Wednesday, August 14, 2013

15 अगस्त : वक्त मिले तो सोचिएगा

क्या 1947 एक धोखा है और 1950 एक फरेब?

मुड़कर 66 बरस पहले के वक्त को देखना और यह सोचना कि तब आजादी का मतलब यह तो नहीं था जो आज हो चला है। कुछ कम वक्त तय करें तो 63 बरस पहले दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का तमगा पाने का हक छाती से लटकाए अब यह सोचें कि लोकतंत्र के जिस राग को 63 बरस पहले सुना वह अब का लोकतंत्र तो नहीं। कैसे महज साठ बरस में अपने ही देश में नागरिक होना, कहलाना और बतौर नागरिक मौलिक अधिकार की मांग करना सबसे बड़ा गुनाह हो गया, यह किसने सोचा होगा। हालात तो यह है कि आज बात कहीं से भी शुरु करें और अंत कहीं भी करें 15 अगस्त 1947 धोखा लगता है और 26 जनवरी 1950 फरेब। चलिये इतिहास के नहीं भारतीय होने के पन्नों को पलटें। जो मां-बाप और दादा-नाना या परदादा के रास्ते हम तक पहुंचे है और हम हैं कि कहे जा रहे है, हम उस देश के वासी है जिस देश में गंगा बहती है। यह देश है वीर जवानो का। मेरे देस की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती..।

तो सच क्या है आजादी या संप्रभुता। अगर कहें दोनों ही सच नहीं हैं और लालकिले के प्राचीर से लहराता तिरंगा तक गुलामी और मुनाफे का ऐसा प्रतीक है, जहां नागरिकों की भागेदारी और देश के नागरिको से सरोकार खत्म हो चले हैं । संविधान में दर्ज नागरिकों के अधिकारों को चुनी हुई सरकारों ने ही बेच दिया है। और राजनीतिक दलों ने खुद को चुनी हुई सरकार का दर्जा देने के लिये संविधान में दर्ज नगरिक होने के पहले मौलिक अधिकार तक में सेंध लगा ली है। तो आप हमें राष्ट्रद्रोही तो नहीं मान लेंगे। वोट डालने का अधिकार। यही तो नागरिक होने की सबसे बड़ी पहचान है। देश का सबसे रईस शख्स हो या सबसे पावरफुल शख्स उसके वोट और सबसे गरीब के वोट की कीमत एक है। यही तो है लोकतंत्र का मजा। लेकिन क्या किसी ने सोचा आजादी के महज 62 बरस बाद ही वोट डालने के अधिकार की भी कीमत लगेगी। और संविधान की घज्जियां एक अदद वोटर कार्ड बनवाने में ही उडन-छु हो जायेगी। अगर घर नहीं है। रोजगार नहीं है। दो जून की रोटी की व्यवस्था का कोई स्थायी जुगाड़ नहीं है। यानी जीने की खातिर अपना गांव छोड़ शहर-दर-शहर भटकते देश के सात करोड़ लोगों के पास आज की तारीख में वोटर आई डी कार्ड नहीं है। यानी नागरिक हैं लेकिन वोट डालने का अधिकार नहीं है। देश के 28 राज्यों की राजधानियो में करीब तीन करोड़ लोग ऐसे हैं, जिनके पास छत तो है लेकिन छत का पता बताने के लिये कोई सबूत नहीं है। यानी दस्तावेज नहीं है तो वह भी नागरिक होते हुये भी उस पहले मौलिक अधिकार से वंचित हैं, जिसके खम्भे पर लोकतंत्र खड़ा है। और इसका दूसरा सच कहीं ज्यादा निराला है। लोकतंत्र के राग में मशगूल करीब चार दर्जन राजनीतिक दलों के नेता कमोवेश देश के हर राज्य में सक्रिय हैं, जो साठगांठ से बिना किसी सबूत के वोटर आई-कार्ड बेचते हैं। यहां बेचने का मतलब रुपया भी है और वोट की खरीद भी। बंगाल समेत सभी उत्तर पूर्वी राज्य और इनसे सटे  रखंड,उडीसा,छत्तीसगढ में तो वोट डालने के राष्ट्रीय अधिकार को जहा धंधे में बदला जा चुका है। वहीं यूपी एक ऐसी जगह है, जहां राजनीतिक दल अपने अनुकुल वोट बैंक का दायरा बढ़ाने के लिये अपनी जातीय राजनीति के अनुकुल वोट का अधिकार कई गुना ज्यादा दिला देते हैं। यानी एक व्यक्ति के पास कई नाम से वोटर कार्ड हो जाता है और लोकतंत्र ठहाके लगाता है। वहीं लोकतंत्र के इस पहले आधार की धज्जियां घुसपैठ करने वाले सवा करोड़ बांगलादेशियों में से 65 लाख से ज्यादा के बने वोटर आई कार्ड से समझा जा सकता है, जो आपको बंगाल से दिल्ली तक कई खेप में छितराये हुये मिल जायेंगे। तो लोकतंत्र के तमगे में अगर यह सबसे बड़ा सूराख है तो इसके बाद शुरु होता है संविधान में दर्ज मौलिक अधिकारों का राजनीतिक चीरहरण। और यह चीरहरण कितना खतरनाक है इसका एहसास संविधान को के किसी भी पन्ने में अंगुली रख किसी भी विश्लेषण को पढ़ने के साथ ही शुरु हो सकता है। चूंकि मौजूदा वक्त में संविधान सिर्फ पदो को संभालते वक्त शपथ के तौर पर इस्तेमाल में लाया जाता है तो लोकतंत्र को खारिज कर सत्ता की पहली हनक भी वहीं सुनायी देती है और संविधान झटके में राजनीतिक सत्ता का गुलाम लगने लगता है।

