Friday, March 20, 2009

मिलिनियर मीडियाडॉग-पार्ट 2

लेकिन मीडिया का यह पहला चैप्टर है, जो न्यूज रुम से शुरु होता है। दूसरा चैप्टर मीडिया का मतलब बिजनेस और चलाने का मतलब मुनाफा वसूली से जुड़ा है। ये चैप्टर उस न्यू इकॉनमी की देन है, जिसमें न्यूज चैनल के लिये लाइसेंस खरीदने से चौथा पाया होने की शुरुआत होती है।

न्यूज चैनल के लिये लाइसेंस का मतलब आपका हाथ-चेहरा । अगला-पिछला सबकुछ सफेद हो । वैचारिक तौर पर सेक्यूलर और लोकतांत्रिक होने की पहचान आपके साथ जुड़ी हो । अपराध या भ्रष्टाचार का तमगा आपकी छाती पर न टंगा हो। जाहिर है यह ऐसी नियमावली है, जिसकी कोई कीमत नहीं लगा सकता और जो लगायेगा वह वसूली भी ऐसी करेगा कि सामने वाले का सबकुछ काला हो, तभी संभव है। तो सरकार के मंत्री से लेकर चढ़ावा लेते बाबूओ की पूरी फौज, एनओसी की मुहर की व्यवस्था आईबी रिपोर्ट से लेकर थाने की रिपोर्ट तक की करा देती है।

सवाल है कि किसी के पास न्यूज चैनल का लाइसेंस जब इतने चढ़ावे के बाद आ ही जाता है तो वह अपनी मुनाफा वसूली कैसे करेगा । पहला तरीका है लाइसेंस को एक साल के लिये किसी बेहतरीन पार्टी को बेच देना। कीमत एक करोड़ से लेकर कुछ भी । यानी सामने वाला लाइसेंस लेकर बाजार को किस तरह दुह सकता है....यह उसकी काबिलियत पर है । और अगर लाइसेंस के जरुरतमंद की पहुंच-पकड़ राजनीतिक पूंजी से जुड़ी होगी तो लाइसेंस की कीमत पांच करोड़ तक लगती है। न्यूज चैनल के कई लाइसेंस इस तरह खुले बाजार में लगातार घुम रहे हैं। कुछ खरीदे भी गये और चल भी रहे हैं। लेकिन सवाल है इस हालात में न्यूज रुम को भी करोड़ों के वारे न्यारे करने हैं...और चूकि चैनल का प्रोडक्ट खबर है तो खेल को पूंजी में बदलने का खेल यहीं से शुरु होता है। सबसे पहले खबर को कवर करने वाले पत्रकारों को चैनल का मंच देकर वसूली के नियम कायदे बता दिये जाते हैं। उसके भी दो तरीके हैं। खबरों को दिखाने के बदले सीधे पांच से पचास लाख तक का टारगेट सालाना पूरा करना । या फिर राज्यों के ब्यूरो को पचास लाख से लेकर एक करोड़ तक में बेच देना। यह तरीका सीधे खबरों को बिजनेस में फुटकर तौर पर भी बदलना माना जा सकता है।

