Friday, December 3, 2010

एक रुका हुआ फैसला

क्या अपराध साबित होने तक राडिया टेप न सुनें ?

दो साल पहले गृह सचिव, आयकर निदेशालय और सीबीआई को इसका एहसास तक नहीं था कि जिस नीरा राडिया का वह टेलिफोन टैप करने जा रहे हैं, उस टेलिफोन पर लोकतंत्र का जनाजा हर दिन निकलता हुआ सुनायी देगा। मामला भ्रष्टाचार और आर्थिक अपराध के तहत हवाला और एफडीआई का था । यानी फोन कॉल्स एक ऐसे आरोपी के टैप किये जा रहे थे, जो कई मंत्रालयो के जरिये देश के राजस्व को चूना लगा रहा था और आयकर महानिदेशालय पता यही लगाना चाहता था कि नीरा राडिया के तार कहां-कहां किस-किस से जुड़े हुये हैं।

लेकिन जब 5851 फोन कॉल्स को आठ हजार पन्नों में समेटा गया तो पहला सवाल हर के सामने यही् आया क्या जिन्होंने नीरा राडिया से फोन पर बातचीत की वह सभी देश को चूना लगाने में लगे थे-इसे माना जाये या नहीं। क्योंकि हर बात करने वाले का अपना अपना लाभ उसके अपने घेरे में था। लेकिन लोकतांत्रिक देश में विकास के यह चेहरे नीरा राडिया से कुछ निजी और बहुत सारी सार्वजनिक बातें जिस तर्ज पर कर रहे थे, उसमें यह सवाल उठना जायज ही था कि निजी संवाद को सार्वजनिक क्यों किया जाये और सार्वजनिक संवाद को क्यों छुपाया जाये । लेकिन सीबीआई,आईडी,एन्कम टैक्स अगर किसी को आरोपी मान रहा है तो फिर निजपन क्या हो सकता है। और लोकतंत्र के जो चेहरे अपराधी से निजपन रखते हैं, उनको किस रुप में देखा जाये।

क्या नीरा राडिया के अपराधी करार देने तक टेप पर पांबदी लग जाये और अपराधी साबित होने के बाद हर बातचीत करने वालों को भी देशद्रोही मानें। यह ठीक उसी प्रकार है जैसे अंडरवर्ल्ड डॉन दाउद इब्राहिम का फोन टैप करने पर उनसे बात करने वालों के खिलाफ सरकार क्या कदम उठाये। हाल में चिदंबरम ने इसके संकेत भी दिये कि आंतकवादियों से बात करने वाले पत्रकारों के खिलाफ भी कार्रवाई होगी। मीडिया में भी इसकी सहमति बनी और भाजपा ने तो इसका खुला समर्थन किया कि चिदंबरम कुछ गलत नहीं सोच रहे। अब सवाल है कि अगर दाउद से कोई उद्योगपति या संपादक बात करता है या फिर दाउद से किसी मंत्री के रिश्ते की बात सामने आती है तो फिर उसके खिलाफ कार्रवाई होगी या सरकार खामोशी ओढ लेगी। ठीक इसी तरह अगर हवाला या अन्य माध्यमों से देश को राजस्व का चूना बकायदा मंत्रालयों के नौकरशाहो और मंत्रियों के जरीये लगाया जा रहा है और इसमें मीडिया के कुछ नामचीन चेहरे भी अपने अपने राजनीतिक प्यादों का खेल खेल रहे हों, तब कार्रवाई होगी या नहीं। इतना ही नहीं दाउद से बातचीत के टेप कोई पत्रकार सामने ले आये तो उसकी वाहवाही समूचा देश या सरकार या गृहमंत्री चिदबरंम या फिर देश का कारपोरेट जगत भी कैसे करेंगे, यह किसी से छिपा हुआ नहीं है । और उस वक्त क्या कोई उघोगपति,संपादक या मंत्री जिसने दाउद से बाचतीच की हो यह कहने की हिम्मत भी रखेगा कि बातचीत तो निजी थी उसे सार्वजनिक नहीं करना चाहिये।

