Monday, April 6, 2015

दिल्ली 1975 : मेरा खोया बचपन

जैसे ही घुमावदार रिहाइश गलियों के बीच से निकलते हुये मुख्य सड़क पर निकलने को हुआ वैसे ही सामने टैगौर गार्डन केन्द्रीय विद्यालय का लोहे का दरवाजा इतने नजदीक आ गया कि वह सारे अहसास झटके में काफूर हो गये जिन्हें सहेज कर घर से निकला था। चालीस बरस पहले इमरजेन्सी लगी थी और मेरे बचपन का स्कूल मुझसे छूटा था। आपातकाल का मेरे जीवन से उस वक्त इतना ही जुड़ाव था कि 975 में मुझसे मेरा स्कूल छूट गया था। इन चालीस बरस में मैं देश-दुनिया खूब घूमा लेकिन कभी अपने बचपन के स्कूल जाने की हिम्मत ना जुटा सका क्योंकि बचपन की उन अद्भुत यादों को जेहन में बसाये रखना चाहता था । लेकिन चालीस बरस बाद टैगौर गार्डन केन्द्रीय विद्यालय का स्कूल कभी जेहन में ना रहा हो ऐसा भी नहीं हुआ । अभी पिछले साल दिसंबर में ही पटना कंकरबाग केन्द्रीय विद्यालय में पुराने छात्रों का जमावड़ा हुआ। वहां 1977 से 1981 तक बिताये दौर को याद करते करते ना जाने कैसे टैगौर गार्डन का केन्द्रीय विद्यालय मेरे जहन में आ ही गया। और वहां भी मैं बचपन की यादों को समेटने लगा और बताने कि कैसे टैंट में स्कूल चला करता था और कैसे टिफिन में खेलते वक्त अक्सर खोपड़िया फुटबॉल की शक्ल में मैदान में दिखायी देती और बच्चे उसी से ही खेलने लगते। और टीचरों की याद में मुझे भी मेरे पांचवी कक्षा की अंग्रेजी की टीचर नीना पांघी याद आ गईं। जिन्होंने टैगौर गार्डन केन्द्रीय विद्यालय छोड़ने के बाद मुझे पत्र लिखा था और बताया कि रांची कितनी खूबसूरत जगह है। दरअसल, 1975 में इमरजेन्सी लगी तो इंडियन इनफारमेशन सर्विस में काम कर रहे पिताजी का तबादला रांची कर दिया गया। रांची उस वक्त बिहार का ही हिस्सा था। घर में कोई खुश नहीं था । मां भी दुखी थी। लेकिन पिताजी उस वक्त सभी को यही समझाते रहे कि हम उस जगह जा रहे है जहा जयप्रकाश नारायण ने सरकार के खिलाफ आंदोलन छेड़ रखा है। इसलिये बिहार जाकर काम करना एक बेहद महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी है और जेपी
को करीब से देखने समझने का मौका भी मिलेगा। पिताजी को रांची से रेडियो का बुलेटिन शुरु करना था। इस वक्त इंदिरा गांधी की नजर जेपी आंदोलन के जरीये बिहार पर थी।

18 मार्च को जेपी ने संपूर्ण क्रांति का नारा क्या लगाया दिल्ली में सियासी हडकंप मचा और उसी के बाद रांची को भी न्यूज 
बुलेटिन का सेंटर बनाना तय हुआ। पटना से शाम का बुलेटिन काफी पहले से होता था और रांची में कोई न्यूज बुलेटिन था नहीं। और दिल्ली में इंदिरा सरकार को इस बात का एहसास था कि अगर जेपी को रोकने के लिये बिहार में सरकार ने ठोस पहल नहीं की तो आंदोलन बिहार से आगे बंगाल को भी अपनी गिरफ्त में ले सकता है। और इंदिरा गांधी को नक्सलवाद की आहट भी इसमें दिखायी देने लगी। साठ के दशक में कैसे छात्र कालेजों से निकल कर नक्सलबाडी की तरफ बढे थे और तब सिद्दार्थ शंकर रे के सामने क्या मुश्किलें आई थीं। या फिर उस वक्त कैसे कांग्रेस की सत्ता डिग रही थी। सारे एहसास इंदिरा गांधी को थे। इसलिये सरकारी प्रोपेगेंडा के लिये न्यूज बुलेटिन होना चाहिये। यह सारी बाते गाहे-बगाहे पिताजी से बातचीत में अक्सर निकल कर आती। और शायद पिताजी को लगता रहा कि सारी बाते हमें जाननी चाहिये तो बचपन में इन बातो को लेकर हमे कोई रुचि हो या ना हो, हम ना भी जानना चाहे तो भी हर घटना से पिताजी हमें जोड़े रखते। तो रांची तबादले की खबर भी उन्होंने सामान्य तरीके से घर में सभी को नहीं दी। बल्कि देश के भीतर होने वाले बदलाव को लेकर चल रहे संघर्ष की जमीन बिहार के बारे में बताते हुये रांची जाने का जिक्र किया। और बताया कि इनके लिये कितना महत्वपूर्ण असाइनमेंट है। क्योंकि रांची में न्यूज बुलेटिन शुरु करना है। हमेशा दिल्ली से जुड़े रहना है क्योकि पटना और रांची के न्यूज बुलेटिन को लेकर दिल्ली की खास नजर है। और तब पांचवी में पढ़ रहा था मैं और मैंने भी अपनी क्लास टीचर और अंग्रेजी पढाने वाली नीना पांधी को यह जानकारी दी।

