Sunday, September 30, 2018

मुस्कुराना छोड़ ठहाका लगाइए आप खूनी लखनऊ में हैं

" ना तो हम रुके हुये थे और ना ही आपत्तिजनक अवस्था में थे। हमारी ओर से कोई उकसावा नहीं था मगर कास्टेबल ने गोली चला दी। " ये लखनऊ की सना खान का बयान है, जो कार में ड्राइवर की बगल वाली सीट पर बैठी थी । और ड्राइवर की सीट पर उनका बॉस विवेक तिवारी बैठा हुआ था । दोनो ही एप्पल कंपनी में काम करने वाले प्रोफेनल्स हैं। और शाम ढलने के बाद अपनी कंपनी के एक कार्यक्रम से रात होने पर निकले तो किसी फिल्मी अंदाज में पुलिस  कास्टेबल ने सामने से आकर सर्विस रिवाल्वर से गोली चली दी । जो कार के शीशे को भेदते हुये विवाक तिवारी के चेहरे के ठीक नीचे ठोडी में जा फंसी । और कैसे सामने मौत नाचती है और कैसे पुलिस हत्या कर देती है इसे अपने  बॉस की हत्या के 30 घंटे बाद पुलिस की इजाजत मिलने पर सना खान ने कुछ यूं बताया , 'हम कार्यक्रम से निकले और सर ने कहा कि वह मुझे घर छोड़ देंगे।

मकदूमपुर पुलिस पोस्ट के पास बायीं और से दो पुलिसवाले कार के बराबर आकर चलने लगे। वे चिल्लाये रुको । मगर सर गाडी चलाते रहे क्योंकि रात का समय़ था। उन्हें मेरी सुरक्षा की चिंता थी। पर तभी इनमें से एक कास्टेबल बाईक से उतरा और लाठी से गाड़ी पर वार करना शुरु कर दिया। मगर सर ने कार नहीं  रोकी। तो दूसरे ने गाडी को ओवरटेक किया और 200 मीटर आगे जाने के बाद सडक के बीच में बाईक रोक दी और हमें रुकने को कहा। हमारी कार कम गति से आगे  बढ़ रही थी और फिर गाड़ी रोक दी। तभी कास्टेबल ने अपनी बंदूक निकाली और सामने से सर पर गोली चला दी। सर ने गाडी पर नियंत्रण खो दिया और वह आगे चलकर खंभे से टकरा कर रुक गयी। मैंने ट्रक ड्राईवर को रोकने की कोशिश की  । बाद में गाडी पर गश्त लगा रहे पुलिस कर्मियों ने हमें देखा और उनसे सर को अस्पाताल ले जाने की गुजारिश की।' और उसके बाद जो हुआ वह बताने के लिये सना भी सामने ना आ सके इसकी व्यवस्था भी शुरुआती घंटों में पुलिस ने ही की। और जब सना को पुलिस ने इजाजत दे दी कि वह बता सकती है कि रात हुआ क्या तो झटके में योगी सिस्टम तार तार हो गया। उसके बाद लगा यही कि किस किस के घर में जाकर अब पूछा जाये कि कि उस रात क्या हुआ था जब किसी का बेटा, किसी का पति , किसी का बाप पुलिस इनकाउंटर में मारा जा रहा था। और  खाकी वर्दी ये कहने से नहीं हिचक रही थी, अपराधी थे मारे गये। फेहरिस्त वाकई लंबी है जो एनकाउंटर में मारे गये। नामों के आसरे टटोलियागा तो यूपी  के 21 नामो पर गौर करना होगा। मसलन गुरमित, नौशाद, सरवर, इकराम, नदीम , शमशाद, जान मोहम्मद, फुरकान , मंसूर, वसीम , विकास, सुमित , नूर मोहम्मद, शमीम, शब्बीर, बग्गा सिंह , मुकेश राजभर , अकबर, रेहान, विकास।  ये वो नाम है तो बीते डेढ बरस के दौर में एनकाउंटर में मारे गये। तो जो एनकाउंटर में मारे गये और एनकाउंटर में मारे गये लोगो के कमोवेश हर घर के भीतर आज भी ऐसा सन्नाटा है कि कोई बोल नहीं पाता। 12 मामले अदालत की चौखट पर हैं। पर गवाह गायब हैं। चश्मदीद नदारद हैं। कौन सामने आये। कौन कहे। पर सना के तो अपनी बगल की सीट पर मौत देखी। कानून के रखवालों के उस अंदाज को देखा जो कानून में हाथ लेकर हत्या करने के लिये बेखौफ थे  । खाकी वर्दी के उस मिजाज को समझा जो हत्या करने पर इस लिये आमादा थी क्योकि हत्या को एनकाउंटर कहकर छाती पर तमगा लगाना फितरत हो चुकी है।  वैसे ये पहली बार हुआ हो ये भी नहीं है ।

