Wednesday, June 5, 2013

रेडकॉरिडोर का सफर-3

जंगल गांव बदल गये युद्द क्षेत्र में

सरकार अलग,  सुरक्षाकर्मियो की गाड़ी अलग, जायका अलग और राज्य अलग लेकिन कुछ अलग नहीं तो लाल निशान और बंदूकों को थामे हाथों का रवैया। आध्रप्रदेश से छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ से उड़ीसा की जमीन पर कदम रखने के लिये सिर्फ पांच कदम ही चलने पडते हैं और हर कदम के बाद सबकुछ बदल जाता है। लेकिन नक्सल नाम लेते ही आंध्र प्रदेश हो या छत्तीसगढ़ या उडीसा का सीमावर्ती इलाका सभी अपनी अपनी भाषा में लाल सलाम करते ही नजर आते हैं और नक्सल हो या सुरक्षाकर्मियों की फौज [यह कभी अकेले या दो - चार के गुट में नहीं होते] राज्यों की सीमाओं के खत्म होने या राज्य की सीमा शुरु होने के बाद भी एक सरीखे नजर आते हैं। चेट्टि गांव की सीमा पर सुबह सुबह गरम गरम इडली और मिठे बौंडा का नाश्ता हो या कोण्टा में कदम रखते ही झाल-मुरी की भुंजा। या उडीसा की सीमा पर नीरा पिलाने और पीते लोगों की ग्रुप। पग पग बदलते रंगों के बीच हर कोई जानता है कि उनकी जमीन से सिर्फ 35 किलोमीटर [सड़क के रास्ते यह दूरी 125 किलोमीटर की है] की दूरी पर दरभा में राजनेताओं के निशाना बनाया गया और उसके बाद कांग्रेस और बीजेपी की राजनीतिक लड़ाई शुरु हो चुकी है। यानी राजनेता आपस में सत्ता के लिये झगड़ते हैं। तो दादा लोग यानी नक्सली अपनी धून में संघर्ष करते हैं। कोई नक्सली संघर्ष या खूनी लड़ाई को खत्म करने खड़ा नहीं होता। छत्तीसगढ़ में झाल-मूरी बेचने वाले के लिये नक्सली दादा है और आंध्रप्रदेश में इडली बेचने वाले के लिये नक्सली अन्ना है। और कोण्टा या चेट्टि गांव में खडे हो जाइये उनके बीच का लगने लगीये तो वह सियासत के हर ककहरे को खोल कर रख देते हैं। आंध्रप्रदेश में कभी एनटीआर ने नक्सली को अन्ना कहकर फुसलाया तो छत्तीसगढ में रमन सिंह ने नक्सलियो के खिलाफ बंदूक उठाकर अपनी सियासत साधी। कैसे। यह आप दरभा घटना के ढाई हफ्ते पहले 7 मई को कोण्टा में रमन सिंह की राजनीतिक सभा से समझ सकते हैं। कोण्टा में रमन सिंह हेलिकाप्टर से पहुंचे। अगर चाहते तो सुरक्षा के कड़े घेरे में सडक के रास्ते पहुंच सकते थे। हेलीकॉप्टर ग्रीन हंट और सीआरपीएफ कैप में बने हेलिकाप्टर के स्थायी हेलीपैड पर उतरा। हेलीपैड से महज तीन किलोमीटर दूर रमन सिंह की सभा हुई। उसके बाद हेलिकाप्टर से उड़ गये। यानी दरभा घाटी में सुरक्षाकर्मियो की गैर मौजूदगी को लेकर जो रोना कांग्रेसी रो रहे हैं और रमन सिंह पर आरोप लगा रहे हैं, सच वह भी जानते हैं कि बीजापुर-दंतेवाडा से लेकर जगदलपुर-घमतरी तक हालात ऐसे हैं, जहां सड़क के दोनों तरफ जंगल तो है लेकिन जंगल गांव से कोई ताल्लुकात किसी सत्ता का नहीं रहा है और जो चुनाव एक वक्त ग्रामीण-आदिवासियों में उल्लास पैदा करता था वह चुनाव अब घृणा पैदा करने लगा है। क्योंकि चुनाव का मतलब है सौदेबाजी और वह भी ग्रामीण-आदिवासियों के नाम पर। अगर यह सवाल छत्तीसगढ़ के छोटे से किराना दुकान चलाने वाले का है तो छत्तीसगढ की सीमा से सटे आंध्रप्रदेश के चेट्टि गांव में इडली बेचने
वाला और सीधा समझा देता है। जब नकसली संगठन पीपुल्स वार ग्रूप बना तब तेंदू पत्ता को लेकर संघर्ष शुरु हुआ। 1980-84 में तेदूपत्ता तीन रुपये में पच्चतर बंडल खरीदा-बेचा जाता था। 2004 में यह 15 रुपये हुआ। और अभी 25 रुपये पहुचा है। लेकिन नक्सल प्रभावित इलाकों में यह तीन रुपये [80-84] से बढ़कर बारह रुपये फिर पच्चीस रुपये [92-95], उसके बाद पचपन रुपये [2004] और अभी 75 [2012 ] रुपये बेचा जा रहा है। यानी नक्सली ना होते तो तेदूपत्ता चुनते-सुखाते हुये उम्र गुजार देने वाले आदिवासियों को मजदूरी भी नही मिलती। संयोग देखिये दरभा घटना के बाद तेदूपत्ता की कीमत में पांच रुपये की वृद्दि हो गई। यानी अब सौ तेदूपत्ता के 75 बंडल की कीमत 80 से 82 रुपये तक लग रही है। यह छत्तीसगढ में कोण्टा से सुकुमा तक के सफर में कई जगहों पर पर खेत में सुखाते तेंदु पत्ता की खरीद-फरोख्त के दैरान मोल भाव में हमने देखा।

