Thursday, November 7, 2013

मौजूदा राजनीति में क्षत्रप कितना टिकेंगे ?


देश के पहले आम चुनाव में कमोवेश हर राजनीतिक दल ने चुनावी प्रचार में कहा कि कमजोर और हाशिये पर पड़ी जातियों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिये हरसंभव प्रयास करेंगे। यूं संविधान में भी इसकी व्यवस्था की गयी कि पहले 15 बरस तो पिछड़ी जातियो को विशेष सुविधा दी जायेगी लेकिन धीरे धीरे हाशिये पर पड़े लोगों को मुख्यधारा से जोड़ लिया जायेगा। यह 15 बरस बीते तो और 10 बरस विशेष सुविधा देने की बात हुई। लेकिन धीरे धीरे विशेष सुविधा देने की राजनीति सत्ता पाने का ऐसा अनूठा मंत्र बनते चला गया कि मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू होते ही राजनीतिक क्षत्रपों का उदय उसी चुनावी राजनीति से हो गया, जिसने वादा किया था कि पिछड़ी जातियों को मुख्यधारा में शामिल कर लिया जायेगा। सुविधा का मतलब आरक्षण से हुआ। और आरक्षण के जरिये मिलने वाली सुविधा पेट से जुड़ी है तो यह चुनाव में सबसे बडा हथियार के तौर पर उन राजनीतिक क्षत्रपों ने अपनाया जिनकी राजनीतिक जमीन ही जातियों के उस ताने बाने से बनी जो हाशिये पर पड़े रहने को ही मुख्यधारा में आने से कही ज्यादा महत्व देने लगी।

ऐसा ही कुछ मुस्लिमों के साथ हुआ। जिसका सच 2006 में सच्चर कमेटी की रिपोर्ट ने यह लिखकर देश को आइना दिखा दिया कि सामाजिक-आर्थिक तौर पर सबसे पिछडा देश का मुस्लिम समाज है। लेकिन यहां भी पिछड़ापन या सुविधा की खोज राजनीति का हथियार बना और पहले कांग्रेस तो उसके बाद जातियों में सिमटे क्षत्रप झटके में कुछ ऐसे मुस्लिम परस्त हुये कि अपनी खास जाति के साथ मुस्लिम गठबंधन ने सत्ता पाने और सत्ता बनाये रखना का अनूठा मंत्र हर किसी को दे दिया। तो "एम" यानी मुस्लिम फैक्टर चुनावी राजनीति का नायाब शब्द बन गया। ध्यान दें तो क्षत्रपों के विकास और मुख्यधारा में जोडने के नारे के साथ साथ इसी दौर में वर्ग संघर्ष का सवाल भी अमीर-गरीब के जरीये मार्क्सवादियों ने राजनीतिक तौर पर बाखूबी उभारा। और इस राजनीति का तोड़ निकला मनमोहन की इकनॉमिक्स तले। क्योंकि सवाल हाशिये पर पड़ी जातियों का हो या गरीबों का संघर्ष और सत्ता की मुनादी ने सत्ता पाने तक हर पांच बरस के दौरान इस वोट बैंक के दर्द को बाखूबी उभारा और उसमें रिसते घाव का बाखूबी इस्तेमाल भी किया। और चूंकि हर दर्द का इलाज या सुविधा का मंत्र पेट से जुड़ा रहा तो हर जाति को नुमाइन्दा भी मिला और उसने विकास की हर थ्योरी को न्यूनतम जरुरत के जुगाड़ से जोड़ा। जिसमें रोजगार से लेकर पैकेज और आर्थिक लाभ से लेकर मुफ्त योजना ही रही। लेकिन मनमोहन सिंह की खुली अर्थव्यवस्था ने झटके में तीन सच की जमीन बदल दी। पहला बाजार को जातिमु्क्त बना कर पेट को उस इक्नामिक्स से जोड़ दिया जो जाति पर निर्भर नहीं थी। दूसरा बाजार राजनीतिक गठबंधन से इतर मुनाफा बनाने की थ्योरी लेकर आया। यानी यादव - मुस्लिम गठबंधन किसी यादव को सत्ता तक तो पहुंचा सकते हैं लेकिन सत्ता की सुविधा जब विकास के कटोरे से निकलेगी तो हो सकता है खुली बाजार अर्थव्यवस्था में दोनो एक दूसरे से टकरायें। यानी यह कतई जरुरी रहा कि सत्ता दो जतियों के जोड़ से मिलती है तो सत्ता का लाभ भी दोनो जातियों को मिले या फिर जातियों के आधार पर मिले। और तीसरा कारपोरेट की सत्ता जातीय या धार्मिक वोटबैंक को आधार नहीं बनाती। यानी लोकतंत्र के पारंपरिक औजार चुनावी राजनीति के नये औजार के सामने भौथरे भी साबित हो रहे हैं। और कॉरपोरेट देश की पारंपरिक राजनीति को प्रभावित कर रही है। और संयोग से मौजूदा राजनीति इसी बिसात पर आ खड़ी हुई है। जिसमें पारंपरिक राजनीति और कारपोरेट सत्ता आमने सामने आ खड़ी हुई है। एक लिये नागरिक होना महत्वपूर्ण है तो दूसरे के लिये उपभोक्ता।