लेकिन पहली बार हत्या करने का लाइसेंस जिस तरह सत्ता ने पुलिस महकमे को यूपी में दे दिया है उसमें  एनकाउंटर हत्या हो नहीं सकती और हत्या को एनकाउंटर बताना बेहद आसान हो चला है । तो क्या बहस सिर्फ इसी कठघरे में आकर रुक जायेगी कि पुलिस से भी गलती हो डजाती है ।  क्योकि हत्या तो देहरादून में 3 जुलाई 2009 को भी  हुई थी । जब लाडपुर के जंगलो में पुलिस ने रणवीर नाम के एक छात्र के साथ खूनी खेल खेला था । हत्या तो दिल्ली के कनाटप्लेस में भी हो चुकी है।

अदालत ने पुलिस को हत्यारा कहने में भी हिचक नहीं दिखायी । लेकिन तबतक अदालत में सुनवाई के दौरान किसी अधिकारी ने ये नहीं कहा था कि इनकाउंटर पुलिस का हुनर हो चुका है । लेकिन यूपी के योगी माडल में ही जब अनकाउंटर  के बूते प्रमोशन का लालच सिपाही-हवलदार-दारोगा-कास्टेबल को दिया जा चूका  है तो सिपाही के दिमाग में इनकाउंटर के अलावे और क्या जायेगा । और नतीजतन खुले तौर पर हत्या करते वक्त भी किसी सिपाही के हाथ क्यो कापंगे जबकि  उसको पता है कि सत्ता में अपराधियो के भरमार है । पूरी राजनीति अपराधियों से पटा पड़ा है। तो ऐसे में सिपाही को अपराधी कहकर कैसे सियासत होगी और कौन राजनीति करेगा । यानी खुद अपने उपर से आपराधिक मामलों को कैबिनेट के जरीये जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ खत्म करा लेते है। जबकि चुनावी हलफनामे में आईपीसी की सात धाराओ के साथ तीन मुदकमें दर्ज होने का जिक्र था। पर सीएम ही जब अदालती कार्रवाई के रास्ते न्याय को खारिज करते हुये अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल करता हो तो फिर जिस कास्टेबल ने गोली चलायी , हत्या की उस खाकी वर्दी को बचाने का काम कौन सी सत्ता नहीं करेगी। क्योंकि सत्ता का एक सच तो ये भी है कि दस कैबिनेट मंत्री और 6 राज्य स्तर के मंत्रियों पर आईपीसी की धाराओ के तहत मामले दर्ज है । और ऐसा भी नहीं है कि दूसरी तरफ विपक्ष के सत्ता में रहने के दौर उसके कैबिनेट और राज्य स्तर के मंत्रियों के खिलाफ आईपीसी की आपराधिक धारायें नहीं थीं। डेढ दर्जन मंत्री तब भी खूनी दाग लिये सत्ता में थे। तो फिर हत्या करने वाले पुलिस का मामला अदालत में जाये या फिर पूरे मामले को सीबीआई को सौप दिया जाये। अपराधी होगा कौन। सजा मिलेगी किसे । और कौन गारटी लेगा कि अब इस तरह की हत्या नहीं होगी । दरअसल लकउन के मिजाज में अब मुस्कुराना शब्द ठहाके लेने में बदल चुका है । और कल तो मुसकुराते हुये आप अदब के शहर लखनऊ में होने का गुरु पाल सकते थे। लेकिन अब ठहाके लगाते हुये हत्या करना और हत्या कर और जोर से ठहाके लगाने वाला शहर लखनऊ हो चला है। बस जहन में ये बसा लीजिये कि लखनऊ की पहचान वाजिद अली शाह से नही योगी आदित्यनाथ से है।

24 comments:

Unknown said...

