Monday, March 16, 2009

“मिलिनियर मीडियाडॉग” - 1

एंकर के कान में आवाज गूंजती है....

...तालिबान ने स्वात घाटी पर कब्जा कर लिया है । एंकर स्क्रीन पर तालिबान के खौफ का समूचा खांका खींचता है। फिर पाकिस्तान के स्वात इलाके में तालिबान के कब्जे की बात कहता है। अभी बात अधूरी ही थी कि एंकर के कान में फिर आवाज गूंजती है....रुको--रुको । कब्जा नहीं किया है शरीयत कानून लागू करने पर तालिबान के साथ पाकिस्तान ने समझौता कर लिया है। एंकर कब्जे की बात को झटके में शरीयत कानून से जोड़ता है। तभी एंकर के कान में शाहरुख कान के कंधों के ऑपरेशन की खबर पहले बताने को कहा जाता है। शरीयत कानून पर शाहरुख का कंधा नाचने लगता है और टीवी स्क्रीन पर शहरुख "डॉन" का गाना गाते नाचते नजर आते है। एंकर शब्द दर शब्द के जरिये शाहरुख की कहानी गढ़ना शुरु ही करता है.....कि कानों में अचानक एक नया निर्देश आता है- डिफेन्स बजट में पैंतीस फीसदी की बढोत्तरी कर दी गयी है। एंकट लटपटा जाता है और उसके मुंह से निकलता है शाहरुख की सुरक्षा में पैंतीस फीसदी की बढोत्तरी। देखने वाल ठहाके लगाते है और कानो में नया निर्देश देते है ...हर खबर को मिलाकर रैप-अप कीजिये और ब्रेक का ऐलान कर दिजिये।

बात पीछे छूट जाती है और न्यूज चैनल अपनी रफ्तार में चलता रहता है। पांच दिनो बाद हफ्ते भर की टीआरपी के आंकडे आते हैं । एंकर टीआरपी में अपनी एंकरिंग के वक्त की टीआरपी खोजता है। उसे पता चलता है, जिस वक्त वह तालिबान से लेकर शाहरुख तक को एक दम में साधता जा रहा था, वही बुलेटिन टीआरपी में अव्वल है तो उसकी बांछें खिल जाती हैं। अचानक न्यूज रुम का वह हीरो हो जाता है। न्यूज डायरेक्टर उसकी पीठ ठोंकते हैं ।

अब एंकर हर बार खबर बताते वक्त इंतजार करता है कि एक साथ कई खबरें उसके बुलेटिन में आये, जिससे उत्तर आधुनिक खबर का कोलाज बनाकर वह दर्शकों के सामने कुछ इस तरह रखे की टीआरपी में उसके नाम का तमगा हर बार लगता रहे। न्यूज डायरेक्टर उसकी पीठ ठोंकता रहे और न्यूज रुम का असल हीरो वह करार दे दिया जाये।

