Tuesday, June 12, 2012

बीजेपी की बिसात पर संघ की चौसर


संजय जोशी और नरेन्द्र मोदी के टकराव ने चाहे बीजेपी की उन जमी परतों को उघाड दिया, जो संघ के गैर राजनीतिक सियासत तले छुपी रहती थीं। लेकिन इस टकराव ने  क झटके में सरसंघचालक मोहन भागवत के उस डी-4 [दिल्ली की चौकड़ी ] को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिसे खारिज करने का सपना नीतिन गडकरी को अध्यक्ष  नाने के साथ ही मोहन भागवत ने पाला था। अध्यक्ष बनने के बाद भी गडकरी डी-4 को खारिज नहीं कर पाये लेकिन खुद की गद्दी बचाने के लिये जिस तरह नीतिन  डकरी मोदी के सामने नतमस्तक हुये, उसने संघ के भीतर बदलाव का सपना तो जगा ही दिया। इसलिये पहले दौर में अगर आडवाणी, जेटली, सुषमा, वैंकेया, अंनत कुमार, राजनाथ सरीखे कद्दावर नेता झटके में ना सिर्फ 2014 की रेस से बाहर हो गये बल्कि उनके सामने गुमनामी में रहने वाले संजय जोशी इस तरह उभरे, जिससे हर किसी को लगा कि नरेन्द्र मोदी का विरोध करने के लिये संजय जोशी को हथियार बनाना ही होगा। यानी बीजेपी से इस्तीफा देने वाले संघ के संजय जोशी, बीजेपी के नरेन्द्र मोदी से ज्यादा बेहतर नेता मोदी विरोधियों को नजर आने लगे।

सवाल है कहीं यह संघ की 2014 के लिये पहले से लिखी गई स्क्रिप्ट तो नहीं है। क्योंकि संघ राजनीति से दूर है, लेकिन बीजेपी के लिये राजनीतिक रास्ता नरेन्द्र मोदी के जरीये संघ बनाने में लगा है। बीजेपी राजनीतिक तौर पर सक्रिय है लेकिन उसे संघ के प्रचारक संजय जोशी के राजनीतिक तरीके भा रहे हैं। और इस खेल में 2014 की बिछती बिसात पर बीजेपी और संघ ही कुछ इस तरह आमने सामने आ खड़े हुये हैं ,जिसमें संघ के भीतर से लकर बीजेपी तक में हर कद्दवर नेता और वैचारिक मुद्दों का चाल, चरित्र, चेहरा बदल रहा है। संघ का मुखपत्र राजनीतिक लकीर खींचना चाहता है तो बीजेपी का कमल संदेश संघ के सामाजिक शुद्दिकरण के विचार फैलाना चाहता है। असल में यह मोदी और संजय जोशी को लेकर इतिहास का ऐसा दोहराव है जहां सरसंघचालक मोहन भागवत राजनीति की धार पर चलने को तैयार है और बीजेपी अध्यक्ष नीतिन गडकरी अपनी खातिर नतमस्तक है। याद कीजिये दस बरस पहले जब नरेन्द्र मोदी गुजरात में हिन्दुत्व की प्रयोगशाला में राजघर्म स्वाहा कर रहे थे तब दिल्ली के संघ मुख्यालय में सरसंघचालक कुप्प सी सुदर्शन गर्व से सीना तान कर मोदी की पीठ थपथपा रहे थे। और चौदह बरस पहले जब संजय जोशी संघ के प्रचारक के तौर पर हिन्दुत्व के नाम पर बीजेपी के संगठन को गुजरात में मजबूत कर रहे थे तब दिल्ली में अटल बिहारी वाजपेयी गर्व से सीना चौड़ा किये हुये थे। 1998 में बीजेपी को इसका एहसास हो चला था कि अगर संजय जोशी सरीखे प्रचारक जुट जायें तो बीजेपी के लिये सियासी रास्ता खुद ब खुद बन जायेगा। वहीं 2002 में आरएसएस को इसका एहसास हो चला था कि अगर नरेन्द्र मोदी सरीखे नेता के हाथ में बीजेपी की कमान आ जाये तो संघ के विस्तार का रास्ता खुद ब खुद बनता चला जायेगा। इसलिये वाजपेयी के राजधर्म के पाठ को संघ ने चंद दिनों बाद ही यह जानते समझते हुये खारिज कर दिया कि इससे प्रधानमंत्री वाजपेयी का कद घटेगा। बीजेपी की साख घटेगी। और बीजेपी की सियासी समझ पर मोदी का दाग गहरा हो जायेगा। और यह दाग बीजेपी की संसदीय राजनीति में आरएसएस के होने का एहसास करायेगा। लेकिन इसी दौर में आरएसएस ने गोविन्दाचार्य का कद छोटा कर स्वयंसेवक वाजपेयी को महत्ता भी दी थी। और संयोग देखिये एक दशक बाद गोविन्दाचार्य की तर्ज पर संजय जोशी को संघ ने ही दरकिनार किया। और मोदी को वाजपेयी की तर्ज पर स्थापित करने की सोच भी पाल ली।  2002 में वाजपेयी मुखर हुये थे तो लालकृष्ण आडवाणी खामोश थे। और आडवाणी की मोदी को लेकर हर खामोशी ने उन्हे मोदी का गुरु बना दिया। लेकिन दस बरस बाद जब मोदी की हुकांर के सामने बीजेपी अध्यक्ष खामोश हो गये और संघ मोदी के पीछे खड़ा हो गया तो आडवाणी को दस बरस पहले के वाजपेयी के तर्ज पर मुखर होना पड़ा। तो क्या आरएसएस जानबूझकर मोदी को बीजेपी की राजनीति के केन्द्र में ले कर आयी। जिससे आडवाणी की अगुवाई करने की लीला टूटे। और जब शिष्य मोदी ही सामने खड़े होंगे तो आडवाणी कुछ नहीं बोलेंगे। और आडवाणी ने जानबूझकर संजय जोशी के पक्ष में हवा बनायी। हो जो भी लेकिन इस प्रकरण ने राजनीतिक तौर पर 2014 को लेकर संघ और बीजेपी के भीतर की सोच के अंतर को ना सिर्फ सतह पर ला दिया बल्कि रणनीति के फर्क को भी साफ कर दिया।

