Sunday, April 22, 2018

ना सिल्वर स्क्रीन पर नायक ना राजनीति में स्टेट्समैन

जब आधी दुनिया सो रही थी, तब नेहरु आजाद भारत के सपनो को हकीकत की जमी दे रहे थे । आजाद भारत के पहले नायक नेहरु थे । पर दूसरी तरफ महात्मा गांधी आजादी के जश्न से दूर कोलकत्ता के बेलियाघाट के अंधेरे कमरे में बैठे थे । पर नेहरु की सत्ता के चमक भी महात्मा गांधी के सामने फीकी थी । इसीलिये महात्मा गांधी महानायक थे। और आजाद भारत में नायकत्व का ये कल्ट सिनेमाई पर्दे पर मिर्जा गालिब से शुरु तो हुआ । पर गांधी ना रहे तो फिर सिनेमाई पर्दे पर ही गालिब की भी मौत हो गई। और सिल्वर स्क्रीन  कैसे नेहरु दौर में समाता चला गया इसका एहसास सबसे पहले राजकपूर ने ही कराया । और अपने नायकत्व को आवारा के जरीये गढा । “आवारा” कुलीनता के फार्मूले में कैद उस घारणा को तोडती है कि अच्छा आदमी बनाया नहीं जा सकता। वह पैदा होता है । और इसे गीत में राजकपूर पिरोते भी है । “बादल की तरह आवारा थे हम / हंसते भी रहे रोते भी रहे ...” और नेहरु के नायकत्व से टकराता राजकपूर का नायकत्व सिल्वर स्क्रीन पर नेहरु के सोशलिज्म को  चोचलिज्म कहने भी भी कतराता और सामाजवादी राष्ट्रवाद को नये तरीके सेगढता भी है। “ मेरा जूता है जापानी, पतलून इंग्लिशस्तानी, सर पर लाल टोपी रुसी फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी “ । तो सियासत में नेहरु और सिल्वर स्क्रीन पर राजकपूर के नायकत्व को कोई चुनौती नहीं थी । पर इस दौर में नायकत्व के सामानांतर लकीर खींचने के लिये खांटी समाजवादी राम मनमोहर लोहिया राजनीति के मैदान में थे । जो आजादी के 10 बरस बाद ही  सत्ता की रईसी और जनता की दरिद्रगी पर संसद में बहस करने के लिये तीन आना बनाम 16 आना की चुनौती नेहरु को ही दे रहे थे । तो सिल्वर स्क्रीन पर राजकपूर के नायकत्व को चुनौती देने के लिये दिलीप कुमार थे । और इस चेहरे का दूसरा रुप नेहरु की ही थ्योरी को सिल्वर स्क्रीन पर उतारने के लिये फिल्म नया दौर आई । मानव श्रम को चुनौती देती टेकनालाजी । पर ये दौर तो ऐसा था कि देश समाज और सिल्वर स्क्रीन भी नये नये नायको को खोज रहा था । 62 के युद्द ने नेहरु के औरे को खत्म कर दिया तो उससे पहले ही आजाद भारत में आधी रात को देखे गये नेहरु के सपनो के हिन्दुस्तान को गुरुदत्त ने सिल्वर स्क्रिन पर निराशा से देखा । और ये कहने से नहीं चूके 'ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है ..... ।

पर निराशा के इस दौर से लाल बहादुर शास्त्री ने “जय जवान जय किसान “ जरीये उभारा । इस नारे ने शास्त्री के ननायकत्व को राजनीति में कुछ इस तरह गढा कि समूचा देश ही राष्ट्रवाद की उस परिभाषा में समा गया जहा इंडिया फर्स्ट था । और सिल्वर स्क्रीन पर मनोज कुमार ने नायकत्व के इस धागे को बाखूबी पकडा । नायकत्व की परिभाषा बदल रही थी । पर हमारे पास नायक थे । शास्त्री के बाद इंदिरा गांधी की छवि तो दुनिया के नायको के कद से भी बड़ी हो गई । 1971 के युद्द ने इंदिरा को जिस रुप में गढा वह दुर्गा का भी था । और अमेरिका जैसे ताकतवर देश के सातवे बेडे को चुनौती देते हुये ताकतवर राष्ट्रध्यक्ष का भी था । पर 71 के बाद इंदिरा का नायकत्व फेल होता दिखा क्योकि करप्शन और सत्ता की चापलूसी के लिये बना दिये गये वैधानिक संस्थानो के विरोध में एक नये नायक जेपी का जन्म हुआ । जेपी सत्ता से टकराते थे । और इमरजेन्सी में भी 72 बरस के बूढे को लेकर धर्मवीर भारती ने जब “ मुनादी “ कविता लिखी तो ईमानदार संघर्ष की इस तस्वीर को सिल्वर स्क्रीन पर सलीम-जावेद की जोडी ने अमिताभ बच्चन को गढ़ा । सिल्वर स्क्रीन पर अमिताभ एक ऐसा नायक बना जो अपने बूते संघर्ष करता । न्याय दिलाने के लिये किसी हद तक जाता । और देखने वालो की शिराओ में दौ़डने लगता । और राजनीतिक हालात से पैदा होती सामाजिक – आर्थिक त्रासदियों को भोगती जनता को लगता वह खुद ही इंसाफ कर सकती है । क्योकि भ्रम तो कालेज छोड़ जेपी के पीछे निकले युवाओं का भी टूटा । और झटके में नायकत्व को जीने वाले देवआंनद से लेकर राजेश खन्ना युवाओ के जहन से गायब
हो गये ।

