Thursday, June 18, 2009

लालगढ़ के राजनीतिक प्रयोग में ममता प्यादा भर हैं

किसने हमारे कुंओं में कैरोसिन तेल डाला?...... नये जमींदार ने। किसने चावल में जहर भरी दवाई मिला दी? .. नये जमींदार ने। किसने हमें हमारी जमीन से उजाड़ा?... नये जमींदार ने। पुलिस किसकी है.? नये जमींदार की। सेना किसके लिये है?... नये जमींदार के लिये। तो अब लड़ाई किससे है ?.. नये जमींदार से। यह नारे लालगढ के हैं । 16 जून को लालगढ़ टाउन के बीच मैदान में करीब छह सौ गांव के पन्द्रह हजार से ज्यादा लोग जमा हुये तो मंच से यही नारे लग रहे थे। मंच से आवाज आती... नये जमींदार पर निशाना है और हजारो की तादाद में जमा लोग इस आवाज को आगे बढाते हुये कहते.... या खुद निशाना बन जाना है।

वाममोर्चा के तीस साल के शासन में पहली बार माओवादियो का रुख वामपंथियो के खिलाफ ठीक उसी तरह है, जैसे चालीस साल पहले कांग्रेस के खिलाफ वामपंथियो ने हथियार उठाकर कांग्रेस को जमींदार और फासिस्ट करार दिया था। वहीं चालीस साल बाद अब संघर्ष से निकल कर सत्ता में पहुची सीपीएम को फासिस्ट और जमींदार का तमगा माओवादी दे रहे है। पश्चिम बंगाल में वाम राजनीति का चक्का एक सौ अस्सी डिग्री में किस तरह घूम चुका है, इसका अंदाजा सीपीआई माओवादी की सीधी पहल से समझा जा सकता है।

16 जून को लालगढ़ टाउन के मैदान की सभा को संबोधित करने और कोई नहीं, उसी आंदोलन से निकले नेता पहुंचे थे, जिन्होंने साठ के दशक में नक्सलबाडी में हथियार उठाकर कांग्रेस के शासन के खिलाफ बिगुल फूंका था । और आंदोलन की आग उस वक्त इतनी तेज हुई थी कि सीपीआई में दो फाड़ हो गया था। और तीन साल बाद यानी 1967 में ही पहली बार गैर कांग्रेसी संयुक्त मोर्चा सरकार बनी, जिसमें ज्योति बसु उप-मुख्यमंत्री थे। लेकिन साठ के दशक में नक्सलबाडी की आग ने वामपंथियो को यह सीख जरुर दे दी की बंगाल की जमीन वामपंथियो के भटकाव को भी बर्दाश्त नहीं करेगी। उस वक्त वजह भी यही रही कि सीपीआई के भटकाव से टूट कर निकली सीपीएम ने जंगल-जमीन से जुड़े मुद्दो को ही अपनी राजनीति का पहला आधार बनाया। नक्सलबाडी की इस आग ने संसदीय राजनीति में चाहे सीपीएम को सफलता दे दी लेकिन आंदोलन की कमान उस दौर जिन एमएल और एमसीसी संगठनों ने थाम रखी थी, पहली बार यही दोनो धारायें एक साथ सीपीएम के खिलाफ बंगाल में हथियार उठाये हुये हैं।

राजनीतिक तौर पर सीपीआई एमएल पीपुल्स वार और एमसीसीआई 2004 में एक साथ हुये। लेकिन विलय के बाद बने सीपीआई माओवादी के लिये बीते पांच साल में यह पहला मौका है, जब राजनीतिक तौर पर वह सीधे सीपीएम को जमींदार और फासिस्ट करार दे कर हथियारबंद संघर्ष के जरीये चुनौती देने को तैयार है । जाहिर है सीधे राज्य के खिलाफ इस तरह हथियारबंद संघर्ष नक्सलबाडी के बाद प्रयोग के तौर पर कहीं हुआ तो वह आंध्र-प्रदेश है । जहां नक्सली संगठन पीपुल्स वार ने राज्य को चुनौती दी तो संसदीय राजनीति में कांग्रेस से लेकर एनटीआर और 2004 में तेलगंनाराष्ट्वादी पार्टी ने चुनावी लाभ भी उठाया । लेकिन बंगाल की स्थिति इस बार सबसे ज्यादा जटील है। नंदीग्राम की आग को राजनीतिक तौर पर ममता बनर्जी ने सीधे किसी सोच के तहत ढाल नहीं बनाया। बल्कि पिछले चालीस साल की जो राजनीतिक ट्रेनिग बंगाल में सत्ताधारी वामपंथियो ने ही जनता को दी है, उसका असर यही हुआ कि जब वाममोर्चा सरकार जंगल-जमीन से जुडे मुद्दो को बिना सुलझाये ही आगे बढी तो सुलगते नंदीग्राम का राजनीतिक असर वामपंथी जनता में खुद-ब-खुद हुआ। और ममता बनर्जी को इसका चुनावी लाभ मिला। लेकिन ममता बनर्जी की राजनीतिक ट्रेनिंग वाम राजनीति के जरीये नहीं हुई है, इसलिये लालगढ़ की हिंसा के बीच जब ममता बनर्जी बंगाल में इस बात का ऐलान करती है कि हिंसा के जरीये समाधान नहीं हो सकता है और लालगढ में हथियार नहीं उठाये जाने चाहिये तो प्रतिक्रिया में कहीं ज्यादा हिंसा इस बात का भी संकेत दे रही है कि माओवादी ममता के जरीये वाममोर्चा के खिलाफ अपनी राजनीतिक लडाई को महज ढाल बनाना चाहते है न कि ममता के अनुकूल राजनीतिक परिस्थितियों की लड़ाई लडना चाहते हैं । वही ममता बनर्जी उस राजनीतिक माहौल को तो सूंघ पा रही है, जिसमें सीपीएम के खिलाफ ग्रामीण इलाको में तेजी से आक्रोष उभर रहा है मगर उस आक्रोष को कोई राजनीतिक जामा नहीं पहना पा रही है।