उपभोक्ता तो नागरिक है लेकिन नागरिक उपभोक्ता हो यह जरुरी है। और संयोग से नागरिक को लेकर सियासी मथना चलने वाले राजनीतिक दलों के सामने पहली बार संकट यह आया है कि वह राजनीतिक बिसात पर तो पांसा उलट-पुलट सकते हैं लेकिन कॉरपोरेट पूंजी से कैसे टकरा सकते हैं। वजह यही है कि नरेन्द्र मोदी बड़े खिलाडी के तौर क्यों नजर आ रहे हैं और पारंपरिक राजनीति करने वालो को अपनी जमीनी परिभाषा को ही क्यों बदलना पड़ रहा है, यह समझे इससे पहले राजनीतिक परंपरा की लकीर समझ लें। तो राजनीति की तीन धारा कांग्रेस, क्षत्रप और वामपंथी में सिमटी सियासत में चौथी धारा के तौर पर भाजपा सेंघ लगा पाने में कभी सफल हो नहीं पायी क्योंकि उसकी जननी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने हमेशा सामाजिक शुद्दीकरण की बात की। और शुद्दीकरण के दायरे में राजनीति के उन हथियारो को हमेशा प्रतिबंधित रखा जो सत्ता पाने के मंत्र थे। इसीलिये आरएसएस का पाठ पढ कर निकले स्वयंसेवक अटल बिहारी वाजपेयी हो या मौजूदा वक्त में लालकृष्ण आडवाणी दोनो ने संघ की नीतियों को एक वक्त के बाद राजनीतिक तौर पर मानने से इंकार कर दिया। अब जरा नरेन्द्र मोदी के पीएम पद के उम्मीदवार बनने से देश के राजनीतिक जमीनी सच को समझे। पहली बार संघ का स्वयंसेवक जो प्रधानमंत्री पद की दौड़ में है। वह हिन्दू राष्ट्रवाद की गूंज करता है लेकिन वह खुद अतिपिछड़ी जाति का है। यानी मंडल के दौर में बने क्षत्रपो के सामने पारंपरिक परेशानी यह है कि वह ऊंची और पिछडी जातियों के लेकर कोई लकीर मोदी को लेकर खिंच नहीं सकते हैं। क्योंकि तब जातीय समीकरण टूटने लगेंगे। वहीं वाम विचार भी मोदी को लेकर कमजोर पड़ेंगे क्योंकि नरेन्द्र मोदी खुद गरीबी से निकले हैं और चुनाव में गरीबी या अमीरी मुद्दा बनती है तो फिर मौजूदा वक्त में कमोवेश हर क्षत्रप करोड़पति और अरबपति हो चुका है। कांग्रेसी भी इस कतार में अव्वल हैं। तो जाहिर है निशाने पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ही आयेगा या संघ के संवयसेवक के तौर पर नरेन्द्र मोदी को लाया जायेगा। लेकिन कांग्रेस समेत तमाम राजनीतिक दल अगर सिर्फ यही बिसात बिछाते हैं तो उनके सामने क्या क्या मुश्किल आ सकती है यह नरेन्द्र मोदी को घेरने के लिये दिल्ली में एक दर्जन से ज्यादा राजनीतिक दलों के नुमाइन्दो के जुटने के हालात से समझा जा सकता है। जो यह मान रहे हैं कि अगर मनमोहनइक्नामिक्स से निकले मुद्दे महंगाई, घोटाले, कालाधन को खारिज कर फासीवाद और साप्रंदायिकता को मुद्दा ना बनाया गया तो राजनीतिक