Wednesday, October 31, 2012

राहुल गांधी का रास्ता क्या होगा?


जिस शख्स की पहचान कतार में खड़े होने की जगह कतार को अपने पीछे खड़े करने की हो,वह शख्स मनमोहन सिंह के मंत्रियों की कतार में कैसे खड़ा हो सकता है। लेकिन उस शख्स का अपना रास्ता क्या होगा। जो शख्स एक वक्त राजनीति को खुली मंडी में तब्दील करना चाहता हो और पारंपरिक या खांटी राजनेताओं के चंगुल से कांग्रेस को मुक्त कराकर युवाओं के हाथ में कांग्रेस का हाथ मजबूत होते हुये देखना चाहता हो। उस शख्स का रास्ता अब क्या होगा?

जो शख्स किसानी राजनीति के जरीये काग्रेस की पहचान लौटाने में भरोसा करता रहा और नेहरु से लेकर राजीव गांधी तक के मिश्रित अर्थव्यवस्था को ही देश की अर्थव्यवस्था की नब्ज मानकर संगठन में भाषण देता रहा, उस शख्स का रास्ता अब किस तरफ जायेगा। यह ऐसे सवाल है जिसे राहुल गांधी ने उठाया और अब यही राहुल गांधी के सामने आ खड़े हुये हैं। और बड़ा सवाल यह हो चला है कि आखिरी राहुल गांधी का रास्ता होगा क्या। राहुल गांधी कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष बन सकते है। लेकिन यह सिर्फ एक पद है। और पद राहुल गांधी की मजबूरी नहीं है। राहुल गांधी कांग्रेस संगठन को मथने का समूचा दारोमदार उठा सकते हैं। राहुल गांधी हारे हुये राज्यों में कांग्रेस के अनुकुल समीकरण बनाने में व्यवस्त हो सकते हैं। लेकिन यह सिर्फ जिम्मेदारी का एक भाव है। और राहुल गांधी कांग्रेस के महासचिव होकर भी हर पद, हर जिम्मेदारी से ऊपर रहे है। तो सवाल है कि जो रास्ता राहुल गांधी को अपने लिये बताना-दिखाना है, उसकी जरुरत आज क्यों महसूस की जा रही है। क्या गांधी परिवार अनुपयोगी लगने लगा है। या फिर कांग्रेस की सरकार होकर भी कांग्रेस की नीतियों वाली सरकार लगती नहीं है। या मनमोहन सिंह ने आर्थिक जीवन की एक ऐसी बड़ी लकीर खींच दी है, जिसके सामने पहली बार सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक सरोकार भी छोटे हो चले हैं। और संयोग से कांग्रेस की राजनीति नेहरु से लेकर राजीव गांधी तक के दौर में कभी आर्थिक मंत्र के आसरे नहीं चली। औघौगिकीकरण का सवाल नेहरु ने खेती को तरजीह देते हुये उठाया।