दिल्ली में बीजेपी के कद्दावर नेता 2014 के लिये जिस राजनीति को देख रहे है उसमे उनके सामने तीन सवाल ही है। पहला, कई मोर्चे पर विफल होती मनमोहन सरकार की कमजोरी का लाभ उठाना। दूसरा, मंदी की तरफ बढ़ते देश के सामने अर्थव्यवस्था का नया खाका रखना। और तीसरा, वोट के गुणा-भाग से एनडीए के पक्ष में ढाई से तीन करोड ज्यादा वोट लेकर आना। क्योंकि 2009 में बीजेपी को साढे आठ करोड़ वोट मिले जबकि कांग्रेस को साढे ग्यारह करोड़। और कुल 29 करोड वोट ही पड़े। यानी बीजेपी की रणनीति के केन्द्र में फेल होती मौजूदा सरकार से लाभ उठाने के लिये वोट की ही जोड़-तोड़ है। क्योंकि 2014 के मंदी के घनघोर बादलों का सामना बीजेपी कैसे करेगी इसकी कोई वैकल्पिक सोच अभी तक तो बीजेपी ने जतलायी-दिखायी नहीं है। खासकर बाजार अर्थव्यवस्था से इतर उत्पादन के जरीये भी अर्थव्यवस्था काबू में रखी जा सकती है इसको लेकर कोई समझ अभी तक बीजेपी के जरीये सामने आयी नहीं है। यानी दिल्ली में बीजेपी के कद्दावर नेताओ के सामने 2009 वाला मंत्र ही 2014 तक मजबूत होकर काम करेगा। लेकिन सरसंघचालक मोहनभागवत की समझ को परखे तो तीन महिने पहले नागपुर में आरएसएस की कार्यकारिणी में जिस तरह
2014 के लिय राजनीतिक योजना बनाने की बात कही गई वह हेडगेवार, देवरस और रज्जू भईया के राजनीतिक प्रयोग की लकीर को ही आगे बढ़ाती नजर आती है। यानी संघ भी तीन स्तर रणनीति बना रहा है। लेकिन संघ की रणनीति बीजेपी से बिलकुल जुदा है। संघ राजनीति के केन्द्र में मनमोहन सरकार को नहीं
आरएसएस के राष्ट्रवाद को रखना चाहता है। मंहगाई और भ्रष्टाचार सरीखे मुद्दो के जरीये स्वदेशी की सोच को उभार कर बाजारवाद की थ्योरी को खारिज करना चाहता है। किसान और विकास में तालमेल बैठाते हुये एक वैसे चेहरे को सामने लाना चाहता है, जिसके जरीये बहुसंख्यक हिन्दू समाज और राष्ट्रवाद झलके। इस लकीर को खींचने में नरेन्द्र मोदी से ज्यादा बेहतर चेहरा संघ के पास कोई दूसरा इसलिये नहीं है क्योकि मोदी की उग्र हिन्दुत्व की छवि तोड कर राष्ट्रवादी मोदी की छवि बनाने में उसे सिर्फ हिन्दुत्व की एक नयी छवि ही गढ़नी है। बाकि काम तो मोदी का अपना काम ही करेगा। क्योंकि संघ को लगने लगा है कि मध्यम वर्ग से लेकर कारपोरेट तबका और हिन्दु समाज से लेकर मुनाफा बनाने में जुटा मुसलिम तबके को भी नरेन्द्र मोदी से कोई गिला शिकवा नहीं है। खास बात यह भी है कि सरसंघचालक का नजरिया बीजेपी के साथ खड़े राजनीतिक दलों को लेकर भी राजनीतिक तौर पर बेहद साफ है।