महत्वपूर्ण यह भी है कि राजनेताओं की हत्या के बाद चाहे सियासत गर्म हो, चाहे सुरक्षाकर्मियों की तादाद लगातार बढ़ रही हो लेकिन दरभा की घटना के बाद दादाओं की बढ़ती ताकत का जिक्र कर तेदूपत्ता चुनने-सुखाने वाले गांव वाले खुले तौर पर ठेकेदारो से कह रहे हैं कि उनकी कीमत उन्हें दें नहीं तो वह दादाओ से कहेंगे। छोटे और मझौले ठेकेदार कितने डरे हुये हैं, यह पहली बार राजनेताओं पर हमले के बाद खुले तौर नजर भी आने लगा है क्योंकि खरीद के लिये पत्तो की बंडल की सौदेबाजी तो वह कर रहे है लेकिन मांगी गई कीमत पर हर ठेकेदार खामोश हैं। कोण्टा में घुसते ही नजर अगर वहा की खूबसूरती पर टिकती है तो दूसरी तरफ सुरक्षाकर्मियों के अत्याधुनिक कैंप को देखकर भी एक क्षण लगता है जैसे हम कश्मीर या करगिल सीमा पर पहुंच गये। क्योंकि तार की बाड और हरे रंग जाल से तो कैंप की घेराबंदी नजर आती ही है। चारो तरफ तीस से चालीस फुट ऊंचे पहरेदारी के लिये बनाये गये मंच भी नजर आते हैं। आंखों में दूरबीन और कंधे या बोरियों के सहारे बंदूक से सटे जवान पहरा कुछ इस तरह देते खुले तौर पर दिखायी देते है जो झटके में भ्रम पैदा करता है कि कही हम युद्द स्थल या देश की सीमा पर तो नहीं पहुंच गये। दुरबीन के निशाने पर शबरी नदी है ।
शबरी नदी असल में छत्तीसगढ और उडीसा के बीच बहती है। जो नक्सलियों के राज्य बदलने का सबसे सुगम और सुनहरा रास्ता है। और दरभा घटना के बाद माना यही गया कि नक्सली शबरी नदी पार कर उडीसा के मलकानगिरी जिले में चले गये और दोनो राज्यो के बीच कोई संवाद की स्थिति है नहीं तो सिवाय दुरबीन से देखने के अलावे और कोई काम कैंप लगाकर बरसों बरस से बैठे सुरक्षाकर्मी कर भी नही पाते है। और 7 मई को जब कोण्टा में रमन सिंह का हेलीकाप्टर उतरा तो गाववाले अब यह कहने से नहीं थकते की पुलिस कैप तो मुखयमंत्री ने अपनी रईसी सुरक्षा के लिये लगाये हैं। क्योंकि जब रमन सिंह आये उस दिन सारी रक्षावयवस्था कोण्टा में ही सिमट गयी। खैर शबरी नदी की खूबसुरती देखकर हम भी ऐसे पिघले की हमले तय किया थकान मिटाने के लिये शबरी नदी में ही नहाया जाये। बेहद मीठा पानी। निर्मल जल। जंगल के बीच चिड़ियों के चहचहाने  के बीच 29 मई को सुबह साढे नौ बजे