Monday, September 21, 2009

माओवादी गठबंधन के पांच साल का मतलब

सत्ता के लिये राजनीतिक गठबंधन के दौर में नक्सलियों के गठबंधन के पांच साल पूरे होने के मौके पर अगर यह सवाल उठाया जाए कि राजनीतिक गठबंधन ने माओवादियों को ढील दे दी और माओवादियो के गठबंधन ने राजनीतिक सत्ता को कटघरे में खडा कर दिया, तो कुछ गलत नहीं होगा । ठीक पांच साल पहले सीपीआई(एमएल), पीपुल्सवार और एमसीसीआई ने मिलकर सीपीआई माओवादी का गठन किया । और इसके बाद रेड कॉरिडोर की जो लकीर आंध्र प्रदेश के नल्लामला के जंगलों से होते हुये बस्तर में रुक जाती थी और एक नयी लकीर उड़ीसा से शुरु होकर बिहार-झारखंड होते हुये बंगाल तक एक नयी रेखा खींचती थी, दोनों न सिर्फ एक हो गयीं बल्कि माओवादियो के इस गठबंधन ने राजनीतिक तौर पर राज्य सत्ता को भी किस तरह कटघरे में खड़ा किया, यह बार बार उभरा।

जहानाबाद जेल ब्रेक से लेकर लालगढ के दौर में न सिर्फ माओवादियो की मारक क्षमता बढ़ती हुई दिखायी दी बल्कि संसदीय राजनीति और राज्य व्यवस्था माओवादी प्रभावित इलाकों में प्रभावहीन होकर उभरी। इस गठबंधन ने एकतरफ जहां पीपुल्स वार को एमसीसी के आम लोगो की भागेदारी के साथ सांगठनिक तौर तरीको को सिखाया, वही एमसीसी को पीपुल्सवार की तर्ज पर गुरिल्ला युद्द की ट्रेनिंग मिल गयी। वहीं दूसरी तरफ राजनीतिक दलों को गठबंधन के जरीये सत्ता तो मिली लेकिन माओवादियों के खिलाफ अलग अलग समझ रखने की वजह से कोई ठोस नीति कहीं नहीं बन सकी।

2004 में ही आंध्र प्रदेश में कांग्रेस के साथ टीआरएस जुड़ी। तेलागंना इलाके में पैठ बनाने वाली टीआरएस ने माओवादियों के खिलाफ कांग्रेस को कोई ठोस नीति नही बनाने दी। छत्तीसगढ में भाजपा ने सलवाजुडुम का नायाब प्रयोग कर जिस तरह आदिवासियो के हाथ में हथियार थमा दिये, उससे कांग्रेस माओवादियों से ज्यादा भाजपा की नीतियो के खिलाफ हो गयी या कहे राजनीतिक तौर पर निशाना साधने लगी। वहीं, उड़ीसा में भाजपा जो कार्रवाई माओवादियो के खिलाफ करना चाहती थी, उससे बीजू जनता दल इत्तिफाक नहीं रखती। झारखंड में कांग्रेस और झामुमो के बीच माओवादियो के खिलाफ कार्रवाई को लेकर कोई सहमति नहीं बनी। वहीं बंगाल में सीपीएम की राय और रणनीति दोनो से न तो सीपीआई ने कभी इत्तेफाक किया और ना ही फारवर्ड ब्लाक ने सहमति जतायी।

ऐसी ही उलझने केन्द्र स्तर पर भी रहीं। लेकिन माओवादियो के गठबंधन ने इसी दौर में पहली बार संसदीय राजनीति में हाथ जलाये बगैर राजनीतिक दलों को भी अपने प्रयोग में मोहरा बनाया। इसका सबसे ताजा उदाहरण अगर ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस है तो 2004 में पहला उदाहरण चन्द्रशेखर राव की टीआरएस थी । 21 सितंबर 2004 को जब दोनो माओवादी संगठनो ने गठबंधन का ऐलान किया था तो उस वक्त एमसीसी के महासचिव कामरेड किशन से जब यह सवाल पूछा गया था कि इस गठबंधन का असर क्या होगा तो किशन का जबाब था कि, " इसका प्रभाव मजदूरों,किसानों और मेहनतकश जनसमुदाय समेत समूची जनता पर पड़ेगा । क्योंकि आज तमाम गांधीवादी, बोटबाज और नकली कम्युनिस्ट पार्टियों का जनप्रेमी मुखौटा काफी हद तक उतर चुका है। ऐसी परिस्थिति में जनता भी एक ऐसी पार्टी का इंतजार कर रही है जो उनके मुक्ति संघर्ष को नेतृत्व प्रदान कर सके । और आने वाले दिनो में इसका सकारात्मक प्रभाव नये तरीके से वोटबाज राजनीति में मेहनतकश समुदाय महसूस करेगा। क्योकि गठबंधन के बाद सीपीआई माओवादी क्रांतिकारी वर्ग संघर्ष के साथ साथ कृषि क्रांतिकारी गुरिल्ला युद्द के जरीये भी बदलाव का नया रुप देखेगी"।

