कारें... ऊपर, जहाँ पहाड़ों पर बर्फ की सिल्लियाँ जमीं दिख रहीं थीं, कारों के धुंए से काली पड़ चुकी थीं. काली बर्फ की पहाड़ियों को देख कर यह लगा था कि हम घूमने आए हैं या इन वादियों में जहर घोलने..?

AAINA said...

KAL KHANA KHATE WAQT KHANA MUH SE BAHAR NIKAL AYA, KYOKI NAHI MALOOM THA KI AAPKA REPORTER TRAIN KE ANDAR PAHUCH JAYEGA. AAP APNI KHABRO KO LEKAR PHIR SE AGRESSIVE HO RAHE HAI JO HAR LIHAZ SE ACHHA HAI PAR MAMTA AUR CHIDAMBARM KE KURSI PAR BANE RAHNE KA AB KYA AUCHITY HAI? SABANDHIT LEKH PAR JANE KA MAN HI NAHI HUAA,KAL KA DRISY KIS TARAH BHULAYA JAY.

DEEPAK BABA said...

पंडित जी, बहुत सही लिखा आपने, अब क्या कमेंट्स दूं, लेख पढते पढते खून खोल उठता है. उनके पास पैसा है इसलिए वो हमारी विरासत का नाश कर रहे हैं. हमारे पहाड़ नंगे हो रहे हैं, हमारे मैदान रेगिस्तान में तब्दील हो रहे हैं और हम मूक दर्शक सरकार और इन कंपनियों का खेल देख रहे हैं. जंगल कट कर खेत बन रहे हैं, खेत कट कर प्लाट बन रहे हैं और प्लाट कट कर फ्लैट बन रहे हैं. यानी की शेत्रफल के हिसाब से खरीदी गई जगह बीघा मैं बिक रही है, बीघा से काट कर जमीन गजों (मीटर) में बिक रही है और मीटर मैं खरीदी जगह फूट varg फीट के हिसाब से बिक रही है.
पता नहीं क्यों, कई बार जिन आदिवासियों ने तीर कमान छोड़ कर बन्दूक उठा ली, ठीक लगते हैं.

Harsh said...

prasoon ji pahad ke haalat bahut kharab ho chale hai... yaha par bade bade bhu mafiya aur builder sakriy ho gaye hai jiske chalte iski sundarta par grahan lag gaya hai.. main khud uttaraakhand se hoo cheejo se bhali bhati vakif hu. rajya sarkar ki udyogik neeti mai bhii pahad ki bade paimane par upesha hui hai.. bhajapa sarkar bhii bhu mafiyao ke aage natmastak hai....
boltikalam.blogspot.com

TUMHARI KHOJ ME said...

पुण्‍य प्रसून जी, प्रश्‍न यह नहीं है कि कौन क्‍या कर रहा है बल्कि प्रश्‍न यह है कि कौन क्‍या कर सकता है? जिनके पास पेडों को लगाने की जिम्‍मेदारी है वे कॉटेज बना रहे हैं, जिन्‍होंने इतने दिनों से पेडों के होने का सुख उठाया उन्‍होंने भी एक तरह से इनका दोहन ही किया था पर उनकी आवश्‍यकताएं सीमित थीं इसलिए इसका अहसास न आपको हुआ और न ही किसी और को ।
पर इतना अवश्‍य कहूंगा कि ‘समरथ का नहीं दोष गुसाईं’ अर्थात जिसकी जितनी सामर्थ्‍य है वह उतना दोहन कर रहा है और जो दोहन नहीं कर पाते हैं वे शोर मचा मचा कर दोहन कर लेते हैं।
एक मिसाल और। सब लोग शोर मचा रहे हैं कि कार, ए सी आदि खरीद कर लोग दिल्‍ली को और गरम, संकुचित कर रहे हैं पर ऐसा कौन सा व्‍यक्ति है जिसके पास पैसा होने के बावजूद भी कार और ए सी नहीं है? हमहारी खासियत है कि हम कभी अपने गिरेबान में नहीं झांकते और सारी दुनिया में खोट देखते हैं। वैसे भी हिंदुस्‍तान में दोहन करते रहने के साथ शोर मचाना बहुत मजे का सौदा है इसलिए आप भी इस रसास्‍वादन में डूबे रहिए और अगर वाकई कुछ कर गुजरने की ताकत है तो अपने अंर्तमन में झांक कर देखिए और बताइए कि क्‍या आपके पास कार कार नहीं है, क्‍या एसी नहीं है और क्‍या आपने अभी तक चार पेड भी समाज को दिए हैं?