Monday, August 25, 2014

मोदी राज में 25 बरस पीछे लौट गयी बिहार की सियासी बिसात


1989 के भागलपुर दंगों की हर तस्वीरे बीते 25 बरस में कांग्रेस के दौर में दंगों की पहचान भी रही है और बिहार में क्षत्रपों के सियासी सफर की बिसात भी रही है। क्योंकि कांग्रेस के दौर में हुये भागलपुर दंगों के बाद
से कांग्रेस कभी भागलपुर सीट जीत तो नहीं ही पायी। बल्कि भागलपुर दंगों ने कांग्रेस के लिये हालात तो इतने बूरे किये कि आजादी के बाद से जिस बिहार की सत्ता पर कांग्रेस हमेशा काबिज रही वहीं कांग्रेस 1989 के बाद से बिहार में चौथे नंबर की पार्टी बन गयी। लेकिन 25 बरस बाद भागलपुर की विधानसभा सीट पर कांग्रेस की जीत ने बिहार में एक ऐसी राजनीतिक बिसात के संकेत दे दिये है जहां दिल्ली की सत्ता पाने के बावजूद नरेन्द्र मोदी बिहार के सियासी कटघरे में आ खड़े हुये हैं। यह कटघरा मुस्लिम एकजूटता का भी है औरमंडल से निकली जातीय राजनीति के ध्रुवीकरण का भी है। मुस्लिमों में गरीबऔर पिछड़ी जातियां पसमांदा के नाम पर नीतीश-लालू खेमे के नाम पर बंटी।

यादव की दबंगई को टक्कर देने के लिये कुर्मी-कोयरी सियासी मलाई खाने के लिये एक हुये। लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव परिणाम ने सत्ता के लिये सियासी धाराओं में बंटे क्षत्रप नीतीश-लालू को जैसे ही एक साथ किया वैसे ही तीन खेमो में बंटे हुये वोटर भी दो खेमों में ही उभरे। और पहली बार मोदी की राजनीतिक जीत के संकेत ने बिहार में दोबारा उस समाजवादी धारा कोबहाने की जरुरत जता दी जिसका बंटाधार समाजवादी-जेपी आंदोलन से निकले राजनेताओ ने सत्ता की ही खातिर की थी। तो पहला सवाल है कि लालू-नीतीश गठबंधन महज जीत का गणित है या फिर सांप्रदायिक उभार के खौफ का ध्रुवीकरण और दूसरा सवाल है बीजेपी का पिछड़ना सामाजिक धारा को खारिज करना है या फिर मोदी मॉडल सरीखा कोई सपना ना जगा पाना। ध्यान दें तो दोनों हालात बिहार के लिये घातक ही हैं। क्योंकि चुनावी जीत हार के दायरे में बिहार काभविष्य सत्ता अपने अनुकुल देख रही है जबकि मौजूदा बिहार के पिछडने को उबारने के लिये किसी राजनीतिक दल के पास कोई सपना नहीं है। सिर्फ लालूनीतीश ही नहीं बल्कि बिहार में बीजेपी की अगुवाई करने वाले सुशील मोदी और नंदकिशोर यादव भी जेपी आंदोलन की ही उपज रहे हैं। यानी जिस बिहार में आज
की तारीख में साठ फीसदी वोटर जेपी आंदोलन के बाद जन्म लिया है वहां की राजनीतिक डोर आज भी चार दशक पहले की राजनीति थामे हुये हैं। जबकि इस दौर में बिहार का गिरमिटिया मजदूर हो या पढा-लिखा तबका, दोनों का पलायन बिहार से हुआ है। कारपोरेट से लेकर सरकारी संस्थानो और शहर दर शहर निर्माण मजदूर से लेकर रोजगार के लिये घक्के खाते तबके में हर पांच में से एक बिहार का ही कर्नाटक से कश्मीर तक में मिल जायेगा। दिल्ली और मुंबई में तो रोजगार के रेले में हर तीन बेरोजगार में से एक बिहारी मिल जायेगा। तो फिर क्या यह माना जाये कि बिहार में राजनीति करने का जो लाट बचा हुआ है वह भी सियासी तौर पर चूका हुआ है। इसलिये फेल सिस्टम ही फेल राजनेताओं के लिये चुनावी सत्ता का मुद्दा बन चुका है। जहां पहली बार कारपोरेट की पूंजी और चकाचौंध चुनावी प्रचार के जरीये नरेन्द्र मोदी ने समूची हिन्दी पट्टी में सेंध लगायी और चाहे-अनचाहे बिहार के वोटरों में वह सपने जागे जो मंडल-कमंडल की राजनीति से आगे दिखायी देने लगा। इसलिये बिहार के उपचुनाव में मोदी की चकाचौंध के सपने और लालू-नीतीश की पारंपरिक राजनीति में बंटे वोटरों का गणित ही आमने सामने नजर आया।

पहली नजर में गणितीय गठबंधन जीता इससे इंकार नहीं किया जा सकता है लेकिन वैकल्पिक राजनीति की तलाश बंजर होती राजनीति के सामने एक बाऱ फिर शून्य राजनीतिक माहौल ही आपस में टकरा रहा है। ऐसे में सवाल सिर्फ इतना है कि जिस लोकसभा चुनाव में महंगाई, रोजगार से लेकर न्यूनतम की जरुरतों का संघर्ष करने का सपना नरेन्द्र मोदी ने दिखाया और मोदी को सांप्रदायिकता के कठघरे में खडा कर जो खौफ लालू-नीतिश-कांग्रेस गठजोड ने दिखाया उसमें चार [ बीजेपी], छह [ गठजोड] का आंकडा एक बार फिर राजनीतिक बिसात पर वोटरों को प्यादा बनाकर सियासत साधने का चुनावी परिणाम है।

1 comment:

joshim27 said...

जब भी 30-40 प्रतिशत वोटिंग होगी तो जातिवादी, परिवारवादी और फर्ज़ी सेक्युलर पार्टियों की जीत तय है, क्योंकि 15% मुस्लिम तो भेड़ बकरियों की तरह ऐसे सेकुलरिज्म के ठेकेदारों को ही वोट करते हैं जो उनकी जीत और प्रजातंत्र की हार तय कर देता है। फिर विकास, रोज़गार जैसे मुद्दों को पूछने वाला कोई नहीं होता क्योंकि कुछ लोगों के लिए विकास और रोज़गार से ज्यादा महत्वपूर्ण टोपी और दाढ़ी लगा कर घूमना है। इसलिए दिग्विजय सिंह की एक बात से तो सहमति रखनी पड़ेगी की लोकसभा चुनाव भाजपा नहीं संघ लड़ रहा था, और स्वयंसेवकों ने ये निश्चित किया की अधिक से अधिक वोटिंग हो और 60-70% तक वोटिंग हुई भी। तभी तो सेकुलरिज्म और जातिवाद के सारे ठेकेदार ज़मीन सूंघते रह गए। दुर्भाग्य से वोटिंग का वही पुराना 30-40 % वाला ढर्रा लौटता दिख रहा है।