मुश्किल यह है कि संविधान को गुलाम बनाने और आजादी को अपनी परिभाषा में ढालने की कवायद उन्ही संस्थानों ने शुरु किया जिसे संविाधन ने सबसे ज्यादा अधिकार दिये और यह माना कि देश के उलझे हुये रास्तों को यही संस्थान रास्ता दिखायेंगे। लोकतंत्र के तीनो पाये। नौकरशाही, न्यायपालिका और संसद। लेकिन इस प्रक्रिया में संसद इतनी ताकतवर बन गयी की नेता-मंत्री खुद को मसीहा मन बैठे। यह संसदीय राजनीति की कवायद थी। सत्ता पाने की होड़ में ऐसी कवायद शुरु हुई कि जिस सामाजिक-आर्थिक राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में देश को देश से अवगत कराया गया वही बीते साठ बरस में बदल गया। राष्ट्रीय भाषा को लेकर आजादी के पहले 15 बरस में जो अध्ययन होना था, वह सरकते सरकते चार गुना वक्त भी गुजार गया और अपनी राष्ट्रीय भाषा को कमजोर दर कमजोर भी करता गया। आजादी के वक्त जो काम विदेशी या गुलाम भाषा के प्रतीक बने अंग्रेजी में 37 फीसदी होता था वह साठ बरस के सफर में 73 फीसदी जा पहुंचा । लेकिन बात यही नहीं रुकी बल्कि उत्तर में समाजवादी पार्टी तो दक्षिण में द्रमुक ने भाषा को राजनीतिक हथियार बना लिया। अब तो भाजपा को भी लगने लगा है कि भाषा पर सियासत हो सकती है तो वह भी संविधान का बात को अपने चुनावी मिशन से जोडकर देश को इसका एहसास कराने लगा है कि जो काम संविधान में दर्ज होने पर नहीं हुआ उसे वह सत्ता में आने के बाद कर देगा । संविधान का अगला माखौल पिछड़ी जातियों को लेकर हुआ। हाशिये पर पड़े जिस समाज की जिन पिछडी जातियों को मुख्यधारा में लाने के लिये 15 और 10 यानी कुल 25 बरस के सफर को तय यह कहते हुये किया गया कि तबतक आरक्षण सरीखे सुविधा का लाभ इन्हें देना जरुरी है । जब तक यह मुख्यधारा से जुड़ नही जाती । और इसके लिये ही सत्ताधारियों को कानून बनाने और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों को एक घरातल पर लाने का अधिकार दिया गया। और इस आधार की जमीन सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के अध्ययन को बताया गया। लेकिन साठ बरस के सफर में आरक्षण का वही लाभ सबसे धारदार राजनीतिक हथियार बन गया। आजादी के वक्त जिस हाशिये पर पडे समाज को सामाजिक-आर्थिक तौर पर उसकी जनसंख्या के लिहाज से 80 फिसदी हिस्से को कमजोर माना गया, साठ बरस बाद उसका साठ फीसदी मुख्यधारा की जातियों की तुलना में सामाजिक-आर्थिक तौर पर मजबूत हो गया। लेकिन तादाद चूंकि 1950 की लक्षमण रेखा के तहत बनी तो राजनीतिक जूतम-पैजार आज भी उस कठघरे से बाहर झांकने को तैयार नहीं है। और क्षत्रपों की सियासत की जमीन ही संविधान बनाते वक्त उलझे कदमों को पटरी पर लाने की जगह पटरी से उतरी रहे यही मान ली गई। कुछ यही तासिर अल्पसंख्यकों को लेकर रही। खासतौर से जो रेखा आजादी के वक्त मुस्लिम समाज को लेकर दर्द और त्रासदी के साये में खिंची गई। वही दर्द और त्रासदी साठ बरस के सफर में वोट बैंक का सबसे सशक्त माध्यम बन गया। जाहिर है यह किसी ने आजादी के वक्त सोचा ना होगा, लेकिन साठ बरस बाद कई एलओसी समाज के भीतर खिंची और राज्यो में वोट बैंक की सियासत ने इस लकीर को और मजबूत ही किया। और संसदीय राजनीति का यही वोट बैंक सत्ता में आने या बाहर करने की लकीर तले देश को सांप्रदायिकता या धर्मनिरपेक्षता का पाठ पढायेगी यह भी किसी ने सोचा न होगा।