तौर पर हर किसी का सूपड़ा साफ हो जायेगा। तो पहली बार पीएम पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी का मतलब ही हिटलरवादी, फासीवादी या सांप्रदायिकता हो चला है। यानी नेताओं का जमघट अतीत के सच को नरेन्द्र मोदी के पीएम पद का उम्मीदवार बनते ही बदल रहा है। क्योंकि संघ परिवार या अयोध्याकांड के नायक आडवाणी या स्वयंसेवक वाजपेयी के पीएम बनते ही फासीवाद और सांप्रदायिकता की जिस परिभाषा को सत्ता के लिये जिन नेताओं ने बदला अब नरेन्द्र मोदी के गुजरात से बाहर निकलते ही नयी परिभाषा दिल्ली में उन्हीं नेताओं ने गढ़ी। नीतीश के लिये बाबरी कांड करने वाले लाल कृष्ण आडवाणी सांप्रदायिक कभी नहीं रहे। मुलायम की सरकार ने मुज्जफरनगर दंगों की आग में सियासी गोटियां फेंकी। और अयोध्याकांड के नायक कल्याण सिंह के साथ जमकर गलबहियां की, जिससे जातियों का जुनुन जगाया जा सके। लेकिन मुलायम मौलाना ही रहे और सांप्रदायिक नहीं हुये। बाबूलाल मंराडी तो बीजेपी से ही निकले। और अब उ बीजेपी सांप्रदायिक दिखायी दे रही है। नवीन पटनायक अयोध्या की आग के बाद भी लंबे वक्त तक बीजेपी से गलबहिया डाले रहे। लेकिन सम्मेलन में बीजेडी के नेता ने कहा कि आरएसएस के स्वयंसेवक देश को बांटने की राह पर निकले हुये हैं। जयललिता ने स्वयंसेवक पीएम वाजपेयी से परहेज नहीं किया। प्रफुल्ल महंत भी एक वक्त स्वयंसेवक पीएम के दौर में साथ खड़े रहे। लेकिन आज उन्हें एक दूसरा स्वयंसेवक सांप्रदायिक नजर आ रहा है और चूंकि नीतीश कुमार ने फासीवाद के आहट का जिक्र कर इमरजेन्सी की याद सम्मेलन में बैठे मीडियाकर्मियो को दिलायी। तो मंच पर बैठे ए बी वर्धन को जरुर यह याद आया होगा कि इमरजेन्सी के वक्त सीपीआई इंदिरा गांधी के साथ खड़ी थी। अब यह सवाल उठना जायज है कि जिस पार्टी या जिन स्वयंसेवको के साथ राजनीति करने में राजनीति के इन धुरन्धरों को कोई परहेज नहीं रहा और अब उसी बीजेपी और उन्हीं राजनीतिक स्वयंसेवकों ने भी अपना नेता नरेन्द्र मोदी को मान कर मिशन 2014 का संघर्ष शुरु किया है तो फिर उसी पार्टी और उन्हीं स्वयंसेवकों को छोड़ कर कभी साथ खड़े रहे राजनेताओं के नये विचार या नयी परिभाषा को लेकर देश का आम वोटर क्या सोचें। असल में राजनीति की साख इसीलिये डांवाडोल है और इसी डांवाडोल स्थिति का लाभ नरेन्द्र मोदी को लगातार मिल रहा है। असल में दिल्ली में 14 राजनीतिक दलो के जमावडे में हर नेता की जुबान पर मोदी का नाम किसी ना किसी रुप में जरुर आया। किसी ने संकेत की भाषा का इस्तेमाल किया तो कोई सीधे निशाने पर लेने लगा।

