Monday, May 28, 2012

सिंगरौली के संघर्ष का सफर



यह रास्ता जंगल की तरफ जाता जरुर है लेकिन जंगल का मतलब सिर्फ जानवर नहीं होता। जानवर तो आपके आधुनिक शहर में हैं, जहां ताकत का एहसास होता है। जो ताकतवर है उसके सामने समूची व्यवस्था नतमस्तक है। लेकिन जंगल में तो ऐसा नहीं है। यहां जीने का एहसास है। सामूहिक संघर्ष है। एक-दूसरे के मुश्किल हालात को समझने का संयम है। फिर न्याय से लेकर मुश्किल हालात से निपटने की एक पूरी व्यवस्था है। जिसका विरोध भी होता है और विरोध के बाद सुधार की गुंजाइश भी बनती है। लेकिन आपके शहर में तो जो तय हो गया चलना उसी लीक पर है। और तय करने वाला कभी खुद को न्याय के कठघरे में खड़ा नहीं करता। चलते चलिये। यह अपना ही देश है। अपनी ही जमीन है। और यही जमीन पीढ़ियों से पूरे देश को अन्न देती आई है। और अब आने वाली पीढ़ियों की फिक्र छोड़ हम इसी जमीन के दोहन पर आ टिके है। इस जमीन से कितना मुनाफा बटोरा जाता सकता है, इसे तय करने लगे है। उसके बाद जमीन बचे या ना बचे। लेकिन आप खुद ही सोचिये जो व्यवस्था पहले आपको आपके पेट से अलग कर दें। फिर आपके भूखे पेट के सामने आपकी ही जिन्दगी रख दें। और विकल्प यही रखे की पेट भरोगे तो जिन्दा बचोगे। तो जिन्दगी खत्म कर पेट कैसे भरा जाता है ,यह आपकी शहरी व्यवस्था ने जंगलो को सिखाया है। यहां के ग्रामीण-आदिवासियों को बताया है। आप इस व्यवस्था को जंगली नहीं मानते। लेकिन हम इसे शहरी जंगलीपन मानते है। लेकिन जंगल के भीतर भी जंगली व्यवस्था से लड़ना पडेगा यह हमने कभी सोचा नहीं था। लेकिन अब हम चाहते हैं जंगल तो किसी तरह महफूज रहे। इसलिये संघर्ष के ऐसे रास्ते बनाने में लगे है जहां जिन्दगी और पेट एक हो। लेकिन पहली बार समझ में यह भी आ रहा है कि जो व्यवस्था बनाने वाले चेहरे हैं, उनकी भी इस व्यवस्था के सामने नहीं चलती ।

