Thursday, March 17, 2011

रेलगाड़ी से तेज है बंगाल में बदलाव की बयार

बंगाल जाती रेलगाड़ी के नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन छोड़ते ही सामने बैठा कोई यात्री अगर इस मिजाज से आपकी तरफ सवाल उछाल कर यारी करना चाहे कि "ममता बनर्जी बंगाल में वामपंथी को हरायेगी जरुर लेकिन मुख्यमंत्री नहीं बनेगी ", तो आप क्या कहेंगे। जाहिर है जिस तपाक से सवाल उछला उसी तपाक से जवाब भी देना होगा क्योकि अगले अठ्ठरह घंटे तो साथ ही गुजारने हैं। तो जवाब रहा- ऐसा हो नहीं सकता, ममता जिस राजनीतिक दांव को खेल रही हैं उसमें वहीं मुख्यमंत्री नही बनी तो बंगाल को लगेगा कि ममता ने ठग लिया। बात ठगने की नहीं है भाईसाब। जंगलमहल का बंगाली भी जानता है कि ममता वामपंथियों को टक्कर तो दे सकती है लेकिन मुख्यमंत्री बनकर जंगलमहल में मंगल तो नहीं कर सकती। नही ऐसा नही है। दीदी तो जंगलमहल के लिये भी रेलगाड़ी शुरु कर रही हैं।और अब दिल्ली से चलेंगे तो सीधे लालगढ़ में अपने घर पर उतरेंगे। सियालदह जाने की जरुरत ही नहीं पड़ेगी। बिना रिजर्वेशन स्लीपर क्लास में बैठे एक सह-यात्री ने बहस में बीच में टोकते हुये ममता का जिस तरह समर्थन किया और लालगढ़ का जिक्र किया वैसे ही डिब्बे में बैठे यात्रियो के लिये यह खुला आंमत्रण सरीखा था, जिसमें जो चाहे ममता बनर्जी को लेकर अपनी बात कह ले।

पूर्वा एक्सप्रेस अपनी रफ्तार में थी और बंगाल के चुनाव को लेकर कई सवाल उछलने लगे तो रेलगाड़ी की रफतार से भी तेज थी। क्या वामपंथियो के तीन दशक की सत्ता की समझ का विकल्प ममता बनर्जी देगी। क्या मनमोहन सिंह की अर्थनीति का विकल्प बंगाल देगा। क्या बंगाल के चुनाव परिणाम पहली बार गरीब बंगाल का अक्स होंगे,जिसके साये में मजदूर,किसान,आदिवासी और अल्पसंख्यक पिछडा तबका ही नजर आयेगा। यह सारे सवाल दिल्ली से कोलकाता लौटते बंगालियो से सुने जा सकते हैं। सिर्फ दिल्ली ही नहीं अलग अलग शहरो में निर्माण से जुडे मजदूरो के अलावे रिक्शा चलाने वाले बंगालियों से लेकर परचून का धंधा करने वाले हो या घरों में काम करने वाली महिलायें हो सभी से जुडे सवाल ममता बन्रजी की राजनीति से कैसे जुड़े हैं और किस तरह ममता बंगाल के वामपंथी गढ़ को तोड देगी , बहस उसी दिशा में चल पड़ी। कन्ट्रेक्टर का धंधा करने वाले पार्थो गांगुली लगे बताने कि कैसे बंगाल चुनाव के ऐलान के साथ ही निर्माण मजदूर और घरो में काम करने वाले बंगालियों के लौटने का सिलसिला जिस तेजी से बढ़ा है , उसमें पहली बार बंगाल में ढहते वामपंथियो की सत्ता से ज्यादा ममता के उस राजनीतिक प्रयोग को देखा जा रहा है, जहां सरोकार की राजनीति परिवर्तन की लहर के तौर पर उठ रही है। हम नहीं गये तो दीदी अकेली पड़ जायेगी। कैडर का आतंक फिर हमें जीने नहीं देगा। घर छोड़कर कबतक बाहर काम करें। वोट नहीं डालेंगे तो दीदी हार जायेगी। अबकि बार लाल झंडा नहीं चलेगा।

