Monday, March 14, 2011

अंधेर नगरी के राजा

पहली बार किसी प्रधानमंत्री ने माफी मांगी। पहली बार लोकसभा में विपक्ष के किसी नेता ने माफ भी कर दिया। पहली बार भ्रष्टाचार,महंगाई और कालेधन पर सरकार कटघरे में खड़ी दिखी। पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री से लेकर जांच एंजेसियों को समाजवादी सोच का पाठ यह कर पढ़ाया कि अपराध अपराध होता है। उसमें कोई रईस नहीं होता। पहली बार प्रधानमंत्री के चहेते कारपोरेट घरानों को भी अपराधी की तरह सीबीआई हेडक्वाटर में दस्तक देनी पड़ी। पहली बार चंद महीने पहले तक सरकार के लिये देश के विकास से जुडी डीबी रियल्टी कार्पो सरीखी कंपनी के निदेशक जेल में रहकर पद छोड़ना पड़ा। पहली बार पौने सात साल के दौर में यूपीए में संकट भ्रष्टाचार के खिलाफ हो रही कार्रवाई को लेकर मंडराया। और पहली बार सरकार को बचाने भी वही दल खुल कर आ गया जिसकी राजनीति गैर कांग्रेसी समझ से शुरु हुई। यानी पहली बार देश में यह खुल कर उभरा कि मनमोहन सिंह सिर्फ सोनिया गांधी के रहमो करम पर प्रधानमंत्री बनकर नहीं टिके है बल्कि देश का राजनीतिक और सामाजिक मिजाज भी मनमोहन सिंह के अनुकूल है।

पहली बार संसद ने भी माना कि विकास को लेकर आर्थिक सुधार की जो जमीन मनमोहन-इकनॉमिक्स ने बनायी है, उसकी बिसात ही भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रही है । और इन सब के बीच देश के सामने वैकल्पिक राजनीति ही नही बल्कि आर्थिक नीतियों का भी कोई खाका नहीं है जो सामाजिक तौर पर कारपोरेट जगत के टर्न ओवर को तीन सौ से तीन हजार फीसदी बढाने के साथ साथ के साथ साथ देश के किसान-मजदूरो की क्रय शक्ति में दस फिसदी का ही इजाफा कर दें। संसदीय राजनीति के पास भी ऐसे तौर-तरीके नहीं है, जो पूंजी पर टिकती जा रही चुनावी व्यवस्था के सामानांतर बिना पूंजी भी संसदीय लोकतंत्र का जाप जनता से करवा सके। यानी हाशिये पर खड़े देश के
80 करोड़ लोगों के सवाल उनके अपने नुमाइनंदों के जरीये पूरे हो और देस में बनती विकास की नीतियों को न्यूनतम से बी जोड़ सके। इसका कोई चेहरा देश के सामने नहीं है। वहीं इसके उलट सत्ता का विकेन्द्रीकरण पूंजी और मुनाफे के बंटवारे के आसरे कुछ इस तरह फैला है, जिससे सत्ता की नयी परिभाषा में हर वह संस्था सत्ता में तब्दील हो चुकी है, जिसके आसरे विकल्प के सवालो को जन्म लेना था। यानी राजनीति अगर सत्ता लोभ में पटरी से उतरने लगे तो संस्थाओं के आसरे उसपर नकेल कसने की जो प्रक्रिया अपनायी जानी चाहिये, वह भी पटरी ही बन जाये तो क्या होगा। सीधे कहें तो भ्रष्टा चार, महंगाई या कालेधन के सवाल पर लोकतंत्र के पहरुओं के तौर पर जिन संवौधानिक संस्थाओं को अपनी भूमिका निभानी चाहिये अगर उन्ही संस्थाओं की विश्वनीयता खत्म होने लगे तो क्या होगा।