लेकिन संभ्रात तरीका किसी राजनीतिक दल या किसी राज्य सरकार से सौदेबाजी को मूर्त रुप में ढालना है । यह सौदा चुनाव के वक्त जोर पकड़ता है। जिसमें पांच करोड़ से लेकर पचास करोड़ तक सौदा हो सकता है। राज्यों के चुनाव में यह सौदा राजनीतिक दलों में खूब गूंजता है। पिछले चुनाव में जो पांच राज्यों के चुनाव हुये, उसमें कई चैनलों के वारे न्यारे इसी सौदे से हो गये। चुनाव चाहे लोकतंत्र की पहचान हो लेकिन चुनाव का मतलब लोकतांत्रिक तरीके से पूंजी और मुनाफा वसूली की सौदेबाजी का तंत्र भी है, जो सभी को फलने फूलने का मौका देता है । लेकिन यह तंत्र इतना मजबूत है कि इसके घेरे में समूचा मीडिया घुसने को बेताब रहता है। यानी यहां टीवी या अखबार की लकीर मिट जाती है। लोकतंत्र में चुनाव का मतलब महज यही नहीं है, मायावती टिकटो को बेचती हैं या फिर बीजेपी और कांग्रेस में पहली बार टिकट बेचे गये। असल में चुनाव में खबरों को बेचने का सिलसिला भी शुरु हुआ। इसका मतलब है अखबारों में जो छप रहा है, न्यूज चैनलो में जो दिख रहा है, वह खबरें बिकी हुई हैं। इसके लिये भी रिपोर्टर को टारगेट दिया जाता है। और संस्थान संभ्रात है तो हर सीट पर सीधे चुनाव लड़ने वाले प्रमुख या तीन उम्मीदवार से वसूली कर एडिटोरियल पॉलिसी बना देता है कि खबरो का मिजाज क्या होगा। यह सौदेबाजी प्रति उम्मीदवार अखबार के प्रचार प्रसार और उसकी विश्वसनीयता के आधार पर तय होती है, जो एक लाख से लेकर एक करोड़ तक होती है। मसलन उत्तर प्रदेश के बहुतेरे अखबार इस तैयारी में है कि लोकसभा चुनाव में कम से कम पचास से सौ करोड़ तो बनाये ही जा सकते हैं। बेहद रईस क्षेत्र या वीवीआईपी सीट की सौदेबाजी का आंकलन करना बेवकूफी होती है क्यकि उस सौदेबाजी के इतने हाथ और चेहरे होते हैं कि उसे नंबरो से जोड़कर नहीं आंका जा सकता है। इन परिस्थितियो में खबरों को लिखना सबसे ज्यादा हुनर का काम होता है, क्योंकि खबरों को इस तरह पाठको के सामने परोसना होता है, जिससे वह विज्ञापन भी न लगे और अखबार की विश्वसनीयता भी बरकार रहे। मतलब खबरों के दो चेहरे है मगर मकसद एक है। पहला "किस-सीन" सरीखे प्रोग्राम टीआरपी देंगे और समाज को जो लुभायेगा,उसे बिजनेस और मुनाफे में बदला जा सकता है । दुसरा खबर को ही धंधे में बदल दिया जाये, जिससे मुनाफा वसूली के लिये टीआरपी ना देखनी पडी और न्यूज प्रोडक्ट का जामा भी बरकरार रहे ।

असल में यह परिस्थितियां किसी एक न्यूज चैनल या नेताओं या फिर ब्रांड चमकाने के लिये बाजार से मुनाफा बटोरने भर की नहीं हैं। यह एक पूरा समाज है जो देश को अपने घेरे में लाना चाहता है या फिर अपने घेरे से ही देश की लीक बनाना चाहता है। इन हालात के बीच मीडिया में खबरों के लौटने का मतलब एक ऐसे लोकतंत्र का जाप करना है, जिसमें सत्ता का चेहरा कभी खुरदुरा ना दिखे । क्योंकि चैक एंड बैलेंस की जो थ्योरी संविधान के जरीये लोकतंत्र के हर पाये को एक दूसरे की निगरानी के तहत खड़ा किया गया और अगर साठ साल बाद यही पाये अपने को बचाये रखने के लिये चैक एंड बैलेस का खेल खेल रहे है तो देश की बहुसंख्यक जनता को यह महसूस होता रहेगा कि दुनिया के सबसे बडे लोकतांत्रिक देश का वह नागरिक है। और चुनाव के दिन आप वोट नहीं डाल रहे हो तो आप सो रहे हैं का ताना आपको आपकी जिम्मेदारी का एहसास करा कर एक नयी सौदेबाजी में निकल सकता है। वैसे भी खुद को लोकतांत्रिक कहलाने का प्रोगपेंडा सबसे मंहगा सौदा होता है। और इस सौदे के घेरे में जब लोकतंत्र का ही पाया हो तो बात ही क्या है ।

10 comments:

डॉ .अनुराग said...

