Wednesday, May 15, 2013

गांधी मैदान को ना ठगिये


परिवार, परिवर्तन या पद। चाहिये क्या । पटना के गांधी मैदान में पटे पड़े पोस्टर को देख कर हर किसी ने कहा परिवार। पोस्टर को पढ़ा तो हर किसी को लगा बात तो परिवर्तन की हो रही है। और जब भाषण हुआ तो लगा लड़ाई तो सत्ता की है, पद पाने की है। पटना के गांधी मैदान ने इतिहास बनते हुये भी देखा है और बने हुये इतिहास को गर्त में समाते हुये भी देखा है। लेकिन पहली बार गांधी मैदान ने जाना समझा कि वक्त जब बदलता है तो संघर्ष के बाद परिवर्तन से ज्यादा संघर्ष करते हुये नजर आना ही महत्वपूर्ण हो जाता है। यह सवाल लालू यादव के लिये इसलिये है क्योंकि कभी जेपी के दांये-बांये खड़े होकर लालू और नीतीश दोनों ने इंदिरा गांधी को घमंडी और तानाशाह कहते हुये जेपी की बातों पर खूब तालियां बजायी हैं। और सत्ता में खोते देश में सत्ता के लिये हर संघर्ष करने वाले को सत्ताधारी अब तानाशाह और घमंडी नजर आने लगा है। यह सच भी है कि कमोवेश हर सत्ताधारी तानाशाह और घमंडी हो चला है। लेकिन इसे तोड़ने के लिये क्या वाकई कोई राजनीतिक संघर्ष हो रहा है। असल में लालू यही चूक रहे हैं और नीतिश इसी का लाभ उठा रहे हैं। दरअसल, इतिहास के पन्नों को टटोलें तो पटना के गांधी मैदान में लालू यादव और नीतिश कुमार ने 1974 से 1994 तक एक साथ संघर्ष किया। और अब इसी गांधी मैदान से नीतिश की सत्ता डिगाने के लिये लालू यादव अपने बेटे की सियासी ताजपोशी करते दिखे।

और गांधी मैदान जो बिहार ही नहीं देश की बदलती सियासत का गवाह रहा है, उसे एक बार फिर उसे संघर्ष में सत्ता पाने का लेप लगते हुये देखना पड़ा। क्योंकि जेपी और कर्पूरी ठाकुर के दौर में नाते-शिश्तेदारों के खिलाफ राजनीतिक जमीन पर खड़े होकर संघर्ष करने की मुनादी करने वाले लालू यादव कितना बदले इसकी हवा परिवर्तन रैली में बहेगी। परिवर्तन की नयी बयार बिहार की सियासत के लिये इसलिये महत्वपूर्ण है क्योंकि अभी तक सत्ता के लिये लालू का हर संघर्ष नीतिश की सत्ता को ही मजबूत करता रहा है। और नीतिश हमेशा ठहाका लगाकर यह कहने से नहीं चूकते कि मुझे हटाकर क्या लालू की सत्ता चाहते हैं। और बिहार की जनता खामोशी से नीतिश धर्म को ही बेहतर मान चुप हो जाती है। लेकिन इस बार लालू का वार दोहरा है, जिसमें वह खुद को माइनस कर चलते दिखे और गांधी मैदान में युवा बिहार के लिये अपने बेटों के जरीये विकल्प का सवाल उठाते दिखे तो मोदी के डंक को मुस्लिमो को चुभाकर नीतिश के आरएसएस के गोद में बैठने की बात भी कह गये।

लेकिन लालू की सबसे बड़ी मुश्किल वही कांग्रेस है, जिसकी पीठ पर सवार होकर उन्होंने दिल्ली की सत्ता का स्वाद भी लिया। अब वही कांग्रेस लालू को पीठ दिखा कर नीतिश को साधने में जुटी है। और लालू के पास इसका जवाब नहीं है जबकि कभी जेपी ने गांधी मैदान में जब नारा लगाया था इंदिरा हटाओ देश बचाओ तब लालू जेपी के साथ खड़े थे। ऐसे मोड़ पर गांधी मैदान परिवर्तन की गूंज कैसे सुन पायेगा और परिवर्तन के नाम पर सिर्फ भीड भड़क्का को ही देखकर इतना ही कह पा रहा है कि लालू का मिथ टूटा नहीं है। क्योंकि भरी दोपहरी और फसल में फंसे किसान-मजदूरों के बीच भी रैली हो गई। यह अलग बात है कि रैली ने यह संदेश भी दे दिया कि बिहार परिवर्तन चाहता है और उसे विकल्प की खोज है। लेकिन कोई परिवार, परिवर्तन या पद के नाम पर गांधी मैदान के जरीये बिहार को ठग नहीं सकता है।

5 comments:

Manish jha said...

बिल्कुल सही है नितीश बाबु के पास अब यही हथकंडा बचा है ,''मै नहीं तो क्या लालू का राज चाहिए''...असल में लालू ने लूटा है और नितीश ने एक पंचवर्षी में भिंगोया था अब निचोड़ रहे है.. असली बिहार देखना है तो रात के टाइम में कभी सेटेलाइट पर बिहार के तश्वीर को निहारियेगा, अँधेरा कायम रहे टाइप दृश्य दिखेगा....बिहार के जनता के पास अब कोई ठोस विकल्प भी नहीं बचा , क्योंकि नितीश ने वादा किया था की अगर बिजली नहीं आई तो इस बार वो वोट मांगने नहीं आयेंगे , तो बचे लालू जिनका कारनामा २० साल बिहार देख चूका है. ..तो फिर आप्शनम

raakesh pathak said...

सर क्या आपको लगता नहीं कि परिवारवाद के मसले पर ये असंतोष पार्टी के भीतर भी करवट ले रहा होगा? खासकर तब जब सदन में नेता प्रतिपक्ष अब्दुल बारी सिद्दकी गांधी मैदान के मंच पर दूसरी पंक्ति में बिठाए गए हों और आगे की पंक्ति में लालू का कुनबा नज़र आए।

रात का अंत said...

Puri aur samosa khate Log kahte sune gae lalu ki railly me do wajah se jate hai ek to patna ghume ke sath sath comptision ki tyari kar rahe bete se muft me milna hojata hai aur dusra jivan ke tanav me pet pakad ke hasen kafi din hojata hai, to uskelie.

रात का अंत said...

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sharad said...

नितिश ने पटना ओर दिल्ली की‌ रेलीया मे खूब वाह वाही कमाई...जब ‌बिहार मे नितिश की ही हवा दिख रही है तो शायद लालू प्रसाद को यह एहसास हुआ की अगली सत्ता भी नितिश कोही मिलेगी..2014 के चुनाव को ध्यान मे रखकर अपने दो बेटो को राजनिती मे उतारकर बिहार को यंग नेता देने की कवायत चल रही है... जो बाप नही कर पाया वो बेटे करेंगे..
या जो बाप ने किया वही बेटे भी करेंगे.. य सबसे बडा सवाल बिहार के लोगो के सामने है...