Tuesday, November 2, 2010

बिहार की लिखी जा रही है नई इबारत

बिहार में 1974 के जेपी आंदोलन की सोच अगर 1989 में मंडल तले दफन हुई तो मंडल की सोच 2010 में आर्थिक सुधार की जरुरतों तले दफन होती दिख रही है। 2010 के बिहार चुनाव में बिहार की वैसी बहुतेरी हकीकत मिथ में बदल रही है जिनके आसरे चुनावी राजनीति का वर्चस्व पांच दशकों से बिहार ने ढोया। परिवर्तन की इस हवा को बहाने में नीतीश कुमार या लालू यादव की सत्ता के दौर का कितना हाथ है यह निर्णय लेने से पहले जरा समझना होगा कि बिहार के समाज की जरूरत ही कैसे बदलती चली गयी।

जेपी की संपूर्ण क्रांति के नारे ने अगर पांच साल के भीतर ही बिहार के युवाओं का भ्रम तोडा और निराशा के अवसाद में ही युवाओं को अपना कैरियर बर्बाद होना दिखा। तो मंडल की आंच की गर्माहट खत्म होने में दस साल का वक्त लगा। और बीते एक दशक के दौरान (1999-2010) बिहार के हर तबके के सामने सबसे बडा सवाल यही रेंगता रहा कि उसकी जरुरत है क्या। उसका रास्ता जाता किधर है। और आंदोलनों से देश को करवट लेने के लिये मजबूर करने वाले बिहारियों का लक्ष्य है क्या। क्योंकि इस दौर में आर्थिक परिस्थितियों के बदलने से देश परंपराओं को तोड़ एक नयी राह जरुर बना रहा था। इस दौर में पूंजी का वर्चस्व संसदीय लोकतंत्र तक पर छाया। चुनी गयी सरकारों की सत्ता कारपोरेट सत्ता के आगे कमजोर दिखी। वोट की ताकत से चाहे सत्ता बदल जाये लेकिन इस ताकत से बडी ताकत पूंजी की बनी और उसमें इतनी पारदर्शिता आ गयी कि वोट डालने या आंदोलन खड़ा करने के बाद भी सौदेबाजी का दायरा पूंजी के मुनाफे से होता हुआ ही सत्ता को छूता दिखा।

केन्द्र में अगर मनमोहन सिंह की आर्थिक चकाचौंध ने लोकतंत्र का हर पाये को अपने उपर निर्भर बना दिया। और संविधान का चैक-एंड-बैलेंस काफूर होता दिखा। तो गुजरात में नरेन्द्र मोदी का उग्र हिन्दुत्व विकास के इन्फ्रास्ट्रक्चर तले छुप गया। कश्मीर से लेकर केरल तक और महाराष्ट्र से लेकर मणिपुर तक आर्थिक चकाचौंध तले विचारधारा या आंदोलनों को देश के खिलाफ सरकारी सत्ता ने कुछ इस तरह खडा किया जिसमें या तो चकाचौंध नहीं तो अपराधी वाली समझ ही रेंगने लगी। लेकिन इस दौर में बिहार की भूमिका कहीं बढी तो वह रोजगार के लिये पलायन। बाहुबलियों से निजात पाने के लिये पलायन। मुनाफा बनाने के लिये पूंजी का पलायन। शिक्षा के लिये पलायन और तो और विवाह के लिये बेटियों का पलायन। लड़कियां भी उस लड़के को दी जाने लगीं जो बिहार का होकर भी बिहार के बाहर ही काम कर रहा था। 1995 से 2006 तक के दौर में बिहार में हर घर की हकीकत यही रही कि जब भी समूचा परिवार जुटा तो बिहार के बाहर का रास्ता ही अलग अलग जरुरतों के लिये खोजना शुरु किया। 1990-2000 के दौर में घपले-घोटाले या अदालत का कहना जंगल राज। इसका मतलब सिर्फ भ्रष्ट्राचार या आपराधियों का बोलबाला नहीं था। बल्कि राज्य में इन्फ्रस्ट्रचर पर ध्यान ना देना और जातीय नेतृत्व का मतलब जात के अंदर बाहुबली की पहचान बनाना भी था।

बाहुबल सिर्फ कानून व्यवस्था को ताक पर रखना भर नहीं हुआ बल्कि इस खेल ने पिछड़े-अगड़े की लकीर भी मिटाई। राजन तिवारी हो या आंनद मोहन और पप्पू यादव हो या शहाबुद्दीन जातीय घेरे में चाहे सभी अलग-अलग हों लेकिन पहचान एक सरीखी ही सभी की रही। इसलिये जब अपराधियों पर नकेल कसने की शुरूआत नीतीश कुमार ने की उसके आईने में जातीय समीकरण या जाती य संघर्ष नहीं उभरा बल्कि अपराध खत्म करने और कानून व्यवस्था का राज लागू होने का संवाद उभरा। फिर इसी दौर में जातीय तनाव की वह परिस्थितियां भी कम होने लगीं जो सिर्फ खेती और भूमि को लेकर संघर्ष की लकीर बिहार में खिंचती थी। जिसके आसरे राजनीति भी जातियों खेमो में अपना दम दिखाकर वोट बटोरने से नहीं कतराती थी।

