Wednesday, November 13, 2013

हमने सचिन को खेलते हुए देखा था

24 बरस के सफर में देश ने 8 प्रधानमंत्री को देख लिया। इन 24 बरस में राजनीति की हर धारा ने सत्ता भी संभाल ली। और तो और इन्हीं 24 बरस में देश का कोई राजनीतिक दल नहीं बचा, जिसने दिल्ली की सत्ता की मलाई नहीं चखी। और इसी 24 बरस में सचिन एक युग में बदल गये। जिस उम्र में बल्ला थामा उस उम्र से बड़ा अब उनका बेटा है। और हिन्दुस्तान के जिस रिकॉर्ड को 24 बरस पहले अगुंलियों पर गिना जा सकता था, उसे अपने 24 बरस के रिकॉर्ड से एक नयी परिभाषा दे दी। जो क्रिकेट की पूरी किताब में बदल गयी।
इतिहास के पन्नों में किस प्रधानमंत्री को याद किया जायेगा यह तो किसी को नहीं पता लेकिन क्रिकेट का जिक्र जब भी होगा तब सचिन का पन्ना स्वर्णिम अक्षरों के साथ खुलेगा। और यहीं से सचिन के नये मायने शुरु होते हैं। जो सचिन को क्रिकेटरों की कतार से अलग खड़ा कर देती है।

सचिन का नाम सचिन देव बर्मन के नाम पर पड़ा। सचिन ने उस वक्त पहला मैच खेला जब हर घर में टीवी दस्तक दे रहा था। सचिन उस दौर में चमके जब भारत बाजार में बदल रहा था। सचिन का नाम हर घर के बच्चे का नाम होने लगा। और सचिन भारत का ऐसा नामचीन ब्रांड बन गया। जिस पर भरोसा और विश्वास हर उम्र के लोगों को था। और मुंबई के शिवाजी पार्क में नन्हें पैरों में पैड बांधकर खेलने वाला सचिन देखते देखते देश का सबसे रईस क्रिकेटर बन गया। फोर्ब्स ने बताया कि 2012-13 के दौरान सचिन की कमाई और विज्ञापनों से मिलने वाली राशि 1 अरब 39 करोड 32 लाख रुपये है। वेल्थ एक्स के मुताबिक सचिन 10 अरब 13 करोड़ रुपये के मालिक हैं। तो सचिन जिस मिट्टी से निकले, उसने सचिन को सोना बना दिया। और अब जिस वानखेड़े स्टेडियम में सचिन आखिरी मैच खेलेंगे, उसे देखने देश के सबसे ज्यादा करोड़पति भी पहुचेंगे। और देश के सबसे लोकप्रिय व्यक्तियों से लेकर सबसे ताकतवर लोगों की कतार भी नजर आयेगी।
तो सचिन रिटायरमेंट के बाद 24 बरस पुराने सचिन तेदूलकर नहीं होंगे बल्कि चकाचौंध भारत के नुमाइंदे होंगे, जिनकी परछाई तले अंधेरे में सिमटा भारत खामोशी से सचिन को निहारेगा,खुश होगा और आने वाली पीढ़ियो को बतायेगा कि उसने कभी सचिन को खेलता हुये अपनी नंगी आंखों से देखा था।

क्योंकि सर डोनाल्ड ब्रैडमैन ने ९० के दशक में अपनी ड्रीम टीम में सचिन को जगह देते हुए उन्हें एक जीनियस से एक युग में बदल डाला था। लेकिन भारत में सचिन का जो जुनुन है उसके सामने तो कुछ दूसरे सवाल हैं। क्योंकि शाम 18 नवंबर को भी ढलेगी। लेकिन 18 नवबंर की शाम कुछ अलग होगी। क्योकि सबकुछ ठीक रहा तो 18 नवबंर को शाम ढलने के साथ ही मुबंई के वानखेडे स्टेडियम में सचिन की विदाई का जश्न खत्म होगा और उसके बाद सचिन तो होंगे लेकिन उनके साथ क्रिकेट नहीं होगा। कैसी होगी 19 नवंबर की वह सुबह जब सचिन का हाथ अनायास क्रिकेट के बल्ले को थामने के लिये बढेगा और उन्हे झटके में एहसास होगा कि अब तो 22 गज की पीच को वह पीछे छोड़ आये है । वानखेडे में अपनी मां और अपने गुरु के सामने खेल कर रिटायर होने का आखरी सपना सचिन ने ही संजोया । लेकिन सवाल यह अबूझ है कि आखिर जिस सपने को सचिन ने देखा अब वह खुद उसे पूरा मान चुके हैं तो फिर सचिन के रिटायरमेंट को लेकर एक अकुलाहट हर किसी में क्यों है। हर दिल की धड़कन क्यों बढ़ी हुई है। तो सच यही है कि मौजूदा क्रिकेट में सचिन की तरह चाहे हर कोई खेल रहा हो लेकिन सचिन जिस दौर से निकले और मौजूदा दौर जिस सचिन को देख रहा है वह क्रिकेटर से ज्यादा सचिन के जरीये अपनी पहचान पाने की अकुलाहट है। और फिलहाल देश में कोई ऐसा है नहीं जो कई पिढियो में नोस्टालिजिया जगा सके ।

तो दुआ कीजिये सचिन वानखेडे के कैनवास पर कुछ ऐसे रंग भरके रिटायर होंगे, जो पोएटिक जस्टिस कहलाए नहीं तो सचिन रिटायर हो जाएंगे और हर दिल में कसक रह जायेगी कि सचिन ने रिटायरमेंट का वक्त सही नहीं चुना या फिर देरी कर दी। क्योंकि सचिन सिर्फ बल्लेबाज या क्रिकेटर नहीं बल्कि एक ऐसे युग की पहचान हैं जहां सचिन चकाचौंध और अंधेरे भारत के बीच पुल हैं।


5 comments:

sunil rawat said...

mujhe..pta tha...bajpai ji sachin pr jaroor likhrnge...kuch..thik tha...magar sachin ka matlab hota kya hai...? aapse behtar paribhasha koi ni de sakta..mujhe sachin ka matlab aap ke shabdon me aur samajhna hai sir jiii...aur vistaar se likhiye na..pyaas aapk blog ki aur hai...

raajkiawaaz said...

सर सुनील जी की अभिलाषा को शांत करे और थोडा अनुभव बाटे। आपका शिष्य।

sharad said...

sir ji,ab dekha na ye hai ki aage sachin desh ke liye kya karenge,,, ya fir aage ki jindagi kese hogi... MP hokar wo desh me sport ke liye kya karte he.

sunil rawat said...

http://anokhiinajar.blogspot.in/2013/11/blog-post.html

GOVIND KUSHWAHA said...

सत्य लिखना खेल नहीं है, पूछो इन
कलमकारों से...
ये लोहे को चीर रहे है, कागज
कि तलवारों से...
प्रेस दिवस पर सभी पत्रकार बंधुओ और
साथियों को हार्दिक शुभकामनाएं.