संघ का मानना है कि जातीय और क्षेत्रीय वोट बैंक के आसरे राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित तो किया जा सकता है लेकिन उसकी अगुवाई नहीं की जा सकती है। ऐसे में अगर बीजेपी राष्ट्रीय राजनीति की अगुवाई राष्ट्रवाद के नाम पर करती है और जनमानस उसे मान्यता देता है तो क्षेत्रीय दलों को भी अपने वोट बैंक के कवच से बाहर आना होगा। खास बात यह भी है कि पहली बार सरसंघचालक की राजनीति में जाति या धर्म का वोट बैंक मायने नहीं रख रहा है। यानि जिस हिन्दुत्व के कंघे पर सवार होकर बीजेपी नब्बे के दशक में चमकी इस बार संघ खुद ही हिन्दुत्व के वोट बैंक को खारिज कर राष्ट्रवाद के आसरे राष्ट्रीय राजनीति की अगुवाई ही बीजेपी के जरीये चाहता है। और अगुवाई की कमान दिल्ली में बैठे बीजेपी के नेता इसलिये नहीं थाम सकते क्योंकि कांग्रेस के बाजारवाद या आर्थिक सुधार को लेकर कोई अलग सोच डी-4 में नहीं है। जबकि पहली बार राष्ट्रवाद की भावना के पीछे मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियों का विरोध है। इसलिये रामदेव के कालेधन को लेकर आंदोलन हो या अणा हजारे का भ्रष्ट्राचार के खिलाफ आंदोलन, आरएसएस का मानना है कि दोनों ही आंदोलन मुद्दो से ज्यादा राष्ट्रवाद का संदेश दे रहे हैं। और राष्ट्रवाद की भावना से ही लोग देश भर में आंदोलन से जुड़ रहे हैं। जबकि इन्हीं मुद्दों पर बीजेपी के आंदोलन को उतनी सफलता इसलिये नहीं मिलती है क्योंकि संसद या सड़क पर विरोध करते हुये काग्रेस से इतर नजरिया बीजेपी का भी नहीं झलकता।

जाहिर है आरएसएस के लिये यहा बीजेपी का मतलब दिल्ली के नेता है और राष्ट्रवाद का मतलब नरेन्द्र मोदी को स्थापित करना। और ऐसे मोड़ पर अगर नरेन्द्र मोदी को लेकर बीजेपी चौसर बिछा लें और संजय जोशी को लेकर संघ शतरंज खेलने लगे तो एक संकेत तो साफ है कि 2014 जैसे जैसे नजदीक आयेगा वैसे वैसे मोदी का दायरा बढेगा और संजय जोशी का कद। क्योंकि राष्ट्रवाद का मुद्दा अगर राजनीतिक जमीन बना लें और संघ का राजनीतिक संगठन बीजेपी की सियसत को थाम लें तो संघ की स्क्रिप्ट बेहद साफ है कि कि मोदी और संजय जोशी एक वक्त के बाद एक साथ खड़े होकर उस बीजेपी को दरकिनार करेंगे जो ना तो संघ के स्वयंसेवकों की बची है और ना ही काग्रेस के लिये चुनौती है। और तो और ना ही सत्ता में लौटने का माद्दा रखती है। ऐसे में जनसंघ के बाद बीजेपी को बनते-उठते देखने वाले 2014 तक बीजेपी के उस ट्रासंफारमेशन को भी देखेंगे जहां संघ गैर राजनीतिक होकर भी राजनीति की बिसात बिछायेगा और महंगाई, कालेधन, विदेशी निवेश से लेकर पूंजी के कारपोरेटीकरण का मुद्दा राष्ट्रवाद से टकरायेगा। मुश्किल यह है कि नागपुर से आरएसएस को लगता है ऐसा ही होगा। लेकिन दिल्ली से बीजेपी को लगता है ऐसा हो नहीं सकता
क्योंकि राष्ट्रवाद की परिभाषा बदल चुकी है। इसीलये अब सवाल सिर्फ नरेन्द्र मोदी है कि वह 2014 के लिये कौन सी परिभाषा गढ़ते हैं।


5 comments:

anoop joshi said...

Sir samay ke saath saath natikta ki parbhasha bhi badal jaati hai sayad,

nimeshchandra said...
This comment has been removed by the author.
Suresh Kumar said...

ap kamal ka likhte ho

Suresh Kumar said...

ap kamal ka likhte ho

Sorabh Chadha said...

NDA fir eitni asmanjish mein kion hia ..Wo kon si ran neeti mein laga hua hia..Kia eis daav peech se NDA nikal payega