Monday, October 31, 2016

दिल्ली से एलओसी तक हवा में घुलता जहर

दो सौ करोड़ । ये बच्चों का आंकडा है। दुनियाभर के बच्चो की तादाद। जिनकी सांसों में जहर समा रहा है ।  हवा में घुलते जहर को दुनिया में कहीं सबसे ज्यादा बच्चे प्रभावित हो रहे हैं तो वह उत्तर भारत ही है । तो जो सवाल दीपावली के बाद सुबह सुबह उठा कि दिल्ली में घुंध की चादर में जहर घुला हुआ है और बच्चों की सांसों में 90 गुना ज्यादा जहर समा रहा है । तो ये महज दीपावली की अगली सुबह का अंधेरा नहीं है। बल्कि यूनिसेफ की रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली समेत उत्तर भारत में 8 करोड़ बच्चों की सांसो में लगातार जहर जा रहा है । और दीपावली का मौका इसलिये बच्चो के लिये जानलेवा है क्योंकि खुले वातावरण में बच्चे जब सांस लेते है तो प्रदूषित हवा में सांस लेने की रफ्तार सामान्य से दुगुनी हो जाती है । जिससे बच्चों के ब्रेन और इम्युन सिसंटम पर सीधा असर पडता है । ये कितना घातक रहा होगा क्योंकि दीपावली की रात से ही 30 गुना ज्यादा जहर बच्चों की सांसों में गया । लंग्स, ब्रेन और दूसरे आरगन्स पर सीधा असर पड़ा । तो क्या दीपावली की रात से ही दिल्ली जहर के गैस चैबंर में बदलने लगी । क्योंकि यूनीसेफ की रिपोर्ट के मुताबिक बच्चो के लिये सबसे ज्यादा खतरनाक क्षेत्र साउथ एशिया है । जहा एक छोटे तबके के जीवन में बदलाव आया है और उससे गाडियों की तादाद , इन्फ्रास्ट्रक्चर का काम , एसी का उपयोग , लकडी-कोयले की आग । फैक्ट्रियों का धुंआ । सबकुछ जिस तरह हवा में घुल रहा है उसका असर ये है कि 62 करोड बच्चे सांस की बीमारी से जुझ रहे हैं। और इनमें से सबसे ज्यादा बच्चे भारत के ही है । भारत के 30 करोड़ बच्चे जहरीली हवा से प्रभावित हैं । और साउथ एशिया के बाद -अफ्रिका के 52 करोड़ बच्चे तो चीन समेत पूर्वी एशिया के 42 करोड बच्चे सांस लेते वक्त जहर ले रहे हैं। यानी जो सवाल दीपालवी की अगली सुबह दिल्ली की सडको पर धुंध के आसरे नजर आया । वह हालात कैसे किस तरह हर दिन 5 लाख बच्चो की जान ले रहा है। 2 करोड़ बच्चों को सांस की बीमारी दे चुका है। तीन करोड से ज्यादा बच्चों के ब्रेन पर असर पड़ चुका है ।12 करोड से ज्यादा बच्चो के इम्यून सिसंटम कमजोर हो चुका है । लेकिन हवा में घुलते जहर का असर सिर्फ दिल्ली तक नहीं सिमटा है । पहली बार लाइन आफ कन्ट्रोल यानी भारत पाकिस्तान सीमा पर जो हालात है उसने प्रवासी पक्षियो को भी रास्ता बदलने के लिये मजबूर कर दिया है ।