इस आइने में अगर सबसे पहले रतन टाटा और राडिया की बातचीत के सामने आने के बाद टाटा के उठाये सवाल पर गौर करें तो उन्होंने बातचीत को निहायत निजी माना। और यह भी कहा कि बातचीत के टेप लीक करने वालो के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिये। अब सवाल है कि अगर मीडिया इस तरह के दस्तावेजों को सामने ना लाये या फिर कोई भी अधिकारी इस डर से हर उस सच को छुपा लें जो देश के लिये खतरनाक हो तो फिर लोकतंत्र का पैमाना क्या होगा। क्योकि एक तरफ आरटीआई के जरीये पारदर्शिता की बात सरकार कर रही है तो दूसरी तरफ मीडिया पर लगातार यह आरोप लग रहे हैं कि वह सरकार के साथ ही जा खड़ी हुई है। फिर मीडिया भी जब कारपोरेट सेक्टर में तब्दिल हो रही है तो किसी मीडिया संस्थान से यह उम्मीद कैसे रखी जा सकती है कि वह पत्रकारिता के आचरण में एथिक्स की बात करें।

असल में राडिया के फोन टैप से सामने आये सच ने पहली बार बडा सवाल यही खड़ा किया है कि अपराध का पैमाना देश में होना क्या चाहिये। लोकतंत्र का चौथा खम्भा, जिसकी पहचान ही ईमानदारी और भरोसे पर टिकी है उसके एथिक्स क्या बदल चुके हैं। या फिर विकास की जो अर्थव्यवस्था कल तक करोड़ों का सवाल खड़ा करती थी अगर अब वह सूचना तकनालाजी , खनन या स्पेक्ट्रम के जरीये अरबो-खरबो का खेल सिर्फ एक कागज के एनओसी के जरीये हो जाता है तो क्या लाईसेंस से आगे महालाइसेंस का यह दौर है। लेकिन इन सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस तमाम सवालो पर फैसला लेगा कौन। लोकतंत्र के आइने में यह कहा जा सकता है कि न्यायपालिका और संसद दोनो को मिलकर कर यह फैसला लेना होगा। लेकिन इसी दौर में जरा भ्रष्टाचार के सवाल पर न्यायापालिका और संसद की स्थिति देखें। देश के सीवीसी पर सुप्रीम कोर्ट ने यह सवाल उठाया कि भ्रष्टाचार का कोई आरोपी भ्रष्टाचार पर नकेल कसने वाले पद सीवीसी पर कैसे नियुक्त हो सकता है। तब एटार्नी जनरल का जबाव यही आया कि ऐसे में तो न्यायधिशो की नियुक्ति पर भी सवाल उठ सकते हैं। क्योकि ऐसे किसी को खोजना मुश्किल है जिसका दामन पूरी तरह पाक-साफ हो। वही संसद में 198 सांसद ऐसे हैं, जिनपर भ्रष्टाचार के आरोप बकायदा दर्ज हैं और देश के विधानसभाओ में 2198 विधायक ऐसे हैं, जो भ्रष्टाचार के आरोपी हैं। जबकि छह राज्यो के मुख्यमंत्री और तीन प्रमुख पार्टियो के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव और मायावती ऐसी हैं, जिन पर आय से ज्यादा संपत्ति का मामला चल रहा है। वहीं लोकतंत्र के आईने में इन सब पर फैसला लेने में मदद एक भूमिका मीडिया की भी है। लेकिन मीडिया निगरानी की जगह अगर सत्ता और कारपोरेट के बीच फिक्सर की भूमिका में आ जाये या फिर अपनी अपनी जरुरत के मुताबिक अपना अपना लाभ बनाने में लग जाये तो सवाल खड़ा कहां होगा कि निगरानी भी कही सौदेबाजी के दायरे में नहीं आ गई। यानी लोकतंत्र के खम्भे ही अपनी भूमिका की सौदेबाजी करने में जुट जाये और इस सौदेबाजी को ही मुख्यधारा मान लिया जाये तो क्या होगा। असल में सबसे बड़ा सच इस दौर का यही है कि देश के लिये जिसे आरोपियों का कटघरा माना जाता है, उसी कटघरे में खड़े आरोपी ही देश का भविष्य बना सकते हैं यही माना जा रहा है । यानी देश में मान्यता उसी तबके की है जो सौदेबाजी के जरीये लोकतंत्र का जनाजा नीरा राडिया से फोन पर हर वक्त निकालता रहा। इसलिये मुश्किल यह है कारपोरेट ने नीरा राडिया को आगे रखा। नीरा राडिया ने मीडिया को । मीडिया ने राजनीति को। राजनति ने पीएम को और पीएम कारपोरेट को देश का सर्वोसर्वा बनाने पर तुले हैं। तो इस गोलचक्कर में रास्ता कहां से निकलेगा।

