Sunday, November 15, 2009

बच्चे....

सोचा था 14 नवबंर को बच्चों के बारे में लिखूंगा । लेकिन हिम्मत पड़ी नहीं...क्योंकि बच्चों के लिये हमने छोड़ा ही क्या है या क्या बना रहे हैं....जो लिखकर संतोष हो। अर्से पहले हरीश चन्द्र पाण्डे की एक कविता पढ़ी थी । याद आ गयी । तो आप भी इसे पढ़ें । इसका शीर्षक ‘बच्चे’ है।

बच्चे
चूंकि बच्चे
विपक्षी की भूमिका नहीं निभा सकते
चूंकि बच्चों की
कोई सरकार नहीं होती
चूंकि बच्चे
अपने खिलाफ जांच में
जेबों के अस्तर तक उलट कर रख देते है
इसलिये बच्चो के बारे में
गंभीरता से सोचो
सोचो
केवल भूख लगने पर ही क्यों रोते हैं बच्चे
ब्रेक फास्ट के समय
राष्ट्रगान गाते हैं बच्चे
हंसी के एवज में
कभी वोट नहीं मांगते बच्चे
बच्चे / पेड़ पर लटके फल होते हैं
इसलिये
संजीदगी से सोचो / बच्चो के बारे में
बच्चों के बारे में किए गए निर्णय
कागज पर कुएं खोदने या
वृक्षारोपण के निर्णय नहीं
बच्चो के बारे में किए गए निर्णय
काली मिट्टी में
कपास उगाने का निर्णय है ।

6 comments:

Arvind Sharma said...
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Arvind Sharma said...

बात आज से लगभग २ साल पहले की है, गाँव से आया २१ साल का एक लड़का , एक बड़े चैनल के गेट पर खडा था, आलीशान इमारत को देख कर अन्दर जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था शायद. यू तो उसके हुलिए को देखकर गॉर्ड उसे भगाने की ही सोच रहा था, पर जब उसे पता चला की एडिटर से समय लिया हुआ है तो साथ में एक आदमी भी भेजा. एडीटर ने उस लड़के को अपने केबिन में बिठाया , लड़के ने बताया की एक पत्रिका निकलना चाहता है, और इसके लिए एडीटर का सन्देश चाहिये , एडीटर की वही प्रतिक्रिया हुई जो उस मूर्ख से दिखने वाले लड़के को देखकर किसी की भी होती, साथ में एक उदहारण भी बताया की पुराने ज़माने के ज़मींदार राजा से हस्ताक्षर कराकर ले जाते थे व उनके नाम पर जनता को लुट ते थे . लड़के की आखों में यह सुनकर एक पल को मायूसी उतर आई कहना चाहता था एडीटर से की उसके लिए तो सत्य ही वो सामने बैठा आदमी राजा हैं, हाँ खुद को वो ज़मींदार नहीं समझता था , उसका तो स्वपन था उस आदमी से मिल लेने भर का जिसके बारे में यह पढ़ा था की जब किसी खबर की विश्वश्नियता सिद्ध करनी हो तो वो खबर उस से पढ़वा दी जाये , लड़का चैनल के गेट से बैरंग लौट रहा था, डबडबायी आखों के साथ ....
ऐसा कुछ वाकया मैंने कही देखा सुना था, और आतामाव्लोकन करने पर खुद को लड़के के करीब पाया, यही कारण था की मैं आदरनीय प्रबाश जी से मिलने की हिम्मत नही जुटा पाया , उन्होंने बड़े स्नेह से कहा था फ़ोन पर मुझे की मुझसे मिलना एक बार आकर, वोह मेरा मार्गदर्शन करेंगे लेकिन दिल के किसी कौने में डर घर कर चुका था
प्रबाश जी और आप मेरे आदर्श रहे है, हालाकि अल्पज्ञानी होने के कारण में दोनों से ही मिलने में संकोच करता रहा हूँ , प्रबाश जी का निधन मन को गहरे तक दुखी कर गया , यही कारण था की उनपर फीचर बनाते समय मैंने ऐसे आदमी की खोज की जो बनाबटी बातें न बोले, दिल से बोले उनके बारे में, और दिमाग में एक ही नाम आया पुण्य प्रसून वाजपेयी , खुस्किस्मती से आपसे संपर्क भी हो गया , पर बाद में महसूस हुआ की महान लोगों से आम इंसान नहीं मिल सकते , ३ बजे के जिस बुलेटिन में आपने कुछ कहने से इनकार कर दिया , वो अंत में समय पर नहीं बन सका, क्यूंकि भावुकता में आकर मैंने आपके अलावा कोई विकल्प नहीं रखा . और उस शाम जब आखें डबडबायी तो २१ साल का वो लड़का फिर याद आ गया . हालांकि सुखद अनुभूति भी हुई यह जानकार की काल कपाल महाकाल दिखाने वाले चैनल का संपादक छोटे से छोटे व्यकतव्य को लेकर इतना सजग हैं की उसमे सालो की रिसर्च चाहता हैं. आपके ही चैनल पर प्रबाश जी से जुडी खबर देखके यह निराशा भी हुई की अगर आप इसमें न होते तो का क्या स्तर होता. http://www.youtube.com/watch?v=SAQTg-0M4uY&NR=१ बरहाल आप थे वहां पर , इसलिए अगर मगर का तो सवाल ही नही उठ ता. आपका कीमती समय नष्ट करने के लिए क्षमा चाहूँगा और प्रत्यन करूँगा की इस योग्य बन सकू की कम से कम आपसे मिलने के लिए जो परीक्षा देनी होती है उसमे खरा उतर सकू ,
आप सच में मेरे राजा है, जितनी मेरी उम्र हैं उतना समय आपको पतरकारिता में हो गया है इसलिए बाल दिवस पर में आपसे यही विनती करना चाहूँगा की जब कभी ग्रामीण प्रष्टभूमि से आया कोई भी बच्चा , ऊँची इमारतों और तेज भागते मानव रूपी मशीनों से घबराकर आपके पास आये तो, पत्रकारिता से इतर, ज्ञान-विज्ञान से इतर होकर , राजा साहब उसे मायूस लौटाने से पहले , एक बार दिल से ...... जरा सोचियेगा...

M VERMA said...

बच्चों के बारे में किए गए निर्णय
कागज पर कुएं खोदने या
वृक्षारोपण के निर्णय नहीं
वाकई बच्चो के बारे मे निर्णय इतना आसान भी नही है

rahul said...

ji, jaisa naam vaisha hi darshan vaise to aam tour par log pardshan karte hi dikhte hai ..lekin yahi aek naam aisa hai jise maine kabhee prdarshan karte hue nahi dekha ..jab bhee kisi khabar ke peeche yah chehra nazar aayahai hai tab-tab us khabar ko khari-khari paya hai ....yah lekh khabr na sahi ..lekin aek aisa asar jarur hai jo kisi ..vayavsto ke prati savendn sheel inshan ke dil se kalam ke rashte hi nikal sakte hai .........isse jyada mujhme samjh nahi hai ...ki mai kya vichar vayakt karu ..

सुशील कुमार छौक्कर said...

एक ऐसे सच को लिख जिसे लिखने लोग कतराते है।

सागर said...

बच्चो के बारे में किए गए निर्णय
काली मिट्टी में
कपास उगाने का निर्णय है ।


... यानि उत्तरोत्तर विकास... सही है...