जी जिस कश्मीर घाटी में हर बरस अब तक साइबेरिया, पूर्वी यूरोप, चीन , जापान  फिलिपिन्स से दसियो हजार प्रवासी पक्षी पहुंच जाते थे । इस बार सीमा पर लगातार फायरिंग और पाकिसातनी की सीमा से जिस तरह बार बार सीजफायर उल्लघन हो रहा है । मोर्टार से लेकर तमाम तरह से बारुद फेका जा रहा है उसका असर यही है कि सीमा पर पहाडो से निकलती झिले भी सूने पडे है । पहाडो की झीले गंगाबल, बिश्हेनसर,गडसार में इसबार प्रवासी पंक्षी पहुचे ही नहीं । इतना ही नहीं कश्मीर घाटी में हर बरस सितंबर के आखरी में दुनियाभर से सबसे विशिषट पक्षियो झंड में करीब 15 हजार की तादाद में अबतक पहुंच जाते थे । इस बार हालात ऐसे है कि घाटी के हरकाहार, सिरगुंड,हायगाम और शलालाबाग सूने पडे है । तो कया पहली बार कश्मीर घाटी की हवा में भी बारुद कही ज्यादा है । क्योकि पक्षी विशेषज्ञो की भी माने तो जो प्रवासी पक्षी कश्मीर घाटी पहुंचते है वह अति संवेदनशील होते है और अगर पहली बार घाटी के बदले कोई दूसरा रास्ता प्रवासी पक्षियो के पकडा है तो ये हालात काफी खतरनाक है । और असर इसी का है कि वादी के प्रसिद रिजरवायर बुल्लर , मानसबल और डल लेकर भी सूने पडे है । लेकिन घाटी के हालात में तो प्रवासी पक्षी ही नहीं बल्कि पहली बार बच्चो के भविष्य पर अंघेरा कही ज्यादा घना है । क्योकि स्कूल के ब्लैक बोर्ड पर लिखे जिन शब्दो के आसरे बच्चे देश दुनिया को पहचानने निकलते है अगर उन्हे ही आग के हवाले कर दिया गया तो इससे बडा अंधेरा और क्या हो सकता है । तो पहली बार कश्मीर घाटी में अंधेरा इतना घना है कि बीते साढे तीन महीनो से 2 लाख बच्चे स्कूल जा नहीं पाये है । और बीते दो महीनो में 12 हजार 700 बच्चो के 25 स्कूलो में आग लगा दी गई । घाटी की सियासत और संघर्ष के दौर में ये सवाल बडा हो चला है कि बच्चो के स्कूलो में आग किसने और क्यो लगायी लेकिन ये सवाल पिछे छूट चला है कि आखिर बच्चो का क्या दोष । जो उनके स्कूल खुल नहीं पा रहे है ।

कल्पना किजिये आंतकवादी सैयद सलाउद्दीन से लेकर अलगाववादी नेता यासिन मलिक और सियासत करने वाले उमर अब्दुल्ला से लेकर सीएम महबूबा मुफ्ती हक कोई सवाल कर रहा है कि स्कूलो में आग क्यो लगायी जा रही है । एक दूसरे पर आरोप प्रतायारोप भी लगाये जा रहे है लेकिन इस सच से हर कोई बेफ्रिपक्र है कि आखिर वादी के शहर में बिखरे 11192 स्कूल और वादी के ग्रमीण इलाको में सिमटे 3280 स्कूल बीते एक सौ 115 दिन से बंद क्यो है । ऐसे में सवाल यही कि क्या पत्थर फेंकने से आगे के हालात कश्मीर के भविष्य को ही अंधेरे में समेट रहे है । क्योकि आंतक की हिसा और संघर्ष के दौर में करीब 80 कश्मीरी युवक मारे गये ये सच है । लेकिन इस सच से हर कोई आंख चुरा रहा है कि बीते साढे तीन महीनो से घरो में कैद 2 लाख बच्चे कर क्या रहे है । जिन 25 सरकारी स्कूलो में आग लगायी गई उसमें 6 प्रईमरी , 7 अपर प्रईमरी , 12 हाई स्कूल व हायर सेकेंडरी स्कूल है । और अंनतनाग और कुलगाम के इन 25 स्कूलो में पढने वाले 12 हजार बच्चो का द्रद यही है कि कल तक वह किताब और बैग देख कर पढने का खवाब संजोये रखते थे । इनरके मां-बाप स्कूल घुमा कर ले आते थे । लेकिन बीते दो महीने से जो सिलसिला स्कूलो में आग लगाने का शुरु हुआ है उसका असर बच्चो के दिमाग पर पड रहा है । और ये सवाल घाटी के अंधेरे से कही ज्यादा घना हो चला है कि अगर बच्चो को कागज पेसिंल किताब की जगह महज कोरा ब्लैक बोर्ड मिला तो वह उसपर आने वाले वक्त में क्या लिखेगें ।

1 comment:

Sankalp Bajpai said...

क्या शहर की ओर भागते लोगों इसी तररकी के पिपासु थे ?
या आधुनिकता की दौड आगे लाने के बजाये पीछे ले जा रही है..😀 जाहिर है आज दिल्ली में या बाकि शहरो में गाड़ी से चलने का रुतबा ही कुछ अलग होता है और साहब चलें भी क्यों न घर बार छोड़ के आये हैं पैसा कमाया है तो शौक तो बनता है फिर जब प्रदुषण बढ़ेगा तो तोख देंगे इलज़ाम दूसरे पर....चलो दिल्ली चलें...।।।