नीरा राडिया एक ऐसे औजार के तौर पर इस दौर में सत्ता के सामने आयीं, जब देश में लाईसेंस राज के बदले महालाईसेंस का दौर शुरु हो चुका है। और खेल अब करोड़ों का नही अरबो-खरबो का होता हैं। खासकर खनन और सूचना तकनीक ऐसे क्षेत्र हैं, जहां सिर्फ कागज पर एक नो ऑब्जेकशन सर्टीफिकेट या एनओसी के लाइसेंस का मतलब ही होता है अरबो के मुनाफे का खेल। और कोई भी नेता जो जनता के रास्ते संसद तक पहुंचता है, मंत्री बनने के बाद उसे भी नीरा राडिया सरीखे फिक्सर की जरुरत अपने मंत्रालय की बोली लगाने के लिये बडे कैनवास में झाकने की जरुरत होती है। वहीं कारपोरेट जगत का रास्ता देश के बाहर के बाजार की कीमत से शुरु होता है जो देश में मंत्रियो को मुनाफे में साझीदार बनाने के लिये उस मीडिया को घेरते हैं, जिनके आसरे संसदीय लोकतंत्र की पताका फहराती रहती है। और मीडिया की इमारत भी अब विश्वनियता या ईमानदारी की जगह पूंजी के ऐसे ढांचे तले खडी हो रही है, जहां से आम आदमी की भूख की जगह उसका मनोरंजन और सत्ता-कारपोरेट की लूट की जगह विकास का रेड कारपेट ही मुनाफा देता नजर आता है। इसलिये पत्रकार अब जनता की राजनीति के लिये नहीं मुनाफे वाले कारपोरेट के लिये काम करना चाहते हैं और कारपोरेट नीरा राडिया के टेप से भी अपना निज बचाना चाहता है। इसलिये यह फैसला रुका है कि अपराधी सिर्फ दाउद है या घोटालेबाज और देश को अरबों के राजस्व का चूना लगाने वाले भी।

22 comments:

amitesh said...

ham bhrashtan ke bhrast hamare...

पी.सी.गोदियाल said...

वाजपाई साहब, जो कुछ आपने अपने इस सुन्दर आलेख के अंतिम पैराग्राफ में कहा है वही तो कुछ तथाकथित "दक्षिणपंथी' हिन्दू बुद्धिजीवियों ने आज से करीब सालभर पहले कहा था, तब क्यों नहीं मीडिया के नींद खुली ?

खैर, सुन्दर आलेख !

डॉ .अनुराग said...

दो चीज़े समझना बहुत जरूरी है .....भ्रष्टाचार को आप मिटा नहीं सकते ..समाज में अब ये वाइरस अपने म्यूटेशन के साथ है .....
..कितनी नैतिक कक्षाए लगे ले ...कितने इमानदारी के क्लोन तैयार कर ले ....तरीका सिर्फ एक ही है ....दोषियों को कड़ी सजा मिले......संपत्ति जब्त हो.....ऐसी जब्त हो की पूरी पीढ़ी पनाह मांगे ......

honesty project democracy said...

