Wednesday, October 26, 2016

सिर्फ सियासत की...कोई चोरी नहीं की

कश्मीर 109 दिनों से कैद, यूपी में सत्ता सड़क पर, महाराष्ट्र में शिक्षा-रोजगार के लिये आरक्षण, मुंबई में देशभक्ति बंधक, बिहार में कानून ताक पर, पंजाब नशे की गिरफ्त में, गुजरात में पाटीदारों का आंदोलन ,दलितों का उत्पीडन, तो हरियाणा में जाट आरक्षण आंदोलन, तमिलनाडु-कर्नाटक में कावेरी पानी पर टकराव, झारखंड में आदिवासी मूल का सवाल तो असम में अवैध प्रवासी का सवाल और दिल्ली बे-सरकार। जरा सोचिये ये देश का हाल है । कमोवेश हर राज्य के नागरिकों को वहां का कोई ना कोई मुद्दा सत्ता का बंधक बना लेता है। हर मुद्दा बानगी है संस्थायें खत्म हो चली हैं। संविधानिक संस्थायें भी सत्ता के आगे नतमस्तक लगती है। वजह भी यही है कि कश्मीर अगर बीते 109 दिनों से अपने घर में कैद है। तो सीएम महबूबा हो या राज्यपाल
वोहरा। सेना की बढ़ती हरकत हो या आतंक का साया। कोई ये सवाल कहने-पूछने को तैयार नहीं है कि घाटी ठप है। स्कूल--कालेज-दुकान-प्रतिष्ठान अगर सबकुछ बंद है तो फिर राज्य हैं कहां। और ऐसे में कोई संवाद बनाने भी पहुंचे तो पहला सवाल यही होता है कि क्या मोदी सरकार का मैंडेट है आपके पास । यूपी में जब सत्ता ही सत्ता के लिये सड़क पर है । तो राज्यपाल भी क्या करें। सीएम -राज्यपाल की मुलाकात हो सकती है । लेकिन कोई ये सवाल करने की हालात में नहीं कि सत्ताधारियों की गुडंगर्दी पर कानून का राज गायब क्यों हो जाता है। मुंबई में तो देशभक्ति को ही सियासी बंधक बनाकर सियासत साधने का अनूठा खेल ऐसा निकाला जाता है। जहां पेज थ्री के नायक चूहों की जमात में बदल जाते हैं। सीएम फडनवीस संविधान को हाथ में लेने
वाले पिद्दी भर के राजनीतिक दल के नेता को अपनी राजनीतिक बिसात पर हाथी बना देते हैं। और झटके में कानून व्यवस्था राजनेताओ की चौखट पर रेंगती दिखती है। बिहार में कानून व्यवस्था ताक पर रखकर सत्ता मनमाफिक ठहाका लगाने से नहीं चूकती। मुज्जफरपुर में महिला इंजीनियर को जिन्दा जलाया जाता है। तो सत्ताधारी जाति की दबंगई खुले तौर पर कानून व्यवस्था अपने हाथ लेने से नहीं कतराती। हत्या-अपहरण-वसूली धंधे में सिमटते दिखायी देते है तो सत्ता हेमा मालनी की खूबसूरती में खोयी से लगती है। बिहार ही क्यों दिल्ली तो बेहतरीन नमूने के तौर पर उभरता है। जहां सत्ता है किसकी जनता पीएम, सीएम और उपराज्यापाल के त्रिकोण में जा फंसा है । और देश की राजनधानी दिल्ली डेंगू, चिकनगुनिया से मर मर कर निकलती है तो अब बर्ड फ्लू की चपेटे में आ जाती है।

तो क्या देश को राजनीतिक सत्ता की घुन लग गई है। जो अपने आप में मदमस्त है। क्योंकि वर्ल्ड बैंक के नजरिये को मोदी सरकार मानती है। उसी रास्ते चल निकली है लेकिन जब रिपोर्ट आती है तो पता चलता है कि दुनिया के 190 देशों की कतार में कारोबार शुरु करने में भारत का नंबर 155 हैं। कर प्रदान करने में नंबर 172 है। निर्माण क्षेत्र में परमिट के लिये नंबर 185 है। तो ऐसे में क्या बीते ढाई बरस के दौर में प्रदानमंत्री मोदी जिस तरह 50 से ज्यादा देशों का दौरा कर चुके है और वहां जो भी सब्जबाग दिखाये । क्या ये सिर्फ कहने भर के लिये था । क्योंकि अमेरिका से ब्रिटेन तक और मॉरिशस से सऊदी अरब तक और जापान -फ्रास से लेकर आस्ट्रेलिया तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बीते ढाई साल में जहां भी गए-उन्होंने विदेशी निवेशकों से यही कहा कि भारत में निवेश कीजिए क्योंकि अब सरकार उन्हें हर सुविधा देने के लिए जी-जान से लगी है। और नतीजा सिफर
क्योंकि विश्व बैंक ने बिजनेस की सहूलियत देने वाले देशों की जो सूची जारी की है-उसमें भारत बीते एक साल में सिर्फ एक पायदान ऊपर चढ़ पाया है। यानी भारत 131 से 130 वें नंबर पर आया तो पाकिस्तान 148 से 144 वें नंबर पर आ गया । और चीन 80 से 78 वें पायदान पर पहुंच गया । और नंबर एक परन्यूजीलैंड तो नंबर दो पर सिंगापुर है । तो क्या भारत महज बाजार बनकर रहजा रहा है जहा कन्जूमर है । और दुनिया के बाजार का माल है । क्योंकि-जिन कसौटियों पर देशों को परखा गया है-उनमें सिर्फ बिजली की उपलब्धता का इकलौता कारक ऐसा है,जिसमें भारत को अच्छी रैंकिंग मिली है। वरना आर्थिक क्षेत्र से जुडे हर मुद्दे पर भारत औततन 130 वी पायदान के पार ही है । तो सवाल है कि -क्या मोदी सरकार निवेशकों का भरोसा जीतने में नाकाम साबित हुई है? या फिर इल्पसंख्यको की सुरक्षा । बीफ का सवाल । ट्रिपल तलाक . और देशभक्ति के मुद्दे में ही देश को सियासत जिस तरह उलझा रही है उसमें दुनिया की रुची है नहीं । ऐसे में निवेश के आसरे विकास का ककहरा पढ़ाने वाली मोदी सरकार के दौर में अगर कारोबारियों को ही रास्ता नहीं मिल रहा तो फिर विकास का रास्ता जाता कहां है। क्योकि एक तरफ नौकरी में राजनीतिक आरक्षण के लिये गुजरात में पाटिदार तो हरियाणा में जाट और महाराष्ट् में मराठा सडक पर संघर्ष कर रहा है । और दूसरी तरफ खबर है कि आईटी इंडस्ट्री में हो रहे आटोमेशन से रोजगार का संकट बढने वाला है ।

