Friday, July 2, 2010

मोदी-नीतीश टकराव की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा

सोमनाथ मंदिर के परिसर में कैमरा जैसे ही समुद्र की विराट लहरों से मंदिर की अट्टलिकाओं को दिखाता है, वैसे ही अमिताभ बच्चन की आवाज गूंजनी शुरु होती है और सोमनाथ की कथा के बीच मंदिर के घंटों और नगाड़ों के शोर के बीच खो जाती है। कभी गजनी ने सोमनाथ मंदिर को लूटा था और कभी लालकृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से ही अयोध्या के लिये कूच किया था। गजनी के आसरे सोमनाथ की कथा में राजनीतिक पैनापन आता है। यह आज भी सोमनाथ मंदिर के पिछवाड़े मुक्ताचल थियेटर में होने वाले साउंड एंड म्यूजिक कार्यक्रम में सुन कर महसूस किया जा सकता है। लेकिन अयोध्या रथयात्रा की गूंज अब सोमनाथ में नहीं होती। आडवाणी की रथयात्रा ने अयोध्या को राममंदिर तो नहीं दिया लेकिन बाबरी मस्जिद को जमीनदोख्त करने की जमीन जरुर तैयार कर दी और उससे उपजे सांप्रदायिक सवाल आज भी समाज के ताने बाने को छिन्नभिन्न किये हुये हैं। मगर अमिताभ बच्चन की गुजरात कथा में इसका एहसास नहीं है। गुजरात कथा कहने का पहला आइडिया अमिताभ बच्चन का ही था और राज्य के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी से पहली मुलाकात में इस आइडिया को देने से चंद घंटे पहले ही अमिताभ ने हरिवंश राय बच्चन की मधुशाला नरेन्द्र मोदी को भेंट में दी थी। वही मधुशाला जिसमें बच्चन ने साफगोई के साथ लिखा मंदिर-मस्जिद भेद बढ़ाते, मेल कराती मधुशाला।


लेकिन गुजरात में नरेन्द्र मोदी की राजनीति में मधुशाला फिट बैठती नहीं है
, तो क्या मोदी मधुशाला के जरिये गुजरात से आगे की राजनीति देख रहे हैं। अमिताभ बच्चन चाहे अपने बाबूजी यानी हरिवंश राय बच्चन की कविताओं को गाहे-बगाहे गुनगुनाकर अपने कवि प्रेम को छलकाते रहें लेकिन नरेन्द्र मोदी का दिल कवि ह्रदय नहीं है, जो वह संकेत और बिंब की भाषा का प्रयोग करें। उन्हे मंदिर-मस्जिद से ज्यादा हिन्दू-मुस्लिम समझ में आता है। इसीलिये बच्चन की गुजरात गाथा में चंद मुस्लिम चेहरे भी हैं। जो युवा हैं। छात्रायें हैं। जिन्हे गर्व है कि वह गुजरात में हैं।

