Thursday, July 23, 2009

कितना खतरनाक है किसान का सच

मेरे पास पन्द्रह एकड़ जमीन है । मैं छतरपुर से चालीस किलोमॉीटर दूर विजावर में जसगुआं खुर्द गाव का जमींदार हूं । मैं आपसे पांच रुपये ज्यादा लेकर क्या करुंगा । मामला सिर्फ आम की सूखी लकड़ियों के मोल भाव का था । उसने पैंतीस रुपये मांगे और मैं तीस रुपये देने की बात कर रहा था। बस इसी बात पर वह बुजुर्ग व्यक्ति फूट पड़ा। इस तरह फूटा की उसकी आवाज में आक्रोष था, लेकिन आंखों में आंसू भी थे । आंसुओं में लाचारी कहीं ज्यादा थी। मानसून आया नहीं तो गांव में रह कर क्या करता। जमीन फट रही है। सोयाबिन की फसल जो अब तक जवान हो जाती है, इस बार बुआई तक नहीं हुई। पिछले साल 15 मई तक बुआई का काम पूरा हो गया था लेकिन अब तो जुलाई शुरु हो गया। गांव में जमींदार बनकर ऐसे ही कोई कैसे रह सकता है। खुद का पेट खाली होगा तो गांववालों के हक के लिये आवाज भी नहीं निकलती।

सबकुछ एक सांस में जिस तरह लकड़ी बेचेने वाला वह शख्स महज पांच रुपये के सवाल पर कहता चला गया, उसने मुझे एक झटके में अंदर से हिला दिया। मैं आम की लकड़ी लेने निकला था । दिल्ली से सटे गाजियाबाद के वसुंधरा इलाके में पूजा -हवन के लिये आम की लकड़ी खोज रहा था। सड़क किनारे लगे पानवाले से लेकर कबाड़ी और फूल वाले सभी के ठेलो पर गया और पूछा कि आम की लकड़ी कहां मिलेगी। कोई नहीं बता पाया । भटकते भटकते इंदिरापुरम थाने के सामने पहुंच गया तो खाकी वर्दी को देख कर दिमाग में आया कि इसे जरुर पता होगा। पूछा तो एक पुलिस वाले ने अंगुली उठाकर इशारे से बताये कि वह सामने झोपड़ी में चले जाओ....और यही वह बुजुर्ग लकड़ी का कोयला और आम की लकड़ी बेचते मिल गए ।

मुझे तीन चार किलोग्राम लकड़ी की जरुरत थी सो उन्होंने तौल दी ...मुझसे कहा पैंतीस रुपये हुये, मैंने तीस रुपये की बात कही तो यह शख्स फूट पड़ा। मै खुद को रोक नहीं पाया और झोपडी में बिछी चारपाई पर ही बैठ गया। बुजुर्ग के हाथ में चालीस रुपये रखते हुये कहा कि मुझे लगा कि खुले पैंतीस रुपये मेरे पास नहीं थे...मुझे लगा आपके पास भी नहीं होगे इसलिये तीस रुपये की बात कह दी। मेरे चारपाई पर बैठते ही उस बुजुर्ग का आक्रोष थमा...लोकिन सख्त तेवर में बोला पांच रुपये का मतलब शहर में नहीं होता लेकिन गांव में पांच रुपये आज भी बड़ी रकम है । लेकिन आपने बताया आप जमींदार हैं..तो इस तरह यहा आकर लकड़ी बेच कर क्या कमाई हो जाती होगी.....

सवाल कमाई का नहीं पेट पालने का है । कमाई मुनाफे को कहते हैं। हम यहां मुनाफा बनाने नहीं आये हैं। बस अपना पेट पाल रहे हैं । सूखे ने पूरे परिवार को ही अलग थलग कर दिया है । मेरे चार बेटे हैं । पानी होता तो सभी किसानी करते । लेकिन सूखा है तो चारो बेटे भी रोजगार की तालाश में कही ना कही निकल पड़े । क्या बेटों के बारे में कोई जानकारी नहीं कि कौन कहां है । कैसे जानकारी होगी । हमी यहां लक्कड़ बेच रहे हैं, इसकी जानकारी गांव में किसे होगी । अब चारों बेटे कहा क्या कर रहे हैं, यह तो दशहरा में गांव लौटने पर ही पता चलेगा । लेकिन गांव में तो सरकार की भी कई योजना हैं। वहां रह कर भी तो कमाया खाया जा सकता है । बड़ी मुश्किल है । जैसे दिये में तेल ना डालो तो बुझ जाता है, वैसा ही सरकार की योजना का है। बाबुओं को तेल चाहिये। अब समूचे गांव में किसान के पास कुछ नगद है ही नहीं तो वह बाबुओ को दे क्या ।