यह टीवी पत्रकारिता का ऐसा पाठ है जो हर कोई पढ़ने के लिये बेताब है । लेकिन न्यूज चैनल के रोमांच का यह एक छोटा सा हिस्सा है । हर खबर को वक्त से पहले दिखाने की छटपटाहट से लेकर खबर गूदने की कला अगर न्यूज रुम में नहीं है तो सर्कस चल ही नहीं सकता। सुबह के दस या कभी ग्यारह बजे की न्यूज मीटिंग में क्रिएटिव खबरों को लेकर हर पत्रकार की जुबान कैसे फिसलती है और कैसे वह झटके में सबसे समझदार करार दिया जाता है...यह भी एक हुनर है । एक ने कहा, आज किसानों के पैकेज का ऐलान हो सकता है । उन इलाकों से रिपोर्ट की व्यवस्था करनी चाहिये जहां किसानो ने सबसे ज्यादा आत्महत्या की हैं। तभी दूसरा ज्यादा जोर से बोल पड़ा...अरे छोड़िये कौन देखेगा। आज रितिक रोशन का जन्मदिन है । उसके घर पर ओबी वैन खड़ी कर दिजिये और उसके फिल्मीसफर को लेकर कोई घांसू सा प्रोग्राम बनाना चाहिये। चलेगा यही । देश युवा हो चुका है । नयी पीढी को तो बताना होगा किसान चीज क्या होती है । सही है तभी एक तीसरे पत्रकार ने बारीकी से कहा...आज दोपहर बाद दिल्ली में एश्वर्या बच्चन एक अंतर्राष्ट्रीय घडी का ब्रांड एम्बेसडर बनेंगी तो उनसे भी रितिक के जन्मदिन पर सवाल किया जा सकता है । धूम फिल्म में दोनो ने एकसाथ काम भी किया था फिर उस फिल्म के जरीये घूम का वह किस सीन भी दिखा सकते है, जिसे लेकर खासा हंगामा मचा था और बच्चन परिवार आहत था।

तभी कार्डिनेशन वाले ने कहा, आधे धंटे का विशेष "किस-सीन" पर ही करना चाहिये। जिसका पेग रितिक-एश्रवर्य की किस सीन होगा । इसमें अमिताभ-रेखा से लेकर रणबीर-दीपिका का "किस -सीन" भी दिखाया जायेगा । आइडिया हवा में कुचांले मार रहा था तो आउटपुट को कवर करने वाले पत्रकार को आइडिया आया कि इस पर एसएमएस पोल भी करा सकते हैं कि दर्शको को कौन सा किस सीन सबसे ज्यादा पंसद है । खामोश न्यूज डायरेक्टर अचानक बोल पडे...आइडिया तो सही है। एसाइन्मेंट चीफ कहां खामोश रहते, बोले हां ...अगर इसका प्रोमो दोपहर से ही चलवा दिया जाये कि दर्शको को कौन सा "किस-सीन" सबसे ज्यादा पंसद है तो एसएमएस की बाढ़ आ जायेगी । फाइनल हुआ चैनल आज रितिक रोशन को बेचेगा ।