लेकिन मुस्लिम चेहरो को गुजरात में समेटने का मतलब मोदी की गाथा को अब गुजरात में समेटना सही नहीं होगा। भाजपा जिस मिसफिट तरीके से खुद को बनाये हुये है उसमें मोदी की राजनीति को अगर हटा दें तो लगता यही है कि
2014 में भी भाजपा के रनवे पर ही कांग्रेस उतरेगी । अमिताभ बच्चन गुजरात में फिट बैठते हैं लेकिन गुजरात के बाहर नहीं और गुजरात के बाहर निकलने के लिये अमिताभ बच्चन की जरुरत मोदी को है। यह सवाल इसलिये मौजूं है क्योंकि मोदी की पहचान गुजरात से है या गुजरात की पहचान मोदी से है , दोनो परिस्थितयों में गुजरात कथा बगैर मोदी के पूरी होती नहीं है। तो अमिताभ बच्चन एक हाथ में मधुशाला और दूसरे हाथ में मोदी का हाथ थामे कैसे बीते एक दशक के गुजरात के सच को छुपाकर कथा वाचन करेंगे। भुज से लेकर सूरत और द्वारका से लेकर गांधीनगर घूमते अमिताभ बच्चन को कैसे वह सब नजर नहीं आयेगा जो गुजरात की हकीकत है। अमिताभ क्या मोदी के उस राजनीतिक प्रयोग की गंध से दूर रह पायेंगे जो गुजरात में बतौर संविधान की रक्षा करने वाले पद पर बैठ कर उसकी घज्जियां उड़ाते हुये मोदी ने किया। अमिताभ तो बाबूजी यानी हरिवंशराय बच्चन का नाम बार बार लेते हैं। वह यह भी जानते है कि नेहरु ने हरिवंशराय बच्चन की नौकरी के लिये क्या कुछ किया। और नेहरु ने ही संविधान लागू होने वाले दिन अपने भाषण में यही कहा था , भारत की सेवा का मतलब देश के करोड़ों लोगों की सेवा है । गरीबी और असमानता दूर करना है । हर आंख से आंसू पोंछना है । यह मुश्किल जरुर है । लेकिन नेताओं का काम यही है और जब तक सभी आंखों से आंसू खत्म नहीं होते तब तक हमारा काम अधूरा है।

लेकिन मोदी की राजनीति ने एक कौम की आखो में आंसू और दिल में जख्म दे कर ही अपनी सत्ता संवारी। यह सब अमिताभ बच्चन को दिखायी तो नहीं देगा क्योंकि कब्र पर उगी हरी घास की तरह ही गुजरात के घाव पर वाईब्रेंट गुजरात रेंग रहा है। जिसमें मनमोहन सिंह की विकास गाथा भी है और कारपोरेट घरानों का संसदीय राजनीति को ठेंगा दिखाने का रुतबा भी। तो अमिताभ के वाचन में गुजरात कथा भी इसी में खो जायेगी। लेकिन हीरे की चमक और तराशी के लिये जब सूरत का जिक्र होगा तो क्या अमिताभ भूल जायेगे कि वाईब्रेंट गुजरात में सूरत ही एकमात्र शहर था, जहा मंदी के दौर में हर दिन दो डायमंड वर्कर खुदकुशी कर रहे थे। और आज भी सैकड़ों कामगार हीरे का हुनर छोड़ मजदूर बन चुके हैं।

बहुत मुश्किल है सौराष्ट्र की जमीन पर खड़े होकर औधोगिक विकास की कथा बाची जाये और सौराष्ट्र-भुज के उन एनआरआई के दर्द को भूल जाया जाये जो दंगो से लेकर भूंकप में सबकुछ गंवा बैठे और उनकी जमीन पर राजनीतिक विकास का अनूठा खेल शुरु हुआ, जिसकी एफआईआर आज भी कहीं लिखी नहीं जाती। लेकिन नरेन्द्र मोदी अब अमिताभ बच्चन के जरीये मनमोहन सिंह और चिदंबरम की नीति को ही जिस सलीके से राजनीतिक एफआईआर बना रहे है, वह एक साथ कई सवाल खड़ा कर रहा है। देश की समझ और विकसित कहलाने की कला में एक सच तो यह है ही कि अब इस देश में कोई दूसरा गुजरात संभव नहीं है। लेकिन गुजरात का मिजाज अगर बदल दिया जाये तो देश के कई हिस्सो में आज भी गुजरात हो रहा है और सत्ता अपना राजधर्म छोड कर काम कर रही है
, इससे इंकार नहीं किया जा सकता।