उस वक्त गर्मियों 
की छुट्टी से पहले अक्सर क्लास में बच्चो से पूछती कि किन किन के पिताजी का तबादला हो रहा है। यानी जिनका स्कूल छूट रहा है । जो अगली क्लास में साथ नहीं होंगे, उन्हे टीचर टॉफी देती। और 1970 से 1975 तक के दौरान टैगोर गार्डन में पढ़ते हुये हर बरस गर्मियों की छुट्टियों के वक्त मुझे लगता रहा कि मुझे कब टॉफी मिलेगी। और 1975 में जब मैडम ने मुझे यह कहकर टॉफी दी कि अब आगे की पढ़ाई मुझे रांची के डोरन्डा-हिनू के केन्द्रीय विद्यालय में करनी है तो मैं उदास हो गया । घर आकर पिताजी को जानकारी दी कि मैडम ने बताया है कि रांची में केन्द्रीय विघालय डोरन्डा हिनू में है । बोले वाह। आपकी मैडम ने केन्द्रीय विद्यालय की डायरेक्ट्री से खोज कर जानकारी दी है। मुझे तो पता ही नहीं है कि रांची में कहा होगा केन्द्रीय विद्यालय स्कूल। मैंने तो किराये के मकान के लिये इतना ही अपने साथियों को कहा है कि रेडियो स्टेशन के आसपास कही घर देख लिजियेगा। बहुतेरी यादों को समेटे 4 अप्रैल 2015 को घर से टैगौर गार्डन केंद्रीय विद्यालय जाने निकला।  बेटे के जीईई की परीक्षा का सेंटर टैगौर गार्डन था। तो तय किया कि आज साथ ही जाउंगा। नौ बजे पहुंचना था। बारिश रात से ही हो रही थी। तो वक्त रहते पहुंचने के लिये सुबह सात बजे ही घर से निकला। बीच में
बरसात इतनी तेज होनी लगी कि सड़क पर कुछ दिखायी नहीं दे रहा था। बेटा पीछे से पूछ रहा था वक्त पर टैगोर गार्डन पहुंच तो जायेंगे। मैंने भी ड्राइवर को कहा देख लो, नौ बजे पहुंचना है। और खुद की यादों में बचपन फिर कुलाचें मारने लगा। कैसे एक दिन जबरदस्त बरसात में स्कूल बस का पहिया ही गड्डे में चला गया। और उसके बाद क्या कुछ नहीं हुआ स्कूल में। कच्ची मिट्टी की सड़क। गड्डों में पानी और स्कूल छूटने के बाद गड्डों के पानी में ही खेलना। बिलकुल खुली जगह में स्कूल था। स्कूल के मैदान में अक्सर खेलते वक्त नरमुंड मिल जाया करते थे। कभी कभी हड्डियां भी। पांव से मार कर खेलते थे। जो याद है वह यही है कि सभी बताते थे कि स्कूल के पीछे श्मशान घाट है। कुछ ने बताया कि श्मशान घाट को सरकार ने बंद कर दिया कि तो स्कूल के प्ले ग्राउंड की जमीन तले श्मशान ही है। तो गाहे-बगाहे नरमुंड का मिलना स्कूल में आम बात थी। क्लास टेंट में चला करती थी। बरसात होती तो टेंट की क्लास में बैठे बैठे भी भीग जाया करते थे। तो बारिश में क्या क्लास और क्या मैदान। क्या स्कूल का दरवाजा और क्या सड़क पर खडी स्कूल बस । सबकुछ सरीखा। स्कूल गेट भी तब लकड़ी का ही था। जो बरसात में अक्सर बह जाता था। और जिस दिन जबरदस्त बारिश होती उस दिन तो बसो तक पहुंचना भी में किसी रोमांच से ज्यादा होता। बैग बचाना है या खुद को। बैग से खुद को बचाना है या खुद से बैग को। कुछ ऐसी यादो में यह भी याद आया कि अक्सर खेल टीचर एक साथ दो तीन बच्चो को उटाकर भागते-दौडते हुये बसो तक यूं पहुचाते जैसे हम उनके लिये फुटबाल से ज्यादा कुछ भी नहीं । वह खुद भिगते लेकिन बच्चों को भीगने से बचाते। क्लास टीचरों की जिम्मेदारी होती कि बच्चों को स्कूल बस तक पहुंचाये तो कई अपनी ओढनी से छुपा कर छोटे छोटे बच्चों को बसों तक पहुंचाते। साइकिल से ले जाते मां बाप। सिर्फ एक दो स्कूटर। लैंबरेटा और वेस्पा। स्कूटर वाले रईस माने जाते। चौथी में पढ़ रहा था तो इन्द्रजीत सिंह को दोस्त इसीलिये कई साथ पढने वालो ने दोस्त बनाया कि उसके पिताजी के पास लैबंरेटा स्कूटर था । सोचते सोचते झटके में सडक की बांयीं तरफ लिखे दिखा । टैगौर गार्डन में आपका स्वागत है। बस गाड़ी दर मोड कर आगे बढा तो याद करने लगा कि क्या कुछ बदला है । लेकिन जैसे जैसे
आगे बढा वैसे वैसे लगा क्या कुछ बचा है चालीस बरस पहले का । कुछ भी नहीं । 1975 तक तो कोई रिहाइश इस इलाके में थी ही नहीं। तंदूरी रोटी बनाने की झोपडिया। ढाबा । गुरुद्वारा। और दूर से दिखायी देता टेंट का स्कूल। और झटके में जैसे ही सामने सड़क पर निकला तो सामने लोहे के गेट के उपर लिखा पाया केन्द्रीय विद्यालय। अरे सबकुछ तो बदल गया । और स्कूल के सामने पन्द्रह फीट की सड़क के अलावे तो कही कुछ भी जगह है ही नहीं । जो खुलापन था वह सब लोगो से पट गया। मकानों ने कोई जगह छोड़ी नहीं। दस फुट से बडी
गलिया कही नजर नहीं आई । उसी में हर घर के बाहर कार । पहले न गलियों में खटिया बिछी रहती थी। लोग उसी पर बैठते कोई ट्रक या बस आ जाती तो सभी उठ कर खटिया किनारे करते। लेकिन अब तो हार्न का शोर । स्कूल के भीतर जा नहीं सकता था तो बाहर की चारदीवारी से ही झांझांक कर उस मैदान का दाज लगाने लगा। जहां बचपन खेलते हुये बीता। हरी घास नजर आयी । लेकिन चालीस बरस पहले तो सिर्फ मिट्टी थी। और डिफिन में अक्सर आसमान में चील मंडराते । जिनकी तरफ हम अपने टिफिन से रोटी या ब्रेड निकाल कर हवा में उछालते तो जमीन पर गिरने से पहले ही चील या बाज रोटी मुंह/पंजे में दबाकर उड़ जाते। और इस खेल में अक्सर कई बार हम कुछ नहीं खाते । हां घर पहुंचकर बताने पर डांट जरुर खाते। लेकिन अब तो आसमान में कोई चिड़िया भी नजर नहीं आती। सिर्फ उंचे मकान। और जमीन पर गाडियों की कतार । चारदीवारी के सहारे स्कूल के पीछे गया तो वहां भी सिर्फ मकान। सामने छोटी सी सड़क। कोई श्मशान कभी यहां हुआ करता था। चाय की दुकान में बारिश की बूंदों से बचते हुये चाय की चुस्की के बीच एक बुजुर्ग ने बताया। लेकिन वह भी टैगौर गार्डन में रहने 1980 में आया था। उससे पहले का कौन हो सकता है यह सोच कर इलाके के बुजुर्ग के किसी महा बुजुर्ग चेहरे को खोजने लगा। जो मेरे अंदर के बचपन के अहसास को पंख दे सके।

