Thursday, July 4, 2019

किसानो की खुदकुशी रोकने वाले बजट का इंतजार....


वाकई ये सवाल तो है कि जब देश की सियासत में किसान-किसान की आवाज सुनायी देती है । सत्ता परिवर्तन से लेकर सत्ता बचाने के लिये किसान राग देश में गाया जा रहा हो । आने वाल वक्त में किसानो के संघर्ष के आसरे ही व्यवस्था परिवर्तन की उम्मीद-आस समाजसेवी जगाने में ले हो तब कोई पूछ बैठे कि क्या , 2019 का आम बजट ये वादा कर पायेगा कि आने वाल वक्त में किसान खुदकुशी नहीं करेगा ? ये ऐसा सवाल है जिसे बजट के दायरे में देखा जाये या ना देखा जाये अर्थशास्त्री इसे लेकर बहस कर सकते है । लेकिन एक तरफ जब सरकार 2022-23 तक देश की अर्थव्यवस्था को पांच ट्रिलियन डालर तक पहुंचाने का वादा कर रही हो तब उसका आधार क्या होगा । कैसे होगा ये तो कोई भी पूछ सकता है । क्योकि दूनिया में भारत खेती पर टिके जनसंख्या को लेकर नंबर एक पर है । विश्व बैक की एनएसएसओ की रिपोर्ट के मुताबिक भारत की 44 फिसदी जनसंख्या खेती पर टिकी है । जबकि अमेरिका-बिट्रेन की सिर्फ एक फिसदी आबादी खेती से जुडी है । और एशिया में पाकस्तान के 42 फिसदी तो बांग्लादेश के 40 फिसदी और श्रीलंका के 26 फिसदी लोग खती स जुडे है । और भारत के इक्नामी इन सब से बेहतर है । लेकिन खुदकुशी करते किसानो की तादाद भी भारत में नंबर एक है । सिर्फ महाराष्ट्र में हर तीसरे घंटे एक किसान खुदकुशी कर लेता है [ चार साल में 12000  किसानो ने खुदकुशी की ] , तो देश में हर दूसरे घंटे एक किसान की खुदकुशी होती है ।और देश का अनूठा सच ये भी है कि भारत की जीडीपी में 48 फिसदी योगदान उसी ग्रामीण भारत का है जहा 75 फिसदी लोग खेती से जुडे है । तो फिर बजट से उम्मीद क्या की जाये । क्योकि 5 ट्रिलियन डालर इक्नामी के मतलब है  उत्पादन की विकास दर 14.6 फिसदी हो जाये । कृर्षि विकास दर 10.1 फिसदी हो जाये । सर्विस क्षेत्र की विकास दर 13.7 फिसदी हो जाये । और जीडीपी की विकास दर 11.7 फिसदी हो । पर ये कैसे होगा कोई नहीं बताता । हालाकि किसान की आय 2022 तक दुगुनी हो जायेगी इसका राजनीतिक एलान पांच बरस पहले ही किया जा चुका है । लेकिन सच तो ये भी है किसान को फसल उगाने में जितने रकम खर्च होती है देश में एसएसपी उससे भी कम रहती है । मसलन हरियाणा को ही अगर आधार बना लें तो वहा प्रति क्विटल गेहू उगाने में किसान का खर्च होता है 2047 रुपया लेकिन एसएसपी है 1840 रुपये प्रतिक्विटल । एक क्विटल काटन उगाने में खर्च आता है 6280 रुपये लेकिन काटन का न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी है 5450 रुपये । इसी तरह एक क्विटल मक्का को उगाने में खर्च आता है 2454 रुपये लेकिन एसएसपी है 1700 रुपये । और देश में किसानी का सच तो ये भ है कि 2002 से 2015 तक किसानो की आय में वृद्दि 3.7 फिसदी रही है । और 2014 से 2018 के बीच कृर्षि जीडीपी ग्रोथ 2.9 फिसदी रही । यानी किसान की आय की वृद्दि की रफ्तार जहतक 15 फिसदी के हिसाब से नहीं बढेगी तबतक दुगुनी आय कैसे होगी कोई नही जानता । फिर आलम तो ये भी है कि गन्ना किसानो का बकाया तक देने की स्थिति में सरार नहीं है । गन्ना मिल और राजनीति में शुगर लाबी की रईसी किसी से छुपी नहीं है । और सरकार भी उन्हे कितनी राहत कितनी सब्सीडी देती है ये सर्वव्यापी है,  लेकिन यूपी में गन्ना किसानो  का 10,183 करोड तो कर्नाटक में 1709 करोड और महाराष्ट्र में 1400 करोड रुपया  बकाया है । और देश भर में गन्ना किसानो का बकाया 21000 करोड से ज्यादा का है ।
