Thursday, December 12, 2013

सियासत की नयी परिभाषा गढ़ी केजरीवाल ने

अन्ना हजारे जनलोकपाल को लेकर रालेगणसिद्दी में सिमट गये हैं। तो जनलोकपाल पर संघर्ष के आसरे आम आदमी पार्टी दिल्ली की सत्ता पर दखल देने की स्थिति में आ गयी है और संसद में एक बार फिर लोकपाल को लेकर गहमागहमी शुरु हो चुकी है। तो बरस भर में नजारा बदल भी गया और बरस भर बाद सारे नजारे 360 डिग्री में घूम भी गये। याद कीजिये तो दो बरस पहले रामलीला मैदान से जनलोकपाल को लेकर जो जन लहर उठी थी, उसने संसद की सांस बांध दी थी। और दिसंबर 2011 में ही लोकपाल को लेकर जो हुआ उसे जनीतिक दलों ने ही नाटक करार दिया था। और संयोग देखिये उसी जनलोकपाल को लेकर रालेगण सिद्दी में अनशन पर बैठे अन्ना हजारे के इर्द-गिर्द की तस्वीर बदल चुकी है। दो बरस पहले जनलोकपाल आंदोलन में साये की तरह रहने वाले अरविन्द केजरीवाल की जगह पत्रकार संतोष भारतीय ने ले ली है। मंच पर साये की तरह दिखने वाले कुमार विश्वास, गोपाल राय और संजय सिंह को अब मंच की जगह जमीन पर भीड का हिस्सा बनना पड़ रहा है।

और संसद में फिर लोकपाल बिल को लेकर हरकत वही पार्टी शुरु कर रही है, जिसने इसे ठंडे बस्ते में डाला था। संसद के पटल पर सरकार लोकपाल बिल रखेगी। उसमें कुछ संसोधन का प्रस्ताव लायेगी। जिसपर लोकसभा में मुहर लगने के बाद उसे राज्यसभा में सोमवार को बहस के लिये लाया जायेगा। तो अब सवाल है  जनलोकपाल आंदोलन से निकली राजनीतिक पार्टी भी जीत कर सियासी मैदान में हो और अन्ना का अनशन भी सामाजिक दबाव बना रहा है। तो क्या वाकई इस बार लोकपाल जोकपाल ना होकर वाकई जनलोकपाल के तौर पर मंजूर हो जायेगा ।