आपने बहुत ही सुन्दर तथ्यों के साथ देश और समाजहित में समर्पित पोस्ट लिखी है....इसके लिए आपका धन्यवाद ....अब मैं एक सामाजिक कायकर्ता और सबसे पहले इस देश का नागरिक होने के नाते जो मेरे विचार है और जो मेरी दिली तमन्ना है वो व्यक्त करता हूँ दरअसल इस राडिया मामले में कानून और सत्य अगर अपना काम करे तो रतन टाटा और मुकेश अम्बानी जैसे लोग इस देश के लिए दाउद और लादेन से ज्यादा खतरनाक साबित घोषित किये जायेंगे तथा इनको पूरी व्यवस्था को सड़ाने का जिम्मेवार मानाजाकर गंभीर सजा होनि चाहिए.........लेकिन यह तब होगा जब इस देश का दिमाग यानि प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति सत्य और न्याय के प्रति संवेदनशील और समर्पित होगा........इसलिए अगर इस मामले में उद्योगपतियों को सजा नहीं होती है तो यह मान लिया जाना चाहिए की असल अपराधी मनमोहन सिंह और प्रतिभा पाटिल जैसे लोग हैं जिनकी वजह से भ्रष्ट मंत्री और उद्योगपतियों द्वारा हर तरह से इस देश को लूटा जा रहा है और आम लोग जीने की मजबूरी में हर रोज मर रहें हैं.....

honesty project democracy said...

एक बात और जिस अधिकारी ने इस टेप को लिक किया या ऐसा महत्वपूर्ण कार्य किया उसको कम से कम दो करोड़ का इनाम देकर भारत रत्न का पुरस्कार भी दिया जाना चाहिए जिससे इस बेईमानों की नगरी में ईमानदारी के लिए लोग प्रेरित हो सकें.....

L.R.Gandhi said...

चोरों का सरदार -सिंह फिर भी इमानदार ?
क्या इमानदारी की परिभाषा ही बदल गई ?
तोहमतें आएंगी नादिर शाह पर ...
आप दिल्ली रोज़ ही लूटा करो....
पर्सून जी आप भी नए घोटाले /हादसे के आने तक ही जी २ को याद रख पाएंगे ...
फिर कोई दूसरी राडिया होगी आपके राडार पर ..और लोग भी भूल जायेंगे ....उतिष्ठकौन्तेय

Cattechie A hacker said...

excellent blog very impressive content..old school of jounos..salute

Rajeev Ranjan said...

आजकल ऐसे मुद्दे मुद्दत के बाद नहीं आते ख़बरों में देखने-सुनने को। सो जब भी कुछ घटित होता है, मान लेता हँू कि इस पर तो पुण्य जी कुछ लिख ही मारेंगे। अभी तक यह उम्मीद ‘बाउंस’ न गई तो न गई। असल में हमारे मन में आपके नायकत्व का यह चेहरा यों ही नहीं बना। इस विश्वास को बनाने में आपके विचारों चाहे वह जनसत्ता में छपी हांे या हिन्दुस्तान में या फिर प्रभात ख़बर में; का सौ-तोला हाथ है। सो पढ़ता हँू अवश्य।