मीडिया अब लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ नहीं रह गया है प्रसून जी ...वो भी केवल वही सच उठाता है जो व्योपारिक दृष्टि से उसके लिए महत्वपूर्ण हो...अब खोजी पत्रकारिता कहाँ है .सिद्दांतो ओर असूलो की ?छह सात साल बाद कोई भी पत्रकार अपना नया चैनल खोल लेता है .... देखिये इंडिया टुडे के सो कॉल्ड बुद्दिजीवी बहस में शाहरुख़ खान ओर करण जोहर फिल्म को प्रतिनिधित्व करते है .नसीर ..श्याम बेनेगल ,शबाना ,गोविन्द निहालनी अनुराग कश्यप .. wednesday के निर्देशक नहीं ...अजीब से खेल है....तो चुनाव विश्लेषण ओर उनके नतीजे भी अलग अलग आयेंगे .....
मीडिया अछे लोगो को हाईलाईट करके उनका मनोबल क्यों नहीं बढाता या उन्हें प्रचार देता ...वरुण गांधी जैसे लोग देखिये मुफ्त में पबिलिसिती पा गए .

SWAPNILA said...

TO KYA MANA JAAY? CHAUTHA ISTAMBH KYA BILKUL BIK CHUKAA HAI?

akhilesh kr singh said...

मीडिया में भी बड़ा झोलझाल है प्रसून जी. आपने बेबाकी से सच्चाई सामने रखी, हम जैसे नए पत्रकार तो अब मीडिया के बाजारू रूप से डरने लगे हैं...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...
This comment has been removed by the author.
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

पत्रकार का मतलब था,

निष्पक्ष और विद्वान-सुभट।

वर्तमान युग में इसकी,

़सब परिभाषाएँ गयीं पलट।

नटवर लाल मीडिया पर,

छा रहे बलात् बाहुबल से।

गाँव शहर का छँटा हुआ,

अब जुड़ा हुआ है चैनल से।

parth pratim said...

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बारे में हमारी जो समझ / आकलन बाहर से है उसके अंदरूनी चाल चरित्र का चित्रण करने के लिए आपको शुक्रिया.

पशुपति शर्मा said...

प्रसून सर आपने बिलकुल ठीक कहा है कि कई चैनलों ने सीधे खबरों को ही धंधा बना लिया है... लाइसेंस मोल-तोल कर खरीद लिया और अब लगा रहे हैं खबरों की बोली... टिकर-इतना रुपया, फ्लैश उतना रुपया, एंकर वीओ- कुछ और ज्यादा पैकेज का रेट कुछ और...

मीडिया खड़ा बाजार में... बेच रहा है खबरें
लेकिन ये तमाशा आखिर कब तक... जिस तरह से सरकार, पुलिस, प्रशासन, कानून से लोगों का मोहभंग शुरू हुआ है मीडिया भी उसकी जद में आ चुका है...
खतरनाक प्रवृत्ति है लेकिन ब्रेक लगे तो कैसे लगे...

janane_ka_hak said...

prasun sir,
maine aapke dono lekh padhe.. tarif e kabil hain...
mai abi media me apna career shuru kar raha hu...
apka ashirwad chahuga...

abi ek production house join kiya h jo alag alag channels k liye program banata h..

rajesh shukla said...

विजुअल मिडिया की भूल चूक और पाँलिसी
PRASHUN JI KA KHULASA SAHI MANA JANA CHAHIYE KYOKI VE BHITARI CHIJO KO SAMAJHATE HI AUR DEKHS HAI. YAH COMMENT USSE AGE LE JANE KI KOSHIS HI------
जब तक तक प्रिन्ट मिडिया का दबदबा था तब तक कम से कम कुछ तार्किक बहसें होती रहती थी। बिजुअल मिडिया के आगमन ने प्रिन्ट मिडिया के प्रभाव को लगभग समाप्त सा कर दिया है। इसकी वजह यह नहीं है कि विजुअल मिडिया में कुछ विशेष बुद्धिजीवी आ गये हैं जो चीजों को ज्यादा महत्वपूर्ण ठंग से देखते हैं। वास्तव में विजुअल में ही प्रभावित करने की गहरी क्षमता है। मिडिया का रोल न्यूज देने से ज्यादा प्रभाव पैदा करना ज्यादा हो गया है जिसके लिये मिडिया वे सारी चीजे इस्तेमाल करती है जो सीनेमा के निर्देशक करते हैं।