से लेकर साढे दस बजे तक हम नदी में ही बैठे रह गये। थकान मिट गयी। नहाने से पहले ड्राइवर ने कहा कि साबुन मत लगाइयेगा। पानी गंदा हो जायेगा। नदी का पानी ही यहा जीवन है। वाकई सिर्फ पानी की धारा के बीच सुरक्षाकर्मियों की दुरबीन तले हम घंटों नहाये। अच्छा लगा। बाहर निकले तो और गाव की आबादी की तरफ बढे तो गांववालो ने बताया कि आगे की सरकार दादा लोगों की ही है। यानी नक्सलियों की सामांनातर सरकार। सुकमा से कुछ पहले हमले चितलनार की तरफ जाने को बढे तो रास्ते में कई छोटे छोटे गाव ऐसे मिले जहा खेती नहीं के बराबर थी । बासं की टोकरी या बांस से बनायी जाने वाले सामानो को वहा बुजुर्ग आदिवासी बना रहे थे । करीब 20 किलोमीटर के पैच में कही सरकार का कोई आभास था तो वह वन विभाग के लगे बोर्ड थे। जो बताते थे कि हम जंगल में है और जंगल में पेड को काटना सबसे बडा अपराध है। लेकिन जगह जगह कटे पेड़ों की तादाद लगातार इसका एहसास करा रही थी कि हर दिन पेड़ काटे जा रहे हैं। खासकर सागवान के पेड़। सागवन के पेड को काटकर अगर कोई नदी में डल देता है तो पेड़ बहते हुये नदी के पार पहुंच जाता है। यानी एक राज्य से दूसरे राज्य में और छत्तीसगढ हो या महाराष्ट्र दोनों राज्यों की सीमाओं पर नक्सल प्रभावित इलाको में ही पेड़ कटे हुये दिखायी देने लगे है। जबकि जहां नक्सल प्रभाव कम है या नहीं है वहां तो बल्लारशाह पेपर मिल को किलो के भाव से वन विभाग की पेड़ काट कर सप्लाई करता है। और उन इलाकों में पेड़ जमीन या कहे जड़ से काटे जाते है। जिससे पते ही नहीं चलता कि यहां पेड़ भी था। सिर्फ जमीन साफ होती चली जाती है। खैर नक्सल प्रभावित इलाकों में पेड़ काट कर नदी में डालने पर ग्रामीणों को एक पेड़ का तीन सौ रुपया मिलता है और पेड़ कटवाने से लेकर नदी में डलवाने वालो में पहले राज्य पार के माफिया थे अब यह ट्रेनिग गांव वालों को ही दे दी गयी है। नक्सल इसे रोक नहीं पा रहे हैं। क्योंकि यह गांववालों के अर्थव्यवस्था का नया आधार हो गया है और कमोवेश हफ्ते भर में दो पेड़ कटते है। नक्सलियों की माने तो वन विभाग के माफिया खुद हर दिन दो से चार पेड़ काटते हैं। ऐसे में कम से कम उनके प्रबावित इलाको में तो पेड़ बहुत ही कम कट रहे हैं।