यहां सरकारी बाबुओं या नेताओं की नहीं कंपनियो के पेंट-शर्ट वाले बाबूओं की चलती है। जो गोरे भी है और काले भी। लेकिन हर किसी ने सिर्फ एक ही पाठ पढ़ा है कि यहां की जमीन से खनिज निकालकर। पहाड़ों को खोखला बनाकर। हरी भरी जमीन को बंजर बनाकर आगे बढ़ जाना है। और इन सब को करने के लिये, इन जमीन तक पहुंचने के लिये जो हवाई पट्टी चाहिये। चिकनी -चौड़ी शानदार सड़केंचाहियें। जो पुल चाहिये। जमीन के नीचे से पानी खींचने के लिये जो बड़े बड़े मोटर पंप चाहिये।  खनिज को ट्रक में भर कर ले जाने के लिये जो कटर और कन्वेयर बेल्ट चाहिये। अगर उसमें रुकावट आती है तो यह विकास को रोकने
की साजिश है। जिन 42 से ज्यादा गांव के साढे नौ हजार से ज्यादा ग्रामीण आदिवासी परिवार को जमीन से उखाड़कर अभी मजदूर बना दिया गया है और खनन लूट के बाद वह मजदूर भी नहीं रहेंगे, अगर वही ग्रामीण अपने परिवार के भविष्य का सवाल उठाता है तो वह विकास विरोधी कैसे हो सकता है। इस पूरे इलाके में जब भारत के टाप-मोस्ट उघोगपति और कारपोरेट, खनन और बिजली संयत्र लगाने में लगे है और अपनी परियोजनाओ को देखने के लिये जब यह हेलीकाप्टर और अपने निजी जेट से यहां पहुंचते है।  दुनिया की सबसे बेहतरीन गाड़ियों से यहां पहुंचते है , तो हमारे सामने तो यही सवाल होता है कि इससे देश को क्या फायदा होने वाला है। यहां मजदूरों को दिनभर के काम की एवज में 22 से 56 रुपये तक मिलता है। जो हुनरमंद होता है उसे 85 से 125 रुपये तक मिलते हैं। और कोयला खादान हो या फिर बाक्साइट या जिंक या फिर बिजली संयत्र लगाने में लगे यही के गांव वाले हैं। उन्हे हर दिन सुबह छह से नौ किलोमीटर पैदल चलकर यहां पहुंचना पड़ता है। जबकि इनके गांव में धूल झोंकती कारपोरेट घरानो की एसी गाड़ियां दिनभर में औसतन पांच हजार रुपये का तेल फूंक देती हैं। हेलिकाप्टर या निजी जेट के खर्चे तो पूछिये नहीं। और इन्हें कोई असुविधा ना हो इसके लिये पुलिस और प्रशासन के सबसे बड़े अधिकारी इनके पीछे हाथ जोड़कर खडे रहते है। तो आप ही बताईये इस विकास से देश का क्या लेना-देना है। देश का मतलब अगर देश के नागरिको को ही खत्म कर उघोगपति या कारपोरेट विकास की परिभाषा को अपने मुनाफे से जोड़ दें तो फिर सरकार का मतलब क्या है जिसे जनता चुनती है। क्योंकि इस पूरे इलाके में ग्रामीण आदिवासियों के लिये एक स्कूल नहीं है।  पानी के लिये हेंड पंप नहीं है। बाजार के नाम पर अभी भी हर गुरुवार और रविवार हाट लगता है। जिसमें ज्यादा से ज्यादा गांव के लोग अन्न और पशु लेकर आते हैं। एक दूसरे की जरुरत के मद्देनजर सामानो की अदला-बदली होती है। लेकिन अब हाट वाली जगह को भी हडपने के लिये विकास का पाठ सरकारी बाबू पढ़ाने लगे हैं। धीरे धीरे खादानो में काम शुरु होने लगा है। बिजली संयत्रो का माल-असबाब उतरने लगा है तो कंपनियो के कर्मचारी अफसर भी यही रहने लगे हैं। उनको रहने के दौरान कोई असुविधा ना हो इसके लिये बंगले और बच्चों के स्कूल से लेकर खेलने का मैदान तक बनाने के लिये मशक्कत शुरु हो रही है। गांव के गांव को यह कहकर जमीन से उजाड़ा जा रहा है कि यह जमीन तो सरकार की है। और सरकार ने इस पूरे इलाके की गरीबी दूर करने के लिये पूरे इलाके की तस्वीर बदलने की ही ठान ली है। चिलका दाद, डिबूलगंज, बिलवडा, खुलडुमरी सरीखे दर्जनो गांव हैं, जहां के लोगो ने अपनी जमीन पावर प्लांट के लिये दे दी। लेकिन अब अपनी दी हुई जमीन पर ही गांव वाले नहीं जा सकते। खुलडुमरी के 2205 लोगो की जमीन लेकर रोजगार देने का वादा किया गया।