फैक्ट नहीं फिक्शन इसका नारा है। यह रियलिटि को भी फिक्शन के रूप में प्रस्तुत करता है और इस इन्टेन्शन से कि यह प्रभाव पैदा करे। मिडिया जो तमाम पूँजिपतियों द्वारा नियंत्रित हैं उनका अपना प्रोग्राम है जो बहुत हद तक जन विरोधी है। इनके गन्दे तर्कों को सुन कर कई बार तो उबकाई सी आती है और इनके प्रस्तुति करने वाले प्रस्तुतकर्ताओं की मुख भंगिमायें देखकर तो कई बार उठ कर चले जाने का ही मन करता है। जो खबरे इन्हें अच्छी लगती हैं या इनके हिसाब से तर्कसंगत होती हैं उन्हें ये हँसती हुई भंगिमा बनाकर पेश करते हैं लेकिन जो इन्हें अच्छी नहीं लगती उन खबरों को अजीब सी भंगिंमा बनाकर त्याज्य बताती हैं। राजनेताओं को लेकर जिस तरह से ये बहस के नाम पर तमाशा करती हैं जिसमें मध्यस्त रिपोर्टर पहले ही प्रोजेकट तय कर चुका होता है कि क्या निष्कर्ष होगा- वह हास्यास्प्रद होता है। विजुअल मिडिया शहर को देश मानती है, महीने में शायद ही कोई खबर हो जो ये देश के उन हिस्सों से लाते हों जिनमें वास्तव में देश बसता है। मुम्बई आतंकवादी हमले का सारा ठीकरा नेताओं पर फोडा जा रहा है जिसमें इस देश का हर नागरिक शरीक है। यह मिडीया हर चीज से अपना पल्ला सजह ही झाड लेती है जबकि यह नेताओं और मंत्रियों से कम उत्तरदायी नहीं है। नेताओं को यह लाभ हानि के हिसाब से अच्छा और बुरा बताती है, उनकी सटीक आलोचना नहीं करती और हर बार शासन का सेशन खत्म हो जाता है।

यह देश के तमाम हिस्सों में जाकर नेताओं के कार्यों की समीक्षा कर देश की जनता को नहीं बताती क्योकि इसमें उसका लाभ का गणित गडबड हो जाता है। माओवाद क्या ऐसे ही इतनी बडी ताकत बन गया? नहीं इसको ताकत बनाने में मिडिया की भी भूमिका है क्योंकि मिडिया में बैठे हुये तमाम तथाकथित बुद्धिजीवी इसे फासिस्म बिरोधी ताकत के रूप में देखते हैं। जो कुछ भी हिन्दूवादी ताकतों का विरोधी है वह इनकी सहानुभूति का पात्र है। क्या यह एक प्रोग्राम नहीं है ? उडीसा के ईसाई चर्चों पर हुये हमलों के समय इसी मिडीया एन डी टी वी ने हिन्दूवादी संगठनों को आक्रमण के लिये उत्तरदायी ठहराने के लिये माओवादियों का सहारा लिया, उनका इन्टरव्यू लिया जिसमें माओवादियों को जिम्मा लेते हुये दिखाया गया। यही एन डी टी वी इन जन विरोधी और देशविरोधी ताकतों को बेनकाब करने के लिये उनका पता क्यों नहीं लगा पाती ? अपने तर्क या अपने प्रोग्राम के लिये इसे आतंकवादी मिल जाते हैं लेकिन कभी खुफिया कैमरें में भी वे दिखाई नहीं पडतें क्यों? यह प्रश्न क्या जनता इनसे न पूछे? ये उडीसा के इसाई चर्चों पर हुये हमलों के समय दिखाये गये माओवादी प्रायोजित भी हो सकते हैं क्योंकि विजुअल मिडिया बहुत कुछ प्रायोजित और नौटंकी जैसा करती है। नेताओं को इनसे प्रश्न पूछना चाहिये कि हाँ भाई यह सब नौटंकी क्यों की जा रही है। सरकार को मिडिया के इस ट्रेन्ड को खत्म करना चाहिये जिससे यह तय हो कि न्यूज क्या है और मनोरंजन क्या है। मिडिया का फैक्ट से हट कर फिक्शन की तरफ जाना इस जनतंत्र के लिये खतरनाक है। मिडिया को पहले यह तय करना चाहिये कि वह कैसा चरित्र रखती है क्योंकि भारतीय मिडीया ने अभी अपना चरित्र तय नहीं किया है। सरकार को यह तय करना चाहिये कि मिडिया अपने सेगमेन्ट्स किस तरह प्रयोग करे क्योंकि कई बार यह मिडिया भारतीय न होकर अमेरिकी मिडिया हो जाती है।

