Friday, June 12, 2009

बीजेपी के ग्राउंड जीरो पर मोदी-आडवाणी

जिस युवा राजनीति का सवाल कांग्रेस के भीतर उफान पर है, वह उफान ‘हिन्दुत्व की प्रयोगशाला’ के राज्य गुजरात में बीजेपी के गढ़ राजकोट में अर्से से है। राजकोट में कम्प्यूटर साइंस से लेकर बिजनेस मैनेजमेंट और मेडिकल से लेकर बीपीओ से जुडा युवा तबका बीजेपी का झंडा उठाने से नही चूकता लेकिन लहराते झंडे में संघ की वैचारिक समझ देखना चाहता है। आरएसएस की इस राजनीतिक ट्रेनिंग का असर कमोवेश समूचे सौराष्ट्र में है। इसका केन्द्र राजकोट है और वजह भी यही है कि बीजेपी ने कभी राजकोट सीट नहीं गंवायी।

लेकिन 2009 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी राजकोट में कांग्रेस से हार गयी। बीजेपी के युवा कार्यकर्त्ताओ की माने तो बीजेपी कांग्रस से नहीं बीजेपी के कांग्रेसीकरण से हार गयी। और सौराष्ट्र में बीजेपी का मतलब है नरेन्द्र मोदी। तो पहली बार गुजरात में संघ और बीजेपी के भीतर यह सवाल जोर-शोर से कुलबुला रहा है कि नरेन्द्र मोदी का भी कांग्रेसीकरण तो नहीं हो रहा है?

कांग्रेसीकरण का सवाल चुनाव को लेकर बनायी गयी रणनीति और चुनाव के बाद देश की राजनीति में मोदी की अपनी भूमिका के तौर तरीको को अपनाने से है। सौराष्ट्र में बीजेपी और आरएसएस ही नहीं किसी भी तबके के बीच बैठते-घूमते हुये कोई भी नरेन्द्र मोदी की गैर मौजूदगी में भी मोदी का एहसास कर सकता है। द्वारका में द्वारकादीश मंदिर के बाहर मनीष की पान की दुकान हो या पोरबंदर में गांधी के जन्मस्थल वाले मोहल्ले में दिनेश सर्राफा की दुकान या फिर सोमनाथ में सोमेश का एसटीडी बूथ...हर जगह नरेन्द्र मोदी के साथ अपनी तस्वीर को दुकान में चस्पा कर दुकानदार गर्व भी महसूस करता है और सामाजिक अकड़ भी दिखाता है।

युवा तबका मोदी के साथ तस्वीर खिंचा कर अपने घेरे में अपनी अकड दिखाने से नही चूकता तो बच्चे और महिलाएं मोदी के हस्ताक्षर लेकर मोदी की नायक छवि को बरकरार रखते हैं। नायक की यह छवि मोदी की किस्सागोई से भी जुड़ चुकी है। मसलन सड़क से गुजरता मोदी का काफिला आम लोगो की आवाजाही नहीं रोकता। सडक पर कोई दुर्घटना हो तो लोगो की आवाजाही चाहे जारी रहे लेकिन मोदी का काफिला रुक जाता है और घायलों का कुशलक्षेम पूछ कर ही आगे बढ़ता है। मोदी की लोकप्रियता का यह अंदाज मोदी को आरएसएस की उस राजनीतिक ट्रेनिंग से अलग खड़ा करता है, जिसमें वैचारिक शुद्दता के साथ आदर्श समाज की परिकल्पना हो। जिसमें संगठन और हिन्दुत्व समाज का भाव हो। ऐसा नहीं है कि अपनी लोकप्रियता को इस तर्ज पर देखने के लिये मोदी ने कोई खास रणनीति अपनायी। असल में आरएसएस की राजनीतिक ट्रेनिंग और बीजेपी की राजनीति ने जहां दम तोडा, वहां नयी पीढी और आर्थिक सुधार के बाद बनते नये सामाज की जरुरतों को मोदी ने थामा । इसलिये मोदी का संकट दोहरा हो गया। एक तरफ मोदी की प्रयोगशाला में संघ ने भी खुद को झोंका और रास्ता न पाकर बीजेपी भी नतमस्तक हुई। वहीं, दूसरी तरफ इस प्रयोगशाला की हर कैमिकल थ्योरी मोदी ही रहे तो मोदी को देखने का नजरिया भी हर तबके ने अपने अपने तरीके से अपनाया। किसी के लिये मोदी हिन्दुत्व का झंडाबरदार रहे तो किसी के लिये विकास का प्रतीक तो किसी के लिये बालीवुड के नायक सरीखे हो गये।