किसान परिवार ही नहीं वरन खेती से जुड़े मजदूर और समाज को भी नेहरु ने बराबर की महत्ता दी। इंदिरा गांधी और राजीव गांधी भी कांग्रेस की राजनीति के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन शौली को महत्व देते रहे। पूंजी के आसरे राजनीति को ढालने का प्रयास कभी हुआ नहीं। तो चुनावी संघर्ष का हर मैदान कांग्रेसी राजनीति को समाजिक जीवन से जोड़े भी रहा और कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक के सवालो का समाधान भी राजनीति के रास्ते ही मांगा गया । यहां तक की मंडल कमीशन लागू होने के बाद भी कांग्रेस के सामने पिछड़े या अगड़ों या फिर अति पिछड़ों से लेकर अगड़ों में गरीब का सवाल भी सामाजिक सरोकार को लेकर ही उठा और उसके राजनीतिक रास्ते निकालने के लिये कांग्रेस के खांटी नेताओं ने भरसक माथापच्ची की। कांग्रेस के कई राष्ट्रीय अधिवेशन इसी सरोकार को टोटलने पर स्वाहा हुये। मगर राजनीतिक के केन्द्र में सामाजिक जुड़ाव बना रहा। और शायद यही पूंजी राहुल गांधी के पास है। इसीलिये वह विदर्भ के किसानों की मजबूरियों को समझने के लिये पी साईनाथ सरीखे पत्रकार को साथ ले जाने से नही हिचकते जो लगातार अपनी रिपोर्टों से मनमोहन सिंह के उस आर्थिक मंत्र की मुखालफत करता है, जो आर्थिक विकास किसानों को लगातार खुदकुशी करने को मजबूर करता है। राहुल गांधी महज पिकनिक के मूड मिलिबैंड के साथ दलित के घर रात का भोजन नहीं करते। राहुल गांधी कांग्रेसी युवाओं की ट्रेनिंग को वर्धा में गांधी आश्रम से जोड़कर सिर्फ परंपराओं को जिन्दा रखने की नही सोचते। बल्कि मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में लाचार होते सामाजिक सरोकारों को कांग्रेस के अनुकुल बनाने का संघर्ष करते हुये लगते है । या फिर बदलती सामाजिक परिस्थितियों में राजनीतिक सरोकार को बनाये रखने की कांग्रेसी लाचारी का प्रतीक बन कर उभरते है, जो मनमोहन सिंह के आर्थिक मंत्र में गुम होती जा रही है। जाहिर है यह परिस्थितियां बताती है मनमोहन सिंह का दौर कांग्रेस की राजनीति को ही टक्कर दे रहा है। यानी पहली बार कांग्रेस की राजनीति से इतर काग्रेस की सरकार की नीतियां एकदम नयी राजनीति बिसात बना चुकी है। जहां सामाजिक सरोकार बेमानी हैं। जहां सांस्कृतिक समझ घाटे का सौदा है। जहां कांग्रेस की पारंपरिक राजनीतिक चकाचौंध खोकर अंधेरे में जाने का प्रतीक है। ऐसे में अब सवाल साफ है कि क्या कांग्रेस मनमोहन सरकार के पीछे चलने को अभिशप्त हो चुकी है। क्या मनमोहन सिंह आर्थिक नीतियां ही काग्रेसी राजनीति का मंत्र बन चुकी है। क्या खुली बाजार अर्थव्यवस्था में ज्यादा से ज्यादा मुनाफा बनाने का ठेका पाना ही कांग्रेसी राजनेताओं की जरुरत है। तो फिर राहुल गांधी का रास्ता जाता किधर है। क्या राहुल गांधी कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष बनकर मनमोहन सिंह के उस बाजार मिथ को तोड़ सकते है जो संयोग से चुनाव लड़ने और जीतने तक का बड़ा हथियार बन चुका है। क्या राहुल गांधी कांग्रेस को उस आर्थिक मंत्र से आगे ले जा कर भारतीय समाज को मथने के लिये तैयार कर सकते हैं, जो मनमोहन सिंह के आर्थिक बिसात पर प्यादा बनकर हांफ रहा है। क्या राहुल गांधी वाकई कांग्रेस को पहली बार उस सामाजिक सरोकार का पाठ पढ़ा पाने की तैयारी में है, जहां सत्ता खोकर कांग्रेस को दोबारा खड़ा किया जा सके। या फिर सत्ता पाने के लिये नये समीकरणों के आसरे ही कांग्रेस संगठन को मिश्रित राजनीतिक घोल बनाने की तैयारी में है। जहां मनमोहन सरकार में पांच युवाओं को स्वतंत्र प्रभार देना राहुल का पहला रास्ता मान लिया जाये।

दूसरी तरफ हरियाणा में जाट सीएम तो गैर जाट प्रदेश अध्यक्ष का प्रयोग हो। उडीसा में श्रीकांत जेना। झारखंड में सुबोधकांत सहाय के जरीये कांग्रेस को परखा जाये। इसी तरह उत्तराखंड,महाराष्ट्र और पंजाब में कांग्रेस की अगुवाई के लिये प्रदेश अध्यक्ष का नया चेहरा देकर नया जोश पैदा किया जाये। यह हो सकता है और राहुल गांधी इस दिशा में बढ़ सकते हैं। लेकिन राहुल गांधी का यह रास्ता भी मनमोहन सिंह के आर्थिक मंत्र के पीछे चलने वाला ही होगा। सरकार की नीतियां अगर सरोकार खत्म कर आर्थिक मुनाफे पर आ टिकी हैं तो राहुल गांधी के सहमति भरे समीकरण भी पहले मुनाफा देखेंगे, बाद में समाजिक जरुरतें । यानी राहुल बिग्रेड चाहे वो मंत्रिमंडल से बाहर निकल कांग्रेस संगठन को मथने के लिये तैयार हो या फिर वर्धा के गांधी आश्रम में गोबर लीप कर महात्मा गांधी के विचारों से ओत-प्रोत होकर राजनीति के मैदान में कूदे, दोनों ही स्तर पर समाज की जरुरतें राजनीतिक सत्ता पाने के हथकंडों के पीछे चलेंगी ही। और सत्ता मुनाफा पाने से हिचकिचायेगी नहीं। तो फिर सवाल उठेंगे ही कि राहुल गांधी का रास्ता उस हांफते और गुस्से से भरे भारत को कांग्रेस से जोड़ने वाला क्या नहीं बन सकता जो मनमोहन सिंह की बिसात पर अपाहिज होकर सत्ता के दो टूक निर्णयो तले कुचला जा रहा है। यह रोमानी भी हो सकता है और धोखा भी कहला सकता है कि मनमोहन सिंह के आर्थिक मंत्र के खिलाफ राहुल कांग्रेस को खड़ा कर दें क्योंकि राहुल की जरुरत कांग्रेस को भी तभी है जब यह मान लिया जाये कि मनमोहन सरकार की नीतियों तले कांग्रेस की साख को बट्टा लगा या फिर मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री होकर भी कांग्रेस की राजनीतिक धुरी नहीं बन सकते। लेकिन राहुल गांधी ऐसा मानेंगे और कांग्रेस को खड़ा करने के लिये सत्ता के बदले पहली बार समाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक जरुरतो को मथेंगे, जिससे 2014 नहीं तो 2019 तक भी देश नागरिकों को सम्मान दे पायेगा।  क्या राहुल गांधी अब मनमोहन सरकार को कांग्रेस के पीछे चलने की दिशा दिखा सकते हैं। क्या राहुल गांधी काग्रेस के आम आदमी के नारे से सरकार के खास लोगो की नीतियों को मुक्त कर सकते हैं। या फिर पहली बार गांधी परिवार की राजनीति हर सत्ताधारी में कांग्रेसी मनमोहन सिंह को देखेंगी और भविष्य के कांग्रेस की घुरी राहुल गांधी नहीं मुनाफा बनाना और पाना होगा। जिसमें आज काग्रेस के मनमोहन सिंह फिट है कल कोई दूसरा मनमोहन होगा। तो इंतजार कीजिये राहुल गांधी के नये रास्ते का।