लेकिन आजाद भारत के नागरिकों को गुलाम बनाकर छलने का असल खेल तो राजनीतिक दलो के संविधान के अपहरण के साथ शुरु हुआ। संविधान को बनाते वक्त देश के हालात का अध्ययन कर जिस नतीजे पर देश को देखा-परखा गया और वोट डालने के समाजवादी चिंतन को अधिकारों की फेहरिस्त में सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण जब करार दिया गया तो उसके अपहरण के बाद शुरु हुआ नागरिकों को संविधान से मिले अधिकारों के रास्ते में खड़े होकर राजनीतिक सत्ता का खुद को संविधान से बड़ा बताने और अधिकारो को पूरा करने का खेल। संविधान बनाते वक्त जीने की न्यूनतम जरुरत को मौलिक अधिकारों से जोड़ना तक जरुरी नहीं समझा गया। साठ बरस पहले यह माना गया कि संसद पीने का पानी, इलाज की जरुरत, दो जून की रोटी का जुगाड, पढ़ाई और छत तो हर नागरिकों को दिलवा ही देगी । उस वक्त बाबा साहेब अंबेडकर ने भी नहीं सोचा होगा कि पीने का पानी संसद नहीं कॉरपोरेट कंपनियां तय करेंगी। स्वास्थ्य सेवा संसद के हाथ से निकल कर कमाई के सबसे बड़े मुनाफे वाले घंघे में तब्दील हो जायेंगी। दो जून की रोटी का जुगाड़ संसद में पहुंचने वाले राजनीतिक दलों के चुनावी मैनिफेस्टो से लेकर राष्ट्रीय नीति का हिस्सा बन जायेगा। और सत्ताधारी खुद का गुणगाण करेंगे कि वह हर पेट के लिये अनाज और हर हाथ के लिये काम ले कर आ गये। और तो और कमोवेश हर राज्य में सत्ताधारी संविधान द्वारा मिले राइट टू शेल्टर यानी छत के अधिकार को अपने राजनीतिक प्रोपोगेंडा से जोड कर कही इंदिरा आवास योजना तो कही वाजपेयी आवाज योजना चलेगी और हर मुख्यमंत्री के 10 से साठ सूत्री कार्यक्रमों में नागरिकों को उन्हीं सुविधाओं को देने का जिक्र होगा जिसे दस्तावेज की शक्ल में संविधान में साठ पहले ही लिख दिया जा चुका है।

