Saturday, April 16, 2011

भगत सिंह...गांधी और अण्णा हजारे

“अगर यह आजादी का दूसरा आंदोलन है तो क्या आप दूसरे महात्मा हैं। मैं तो महात्मा गांधी के पांव की धूल भी नहीं हूं। लेकिन एक बात कहूंगा कि भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने जो एहसान हम देशवासियो पर छोड़ा है, उसका एक अंश भी अगर हम देश को बनाने में चुका दें तो बहुत बड़ी बात होगी। और हमारा संघर्ष यही है।“ आमरण अनशन तोड़ने के बाद अन्ना हजारे की इस सोच ने पहली बार संसदीय व्यवस्था के उस ताने-बाने को झटक दिया, जिसके सुर गांधी और कांग्रेस में समाये रहते थे। किसी संघर्ष को अंजाम तक पहुंचा कर भगत सिंह का नाम कोई गांधी के अहिंसा में घोल दें तो यह न तो वामपंथी कर पाये और न ही दक्षिणपंथी दल। और कांग्रेस भी गांधी के दांये-बांये देखने से ना सिर्फ बचती रही बल्कि गांधी की सोच में कांग्रेस की जमीन को खड़ा मान कर उसने हर बार देश के हर मुद्दे से बचने के लिये गांधी को ही ढाल बनाया।

लेकिन अन्ना हजारे ने गांधी के उन्हीं सवालों को नये तरीके से उछाला, जिन सवालो को कभी गांधी ने नेहरु को कहे थे। नेहरु के सरकार गठन के दौर में सिर्फ कांग्रेसियों को तरजीह दिये जाने पर गांधी ने नेहरु को यही समझाया था कि आजादी समूचे देश को मिली है, सिर्फ कांग्रेस को नहीं। और 63 बरस बाद अन्ना हजारे ने चुनी हुई मनमोहन सिंह की सरकार को यही कहा कि देश सवा सौ करोड़ लोगो का है और इतनी तादाद में लोगों की जरुरतों को संभालने और उसकी व्यवस्था करने के लिये सरकार चुनी जाती है न कि सरकार की जरुरत और सुविधा के मुताबिक सवा सौ करोड़ लोगों को चलना होगा।

यह वक्तव्य चाहे बहुत छोटा लगे लेकिन संसदीय व्यवस्था की वर्तमान तानाशाही के लिये इससे बड़ी चेतावनी और कोई हो नहीं सकती है। फिर गांधीवादी तरीके से दी गई चेतावनी में भगत सिंह के तेवर यानी संघर्ष की जुबान ऐसी जो बिना जनमानस को साथ जोड़े कोई इस देश में कहे और सरकार को खतरा लगने लगे तो उसके खिलाफ राजद्रोह की धारा भी लग जाये। लेकिन अन्ना हजारे ने जिस मासूमियत से भ्रष्टाचार पर नकेल कसने के लिये जनलोकपाल विधेयक के आसरे चुनाव में सुधार के संकेत के लिये अगले संघर्ष की धुन छेड़ी, उसमें लोहिया से लेकर जेपी और भगत सिंह से लेकर गांधी तक की महक आ गयी। और इसी दायरे में हर उस व्यक्ति के छोटे-छोटे सपने जुड़ते गये जो दिल्ली के जंतर-मंतर से लेकर मुंबई के आजाद मैदान और देश के हर शहर जुटा और झटके में लोकपाल विधेयक का कैनवास भी बड़ा हो गया और आंदोलन का चेहरा भी।

मनरेगा में काम की एवज में सौ रुपये में से 40 रुपये सरकारी ठेकेदार को बतौर कमीशन देने से परेशान बुंदेलखंड के वीरेन्द्र हो या फिर बाहरी दिल्ली में उघोग चलाने का लाईसेंस लेने में तीन करोड़ की घूस देने की मजबूरी तले दबे अरुण कुमार। या फिर जॉब कार्ड मिलने के बाद भी राजस्थान में गंगापुर के बेरोजगार अशोक भाई हो या गुजरात के गांव पांगर घवडे के विठ्ठल रावडे, जो ग्रामपंचयत के भ्रष्टाचार से दुखी होकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर आ पहुंचे। सभी की आंखो में एक ही सपना है कि कोई तो ऐसा नायक हो जो देश को पहले माने और गड़बड़ी करने वालों के कान उमेठ दे या कानून सजा देने लगे।