तो बजट को कैसे परखा जाये ये सवाल तो हर जहन में होगा क्योकि देश में 5 करोड किसान बैक से कर्ज लेने पहुंचते है लेकिन कर्ज की रकम दस हजार पार नहीं करती कि उनके घर से बकरी-गाय तक उठाने बैककर्मी पहुंच जाते है । यहा तक की जमीन पर भी बैक कब्जा कर लेती है और बैक के बाहर किसानो की तस्वीर भी चस्पा कर दी जाती है । लेकिन इसी दौर में कोई कारपोरेट-उघोगपति या व्यापारी बैक से कर्ज लेकर ना लौटाने का खुला जिक्र कर ना सिर्फ बच जाता है बल्कि सरकार ही उसकी कर्ज ली हुई रकम अपने कंघो पर ढोने के लिये तैयार हो जाती है । आलम ये है कि बैको से क्ज लेकर ना लौटाने वालो की तादाद बरस दर बरस बढ रही है । 2014-15 में 5349 लोग थे तो 2016-17 में बढकर 6575 हो गये और ये बढते बढते 2018-19 में 8582 हो चुक है । और तो और मुद्रा लोन के तहत भी एनपीए बीते एक बरस में 68 फिसदी बढ गया । 9769 करोड से बढकर 16,480 करोड हो गया । तो क्या बजट सिर्फ रुपये के हेर फेर का खेल होगा । जिसमें कहा से रुपया आयेगा और कहा जायगा इसको लेकर ही बजट पेश कर दिया जायेगा । क्योकि अमेरिका की कतार में खडे होने की चाह लिये भारत ये भी नहीं देख पा रहा है कि जिस अमेरिका में सिर्फ एक फिसदी लोग किसानी से जडे है उनकी लिए भी 867 बिलियन डालर का विधेयक [ फर्म बिल 2019-28 ] लाया गया । जिसमें पोषण से लेकर बीमा और जमीन के संरक्षण से लेकर समुदायिक समर्थन तक का जिक्र है । 
ऐसा भी नहीं है कि सरकार की समझ अब किसानी छोड टेकनालाजी पर जा टिकी हो । तो बजट में उसका जिक्र होगा । सच तो ये है कि टाप 15 इंटरनेट कंपनिया 30 लाख करोड का वेलूय़न कर रही है और उनसे टैक्स वसूलने की हिम्मत सरकार कर नहीं पा रही है । गूगल ने ही 2015-16 में भारत में 6000 करोड का कारोबार बताया लेकिन बिसने वर्लड ने इस आंकडे को 4.29 लाख करोड बताया । अगले दो बरस में ई-कामर्स का बजट भारत में 200 बिलियन डालर हो जायेगा । लेकिन बजट बेफिक्र रहेगा और इस्ट इंडिया की गुलामी से उबर चुका भारत अब इंटरनेट कंपनियो की गुलामी के लिये तैयार है । और आखरी सच तो देश का यही है कि जिस महाराष्ट्र में बारिश ने कहर बरपा दिया । मुबंई पानी पानी हो गई । फ्लाइट रुक गई । रेलगाडी थम गई । सत्ता का गलियारी बारिश में तैरता दिखा . बिजली के करंट और दीवार गिरने से 50 से ज्यादा मौत हो गई उस मुबई के मेयर ये कहने से नहीं चुकते कि मुबई में पीने का पानी खत्म हो चला है । मराठवाडा-विदर्भ में भी पानी नहीं है । तो फिर किसानो की खुदकुशी का जिक्र किये बगैर कैसे किसानो का हित साधने वाला बजट आने वाला है इसका इंतजार आप भी किजिये...हम भी करते है ।

4 comments:

Sandeep said...

Very good really there is nothing for formers.
You must make a political party.

ajay said...

If your figure are correct then God save the King (Farmer).I have a one question why people don't understand and question the govt. If Govt does not bother then why no revolution?

osama said...

Hi Bajpai Sir,

I have seen your program of 6th July 2019. Regarding the BPL patient is not getting any benefit in private hospital(MAX SAKET). Please share the contact number of the patient attendant. I am doing social work for all needys by helping in their treatment in AIIMS Delhi.
My detail mentioned below.

Name Osama Usmani
Mail Id- ousmani2002@gmail.

Regards,
Er Osama Usmani

Naveen Kumar said...

Punya ji aap bahutt acche reporter ho.