लेकिन वासागौंडा, जगरगौंडा, चितलनार ऐसी जगह हैं, जहां बीडीओ, पटवारी या तहसीलदार की नहीं चलती। यहां नक्सली कमांडर की चलती है। और गांव में खेती से लेकर घर बनाने की जो जमीन गांववालों के पास है उसे सरकारी नजरीये से समझे तो वन विभाग की ही सारी जमीन है। लेकिन यहां जमीन के पट्टे कमांडर बांटता है। और कोई भी शिकायत हो उसके निपटारा ही कमांडर करता है। दरअसल यहां इन्द्रावती टाइगर प्रोजेक्ट के लिये नक्सलियो की स्पेशल प्लाटून भी है। सरकार इन्द्रवती टाइगर प्रोजेक्ट को राष्ट्रीय पार्क मानती है लेकिन इस घेरे में आये गांववालों की त्रासदी यह है कि वह प्रोजेक्ट की जमीन की भीतर एक पत्ता भी नहीं तोड़ सकते। नदी में मछली नहीं पकड़ सकते। अपने घर को नहीं बना सकते। तो ऐसे में नक्सलियों ने इन्द्रावती प्रोजेक्ट के नाम से ही विशेष प्लाटून बना कर इन आदिवासी बहुल इलाके में अपनी सामानांतर व्यवस्था बना ली है। जहां वन अधिकारी शाम ढलने की बाद जाने से घबराते हैं। लेकिन दरभा घटना के बाद पहली बार इस इलाके में भी एसटीएफ के जवान कंधे पर नयी नवेली बंदूक लगाये पहुंचे हैं। और एसटीएफ की जितनी बडी तादाद हमने बेमनी में देखी लगा वहा कोई आपरेशन हो रहा है। एसटीएफ के कमांडर से मिलने पर पता यही चला कि एसटीएफ की छह कंपनिया 28 मई को छत्तीसगढ़ पहुंच गई और अब खोजी अभियान शुर कर चुकी है। सुकमा की तरफ बढ़ते हुये हमने दो दर्जन बस और दर्जन भर ट्क-ट्रैक्टर में एसटीएफ के जवानों को आते देखा। ट्रक में जवान पानी की बड़ी बड़ी टंकिया भी लादे हुये थे। और साथ ही बख्तरबंद गाड़ी के साथ 50 के करीब मोटरसाइकिल पर भी एसटीएफ के जवान थे। हर मोटरसाइकिल से दो दो जवान कांधे पर बंदूक लटकाये और हर पांच मोटरसाइकिल के बीचे में एक मोटरसाइकिल पर लैंड माईन पकड़ने वाली मशीन के कर जाते दो दवान। और यह सिलसिला करीब एक लगातार में तीन किलोमीटर तक। यानी एसटीएफ एक साथ तीन किलोमीटर को अपनी जद में लेकर आगे बढ रही थी। जंगल -झाड के बीच एसटीएफ का तमगा लगाये जवानो की उम्र 20 से तीस के बीच थी। यूनिफार्म के नाम पर सिर्फ पेंट ही कमोवेश एक तरह की थी। बाकि गंजी से लेकर जूते और पानी की बोतल तक को देखकर लग रहा था कि अपने अपने घर से एसटीएफ जवान जूते-बोतल-गंजी लेकर चले है। क्योंकि प्लास्टिक की बोतल भी थी और बच्चों के स्कूल ले जाने वाली पानी की बोतल भी। गंजी सफेद भी थी। और रंग बिरंगी भी। कुछ जवान तो मोबाइल से बात करते
हुये मस्ती में जंगल में चल रहे थे। और इस अभियान में जो भी ग्रामीण-आदिवासी टकराता उसकी तालाशी लेकर उसे पकड़ने से जबान नहीं चुक रहे थे। तीन ग्रामीण आदिवासियों के पास से मोबाइल निकला तो एसटीएफ के कमांडर ने लात-घूसे जड़कर उसे बख्तरबंद गाडी में यह कहते हुये ढकेल कर बंद कर दिया कि यह नक्सलियों के सिग्नल दे रहा होगा। दो ग्रामीण आदिवासी महिलायें जंगल के बीचसे झोला उठाये आ रही थी तो जवानों ने दूर से ही उसे ऐसा डराना शुरु कर दिया कि महिला डर से वही बैठ गयी। लेकिन इस पूरी पहल में यह भी साफ लग रहा था कि एसटीएफ के जवान खुद कितने डरे हुये हैं और अपना डर कम करने के लिये शोर मचाते हुये आगे बढ़ रहे हैं। बीच बीच में नालों पर बने सीमेंट के छोटे छोटे पुलों के दोनो तरफ की सडक को भी जहां तहां नक्सलियों ने काट रखा था। उसे देखकर जवान दहशत में आते और कही कोई विस्फोटक तो नहीं है, इसे परखने में लंबा वक्त लगता। फिर खोजी अभियान आगे बढता ।यानी पूरा क्षेत्र ही जिस तरह बंदूक के साये में है ऐसे में यह सवाल पहली नजर में ही बेमानी लगता है कि देश के भीतर नागरिकों तक मुख्यधारा पहुंचाने या मुख्यधारा से उस कटी हुई धारा को कोई जोड़ने का प्रयास चल रहा है। युद्द क्षेत्र में तब्दील इस इलाके का दूसरा सच यह भी है कि कोई वैचारिक युद्द लड़ा जा रहा है ऐसा यहां बिलकुल नहीं लगता।

