Wednesday, March 4, 2009

आतंकवाद की धार के आगे भोथरी क्यों है सरकार

श्रीलंका को एक पहचान और शोहरत क्रिकेट ने दी। उसके नायक बने जयसूर्या। ठीक उसके उलट श्रीलंका को एक दूसरी पहचान एलटीटीई ने दी और उसके नायक-खलनायक रहे है प्रभाकरण। संयोग से दोनों की पहचान ही लाहौर में आमने सामने आ गयी। एलटीटीई अपने सबसे बड़े संकट के दौर से गुजर रहा है क्योंकि श्रीलंका में उसका सफाया करने के लिये फौज भिड़ी हुई है। ऐसे में सरकार से सौदेबाजी के लिये क्रिकेट टीम पर निशाना साधना उसके लिये सबसे बडी सफलता हो सकती थी। असल में लाहौर में श्रीलंका क्रिकेट खिलाड़ियों को बंधक बना कर एलटीटीई के अनुकूल स्थितियों को बनाने की साजिश हरकत-उल-मुजाहिदीन ने रची। संयोग है कि बंधक बनाया नहीं जा सका। असल में इस घटनाक्रम ने समूची दुनिया के सामने एक साथ कई सवालों को खड़ा कर दिया है।

मसलन आतंकवाद के अपने तार और उनकी अपनी प्रतिबद्दता को लेकर लोकतांत्रिक सरकारों का रुख क्या होना चाहिये। जिस तर्ज पर दुनिया में समाज बंट रहा है, उसमें जब सरकारें एक वर्ग या एक तबके के हित को ही देख कर अपनी अपनी सत्ता बरकरार रखने में जुटी हैं और हिंसा सौदेबाजी के लिये सबसे धारदार हथियार बनता जायेगा तो उस सिविल सोसायटी का क्या होगा जो लोकतंत्र को आधुनिक दौर में सबसे बेहतरीन व्यवस्था माने हुये है। लोकतंत्र के नाम पर सत्ता की तानाशाही अगर नीतियों के सहारे लोगों को मार रही हों तो बंदूक के आसरे लोगों को मौत के घाट उतारने की पहल और कथित लोकतंत्र में अंतर क्या होगा। असल में यह सारे सवाल इसलिये उठ रहे हैं क्योकि एलटीटीई के संबंध पाकिस्तान के हरकत-उल-मुजाहिदीन के साथ तब से हैं, जब उसका नाम हरकत-उल-अंसार था। उस वक्त वह इंटरनेशनल इस्लामिक संगठन का सदस्य था और दो दशक पहले इस्लामिक संगठन से जुड़े अल-कायदा के सदस्य के तौर पर न सिर्फ उसने अपनी पहचान बनायी बल्कि आतंकवादी संगठनों के बीच मादक द्रव्य और हथियारों की तस्करी का जो धंधा चलता, उसमें यह संगटन सबसे मजबूत भूमिका में था।

1993 में पहली बार बारत के कोस्टल गार्ड ने एलटीटीई के एक जहाज की बातचीत को जब पकड़ा तो उसमें यही बात सामने आयी कि कराची से चला जहाज उत्तरी श्रीलंका के वान्नी क्षेत्र में जा रहा है। इस जहाज में हथियार लिये हुये एलटीटीई का नेता किट्टू मौजूद है। एलटीटीई को भी इसकी जानकारी मिल गयी कि भारतीय नेवी पीछे लगी हुई है तो उसने उस जहाज को अरब सागर में ही जला कर डुबो दिया । लेकिन उसके बाद कई तरीकों से यह बात खुलकर उभरी की अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच हेरोईन की तस्करी में एलटीटीई का खासा सहयोग पाकिस्तान के आतंकवादी संगठन लेते रहे। जिन्हे आईएसआई की भी मदद मिलती और एक वक्त नवाज शरीफ की तो खुली शह थी। उस दौर में दक्षिणी फिलिस्तीन में हथियार पहुंचाने का जिम्मा हरकत-उल-अंसार के ही जिम्मे था, जिसके पीछे आईएसआई खड़ी थी। लेकिन मदद के लिये एलटीटीई का ही साथ लिया गया। क्योंकि समुद्री रास्ते में एसटीटीई से ज्यादा मजबूत कोई दूसरा था नहीं। फिर हथियारों को लेकर जो पहुंच और पकड़ नब्बे के दशक में एलटीटीई के साथ थी, वैसी किसी दूसरे के साथ नहीं थी । 1995 से 1998 के दौरान आईएसआई ने एलटीटीई को इस मदद के बदले पहली बार एंटी एयरक्राफ्ट हथियार और जमीन से आसमान में मार करने वाली मिसाइल भी दी थीं, जिसको लेकर श्रीलंका की सरकार ने उस वक्त परेशानी जतायी और पाकिस्तान पर अंतर्राष्ट्रीय दबाब भी बनाया।