लेकिन सर..दिल्ली में और भी बहुत कुछ है ....उस पर भी ठप्पा लगा दे....यह आवाज पीएमओ और विदेश मंत्रालय देखने वाले पत्रकार की थी । संयोग से आज दिल्ली में पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री खुर्शीद कसूरी हैं। एक तरफ सरकार तालिबान का राग अलाप रही है और पाकिस्तान से युद्द के लिये दो-दो हाथ की तैयारी कर रही है...उस वक्त कसूरी का इंटरव्यू किया जा सकता है कि तालिबान का मतलब है क्या । बीच में ही आउटपुट-एसाइनमेंट के लोग एक साथ बोल पडे...कहां फंसते हैं, तालिबान का खौफ जब टीआरपी दे रहा है तो कसूरी के जरिये सबकी हवा क्यों निकालना चाहते हैं । तो सर एलटीटीआई को लेकर श्रीलंका की पूर्व राष्टरपति चन्द्रिका कुमारतुंगा से बात की जा सकती है । उनका इंटरव्यू लिया जा सकता है..संयोग से वह भी दिल्ली में हैं। एसाइन्टमेंट वाले को आश्चर्य हुआ कि उसे जानकारी ही नहीं कि यह सब दिल्ली में हैं तो सवाल किया, मामला क्या है..क्यों दोनो नेता दिल्ली पहुंचे हैं । जी..अय्यर की किताब का विमोचन है । कौन अय्यर.... मणिशंकर अय्यर । जी..वहीं । अरे अय्यर को कौन जानता है, उनकी क्रिडेबिलेटी या कहिये कांग्रेस के भीतर उन्हे पूछता ही कौन है । कौन देखेगा इनके गेस्ट को । छोड़िये। खामोश न्यूज डायरेक्टर फिर उचके और कहा, नजर रखिये प्रोग्राम पर कहीं कुछ कह दिया या फिर किसी ने कुछ दिखाया तो बताइयेगा...ऐसे कोई मतलब नहीं है इनके इंटरव्यू का ।
खैर छिट-पुट खबरों पर चिंतन-मनन के बाद दो घंटे की बैठक खत्म हुई । दोपहर के खाने को लेकर चर्चा हुई । कैंटिन और नये जायके को लेकर मंदी पर फब्ती कसी गयी । किसानों ने देश बचाया है...गर्व से कई तर्क कईयों ने दिये....उन्होंने भी जिन्होंने किसानों को टीवी स्क्रीन पर दिखाने को महा-बेवकूफी करार दिया था । खैर दिन बीता । समूची मीटिंग और रिपोर्ट करने ...खबर दिखाने की बहस हर दिन की तरह खत्म हुई । अगले दिन राजनीतिक दल को कवर करने वाला रिपोर्टर देश की राष्ट्रीय पार्टी के दफ्तर में बैठा था । तभी पता चला आज प्रेस कान्फ्रेन्स वरिष्ट नेता और सरकार में कबिना मंत्री रह चुके राष्ट्रीय दल के नेता लेंगे । पत्रकारों से बातचीत के बाद जब वह रिपोर्टर किसी सवाल पर प्रतिक्रिया लेने इस नेता के पास पहुंचा तो नेता-पूर्व मंत्री ने रिपोर्टर से कहा..आपके चैनल ने कल कमाल का प्रोग्राम दिखाया । किस हीरो का किस-सीन सबसे बेहतर है । क्रिएटिव था प्रोग्राम । मैंने तो कुछ देर ही देखा । तभी इस राष्ट्रीय पार्टी के कई छुटमैया नेता बोल पड़े । जबरदस्त था प्रोग्राम....हमने पूरा देखा । इसे रीपीट कब किजियेगा । अरे सर जरुर देखियेगा...खास कर इसका अंत जहां राजकपूर-नर्गिस और रितिक-एश्वर्या को एक साथ दिखाया गया है।

रिपोर्टर ने नेताओं की प्रतिक्रिया को हुबहू अगले दिन की न्यूज मीटिंग में बताया । न्यूज डायरेक्टर की बांछें खिल गयी । उन्हें व्यक्तिगत तौर पर लगा कि उनसे बेहतर कोई संपादक हो ही नही सकता है । न्यूज डायरेक्टर ने प्रोग्राम बनानेवाले प्रोडूसर को बधाई दी । फिर आधे दर्जन पत्रकारों ने एक-दूसरे की पीठ ठोंकी कि यह आईडिया उन्हीं का था । खैर पांच दिन बाद आयी टीआरपी में भी यह प्रोग्राम अव्वल रहा। चैनल ने एक पायदान ऊपर कदम बढाया।

दो हफ्ते बाद मुबंई के एक पांच सितारा होटल में विज्ञापनदाताओं की एक पार्टी हुई, जिसमं पहली बार एंकरो को भी बुलाया गया । विज्ञापन देने वाले एंकरो से मिलकर बहुत खुश हुये । विज्ञापन देने वालों के जहन में हर एंकर की याद उसके किसी ना किसी प्रोग्राम को लेकर थी तो कई तरह के प्रोग्राम का जिक्र हुआ तो एंकर ने भी छाती फुलायी और खुद को इस तरह पेश किया जैसे वह न होता तो उनका पंसदीदा प्रोग्राम टीवी स्क्रीन पर चल ही नहीं पाता। दो युवा एंकर तो खुद को हीरो-हीरोइन समझ कर फोटो खिंचवाने से लेकर ऑटोग्राफ देने और संगीत की धुन पर इस तरह मचले की लाइव शो हो जाता तो टीआरपी छप्पर फाड़ कर मिलती। उस रात के हीरो भी वही रहे और विज्ञापन देने वालो ने दोनो युवा एंकरो की पीठ ठोंकी और सीओ ने भी जब खुली तारीफ कर दी तो परिणाम अगले दिन से ही स्क्रीन पर नजर आने लगा। दोनो एंकरो को कई प्रोग्राम की एंकरिंग का मौका मिलने लगा । और न्यूज डायरेक्टर ने दिल खोलकर दोनो एंकरों को सबसे बेहतर करार दिया। दोनों ने खुद को सबसे बेहतरीन पत्रकार मान लिया । आफिस में रिपोर्टर-पत्रकारो की धडकन बढ़ गयी।

