Thursday, March 31, 2016

कोलकत्ता एक ऐसा शहर..........

हुगली नदी किनारे तीस मील की लंबाई में बसा हुआ महानगर कोलकत्ता। खौफ, दशहत अंधेरे और उत्तेजना का शहर । यह शहर द्वंद का है और अनोखे टकराव भरे तर्जुबे का है । यहा रोशन रोशन सड़के और अंधी गलियां है । कहीं दौलत की रेलपेल और एश का नंगापन , तो कही गरीबी बदहाली, बीमारी और भूख है । श्रद्दा और अंधविश्वासों के तिलिस्मी महल भी है और भाले की नोंक की तरह सीने में उतरती हुई झुग्गियां भी है । एक तरफ दूर तक फैला हुआ लंबा-चौडा मैदान जो तकरीर और तफरीह के शौकिन चेहरो की छलकती हुई भीड के भर जाने से और भी फैला नजर आता है , तो दूसरी तरफ दरबो जैसी खोलियों में सूखे ईधन जैसे बेरौनक जिस्मो के अंबार । जहा ना उजाला है ना हवा । और ख्वाइशों ने किसी के लिये गुंजाईश नहीं छोड़ी । और इस शहर में अगर कोई पुल ढह जाये । ऐसा पुल जिसपर गाडियां नहीं रेंगती बल्कि पुलों के नीचे जिन्दगी आबाद रहती है । तो असे महज हादसा या दुर्घटना नहीं कहा जा सकता । बल्कि खुले आसमान तले रहने वालो के सिर पर ही आसमान के गिर जाने सरीखा है । फिर कोलकत्ता ऐसा शहर है जिसे देखकर किसी को टोक्यो तो किसी को लंदन और किसी को न्यूयार्क याद आ ही जाता है। लेकिन सच यही है कि हर नजर ने कोलकत्ता को अपने नजरीये से ना सिर्फ देखा बल्कि उसे एक नाम भी दे दिया । किसी ने सीटी आफ जाय कहा । तो राजीव गांधी ने कोलकत्ता को डाईंग सिटी कहा था । लेकिन चर्चिल ने कोलकत्ता को देखर अपनी मां से कहा था , " ये एक अजीम शहर है । और रात की ठन्डी हवा और सुरमई धन्ध में यह लंदन जैसा दिखाई देता है । " तो 1863 में ब्रिटिश संवाददाता सार जार्ज ट्रेविलियन ने लिखा, "कलकत्ते से ज्यादा उदासिन बस्ती दुनिया की चारो दिशाओ में और कोई नहीं । " किपलिंग ने कलकत्ते को , "खौफनाक और डरावनी रातो का शहर कहा था । " वायसराय राबर्ट क्लाइव ने कलकत्ते को , "कायनात की सबसे बुरी बस्ती करार दिया । " तो विलियम हंटर ने एक रात अपनी मंगेतर को जो मुहब्बतनामा भेजा उसके लफ्जे में कलकत्ते का जिक्र कुछ यू था । " तसव्वुर करो उन तमाम चीजों का , जो फितरत में सबसे शानदार है । और उसके साथ साथ उन समाम अनासिर का जो तामीर के फन में सबसे ज्यादा हसीन होते है । फिर तुम अपने आप कलकत्ता की एक धुंधली सी तस्वीर देख लोगी । और 1827 में गवर्नर जनरल के सामने अपने पेंशन का मुद्दमा लेकर गालिब भी कलकत्ता पहुंचे थे और गालिब कलकत्ते पर आशिक हो गये थे । गालिब ने लिखा भी , "कलकत्ता का जो जिक्र किया तूने हमनशीं / इन तीर मेरे सीने में मारा कि हाय हाय / वह सब्जाजार हाए मुतर्रा कि है गजब / वह नाजनी बुताने-खुद आरा कि हाय हाय "