असल में एलटीटीई और आईएसआई के बीच रिश्ते यहीं खत्म नहीं होते। नौ ग्यारह के बाद पाकिस्तान और अफगानिस्तान जब अमेरिकी निगरानी में आया और नाटो सैनिको की तैनाती इन क्षेत्रो में हुई तो एलटीटीई के जरिये हथियारों को फिलिस्तीन समेत अरब देशों में पहुंचाने के लिये म्यानार और दक्षिणी थाईलैड का रास्ता चुना गया। जाहिर है इस लंबी कवायद के दौर में अगर एलटीटीई कमजोर होता है...जो वह हो चुका है तो श्रीलंकाई सरकार को झुकाने के लिय क्रिकेट खिलाडियों से बेहतर सौदेबाजी का कोई प्यादा हो नही सकता था।

दरअसल इस कार्रवाई में 37 साल पहले के उस म्यूनिख ओलंपिक की याद भी दिला दी जिसमें शामिल होने पहुंचे इजरायल के 11 एथलिट और कोच को बंधक बनाकर 234 फिलिस्तिनियों की रिहायी की मांग यासर अराफात समर्थित आंतकवादी संगठन ब्लैक सैप्टेंबर ने की थी। श्रीलंका की क्रिकेट टीम में सबसे उम्र दराज खिलाड़ी जयसूर्या है। जिनका जन्म म्यूनिख ओलंपिक के दो साल बाद हुआ था, लेकिन उस दौर की तस्वीर इस तरह पाकिस्तान में सामने आएगी, यह जयसूर्या ने सोचा ना होगा।

लेकिन इस घटना ने भारत के सामने एक साथ कई सवाल खड़े किये है । खासकर पाकिस्तान को लेकर भारत जिस लोकतंत्र के होने की दुहायी देता है, उसमें क्या वहां की व्यवस्था इसके लिये तैयार है। फिर आतंकवादी हिंसा अगर किसी देश को आगे बढ़ाने का हथियार बनती जा रही है, जिसे सैनिक और नागरिक मदद के नाम पर अमेरिका शह दे रहा है तो क्या उसे मान्यता दी जा सकती है। और इन परिस्थितयों के बीच एक तरफ क्रिकेट सरीखे खेल की पांच सितारा दुनिया और दूसरी तरफ चुनाव के जरिये लोकतंत्र का अलख जगाने की चाह....कैसे चल सकती है । फिर देश के भीतर जब पाकिस्तान से ज्यादा मुसलमान मौजूद है तो धर्म के नाम पर बांटने की राजनीति और अमेरिका की जनसंख्या से ज्यादा लोग जब गरीबी की रेखा से नीचे हो तो देश में आर्थिक सुधार का मजमून कैसे चल सकता है। कहीं किसी भी रुप में सौदेबाजी कर सत्ता या सरकार को पटखनी देने का नया रास्ता तो नहीं खुल रहा है । सवाल कई हैं लेकिन समाधान अब पहले देश को एक धागे में पिरोने का ज्यादा है...अन्यथा संगीनों की कमी का राग अलाप कर क्रिकेट टूर्नामेंट आईपीएल रद्द तो ऐलान तो किया जा सकता है लेकिन देश में भरोसा नही जगाया जा सकता ।

10 comments:

अंशुमाली रस्तोगी said...