खबर परोसते न्यूज चैनलो की असल पहचान कमोवेश इसी वातावरण के इर्द-गिर्द घूमती है । यह एक ऐसा घेरा है, जिसमें समाने और ना समा पाने का सुकुन भी एक सा है । इस वातावरण को किसी एक न्यूज चैनल के घेरे में रखना वैसी ही मूर्खता होगी जैसे चैनलों पर परोसे जा रहे सच पर वाहवाही सिर्फ किसी एक नेता की मानी जाये या फिर जिन विज्ञापनदाताओ की पूंजी के जरीये न्यूज चैनल चलते हैं, उनमें सिर्फ चंद के खुश होने की बात कही जाये। यानी नेताओं की कमी नहीं और विज्ञापन देने वालो में भी इस विचार की भरमार है कि जो टीवी न्यूज चैनल पर दिखायी दे रहा है उन्हे देखने में मजा आता है । असल में हिन्दी पट्टी में हिन्दी के न्यूज चैनलों ने पहली बार भाषायी क्रांति के साथ साथ मुनाफे और बाजार की एक ऐसा परिभाषा गढ़ी है, जिसने समाज के भीतर एक नया समाज गढ़ दिया है । इस समझ के दायरे में जाति-शिक्षा-लिंग सब बराबर हैं। यानी जो समाज राजनीतिक तौर पर बंटा है या सामाजिक विसंगतियो का शिकार होकर दकियानुसी संवाद बनाता है, उसे टीवी के जरीये एक ऐसा जुबान दी गयी कि उसका विशलेषण राजनीतिक तौर पर होने लगे । मंगलौर के पब में लडकियो के साथ मारपीट जैसी स्थिति अगर बिना टीवी न्यूज चैनल के होती तो उसका स्वरुप यही होता कि जिन लडकों ने लडकियो के साथ बदसलूकी की उनका शहर में रहना दुभर हो जाता। या फिर लड़कियों के परिजन लुंपन लडकों की ऐसी पिटाई करते और मुथालिक का चेहरा काला कर शहर भर में घुमाते की उसकी हिम्मत नहीं पड़ती कि लडकियों की तरफ आंख भी उठा सके।
लेकिन कमाल टीवी का है । जिसने मुथालिक की गुंडागर्दी को नैतिकता के उस पाठ का हिस्सा बना दिया जिसकी दुहायी संघ परिवार गाहे-बगाहे देता रहता है । अब विशलेषण होगा तो मुथालिक महज पूंछ की तरह होंगे और आरएसएस सूंड की तरह नजर आयेगा। हुआ भी यही । और यही सूंड धीरे धीरे बीजेपी की राजनीति का हिस्सा बनी और बीजेपी इस मुद्दे को आत्मसात कर ले, इसका प्रयास कांग्रेस ने खुल्लमखुल्ला संघ से जोड़कर कर दिया । जो न्यूज "किस-सीन" के प्रोग्राम में खोये रहते, जब उनके माइक और कैमरा नेताओ की प्रतिक्रिया लेने निकले तो कौन नेता बेवकूफ होगा जो घटना पर अपनी जुबान न खोले । किसी को तालिबानी कल्चर दिखा तो किसी को हिन्दु समाज की नैतिकता । किसी को हिन्दु वोट नजर आया तो किसी को युवा वोट । जाहिर है क्या नेता, क्या सरकार, क्या गुंडा और क्या समाज सुधारक न्यूज चैनल के पर्दे पर कोई भी आये लगते सभी एक सरीखे है । कोई खबर किसी भी रुप में दिखायी जाये, उसके तरीके उसी मनोरंजन का हिस्सा बन जाते है जिसे खारिज करने के लिये मीडिया की जरुरत हुई । और उसे लोकतंत्र का चौथा खम्भा माना गया।...........................................................(जारी)