लेकिन सरपंच व्यवस्था के जरीये भी तो काम हो रहा है । सरपंच का मतलब है पैसे के बंटवारे का पंच। कोई योजना में कितना भी पैसा आये लेकिन सरपंच तभी केस बनाता है, जब उसे पचास फीसदी कमीशन मिल जाये । हमारे यहां नरेगा भी आया था। हर परिवार में एक व्यक्ति को काम मिलेगा, यह पोस्टर गांव गांव में चिपकाया गया। हमने भी सोचा कि छोटा बेटा, जिसकी शादी नहीं हुई है, वह गांव में ही रहे इसलिये उसी का नाम नरेगा के लिये दिया। लेकिन सरपंच को उसमे केस बनाने के लिये पचास फीसदी चाहिये। और बाबू को पन्द्रह फीसदी अलग। अब दिन भर मेहनत करके सौ रुपये के बदले पैतीस रुपया कमाने से क्या होगा। रजिस्ट्रर पर दस्खख्त कराता है सौ रुपया का और मिलता है पैतीस रुपया। कुछ गांव में तो पन्द्रह रुपया में भी गांव वालों ने काम किया है । क्योकि सरपंच तक पहुंच कर केस बनवाने में ही बीस-तीस रुपया खर्च हो जाता है।

केस बनवाने का मतलब क्या है । केस का मतलब है, जिसको सरकार की योजना का लाभ मिल सकता है। इसपर सरपंच और बाबू बैठा रहता है । वह नाम लिखेगा ही नहीं तो काम मिलेगा ही नहीं। हां , अगर केस बना देगा कि इसको काम मिलना चाहिये तो मिल जायेगा। तो क्या आपको किसान राहत का भी कोई पैसा नहीं मिला । एक बार हल्ला हुआ था कि बैंक से जो पैसा लिये थे, वह भी माफ हो गया और बैक बिना कमीशन खेती के लिये कर्ज देगा। लेकिन पिछले साल तीन महीने बैंक का चक्कर जब गांव का जमींदार होकर हमीं लगाते रहे तो गांव वालों का क्या हाल हुआ होगा जरा सोचिये। हमनें बैंक से 18 हजार रुपया लिया था, लेकिन यहां आने से पहले बैंक को पूरा इक्कीस हजार लौटाये। कौन सा बैक था । ग्रामीण विकास बैंक । तीन बाबू बैठता है वहां । लेकिन कर्ज माफी तो दूर राहत सिर्फ इतना दिया कि कमीशन नहीं लिया । नहीं तो कई गांव में तो सरपंच के जरीये ही कर्ज लिये किसानों को धमकाया जाता कि अगर कर्ज का पैसा नहीं लौटाया तो कानूनी कार्रवाई होगी और जमीन जब्त हो जायेगी । इसीलिये वहा महाजनी जोर-शोर से चलता है। जिसके पास पैसा है, वह राजा है, जो किसान है, वह रंक है ।