मान लें अगर कल की तारीख़ में आप किसी स्कैण्डल में फँस गए तो...? आपकी जो गत होगी सो होगी, लेकिन हम किसके शरणागत होंगे? ए. राजा के? नीरा राडिया के? प्रधानमंत्री या फिर राष्ट्रपति के? बता दँू कि दिल्ली के पुस्तक मेले में आपको देखा तो उत्साहित था मैं। बात करने की इच्छा हुई, लेकिन अगले ही पल सोचा ऐसे लोगों से दूरी भली। ये देवता नहीं कि इनके करीब जा पाँवपूजी करें। नजदीक जाकर कहने से अपनी चाहे जो छवि बने उनकी निगाह में। लेकिन पुण्य प्रसून बाजपेयी जो वास्तव में हैं उससे कहीं अधिक श्रद्धेय हमारी नज़र में जरूर हो जाएंगे। दरअसल, आज सबसे बड़ी चिंता अपने श्रद्धेय या अपने आदरणीय आदर्शों व विश्वासपात्रों का बेनकाब होना है। अतः चाहे आप हों या रविश या आशुतोष। सबको टेलीविजन पर देख कर दूर से आदमी पहचान राय कायम किया जाए उतना ही उचित है। आपका जितना औद्योगिक घराने या सत्ता से फासले पर रहना जरूरी है। उतना ही आवश्यक पाठक/दर्शक को भी मीडिया के आप जैसों चर्चित चेहरों से अलग रहने की है। अन्यथा कारगिल-परी बरखा दत्त और उनके सहरूपों ने जैसा सलूक भारतीय पाठकों/दर्शकों से किया है, क्या पता आप भी दगा दे जाएँ तो हम किस बिचौलिए को पकड़ेंगे? उससे सुलह-हिसाब करेंगे क्योंकि हमारा-आपका रिश्ता विश्वास और सच के सही मानदंडो पर टिकी है। पूजा या पा लगी पर हरगिज नहीं।
-राजीव रंजन प्रसाद, शोध-छात्र(प्रयोजनमूलक हिन्दी पत्रकारिता), बीएचयू,

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

कल एक चैनल पर इस डीलिंग को जस्टीफाई करने की कोशिश की जा रही थी, क्योंकि बिरादरी भाई शामिल थे. गोदियाल जी की बात का उत्तर शायद किसी के पास भी नहीं..

भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) (BAAS) said...

आदरणीय श्री पून्य प्रसून बाजपेयी जी,
नमस्कार।

सदा की भांति आपने अच्छा लिखा है। आशा है कि आगे भी लिखते रहेंगे।

आदरणीय श्री पून्य प्रसून बाजपेयी जी, आपने अनेक सवाल उठाये हैं, जिनमें तार्किकता के साथ-साथ वैधानिकता भी समाहित है। परन्तु इन सवालों पर विचार करने के लिये नियुक्त उन लोगों में, जिन्हें संवैधानिक निकायों पर पदास्थापित किया गया है, विचार करने का माद्दा और साहस है?

आदरणीय श्री पून्य प्रसून बाजपेयी जी, संविधान, कानून, नैतिकता ये सब एकाएक ही धराशाही नहीं हुए हैं। उनको ध्वस्त करने की नींव हमने एक आम व्यक्ति के साथ हो रहे अन्याय की अनदेखी करके या आम व्यक्ति का अपमान करने वाले व्यक्ति को खुला छोडकर बहुत पहले ही कर दी थी।

आदरणीय श्री पून्य प्रसून बाजपेयी जी, जो मानसिकता आजादी से पूर्व या आजादी के तत्काल बाद आम व्यक्ति के मानवीय मूल्यों की परवाह नहीं करती थी और जिसको स्थानीय वैधानिक या संवैधानिक निकायों ने न मात्र नजरअन्दाज किया, बल्कि संरक्षण भी दिया, वही ताकतें सुरसा के मू:ह की तरह से विकाराल रूप धारण करके, अब राष्ट्रीय मूल्यों और हितों की परवाह नहीं कर रही हैं और राष्ट्रीय संवैधानिक निकाय आसानी से इस सबको नजरअन्दाज करके खुलेतौर पर केवल संरक्षण ही प्रदान नहीं कर रहे हैं, बल्कि इस आपराधिक कृत्य को धृष्टतापूर्वक अपना हक मानकर इसमें साझेदारी भी करने लगे हैं!