11 comments:

चन्दन चौहान said...

अच्छा लेख है

Dr. Smt. ajit gupta said...

न्‍यूज चेनल में आप सक्षात्‍कार लेते समय अपनी बातों को गोलमाल अंदाज में पेश करते हैं लेकिन यहाँ इतनी स्‍पष्‍टता से आपने मीडिया की पोल खोली है कि दिल खुश हो गया। सच में इस देश का भविष्‍य शायद भगवान के ही हाथ में है, क्‍योंकि प्रत्‍येक स्‍तम्‍भ अपनी-अपनी बटोरने में ही लगे हैं। इस धरती पर अवतार होते रहे हैं शायद और कोई आ जाए और हमारा उद्धार कर जाए। बढ़िया लेखन के लिए बधाई।

रात का अंत said...

मुझे नहीं लगता प्रसूनजी...जब तक आप जैसे गंभीर लोग मीडिया से जुड़े हैं तब तक इस तरह की दिक्कतें न्यूजरूम में होनी चाहिए..रही बात टीआरपी बटोरने के कवायद की तो किसी को पढ़ा था काफी पहले कि अभी टीवी हमारे यहां बच्चा है..तो जाहिर है बचपना तो दिखेगा ही लेकिन शायद गंभीरता भी तभी आएगी जब इस तरह के लेखों से मखौल उड़ाया जाए...बहुत कम लोग होते हैं जो खुद को कटघरे में खड़ा कर पाते हैं

SWAPNILA said...

JIS TARAH SANSAD ME BJP SINA THOKKAR YAH NAHI KAH SAKTI KI USNE MASJID TODI HAI THIK USI TARAH ELECTRONIC MEDIA YE NAHI KAH SAKTI KI WO SIRF BUSINESS KARTI HAI. AGAR YE SAFGOI AA JAYE TO BJP KO HAR BAR ATAKTE ATAKTE SAFAI NAHI DENI PADEGI AUR MEDIA BHI NIRLAJJ HOKAR BINA KISI ROKTOK KE YE CIRCUS CONTINUE KAR PAAYEGI.YE CHINTA KA VISYA HAI YA NAHI PAR SHAYD HI KOI YUVA IS CHETR ME KUCH BADLNE KE MAKSAD SE JATA HAI, KYOKI SARE VICHAR GLAMOUR KI DUNIA ME DHWAST HO CHUKE HAI. TRAINING KE DAURAN KEWAL ITNI HI BAATE HOTI HAI KI BOLNA BHAR AANA CHAHIYE, LOOK ACHHA HONA CHAHIYE AUR HA DIMAAG TO RAKHNA HI NAHI CHAHIYE AGAR WO CHAL GAYA TO AIK BHI NEWS CHANNEL ME KATHPUTLI NAHI BAN PAAYEGE. TADAT MAT DEKHIYE , QUALITY DEKHIYE TO SAMJH ME YAHI AATA HAI KI N AIM HAI, N APPROACH HAI, N ACTION HAI AUR NA HI ANALYSIS HAI SIRF TRP KA ROG HAI.

raviranjan kumar said...

bilkul sahi.media me kam karne wale bahu kam log media ki haqikat ko samne rakthe hai.dhanywad.......aapka jo electronic media ki kuch sachhi taswaeer ham logo ke samne rakhi hai..........