Great article sir

Unknown said...

Best Speec

Unknown said...

One of the best speech sir I am with you ...

Ashutosh Pandey said...

Awesome article

24*7 ever said...

Sir 10tak me miss kr rha hu apko

Unknown said...

Aap ko Master stroke pr Miss kar raha hu

Sakshi Pandey said...

सिर्फ लखनऊ क्यू?? अब तो भारत का मतलब भाजपा है और भाजपा का मतलब संविधान। और ये संविधान सामाजिक नैतिकता के आसरे नहीं बल्कि धर्म की बिसात पर चल रहा है।

Unknown said...

को नौकरी बचाने के विलोपित कर देना चाहिए
अंतिम और महत्वपूर्ण
जिस थाना क्षेत्र में यह घटना घटित हुई है वहां की कई रोड रात में कार में निर्लज्जों की ऐशगाह बन जाती है। जहां पर पुलिस कर्मी अपनी इज्जत बचाता है

कड़वा है सत्य है ।

Unknown said...

वो ड्यूटी पर था और सुन सान रास्ते पर धारा 497 ख़त्म होने का जश्न मना रहे दुनिया के सर्वाधिक महंगे सेल फ़ोन के मैनेजर को इतनी रात में एकांत में गाड़ी रोकने का कारण पूछने पर आन डयूटी पुलिस कांस्टेबल पर 3 बार गाड़ी चढ़ा कर जान से मारने की कोशिश की मीडिया और पब्लिक के अनुसार 2 पुलिस वालों को आपस में किसी एक कि मृत्यु होने का इंतज़ार करना चाहिए था ।

मेरा प्रश्न ये है कि अगर 1:30 बजे रात में कोई 2 पुरुष या महिला की वाहन में सुन सान रास्ते में गाड़ी रोक कर बैठे हैं। और शक होने पर कोई पुलिस कर्मी उनको रोकता है तो क्या वाहन में बैठे लोगों को उन पुलिस कर्मियों पर अपनी गाड़ी चढ़ाने का अधिकार कौन देता है।
अब पुलिस वाले ने आत्मरक्षा की तो 302 झेल रहा है।
दूसरा तथ्य
अगर पुलिस कर्मी रोक टोक न करते और दूसरे दिन उसी गाड़ी या जगह पर कोई घटना घटित हुई होती तो क्या पुलिस कर्मी पर कार्यवाही न होती इस प्रकार पुलिस कर्मी को अपने कर्तव्यों को नौकरी बचाने के विलोपित कर देना चाहिए
अंतिम और महत्वपूर्ण
जिस थाना क्षेत्र में यह घटना घटित हुई है वहां की कई रोड रात में कार में निर्लज्जों की ऐशगाह बन जाती है। जहां पर पुलिस कर्मी अपनी इज्जत बचाता है

कड़वा है सत्य है ।

Unknown said...

sahi hai

KARE EDUCATION said...

Missing master stroke... Left watching the news channel...

Unknown said...

Very sad circumstance

Unknown said...

Chaliye thodi der ke liye Maan lete h aapki sari baat Shi h par kya Goli marna si solutions tha wo ek police officer tha na ki ek aam Aadmi unhe bakayda training di jati hai porblpro Ko handle karne ke liye unke pass kai options the wo Goli unki tayar m bhi maar sakte the unke Baad already unki gari ruk jati ..ya control room call kar sakte the ..etc
..
Durbhgy hamari system ki h ek Baar aap police officer ban jao ya IAS officer hi q nhi phir job aapki h system aapki h sab kuch aapki h ki ye mansikta Hoti hai properly na koi training na koi infrastructure na hi koi monitoring sab raam bharose kabhi fursat mile to USA ya duniya ki police officer ke public ke saath ya criminal se deal karne ki training Janne ka pryaas kijiye ...karwa stya kya h ye important nhi h important h policeing system Ko Shi karne ki aaj aap India ke koi bhi State chale jaye dekh lijiye wo kitna samjhdaari or sensitive h hamari surksha ke liye.