संविधान को खारिज कर राजनीतिक दलो ने कैसे अपनी चुनावी बिसात चुनावी घोषणापत्र के जरीये बनायी और साठ बरस की यात्रा में कैसे हर नागरिक के लिये संविधान में दर्ज शब्द बेमतलब करार देते हुये राजनीतक दलों के चुनावी घोषणापत्र से लेकर सत्ताधारी की नीतियां ही राष्ट्रवाद भी हो गयी और लोकतंत्र का पैमाना भी यह सुप्रीम कोर्ट के सामने आये दो सौ से ज्यादा मामलो में से सिर्फ आधे दर्जन मामलों को देख-पढकर ही समझा जा सकता है ।

गोलकनाथ बनाम पंजाब 1967, केशवानंद भारती बनाम केरल 1973, मिनरवा मिल्स बनाम भारत सरकार 1980, वामनराव बनाम भारत सरकार 1981, भीम सिंह बनाम भारत सरकार 1981, सम्पत कुमार बनाम भारत सरकार 1987 । यह ऐसे मुकदमे हैं, जिनके जरीये नागरिक समझ सकते हैं कि कैसे संसद, सत्ताधारी और राजनीतिक दल के साये में नागरिकों को मौलिक अधिकारो की लूट शुरु हुई। और कैसे कारपोरेशन से लेकर कारपोरेट युग तक के दौर में राज्यसत्ता ने ही नागरिकों को पंगु बनाकर कभी कारपरेशन तो अब कारपोरेट को राज्यसत्ता के बराबर खड़ा कर दिया। और नागरिक यह सोचने लगा कि जिसे उसने चुना नहीं वही उसके जीवन से जुड़े हर तत्व का मालिक कैसे बन गया। इन नजरियों को साफ करने के लिये सुप्रीम कोर्ट की दो व्याख्या अपने आप में काफी हैं। पहली शिक्षा को लेकर है तो दूसरी कानून के समक्ष हर किसी के बराबरी का सवाल। 1981 में अजय हसिया बनाम खालिद मुजिब पर फैसला जस्टिस पी एन भगवती ने दिया था। और उसी वक्त उन्होंने इस सच की पूरी व्यख्या की थी कि कैसे नागरिकों के जीवन से किसी भी आर्थिक आधार के जुड़ने से, चाहे वह मौलिक अधिकार का हिस्सा ही क्यों ना हो नागरिकों को और कोई नहीं राज्यसत्ता ही ठगती है। और जब सवाल समानता के अधिकार से जुडते हुये कानून की बराबर मदद को लेकर आया तो सुप्रीम कोर्ट में ही नागरिकों को मिलने वाले हक को लेकर यह सवाल भी उठा कि कैसे हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने की स्थिति इस देश में सिर्फ एक फीसदी लोगों से भी कम की है। क्योंकि वकीलों की रोजमर्रा की पेशी की जो औसत रकम है वह इस देश में 80 फीसदी नागरिकों के सालाना खर्च के बराबर है। तो ऊपरी अदलते सिर्फ उन्हीं की पैरोकारी और फैसलों के इर्द गर्द घुमती है, जिन्होंने राज्यसत्ता को संविधान से आम नागरिकों के अधिकारों को छिनने पर चुप्पी साध रखी है । या फिर संविधान द्वरा प्रदत्त नागरिको के हक को राजनीतिक सौदेबाजी का हिस्सा बना चुके हैं। और नागरिक अपने ही हक को लेकर अदालत तक पहुंच नही पाता। 1987 में प्रभाकरण नायर बनाम तमिलनाडु के मामले ने तो छत के अधिकार को ही ले उडी राज्य सरकार पर सीधी अंगुली उठायी दी । लेकिन सवाल सिर्फ अदालत की व्याख्या या संविधान को लेकर सुप्रीम कोर्ट के जरीये सत्ताधारी राजनीतिक दलो को चेताने भर का नहीं है। अगर 2009 के लोकसभा चुनाव में घोषित राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के घोषणापत्र को ही देख लें या फिर 2014 के लिये बिछती सियासी बिसात में उठाये