चूंकि भूमि और खेती ही बिहार में जातियों को बांटती और उसी आधार पर जातियों के संघर्ष को पेट से जोडती। लेकिन जिस तरह पलायन ने बिहार के बाहर के समाज को भी नयी पीढ़ी के जरिये बिहार को नये तरीके से जोड़ना शुरू किया। उसमें छात्र से लेकर विवाहिता और मजदूर से लेकर व्यापारी तक जब जब बिहार लौटे तब तब परिवारों में बिहार के बाहर की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों को लेकर तुलना जरुर हुई। अपराधियों या कहें बाहुबलियों पर नीतीश सरकार की कार्रवाई ने सिर्फ कानून व्यवस्था का दायरा नहीं बढाया बल्कि इसने जातीय तनाव को भी कम किया और उन आर्थिक परिस्थितियों को भी बदल दिया जिनके आधार पर जातीय विभाजन आसानी से नजर आता था। खासकर आय के साधनों में सामूहिकता के बोध ने हर जाति के भीतर इस सोच को विकसित किया कि उसके जीने की जरूरत रोजगार है ना कि जातीय समीकरण।

चूंकि 2001 से 2006 के दौरान आर्थिक सुधार की हवा ने जातीय घेरे में ही जीने की सोच को कई स्तर पर बदला। मसलन माल संस्कृति ने जातीय आधार पर धंधे की सोच खत्म की, तो बाजार संस्कृति ने धंधे पर कोई आंच आने पर उसके विरोध की जमीन को जातीय आधार के बदले कानून व्यवस्था के दायरे में देखा। यानी सत्ता की जो सोच पहले जातीय समीकरण के आधार पर सत्ता की मलाई खाने के लिये होती थी वह अब सत्ता के जरिये अपने धंधे को चलाये रखने के लिये वातावरण खोजने लगी। यानी सत्ता का मतलब जातीय दबंगई ना होकर सुशासन हो गया। और इस सोच के घेरे में वह सभी जातियां आयीं जो कल तक खुद को जातीय समीकरण के आसरे अपनी सत्ता को बनते या बिगडते देखने की सोच पाले हुईं थी।

यानी बिहार चुनाव में अगर पहली बार विकास मुद्दा बना है तो उसके पीछे वह तमाम परिस्थितियां हैं जिसके आसरे वह समाज अपनी जरुरतों को पूरा होता देख रहा है जो जरुरतें एक दशक पहले तक सत्ता के साथ जातीय समीकऱण बैठाने पर ही पूरी होती थी। यानी दलित हो या ब्राह्मण या फिर राजपूत हो या कुर्मी । उसकी जरुरतें सामूहिक घेरे में बिना किसी सामाजिक आंदोलन के इस दौर में एक सरीखी होती चली गयीं। हालांकि महादलित और मुस्लिम समुदाय चुनावी दौर में अभी भी उन रास्तो को टटोल रहे हैं जहां उनकी जरुरतें सत्ता की नीतियों और सरकार की योजनाओं के आसरे पूरी हों। लेकिन 2010 में भी सत्ता या कहे सरकारें अभी भी नीतियों के आसरे महादलित या मुस्लिमों को खुद पर आश्रित किये हुये हैं, इसलिये महादलित अगर अपने अनुकूल सरकार बनाने की दिशा में है तो मुस्लिम अपनी एकजुटता से जीतने वाले के साथ खडा होकर खुद को किंग-मेकर की भूमिका में रहना चाहता है।

दरअसल सत्ता के तौर तरीकों ने बिहार में जातियों के उग्रपन को भी सत्ता से डिगाया है। मसलन एक दौर में अगर श्री बाबू के मुख्यमंत्री रहते हुये बिहार में भूमिहार जाति खासी दबंग और उग्र हुई तो लालू प्रसाद यादव के दौर में यादव भी दबंग और उग्र हुआ। इसी का असर है कि जाति के उग्र चेहरे को सरकार बनाने की दिशा में मान्यता दुबारा कभी मिली नहीं। श्री बाबू के बाद कोई भूमिहार मुख्यमंत्री नहीं बना तो लालू यादव के बाद यह खतरा यादवो को लेकर भी पैदा हुआ। इसका एक नजारा 2005 और इस बार यानी 2010 के चुनाव के दौरान छपरा में नजर आया। 2005 में छपरा के धर्मनाथ जी के मंदिर के ठीक सामने धर्मनाथ दुबे के परिवार के लोगों ने कैमरे पर कोई प्रतिक्रिया इस डर से नहीं दी कि कोई यादव अगर सुन लेगा तो उनका जीना मुहाल हो जायेगा। वहीं इस बार धर्मनाथ दुबे परिवार खुले तौर पर चुनाव पर अपनी प्रतिक्रिया बिना हिचक देने के लिये सामने आया। ऐसा भी नहीं है कि इस बाद उसी गली में यादवो में कोई हिचक थी।

