Wednesday, November 22, 2017

बदलती सियासी बिसात में संघ परिवार की भी मुश्किलें बढ़ी हैं

प्रधानमंत्री मोदी के सामने जिस दौर में राजनीतिक चुनौती लेकर राहुल गांधी आ रहे हैं, उस दौर का सच अनूठा है क्योंकि संघ के प्रचारक से पीएम बने मोदी के ही दौर में संघ परिवार का एंजेडा बिखरा हुआ है। संघ से जुड़े पहचान वाले स्वयंसेवक अलग थलग है। वहीं इंदिरा गांधी की तर्ज पर मोदी चल कर सफल हो रहे हैं। पर राहुल गांधी का कॉपी पेस्ट सफल हो नहीं पा रहा है। तो नेहरु गांधी की विरासत ढोती कांग्रेस को ही अब चुनावी लाभ नेहरु गांधी के नाम पर उतना मिल नहीं पा रहा है। तो कांग्रेस सिमट रही है। और मोदी के दौर में बीजेपी ने जिस विस्तार को पाया है, उसमें संघ के जरीये  चुनावी लाभ बीजेपी को कबतक मिलेगा ये सवाल सबसे बडी चुनौती के दौर पर 2019 में नजर भी आयेगा। क्योंकि तब संघ की मजबूरी नीतियों पर नहीं सियासी तिकड़मों पर चलने की होगी। क्योंकि संघ से जुडे लोगों की कतार जरा देखिये आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, गोविन्दाचार्य, प्रवीण तोगडिया, संजय जोशी  ऐसे नेता रहे हैं, जिनकी अपनी पहचान है पर मौजूदा वक्त ने इन्हें हाशिये पर ढकेल दिया है। इनकी खामोशी कांग्रेस का संघीकरण कर रही है। यानी मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियों को मोदी सरकार ने अपनाया।

और कांग्रेस मोदी सरकार की नीतियो में मीन-मेख पुराने स्वयंसेवकों की खामोशी से निकाल रही है। जबकि इसी दौर में कांग्रेस से कही ज्यादा तीखे तरीके से संघ के ही संगठन या पहचान पाये स्वयंसेवक उठा रहे हैं। मसलन भारतीय मजदूर संघ और स्वदेशी जागरण मंच ने मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों के विरोध का दिन वही चुना जब मोदी सरकार को सबसे बडी राहत मूडीज ने दी थी। विहिप ना सिर्फ उसी दिन  खामोश रही जिस दिन श्री श्री राम मंदिर का रास्ता तलाशने अयोध्या पहुंचे । बल्कि सुब्रमण्यम स्वामी से लेकर यूपी के मुखिया योगी की राममंदिर पर हर पहल के बावजूद राम मंदिर आंदोलन से निकले प्रवीण तोगडिया ने बेरोजगारी और  किसान का मुद्दा उठाकर आर्थिक नीतियों पर ही चोट की। और इसी के समानांतर गुजरात में किसान संघ की नींव जालने वाले लालजी पटेल भी आर्थिक नीतियों को ही लेकर बीजेपी के खिलाफ चुनाव में मुखर हो गये। और इस कतार में ये भी पहला मौका है कि यशंवत सिन्हा गुजरात में ही बीजेपी के पूर्व सीएम सुरेश मेहता के बुलावे पर घूम घूम कर मोदी सरकार की बिगड़ी आर्थिक नीतियों का हाल बता रहे हैं। और संघ -बीजेपी की यही वह सारी कतार है, जिससे कांग्रेस में आक्सीजन आ रहा है। तो सवाल दो है। पहला, क्या संघ परिवार का बीजेपीकरण  हो रहा है और बीजेपी का कांग्रेसीकरण। दूसरा, क्या राहुल गांधी के दौर में स्वतंत्रता संग्राम से निकली कांग्रेस की उम्र खत्म हो चुकी है। यानी पारंपरिक चुनावी चुनौतियों का दौर खत्म हुआ और अब राहुल ही नहीं बल्कि  संघ परिवार और बीजेपी के सामने भी नयी चुनौतियां हैं। इसीलिये इस दौर ने बीजेपी और कांग्रेस दोनों को ही शार्टकट का रास्ता सिखला दिया है।