जा रहे मुद्दों को परखें तो बीस किलो चावल से लेकर मुफ्त छत की व्यवस्था कराने और शिक्षा को अधिकार बनाते हुये सड़क, पानी बिजली पूरी करने की बात करने वाले राजनीतिक दलों से लेकर सरकार के नरेगा और फूड सिक्योरटी विधेयक के आइने में संविधान को कभी पढ़कर देखे तो समझ जायेंगे कि कैसे साठ बरस में राजनीतिक दलों की गुलामी और सत्ताधारियों के राष्ट्र में रहकर ही कोई नागरिक होने का हक पा सकता है । संविधान ने देश के नागरिकों को सबसे बड़ा माना। लेकिन संसदीय सत्ताधारियों ने झटके में नागरिको से सारे अधिकार छिन कर उपभोक्ताओं की ऐसी फौज खडी कर दी कि नागरिको को मिलने वाले सारे हक कारपोरेट और पैसो वालों के हाथ में आ गये। और नागरिकों के नाम पर जो बचा उसे कल्याण योजना का नाम दिया गया। संयोग से कल्याण योजनाओ को लेकर भी सत्ताधारियों ने ही माना कि सबसे बडी राजनीतिक और लोकतांत्रिक लूट तो वही होती है। कांग्रेस और भाजपा दोनों के 2009 के चुनावी मैनिफेस्टो में 40 फीसदी लोकप्रिय नारे संविधान से ही चुराये हुये थे। 2004 से 2012 तक सभी 28 राज्यों और दिल्ली के विधानसभा चुनाव में कमोवेश हर राजनीतिक दल ने आम आदमी के हक या उसे जिन सुविधाओ को देने की बात अपने चुनावी घोषणापत्र में कही उसका 80 फिसदी हिस्सा किसी ना किसी रुप में संविधान के तहत नागरिकों के अधिकार क्षेत्र में आता है या फिर राज्यसत्ता का काम है कि वह उसे पूरा करें। लेकिन अपनी राजनीति सौदेबाजी के दायरे आमआदमी और देश के नागरिकों के साथ जो छल-कपट इस दौर में संसदीय राजनीति की जरुरत बन चुकी है परिणाम उसी का है कि संविधान की शपथ लेने के बाद भी संविधान को ही खारिज करने की सोच हर सत्ताधारी के भीतर तक समा चुकी है। और सत्ताधारियों ने मान लिया है कि चुन कर सत्ता में पहुंचने का मतलब है पार्टी का संविधान देश के संविधान से बड़ा हो जाना। यह सवाल इसलिये क्योंकि कोई भी नेता चुने जाने के बाद और कोई भी मंत्री बनते वक्त संविधान के अंतर्गत काम करने की कसम खाता है। और लोकतंत्र के दूसरे पाये के तौर पर नौकरशाही संविधान के तहत सीआरपीसी और आईपीसी की घाराओ को लागू करने का काम करती है। लेकिन औसतन हर बरस सवा सौ से ज्यादा आईएएस और आईपीएस के वैसे अधिकारी जो संविधान के मातहत काम करते है और ईमानदारी का पाठ सत्ताधारियों को भी पढ़ाने की हिम्मत रखते हैं उन्हे वही सत्ता संसपेंड कर देती है जो संविधान की कसम लेकर सत्ता चलाते हैं। किसी देश के ऐसे चीरहरण को अगर आजाद देश कहा जाये तो इसमें से कौन अपना नाम कटाना चाहेगा और कौन इसे बदलने के लिये संघर्ष का रास्ता अपनायेगा। इंतजार करना होगा या पहल करनी चाहिये। वक्त मिले तो सोचियेगा।

6 comments:

raajkiawaaz said...

आज का यूवा आर्थिकी रूप से पंगु हो चूका है वो नोकरी से आगे बढ़ ही नहीं पा रहा है। कॉर्पोरेट इतना हावी हो गया है की सब छो टे लगने लगे है। घर से बाहर निकले तो निकले कैसे। पेट का सवाल पहले आ जाता है। और क्रांति घर बैठ कर तो हो नही सकती।

sahafi vani said...