इस अंदाज ने मोदी को भी बरगलाया। जिन्हें टिकट दिया गया, उनका वास्ता संघ से रहा नहीं और सामाजिक पहचान बीजेपी के बीच की है नहीं। हां, बाजार और पूंजी से पहचान बनाने वाले बीजेपी के उन समर्थको को मोदी ने न सिर्फ टिकट दिया बल्कि गुजरात बीजेपी में उनकी राजनीतिक हैसियत भी बढ़ायी। राजकोट के उम्मीदवार किरण पाटिल इस सोच के प्रतीक हैं, जो पैसे के बूते बीजेपी का टिकट तो पा गये लेकिन बीजेपी के भीतर ही वोट ना मिलने से हार गये । असल में आरएसएस ने गुजरात में जो राजनीतिक ट्रेनिंग दी, उसमें हर जिले में ऐसे पैसे वालों की भरमार है, जो संघ या बीजेपी की कार्यशाला या बैठकों को सफल बनाने के लिये हर तरीके से भौतिक इंतजाम करते रहे हैं।

मोदी ने पूंजी और राजनीति को मिलाकर उन्हें ही राजनीतिज्ञ बना दिया, जो कल तक पार्टी के इंतजाम का खर्चा उठाते-देखते थे । बीजेपी के इन नये कर्ताधर्ता के राजकरण के तौर तरीके कांग्रेसी सरीखे हैं। जिसमें आरएसएस की सामाजिक सोच नहीं बल्कि सत्ता बनाये रखने के तौर तरीके चलते हैं। यह तरीके बीजेपी के नेता और कार्यकर्ता के बीच खायी लगातार चौड़ी भी करते जा रहे हैं। कार्यकर्ता की समझ या उसके सुझाव या उसकी जरुरत लोकप्रिय मोदी स्टाइल के आगे कोई मायने नहीं रखते क्योकि कार्यकर्ता जहां के सवाल खड़ा करता है, वहां से या तो मोदी सीधा संपर्क बनाने की दिशा में हीरो की तरह जाते हैं.या अपने नये राजनीतिक करिन्दो के जरीये राजनीति टटोलते हैं। यह स्टाइल मोदी को घेरे समूह में भी है। यानी मोदी जैसा ही उसे घेरे लोग भी बनना-दिखना चाहते हैं। तो हर का वास्ता स्टाइल से होता है ना कि मोदी से।