असल में पहली बार देश के आमजन के सामने संवैधानिक संस्थाओं के जरीये भी रास्ता ना निकल पाने का संकट है। यानी संस्थाएं अगर ढहती नजर आ रही है तो विकल्प के सवाल किस आसरे देश के मानस पटल पर छा सकते हैं
, यह सवाल संसदीय राजनीति में सत्ता के लिये मशगूल राजनीतिक दलों के सामने भी है और आंदोलनों के जरीये सरकार पर दबाव बनाने वाले संगठनो को सामने भी। लेकिन वह किस चेहरे को लिये सामने आये, यह जवाब किसी के पास नहीं है। इसलिये सवाल यही है कि जो आर्थिक परिस्थितियां देश की राजनीति को भी अपने हिसाब से चला रही है और जिन माध्यमों के जरीये विकास का खांचा खींच कर देश के भीतर कई देश बना रही है, क्या उसे बदला जा सकता है। क्या संसदीय व्यवस्था के भीतर राजनीति करनी की इतनी जगह बची हुई है, जहां चुनाव के नये मापदंड तय किये जा सके। क्या सत्ता से टकराने में इतना लोकतंत्र देश के भीतर बचा हुआ है जहां पुलिस-प्रशासन विकल्प की सोच को राजद्रोह या गैरकानूनी करार देकर जेल में ना ठूंस दें। क्या लोकतंत्र के तीन स्तम्भों पर निगरानी रखने वाला मीडिया में इतनी मानवीयता अब भी बची है कि वह जनमानस की हवा को मुद्दों के आसरे आंधी बनाने में बिना मुनाफा काम करें। क्या यह संभव है कि देश के खनिज संस्धानों से लेकर देश की न्यूनतम जरुरत पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य के मद्देनजर पहले समूचे देश को सरकारी व्यवस्था नापे और संस्थायें काम में जुट जाएं। क्या यह संभव है कि विकास की जो नीति शहरीकरण और बाजारीकरण के जरिए कॉरपोरेट के आसरे मुनाफा पंसद नीति बनायी जा रही है, उसे कानून के जरीये बदला जाये। यानी बैकों को लेकर कानून बन जाये कि जनता का पैसा बहुसंख्यक जन के हित की योजनाओ को अमली जामा पहनाने के लिये एक नियत वक्त में सरकारी संस्थाओ के जरीये जन नुमाइंदों की निगरानी में पूरा किया जायेगा। गड़बड़ी होने पर आपराधिक कानून काम करेगा।

क्या यह संभव है कि कानून बनाकर बैंकिंग सेक्टर को किसान-खेती से जोड़ा जाये । मसलन बैंकों को हर हाल में किसानों को खेती के लिये तीन फिसदी पर कर्ज देना है
, नहीं दिया तो पैनल्टी में बैंक से उस क्षेत्र के किसानो की संख्या के मुताबिक वसूली होगी। क्या खेती की जमीन पर कानूनन पूरी तरह रोक लगाकर खरीदने-बेचने वालों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज नहीं किया जा सकता है। और खेती के लिये सिंचाई से लेकर कटाई  और गोदाम से लेकर बाजार तक फसल पहुंचाने के लिये इन्फ्रास्ट्रक्चर को उघोग का दर्जा देकर नयी नीति नहीं बनायी जा सकती है। क्या औघोगिकीरण के लिये देश की करोड़ों एकड बंजर जमीन को विकास से जोड़ने की योजना बनाने की दिशा में योजना आयोग को नहीं लगाया जा सकता है। क्या बुंदेलखंड सरीखे देश के पिछडे इलाको में देश के सबसे बेहतरीन शिक्षा और स्वास्थय केन्द्र खोलकर एक नया आर्थिक मॉडल नहीं बनाया जा सकता है। जो अपने इर्द-गिर्द रोजगार का एक पूरा खाका खडा कर सकता हो । क्या गांव को शहरो में तब्दील करने की जगह गांवो के माहौल-जरुरत के मुताबिक विकास का वैकल्पिक ढांचा खड़ा नहीं किया जा सकता है। क्या पब्लिक सेक्टर के जरीये विकास की उन योजनाओ को अमल में नहीं लाया जा सकता है जो कारपोरेट या निजी हाथो में लाइसेंस थमाकर देश के इन्फ्रास्ट्रक्चर को भी सस्ते में लुटाया जाता है और बैंकों के जरीये सस्ते में पूंजी जुगाड़ने का रास्ता भी साफ कर दिया जाता है। क्या देश का एक आर्थिक इंडेक्स नहीं बनाया जा सकता । जिसके मातहत रोटी से लेकर जमीन और शिक्षा से लेकर मकान तक की कीमत देश में एक निर्धारित खांचे से बाहर ना निकले। यानी जमीन की कीमतें अगर बढ़ती है तो गेहूं-चावल और भाजी की कीमते भी उसी रुप में बढगी। फ्लैट अगर दस लाख की जगह एक करोड़ हो सकते हैं तो दाल-चावल की कीमतें एक हजार रुपये प्रति किलोग्राम क्यो नहीं हो सकती। अगर यह नहीं हो सकता तो फिर जमीन-फ्लैट या वैसे हर प्रोडक्ट की कीमते भी एक सीमित दायरे में ही रहेगी जिससे कालाधन बनाने या कालाधन को इन्वेस्ट करने के रास्ते रुके। यानी कीमत बाजार नहीं देश की जरुरत के मुताबिक सरकार तय करें जो पंतायत स्तर से लेकर संसद तक में काम कर रही हो। शायद यह सकुछ हो सकता है लेकिन इसके लिये संसदीय ढांचे की चुनावी प्रक्रिया को भी सस्ता करने की जरुरत पड़ेगी। जरुरी है कि देश में चुनाव लडने के लिये 10 रुपये का फार्म मिले। यानी 25 हजार रुपये ना देने पड़े।