जिस तरह इस मिडिया ने अमेरिकी चुनावों का चौबीस घंटे धमाकेदार प्रचार किया वह किसी देशद्रोह से कम नहीं है। मिडिया को देश को कवर करने में अपनी ताकत लगानी चाहिये जिससे जनतात्रिक प्रक्रिया आगे बढ सके। लेकिन यह हो नहीं सकता क्योंकि ऐसी खबर जो उबाऊ हो उसके लिये पूँजीपति एडवर्टाइजमेन्ट नहीं देगा । पूँजिपतियों को मैनिया पैदा कर सकने सकने वाली चीजें चाहिये, उसे फैक्ट चाहिये ही नहीं विशेषकर वह फैक्ट हिसमें उसका फायदा न हो–वह फिक्शन पसंद है । इस फिक्शन पसंदी को माओवादी भी जानता है और आतंकवादी भी जानतें हैं इसलिये उन्हें कोई दिक्त नहीं होती, वे घर में घुस कर बम फेंक जाते हैं। पैसठ आतंकी वारदातें आयी और चली गयी यह मिडिया आदोलन नहीं पैदा हुआ लेकिन ताज पंचतारा होटल पर हुये हमले ने इनकी नींद ही मानो उडा दी हो चौबीस घंन्टे चला रहे है, आन्दोलन पैदा कर रहें है क्यों? क्योकि इन होटलों में मिडिया खबरे तलाशती रहती है, इन्हीं में हीरो-हिरोईन मिलते हैं। और तो और इसी आनन फानन में मिडिया होटल को रा‍ष्टीय सम्पदा घोषित करनें में भी नही हिचकी मानो हर पूँजिवादी ठिकाना रा‍ष्टीय सम्पदा हो।
जनता के मरने से कोई फर्क मिडिया को नहीं पडता क्योंकि जनता तो मरती ही रहती है बस बुर्जुआ नहीं मरना चाहिये। इन दस सालों में कम से लाख की संख्या तो पहूँच ही गयी होगी आतंक और माओवाद के शिकार लोगों की, लेकिन मिडिया कोई हाय तौब नहीं मचाती क्यों? मिडिया को राजू श्रीवास्तव के हँसी और तमाम रियलिटी शो की खबरे दिखाने से फूर्सत मिले तब तो यह कुछ जनता की खबर दिखाये। इस मिडिया की तुलना उत्तर प्रदेश पुलिस से की जा सकती है जो घूस लेती है और अपनी ड्यूटी नहीं निभाती। लेकिन यह वास्तविक पुलिस की तरह बर्ताव करना चाहती है और वह इस तरह से पेश आती भी है मानो वह पुलिस ही हो यहाँ तक वह राजनेताओं से भी पुलिसिया रोब झाडने से नही हिचकिती। । जिस तरह से किसी भी नेता का यह अपमान करती है जो जन प्रतिनिधि है और जिन्हें कानून में सर्वोपरि माना गया है, जो जनतंत्र का सिम्बल है वह निहायत मूर्खतापूर्ण है। राजनाताओं को मिडिया के इस तरह के अप्रोच को खारिज करना चाहिये। राजनेताओं को अपनी बात सदैव लाईव कहनी चाहिये चाहे वह डीबेट हो या कोई चर्चा या किसी मुद्दे पर ही वो क्यों न घिरे हों क्योंकि अन्यथा ये कुछ का कुछ दिखा देते हैं और जनता मे गलत मैसेज जाता है। नेता जन प्रतिनिधि है इसलिये उसका यह संवैधानिक अधिकार होना चाहिये कि वह मिडिया के द्दारा अपनी बात बिना एडिट किये रख सके। मुख्तार अब्बास नक्वी का रोष जायज था यह अलग बात है वे मिडिया के रोष में लिपिस्टिक की बात बोल गये। मिडिया को स्कैन करने की सख्त जरूरत है अन्यथा यह एक अलग तरह के आतंक को जन्म दे सकती है। पैसा कमाने के प्रोजेक्ट में कुछ का कुछ हो सकता है, कोई प्रोग्रेसिव चैनल अंधविश्वास को आगे बढा सकता है कोई किसी कल्ट को जन्म दे सकता है। मसलन एन डी टी वी न्यूज स्वयं को सबसे प्रोग्रेसिव हिन्दी चैनल के रूप में सामने रखने की कोशिस करता है तो दूसरी तरफ अपने इन्टरटेनमेन्ट चैनल ईमेजिन पर जै जै जै शनिदेव दिखा रहा होता है यानी संस्कृति और व्यवहारिक जीवन मे अंतर को इसका व्यापारिक चरित्र मिटाने की कोशिस करता है।