अभी यह सवाल है लेकिन आकलन अब यही हो रहा है कि जब आंदोलन भी सफल और आंदोलन से निकली राजनीति भी सफल तो फिर संसद अलग राह कैसे पकड़ सकती है। लेकिन बदलती राजनीति और गिरते पारंपरिक राजनीतिक खंभों के बीच भी हर कोई अब आस्तित्व की लड़ाई लड़ने लगा है क्योंकि उसे लगने लगा है कि 2014 समूची सियासी बिसात ही बदल देगी। शायद इसीलिये आम आदमी पार्टी की इस भीड़ में ऐसा कोई खास दिखायी नहीं देगा, जिस पर नजर टिके तो टिकी रह जाये। ना ही इसमें कोई जमीनी नेता होने का दावा करने वाला है ना ही कोई चांदी का चम्मच लेकर पैदा हुआ है। हफ्ता भी नहीं हुआ जब आम आदमी पार्टी के विधायकों के चेहरे सड़क पर नारे लगाते हुये धूल फांक रहे थे और दिल्ली की विधानसभा से लेकर संसद के गलियारे तक में कभी इन्हें तरजीह देना तो दूर इन पर चर्चा भी जरुरी नहीं समझी गयी। फिर ऐसा क्या है कि दिल्ली के जनादेश से निकलती आवाज पर या तो बडे बडे नेताओं की धिग्घी बंधी है या फिर जोकर या बुलबुला कहकर खारिज करने पर आ तुले हैं। वजह इसकी है क्या। जाहिर है आम आदमी पार्टी के तमाम नेता मौजूदा दौर के राजनेताओं से एकदम अलग हैं। और मौजूदा दौर के तमाम राजनेता चाहे अलग अलग राजनीतिक दल में हो लेकर बीते ढाई दशक में हर नेता एक सरीखा लगने लगा और हर राजनीतिक दल सत्ता के लिये ही संघर्ष करती नजर आयी। इसलिये विचारधारा गायब हुई। सत्ता समीकरण लोकतंत्र का आखिरी सच बन गया। और सभी राजनीतिक दल सत्ता के लिये दौड़ते हाफ्ते दिखायी देने लगे। जाहिर है इसमें पहली बार ब्रेक दिल्ली से निकले उस जनादेश ने लगायी जो पारंपरिक राजनीति से ऊब चुकी है। सरोकार के बदले सत्ता की हनक वाली राजनीति से डरने लगी है। सत्ता को लूट का पर्याय बना चुकी है। यानी परिवर्तन की लहर या विचारधारा के बदले सिर्फ और सिर्फ कामनसेंस मायने रख रहा है। और ध्यान दें तो आम आदमी पार्टी उसी कामनसेंस की बात कर रही है जो संविधान में दर्ज है। जो भारतीय लोकतंत्र की पहचान है। संयोग से बीते ढाई दशक की सियासत ने इसी कामनसेंस की समझ को ही ही ताक पर रख ऐसी सियासी बिसात बिछायी की वही आम आदमी ही हाशिये पर चला गया, जिसके भरोसे दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश होने का तमगा भारत पाये हुये है। और अब आम आदमी ही जब जनादेश से खद्दरधारी पांच सितारा नेताओं को बदलने को कह रहा है तो उन्हे कोई जोकर तो कोई पानी का बुलबुला मान कर अपनी ठसक बरकरार रखना चाह रहा है। यानी सत्ता पाने के लिये चुनाव नहीं लड़ा जाता या फिर सत्ता के लिये ही चुनाव लड़ा जाता है, यह भी उलझन बनेगी यह भी किसी ने नहीं सोचा होगा। लेकिन इतिहास के पन्नों को पलटे तो कई सच अबके दौर में बेमानी लगेंगे।

मसलन सत्ता अगर बहुमत के आंकड़ों से चलती है तो सबसे ज्यादा सीट राजीव गांधी को 1984 में मिली। लोकसभा में दो तिहाई से ज्यादा। इस तुलना में 1957 में नेहरु की अगुवाई में काग्रेस को 371 सीटें मिली। उस वक्त कांग्रेस ने 490 सीटों पर उम्मीदवारों को खड़ा किया था। और उसके बाद 1971 युद्द के तुरंत बाद इंदिरा गांधी को 352 सीट मिलीं। दो तिहाई से महज 13 सीट कम। लेकिन हुआ क्या। नेहरु के दौर को छोड़ दें तो राजीव गांधी और इंदिरा गांधी इतनी बड़ी सफलता के गर्त में ही डूबी।

भ्रष्टाचार की छांव में राजीव गांधी और इमरजेन्सी तले इंदिरा गांधी की सत्ता पांच बरस के कार्यकाल से पहले ही लड़खड़ायी और विकल्प के तौर पर आंदोलन करते हुये सियासी अलख जगा कर सत्ता में आये वीपी सिंह 143 सीट पाकर भी पांच बरस का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाये और जेपी आंदोलन से निकली जनता पार्टी की अगुवाई करते मोरराजी देसाई 295 सीट पाकर भी दो बरस में लड़खड़ा गये। तो पहला सवाल -बहुमत पा कर अकेले सत्ता हो या गठबंधन के जरिये मिली सत्ता दोनों फेल हो सकती हैं।