तो क्या देश में  बेरोजगारी का सवाल सबसे बडा हो जायेगा । और इसकी जद में पहली बार शहरी प्रोपेशनल्स भी आ जायेगें । ये सवाल इसलिये क्योकि देश की तीन बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनियों की विकास दर पहली बार 10 फीसदी के नीचे पहुंच गई है। और अमेरिकन रिसर्च फर्म एचएफएस का आकलन है कि अगले पांच साल में आईटी सेक्टर में लो स्किल वाली करीब 6 लाख 40 हजार नौकरियां जा सकती हैं । और अगले 10 साल में मिडिल स्केल के आईटी प्रफेशनल्स की नौकरियो पर भी खतरे की घंटी बजने लगेगी । तो क्या जिस आईटी सेक्टर को लेकर ख्वाब संजोय गये उसपर खतरा है । और इसकी सबसे बडी वजह आटोमेशन है । यानी ऑटोमेशन की गाज लो स्किल कर्मचारियों पर सबसे ज्यादा पड़ेगी। और मिडिल लेवल के कर्मचारियों पर कम होते मुनाफे की मार पड़ना तय है। जिसके संकेत दिसंबर 2014 में उस वक्त मिल गए थे, जब टीसीएस ने 2700 से ज्यादा कर्मचारियों की छंटनी कर दी थी। इतना ही नहीं बैंगलुरु में बीते दो साल में 30 हजार से ज्यादा कर्मचारियों की छंटनी हुई है । तो क्या जिस स्टार्टअप और डिजिटल इंडिया के आसरे आईटी इंडस्ट्री में रोजगार पैदा करने का जिक्र हो रहा है वह भी ख्वाब रह जायेगा । क्योकि आईटी सेक्टर का विकास भी दूसरे क्षेत्रों
के विकास पर निर्भर है। और दुनिया के हालात बताते है कि रोबोटिक टेक्नोलॉजी ने मैन्यूफैक्चरिंग में पश्चिम के दरवाजे फिर खोल दिए हैं । यानी लोगो की जरुरत कम हो चली है । भारत के लिये ये खतरे की घंटी कही ज्यादा बडी इसलिये है क्योंकि -आईटी सेक्टर में बदलाव उस वक्त हो रहा है,जब भारत में बेरोजगारी संकट बढ़ रहा है।

2 comments:

Sajid Ali said...

सर प्रणाम आपके ब्लॉग में सटीक बात कही गई है..पहले पैरा को फेसबुक पर लगा रहा हूं..आपके साभार और ब्लॉग के लिंक सहित...।

धन्यवाद ।

Sankalp Bajpai said...

आदरणीय पुण्य प्रसून बाजपाई जी चरणस्पर्श
आपने इस लेख में बेरोज़गारी के बारे में प्रकाश डाला परंतु क्या माजूद सरकार का ही आंकलन या किये गए प्रयासों को जनता के कटघरे में ही क्यों खड़ा किया जाए। क्या लोक सभा ,राज्यसभा और विधानसभा के प्रत्येक सदस्य का कर्त्तव्य सिर्फ लेटर हेड तक ही सिमित होना चाहिए?
सत्ता से बेदखल हुई पार्टियां क्या वाकई माफ़ी के अधिकारी हैं...10 वर्षों का राज आईटी सेक्टर को घुट्टी पिलाने में निकल गया ,और घुट्टी उस पूत को पिलाईगयी जिसके पैर पलने से बाहर आए ही नहीं।
क्या वाकई यही नीति थी .....एक ऐसे देश की जो कृषि प्रधान था और कदम बढ़ाया तो सीधे सेवा क्षेत्र में ।
आज अगर सर्कार देर से सही प्रयास करती भी है उत्पादन क्षेत्र को ऑक्सीजन देने की तो विपक्ष भूमि अधिकरण होने नही देगा वो भी बेशर्त अब उद्योगों को ही सोचना है कि हवा में कैसे उद्योग चलाएं।
क्या जनता अब तख्ती ले के विपक्ष के दफ्तर के सामने जाए या सरकार के....आप बयायें।

संकल्प बाजपाई
लखनऊ