4 comments:

bahujanshakti said...

यही तो मुश्किल है राहुल की , कि वो अपनी दादी की राह चले या अपने पिता राजीव की या फिर अपनी माँ सोनिआ की, क्योंकि "अपना तो कुछ है ही नहीं" सिवाए "विरासत की हैसीयत" के !

kuldeep sharma
beemapanditmrt@gmail.com

Amrit Kumar said...

राहुल क्‍या कर सकते हैँ यह तो बाद मैं दिखेगा, पर सँगठन मैं वो जो कर रहै है वह दिख रहा है...

kamlakar said...

राहुल राजनैतिक विरासत को भी नहि ढो पा रहे है और ना ही संगठन को थाम पा रहे है उनको तो ये भी नहि पता की वो करना क्या चाहते है, राजनैतिक विरासत सम्हाले की पारिवारिक विरासत या संगठन को ये तीन ही केंद्र है राहुल के जीवन में और इन केन्द्रों में ना तो तालमेल है और ना पकड़, राहुल १२ वी पास उस बच्चे की तरह है की जिन्हें ये नहि पता की उन्हें किस संकाय से आंगे की पढाई करनी है या ऐसा कौन सा काम किया जाये की जीवन के सारे सोपान मिल जाये, अनिर्णय और अनिच्छा के साथ साथ कांग्रेस की विरासत को किस और धकेला जाये की जनता का आत्मविश्वाश उनके साथ हो सके, इसकी कोशिस भी की है राहुल ने लेकिन कही ना कही जमीनी हकीकत से दूर रहकर, लगभग ५ वर्षो से ऊपर होने को आये होगा राहुल को सक्रीय राजनीती में कदम रखे हुए मगर देश के सामने कुछ ऐसे मौके आये है की उनको देश सुनना चाहता था उनका स्वयं का क्या मत है मगर राहुल हमेशा ही उन मौको में नदारत नजर आये, आप सत्ता पर या संगठन में चाहे जिसे बैठा दे लेकिन जनता के बीच तो आपको आना ही पडेगा इसलिये की जनता ही आपको उस सिहासन तक पहुचती है और इस जमीनी हकीकत से राहुल अभी बहुत दूर है क्योकि राहुल का आत्मविश्वाश उनके सहयोगी है और यही सहयोगी इनकी अज्यानता का लाभ उठा रहे है और राहुल की यह अज्यानता देश को बोरने में लगी हुई है जो देश को तो बाद में बोरेगी पहिले उस कांग्रेसी विरासत को डुबो देगी जो इन्हें किसी के सामने खड़ा होने लायक भी ना रखेगी.

अमित भारतीय said...

राहुल, जवाहर लाल नेहरु या इन्दिरा जी के समाजवाद को अगर आगे बढ़ाना चाहते हैँ तो वे किस बात का इन्तजार कर रहे हैँ?
अगर मनमोहन सिँह उनके इस रास्ते मेँ बाधा हैँ, तो फिर सोनिया क्या कर रही हैँ?
अन्ततः मुझे नहीँ लगता राहुल को इतने गूढ़ विषयोँ की समझ होगी...