Saturday, April 13, 2013

पानी गटक गई शुगर लॉबी : महाराष्ट्र सूखा- पार्ट 2

लातूर एक बेहतरीन उदाहरण है कि कैसे शुगर लॉबी ने पानी से लेकर खेती तक को हड़प लिया। 1972 के सूखे के वक्त ही वर्ल्ड बैंक ने मदद देने के साथ महाराष्ट्र सरकार के सामने तीन शर्ते रखी थीं। पहली वॉटर मानिंग की जगह वाटर हार्वेस्टिंग करना। दूसरा गन्ने की खेती कम करना। और तीसरा ट्यूब वैल का आधुनिक तरीके से इस्तेमाल करना, जिससे पानी बचा रहे। सरकार ने तीनों आधारो को खारिज कैसे किया यह तो पूरे महाराष्ट्र में देखा जा सकता है। लेकिन शुगर लॉबी के आगे सबकुछ कैसे लुटाया गया इसका उदाहरण है लातूर । 1972 में सिर्फ 6 हजार हेक्टेयर जमीन पर गन्ने की खेती होती थी। लेकिन 2012 में यह बढ़कर 52 हजार हेक्टेयर हो चुका है। 1972 में कोई शुगर फैक्ट्री लातूर में नहीं थी। लेकिन 2013 में एक दर्जन शुगर फैक्ट्री लातूर में है। जिसमें सिर्फ साई शुगर फैक्ट्री को छोड दें तो बाकी 11 शुगर फैक्ट्री राजनेताओं की हैं, जिनका महाराष्ट्र में राजनीतिक कद बेहद बड़ा है। मसलन विलासराव देशमुख के परिवार के पास चार शुगर फैक्ट्री [ माजरा, रेणा, विकास, 21 वीं सेंचुरी ] हैं। शिवराज पाटिल [जय जवान जय किसान[, बाबा साहेब पाटिल [सिद्दी शुगर फैक्ट्री ], निलंगेकर [शिवाजी राव पाटिल शुगर कोपरेटिव ] , दिलिपराव देशमुख [जागृति शुगर फैक्ट्री] , अरविंद
काबले [ प्रियदर्शनी ] यानी हर राजनीतिक दल के नेताओं की शुगर फैक्ट्री।

संकट यहीं से पानी को लेकर शुरु होता है। क्योंकि एक दर्जन शुगर फैक्ट्री को जितना पानी चाहिये उसमें लातूर की 60 फीसदी जमीन की सिंचाई हो सकती है। लेकिन महाराष्ट्र सरकार ने खेती की कीमत लगाने की नीति ही ऐसी बनायी, जिससे दाल, चावल, गेहूं या सोयाबीन उगाने वाला भी गन्ना उगाये क्योंकि गन्ने की कीमत ही सबसे ज्यादा मिलती है। बाकी फसल की कोई कीमत है नहीं। तो किसान भी गन्ना उगाने पर मजबूर है।  लेकिन सूखे के दौरान भी हर शुगर फैक्ट्री को उसकी जरुरत के हिसाब से पानी दिया जा रहा है. खास बात यह है कि विलासराव के बेटे विकास देशमुख ने अपने नाम से जो नयी शुगर फैक्ट्री खोली है, उसका उदघाटन करने पिछले दिनों सोनिया गांधी गईं और संयोग से अप्रैल के पहले हफ्ते में भी जब सूखे को लेकर समूचे मराठवाड़ा में हाहाकार मचा हुआ है तब भी विकास शुगर फैक्ट्री में पानी सप्लाई उसकी जरुरत के मुताबिक जारी थी।

1 comment:

अमित भारतीय said...

आपकी रिपोर्टिँग को देखकर पक्का कह सकता हूँ कि पत्रकारिया आज भी मिशन, भले ही कुछेक पत्रकारोँ के लिए सही