दरअसल, एमसीसी के महासचिव पांच साल पहले जब यह बात कह रहे थे, उससे पहले एमसीसी की पहल बंगाल में थी जरुर लेकिन वाममोर्चा सरकार के सामने उसने कभी ऐसी चुनौती किसी मुद्दे के आसरे नहीं रखी, जिससे नक्सलबाडी संघर्ष या आम जनता की भागीदारी का कोई एहसास माओवादियो के साथ जागे। लेकिन गठबंधन के बाद जिस तर्ज पर बंगाल में सिंगूर, नंदीग्राम और लालगढ़ में माओवादियो की मौजूदगी नजर आयी और जमीन अधिग्रहण के मुद्दो को खेत मजदूर और आदिवासियो के हक में करने के लिये उसी संसदीय राजनीति को औजार बना लिया, जिसकी नीतियां इसके खिलाफ शुरु से रही, वह गौरतलब हैं। रणनीति के तौर पर बंगाल में पहली बार आंध्र प्रदेश के माओवादियो ने अगुवाई की और उसे सांगठनिक या कहे प्रभावित लोगो को गोलबंद करने में जिस तरह एमसीसी का कैडर जुटा उसने राजनीतिक तौर पर गठबंधन के महत्व को सामने रखा। सिंगूर, नंदीग्राम के बाद लालगढ में पीपुल्स वार के पोलित ब्यूरो सदस्य कोटेश्वर राव जिस तरह मीडिया के सामने खुल कर लाये गये, उसने राजनीतिक दलों के गठबंधन में सत्ता की खिंचतान को ही एक सीख दी कि गठबंधन के जरीये ताकत बढाने का मतलब अपनी जमीन पर साथी को बडे कद में रखना भी होता है।

संसदीय राजनीति के गठबंधन में महाराष्ट्र से लेकर बिहार तक में और खासकर बंगाल में कभी अपनी जमीन पर किसी राजनीतिक दल ने अपने सहयोगी को आगे बढ़ने नहीं दिया, उल्टे साथी की राजनीति को भी हड़पने का मंत्र जरुर फूंका । असल में राजनीतिक दलों में जब खुद का कद बड़ा और बड़ा करने और दिखाने की होड़ है, ऐसे वक्त अगर बीते पांच साल के दौर में उसी पीपुल्स वार की पहल को देखे जो उससे पहले के 35 साल में कभी एमएल के वार जोन में माओवादियो को घुसने नहीं देता था और वैचारिक तौर पर संघर्ष से ज्यादा एक-दूसरे के कैडर को खत्म करने की दिशा में ही बढ़ता चला गया । गठबंधन के बाद पीपुल्स वार ने एमसीसी के साथ मिलकर एमएल शब्द छोडकर सिर्फ संगठन का नया नाम सीपीआई माओवादी पर ही सहमति नहीं बनायी बल्कि एमसीसी को गुरिल्ला जोन विकसित करने की जो ट्रेनिग दी, उसी का असर है कि देश का गृहमंत्रालय आंतरिक सुरक्षा के मुद्दे को सबसे गंभीर मान रहा है। क्योंकि रिपोर्ट साफ बतलाती है कि देश में पहली बार गुरिल्ला जोन ना सिर्फ विकसित किये गये हैं, बल्कि रणनीति के तौर पर इस जोन को दो स्तरो पर बांटा गया है, जिसमें आधार क्षेत्र में जन राजनीतिक सत्ता स्थापित करते हुये नये निर्माण क्षेत्र को विकसित करने की दिशा में माओवादी बढ़ रहे हैं।