तो क्या खेती सिर्फ बारिश पर टिकी है । बारिश पर या कहें पैसे पर । क्योकि सिचाई की कोई व्यवस्था है नहीं। बिजली रहती नहीं है । जो मोटर पंप लगा रखे हैं उन्हें चलाने के लिये डीजल चाहिये । अगर पंप के भरोसे ही खेती करनी है तो हर महिने कम से कम दो हजार रुपया पास में रहना चाहिये। फिर बीज और खाद की जो व्यवस्था सरकार ने कम दाम पर कर रखी है, वह तभी मिल सकता है, जब पास में चार पांच सौ रुपये कमीशन देने या केस बनाने के हो। यहां भी केस बनता है। हां, अगर एकदम गरीब किसान है तो सरपंच के लिखने पर बीज बहुत ही कम कीमत पर भी मिल सकता है। तो बीज कम कीमत में तो मिल जाता है, लेकिन उसकी एवज पर आधा बीज मुफ्त में सरपंच अपने पास में रख लेता है। यह सिर्फ आपके इलाके में है या समूचे क्षेत्र में। यह न तो इलाके में है, न क्षेत्र में बल्कि पूरे राज्य में या कहे पूरे देश में ग्रामीण इलाको का यही हाल है ।

मध्य प्रदेश से सटा विदर्भ का इलाका है । पहले यह मध्य भारत का ही हिस्सा था । हमारे बड़े बेटे की शादी वहीं हुई है । अकोला में । वहां भी हमारा जाना अक्सर होता । बेटा तो जाता ही रहता है । वहां के किसानों के सामने भी सबसे बडा संकट यही है कि बीज-खाद और डीजल का पैसा किसी के पास है नहीं । ग्रामीण बैक किसानों को उनका हक देता नहीं। वहां भी महाजनी ही किसानो को चलाती है। इतनी लंबी बहस के बाद जब मैने उन बुजुर्ग का नाम पूछा तो उल्टे हंसते हुये मुझी से मेरा नाम पूछ लिया। फिर कहा, हम ब्राह्ममण हैं। मेरा नाम जगदीश प्रसाद तिवारी है। इसलिये हम आम की लकड़ी यहां बेच रहे हैं। क्योंकि इस उम्र में कोई दूसरा काम कर नहीं सकते और धर्म कोई दूसरा काम करने का मन बनने नहीं देता। किसान शुरु से ही थे । कई पीढियों से किसानी चली आ रही है । लेकिन यह कभी नहीं सोचे थे कि जमीन रहने के बाद भी किसानी नहीं कर पायेगे। और जमीन रहने के बाद भी परिवार बिखर जायेगा।

मेरे लिये कल्पना से परे था कि लकड़ी बेचता यह शख्स परिवार के बारे में बताते बताते रो पड़ेगा और कहने लगा कि मुझे पता ही नहीं है कि मेरा छोटा बेटा कहा कमाने खाने निकला। मैं तो यहां लकड़ी बेचने इसलिये पहुंच गया कि गांव के रामप्रसाद का बेटा यहां हवलदार है। मैंने उसके घर में तब पूजा करायी थी, जब उसके बेटे को नौकरी लगी थी । उसने मेरी व्यवस्था तो यहां करा दी । लेकिन छोटका होगा कहां........मैंने कहा मै आपसे इसीलिये बात कर रहा थी कि पत्रकार हूं । आपकी बात अखबार में लिखूंगा । मैंने उनके कंधे पर हाथ रखा तो उस बुजुर्ग ने मुझे ही संभालते हुये कहा...घर में पूजा है क्या । हां.....तो जाओ पंडित जी इंतजार कर रहे होंगे फिर मुझे पांच रुपये लौटाते हुये कहा कि पैतीस रुपये हुये ...यह आपके पांच रुपये । मैं पांच रुपये जेब में डालने के लिये उठा तो वह बुजुर्ग कह उठा इस पांच रुपये को कम ना आंको। गांव में कईयो की जिन्दगी इसी में चलती है। और देश में शहर से ज्यादा गांव हैं। मुझे लगा मनमोहन सिंह हर गांव में शहर देखना चाहते है और राहुल गांधी हर गांव को अपने सपने से जोड़ना चाहते है । ऐसे में किसान का सच कितना खतरनाक है ।

17 comments:

Vishal Mishra said...

ek movie dekhi thi SUMMER 2007..usme kisano ki jo haalat dekhi thi wo aaj bhi dil ko hilaati hai.. bahut kuch karne ka mann karta hai. main andar es hil jata hun aur jab tak in logon ke liye kuch kar nahi leta tab tak yu hi pareshan rahunga.. apne badhiya lekh likha hai..par TV, Radio aur Print media ki khabar ka asar nahi hua to Blog patrakarita se kam hi ummeed hai...

par main kuch karna chahta hun kya aap sath aayenge? aur is lekh ko padhne walo kya aap bhi?