आदरणीय श्री पून्य प्रसून बाजपेयी जी, ऐसे में किससे विचार करके, परिवर्तन की अपेक्षा की जा सकती है। सभी संवैधानिक निकायों की दुर्दशा तो हम सबने मिलकर की है। हमने आजादी के बाद भी अपनी परम्परागत मानसिकता को बदलने पर कोई विचार नहीं किया। कानून तो लम्बे-चौडे बना दिये, लेकिन उनके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी किसी पर नहीं डाली। बिना उत्तरदायित्व के कौन, किसकी सुनने वाला है?

आदरणीय श्री पून्य प्रसून बाजपेयी जी, आत्मरक्षा के अधिकार में आक्रामक पर उतना हमला करने का हक हमने प्रत्येक भारतीय को "भारतीय दण्ड संहिता" में प्रदान किया है, जितना कि अपने आपको बचाने के लिये जरूरी हो। इस कानून के तहत अपने जीवन को बचाने के लिये आक्रामणकर्ता के जीवन तक को छीना जा सकता है। लेकिन पूरे गाँव या मोहल्ले के राशन को कालाबाजारी के जरिये बेचकर डकार जाने वाले अपराधी द्वारा एक पूरे के पूरे गाँव को भूख से बिलबिलाकर, तिल-तिल मरने या विवश होकर अनैतिक कार्यकलापों या अपराधों में लिप्त हो जाने को मजबूर कर देने वाले के जीवन को सामूहिक रूप से समाप्त कर देने का कानूनी अधिकार आत्मरक्षा का अधिकार नहीं है।

आदरणीय श्री पून्य प्रसून बाजपेयी जी, राडिया के टैप तो राष्ट्रीय मुद्दा बन गये हैं, लेकिन सरकारी दफ्तरों से नीचे से ऊपर तक कितनी ही राडिया या राडे हैं। जिन्होंने पूरी की पूरी व्यवस्था को दीमक की तरह अन्दर से चट करके खोखला कर दिया है।

आदरणीय श्री पून्य प्रसून बाजपेयी जी, लोक सेवकों को जनता के नौकर के रूप में जनता की सेवा करने के लिये नियुक्त किया जाता है, जो जनता के सेवक के बजाय जनता के स्वामी बन गये हैं। जो जनता से अपेक्षा करते हैं कि जनता उनको अपना भगवान माने, ऐसे नौकरों से देश/जनता को स्वामिभक्ति की आशा करना निरर्थक है।

आदरणीय श्री पून्य प्रसून बाजपेयी जी, लोक सेवकों ने अनाधिकार हथियाई अपनी इसी असंवैधानिक हैसियत को अपना संवैधानिक अधिकार बना लिया और लोक सेवा के दौरान किये जाने वाले सभी प्रकार के अपराधों को विभागीय जाँच के सुरक्षा कवच में दफन करके स्वयं को भारतीय आपराधिक कानूनों के शिकंजे से मुक्त कर लिया, जिसे न्यायालयों ने भी परोक्ष रूप से समर्थन दे दिया है। आखिर कोर्ट में बैठने वाला व्यक्ति भी तो अन्तत: अपने आपको ब्यूरोक्रेट ही मानता है। जिसको संविधान का सुरक्षा कवच मिला हुआ है, लेकिन वह कर्त्तव्यों के प्रति निष्ठा रखने के लिये प्रतिबद्ध नहीं होकर भी न्यायमूर्ति कहलाता है। और तो और सेवानिवृति के बाद भी न्यायमूर्ति का तमगा नाम के आगे लगा रहता है।

बडी समस्या है कि कहाँ से शुरू करें और कहाँ से नहीं? मुझे तो लगता है कि हमें अपने आपसे ही शुरूआत करनी होगी।
शुभकामनाओं सहित।
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
0141-2222225
98285-02666

संतोष त्रिवेदी ♣ SANTOSH TRIVEDI said...

यही बात गौर करने वाली है और हर भरिय के ज़ेहन में भी घूमनी चाहिए की अपरधियों का 'वर्गीकरण' भी हो सकता है क्या ? यदि दोष सिद्ध होने तक कोई दोषी नहीं है,फिर तो 'नेताओं' की तरह पत्रकार-बिरादरी भी पाक-साफ़ हो जाएगी !