मिडिया पर एक गम्भीर बहस की जरूरत है तभी जाकर हम इसका एक जनवादी चेहरा बना पायेंगे और सत्य का भ्रम फैलाने के इनके खतरनाक इरादों को रोक पायेगे। मिडिया की आलोचना का कोई सशक्त फोरम या मिडिया का होना भी जरूरी है जिससे सार्थक बहसें की जा सकें और कुछ नया सुझाव दिया जा सके। आलोचना के प्रति हमारे अंदर उदारता नहीं है जिसके कारण कुछ नया नहीं हो पाता। मिडिया में जिस तरह की आलोचना की संस्कृति का विकास हो रहा है वह बहुत ही दुखदायी है। यह महत्वपूर्ण मुद्दों को भी बहुत सतही सोच के लोगों को बुलाकर डाईल्यूट कर देता है। प्रिंट मिडिया मे लिखने वाले तमाम पत्रकार वर्षों से घिसीपिटी विचारधाराओं के इदगिर्द अपनी प्रतिक्रियाये देते रहते हैं। विजुअल मिडिया के तमाम अधःपतन और प्रोग्रामों की आलोचना नहीं की जाती क्योंकि यह दुश्प्रचारित किया जा चुका है कि चाहे प्रोग्राम जैसा भी हो वह अच्छा है , उस पर देश की अर्थब्यवस्था टिकी हुयी है जबकि इसका लाभ देश को कम ही मिलता है। यह वर्ग अपनी जन विरोधी चीजों को भी राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान कर देता है, जो कुछ भी पूँजी से जुडा हुआ है वह राष्टीय है। यह अपनी हर चीज मे जन विरोधी रूख बनाये हुये है जिसे यह प्रोग्रेसिव कहता है मसलन पुरूषों के परफ्यूम का वह प्रचार याद करें जिसे ॒॒॒॒॒॒ कम्पनी ने बाजार में परफ्यूम बेचने के लिये उतारा था जिसे सीधे सामान्य जनता की बीवीयों की अस्मिता पर आक्रमण कहा जा सकता है। इस एड में जिस तरह कामोन्माद में एक गृहणी एक नवयुवक के सामने स्वयं को प्रस्तुत करती है वह गौरतलब है। यह एड दो काम एक साथ कर रहा होता है एक तरफ यह जनता के पारिवारिक ताने बाने को तोडता है तो दूसरी तरफ यह प्रचारित करता है सेक्स हर मूल्य से बडा है जिसके लिये हर तरह के पवित्र सम्बन्धों को भी तोडा जा सकता है। इसके इतर यह अपना परफ्यूम तो बेच ही रहा होता है यानि तीन काम एक साथ हो रहे हैं। इस तरह के प्रचार से कई तरह का आतंक पनप सकता है, रेप बढ सकता है, समाज में कोई अपने पिताओं, भाईयों, चाचाओं किसी पर विश्वास नहीं कर सकता है इत्यादि। मिडिया यह सब सोचती ही नहीं है क्योंकि यह कभी सोचती ही नहीं हाँ वह होमोसेक्स को लेकर परेशान जरूर होती है, उस पर चर्चायें करवाती है मानो यह कोई आम चीज हो जबकि हाल ही में बडी आतंकवादी घटनाये हुयी होती हैं।