इस लडाई में ममता का संकट दोहरा है। एक तरफ वैचारिक तौर पर तृणमूल कांग्रेस की कोई पहचान नहीं है, सिवाय कांग्रेस के टूट कर दल बनाने से और दूसरी तरफ ममता ने उसी कांग्रेस का हाथ थाम रखा है, जिसके साथ सीपीएम से फूटा गुस्सा जा नहीं सकता है। यानी पहले नंदीग्राम और अब लालगढ से निकले मुद्दे ममता की राजनीति को साध रहे है । ममता भी राजनीतिक भाषा में वाम लहजे का इस्तेमाल कर रही हैं, जो जमीन-जंगल से जुडे किसान-मजदूर-आदिवासी और गांववालों को अछ्छी लग रही है। लेकिन बंगाल की जमीन पर वाम और अतिवाम की लडाई में ममता महज प्यादा हैं, इससे इंकार नहीं किया जा सकता है । क्योंकि सीपीएम जिस नयी पीढी का सवाल उठाकर आर्थिक सुधार की दिशा में कदम बढा रही है, वह पीढी मंदी के दौर में देश में रोजगार छिनने वाले माहौल को बकायदा देख रही है। बंगाल की इस युवा पीढी का लालन-पालन भी वामसमझ वाले परिवार और माहौल में हुआ है । इसलिये बंगाल में नये सवाल देश के दूसरे हिस्सो की तुलना में कहीं तेजी से उठते हैं। खासकर मुद्दों को अगर राजनीतिक पंख लग जाये तो बंगाल की एकजुट समझ भी खुल कर सडकों पर ही निकलती है । इसका असर सामाजिक तौर पर किस तेजी से हो रहा है, यह लालगढ के परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है। जहां सीआरपीएफ के बासठ कैंप गांव और जंगल में चुनाव के बाद से ही लगा दिये गये थे । लेकिन जब नारे लगे की पुलिस -सेना जमींदार के लिये है तो गांव से सुरक्षाकर्मियों को 12 कैंप इसलिये समेटने पड़े क्योंकि गांववालों ने खाना-पानी बंद देना और कैंप तक पहुंचने देना भी बंद कर दिया । इसका असर शहर में भी दिखायी दिया खासकर उन जिलो में जहा राशनिंग लूट हुई थी। सीआरपीएफ को देख कर शहरों में यह सवाल तेजी से घुमड़ने लगा कि अगर वाममोर्चा विकास के नाम पर खेत और जमीन को खत्म कर देगे तो मुश्किल और बढेगी । वहीं किसान-मजदूर अगर मारा जायेगा तो खेती करेगा कौन।