सुशील कुमार छौक्कर said...

चौथे स्तम्भ पर कुछ उम्मीदें थी अब वो भी टूट गई। अफसोस इसके सिवाए क्या कर सकते है। वैसे जब मिसन से ज्यादा पैसे को अहमियत दी जाने लगे तब ऐसा ही होता है।

दीपक बाबा said...

प्रसून सर,

समाज ने मीडिया और न्यायपालिका से बहुत उम्मीदें पाल रखी है. पर ये समाज जब तक खुद नहीं सुधरता तो इसमें घोटालेबाजो का क्या कसूर. ५०० -१००० रुपे रिश्वत देकर इस समाज में दरियादिली से ब्यान किया जाता है. न लेने वाले को शर्म न देने वाले को.

भ्रष्टाचार वाकई एड्स से भयंकर बिमारी बन चुकी है..... राडिया जैसे तो मात्र वाहक है... कीटाणु पनप रहे हैं.... फल फूल रहे है.

सम्वेदना के स्वर said...

प्रसून जी राडिया टेप भारत के विक्की लीक्स हैं।
सुप्रीम कोर्ट को चाहिये कि इन टेपों को “राष्ट्र के नाम सन्देश” के रूप में पूरे देश में सभी टेलीविज़न चैनलों और रेडियों पर, अपनी देखरेख में प्रसारित करवायें।
इन टेप्स को लीक करने वाले व्यक्ति को “सबसे धासूं सीटी बजउआ पुरुस्कार” (बेस्ट व्हीसिल ब्लोअर पुरुस्कार) दिया जाये। भारत-रत्न इसलिये नहीं क्योकि उसे पाने वालों में एक नाम धीरु भाई अम्बानी का भी है।
सभी धुरन्धर मीडियाकर्मी अपनी सम्पत्ति की सार्वजनिक घोषणा करें। सभी चैनल अपनी आय और व्यय का लेखा जोखा, अपनी वेब साईट पर लगायें।
सभी राष्ट्रीय दलों को अपना एक एक टेलीविज़न चैनल खोलने को कहा जाये ताकि अपने प्रचार प्रसार के लिये व्यापारिक घरानों के द्वारा संचालित मीडिया के हाथ की कठपुतली न बनें और एक दूसरे के घोटालों को जनता के सामने लायें।
पीएमओ, में सीसीटीवी कैमरे लगायें जायें तथा उसकी गतिविधियों का सीधा प्रसरण हो! (हा..हा..हा....ऐसा सम्भव न हो तो अमेरिकी डबल एजेंट को रिश्वत देकर जानकारी प्राप्त की जाये और फिर सार्वजनिक की जाये)

सनसनीखेज भांडिया टेप - एक्स्क्लूसिवली “सम्वेदना के स्वर” पर जरुर देखें

Kajal Kumar said...

... देश के ताबूत में जंग लगी कीलें ठोकते पकड़े गए तो संविधान याद आया. वाह जी बल्ले बल्ले. जै हो मेरे क़ानून की.

मनीष चौहान said...

वाजपेयी जी आप बेहद शातिर और दोहरे चरित्र वाले पत्रकार हैं... आप सरकार और कार्पोरेट-कार्पोरेट तो चिल्ला रहे हैं. बेशर्म पत्रकारों का नाम लेना मुनासिब नहीं समझा... आखिर क्यों??? शायद इसीलिये न कि मुश्किल वक़्त में पता नहीं कौन साथ दे जाए... अगर आप पत्रकारिता को अपना सर्वस्व समझते हैं और आप इस देश और समाज के लिए सचमुच चिंतित हैं तो मोटी चमड़ी वाले एक भी दलाल पत्रकार का नाम क्यों नहीं लिया??? क्यों इन बेशर्मों के खिलाफ कुछ भी लिखने या बोलने का काम एक अलोक तोमर के ही जिम्मे है??? ज़रा सोचिए..