मोदी गुजरात के दाग को धोना चाहते है लेकिन तरीका बाइब्रेंट गुजरात का है । जिसमें मनमोहन सिंह की आर्थिक नीति और चिंदंबरम की आंतरिक कानून व्यवस्था ही सहारा है । और उसपर कांग्रेस के मुस्लिम प्रेम का लोप है। समूचे सौराष्ट्र में जो धंधे दंगों में चौपट हुये और हुनर खत्म हुये उसे दुबारा जगाने के लिये बडी पूंजी वालो को मुनाफे का चस्का दिखाकर नये उद्योग शुर किये जा रहे हैं । बाइब्रेंट गुजरात का यह रंग बाजार में तो सजेगा लेकिन सौराष्ट्र के अल्पसंख्यक समुदाय के ताबूत पर एक कील और गाढेगा। क्योंकि राहत शिविरों से लेकर अलग अलग रास्तों से हाथ का जो हुनर बाजार में पहुंचता है, उसकी कीमत के आगे मशीनी कारीगरी बेहद सस्ती है। इसलिये गुजरात की मुश्किल बाइब्रेंट होना भर नहीं है बल्कि हथियारो का धार के बाद अब बाजार की धार उन्हें खत्म कर रही है।

मुस्लिम छात्राओं की तस्वीरें तो गुजरात गाथा के साथ जोड़ी जा सकती है लेकिन मुस्लिमों के रोजगार के सारे रास्ते और राहत देने वाले सारे सरकारी रास्ते उन्हें
2002 का मुस्लिम ही बनाये रखना चाहते हैं। क्योकि तभी हिन्दू मन को राहत मिल सकती है। लेकिन गुजरात के विकास दर की छलांग अगर मनमोहन सिंह की अर्थनीति को छूने लगे तो मोदी को खारिज कौन कर सकता है। मनमोहन सिंह भी परतों को उठाकर सामाजिक हकीकत तो देखना चाहेगे नहीं क्योकि उनकी विकास की धारा तले की परतें उठी तो सामाज का सच किसान-आदिवासी-ग्रामीण के सवाल पर कही ज्यादा छीछा-लेदर कर सकता है। तो बाइब्रेट गुजरात का तमगा तो मनमोहन सिंह भी मोदी से नहीं छिन सकते। फिर आंतरिक सुरक्षा की जिस लडाई को चिदंबरम तूल दे रहे हैं, मोदी उसी को औजार बनाकर अपनी गाथा को भी लिख रहे हैं। गुजरात के आदिवासी और जंगलों को बचाने का संघर्ष भी दो दशक से ज्यादा पुराना नहीं है। लेकिन चिदंबरम ने जिस तरीके अब माओवाद की हवा बहायी तो उसका लाभ नरेन्द्र मोदी भी लेने से नही चूक रहे। आतंक के फंदे में मुस्लिमों को लाने के खेल से आगे का खेल माओवाद के घेरे में अब उन संघर्ष करने वालो को लाने का शुर किया गया है जो किसी ना किसी रुप में मोदी के राजधर्म के खिलाफ है। कभी डांग में आदिवासियो को खदेड़ कर उनसे जमीन छिनने के खिलाफ हुये संघर्ष से जुडे लोग दस-पन्द्रह साल बाद माओवादी करार दे कर जेल में ठूंसे जा रहे हैं। सूरत में दर्जन भर बंद है तो राजकोट-बडोदरा में कई दर्जन। माओवाद का तमगा लगाने के बाद राज्य पर कोई अंगुली उठा नहीं सकता क्योकि यह लाइसेंस भी देश के गृमंत्रालय ने दे दिया है। तो मोदी इस लाभ को उठा कर अपनी राजनीतिक गाथा को भी केन्द्र सरकार से कहीं आगे ले जा रहे हैं।