राज्य के सत्रह जिले ऐसे हैं, जहां खेती न हो तो जिन्दगी की गाड़ी चल नहीं सकती है । इन जिलों में गरीबों की तादाद का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि साठ फिसद घरों में बीपीएल कार्ड है और निन्यानवे फिसद परिवारो के घर राशन का ही चावल-गेंहू आता है । और सत्ताधारी वामपंथियो के लिये कैडर बनाने और जुटाने की सौदेबाजी का आधार भी पेट भरने के साधन जुटाने पर आ टिकता है। यानी बीपीएल कार्ड सीपीएम कैडर के पास होगा ही । राशन की लूट में उसी कैडर को अन्न मिलेगा जो सत्ता के लिये काम कर रहा होगा। जाहिर है जब वाम राजनीति पेट की परिभाषा पर टिकी होगी तो जिसमें बल होगा वहीं असल वामपंथी भी हो जायेगा। चूंकि राज्य की सत्ता की ताकत के सामने हर कोई बौना है और राज्य के आंतक के सामने हर आंतक छोटा है तो ऐसे में सत्ताधारी अगर कमजोर होगा तो पेट की जरुरत वैचारिक आधार बदलने में कितनी देर लगायेगी । असल में नंदीग्राम और लालगढ की राजनीति से बंगाल की सामाजिक-आर्थिक स्थिति सीधे जुड़ी हुई है । इसलिये चुनाव में जैसे ममता बनर्जी मजबूत हुई हैं, सीपीएम का कैडर ममता के साथ हथियार लेकर खड़ा होने से नहीं कतरा रहा है। वहीं ममता की यही जीत सीपीएम को कमजोर करने से ज्यादा माओवादियो को मजबूत कर रही है, क्योकि बंदूक तले वह राज्य की पुलिस से दो दो हाथ कर रहे है और जिले-दर-जिले ममता के साथ जुड़ने वाला सीपीएम कैडर प्रमोशन पाकर पेट के लिये कहीं ज्यादा लाभ समेट रहा है। वाममोर्चा के कैडर के चक्रव्यू को भेंदते हुये लालगढ से माओवादी कोलकत्ता तक अब नक्सलबाडी की तर्ज पर उस राजनीति को हवा देने में लग गये हैं, जहां राज्य मान ले कि हथियार जनता ने उठा लिये हैं।

चूंकि गांव समिति से लेकर जिला कमेटी तक के स्तर पर कामकाज देखने वाले कैडर के पास हथियार रहते हैं और चुनाव से पहले इलाको के कब्जे की राजनीति इसी हथियार के भरोसे चलती है, इसे हर राजनीतिक दल का कैडर जानता सतझता है । चूकि सत्ताधारी सीपीएम कैडर के पास सबसे ज्यादा हथियार हो सकते है, इसी आधार पर माओवादियो ने अपनी रणनीति के तहत गांव वालों को उकसाना भी शुरु किया है जिससे सीपीएम दफ्तरों और नेताओं के घरो में आग लगा कर हथियार समेटे जा रहे है । लालगढ के इलाके में अगर सीपीएम कैडर का पूरी तरह सफाया हुआ है तो उसकी बडी वजह उनके हाथों से हथियारों का जाना भी है और ग्रामीणो का हाथ में हथियार उठाकर माओवादियो की सभा में नारा लगाना भी।

ऐसे में सवाल सिर्फ लालगढ के जरीय माओवादियो के हथियारबंध संघर्ष के नारे भर का नहीं है। बल्कि मुश्किल परिस्थितयाँ उस आने वाले टकराव को लेकर बन रहे राजनीतिक माहौल की हैं, जो प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर इलाकों में लूट के लिये बड़े कारपोरेट घरानों को लाइसेंस दे रही हैं और चार फसली खेती योग्य जमीन पर उद्योग लगा कर रोजगार पैदा करने का स्वांग रच रही हैं। जबकि बंगाल का सच यही है कि वहां वो नारे भी दम तोड चुके हैं, जिसके भरोसे कांग्रेस रोजगार क्रांति का सपना संजोये है। क्या ऐसे में बंगाल में वामपंथियों और माओवादियों का संघर्ष देश की राजनीति को साध पायेगा, यह नया सवाल बंगाल की जमीन पर वाम राजनीति को समझने वाला बौद्धिक तबका खड़ा कर रहा है क्योंकि उसे लगने लगा है जब प्रतिक्रियावादी ममता बनर्जी की सलाहकार नक्सली महाश्वेता देवी हो सकती हैं, तो भविष्य में नयी राजनीतिक जमीन माओवादियो के लिये कुछ नयी परिस्थितियाँ पैदा भी कर सकती है।

8 comments:

समय said...

उम्दा विश्लेषण।
कई चीज़ों को एक साथ पैनी नज़र से देख रहे हैं आप।

Ratan Singh Shekhawat said...

चाहे माओवादी हो,नक्सलवादी हो, समाजवादी हो ,पूंजीवादी हो गरीब जनता का कोई नहीं ! सबको सिर्फ सत्ता चाहिए ! गरीब तो बेचारा इनके नारों में ही उलझा रहता है | वह सिर्फ सत्ता प्राप्ति की सीढी भर है |

काजल कुमार Kajal Kumar said...

अभी तो देश में, ढाई सों जिले ही नक्सल प्राभावित हैं, यूं ही चलता रहा तो भारत के भी नेपालीकरण के दिन दूर नहीं...भारत का प्रधानमंत्री भी कोई नक्सली ही होने वाला है...सरकारें, कबूतर बनी बैठी हैं..मानो ये कोई समस्या ही नहीं है....वोटों की दलाली के चलते कोई भी समस्या की मूलभूत जड़ तक जाना ही नहीं चाहता.