लेकिन रोजगार मिला सिर्फ 234 लोगो को। आदिवासियों के जंगल को तबाह कर दिया गया है। जिन फारेस्ट ब्लाक को लेकर पर्यवरण मंत्रालय ने अंगुली उठायी और वन ना काटने की बात कही। उन्हीं जंगलों को अब खत्म किया जा रहा है क्योंकि अब निर्णय पर्यावरण मंत्रालय नहीं बल्कि ग्रूप आफ मनिसटर यानी जीओएम लेते हैं । ऐसे में माहान,छत्रसाल,अमेलिया और डोगरी टल-11 जंगल ब्लाक पूरी तरह खत्म किये जा रहे हैं। करीब 5872.18 हेक्टेयर जंगल पिछले साल खत्म किया गया। और इस बरस 3229 हेक्टेयर जंगल खत्म होगा। अब आप बताइये यहां के ग्रामीण-आदिवासी क्या करें। कुछ दिन रुक जाइए, जैसे ही यह ग्रामीण आदिवासी अपने हक का सवाल खड़ा करेंगे वैसे ही दिल्ली से यह आवाज आयेगी कि यहां माओवादी विकास नहीं चाहते हैं। और इसकी जमीन अभी से कैसे तैयार कर ली गई है यह आप सिंगरैली के बारे में सरकारी रिपोर्ट से लेकर अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक मंचों से सिंगरैली के लिये मिलती कारपोरेट की मदद के दौरान खिंची जा रही रिपोर्ट से समझ सकते हैं। जिसमें लिखा गया है कि खनिज संसाधन से भरपूर इस इलाके की पहचान पावर के क्षेत्र में भारतीय क्रांति की तरह है। जहां खादान और पावर सेक्टर में काम पूरी तरह शुरु हो जाये तो  मेरिका और यूरोप को मंदी से निपटने का हथियार मिल सकता है। इसलिये यहां की जमीन का दोहन किस स्तर पर हो रहा है और किस तरीके से यहा के कारपोरेट के लिये अमेरिकी सरकार तक भारत की नीतियों को प्रभावित कर रही है इसके लिये पर्यावरण मंत्रालय और कोयला मंत्रालयो की नीतियो में आये परिवर्तन से भी समझा जा सकता है । जयराम रमेश ने पर्यावरण मंत्री रहते हुये चालीस किलोमिटर के क्षेत्र के जंगल का सवाल उठाया।

पर्यावरण के अंतर्राष्ट्रीय एनजीओ ग्रीन पीस ने यहा के ग्रामीण आदिवासियों पर पडने वाले असर का समूचा
खाका रखा। लेकिन आधे दर्जन कारपोरेट की योजना के लिये जिस तरह अमेरिका, आस्ट्रेलिया से लेकर चीन तक का मुनाफा जुड़ा हुआ है। उसमें हर वह रिपोर्ट ठंडे बस्ते में डाल दी गई जिनके सामने आने से योजनाओ में रुकावट आती। इस पूरे इलाके में चीन के कामगार और आस्ट्रेलियाई अफसरो की फौज देखी जा सकती है। अमेरिकी बैंक के नुमाइन्दे और अमेरिकी कंपनी बुसायरस के कर्मचारियों की पहल देखी जा सकती है। आधे दर्जन पावर प्लांट के लिये 70 फीसदी तकनीक अमेरिका से आ रही है। ज्यादातर योजनाओ के लिये अमेरिकी बैंक ने पूंजी कर्ज पर दी है। करीब 9 हजार करोड से ज्यादा सिर्फ अमेरिका के सरकारी बैंक यानी  बैक आफ अमेरिका का लगा है। कोयले का संकट ना हो इसके लिये कोयला खादान के ऱाष्ट्रीयकरण की नीतियों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। खुले बाजार में कोयला पहुंच भी रहा है और ठेकेदारी से कोयला खादान से कोयले की उगाही भी हो रही है। कोयला मंत्रालय ने ही कोल इंडिया की जगह हिंडालको और एस्सार को कोयला खादान का लाइसेंस दे दिया है। जो अगले 14 बरस में 144 मिलियन टन कोयला खादान से निकालकर अपने पावर प्लांट में लगायेंगे। तमाम कही बातों के दस्तावेजों को बताते दिखाते हुये हमने ख दान और गांव के चक्कर पूरे किये तो लगा पेट में सिर्फ कोयले का चूरा है। सांसों में भी भी कोयले के बुरादे की घमक थी। और संयोग से ढलती शाम या डूबते हुये सूरज के बीच सिंगरौली में ही आसमान में चक्कर लगाता एक विमान भी जमीन पर उतरा । पूछने पर पता चला कि सिगरौली में अमेरिकी तर्ज पर हिंडालको की निजी हवाई पट्टी है जहा रिलायस,टाटा,जिदंल,एस्सार , जेयपी समेत एक दर्जन से ज्यादा कारपोरेट के निजी हेलीकाप्टर और चार्टेड विमान हर दिन उतरते रहते हैं। और आने वाले दिनो में सिंगरौली की पहचान 35 हजार मेगावाट बिजली पैदा करने वाले क्षेत्र के तौर पर होगी। जिस पर भारत रश्क करेगा।