ऐसे में जो सवाल मोदी को बार बार डिगा सकता है वह मुस्लिमों का है। इस पर कांग्रेस का लेप चढाकर मोदी एक नयी राजनीति की शुरुआत भी बिहार से कर रहे हैं। कांग्रेस ने मुस्लिमों को सिर्फ इस्तेमाल किया यह बात बिहार की राजनीति में खुलकर लालू प्रसाद यादव
, रामविलास पासवान और नीतीश कुमार करते है। बिहार की राजनीति में कांग्रेस ना सिर्फ हाशिये पर है बल्कि भागलपुर दंगों के बाद से वनवास का दर्द छेल रही है। और भागलपुर की टीस बिहार में अयोध्या और गुजरात से आज भी ज्यादा है। लेकिन बिहार में कोई भी कांग्रेसी पोस्टर मुस्लिम के बगैर अधूरा माना जाता है । मोदी ने कांग्रेस के इसी मुस्लिम प्रेम में अपने मुस्लिम प्रेम को जोडकर एक तीर से कई निशाने साधने की पहल की है। मुस्लिमों को लेकर भाजपा का राजनीति दर्द यही है कि अटल बिहारी वाजपेयी के बाद कोई नेता है नहीं जो मौलाना टोपी पहन कर संघ राजनीति को आगे बढ़ाये। और बाइब्रेंट मोदी के अलावे भाजपा के पास कोई नेता है नहीं जो हिन्दुत्व की गर्मी तले विकास की चादर भी ओढे और केन्द्र सरकार को ठेंगा भी दिखाये। मोदी की यही राजनीतिक समझ उन्हें बार बार गुजरात से बाहर ले जाने के लिये प्रेरित करती है। बिहार में नीतीश के साथ खुद को दिखाकर मुस्लिम प्रेम की जो लकीर नरेन्द्र मोदी खींचना चाहते थे, वह उनकी राष्ट्रीय मान्यता पाने की महत्वकांक्षा का अक्स है। लेकिन दूसरी तरफ मोदी को गुजरात में समेट देना नीतीश की राष्ट्रीय मान्यता पाने की महत्वकांक्षा का भी हिस्सा है। बिहार के सभी मुस्लिम नीतीश के साथ आ जायेगे यह सोचना भूल होगी लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर मुस्लिम समुदाय नीतीश को मौलाना नीतिश के तौर पर मान्यता दे देगा, इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता है। इसलिये नीतीश-मोदी की तकरार बीजेपी-जेडीयू की तकरार नही है बलिक गुजरात और बिहार के बाहर राष्ट्रीय महत्वकांक्षा लिये हुये मोदी-नीतीश का टकराव है, जिसका लाभ संसदीय राजनीति में कौन तीसरा उठायेगा....देखना यह दिलचस्प होगा।

12 comments:

राकेश पाठक said...

'यूपी में दम है क्योंकि जुर्म यहां कम है' कभी ये नारा अमिताभ बच्चन के मुंह से सपा के लिए बने एक ऐड में सुनने और देखने को मिला था। और उसके बाद सपा यूपी में लगभग ज़मींदोज़ हो गई। फिर ऐसा कैसे हो सकता है कि मोदी अमिताभ के सहारे गुजरात से बाहर निकलने की जुगत लगा रहे हैं। ध्यान देनेवाली बात ये है कि अमिताभ की सामाजिक स्वीकारोक्ति उनके कला पक्ष की वजह से है न की महात्मा की छवि की वजह से।
दूसरी बात मोदी-नीतीश मामले में यकीनन राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा अहम है लेकिन ये खालिस उसका टकराव दिखाई नहीं देता इससे इतर नीतीश दरअसल मोदी पर हमला करके दो लक्ष्य हासिल करना चाहते हैं एक मुस्लिम वोट बैंक को फुसलाने का जिसे कांग्रेस ने एक मुस्लिम प्रदेश अध्यक्ष बना कर फोड़ने की कोशिश की है। दूसरा इस छवि को तोड़ने का भी जिसमें विपक्ष उनपर संघ या फिर भाजपा के झंडेतले काम करनेवाला मुख्यमंत्री करार देकर हमले करता है।

डॉ .अनुराग said...