लेख वैचारिक है।
दरअसल, यह हकीकत है कि सरकारें आतंकवाद पर गंभीर नहीं हैं। सरकारों के लिए सत्ता और वोट और इसके सहारे पनपने वाला भ्रष्टाचार ही अहम है। वे जनता के हित नहीं, अपने हित सत्ता की जमीन पर तय करती हैं।
याद रखें, आतंकवाद और आतंकवादी की मार नेता, सरकार या सत्ताएं नहीं सिर्फ जनता की झेलती है। और झेलती रहेगी।

वर्षा said...

आज के अख़बार में जब पढ़ा कि भारत की खुफ़िया एजेंसियां इसके पीछे हो सकती हैं, तो सकते में आ गई। लिट्टे, तालिबान, आईएसआई, रॉ कितने दोस्त हैं दहशतगर्दों के।

गुस्ताख़ said...

कई लोग ये कयास लगा रहे हैं कि पाकिस्तान में इन हमलों के पीछ रॉ का हाथ हो सकता है। देखिए संसार के किसी देश की खुफिया एजेंसी दूध की धुली नहीं हो सकती। जैसी रणनीतिक चालें जनता के तताकथित हित में नक्सली और वामपंथी चलते हैं ऐसी चाल खुफिया एजेंसियां भी अपने देशों के हित में चलती हैं। अब मुंबई हमलों का आरोप अगर आईएसआई पर आया तो रातों रात पाकिसतान की एजेंसी ने यह भी पता लगा लिया कि लाहौर के हमले के आतंकवादी भारत एक रास्ते आए और उन्हे सूबूत भी मिल गए। जिस तरह बिहार पुलिस को चोरी की वारदातों का पहले से पता होता है वैसे ही उन्हें भी इन हमलों का लगता है पहले से ही पता था क्या। आतंकवाद और हिंसा अपने किसी भी स्वरुप में निंदनीय है। भारत इससे कैसे निपटेगा..वैसे ही जैसे निपटना चाहिए। हिंसा का जवाब प्रतिहंसा से देकर। तालिबान के खिलाफ गांधीगीरी कामयाब नहीं होने वाली..।

aahsas said...

आतंकवादी संगठनों का भुमंदलिकरण तो हो रहा है और ये बड़े सुनियोजित रूप से MoU पर हस्ताक्षर कर के आपसी सहयोग से अपने कार्यवाहिओं को अंजाम दे रहे हैं पर दिमाग में खलल तब होती है की आखिर हम उनके नापाक इरादों के खिलाफ कोई साझा संगठन क्यों नहीं खडा कर पाते हैं,`लेकिन आचे विचारों चोर-चोर मौसेरा भाई`ये कहावत तो सुनते आया हूँ लकिन अच्छे विचारून का कोई रिश्ते बने ऐसा देखने को नहीं मिला है..लेकिन मैं मनुष्य के भविष्य से निराश नहीं हूँ !

aahsas said...

आतंकवादी संगठनों का भुमंदलिकरण तो हो रहा है और ये बड़े सुनियोजित रूप से MoU पर हस्ताक्षर कर के आपसी सहयोग से अपने कार्यवाहिओं को अंजाम दे रहे हैं पर दिमाग में खलल तब होती है की आखिर हम उनके नापाक इरादों के खिलाफ कोई साझा संगठन क्यों नहीं खडा कर पाते हैं,`लेकिन आचे विचारों चोर-चोर मौसेरा भाई`ये कहावत तो सुनते आया हूँ लकिन अच्छे विचारून का कोई रिश्ते बने ऐसा देखने को नहीं मिला है..लेकिन मैं मनुष्य के भविष्य से निराश नहीं हूँ !

vipin dev tyagi said...