पर इसके बाद कि सामाजिक-राजनीतिक निराशा ने नायको की लोकप्रियता खत्म की । असर ये हुआ कि एक तरफ भारतीय राजनीति में गठबंधन की सरकारो को सत्ता दिलायी  तो सिल्वर स्क्रीन पर भी मल्टी स्टार यानी जोडी नायकों का खेल हो गया । याद कीजिये शोले , दोस्ताना ,काला पत्थर । और शायद यही वह दौर था जब राजनीति में क्षत्रपों का उदय हुआ तो दूसरी तरफ नायकी मिजाज सिल्वर स्क्रीन पर भी बदलता नजर आया । तो एक तरफ सिल्वर स्क्रीन के नायक सलमान/आमिर/शाहरुख/अजय देवगन/अक्षय कुमार /रितिक है तो दूसरी तरफ राजनीतिक मैदान में लालू /मायावती/मुलायम / नीतिश / चन्द्रबाबू /ममता नायक के तौर पर उभरे । ये वो चेहरे है जो अपने अपने वक्त के नायक रहे हैं । फिल्मी नायको की इस कतार ने अगर तीन पीढी की नायिकाओं के साथ काम लिया है


तो राजनीति के मैदान में बीते तीन दशक से ये चेहरे अपने अपनी बिसात पर नायक रहे हैं । इन नायकों में आपसी प्रतिस्पर्धा भी खूब रही है । सलमान-आमिर और शाहरुख की प्रतिस्पर्धा कौन भूल सकता है । और राजनीति में मुलायम मायावती , लालू नीतिश की प्रतिस्पर्धा कौन भूला सकता है । फिर अजय देवगन और अक्षय कुमार का कैनवास उतना व्यापक नहीं है । एक्शन को केन्द्र में रखकर संवाद कौशल से ही इन दोनो ने जगह बनायी । ठीक इसी तरह ,ममता बनर्जी और चन्द्रबाबू नायडू का भी कैनवास व्यापक नहीं रहा । दोनों ने अपनी राजनीतिक जमीन केन्द्र से टकराते हुये  क्षत्रपों के तौर पर गढी । एक लिहाज से नायको की कतार यही आकर थम जाती है । क्योकि इन चेहरो के आसरे सिनेमाघर में हाउस फूल होता रहा । और राजनीति के नायक क्षत्रपो के सामने राष्ट्रीय राजनीतिक दल काग्रेस या बीजेपी भी टिक नहीं पाये । पर ये नायकों का आखिरी दौर था । क्योकि इसके बाद की कतार में आकार्षण है पर नायक नहीं । मसलन , सिल्वर स्क्रिन पर  रणवीर कपूर /रणबीर सिंह / वरुण धवन /टाइगर श्राफ है तो राजनीतिक मैदान में अखिलेश यादव/तेजस्वी यादव /केजरीवाल/उद्दव ठाकरे / उमर अब्दुल्ला है । पर नायक नहीं है । तो क्या मौजूदा दौर में नायक गायब है । आकर्षण है । पर इनमें नायकत्व नहीं है जिसके आसरे कोई फिल्म हाउस फुल देदें । या फिर जिस नेता के आसरे देश में विकल्प नजर आने लगे । क्योकि इन तमाम चेहरो को देखिये और इनकी फिल्मो को याद किजिये तो सभी अचानक तेजी से चमके फिर गिरावट आ गई । आज फिर सभी संघर्ष के रास्ते पर है । यानी संघर्ष के आसरे सिल्वर स्क्रिन पर रणवीर कपूर या रणवीर सिंह या वरुण धवन सफल दिखायी दे सकते है । लेकिन सितारा आकर्षण इनके साथ अभी भी जुडा नहीं है। और यही हालत नये नेताओं की है । ये भी सफल होते है जैसे केजरीवाल तेजी से निकले पर नायक के तौर पर नहीं बल्कि संघर्ष करते हुये ठीक वैसे ही  जैसे फिल्मों के लिये अच्छी