Unknown said...

खुन का रंग लाल है लेकिन धर्म के रंग सफ़ेद होता है ,और बुरे दिन आने वाले हैं

Amit Arora said...

लिखते रहें इसी तरह। आपकी कलम सलामत रहे।

Unknown said...

Sir,
Yesterday, I when I was reading CAG report of 2016, I saw something interesting abot petrolium companies annual profit. Am sure u will definitely like to know about that. please reply...

Unknown said...

Miss u sir master Stoke always wirtting truth.i'm with you

Hanif Shaikh said...

सहमत 👍👍👍

A Y Qureshi said...

lage raho himmat nahi harna sach Kehne ke liye

Mahendra Singh said...

मारते रहिए मरवाते रहिए इससे कुछ काम करते रहने का एहसास भी होगा और टाइम पास भी होगा.

Mahendra Singh said...

हिम्मत तो इस शख्श में है.

Îftíkhâr said...

Great article sir, we all miss you on TV we very much miss #master_strok please start a your own channel on YouTube name of master stroke we all need your news. Thank you

Rajiv Ranjan Prakash said...

कई दिन से सोच रहा था कि कुछ लिखूँ या नही पर लगता है कि कहना ज्यादा उचित होगा। सिर्फ विरोध के लिए विरोध ठीक नही। यदि यूपी पुलिस कुछ नही करती तो उन्हें निठल्ली यूपी पुलिस कहा जाता है।वही पुलिस जिन्हे एक एक गोली का हिसाब देना पड़ता है। पर अपराधियों से कोई हिसाब नही मांगता। उस रात की घटना बड़ी विचित्र प्रतीत होती है। सिरह बड़ी कंपनी का अधिकारी होने से उनका चरित्र भी उत्तम होगा यह कहना मुश्किल है। यहां घटना का सिर्फ एक पक्ष रखा है पुण्य पासून जी ने। और पत्रकारों के बारे में यही कहा जता है कि वो क़भी निष्पक्ष नही होते। प्रसून जी अलग कैसे हो सकते हैं? इसलिए आजकल राजनेता हो या उद्योगपति या कोई कंपनी हर कोई पीआर कंपनी जे माध्यम से मीडिया को यूज(दुरुपयोग)कर रहा है।अभी कुछ दिन पूर्व ही संगीत सोम के घर बेम फोड़े गए और पुलिस ने गोली नही चलाई तो उन पर सरकार ने कार्रवाई करने की बात कह रही है। मेरा मानना है कि अपराधियों से उसी की भाषा में बात करने की नीति ही ठीक है।कुछ गलतियां भी होंगी पर अपराधियों में डर तो रहेगा। लेकिन यहां पुलिस और अपराधी तथा नेताओं के गठबंधन पर भी नज़र रखने एवं कार्रवाई करने की जरूरत है।प्रसून जी महंगाई,भ्रष्टाचार और अपराध मुद्दे हैं जो आज सभी समस्याओं की जड़ हैं।और इनपर कोई बात नही करता।आजकल प्लांटेड खबरों पर ही हर जगह चर्चा होती है।कोइक निष्पक्ष लिखिए तो ज्यादा अच्छा रहेगा। भारत में जहां कोई मुस्लिम नाम देखा नही कि सबकी धर्मनिरपेक्षता जग जाती है।देशप्रेम पीछे छूट जाता है।

Rajiv Ranjan Prakash said...

बिल्कुल सही विचार हैं आपके।यहाँ पब्लिसिटी और धर्मनिरपेक्षता का सिक्का ही चलता है।अभी हाल में ही लखनऊ में पास्पोर्ट ऑफिस का मामला पुराना नही हुआ है जब देश भर में मीडिया ने अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और धर्मनिपेक्षता पर बहस शुरू हो गई पर बाद में मामला कुछ और निकला।