10 comments:

dr.dharmendra gupta said...

most of us, urban indians r unaware of painful conditions of rural people but d most heinous crime is to be silent over loot of earth.

d most appaling situation is that our so-called representatives r silent n opposition have closed their eyes.....

elecronic media is busy in reporting of cricket n film actors.....

for what we r waiting?

collapse within? or
crushing from outside?

AMBRISH MISRA ( अम्बरीष मिश्रा ) said...

जालिम जमाने की फिकरत तो देखो !
सर पे चढ सरकार बनाते है ,
और अगर पूछो सारोकार
तो वे आँखे दिखाते है .....,

दर्द भी वे देते है और
दवा के नाम पे जहर भी ,
आदिवासी (जंगली) है हम
लोग ऐसा मानते है ...

पर किसी का घर उजाड देना ..
क्या इन्सानो का काम है
या किसी जंगली का ...
वो भी ...कुछ कागज के लिये

अलग अलग समुदाय
अगल अलग जनजाति
अलग अलग तरीके
अलग अलग सलिके

पर सब अब अलग है
हर अंग जुदा है
हर रंग जुदा है
कई पीढी ... अब खत्म है

समाजबाद और अर्थवाद
आईपीएल टैक्स फ्री ..
पिट्रोल मे टैक्स की आग
अर्थवादियों का समाजबाद
जिन्दाबाद जिन्दाबाद ...

कारो का शौक
कारोबार की चाह
दिखती नही गरीब की आह
बंद होती है यहाँ जिदगी की चाह

कुछ गोरे और उनके वंसज काले
काम अनोखे और मतवाले
महनेत से डरते है करते है घोटाले
मेरे ही देश मे है ... उनके वंसज काले

अब उन जगलो मे सब है ,
रास्ते पुल और मजबूत इरादे..
पर लोगों के लिये नही ..
लोगों के हटाने के लिये

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_________________

बाजपेयी जी ,

आपको सलाम , आपके काम को सलाम ,
आपके जज्वात को सलाम ,

आप जैसे लोगों को देख लगता है कि कुछ लोगों
मे खून अभी जमा नही ... तभी आपका मन स्वस्थय है ।


आपकी इस लेख की कुछ लाईने मुझे बहुत प्रभावित करती है
जो इस प्रकार है ........

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जानवर तो आपके आधुनिक शहर में हैं, जहां ताकत का एहसास होता है। जो ताकतवर है उसके सामने समूची व्यवस्था नतमस्तक है।

तय करने वाला कभी खुद को न्याय के कठघरे में खड़ा नहीं करता। चलते चलिये। यह अपना ही देश है।

सरकारी बाबुओं या नेताओं की नहीं कंपनियो के पेंट-शर्ट वाले बाबूओं की चलती है। जो गोरे भी है और काले भी।

,यहां मजदूरों को दिनभर के काम की एवज में 22 से 56 रुपये तक मिलता है।उन्हे हर दिन सुबह छह से नौ किलोमीटर पैदल चलकर यहां पहुंचना पड़ता है।

कारपोरेट घरानो की एसी गाड़ियां औसतन पांच हजार रुपये का तेल फूंक देती हैं। और इन्हें कोई असुविधा ना हो इसके लिये पुलिस और प्रशासन के सबसे बड़े अधिकारी इनके पीछे हाथ जोड़कर खडे रहते है।