असल में 2004 में पीपुल्स वार के महासचिव गणपति से यही सवाल किया गया था कि जंगल से बाहर माओवादियो की पकड़-पहुंच को लेकर गठबंधन की रणनीति क्या होगी। उस वक्त गणपति ने कहा था , " शत्रु के साथ छोटी झड़पों से बड़ी लड़ाइयों में विकास, छोटे सैन्य रुपों से बडे सैन्य रुपों का निर्माण, थोडी संख्या से बड़ी संख्या बनना, कमान और कमीशनों के रुप से ज्यादा व्यवस्थित ढांचो में विकास और शत्रु से हथियार छिनते हुये स्वयं को सशस्त्र करते में ज्यादा क्षमता। साथ ही आंतरिक पार्टी संघर्षो से बचने के लिये नये तरीके से राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक उत्पीड़न के मुद्दो के लिये कैडर को लगातार संघर्ष से जोडे रखना। " माओवादियो की इस सोच को अगर रेड कॉरिडोर में टटोल कर देखे तो पहली बार कई ऐसी स्थितिया सामने आयेंगी, जिसमें यह साफ लगेगा कि जिस तैयारी में माओवादी पांच साल पहले गठबंधन के जरीये जुटे और इन पांच सालो में छत्तीसगढ़, उड़ीसा,झारखंड और बंगाल में जो चेहरा माओवादियो का उभरा, उसने पहली बार विकास से कोसों दूर होते इलाको में ही विकास की लकीर के जरीये लूटतंत्र का संसदीय चेहरा भी उभार दिया है । इससे पहले के 35 सालों में रेड कॉरिडोर को लेकर यही सवाल सबसे ज्यादा गूंजता था कि नक्सल प्रभावित इलाको में विकास हुआ नहीं है या फिर सरकार की किसी योजना को माओवादी पहुंचने नहीं देते हैं। लेकिन बीते पांच सालो में जिस तेजी से रेडकॉरिडोर में किसान-आदिवासियो की जमीन पर विकास की लकीर खिंचने का प्रयास हुआ और प्राकृतिक संसाधनो की लूट खासकर खनिज पदार्थो को बहुराष्ट्रीय कंपनियो को बेचेने का प्रक्रिया शुरु हुई, उसने सरकार-माओवादी टकराव को एक नया कलेवर दे दिया। क्योंकि नक्सल प्रभावित सवा सौ जिलो के छह सौ गांव की स्थिति सामाजिक-आर्थिक तौर पर आज भी सबसे पिछड़े क्षेत्रों की त्रासदी ही बयान करती है। यह वैसे गांव हैं, जहा प्राथमिक शिक्षा,प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र और पीने का पानी तक मुहैया नहीं है। वहीं, अड़तालिस जिले ऐसे हैं, जहां की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियो में आजादी के बाद से इतना ही बदलाव आया है कि अंग्रेजों की जगह स्थानीय जमींदारो और राज्य सत्ता के नुमाइन्दो ने ले ली है। इन क्षेत्रो में नया बदलाव उनकी जमीन पर दखल और खनन है। यहां स्पेशल इकनामी जोन के नाम पर सिर्फ जमीन अधिग्रहण ही नहीं बल्कि उड़ीसा, छत्तीसगढ और झारखंड में खनिज के लिये यूरोप,एशिया और अफ्रीका की दो दर्जन से ज्यादा बहुराष्ट्रीय कंपनियो से देश की टॉप दस कंपनिया इस बात की होड़ कर रही है कि खनिजों की माइनिंग का अधिकार किसे मिलता है।

अगर रेडकारिडोर में बंगाल को छोड भी दिया जाये तो भी इस लालगलियारे के छह प्रमुख राज्यों आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र ,मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ,उड़ीसा और झारखंड में करीब अठारह लाख करोड़ की माइनिंग की बोली बीते पांच साल में लगायी गयी। जिसकी कीमत विश्व बाजार में साठ लाख करोड़ से ज्यादा की है । जाहिर है मुनाफे के इतने बडे अंतर का मतलब राज्यों में कमीशन को लेकर भी होड़ होगी। इस होड़ का असर यही है कि जिन इलाको में खनन होना है उन्हीं इलाको में सबसे ज्यादा माओवादियो के प्रभाव को बताया दिखाया गया है और राज्य पुलिस से लेकर अर्द्दसैनिक बलो की जो तैनाती दिखायी जा रही है, वह भी इन्हीं इलाको में केन्द्रित है । इसका असर माओवादियो के लिये दोहरे फायदे वाला भी साबित हुआ है । एक तरफ जिन इलाको में खनन हो रहा है या होना है वहां ग्रामीण-आदिवासी सरकार की नीतियो के खिलाफ एकजूट हुये हैं। इनके बीच माओवादियो की पैठ किस तेजी से बढ़ी है, इसका एहसास इसी से हो सकता है कि आंकडों के लिहाज से माओवादियों के निर्माण कैडर में दो सौ फीसदी तक का इजाफा हुआ है। निर्माण कैडर का मतलब है, जहां माओवादी निर्माण की अवस्था में हैं। वहीं पांच साल पहले जिस रणनीति का जिक्र पीपुल्सवार के महासचिव गणपति कर रहे थे कि उसी घेरे में सरकार घिरने भी आ रही है । क्योंकि उसी दौर में सुरक्षा बलों को सबसे ज्यादा नुकसान माओवादियों के हमले में हुआ है। हथियारों की लूट से लेकर अर्द्धसैनिकों की मौत बारुदी सुरंग के साथ साथ मुठभेढ़ के दौरान हुई है । इसकी एक वजह माओवादियों से ज्यादा खनन में कोई मुश्किल ना आने देने की राज्य सरकारो की सोच भी है। लेकिन माओवादियो को इसका सबसे बडा लाभ उन नये क्षेत्रो में मिल रहा है, जिसे विकास की श्रेणी में रखकर सरकार गांव से शहरो में तब्दील होते हुये देख रही है।