जाहिर है पांच दिनों में सिर्फ दिल्ली के जंतर मंतर पर अगर लाखों लोगों की आवाजाही होती रही तो फक्कड से लेकर करोड़पतियों के चेहरे भी वहीं दमके और बेरोजगार युवाओं के साथ साथ हर क्षेत्र में कामयाबी के पायदान चढते प्रोफेशनल भी नजर आये । यानी जिन्हें धन कमाना है और जिन्हें रोजगार चाहिये और जो धनी हैं, जो बेरोजगार नहीं है, सभी के सवाल पहली बार एक धागे में पिरोये नजर आये। क्योंकि हर के जहन में सवाल एक ही था कि ईमानदारी और विश्वसनीयता सत्ता-सरकार से जब गायब हो चुकी है तो फिर रास्ता कैसे निकलेगा। यानी अन्ना हजारे के आवरण अनशन से सरकार डर गयी यह कहने से पहले समझना यह भी होगा कि आम लोगों के जहन में संसदीय सत्ता की जो परछाई है, वह पहली बार सफेद-काले में नजर आयी। और सियासत का काला चेहरे देश के हर जतर-मंतर पर बितते वक्त के साथ यह सवाल खड़ा कर रहा था कि जन-लोकपाल से आगे का रास्ता क्या होगा। और इसी मोड़ पर यह सवाल भी उठा कि क्या आंदोलन अन्ना हजारे को चलायेगा या अन्ना के एकमात्र लोकपाल विधेयक को बनाने में जनता की भागेदारी के साथ ही आंदोलन भी खत्म होगा। असल में परिस्थितिया दोनों आयी और निर्णय भी दोनो ही हुये। जिस लोकपाल विधेयक पर उठे आंदोलन के सामने सरकार नतमस्तक हुई, उसी जनसमूह के आंदोलन के सामने अन्ना भी नतमस्तक हुये। इसीलिये बिना किसी राजनीतिक दल से जुड़े हुये और सत्ता की आंकाक्षा से दूर अन्ना ने चुनाव सुधार की एक ऐसी गोटी आंदोलन खत्म करने के साथ फेंकी, जिसमें चुनाव के वक्त उम्मीदवारों की फेरहिस्त में एक खाना खाली भी हो और वह अन्ना हजारे का हो । यानी हर उम्मीदवार गड़बड़ है तो कोई मंजूर नहीं है पर ठप्पा लगा कर आम नागरिक उसी चेतावनी को दोहरा दे जो अन्ना हजारे ने जनलोकपाल विधेयक पर छिड़े आंदोलन से चेताया। यानी जन-भागेदारी के इस मंत्र में पहली बार समूची संसदीय राजनीतिक व्यवस्था को ही सत्ता में तब्दील कर अन्ना हजारे ने यही सवाल उठाया कि जो भूमिका सत्ताधारी और विपक्ष की होती है, वह इस दौर में खत्म हो चुकी है। नेता हो या मंत्री या कोई भी राजनीतिक दल। सभी आपस में एक दूसरे का विकल्प है। यानी संसदीय राजनीति में चैक एंड बैलेंस की जो समझ संविधान में मौजूद है, वर्तमान में चैक करने वाला तत्व गायब हो चुका है। अब चैक आम नागरिक को करना होगा और यह चैक सिर्फ चुनाव के नाम पर नहीं हो सकता है। क्योंकि भ्रष्टाचार की असल ट्रेनिंग राजनीतिक सत्ता से ही शुरु होती है और वोटर के सामने विकल्प नहीं है। इसलिये सवाल शरद पवार का नहीं है, जो भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरेने के बावजूद सरकार के उस मंत्री समूह का हिस्सा बने रहे, जिसे भ्रष्टाचार पर नकेल कसनी है। लेकिन रास्ता यह भी नहीं है कि अंगुली उठने पर पवार पद छोड दें और फिर देश किसी दूसरे पवार के आने का इंतजार करें। इसलिय राइट टू रिकॉल का सवाल भी अन्ना हजारे नीतर यह सवाल उठाया । और नकेल कसने के लिये आम वोटर को हमेशा तैयार रहने को भी कहा। लेकिन इस प्रक्रिया में जो सबसे बड़ा सवाल संकेत के तौर पर उठा वह राजनीतिक शून्यता का है। चूंकि संसदीय व्यवस्था की समूची ट्रेनिंग ही संसद को सर्वोपरी मानती है और जन-लोकपाल विधेयक को भी इसी रास्ते गुजरना है तो फिर संसद के भीतर अलग अलग राजनीतिक दलो की भूमिका होगी क्या। अगर सरकार के पांच मंत्रियों के समूह के साथ सिविल सोसायटी की नुमाइन्दगी करने वाले पांच सदस्यों के समूह के ड्राफ्ट को संसद खारिज कर दें तो क्या होगा। यानी विपक्ष में बैठे राजनीतिक दल अगर संसद के भीतर यह सवाल उठा दें कि किसी विधेयक को तैयार करने में अगर संसद के बाहर के पांच सदस्यो को लिया गया और उन्हे कोई संवैधानिक पद भी नहीं दिया गया तो इसे क्यों माना जाये। या फिर राजनीतिक दल सरकार पर यह आरोप लगाये कि अन्ना हजारे पर फैसला लेने से पहले सर्वदलीय बैठक क्यों नहीं बुलायी गयी। जबकि अन्ना हजारे ने अपने आंदोलन के जरीये सांसदो की नुमाइन्दगी पर ही सवालिया निशान लगा दिया। यानी आंदोलन की बुनियाद ही इस बात पर खड़ी है कि संसद भ्रष्टाचार के सवाल पर सही पहल करने में नाकाम रही।