और इस लकीर को आगे खींचे तो नरसिंह राव और अटल बिहारी वाजपेयी दो ऐसे पीएम निकले जो बहुमत ना होने के बावजूद सत्ता बनाये रखने के हुनरमंद कहलाये। नरसिंह राव को 1991 में 232 सीट मिली और उन्होंने सांसदों की खरीद फरोख्त की, जिससे झारखंड घूस कांड निकला तो वाजपेयी 24 राजनीतिक दलों को एक साथ लेकर चले। जिन्हें 1999 में सिर्फ 182 सीट ही मिली थीं। ध्यान दें तो 1984 के बाद से कभी किसी भी राजनीतिक दल को देश ने बहुमत दिया नहीं। और बहुमत ना पाने के बावजूद हर बड़े दल ने जोड़-तोड़ कर सत्ता का दावा भी ठोंका। सत्ता बनायी भी। और 13 दिन से लेकर 4 महीने तक भी केन्द्र में सरकार चली। यानी बीते 25 बरस का सच यही है कि केन्द्र में सरकार जोड़-तोड़, गठबंधन के आसरे ही चली। और इस दौर ने देश ने सात प्रधानमंत्रियों को देखा। वीपी सिंह, चन्द्रशेखर, पीवी नरसिंह राव, देवेगौडा , आई के गुजराल, वाजपेयी, और फिलहाल मनमोहन सिंह। और इतिहास के पन्नों में सबसे सफल मनमोहन सिंह ही कहलायेंगे, जिन्होंने आंदोलन तो दूर राजनीति का ककहरा तक नहीं पढ़ा। लोकसभा का चुनाव तक नही लड़ा।
यानी सत्ता हर किसी को चाहिये लेकिन यही सवाल 2013 में दिल्ली की सत्ता को लेकर एक नयी परिभाषा गढ़ रहा है।

सत्ता में ना आने के तर्क बहुमत के आंकड़े को लेकर बीजेपी भी गढ़ रही है आम आदमी पार्टी भी। दिल्ली की सत्ता के लिये बीजेपी को 5 सीट चाहिये तो केजरीवाल को 8 सीट। और दोनों ही माने बैठी हैं कि चुनाव होंगे तो किसी को तो बहुमत मिलेगा और सरकार तभी बनायेंगे। तो पहली बार दो सवाल सीधे निकले हैं, बहुमत के बगैर सरकार बेमानी है। और चुनावी राजनीति में खंडित जनादेश बेमानी है। यानी पहली बार चुनावी राजनीति में जीत का आंकड़ा ही ना सिर्फ सबसे महत्वपूर्ण हो चला है बल्कि विचारधारा भी बहुमत के आंकड़े तले बेमानी हो चली है। तो देश बदल रहा है अब इसके लिये जनलोकपाल आंदोलन को तमगा दें या आंदोलन से निकले आम आदमी पार्टी को या फिर देश के नागरिकों के आक्रोश को जो पहली बार सियासत की नयी परिभाषा गढ़ने के लिये बैचेन है।

2 comments:

Manish mishra said...

Bahut acha likha hai sir apne.is baat me koi do rai nahi ki kejriwal ne aaj rajniti ki alag paribhasha di hai, logon ko jagruk hona sikhaya hai aur isi seekh ke badaulat aaj AAP ko 28 seaten mili hain.

lekin kya ye nazariya dusre rajyon me bhi apna prabhav choda hai,AAP ko iska aklan jarur karna chahiye.

saath hi agar we apne party ka wajood kayam rakhna chahte hain to unhe apne MLA's/karyakartaon ko sahi se monitor karna hoga,logon se jaise judi thi waise jude rehna hoga.

Sameer Jha said...

वाजपेयी जी मैं एक संवैधानिक स्तिथि जानना चाहता हूँ कि क्या यह सम्भव है कि कांग्रेस बिन केजरीवाल के मांगे अपने आठ विधयकों के समर्थन कि चिट्ठी राज्यपाल को भेज दे। क्या ऐसी स्तिथि में AAP को सरकार बनाने क लिए मजबूर किया जा सकता है?