और पहला सवाल यही निकला की 2014 के चुनाव में नरेन्द्र मोदी ही मुद्दा है। और ढाई दशक पहले मंडल कंमडल से निकली राजनीति के जरीये जो भी क्षत्रप बने उनकी राजनीति में पहली बार नरेन्द्र मोदी सेंध लगा रहे हैं। क्योंकि जाति के तौर पर मोदी अति पिछडा से आते हैं। वाम नजरिये से समझे तो मोदी गरीब परिवार से आते हैं । और दूसरा मुद्दा उठा कि मनमोहन सरकार के कामकाज से कांग्रेस का ग्राफ गिर रहा है और अब शरद पवार भी खड़े होने से कतरा रहे हैं। एनसीपी नेता डी पी त्रिपाठी हालाकि लगातार बोलते रहे कि वह यूपीए के साथ हैं। लेकिन जिस तर्ज पर मौजूदा राजनीति का विकल्प खोजने की कवायद शुरु हुई है उसमें मौजूदा क्षत्रपों के आपसी टकराव ही सबसे बडी रुकावट है। क्योंकि शरद पवार महाराष्ट्र में बिना कांग्रेस के रह नहीं सकते। वह जानते है कि कांग्रेस का साथ जहां उन्होंने छोडा वहीं एनसीपी के तमाम नेता काग्रेस की राह पकड़ लेंगे। तो बिहार की सियासत में सांप्रदायिकता के सवाल पर नीतीश पर लालू हमेशा से भारी हैं। यूपी के मौजूदा सियासी हालात बताते हैं कि मुलायम पर मायावती भारी हैं। बंगाल में लेफ्ट फ्रंट की वाम धारा को ही ममता बनर्जी हड़प चुकी है। असम में प्रफुल्ल महंत फूंके हुये कारतूस हैं। पंजाब में पीपीपी के मनप्रीत बादल चूके हुये राजनीतिक खिलाड़ी हैं। तो राजनेताओं की दिल्ली में कवायद संख्या बल से तो राजनीति को प्रभावित कर सकती है लेकिन जमीनी राजनीति में बिहार में लालू, बंगाल में ममता,यूपी में मायावती, तमिलनाडु में करुणानिधि और आध्र प्रदेश में जगन रेड्डी को कैसे खारिज किया जा सकता है। खासकर तब जब सवाल संख्या बल के भरोसे सरकार बनाने के दौर का हो। और बिना गठबंधन कोई सरकार बना नहीं सकता है, इसे जब हर कोई जानता हो। ध्यान दें तो मनमोहन के बाजारवाद ने सांप्रदायिकता के खिलाफ लड़ाई को कमजोर कर दिया। और मंहगाई भ्रष्टाचार या कालाधन सरीखे मुद्दे आम लोगों के पेट से जुड़ गये जबकि सांप्रदायिकता सियासी मुद्दा भर रह गया। और राजनेताओं ने इस सच को हमेशा पूंछ से पकड़ने की कोशिश की इसीलिये मौजूदा दौर में राजनीति की साख भी कमजोर हुई। इसलिये याद कीजिये तो दो बरस पहले ही अन्ना हजारे के गैर राजनीतिक आंदोलन ने सत्ताधारी राजनीतिक दलो की चूलें हिला दी थीं। असल में राजनीति को लेकर आम लोगो के इसी गुस्से को नरेन्द्र मोदी हर किसी को खारिज कर भुना रहे हैं और तमाम राजनीतिक दल मुद्दा छोड़ मोदी को ही मुद्दा मान मिशन 2014 की दिशा में चल निकले हैं। तो विकल्प का रास्ता निकलेगा कैसे यह सबसे बड़ा सवाल है। और खासकर तब जब नरेन्द्र मोदी कांग्रेस की नब्ज पर हमला करने की तैयारी भी कर रहे है और संघ से अलग खुद को दिखाने का प्रयास भी कर रहे हैं। एक वक्त संघ के चहते प्रवीण तोगडिया. संजय जोशी और एम जी वैघ ने कई मौको पर मोदी को खारिज किया। लेकिन संघ परिवार मोदी के साथ खड़ा रहा। इस कैनवास को विस्तार दिजियेगा तो संघ के भीतर यह सवाल बार बार उठा कि सिर्फ नरेन्द्र मोदी के आसरे संघ की समूची राजनीतिक धारा को परिभाषित किया जाये। या फिर अयोध्या, कॉमन सिविल कोड, धारा 370 या गोवध या फिर गंगा शुद्दिकरण सरीखे मुद्दो को भी चुनावी राजनीति से जोड़कर स्वयंसेवक मोदी को आगे बढ़ाया जाये। और अगर ऐसा नहीं होता है तो वाजपेयी या आडवाणी से कई कदम आगे निकल कर संघ की राजनीतिक धारा को मोदी खारिज करेंगे। क्योंकि वाजपेयी तो पीएम बनने के
बाद बदले। आडवाणी पीएम होने के लिये जिन्ना प्रकरण में डूबकी लगा आये और मोदी ने अपनी लोकप्रियता को ही राजनीतिक तमगा मान लिया। ध्यान दें तो नरेन्द्र मोदी ने कभी विवादास्पद मुद्दों को नहीं उठाया। राम मंदिर भी नहीं। मंदिर से पहले शौचालय की जरुरत जरुर बतायी। कॉरपोरेट को कभी खारिज नहीं किया। जातीय या वर्ग के आधार पर कभी कोई टिप्पणी नहीं की। सिर्फ एक बार हिन्दु राष्ट्रवाद का जिक्र मोदी ने अपने इंटरव्यू में किया । लेकिन इस दायरे से कोई नये जातीय समीकरण बनते या टूटते ऐसा भी नहीं है । और बेहद बारीकी से नरेन्द्र मोदी ने दो परिस्थितियों पर कभी कोई हमला नहीं किया। पहला कॉरपोरेट और दूसरा खुली बाजार इकनॉमिक्स।