अचानक सुशाधर महतो ने जिस तेजी से अपनी बात कही उससे सभी झटके में आ गये। महतो दा आप ऐसा क्यों कहते हैं। क्या वामपंथियो ने मजदूरों के लिये कुछ नहीं किया। किया होगा लेकिन दिल्ली में आज भी ममता दीदी का घर हम बंगालियो के लिये खुला है। सीपीएम का नेता तो दसियों साल से दिल्ली में है लेकिन कोई सीपीएम का नेता दिल्ली में मिलता तक नहीं है। हमारा रिजर्वेशन भी ममता के घर से हुआ। और अबकि बार तो दीदी ने दिल्ली से भी हमारे इलाके में रेलगाड़ी रोकने का स्टेशन बनाने का ऐलान कर दिया है। हम पहली बार बिना किसी दलाल को पैसे दिये रिजर्वेशन पर घर लौट रहे हैं। महतो दा की खामोश बीबी भी झटके में बोल पड़ी। अब बताओ दीदी के लिये लौटना को पहले से ही होगा। हम लौटेंगे तो दीदी के लिये काम करेंगे। गांव में हिम्मत आयोगी। कैडर की हिंसा का जवाब देंगे। यह सारे बोल रेलगाड़ियो से लौटते उन बंगालियों के हैं, जिनका जीवन दिहाड़ी मजदूरी या हर दिन जीने के लिये रोजगार तलाश करना ही जिन्दगी का पहला और आखिरी सच बना हुआ है। दिल्ली से सीधे कोई रेलगाड़ी जंगलमहल के इलाके में घर तक भी ले जा सकती है , यह सपना भी कभी उन बंगालियो ने नहीं देखा जिनका सबकुछ लालगढ़ के आंदोलन में खाक हो गया।

लेकिन ममता ने इस सपने को भी अपने बजट में जगह दे दी। जंगलमहल के जिस इलाके में माओवादियो ने रेलगाड़ी रोककर कंबल और पेन्ट्रीकार को ही तो लूटा था। ममता ने उनका साथ दिया तो क्या गलत किया। वामपंथियों ने तो हमारा हक लूटा है और सत्ता में बनी हुई है। दीदी अगर लुटेरो को सत्ता से भगाने के लिये जुटी हैं तो हमें वोट डालने के लिये लौटना ही पड़ेगा। चाहे रेलभाडा उधार ही क्यों ना लेना पड़े। बूढी मां,पत्नी , भाभी को बिना रिजर्वेशन भी रिजर्वेशन के डिब्बे में रिजर्वेशन के जुगाड में घूमते बीरभूम के जागो दा भी बहस में अपनी गुंजाइश देख कूद पड़े। नाम जगीश्वर था लेकिन उनके साथ खड़े एक युवा लड़के ने जागो दा के सुर में सुर मिलाते हुये कहा जब दूरंतो गाड़ी चल सकती है तो सिर्फ हम मजदूरों के लिये रिजर्वेशन वाली गाड़ी क्यों नहीं चल सकती जो सीधे जंगलमहल ले जाये। भाईसाहब आप क्या माओवादी है जो जंगलमहल के लिये ही एक रेलगाड़ी खोज रहे हैं। बगल में बैठे शशीधर शर्मा खामोशी तोड़ ऐसी टिप्पणी देंगे किसी ने सोचा नहीं होगा। इसलिये माओवादी कहते ही हर कोई खामोश हो गया। लेकिन जवाब सुशाधर महतो की पत्नी से आया जो बोल पड़ी माओवादी से भी हिम्मत आता है। अब हम गांव लौटेगी तो गांव वालो में हिम्मत आयेगा। वहां तो सीपीएम के कैडर से वोट डालने के लिये भी लड़ना पडता है। पहले से जायेंगे तो सभी को एक-दूसरे का सहारा मिलेगा। हिम्मत लौटेगा। उनके साथ सफर करने वाले दिल्ली के लाजपत इलाके में काम करने वाले सुनिल महतो और जायदीप भी इसके बाद लगे बताने। तीन बरस पहले ही दिल्ली आये। जब आये थे तब लालगढ में रहना मुश्किल था। घर जल चुका था। सारा सामान लुटा जा चुका था। पिछले एक साल से दोबारा लालगढ में आवाजाही शुरु की तो घास-फूस की झोपडी बनायी और अब खेती दोबारा शुरु करवाने का भरोसा ममता ने दिया है। हम तो चाहते है कि इसबार आरपार की लड़ाई हो जाये। ममता दीदी सीपीएम को उखाड़ फेंके। और हमें दोबारा दिल्ली आने की जरुरत न पड़े । दिल्ली आना कौन चाहता है । अब बंगाल में सीपीएम का डर हमारा पेट भी काट डालेगा तो पेट की खातिर कहीं तो भागना ही पडेगा। लेकिन दीदी इस पेट को समझती है। और सीपीएम सिर्फ सिर गिनता है। जाहिर था शाम ढलने के बाद सभी अपने अपने खाने के जुगाड़ और सोने की व्यवस्था में लग गये। और तब अपने सामने बैठे उसी शख्स को मैंने कुरेदा, जिसने ममता के सीएम ना बनने को लेकर पहली बहस छेड़ी थी, क्यों आपको जवाब मिल गया कि ममता बनर्जी ही मुख्यमंत्री बनेंगी। नहीं, मिला और मेरा भरोसा पक्का है कि ममता चुनाव तो जीत जायेंगी लेकिन सीएम वह नहीं बनेगी। क्यों । आपने नहीं देखा ममता बनर्जी को लेकर कैसे पहली बार उन बंगालियों में भी जोश है, जो हाशिये पर हैं। यानी ममता की छवि उसकी ईमानदारी की है। और यही छवि वामपंथियो को डरा रही है। इसलिये ममता इस छवि को तोड़ना नहीं चाहेगी। बल्कि रेलमंत्री बनी रहेगी और बंगाल के उस तबके का भला करती रहेगी जो हाशिये पर है। तो मुख्यमंत्री कौन होगा । कोई भी हो सकता है। लेकिन मेरे ख्याल से प्रणव मुखर्जी हो सकते हैं। और ममता अपने किसी करीबी खास को डिप्टी सीएम बना देगी। क्योकि ममता जिस बंगाल का सपना सत्ता में आने के बाद दिखा रही हैं, उसकी रुकावट यही लेफ्ट फ्रंट होगा जो अभी वामपंथी लीक छोड़ चुका है। लेकिन बंगाली समाज अभी भी वामपंथी है। इसलिये समझना यही चाहिये कि ममता आज की तारिख में सीपीएम से बड़ी वामपंथी है। और सत्ता बदलाव के बाद ममता अपनी छवि को दिल्ली में भुनायेगी ना कि बंगाल में खपायेगी। और आप तो न्यूज चैनल के हैं, टीवी पर देखता रहता हूं। लेकिन मैं कैडर का हूं । जनता से जुड़ कर ही काम करता हूं।
क्या सीपीएम के हैं?
जी नहीं, अल्ट्रा लेफ्ट का हूं । अल्ट्रा लेफ्ट यानी.... यानी क्या वहीं माओवादी ।