खुले तौर पर हर कोई अपने उम्मीदवारों को लेकर अपनी बात कहने की हिम्मत दिखा रहा था। असल में यह चेहरा विकास का नहीं विकास की दिशा में कदम उठने से पहले उस सोच के घेरे का है जो किसी भी समाज के आगे बढ़ने की पहली जरुरत होती है। यानी पहली बार चुनाव में सरकार पर निर्भरता बिना जातीय समीकरण को लेकर बढी है। इसलिये सवाल नीतीश कुमार या लालू यादव का नहीं है बल्कि सवाल उन परंपराओं के टूटने के बाद बने उस माहौल का है जिसमें पहली बार अपने आस्तिव को बाजार या रोजगार के जरिये लोग टोटल रहे हैं। इसका असर ही है कि चुनाव प्रचार के केन्द्र में नीतिश कुमार के पांच बरस के शासन से ज्यादा लालू-राबडी के वह पन्द्रह साल बार बार गूंज रहे है। यानी लालू पहली बार नीतीश के नकारात्मक विकल्प के तौर पर चुनाव मैदान में ज्यादा नजर आ रहे हैं। जबकि कांग्रेस उन दोनो मोर्चो पर विफल है जिसके आसरे बिहार कांग्रेस को लेकर लकीर खींच सकता था।

दरअसल जातीय समीकऱण पर विकास का सवाल छाने के बाद नये तबके के तौर पर युवा और महिला का उबार तो हुआ है लेकिन इनकी अगुवाई करने की ताकत करने नाला कोई नेता बिहार में किसी दल के पास नहीं है। राहुल गांधी और सोनिया गांधी इस दिशा में एक आस भर हैं। जो विश्वास में तब्‍दील इसलिये नहीं हो सकते क्योंकि अभी कांग्रेस के अनुकूल ना तो बिहार बना है और ना ही मनमोहन सिंह की अर्थव्यवस्था को बिहार में मान्यता मिली है। लेकिन नीतीश की सत्ता पर अंकुश कांग्रेस दिल्ली से भी लगा सकती है, यह सोच जरुर उभरी है। यानी बिहार चुनाव के परिणाम कांग्रेस के विपक्षी दल के तौर पर मान्यता दिला सकते हैं। इन परिस्थितियों में सबसे मौजू वह सवाल है जो इस चुनाव में गायब है। नीतीश कुमार का सकारात्मक विकल्प। यानी 15 बरस का विकल्प तो सकारात्मक तौर पर 5 बरस मौजूद रहा। मगर 5 बरस का सकारात्मक विकल्‍प इस चुनाव में गायब है। ऐसे में पहली बार बूढ़ी हो चुकी जेपी की पीढी हो या चालीस पार मंडल की पीढी इन दोनों के आंदोलन बिहार की जवां पीढी की रगों में नहीं दौडती। क्योंकि जेपी और मंडल से निकले बिहारियों ने राजनीतिक जीवन छोड़ चुनावी हिसाब से चलना शुरू कर दिया था। और चुनावी गणित ही राजनीति का मंत्र बन गया।

इसलिये नयी पीढी ना तो राजनीति या चुनाव के हिसाब से जीने को तैयार है ना ही लालू या नीतीश में अपना अक्स देख नहीं पा रहे है। बल्कि यह जवां पीढी मनमोहन सिंह के चकाचौंध को भी अपना सच नहीं मानती। और तो और जेपी या मंडल भी इस नये बिहार की जरुरत नहीं है। इसलिये चुनाव परिणाम ना तो चौकाने वाले होगें और ना ही आखरी सच ।

1 comment:

baba said...

NAI PIDHI VIKASWAD KE JHANSE ME NAHI, VIKAS KE WASTVIKTA ME APNE SWARUP KI TALAS ME HAI. APNE UPER KE PIDHI KO JATIWAD KE DALDAL ME JALTE-BHUNTE DEKH CHUKA YE NAVBERG DHARA KE BIPRIT BHI TAIRNE KO TAIYAR HAI.ISLIYE CHACHE J.P YA MANDAL SARIKHE ANDOLAN HO ATHWA LALU YA NITISH SARIKHE RAJNETA,INKI SAFALTA IS PAR NIRVER HAI KI YE APNI DHARA KO BIHAR ME KIS TARAF MODTE HAIN. SAYAD NITISH KI SAFALTA AUR BIHAR KI HO RAHI TARAQUI KA YAHI RAJ HAI.SAYAD LALU SARIKHE NETA APNI DISA BADALNE ME KAFI DER KAR CHUKE HAIN,APNI DHARA MODNE KE BAD BHI , INHE PICHLI PANKTI ME HI "WAITING FOR POSTING" ME RAHNA PADEGA