संयोग से मनमोहन सिंह इन्हीं दो के आसरे सत्ता में 10 बरस से बने हुये हैं। और संयोग से इन दोनो स्थितियों का ही कमाल है कि बिहार यूपी के जातीय वोट बैंक को लगातार डिगा भी रहा है और जातियां अपने नुमाइन्दो पर यह दबाव भी बना रही हैं कि कि पारंपरिक धारा टूटनी चाहिये। इन परिस्थितियों में मुलायम सिंह यादव हो या नीतिश कुमार अगर जातीय समीकरण के आसरे ही सियासत होगी तो फिर मौजूदा राजनीति जातिय सेंघ लगाकर भी पार पा सकते हैं। क्योंकि कुर्मी जाति के नेता के तौर पर नीतीश की पहचान हो सकती है लेकिन राष्ट्रीय तौर पर कुर्मी जाति की बहुलता नहीं है यही मुश्किल मुलायम सिंह यादव को लेकर यादव वोटबैंक के साथ हो सकती है। और ऐसी ही परिस्थितियां महाराष्ट्र में मराठा वोटबैंक की और दक्षिण में द्रविड वोट को लेकर हो सकती है  ध्यान दें तो पहली बार जातीय बंधनों में बंधी राजनीति भी विकास का ढिढोरा इसलिये पीट रही हैं क्योंकि मनमोहन इकनॉमिक्स ने परंपरा से इतर जिन्दगी जीने की मुश्किलें बढायी हैं। और यह मुश्किल सीधे पेट से जुड़ी हैं . इसका लाभ और कोई नहीं कॉरपोरेट सत्ता उठाना चाहती है। जो उठा रही है। इसलिये मौजूदा संसद में अगर सौ से ज्यादा सांसद अगर कॉरपोरेट की पूंजी पर टिके हैं। और चुनाव लडते वक्त कारपोरेट ही पैसा लगाता है और संसद में कारपोरेट का ही हित यह सांसद पूरा करते है और इसे विकास का जामा पहना दिया जाता है। क्योंकि सरकार का अपना कोई इन्फ्रास्ट्रक्चर है नहीं, जो कॉरपोरेट से बेहतर हो या उसके सामानांतर हो। फिर राजनीति के इस मोड़ पर जब कारपोरेट गवर्नेंस को लेकर सरकार पर सवालिया निशान लगा रही हो और नरेन्द्र मोदी उसी कारपोरेट के चहेते बने हो तब क्षत्रपों की राजनीति क्या मायने रखेगी यह एक सवाल भी है और आने वाले वाले वक्त में नायाब लोकतंत्र का बदलता चेहरा भी।

1 comment:

Vinit Singh said...

True Sir..
I closely follow ur every article and it is d mirror of d modern day politics.