WHY YOU ARE NOT CONTACTING TO THE COMMAN MAN, WHY HAVE YOU LIMITIZED IN A SPECIFIC AREA, WHY ARE YOU NOT COMING FROM INNER WORLD.

sahafi vani said...

make the new people like students coming to journalism aware about it

Kulwant Happy said...

पब्‍लिक है कहां मानती है।

sikander chitrakaar said...
This comment has been removed by the author.
sikander chitrakaar said...

आज़ादी एक साजिश

आज़ादी का नाम सुन कर गुलाम ही नहीं आज़ाद लोग भी सपने सन्जो लेते हैं | जब किसी को आज़ादी के बारे में समझाया जाता है , आज़ादी के आनंद का सपना दिखाया जाता है तो हर आदमी उस आनंद को पाने के लिए तिलमिला जाता है । उन्हें अपना जीवन
घुटन और बंधन दिखाई देने लगता है । ये बंधन इनको इतना पीड़ित और बैचेन बना देते हैं कि आदमी इसे एक पल के लिए भी सहन नहीं कर सकता और वह उस आनंद के सपने की तरफ दौड़ पड़ता है जिसमें वह आज़ादी के आनंद का सपना देखता है । वह इस बात को बिलकुल नहीं समझ पता कि ये जो सपना वह देख रहा है ये एक साजिश भी हो सकती है । ये साजिश कोई आम आदमी नहीं रचता इसको रचने वाले लोग होते हैं सत्ताधारी , धर्म गुरु या नेता
। वे चाहते हैं मन मानी कि उनकी मर्ज़ी के बिना कोई कुछ न कर सके । जब उनकी सत्ता पर आंच आने लगती है और जब- जब उनका सिंहासन डगमगाने लगता है तब - तब वे इस प्रकार का प्रचार करते हैं । जिससे आम आदमी की भावनाओ से खेल कर अपनी कुर्सी को मजबूत बना सकें । इस प्रकृति में दो किस्म के लोग होते है स्वार्थी और परमार्थी , चालक और भोले । परमार्थी लोग बहादुर , निडर और देश भक्त होते हैं जो हर पल अपना सब कुछ बलिदान करने के लिए तैयार रहते है उन्हें न घर चाहिए न धन वे तो प्रतेक प्राणी को खुशहाल देखना चाहते हैं , वे अपने कर्तव्यों को पूरा करते है , अपने वचन को पूरा करते है । जिनका जीवन ही परमार्थ के लिए होता है । वे होते हैं भगत सिंह , चन्द्र शेखर आजाद , स्वामी दयानद सरस्वती ।
सत्ताधारी हर पल नए नए षड्यंत्र रचता रहता है चाहे वो किसी भी सिंहासन पर बैठा हो । उनका सम्पूर्ण ध्यान अपनी कुर्सी पर रहता है कहीं ये छिन्न न जाये , कहीं मेरा सुख छिन्न न जाये । इस लिए वे उन परमार्थी लोगो में अपना प्रचार करते हैं और उनमें अपने विरोधी के लिए नफरत पैदा कर देते हैं । धर्म के नाम पर , जाति के नाम पर , देश के नाम पर , गरीबी अमीरी के नाम पर जैसा भी उनको माहौल दिखाई देता है उसी दिशा में अपना प्रचार करते हैं । और उन बहादुरों को अपने जाल में फंसा लेते हैं जो भगत होते है जो अपनी आन पर मिटना जानते हैं । सत्ताधारी लोग उनकी भावनाओं से वो खेल खेलते हैं जो आदमी को हैरान करदे ये लोग उनको शहीद कर देते हैं और उनकी लाशों पर , उनकी चिताओं पर चिराग जला जला कर अपनी कुर्सी की मुरमम्त करते हैं । इनकी कुर्बानी का लाभ ये शातिर सत्ताधारी उठाते हैं बहादुर देश भगत इनकी साजिश का शिकार होते हैं और यहाँ से जनता की गुलामी का दूसरा चरण आरम्भ हो जाता है ।

सिकन्दर चित्रकार