4 comments:

KALAM said...

bahoth accha laga.Par kya mamta jeeth ne ke bad sahi sarkar de payega. Bangal ke jantha parivarthan chahatha hain. Par seat sharing ko lekar congress aur trinamul ke bich jo rajnithi dekhi ja rahi hain. Agar yeh log saththa pe athe hain tho zyaadathar samay tu tu main main main hi bith jayega. Par bampanth bhi badal gaya hain aise main bangal ke log sahi dhang se confused hain isbar ki vote kis ko de

सतीश कुमार चौहान said...

MAMTA KAREGI YA NAHI PER THE TASTE OF INDIA IS CHAGE MAY BE SOME THING BETTER ____SATISH KUMAR CHOUHAN BHILAI C.G.

prabhatdixit said...

waise apko kya lagta hai,mamta ke aane ke baad sab kuch badal jayega.mujhe to nahi lagta,haa itna jarur hai ki sthitiyan pehale se achchi ho jayengi lekin tasveer bilkul badal jayegi aisa hona mumkin nahi.
mein bahut nirash mehsus karta hoo jab dekhta hoo ki hamare paas vikalp hi nahi hai ki hum kisko desh ka samjhe,manmohan ameriki kathputali hai to bjp kabhi yahi haal hai.lalu mulayam mayavati jativaai rajniti karte hai,nitish theek thak hai lekin desh chalane layak nahi.
desh chalane ke liye ek aadmi ki nahi poore cader ya group ki jarurat hoti hai aise mein kis ar yakin kiya jaye.
kya hamara system kabhi sudhar sakega.
baba ramdev ko try karein kya?
sir ji aap kuch to jarur kehna chahe ek line ka hi sahi,mujhe bahut bahut achcha lagega.
plz sir rply jarur karna,aapke guideline ki jarurat hai.
namaskar.

Arun Agarwal said...

sir bengal mey badlav hona chayeyei or loktantra ki b yahi mang hai ki bengal ki sthithi badle.par dekhne wali baat yeh rahegi ki Mamta chunav jitne ke baad waha ki CM banti hai ya nahi.Sawal kai judey hai ki kya wah sahi vikalp hai bengal k liye......Log badlav chahte hai lekin kya yeh badlav bengal k heet mey hpga ya fir ojhi votebank ki rajneeti apna daanv khel jayegi............