अमिताभ एक चतुर व्योपारी है .....राजीव गाँधी से .मुलायम....ओर फिर मोदी तक का सफ़र करते है ........वे सारे राजनैतिक साथियों के साथ होने वाले लाभ चुचाप लेते है .पर उनके साथ से हुई हानियों पर शोर मचाते है .अपने ब्लॉग पर भी ओर मीडिया में भी......
एक बात मुझे अभी तक समझ नहीं आती .के मोदी की गलतियों को मीडिया याद रखता है ......पर पचीस हज़ार जान लेने वाले अर्जुन सिंह को सिर्फ दोषी कहकर भूल जाता है ....क्या राजीव गाँधी को बिना सूचित किये अर्जुन सिंह वो निर्णय ले सकते थे .......कोंग्रेस का इतिहास बताता है किसी मुख्य मंत्री में इतनी हिम्मत नहीं .....इससे मोदी की गलतिय कम नहीं हो जाती...
दरअसल बतोर एक भारतीय नागरिक मेरे लिए सब दोषी है .....मै चाहता हूँ मीडिया भी सब को एक सामान देखे ......ठीक वैसे जैसे वे असल में है......

सम्वेदना के स्वर said...

प्रसून जी! विडम्बना यही है कि स्वंम को निरपेक्ष सिद्ध करने के लिये आप को भी मोदी को लतियाना पडता है. उनकी कविता या कवित्त को समझने की क्षमता को बडे मज़े से आप ने शून्य कह दिया.

ब्रांडिंग का खेल भर है भारत की राजनीति....
इलेक्ट्रानिक मीडिया ने इसकी ताकत और बडा दी है..

पीयूष पाण्डे said...

सहा कहा....लेकिन नीतीश की दिक्कत यह है कि तमाम उपलब्धियों के बावजूद वो बिना भाजजा के बिहार में अपनी नैया पार नहीं लगा सकते।

E-Guru Rajeev said...

(एक बात मुझे अभी तक समझ नहीं आती .के मोदी की गलतियों को मीडिया याद रखता है ......पर पचीस हज़ार जान लेने वाले अर्जुन सिंह को सिर्फ दोषी कहकर भूल जाता है ....क्या राजीव गाँधी को बिना सूचित किये अर्जुन सिंह वो निर्णय ले सकते थे .......कोंग्रेस का इतिहास बताता है किसी मुख्य मंत्री में इतनी हिम्मत नहीं .....इससे मोदी की गलतिय कम नहीं हो जाती...
दरअसल बतोर एक भारतीय नागरिक मेरे लिए सब दोषी है .....मै चाहता हूँ मीडिया भी सब को एक सामान देखे ......ठीक वैसे जैसे वे असल में है......)---साभार डॉ. अनुराग.
आपका विश्लेषण मोदी विरोधी और भाजपा विरोधी है, जबकि आपको भारत का नागरिक होकर सोचना चाहिये, जो कि आपने नहीं किया है.

Mukhtej singh said...

bajpai ji,apne desh ki ye sabse badi dikkat hai apni rajnaitik rotiyon ko sekane ke chakkar me DESH ko sabne pichhe dhakel diya hai.chahe wo kisi bhi party ke karndhar ho.

TUMHARI KHOJ ME said...

पुण्‍य प्रसून जी,
इस विषय पर आपका पूर्वाग्रहों से ग्रसित यह ताजा लेख पढा और तुंरत मुझे आपके ब्‍लॉग पर इशरत जहां पर 9 सितंबर 2009 का लिखा लेख याद आ गया जब आपने अतिंम पैरा में लिखा था “सवाल है इसकी मजिस्ट्रेट जांच कब होगी और इसकी रिपोर्ट कब आयेगी। जिसके घेरे में कौन कौन आएगा कहना मुश्किल है लेकिन इसका इंतजार कर फिलहाल इताना तो कह सकते हैं-इशरत हमें माफ कर दो।“
मैं सिर्फ इतना कहूंगा सच सिर्फ सच होता है वह चश्‍मों के बदलने से नहीं बदलता और तारीखें केवल सच को पुख्‍ता करती हैं पूर्वाग्रहों को नहीं।

Nikhil Srivastava said...