दरअसल, संसद या सांसदो के जरीये यह सवाल मानसून सत्र में जनलोकपाल विधेयक रखते वक्त नहीं उछलेगा यह सोचना भी बचकानापन होगा, क्योकि पहली बार संसदीय व्यवस्था को आम नागरिको के आक्रोश ने अन्ना हजारे के जरीये खारिज किया है। या कहे संसदीय सत्ता को यह निर्देश दिया है कि आपका काम व्यवस्था बनाने और चलाने का है। उसके तौर तरीको को सत्ता या संसद के अनुकूल बनाने का नहीं है। लेकिन संसद की वर्तमान परिस्थितियों को देखकर अगर पहला सवाल यह खड़ा होता है कि महिला आरक्षण की तर्ज पर संसद का हंगामा लोकपाल विधेयक को भी लटका दें। यानी लालू यादव, मुलायम सिंह यादव, मायावती या करुणानिधि या फिर शरद पवार सरीखे नेताओ के राजनीतिक दल अपने नेताओ के लोकपाल विधेयक के दायरे में आने के मद्देनजर संसद ही ना चलने दें। या कहे संसद के 145 सासंदो पर जब भ्रष्टाचार के मामले दर्ज है और संयोग से जिस महात्मा गांधी का नाम लेकर अन्ना हजारे ने आंदोलन शुरु किया तो उन्ही की जन्मभूमि पोरबंदर के कांग्रेसी सांसद विठ्टलभाई पर जब सबसे ज्यादा मामले दर्ज हैं तो अपने खिलाफ फाइल खोलने के लिये बनने वाले कानून पर यह संसद मुहर कैसे लगायेगी। लेकिन इसका जवाब भी पहली बार अन्ना हजारे के आंदोलन से निकला है कि संसदीय राजनीति के मूल में जब आम नागरिक या कहे वोटर है और वहीं संसदीय व्यवस्था के नियम कायदो को लेकर सडक पर होगा तो फिर संसदीय व्यवस्था को तौर-तरीके बदलेंगे या संसद भी आम नागरिक के आंदोलन के अनुकूल कार्ररवाई करने को बाध्य होगी। क्योंकि जब घोटालो में खुद मनमोहन सिंह फंसते है तो वह चुनाव में अपनी जीत और कटघरे में खड़े करने वाले राजनीतिक दलो की हार में आइना दिखाकर खुद को बचाने से नहीं कतराते। तो जब वही जनता अपने मुद्दो को लेकर सरकार और सासंदो के कान उमेठेगी तो संसद क्या करेगी, यह मानसून सत्र में देखना दिलचस्प होगा और 15 अगस्त के बाद कही ज्यादा खतरनाक भी। क्योंकि आजादी के बाद पहली बार कोई ऐसा नायक मुद्दो को लेकर जनता से जुड़ा है या जनता उससे जुड़ी है जो किसी राजनीतिक दल का नहीं है। चकाचौंध की अर्थव्यवस्था का नहीं है। और उसके पास गंवाने या पाने का कुछ भी नहीं है। सिवाय देश को ईमानदारी का सपना दिखाने के।

5 comments:

LOVE AND ONLY LOVE said...
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FAshionClutch said...

भ्रष्टाचार से लडने का माहोल जो आज देश मई आण हजारे नि बनाया है, उस का मसोदा कुछ हद तक केंद्रीय सतर्कता आयोग को भी जाता है, अगर केंद्रीय सतर्कता आयोग की रिपोर्ट के उपर गौर किया जाये तो २००९ मे १५५४१ भ्रष्टाचार के अंतर्गत दर्ज हुए, जो सीदा नौकरशाह आईएस, के खिलाफ थे. उन १५५४१ मामलो मे से ५००० केस मे केंद्रीय सतर्कता आयोग ने कठोर करवाई की मांग की, और बाकि ९००० मामलों मे कोमलता बरती.

Rahul Tiwari said...

कुछ बात है अन्ना की रोशनाई में
बिगुल की तान है उनकी शहनाई में

Ayush Mittal said...

firstly prasoon sir i watch your programme every week n 5 days. n i m your great fan. yahi kehna chaunga ki aapne bhi anna hazare ki trah ek muhim ched rakhi hai is desh ke sach ko ujagar karne ki aur logo ka vastvikta se prichya karane ki. aur aapki is manohari vaani dwara hum bhi bahut kuch siikhne ka prayas karte hain.

raashtrachintan said...

क्या भ्रष्ट लोगों को साथ लेकर अन्ना हजारे भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई ईमानदारी से लड़ पायेंगे? गांधी साधनों की पवित्रता पर अत्यन्त जोर देते थे और अन्ना हजारे ? अब देश पर एक और गांधी मत लादिये....गांधी आयेंगे तो साथ एक नेहरू वंश भी आयेगा.....आयेगा क्या आता दिख रहा है।