नदीम अख़्तर said...

बहुत शानदार वर्णन है इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की मानसिक कंगाली का। ऎसा लगा, जैसे मैं न्यूज़ रूम में हूं और रुटीन मीटिंग का हिस्सा हूं। विभिन्न अखबारों में काम करते हुए डेली मीटिंग का मेरा जो अनुभव है, उसमें हाल तक दकियानूसी बातों को तरजीह नहीं दी जाती थी। प्रिंट मीडिया में कम स‌े कम स‌ब्जेक्ट बेस्ड बातें होती हैं, जहां कम स‌े कम फूहड़ता परोस कर पाठक झटकने के बाद स‌ंपादकगण स‌ीना नहीं चौड़ा करते। हां, ये अलग बात है कि वैचारिक खोखलेपन के दौर स‌े प्रिंट मीडिया भी गुज़र रहा है लेकिन अभी भी गंध मचाने की दौड़ में प्रिंट मीडिया इलेक्ट्रॉनिक स‌े कोसों दूर है। खैर, अगर आपको फुर्सत मिले, तो कभी रांची आने के बारे में भी स‌ोचिये। यहां बहुत दिन हो गया है, लोगों स‌े मिले-जुले। रजत दा स‌े आपकी चर्चा हुआ करती है। रजत दा अभी देहरादून में हैं। खैर, बात होती रहे..। खुदा हाफिज़।


रांचीहल्ला

mohit said...

aapko yaad hoga..

kahbrey to mahaj ek bahanaa hai dar-asal hamey aapko jagana hai....

creativekona said...

आदरणीय प्रसून जी ,
आपने न्यूज रूम ,वहां की
स्थितियों ,उठापटक ,ऊपरी दबावों ...और इन सब को ठेंगा दिखा कर खुद को हीरो साबित करने वालों का बहुत अच्छा वर्णन किया है .मुझे लेख के अगले भाग का इंतजार रहेगा .लम्बी कहानी या उपन्यास लिखने के लिए अच्छा प्लाट
है.शुभकामनाओं के साथ.
हेमंत कुमार

Tara Chandra Gupta "MEDIA GURU" said...

bahut sundar lekh sir. news room ki sari kahani trp ke sath gadh dali. achha lekh.

पशुपति शर्मा said...

मिलियनेयर मीडियाडॉग के भौंकने की वजह और अंदाज पर एक अच्छी टिप्पणी है... बिलकुल सच कहा सर आपने... मीडिया खुद ही मुद्दों को इस तरह से गड्ड मड्ड कर देता है कि असली सवाल कहीं गुम हो जाता है...
एंकर के साथ होने वाले छह पांच को भी आपने बखूबी बयान किया है... कमांड दर कमांड... कंफ्यूजन दर कंफ्यूज लेकिन टीआरपी आ जाए तो सब बल्ले

himmat said...

आपका अरण्यरुदन मेने सुना और में भी रोया. बात पतेकी की आपने लेकिन करीबन येही हाल हे हर क्षेत्र का. सुनाई देता हे की उत्क्रांत होता जा रहा हे समाज. पर हमें तो अधोगमन के सिवा कुछ नहीं दिखाई देता हे. हम तो बेदाग़ होकर इस दुनिया से विदा लेनेके अलावा इस जगत से और कुछ कामना नहीं रखते हे. हमें ये जगत रास नहीं आ रहा हे. और नहीं आ रहा हे इसकी कोई फरियाद भी नहीं रखते हम. देखे जा रहे हे जो नजरके सामनेसे गुजरता हे. लेकिन आरजू ये बची हे की आपजेसे हमदर्द से मुलाक़ात हो जाय तो कंधे सर रख कर खूब रोना हे हमें. में जानता हु की वक़्त के चलते ये आरजू भी चली जायेगी.