यह तमाशा की रचना करती है जब यह पटना के प्रेम गुरू को हीरो बनाती है और उनके अवैध सम्बन्धों को जिसे प्रेम कहा जाता है को राष्ट्रीय मुद्दा। न्यूज वास्तविक समय में हो रही घटनाओं से विशेष इत्तेफाक नहीं रखता जबतक कि यह सर्वव्यापी न हो जाये। मिडिया मे ऐसे बुद्धिजीवियों की भरमार है जो किसी भी तरह से बुद्धिजीवी नहीं हैं बल्कि एक बाजीगर हैं या एक संचालक हैं। इन संचालक बुद्धिजीवियों के पास दृष्टि की निहायत कमी है इसलिये ये वास्तविकता को देख ही नहीं पाते और फिक्शन का सहारा लेना इनकी मजबूरी हो जाती है जिसके द्धारा ये संचालन के उत्तरदायित्व को पूरा करते हैं। आई बी एन न्यूज चैनेल के तमाम प्रस्तुतकर्ता जादूगर या कलाबाज और संचालक से ज्यादा नहीं लगते, कई बार तो वे इतने पतित हो जाते हैं कि वह सब प्रस्तुत करने लगते हैं जिसे एक पण्डा कहानियों मे कहता है। ज्यादातर पत्रकार जो सफल हैं उनकी सफलता उनकी उनकी तमाम अप्रवीण लोगों के बीच सांमन्जस्य बैठाने की क्षमता मे निहित है और यह मिडिया का एक बडा सच है। एकाधिकारवादी पत्रकारों के द्धारा वे लोग ही ग्रुप में सम्मिलित किये जाते हैं जो सामंजस्य बनाकर चलते हैं और उनके एकाधिकार को चुनौती नहीं देते इस प्रक्रिया में वास्तविक प्रवीणता पीछे छूट जाती है और एक ऐसी प्रवीणता का जन्म होता है जो कलाबाजी और बाजीगरी में निहित है। बिहारी पत्रकारों का हिन्दी पत्रकारिता में समग्र एकाधिकार के पीछे यही कडुवा सच है। हर बिहारी जो विश्वविद्यालय में पढ चुका होता है वह ज्यादातर मामलों में या तो लेखक हो जाता है या पत्रकार और कई मामलों में दोनो, ऐसे एकाधिकारवादी पत्रकारों की मिडिया में उपस्थिति के कारण होता है। मिडिया की अस्तरीयता का एक प्रमुख कारण इस वर्ग के एकाधिकार में भी देखा जा सकता है। जब तक मिडिया में इन चीजों पर ध्यान नहीं दिया जाता मिडिया एक मनोरंजन से उपर नहीं उठ सकती।
--RAJESH

sandeep said...

prasun g media bik chuka hai .dekho kis tarah asaram bapu ,shankracharya ko badnaam kiya gya.kis tarah logo ki bhavnao k sath khela gya.santo ki favour koi nhi karta.ap bhi kya bik chuke ho ?