हेलिकाप्टर या निजी जेट के खर्चे तो पूछिये नहीं सिगरौली में अमेरिकी तर्ज पर हिंडालको की निजी हवाई पट्टी है जहा रिलायस,टाटा,जिदंल,एस्सार , जेयपी समेत एक दर्जन से ज्यादा कारपोरेट के निजी हेलीकाप्टर और चार्टेड विमान हर दिन उतरते रहते हैं।

बस ...काम पूरी तरह शुरु हो जाये तो अमेरिका और यूरोप को मंदी से निपटने का हथियार मिल सकता है।



मुझे इस पर एक गाना याद आता है ........ ये जाने वाले हो सके तो लौट के आना माता तुम्हे बुला रही है ..
पर ये भगाये या खत्म किये जा रहे है किसी की कडकी दुर करने के लिये ......

अरूण साथी said...

bahut hi gambhir aur bajib sawal...jabab kaun dega?

aawaz24 said...

mai singrauli me hi rahata hun aur patrakarita se juda hun lekin koi is singrauli ke badhali par chhapne ko taiyaar nahi. Maine ek chhota sa kosis kiya web par likhne ka ke shayad koi sun le.prabhat khabar par aur kai website par phir maine ek chhota sa web portal banaya aur likhna tatha singrauli se sambandhit samagri ko ek jagah laane ka koshish kiya. lekin aaj bahut khusi hua ke aap ne singrauli par kuchh liha hai. halaat to aur bhi battar hai bhai jaan. hum jaise chhote patrakar ki baat to ansuni hi rah jaati hai shayad aapke lekh ka kuchh asar ho.

Abdul Rashid
Singrauli M.P.

GOVIND KUSHWAHA said...

Sir is duniya aapse jayada takatbar kalam kisi ki ho hi nahi sakti

sharad said...

aapke lekh hamesha sochne par majbur karte hai. sachai janke tajub aur ghusa bhi ata hai. par aap badi khabar mai hamesha kehte hai na. k ye india hai yaha esa hi hota hai... aap jayda se jyade likh sakte hai. aur hum padh sakte hai...

Rahul said...

prasun ji .......................
................bada dukh hota hai ki kaise apne hi desh ko bechkar kaise manniya manmohan brigade ne desh ko vikash ke nam par chuna lagaya 60 salo se nehru se lekar bajpeyi tak ki kamayi ko kaise manmohan brigade ne bechkar vikash ka jhunjhuna dikhaya aur usi jhunjhune ke shor me kaise sab kuchh khatma ho gaya pata hi nahi chala .............................................................................................aapse ek gujaris hai kya kuchh roshni dikhayi deti hai kripya margdarshan karen

राज-नीति said...

aap ne yatharth taswir batai,puri bebaki se...aap ko salaam

Akhilesh Jain said...

प्रसूनजी, यदि "बनाना रिपब्लिक" ऐसे ही बनता है तो ये अभी शुरुआत है..ये पंक्तियाँ सिर्फ दिलासा दिलाती हैं जिससे पेट नहीं भरता..आंसू पूछ जाते है

..हैं कहाँ हिटलर, हलाकू, ज़ार या चंगेज़ ख़ाँ
मिट गये सब, क़ौम की औक़ात को मत छेड़िये..

Akhilesh Jain said...

डिम्पल यादव चुनाव जीतीं:
प्रसूनजी, जब मुलायम सिंह की अपनी बहू को चुनावों में चुनाव जीतीं तो हमें उनका वो बयान याद आता है....जिसमे उन्होंने कहा था की अगर "महिला विधेयक बिल पास हो गया तो संसद में ऐसी ऐसी औरतें आएँगी जिन्हें देख के लोग सीटियाँ बजायेंगे..."

... दोगली मानसिकता का इससे बड़ा उदाहरण और क्या होगा ?

अब मुलायम सिंह यादव की बहू को देखकर सांसद सीटिया बजायेगे तब क्या हो होगा ??????