कहानी , सधा हुआ निर्देशन चाहिये । वैसे ही इन नेताओं को भी राजनीति गढने के लिये मुद्दा चाहिये । उसे सफल बनाने के लिये प्रचार-प्रसार और कैडर की मेहनत चाहिये । और सफल होने के लिये अखिलेश सरीखे नेता को भी पुरानी पीढी की सफल मायावती के साथ जुड़ना पडता है । यानी मौजूदा वक्त में नायक की कमी कैसे राजनीति की कमान संभालने वालो से लेकर सिल्वर स्क्रीन तक पर है, ये भी साफ है । या फिर ये कहा जाये कि मौजूदा वक्त ने नायक की परिभाषा ही बदल दी है । क्योकि सिल्वर स्क्रीन पर बाहुबली और देश में पीएम मोदी ने नायकत्व को नई परिभाषा तो दी है । बाहुबली का डायलाग “मेरा वचन ही मेरा शासन है “ संभवत नौजूदा राजनीतिक सत्ता की कहानी भी कहता है । तो क्या ये नये दौर के नायकत्व की पहचान है । एक तरफ बाहुबली बने प्रभाश .है । तो दूसरी तरफ गुजरात माडल लिये पीएम मोदी । बाहुबली के सामने बालीवुड के सितारे भी नहीं टिके । और मोदी के सामने उनकी अपनी पार्टी बीजेपी का ही कद छोटा हो गया । तो क्या ये बदलाव का दौर है । दक्षिण से बाहुबली जैसी फिल्म बनाकर कोई निर्देशक देश दुनिया में तहलका मचा सकता है । और बालीवुड का एक निर्देशक उसका वितरक बनकर ही खुश हो जाता है कि उसके करोडो के वारे न्यारे हो गये । तो दूसरी तरफ राष्ट्रीय नेताओ की कतार से इतर ही नही बल्कि हिन्दी पट्टी से दूर गुजरात से एक शख्स निकल कर देश की समूची राजनीति को ना सिर्फ बदल देता है बल्कि लोकतंत्र को नई परिभाषा भी दे देता है । और विपक्ष की समूची राजनीति एकतत्र होकर उसे हराने में ही अपनी जीत मानती है । यानी नायकत्व समेटे हालात क्या सिल्वर स्किर से लेकर राजनीति तक में बदल चुके है । क्योकि एक वक्त वाजपेयी नायक थे पर राजधर्म का पाठ जिन्हे पढाया आज वही शख्स नायक है । और एक दौर में जो बालीवुड मुगले आजम बनाता था । आज वही बालीवुड दक्षिण की तरफ देखने को मजबूर है ।

11 comments:

jay prasad said...

Some word mistake....!
Nice Blog sir✔✔✔

jay prasad said...

Sir replye nhi dete ho...? why...?

HARSHVARDHAN said...

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन विश्व पुस्तक एवं कॉपीराइट दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

kirin bittiza said...

Very nice comparison, as usual always a pleasure to listen you n read you. Thanks sir

N.B. Mishra said...

http://dogs-matter.net/demopsu2018/c019.html


Have a look

Ajit awasthi said...

बढ़िया है

Technical Spot said...

proile still says a reporter in AajTak News channel.

Faiz Alam said...

इसी तरीके से भाई भतीजावाद भी सिल्वर स्क्रीन और राजनीति दोनों में दिखाई देता है/दिया है।

rajendra jain said...