जारी..........

3 comments:

निरंजन कुमार मिश्रा said...

यादों की बगिया को शब्दों की कलियों से बखूबी सजाया है आपने,,,यादें ही वह आईना है जो अतीत को भी हुबहू हमारे सामने रख देती है. लेकिन विकास और आधुनिकता की दौड़ में कब वो इतिहास बनकर रह जाते हैं पता ही नहीं चलता,,,

Tapasvi Bhardwaj said...

Bahut hi sundar aur manmohak articel...yun hi like khte rahiye sir

Univac Group India said...

प्रसूनजी,
नमस्कार.
कमाल का लिखा है आपने. आपका सजीव लेख पढ़ते-पढ़ते कब मै अपने बचपन में पहुँच गया पता ही नहीं चला. मेरा जन्म उत्तर गुजरात के छोटे से शहर पाटन में हुआ जहाँ मै बालमन्दिर(KG) से हायरसेकेंडरी तक पढा ओर अब पिछले २५ वर्षो से दिल्ली में कैद हूँ. हालांकि गुजरात में छोटी से छोटी जगह भी पक्के स्कूल और पक्की सड़क हुआ करती थी टेंट या फिर कच्चे बने स्कूल नहीं होते थे क्योंकि उस वक़्त भी गुजरात विकसित राज्य था लेकिन अन्य सभी बाते जो आपने लिखी है वो मन को बचपन तक उड़ा ले जाने के लिए पर्याप्त थी. आशा है पुनः आप का कोई अन्य सजीव चित्रण पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त होगा.

धन्यवाद

अशोक श्रीवास्तव
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