कल तक जो घन्नसेठ फक्कड और मुफलिस संघी स्वसंसेवक या बीजेपी नेता को अपने घर में ठहरा कर भोजन करा कर घन्य समझता था, वही सेठ नेता बनने के लिये अब जोड-तोड़ भी कर रहा है और वैचारिक तौर पर खुद को ज्यादा समझदार नेता भी मान रहा है और फक्कड-मुफलिस संघी को बाहर से ही बाहर का रास्ता दिखाने से नहीं चूक रहा। चूंकि मोदी ही सर्वसर्वा हैं और उन तक सीधी पहुंच उस तबके की है तो वह भी कार्यकर्ता-नेता को कुछ नहीं समझता। चूंकि दंगों से उपजी हिन्दुत्व प्रयोगशाला का पाठ बीजेपी की राजनीति के लिये ज्यादा देर तक फायदेमंद हो नही सकता है, इसलिये बीजेपी से पहले मोदी ने ही नये राजधर्म के नये-नये तौर तरीके अपनाये । जिससे 2002 की पहचान का तमगा ही छाती पर न टंगा रहे । इसलिये 2009 तक आते आते मोदी ने विकास का खांचा उस नयी अर्थव्यवस्था के ही इर्द-गिर्द ही रचा, जिसके खिलाफ स्वदेशी जागरण मंच काम करता रहा है। जिसमें वैकल्पिक आर्थिक खांचा खड़ा कर स्वावलंबन का सवाल है। खेती और उघोगों के सामानांतर समाज के हर तबके को भी एक साथ खड़ा करने का सवाल है । वहीं, मोदी के अंदाज ने सौराष्ट्र के एनआरआई समेत उस क्रीम तबके को पकड़ा, जिसकी जरुरत विकास का इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने की थी । जिसके लिये वह फंडिंग के लिये भी तैयार है।

मोदी ने उघोगोपतियो को रिझाने के लिये सौराष्ट्र की जमीन का एनओसी खुद ही बांटे। उघोगों के लिये इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करने का जिम्मा भी खुद उठाया। उघोगों तक बेहतरीन सड़क बनाने की रफ्तार भी अपने हाथ में रखी। भ्रष्टाचार या कमीशनखोरी के बंदरबांट को सीधे सत्ता से जोडा। और सत्ता को भी इस तबके ने हिस्सेदारी दे दी। इसका बेहतरीन उदाहरण पोरबंदर में देखा जा सकता है, जहां सबसे ज्यादा एनआरआई हैं। तो पोरबंदर जिला भी है और औघोगिक विकास की नगरी भी। बडे किसान भी है और किसान-व्यापारी मोदी स्टाइल के प्रतीक भी हैं। असल में नरेन्द्र मोदी राजनीति एक स्टाइल है, जो गुजरात में पांच करोड़ गुजरातियों का नाम तो लेता है लेकिन सामाजिक तौर पर महज पचास लाख गुजरातियों के जरीये बाकियों को इस स्टाइल को अपनाने पर ही टिका देता है। ऐसे में सत्ता की कार्यप्रणाली भी संगठन से इतर इसी स्टाइल पर आ टिकी है जो व्यक्ति विशेष को देखती है न कि किसी विचारधारा या सांगठनिक तौर-तरीको को।

मोदी स्टाइल सत्ता बरकरार रखने का एक ऐसा तरीका है, जो पार्टी या विचारधारा से हटकर एक तबके को मुनाफे की थ्योरी समझाता है तो दूसरे तबके को मुनाफे में हिस्सेदारी के लिये लालायित करता है। जो बच जाते हैं, उन्हे संभावना और आशंका के बीच तब तक झूलाता है ज बतक उसपर कोई और राजनीति अपना मुलम्मा ना चढ़ा ले। राजनीतिक तौर पर बीजेपी के लिये यह शार्टकट का रास्ता हो सकता है लेकिन पांच करोड गुजरातियों और सवा सौ करोड़ भारतीयों के अंतर को समझना होगा, जो ना तो बीजेपी समझ पायी न ही लाल कृष्ण आडवाणी समझ पा रहे है।

सत्ता का रास्ता बीजेपी के लिये तभी तक मान्य है, जबतक वह कांग्रेस की बनायी लीक का विकल्प दे सके। असल में बीजेपी सत्ता के लिये अपनी उस लकीर को ही मिटाना चाह रही है, जो कांग्रेस की राजनीति से अलग बन रही थी। कांग्रेस के एनजीओ स्टाइल के सामानांतर संघ के करीब चालीस संगठन और को-ओपरेटिव व्यवस्था का जो खांचा बीजेपी को राजनीतिक लाभ पहुचा सकता था, उसे बीजेपी ने खुद ही तोडा । हिन्दुत्व की प्रयोगशाला या मंदिर निर्माण कांग्रेस की राजनीति का विकल्प नहीं हो सकते बल्कि सामाजिक तौर पर भावनात्मक उभान जरुर पैदा कर सकते हैं। लेकिन इस उभान का राजनीतिक लाभ तभी मिल सकता है, जब सामाजिक तौर पर वैकल्पिक राजनीति की जमीन हो। असल में भगवा कांग्रेसीकरण ने इसी जमीन को हड़पा है। जिसमें गुजरात में मोदी हो या दिल्ली में आडवाणी दोनो ने विकल्प का सारा ताना-बाना खुद के ही हर्द-गिर्द बुनने की जबरन कोशिश की है।