बंदूकों से क्रांतियों को ज्यादा देर तक रोका नहीं जा सकता....भारत अपने ही इतिहास से भी नहीं सीख रहा....क्या अंग्रेजों की बन्दूंकें काम आईएं थीं ?

विवेक said...

आपकी बातों ने मेरे भीतर कुछ सवाल खड़े किए हैं...और बेशक, उनका जवाब आपसे बेहतर कौन दे सकता है...

1. मैं यह नहीं समझ पा रहा हूं कि आज सीपीएम के खिलाफ एक लड़ाई जीतने के लिए ममता का साथ लिया जा रहा है। क्या कल वही ममता मजबूत होकर सामने ठीक उसी तरह नहीं खड़ी होगी, जैसे आज सीपीएम खड़ी है?

2. सैद्धांतिक तौर पर एक दुश्मन को हराने के लिए दूसरे दुश्मन को मजबूत कर देना आगे चलकर नुकसानदायक साबित नहीं होगा? चूंकि दोनों ही नक्सलवादियों के खिलाफ हैं, इसलिए कौन जाने भविष्य में ये दोनों ही स्टेट के तौर पर नक्सलियों के खिलाफ खड़े नजर आएं, ठीक वैसे ही जैसा नेपाल में हुआ। आखिर में सत्ता उन्हीं हाथों में चली जाएगी, जिनके खिलाफ आज लड़ाई लड़ी जा रही है।

हो सकते तो समझाएं...

उपाध्यायजी(Upadhyayjee) said...

desh me ees tarah ke upadraviyon ko shakti ke sath daman kar dena chahiye. Bahut ho gaya. Hindustan kahan ka kahan chala gaya aur ye log jamindar aur majdoor ka kahani bana kar garibo ka shoshan kar rahe hain. Pakistan aur Aatankvadiyon se ladne waali kendra sarkar ko chahiye ki ees tarah ke upadraviyon ko kaabu me karen.
Sharmanak hadasa!!!
Eetane bade sankhya me upadravi hathiyaar lekar jamavada kar baithe aur wahan ki sarkar muh taak rahi hai.
Shame! Shame! Shame

GJ said...

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kumar Dheeraj said...

वामपंथ की राजनीति करनेवाले शायज इस बार ज्यादा ही निराश होगे । क्योकि पहली बार माकपा को मुहं की खानी पड़ी है । लेकिन एक चीज जो पहली बार सामने आयी है कि जब बंगाल में लाल दुगॆ बिखड़ा है तो तरह तरह के बयान सामने आ रहे है । पहले तो न ही ऐसे आंकड़े सामने आते थे और न ही बाम के विरूध्द कोई आवाज उठाई जाती थी लेकिन इस बार सब कुछ बदला बदला जरूर है । पोस्ट में तमाम जानकारी है । जिसे पढ़कर अच्छा लगा । धन्यवाद

raish said...

prasoon jee,
isme koi shak nahi ki aap aaj ke daur ke nami baniyaon ( patrakaron) se kahin jyada gambhir lekhan karte hain aur aap ko tathyon ka bareek gyan bhi hai. sach kahta hun, main bahut pehle se aap ki pratibha ka kayal raha hun. kayee baar aapse mulaqat huyee, maine apna paksh rakha bhi. aapko yaad ho na ho. karan thodi bahut to aap bhi patrakarita ki us bimaari se grasht hain jisme naam milne ke saath benaam logon ko hikarat ki nazar se dekhna ek parampara hai. khairmain ek baat hamesha kahna chahta raha hun aapki lekhni ke sandarbh me. aap hawa hawai patrakar nahi, aap ko vishyon ka behtarin gyan hota hai lekin kahin na kahin aapki lekhni me complicacy jaroor rahti hai. is se aksar aap ki theme samajhne me aam pathak ko muskil hoti hai. tv par anchoring ke dauran bhi aksar yeh cheez dekhta hun. chhota hun par sujhao hai ki thodi saralta ke saath aap ki baaten aaye to log aasani se samajh payeen. mujhe yaad aata hai ki aajtak me ek baar aap javed akhtar se kuch sawal kar rahe the, unhone bhi aapse yahi shikayat ki the ki aap kya sawal kar rahe hain unhe samajh nahi aa raha. main aapka shayad sabse bada prasansak hun, isliye itni bebaki se ye baat kah raha hun. ummid karta hun aap ise anyatha na lenge. aur yah bhi ummid karta hun ki meri baaton par sochenge. aur kya kahun, i salute u and ur type of journalism.
raish ahmad lali
assistant editor, shukrawar news magazine.