अंशुमाली रस्तोगी said...

क्या बता सकते हैं वाजपेईजी कि आपने इस भावनात्मक लेख को अपने ठंडे ऐसी कमरे में बैठकर कर लिखा याकि उस गरीब की झोपड़ी में।
यह बात केवल उस गरीब की नहीं है यहां के गांव और गरीब बहुत हद तक इस गुरबत के शिकार हैं। आपकी बात तो इस लेख के कहीं छपने पर ही खत्म हो जाएगी लेकिन वो गरीब अभी भी पांच रुपए के लिए संघर्ष कर रहा होगा। दरअसल, यह हमारे विकासशील भारत का विकृत सच है।

उपाध्यायजी(Upadhyayjee) said...

NREGA ke naam par jo loot maar machi hai ooski suvidha kisano tak kitani pahuch paati hai ye kisan se adhik kaun jan sakta hai. Mukhiya/Sarpanch kitane dabang hote hain ye to aapko malum hi hoga. Aap se mila hua kisan chahe jees prant ka bhi ho oosne pure hindustan ki kisano ki vyatha kah daali. Man Mohan aur Rahul jee kewal Kalavati ke jhopadi me photo khichwa kar vote le lete hain. Waise unki bhi koi galti nahin hai. Sabase adhik charcha chunavo ke dauran jo hui media me wo hui Pakistan, mumbai kand, weak/strong PM etc. Koi kisano ki durdasha, arthvyavastha, mahangai par charcha hote nahin dekha. Eesliye wo bhi khush hain.

Suresh Chiplunkar said...

रस्तोगी जी विकृत सच तो है, लेकिन फ़िर भी तो पत्रकारगण आज भी एक "परिवार विशेष" की चमचागिरी और जय-जयकार करते रहते हैं…। जबकि किसानों की इस हालत के लिये सबसे अधिक वही जिम्मेदार माना जाना चाहिये ना, जो सबसे अधिक समय सत्ता में रहा हो? लेकिन उनसे कोई सवाल-जवाब कभी नहीं किया जाता… पढ़िये और भूल जाईये… ऐसा ही चलता रहेगा सब कुछ… हमने भी भ्रष्टाचार को शिष्टाचार मान ही लिया है, गाँव वाले भी मानना सीख रहे हैं…। क्या आप कुछ बदलाव की उम्मीद करते हैं? जब सिस्टम ही कैंसर से सड़ चुका हो तब छोटी-मोटी दवाई-गोली से काम चलने वाला नहीं है, एक बड़ी "सर्जरी" चाहिये…

अंशुमाली रस्तोगी said...

सुरेशजी मैं सहमत हूं आपसे।

jay said...

छत्तीसगढ़ मे हालिया नक्सल हमले पर अपनी लेखनी का पुण्य प्रशुन बरसाइये वाजपयी जी...हो सकता है इस पर आपको गोयनका पुरस्कार नहीं मिले लेकिन एक चुनी हुई सरकार को बदनाम कर पुरस्कार बटोरने से बड़ा काम होगा ये.....धन्यवाद.
सादर/जयराम दास.

AlbelaKhatri.com said...

उदर की आग में जलता जहाँ इन्सान रोता है

ज़मीं के हाल पर यारो वहां आस्मान रोता है

किसे फ़ुर्सत कोई देखे वतन के ज़ख्म 'अलबेला'

कि अपने हाल पर अक्सर ये हिन्दुस्तान रोता है

punyaprasun said...

मुझे लगता है...ब्लाग को हमें टीवी सरीखा बनाने या बाजार के दबाव में चलने वाले मिडिया सरीखा बनाने से बचाना चाहिये । हर तथ्य को सरकार की ओट में देखने की जरुरत होनी नहीं चाहिये । सरकार जब दस करोड वोट से बन सकती है । और पांच करोड के लिये नीतिया बनाकर चल सकती है....तो वहां जांकने की जरुरत क्यो है । कुछ विकल्प खडे करने चाहिये तभी अंधेरा छटता लगेगा । मजा तभी है, जब हम जले और दुनिया आग पकड लें........

punyaprasun said...