जरुरी है कि पंचायती राज व्यवस्था से लेकर लोकसभा तक की प्रक्रिया आपस में इस तरह जुड़े, जिससे हर पचास हजार लोगो को अपना नुमाइंदा सीधे नजर आये । यानी चार स्तर या चौखम्भा राज की व्यवस्था जमीनी तौर पर हो। चूंकि यह सब नहीं है इसलिये चुनावी व्यवस्था में नीतिया-विचारधारा हाशिये पर है और उसी का प्रतिफल है कि ममता बनर्जी बंगाल में भूमि-सुधार से लेकर भूमि अधिग्रहण और किसान-मजदूर आदिवासियो के सवाल पर कांग्रेस की सोच से ठीक उलट है लेकिन बंगाल में दोनो एकसाथ है। दिल्ली में पूर्व कैबिनेट मंत्री ए राजा को भ्रष्टाचार के आरोप में जेल भिजवाने पर प्रधानमंत्री खुशी जाहिर करते है
, उसी ए राजा को चेन्नई में वही डीएमके क्लीन चीट दे देती है। और दोनो एकसाथ मिलकर चुनाव भी लड़ते है और केन्द्र की सरकार भी सभी साथ मिलकर चलाते है । यानी विकास के हर मुद्दे पर देश के खिलाफ लिये जा रहे निर्णयों पर एक वक्त के बाद अगर प्रधानमंत्री माफी मांग लें और विपक्ष माफ कर दें और इस संसदीय व्यवस्था को बरकरार रखने के लिये कोई ना कोई राजनीतिक दल आंकड़ों के लिहाज से संसद के भीतर खानापूर्ती करते रहें तो सवाल यही है कि व्यवस्था का राजद्रोह और राजनीति की जनविरोधी सोच और क्या होती है।

7 comments:

सम्वेदना के स्वर said...

भारत में (अ) व्यव्स्था किस तरह काम करती है?
पी सी बाबू से एक साक्षात्कार :- http://samvedanakeswar.blogspot.com/2011/03/blog-post_11.html

पोल तो खुल चुकी है पर ढोल के शोर में सब खो जायेगा शायद!

mridula pradhan said...

itni vistrit jankari ke liye dhanybad.

anurag said...

aap ke dwara batai sari bate sambhav hai ,agar desh ke karnedhar ke dimag mai khaka bharatvarsh ka ho na ki World Bank & IMF ka.hamari growth WB IMF Aur vishisht Industrial Gharana ke liye hai, Aam sadak per chalnewale Bhartawasi ke liye nahi.

"jai Ho maharaj"

Anurag Pandey

anurag said...

aap ke dwara batai sari bate sambhav hai ,agar desh ke karnedhar ke dimag mai khaka bharatvarsh ka ho na ki World Bank & IMF ka.hamari growth WB IMF Aur vishisht Industrial Gharana ke liye hai, Aam sadak per chalnewale Bhartawasi ke liye nahi.

"jai Ho maharaj"

Anurag Pandey

सतीश कुमार चौहान said...

आप जिस राजनैतिक परख के साथ बात रख रहे हैं वह उपदेश से ज्‍यादा कुछ नही, अपनी बिरादरी से ही शुरू किजीऐ सब धरे के धरे रह जाऐगे ये तो एक दौर हैं कोसने का आप भी हाथ धोते रहीये , समझना तो ये हैं कि क्‍या घोटाले होते नही थे .....
सच तो ये हैं कि पोल खुल रही है वर्ना ....
सतीश कुमार चौहान भिलाई

sharad said...

punya prasun ji aapki soch aur lekh ka koi jawab nahi. lekin bhgwan bhrose chalta hai apna desh.. is desh ko bachane wala sirf media aaj ki tarikh me hai... lekin use pehale kuhd ko parakana hoga...

sharad said...

punya prasun ji aapki soch aur lekh ka koi jawab nahi. lekin bhgwan bhrose chalta hai apna desh.. is desh ko bachane wala sirf media aaj ki tarikh me hai... lekin use pehale kuhd ko parakana hoga...