कुछ मायनो में कलकत्ता की कहानी हिन्दुस्तान की कहानी है , बल्कि तीसरी दुनिया की एक मुख्तसर तस्वीर । ये तस्वीर बताती है कि साम्राज्य क्यो और कैसे वजूद में आये । कलकत्ता की कहानी औघोगिक क्रांति की कहानी है । कलकत्ता की कहानी दुनिया के मजदूरो को एक करन सत्ता बदलने की कहानी है । कलकत्ता की कहानी राजनीतिक शून्यता को संघर्ष के आसरे भरने की कहानी है । इसीलिये कलकत्ते में पुल ढहा तो राजनीति कही तेजी से ढहती और खडी होती दिखी । यानी कैलकटा...कलकत्ता....कोलकाता... । तो इस दौर में नाम बदला लेकिन मिज़ाज नहीं...। यही है कोलकाता की ख़ूबी...। कहा जाता है कि शहर में चमक और सफ़ाई देखनी है तो दिल्ली जाएं....। मशहूर और रईस देखने हैं तो मुंबई का रुख़ करें। लेकिन शहर में रूह महसूस करनी है तो कोलकाता आएं....। माना ये भी जाता है कि कोलकाता की रूह बसती है...वहां की भीड़ में। और इसी भीड़ भरे कोलकाता की हलचल तबदील हो गई एक कोहराम में जब शहर की जान माने जाने वाले बड़ा बाज़ार में एक फ्लाई ओवर निर्माण के दौरान ही ढह गया। कोलकाता में कोहराम....की वजह यक़ीनन फ़िलहाल गिरा हुआ फ़्लाई ओवर है...तकलीफ़देह और दिल को दहलाने वाला हादसा। लेकिन इस हादसे की वजहों पर नज़र डालें तो अंदाज़ा मिलेगा कि ये शहर का मिज़ाज ही है जो फ़्लाई ओवर के बनाए जाने की रफ़्तार पर हावी हो गया था। इत्मीनान के साथ आहिस्ता आहिस्ता शहर की भीड़ भरी रफ़्तार के साथ इसका काम भी पूरा किया जा रहा था। 2009 से बनना शुरू हुए इस फ़्लाई ओवर को यूं तो बन जाना चाहिये था साल 2012 में। लेकिन इस बीच सरकार बदल गई लेकिन बदल ना पाई तो इस फ़्लाई ओवर की सूरत। साल 2016 तक फ़्लाई ओवर 65 से 75 फ़ीसदी ही बन पाया। मानो कुछ यूं कि इस फ़्लाई ओवर के बनने या ना बनने से शहर के सुकून भरे भीड़ भाड़ वाले माहौल पर कोई असर ना हो रहा हो।भला कोई असर होता भी तो कैसे क्योंकि कोलकाता राजधानी है उस पश्चिम बंगाल राज्य की....। जहां सियासत भी करवट लेती है बेहद आहिस्ता आहिस्ता। आज़ादी के बाद 10 या 15 नहीं बल्कि लगभग 25 साल तक इस शहर ने कांग्रेस की हुकूमत देखी तो उसके बाद 34 साल लगातार वामपंथी सत्ता के नीचे ये शहर अपने मिज़ाज के साथ इत्मीनान से सांस लेता रहा। कोलकाता में क्यों है भीड़ के बावजूद भी एक इत्मीनान....क्यों है यहां की हलचल में भी एक सुकून। वजह शायद ये है कि इस भीड़ की ज़ुबान यूनिसेफ़ की माने तो दुनिया की सबसे मीठी ज़ुबान बांग्ला है। ऐसी जुबान....जिसने आज़ादी से पहले ढाका से लेकर कोलकाता को एक धागे में पिरोया। वो मीठी बांग्ला जिसने रबीन्द्र नाथ टैगोर के रबीन्द्र संगीत को बांग्लादेश के राष्ट्र कवि नज़रुल इस्लाम के गीतों से जोड़ा। सियासत की जगह बांग्ला जज़्बे को अगर मौक़ा दिया जाता तो कभी सरहदें ना बनती। क्योंकि भद्र बांग्ला ने हमेशा पिरोया चीज़ों को पिरोया है बिखेरा नहीं। लोगों से लेकर इमारत तक। कोलकाता शहर की ख़ूबसूरती में शामिल है....कोलोनियल आर्किटेक्चर से लेकर...नवाबों की हवेलियां....और मॉडर्न अट्टालिकाएं.....। यहा वजह है कि कोलकाता का इत्मीनान हादसों के बीच भी कभी गुम नहीं होगा। क्योंकि मौजूदा दौर के टूटते पुल के सामने आज भी ख़ामोश ख़ड़ा है कोलकाता की संस्कृति को समेटे हावड़ा ब्रिज।