सर,
मास्टर स्ट्रोक में आप किसानों से जुड़े मुद्दे उठाते रहे हैं|
किसानों से ही जुड़ा एक घोटाला राष्ट्रीय बीज निगम से जुड़े श्रीगंगानगर जिले के जैतसर केंद्रीय कृषि राज्य फार्म में हुआ है| घोटाला फॉर्म द्वारा चलाए जा रहे बीज उत्पादन कार्यक्रम में हुआ है इस कार्यक्रम के तहत फार्म प्रशासन किसानों की जमीन पर बीज का उत्पादन करवाता है| इसके लिए बीज व अन्य सुविधाएं फार्म प्रशासन द्वारा दी जाती है इसके बाद जो बीज तैयार होता है उसे फार्म द्वारा संबंधित जींस के बाजार के अधिकतम मूल्य से 20% अधिक होने पर खरीदा जाता है | परंतु यहां पर भ्रष्ट अधिकारियों ने सीधे किसानों से एग्रीमेंट करने के बजाय व्यापारियों से बीज उत्पादन का एग्रीमेंट कर लिया| व्यापारियों ने किसानों की जमीन ठेके पर लेने के फर्जी दस्तावेज तैयार कर फार्म से अग्रीमेंट कर लिया और बाजार से हजारों क्विंटल गेहूं,जों ओर चना जैसी जींसे खरीदकर फार्म को बीज के दाम पर बेच दिया और करोड़ों रुपए का मुनाफा भ्रष्ट अधिकारियों और व्यापारियों ने आपस में बांट लिया | जबकि जिन किसानों की जमीने ठेके पर लेना दिखाई गई है उन किसानों को इसकी जानकारी तक नहीं है| इस पूरे घोटाले में एक प्रकरण मैं तो एक ऐसे किसान के नाम से एग्रीमेंट दिखाया गया है जिसकी मौत ही एग्रीमेंट से 7 माह पूर्व हो चुकी हैं वहीं एक मामले में जिस किसान की जमीन है उसके स्थान पर किसी दूसरे व्यक्ति की फोटो लगाकर एग्रीमेंट कर लिया गया है |यही नहीं कई मामलों में फार्म प्रशासन द्वारा किसान की जमीन पर जो का बीज उगाने का एग्रीमेंट किया गया है लेकिन उस किसान ने पिछले कई सालों से अपने खेत में गेहूं के अलावा किसी दूसरी फसल का उत्पादन तक नहीं किया है| यह घोटाला कितना बड़ा हो सकता है इसका अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि केवल जैतसर केंद्रीय कृषि राज्य फार्म द्वारा इस सीजन में करीब 80000 क्विंटल गेहूं ,जो और चना बीज उत्पादन कार्यक्रम के तहत खरीदा गया है अगर इसमें सूरतगढ़ और सरदारगढ़ के केंद्रीय कृषि राज्य फार्म को शामिल कर लिया जाए तो घोटाले का अंदाजा लगाया जा सकता है| किसानों को जब इस मामले का पता चला तो उन्होंने फार्म प्रशासन में शिकायत की तो फार्म प्रशासन ने शिकायत पर कार्रवाई के बजाय उन किसानों की जमीनों पर व्यापारियों से हुए अग्रीमेंट को रद्द कर इतिश्री कर ली | पूरा मामला सामने आने पर राष्ट्रीय बीज निगम ने जैतसर केंद्रीय कृषि राज्य फार्म के डायरेक्टर आर के कस्वां का स्थानांतरण दिल्ली मुख्यालय पर कर दिया है| ऐसे में सवाल यह पैदा होता है कि किसानों का हक मारने वाले भ्रष्ट अधिकारियों और व्यापारियों के खिलाफ कार्यवाही कब होगी | इस पूरे प्रकरण की जांच सीबीआई किसी अन्य एजेंसी से करवाई जाए तो दूध का दूध और पानी का पानी हो सकता है |

सर, पूर्व में मैंने आपको सूरतगढ़ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा मृदा जांच कार्ड कार्यक्रम की शुरुआत करने के 2 साल बाद भी मृदा जांच प्रयोगशाला के शुरू नहीं होने के बारे में आपको बताया था जिस पर आप ने संज्ञान लेते हुए 10 तक कार्यक्रम में उस खबर को शामिल किया था | उम्मीद है कि किसानों से जुड़े इस मसले को भी आप अपने कार्यक्रम में स्थान देंगे |यह खबर राजस्थान पत्रिका और राजस्थान के एक दो रीजनल चैनल में प्रसारित भी हुई है पर कार्रवाई नहीं हुई है खबर से संबंधित विजुअल और बाइट्स अगर आप चाहे तो मैं उपलब्ध करवा सकता हूं या फिर आप अपने संवादाता को मेरा संपर्क नंबर दे सकते हैं मैं उन्हें घोटाले से संबंधित दस्तावेज वह पीड़ित किसानों के बारे में जानकारी उपलब्ध करवा दूंगा |

Rajendra jain
Mo_9928298484
Suratgarh rajasthan

rajendra jain said...

Plz see the story

सुरेश कुमार शुक्ल said...

आपकी कमाई साफ है, यह आपकी ताकत है
साफ कमाई साफ सोच को मजबूत करती है

इसी सोच पर सब पार्टी को परख कर बताइए
आम देशवासी भी पसंद करेगा
कुछ दिन लगेंगें लेकिन समझ जाएगा

जैसे पहली बार किसी को बताते हैं क्योंकि स्कूलों कालेजों ने नहीं बताया