आतंकवाद आज जो शक्ल अख्तियार कर चूका है..उस पर काबू पाना आसान नहीं लग रहा है..वो भी तब जब दुनियाभर के देशों की सरकारें...रीड की हड्डी से कमजोर साबित हो चुकी हैं..सरकार किसी भी पार्टी की हो..या रही हो...लेकिन मजबूत आतंरिक और सुरक्षा नीति किसी के पास नहीं है..आतंकवाद का मुकाबला मौकापरस्त राजनीति...वोटबैंक के खातिर...दुश्मन को दोस्त बनाने...अपना काम निकालने वाली सोच से नहीं हो सकता है...पूर्व यूएसएसआर से मुकाबला करने के लिये अमेरिका की सीआई ने तालिबान बनाया...वो ही तालिबान आज अमेरिका सहित पूरी दुनिया के लिये खतरा बन चुका है...भारत में आतंक फैलाने के लिये आईएसआई ने लश्कर और दूसरे नाम से आतंकी संगठनों को खड़ा किया..आज ना तो वो आतंकी संगठन आईएसआई के कंट्रोल में हैं ना ही पाकिस्तान की सकार के..उनके सरमायेदार आज पूरी दुनिया में है..दुनियाभर से करोड़ों रूपये की मदद इन संगठनों को मिल रही है..अब ये संगठन सरकार के सामने शर्त रखने..अपनी मर्जी से समझौता करने की हैसियत हासिल कर चुके हैं...ठीक इसी तरह दो दशक पहले अकाली दल के बढ़ते राजनीति प्रभाव का मुकाबला करन के लिये भिंडरवाला नाम का एक जिन्न बोतल से निकाला गया...कई सालों तक पंजाब की धरती खून की होली खेलती रही..अब जाकर खेतो में फिर फसल लहराने लगी है...जहां तक मुझे समझ आता है किसी भी संगठन के हिंसक होने,नक्सली होने,या हाथ से निकलने में...कहीं ना कहीं उन सरकारों की कमी रही है..जो उस वक्त की नब्ज को पकड़ नही पायीं...वो उस गुस्से,असंतोष,पहले चिंगारी को समये रहते बुझा नहीं पायीं...जलती आग पर मुंह से फूंक मारने और मुंह में पानी भरकर फेंकने से काबू नहीं पाया जा सकता...ना कल ना आज, ना आने वाले कल...

Rishi Rish said...

पहली बार मैं आपके आंकलन से सहमत नहीं हूँ । यह एक अच्छा विचार लगता है कि ये हमला लिट्टे ने हरकत-उल-मुजाहिदीन की सहायता से करवाया है, पर प्रथम दृष्टया ये कार्रवाई तालिबान और पाकिस्तानी सेना की मिली-जुली साजिश ज़्यादा प्रतीत होती है । इसके पीछे दो कारण हो सकते हैं । पहला तो यह कि इस घटना के बाद भारत का पाकिस्तान पर मुंबई हमलों की जाँच और उसके दोषियों को सजा दिलाने की बात को इस घटना की आड़ में आसानी से भुला दिया जायेगा क्योंकि मुंबई हमलों के समान ही इसे बताकर पाकिस्तान अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को यह समझाने में कामयाब रहेगा कि वह ख़ुद भी भारत की ही तरह आतंकवाद का शिकार है, और उसके लिए इस वक्त इस घटना की जांच पाकिस्तान की साख पर लगे धब्बे को मिटाने के लिए मुंबई हमलों की जांच से कहीं ज़्यादा जरूरी है । आखिरकार श्रीलंका की टीम उस समय पाकिस्तान जाकर खेल रही थी, जब अधिकांश देशों ने पाकिस्तान में सुरक्षा के हालात के मद्देनज़र वहां जाने से मना कर दिया था । भारत के मुंबई हमले की जांच और उसके दोषियों पर कारवाई की मांग को बरकरार रखने की दशा में पाकिस्तान इस हमले के तार भारतीय खुफिया एजेंसियों से भी जोड़कर प्रोपगंडा फैला सकता है । इस समय भारत में आम चुनाव होने और उसके बाद नै सरकार के आने कि स्थिति में वैसे भी पाकिस्तान पर लगातार दबाव बनाये रखना सम्भव नहीं है ।

दूसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पाकिस्तानी सेना और तालिबान की नूरा-कुश्ती स्वात घाटी में दुनिया देख चुकी है । पाकिस्तानी सेना और खासकर जनरल अशफाक परवेज़ कयानी ज़रदारी को असफल साबित कर पाकिस्तानी अवाम को ये संदेश देना चाहते हैं कि ऐसे समय में पाकिस्तान की चुनी हुई सरकार देश को सही तरीके से चलाने में सक्षम नहीं है और तालिबान के बढ़ते क़दमों और अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी में मुल्क की खोई हुई इज्ज़त को अगर कोई वापस लौटा सकता है तो वो सेना ही है, और इसमे कोई अचरज नहीं कि पाकिस्तान के अन्दर से ऐसी आवाजें आनी शुरू भी हो गयी हैं । यहाँ तक कि मुशर्रफ़ को सत्ता से हटाने के लिए आसिफ अली ज़रदारी से हाथ मिलाने वाले उनके के कट्टर विरोधी मियां नवाज़ शरीफ ने भी मुशर्रफ़ को ज़रदारी से बेहतर राष्ट्रपति बताया है । पाकिस्तानी सेना और तालिबान का ये लुका-छिपी का खेल अमेरिका पर दवाब बना कर उसको अफगानिस्तान और पाकिस्तान से पीछे हटाने के लिए भी है । क्योंकि एक बार सेना के पाकिस्तान में सत्ता पर काबिज़ होने के बाद तालिबान को वापस अफगानिस्तान लौटने और उनको अफगानिस्तान में सत्ता में साझेदारी के फोर्मूले को सामने रख कर अमेरिका से अफगानिस्तान में शान्ति वहाली और वहां से उसके निकलने के सम्मानजनक रास्ते पर समझौते को आसानी से अमेरिका को बेचा जा सकता है ।

राजकुमार ग्वालानी said...

पाक से सभी खेलों के रिश्ते हर देश को तोड़ लेने चाहिए। पाक ने जिस आश्वासन के साथ लंकाई टीम को अपने घर बुलाया था उस आश्वासन पर पाक सरकार खरी नहीं उतरी। जो टीम ऐसे समय में पाक की इात बचने गई थी जब भारतीय टीम ने वहां जाने से इंकार कर दिया था ऐसी टीम को तो पाकिस्तान में ज्यादा से ज्यादा सुरक्षा देनी थी, लेकिन हमले ने साबित कर दिया कि पाक में टीम की सुरक्षा पर ध्यान ही नहीं दिया गया। पाक में तो अब क्रिकेट समाप्त ही हो जाएगा। पाकिस्तान जाने के लिए कोई टीम क्या किसी भी देश का आम नागरिक तैयार नहीं होगा।

Rishi Rish said...

Please read these links alonwith what I've written above sometimes back :

http://ibnlive.in.com/news/perform-or-perish-pak-army-chief-tells-zardari/87178-2.html

http://ibnlive.in.com/news/afghan-welcomes-obamas-call-to-reach-out-to-taliban/87181-2.html

I was quite close to reading the things much earlier.

rajani kant said...

प्रसून जी आपने लेख बहुत अच्छा लिखा है। लेकिन आपसे उम्मीद नहीं थी कि आप आंकड़ों से खिलवाड़ कर चमत्कार करने की कोशिश में असलियत से मुंह मोड़ लेंगे। आपने जिक्र किया है कि जयसूर्या की उम्र 37 साल है। जबकि कुछ ही महीनों में वो चालीस साल के हो जाएंगे। उनका डेट ऑफ बर्थ
30 जून, 1969 है। आपने अपने ब्लॉग और देनिक भास्कर अखबार के अलावा जी न्यूज़ के लाखों दर्शकों को गलत जानकारी दी। अगर आप लेख लिखने से पहले थोड़ा होमवर्क कर लेते तो ऐसी गलती नहीं करते। लेकिन जब इंसान को दंभ हो जाता है तो वो रावणोचित व्यवहार करने ही लगता है।