मनीष चौहान said...
This comment has been removed by the author.
AAINA said...

DEKH LIJIYE...AAP SAWAL KHADA KAR RAHE HAI AUR LOG HAI KI AAP PAR HI NISANA SADH RAHE HAI..

anoop joshi said...

sir sayad yaad ho ye prakaran aapne kaafi mahine pahle hi apne blog me likh diya tha. lekin pata nahi tab itni baat kyon nahi uthi........
sir bata sakte hai ye media se kaun se log is lobing me samil the......?

राकेश पाठक said...

वो तो ठीक है कि अब
लिखा जा रहा है
कहा जा रहा है
पर सवाल
और भी है...
कि आखिर, लोकतंत्र का चौथा खंभा
खिसकता हुआ
कहां जा रहा है?

himmat said...

प्रसुनजी आपने इस देशकी मुलभुत समस्याओ का पोस्टमोर्टम करके रख दिया है.
कुछ पाठक बारीबारी आपको संदेह के दायरेमें लेने की चेष्टा कर रहे हे उनको मेरा ये निवेदन...
लोकतंत्र के चोथे खंभे की निंव खिसककर कही नही जा रही हे. ना उसके उपर का भरोसा टुटा है. इस ब्लोगमें हम जो पढ रहे हे वो लोकतंत्र के चौथे खंभे की आवाज है, राजा, चौहाण, कलमाडी जेसे महा हरामीओ को ये चौथा खंभा ही घर-जेलमें बंद करनेकी ताकात ये चौथे खंभे मे हे.
पोलिटिश्यन, ब्युरोक्रेट्स, इन्डस्ट्रियालिस्ट नही चाहते की ये चौथा खंभा सलामत हो. इसलिये वो चौथे खंभे के प्रति हो सके इतना कुप्रचार करते हे.
2-जी स्पेक्ट्रमकांडमें मिडियाकी कइ हस्तिया फसी हे फीर भी मिडियाने ही उसको उजागर कीया. चोथे खंभे की ही बिरादरी के कुछ लोग उनको गिराने की मुहीममें शामिल हे तो अपनी जान को दांव पर लगाकर, करोडोकी लालचको ठुकरानेवाले कंई चोथे खंभे को मजबुत करनेमें दिनरात एक कर रहे हे. मिडीयाकी छवी धुमिल होती हे तब वो दाग भी यही बहादुर लोग पोंचते हे.
जनता मिडियासे आस तोड दे यही तो चाहते हे ये करप्ट लोग. क्योकी मिडियाही उसकी राह का कांटा है. प्रजा मिडिया को नजरअंदाज कर दे तो फिर करप्ट लोगोको कोई बात का हिसाब नही देना पडेगा.
पुण्यप्रसुन जेसे मुल्यनिष्ठ आदमीकी तारिफ से ये कहकर बचना की पता नही ये भी बरखा की जमात के न निकले तो तो फिर आपको अल्लाह बचाये. मुजे प्रसुनजी जैसे लोग अपने जेसे लगे और उसकी तारिफ करके उसके बगलमे खडे होने की हिम्मत ना रख्खु किसकी बगल-बिरादरीमें जा कर बेठु. आखीर आगे जा के ये लोग बदल जाये तो दोष मेरी उनके उपरकी निष्ठा का नही, इन लोकोकी मुल्योके प्रति श्रद्धा का रहेगा. लेकिन में अभी उनके पक्षमे ना खडा होउ तो फिर दोष मेरी सत्यके प्रति निष्ठाका माना जायेगा.
कंचन को लाख तपाओ वो अपना रंग नही बदलेगा.

reporterneeraj.blogspot.com said...

टेलिफोन पर लोकतंत्र का जनाजा हर दिन निकलता हुआ सुनायी देगा।
मेरे हिसाब से ये लाइन सही नहीं है