और संकरे शहर की सबसे संकरी गली के बीच में बीते नौ बरस से जिस पुल को बनाने का जद्दोजहद इन हालातो को लेकर चलती रही कि एक खंबा लगे तो 100 परिवारो की नींद में खलल आ जाये । चार पिलर खडे करने हो तो सौकडो मजदूर और बेबस पड़े लोगो की जिन्दगी हराम हो जाये । ऐसे में उस पुल के गिरने का
मतलब होता क्या है । यह सारा नजारा आज खुल कर हर आंखो के सामने आ गया । चलती बस और किनारे खडे ट्रक टैक्सी अगर इसकी चपेट में आये तो पुल की छांव में बैठे रिक्शा और गाथ गाडी खिंचने वाले भी दब गये । लेकिन कल्पना किजिये बडी तादा में पुल के नीचे ही जिन्दगी बसर करने वाले परिवारो का
क्या हुआ होगा । पुल के नीचे परिवार छोड काम पर निकला मजदूर हुगली नदीं किनारे भी मजदूरी कर रहा था और कई मजदूर तो पुल के उपर ही काम कर रहे थे । कितने दबे , कितने मरे । सियासत इसकी गिनती बतायेगा और बता रहा है । लेकिन जो शहर बिना गिनती के जीता हो वहा कितनो की मौत तो किसी कागज पर भी दर्ज नहीं होगी । क्योकि कोलकत्ता का सच यही है कि यहा लाखो लोग खुले आसमान तले पूरी उम्र गुजार देते है । फुटपाथ पर पैदा होते है । जवान होते होते है । बच्चे पैदा करते हैं और मर जाते हैं। यहां गरीबी ऐसे रंग-रुप लेकर साथ लेकर आती है कि बहुतेरे इस नजारे की ताब नही ला सकते । यहां हिंसा है । वहशत है । और टकराव है । दूसरी तरफ तन्जीम है । धीमापन है और घर की चौखट पर उस पुरानी मिट्टी की महक है जो हर शहर से गायब हो चली है । अन हालातो के बीच जिस उलाके में पुल ढहा वह इलाका तो व्यापार और उघोग के एतबार से कोलकत्ता का सबसे बडा इलाका है । कह सकते है चेतना का सबसे बडा केन्द्र बडा बाजार का इलाका । जहा के घरो में आज भी धन्ना सेठ रहते हैं । न्हे फक्र है खुद के भ्दर मानुष होने का । इसीलिये जैसे ही पुल के
गिरने की आवाज आई हर किसी ने पहले अपने घर को टटोला । कोई बाहर तो नहीं । कही कोई पुल की तरफ तो नहीं गया । क्योकि पुल के नीचे मजदूर-साहूकार ही नहीं बसते बल्कि इस पूरे इलाका का शहर यही जीवंत होता है । इसीलिये पुल ढहा तो कोलकत्ता ठहर गया । क्योकि पुल ढहा और सत्ता का भ्रष्टाचार एक ऐसा राज्य में गूजने लगा जो हिन्दुस्तान की पहली रियासती राजधानी थी । और जहा 1967 के चुनाव के बाद 14 सियासी पार्टियों की मिली जुली हुकूमत ने यह एलान किया था कि पश्चम बंगाल के मंत्रियों की हिफाजत के लिये अब पुलिस की दरकार न होगी । सीएम की तनख्वाह 1150 रुपये से घटाकर सात कर दी गई थी । और मंत्रियो का वेतन नौ सो घटाकर 500 रुपये । और तो और जिस कोलकत्ता में लू से सैकडो मौते होती थी वहा सरकारी दफ्तरो से एयरकंडीशन हटाने का फैसला ले लिया गया था । और कलकत्ता के मैदान में जब पहली सभा हुई तो जिक्र किसानो की बदहाली का हुआ था । मजदूरो के हक के सवाल थे । तालिम में सुधार की बात ती । बेजमीन मजदूरो की रोटी के सवाल थे । शहर की दीवारो पर इन्कलाब के नारे थे, " बंगाल के बेटो ! नींद से जागो और दहाडो शेर की तरह । " दुनिया के सबसे ज्यादा बागी छात्र भी यही थे ।और आजादी के बाद दंगे भी बंगाल में ही भडके । और उस वक्त महात्मा गांधी ना होते तो दंगे पूरे देश को अपनी हद में लेलेते । तो मनाईये जब सियासत मैली हो रही है । भ्रष्टाचार राजनीति के दामन से बंध चुका है ऐसे में कोई रोशनी कोलकत्ता
से निकले तो ठीक नहीं तो हर जिस्म पर ऐसे दाग बढते चले जायेगें । और सियासी आरोप प्रत्यारोप में मौत खो जायेगी ।

2 comments:

ashutosh mitra said...
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ashutosh mitra said...

पुण्य भाई,
ये फ्लाई ओवर नहीं, वामपंथ और ढ़ोगपंथ ढ़हा है... वो भी अपने ही ढ़ोंगीपने की कंक्रीट के बोझ तले...!
हमारे लिए तो कोलकाता एक ऐसा शहर है जो भुखमरी और कंगाली दिखा कर वाहवाही बटोरने वाले महान कलाकारों की जन्म और कर्मभूमि रही है। तभी तो 1927 से आप सीधे 2012 में आ गए। इस बीच इस शहर में समय थम गया। और रूह-वूह का बेमानी बातों से खुद को खुश न करिए। क्योंकि नोएडा में बैठा कोई भी संपादक कोलकाता जा कर काम करना पसंद न करेगा। और तो और किरांतिकारियों को JNU नहीं दिल्ली से मतलब है।
यही तो कमाल है वामपंथ की तो वो दक्षिणपंथियो से अच्छी मार्केटिंग करता है, और भुखमरी और कंगाली तक बेच डालता है। उसी बेचू कला के महान कलाकारों के कारण बंगाल में वाम आंदोलन को 35 बरस 'राज करने' का सुअवसर मिला...लेकिन सर्वहारा और किरांति का आइडिया बेच कर वोट कमाने वाले लोगों ने बंगाल को कंगाल करने में कोई कसर नहीं रखी।
आज रेडलाइट में ग्राहक की तलाश में खड़ा वामपंथ सारे देश को आदर्श, आजादी और पता नहीं क्या-क्या की दुहाई देता फिर रहा है वह वामपंथ इस फ्लाई ओवर की तरह जर्जर हो गया है जो कन्हैया की कंक्रीट से इस फ्लाई ओवर को पूरा करना चाहता है और इस आपाधापी में अपना जर्जर अस्तित्व भी खोने को आतुर है।
बकिया समय तो सब सिद्ध करेगा ही..