हां, एक दूसरे के खिलाफ आक्रोश और घृणा का भाव यहां जरुर नजर आया। एक तरफ सरकार की पूरी मशीनरी और दूसरी तरफ न्यूनतम की जुगाड़ में फंसे जंगल गांव के लोग। संवादहीनता की इस स्थिति का एक परिणाम भर है दरभा। 45 घंटे के सफर के बाद हम तो यही देख पाये।

7 comments:

rahul chouhan said...
This comment has been removed by the author.
rahul chouhan said...

very informative....thank you sir

सतीश कुमार चौहान said...

प्रसून जी, सवाल सिर्फ और सिर्फ इस इलाके के स्‍वास्‍‍थ और शिक्षा का हैं , हम राजधानी में बैठकर इस ईलाके के लिऐ जवान बढाने , हथियार बढाने की बात तो करते हैं पर बुनियादी सवाल पर राजनीति करके टाल जाते हैं,समस्‍या मोदी और रमन की है टांग अडा रहे मोदी है ...चुनाव सर पर हैं अगर सत्‍ता की मलाई खानी ही है तो करिऐ चुनाव घोषणा पत्र में करिऐ अपनी रणनीति का खुलासा बजाय एक दुसरे की मदद के .....

पुष्यमित्र said...

सर, लगता है गलती से मेरा कमेंट डिलीट हो गया है... आपके इन रिपोर्ताज से मैं काफी प्रभावित हूं. इस दौर में जब टीवी चैनलों के स्टूडियो की बहस को पत्रकारिता का पर्याय मान लिया गया है, ऐसे में आपका रेड कॉरिडोर के इलाके में जाकर वहां की खबर देना हम सबों के लिए प्रेरणादायी है...

ARUN SATHI said...

जमीन तक जाकर नक्सलियों की सच्चाई लेकर आए, साथ ही आदिवासियों की पिटने की बात भी।
एक साहसिक कदम जिसके दम पर पत्रकारित जिंदा है

chirag jain said...

सर आप जेसे पत्रकार से ही उम्मीद थी की आप जमीनी हकीकत का मुआयना करेंगे । जिंदादिल पत्रकारिता को सलाम ।

दीपक बाबा said...

पुष्यमित्र said...
इस दौर में जब टीवी चैनलों के स्टूडियो की बहस को पत्रकारिता का पर्याय मान लिया गया है,

ARUN SATHI said...
एक साहसिक कदम जिसके दम पर पत्रकारित जिंदा है

aapki report to kaabile tareef hai hee, in dono coments ko mera bhi maana jaaye.