जाति को ना मानने वाली बीजेपी के सोशल इंजीनियरिंग से लेकर किसी भी पार्टी के दागी तक को जीत के लिये साथ लेने में बीजेपी को हिचकिचाहाट नहीं है तो कांग्रेस गठबंठन बगैर सत्ता मिल नहीं सकती ये मान चुकी है । और गुजरात में ही जिस तरह हार्दिक-जिग्नेश,राठौर के इशारे पर चल निकली है। उसमें नेहरु गांधी की विरासत का लाभ पाने की सोच खत्म हुई ये मान चुकी है। क्योंकि गुजरात में कांग्रेस के लिये दो सवाल सबसे बड़े हो चुके हैं। पहला, गुजरात  में धर्म की लकीर पर जाति की लकीर हावी होगी या नहीं। दूसरा , एससी,ओबीसी, पाटीदार गुटों के आसरे कांग्रेस जीत पायेगी या नहीं। यानी गुजरात में बीजेपी की धर्म से मोटी लकीर जाति के आधार पर खींचने के लिये कांग्रेस तैयार है। तो क्या अंतर सिर्फ लकीरो का है। और यही वह हालात  है जो बतलाते है कि राहुल के साथ बीजेपी की कमजोरी साधने वाली कोई टीम नहीं है। फिर हार्दिक-जिग्नेश-राठौर के अंतर्विरोध की आग से जुझने की क्षमता भी राहुल में है। यानी कांग्रेस की कमजोर विकेट पर बैटिंग करते करते क्या बीजेपी का कांग्रेसीकरण वाकई हो चुका है। क्योंकि कांग्रेस ने नेहरु गांधी का नाम हमेशा लिया। और बीजेपी हेडगेवार-गोलवलकर को ज्यादा  मुखर होकर बहुमत के साथ सत्ता में रहते हुये भी उठा रही है। ऐसे में पहली बार परीक्षा और चुनौती संघ परिवार के सामने भी है क्योंकि पहली बार संघ परिवार की छाया में सत्ता नहीं है बल्कि मोदी सरकार की छाया में संघ  परिवार है। फिर संघ ने अपने एंजेडे को सत्तानुकूल मुलायम बनाया है। मोदी चुनावी राजनीति को साधने में प्रैक्टिकल ज्यादा हो गये तो योगी प्रतीकात्मक ज्यादा है।

यानी चाहे अनचाहे पहली बार 2019 के लिये बिछती गुजरात की चुनावी बिसात उन आर्थिक हालातों को हवा दे रही है, जिसे हर बार हर पार्टी ने हाशिये पर ढकेला है। यानी संघ परिवार का सामाजिक शुद्दीकरण बेमानी हो रहा है। कांग्रेस का नेहरु-गांधी विरासत को ढोना मायने नहीं रख रहा है। बीजेपी का संघ परिवार के संगठनात्मक विस्तार से अपनी जीत की उम्मीद पालने के दिन लद रहे है। यानी चाहे अनचाहे ये सवाल धीरे धीरे संघ परिवार के लिये बडा होता जा रहा है कि जो स्वयंसेवक स्वयंसेवक रह गया वह तो संघ के एजेंडे पर खामोश रहेगा नहीं। और जो स्वयंसेवक संघ का एजेंडा छोड़ सत्ता के लिये खामोश है, वह स्वयंसेवक सियासी रंग में रंगा जा चुका है। तो मोदी की हर जीत हार तले बार बार संघ की जीत हार भी देखी जायेगी। जो शायद जीत तक तो ठीक है पर हार के बाद के हालात में बीजेपी से कही ज्यादा संघ को सामाजिक तौर पर खडा करने की मुश्किल ना आ जाये। सवाल तो ये उन्हीं कद्दावर नेताओं तले उठेगा तो फिलहाल हाशिये पर हैं।

5 comments:

Upendra Gupta said...

सर इस दौर में सच कोई सुनना नहीं चाहता है।

Upendra Gupta said...
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Upendra Gupta said...

हाय रे राजनीति:-

जेपी से उत्पन्न हुआ लालु और नितीश।
अन्ना से उत्पन्न हुआ केजरी और विश्वास।
गुजरात से उत्पन्न हुआ ठाकोर और हार्दिक।

हर तीन घंटे में किसान खुदख़ुशी करता यही हमारी टीस।
बोलो भईया लोकतंत्र की जय!!

Navjeet Singh said...

India ka syatem bakwas hai jo jis hat ki bat karke aata Sabse jyada usi ke pass money hai chehe Maya ho ya Lalu, public kare to kare kya sare neta ek jaise h

Sonu Singh said...

मुझे आरएसएस को समझने के लिए कौन सा किताब पढ़ना पड़ेगा ?