लेख बहुत अच्छा है सर. विश्लेषण बेहतरीन है. सब कुछ है पर एक बात समझ में नहीं आई कि जो हेडिंग कह रही है वो तो आखिरी पैरे में नजर आया.

कुमार आलोक said...

गुजरात मोदी की जागिर नही है ...लेकिन उस महाराष्ट्र से बढिया है ..जहां आप सूरत शहर को ही देख लिजीये कितने बिहारी और उत्तर भारत के लोग आबाद है । सूरत शहर का सबसे बडा कपडा व्यापारी हरियाणा का है । वहां ऐसी राजनीति कभी देखने को नही मिली जब बाहर के प्रदेश से आये लोगों पर अपराधियों के जैसा व्यवहार किया गया हो। वहां के इकनामी में बाहर से आये लोगों का अहम योगदान है । महाराष्ट्र में बाह से आये लोगों पर जुल्म हुये ..एमएनएस अपराधी था ...लेकिन जिन राष्ट्रीय पार्टियों ने नंगे नाच को मूक दर्शक बनकर देखा वो राज ठाकरे से कहीं ज्यादा कसूरवार है। अमिताभ अपनी भद्द पिटवा टुके है उत्तम प्रदेश का ऐड बनवाकर ...मोदी को कितना हद तक राष्ट्रीय पहचान दिलवा पायेंगे यह तो समय ही बताएगा। नीतिश कुमार और मोदी का प्रसंग और कुछ नही बल्कि खबरों में अपने आपको बनाये रखने का था । ५०० करोड लौटाकर नीतिश ने क्या संदेश दिया है? मुंबइ के भाजपा अधिवेशन में आने के लिये नीतिश ने आडवाणी से पैरवी की थी । बिहार में उंची जातियों के समर्थन लेने के लिये उन्हें भाजपा के शरण में फिलहाल कुछ और दिन रहना पडेगा । अगर नीतिश सचमुच भाजपा और मोदी से इतना खिन्न है तो उन्हें नवीन पटनायक के जैसा साहसिक कदम उठाना होगा जिसकी औकात नीतिश में नही है ।

DEEPAK BABA said...

वाजपई जी, मैं डॉ अनुराग से सहमत हूँ, की अमिताभ एक चतुर व्यापारी की तरह अपनी जिंदगी आगे बड़ा रहे रहे हैं. ले दे कर मधुशाला का गिफ्ट और हर राजनितिक मंच पर "बैर बढ़ाते मंदिर मस्जिद - मेल कराती मधुशाला" का पाठ. पता नहीं आप जैसे सुलझे हुवे पत्रकार कब मोदी आग्रह से मुक्त होंगे. दंगे हरेक दल की सरकार में हुवे. क्या समाजवादी, क्या कांग्रेसी और क्या जनसंघी. आप जैसे ही पत्रकारों नें इशरत जहाँ का मुद्दा जोर शोर से उठाया था ... पर आज उसकी कलाई खुलने लगी है.

AAINA said...

kya rawan ram ho sakta hai

VIVEK DUBEY said...

सवाल है इसकी मजिस्ट्रेट जांच कब होगी और इसकी रिपोर्ट कब आयेगी। जिसके घेरे में कौन कौन आएगा कहना मुश्किल है लेकिन इसका इंतजार कर फिलहाल इताना तो कह सकते हैं-इशरत हमें माफ कर दो।“ ye aapne hi likha tha apne purane lekh me, ab usi nusrat ke bare me clear ho chuka hai ki wo ek aatmghati hamlawar thi to kya mane aapke lekh bhi purvagrah se grasit hote hai. modi to sahi nahi hai isme koi sandeh nahi, per aapke galat lekh likhne per dukh hota hai