मुझे लगता है...ब्लाग को हमें टीवी सरीखा बनाने या बाजार के दबाव में चलने वाले मिडिया सरीखा बनाने से बचाना चाहिये । हर तथ्य को सरकार की ओट में देखने की जरुरत होनी नहीं चाहिये । सरकार जब दस करोड वोट से बन सकती है । और पांच करोड के लिये नीतिया बनाकर चल सकती है....तो वहां जांकने की जरुरत क्यो है । कुछ विकल्प खडे करने चाहिये तभी अंधेरा छटता लगेगा । मजा तभी है, जब हम जले और दुनिया आग पकड लें........

Common Hindu said...

Hello Blogger Friend,

Your excellent post has been back-linked in
http://hinduonline.blogspot.com/

- a blog for Daily Posts, News, Views Compilation by a Common Hindu
- Hindu Online.

Common Hindu said...

well said

पुण्य प्रसून बाजपेयी Ji


"मजा तभी है, जब हम जले और दुनिया आग पकड लें........"

आदर्श राठौर said...
This comment has been removed by the author.
आदर्श राठौर said...

रस्तोगी जी एसी के कमरे में बैठकर भी लिखा हो तो लिका तो सही न। कम ही लोग हैं जो इस तरह के सामाजिक विषयों पर लिख रहे हैं। कोई और होता तो अन्य विषयों पर लिखता। मेरे विचार से वास्तविक पत्रकारिता तो इस ब्लॉग के माध्यम से ही की जा रही है। और पत्रकारों को गरियाने वाले आइना देख कर आएं।

उसका सच said...

वाजपेयी जी उन गरीबो से जाकर मिले भी..और महसूसें उनका दर्द

विवेक said...

बाकी आपकी किसी बात से कोई असहमति हो, इसका तो सवाल ही पैदा नहीं होता, लेकिन एक बात जरा खटकी। जितना मैंने आपके बारे में सुना है और आपको पढ़ते-पढ़ते जो आपके बारे में राय बनी...उस दायरे में आपका पूजा-हवन के लिए आम की लकड़ी खोजते भटकना आ ही नहीं रहा है। अगर आपका यह निजी विश्वास है, इस आधार पर इस बात को जस्टिफाई भी किया जाए, तो ब्लॉग पर इस तरह कहना...क्योंकि आप तो हमेशा से धर्म की राजनीति और सार्वजनीकरण का विरोध करते आए हैं। इन मान्यताओं के नुकसान और इनकी वजह से उपजी पीड़ा को आपने जितनी मजबूती से पेश किया है, वह मेरे जैसे लोगों के लिए तो अनुकरणीय और सिखाने वाला अनुभव रहा है। तो फिर आपको पूजा-हवन के लिए आम की लकड़ी खोजते मैं इमेजिन ही नहीं कर पा रहा हूं।

बेरोजगार said...

आदरणीय प्रसून जी आप हाथ मसलते हुए अपनी बात जब टीवी पर कहते हैं तो,पूरी बात कील की तरह ठुकती हुई लगती है. ये बात आपने लिखी तो मुझे भी अपनी यादें ताज़ा होती हुई नज़र आई. आप को ये बात खोजनी पड़ी लेकिन हमारा तो जीवन ही इन्ही के बीच गुजरता है.क्या करें ...

DILEEP SHARMA said...

aapka article sadey padrta hoo. aapeny aamlogo ki problem ko zinda rakha hai. city se aacha village hai. ghin aati hai city me rehety hueye. bahuut exploitation hai.es gandigi ko saf karana chahiye.system per chot kareney ki need hai.merry zindgi ka sabse big afsos jab terreists sansad bhavan me ghusey thy kam se kam 300 sansado ko marena chahiye tha.tab salo ko samgha me aata ki aatank kya hota hai, system hi kharab hai. es kharab system ke pichey zitney log hai enko mar[kill] diya jay.kisan suisude ne kery jo suiside kareny ke liya prerit kery unko jaan se maar diya jay.