इस हकीकत को कोई समझ नही पा रहा है कि आरएसएस अगर खुद को सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन कहता है तो उसका राजनीतिक पाठ समाजिक शुद्दीकरण और सांगठनिक विचार को ही राजनीतिक सत्ता मानता है। जो कांग्रेस की संसदीय राजनीति की थ्योरी से हटकर है । इसलिये संघ का वोट बैंक भगवा कांग्रेसीकरण यानी बीजेपी का वोटबैंक नही हो सकता। इसलिये सवाल यह नहीं है कि आडवाणी हार गये है और मोदी भी उसी राह पर हैं। बड़ा सवाल यह है कि एक तरफ कांग्रेस है तो दूसरी तरफ संघ । वाजपेयी ने संघ की समझ को सूंड से पकड कर सत्ता भोगी और आडवाणी ने संघ की समझ को पूंछ मान कर खुद को ही मजबूत नेता माना । राजकोट की हार बताती है कि मोदी भी इसी राह पर है। लेकिन बीजेपी के ग्राउंड जीरो पर खडे होकर महसूस किया जा सकता है कि भविष्य का सवाल बीजेपी की राजनीति या मोदी की राह की नहीं बल्कि आरएसएस के आस्तित्व का है । जिसका नया पाठ मुद्दा के आसरे राजनीति को खडा करना है ना कि राजनीति के आसरे मुद्दो को ताड़ना ।

(गुजरात से लौटकर)

8 comments:

mahashakti said...

बहुत ही सार्थक लेख, आपकी इस विधा कायल हुये बिना नही रहा जा सकता है। आज भाजपा कितना भी आत्‍ममंथन करे, कि हम हिन्‍दुत्‍व की वजह से हारे है किन्‍तु यह गलत होगा, आज भाजपा अपने मूल मूद्दो से भटक कर भाजपा बने रहने के बजाय राजग बने रहना चाहती है, इसका परिणाम यह हुआ कि भाजपा तो कमजोर हुई इसका मुख्‍य कारण भाजपा का कमजोर होना ही था।

अगर भाजपा राजग को दरकिनार कर अपने मूल लडाई लड़ती तो आप सत्‍ता के सर्वोच्‍च शिखर पर होती और राजग भी अपने सर्वोच्‍चता पर होता। संघ से दूरी भाजपा को ले डूबी, इसके लिये राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के कुछ प्रचारक भी जरूर जिम्‍मेदार है, सत्‍ता के स्‍वर्णकाल में अपना कर्म भूल कर सत्‍ता लाभ में लग गये थे। जरूरत है कि अब धरा पर लौटा जाये।

Nirmla Kapila said...

सार्थक चिन्तन योग्य और सटीक प्रस्तुति है आभार्

CARTOON TIMES by-manoj sharma Cartoonist said...

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keval kuch hain jo mujko jamte hain
aap unme se ek hain
kargil ke kafi pahle se
aapko follow kar raha hoon TV par


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uchit samay par sahi lekh prastut kiya hai aapne...aaj maine pahli baar aapka pad raha hun, aapko bolte to suna hai....aapke lekhni ka bhi jawab nahi...

hamarijamin said...

Nagpur se Lalgarh tak--'dam' or 'wam' ki aapki samajh suchintit hai.BJP OR sangh ki gahari padtal
thik ban pada hai.