इस दौर में रेड कॉरिडोर में ही पचास से ज्यादा नये शहर सरकार के दस्तावेजों में बने हैं। लेकिन आर्थिक नीतियो को लेकर जो तनाव इन क्षेत्रो में पनपा है, उसमें वैचारिक तौर पर माओवादियों को एक बड़ा आधार भी इन्हीं क्षेत्र में बनता जा रहा है । क्योकि माओवादी इन इलाकों में उन मुद्दों को छू रहे हैं, जिससे जनता को हर क्षण दो-चार होना पडता है। मसलन , माओवादियो ने राष्ट्रीयता से लेकर दलित उत्पीडन और महिलाओ से लेकर अल्पसंख्यक समुदायों के उत्पीडन के मुद्दो को लेकर विशिष्ट नीतियां तैयार की हैं। लेकिन गठबंधन के इस दौर में संसदीय राजनीति या माओवादियों से इतर आम लोगो का परिस्थतियों को देखे तो उनके सामने सबसे मुश्किल वक्त है। एक तरफ राज्य की भूमिका ज्यादा से ज्यादा मुनाफा बनाने वाली हो चली हैं और वैसी नीतियों को ही लागू कराने वाली बन चुकी हैं, जिसमें उनका वोट बैक समा जाये।

वहीं, माओवादियो का चाहे विस्तार इन इलाको में खूब हो रहा है लेकिन उनके रणनीति अभी भी खुद को बचाते हुये अपनी पकड़ को मजबूत बनाने की है। यानी माओवादी अभी उस स्थिति में नहीं आये हैं, जहां प्रभावित इलाको की आर्थिक परिस्थियों को बदल दें । या फिर जिस सर्वहारा का सवाल जिन इलाको में गूजता है, उन इलाको के लिये कोई वैक्लिपिक ढांचा खड़ा कर सके । वही दूसरी तरफ केन्द्र सरकार का नजरिया माओवादियो को लेकर कितनी सतही समझ वाला है, यह माओवादियो के आत्मसमर्पण और उनके पुनर्वास के लिये जारी सुविधाओ के ऐलान से समझा जा सकता है, जिसके तहत मुआवजे-दर-मुआवजे का जिक्र किया गया है । यानी गठबंधन में जिस तरह छोटे सहयोगी दलो को सत्ता की मलाई चखाकर सत्ता बरकरार रखी जाती है, उसी तर्ज पर माओवादियो की समस्या का समाधान भी देखा जा रहा है । जबकि माओवादियो की पहल बताती है कि संसदीय राजनीति के इसी तौर तरीकों में पिछले चालीस साल में माओवादी न सिर्फ फैलते चले गये हैं बल्कि राजनीतिक दलों से कही ज्यादा प्रयोग कर उन्होंने खुद का खासा मजबूत बना लिया है और गठबंधन उसका नया हथियार है।

3 comments:

पी.सी.गोदियाल said...

पुण्य प्रसुन्न जी,
एक कहावत है कि दूसरो के लिए कांटे बोवोगे तो कभी न कभी आपको भी चुभेंगे ! ठीक वही हो रहा है आजकल लालगढ़ और उसके आस-पास ! जिन वामपंथियों ने ये कांटे बोए थे, आजकल फसल काट रहे है ! ममता बनर्जी और कुछ और नेता अगर यह सोचते है कि इन लोगो की सुहानुभूति पाकर ये हमेशा सफल रहेंगे तो ये भेई वही गलती दोहरा रहे है जो वामपंथियों ने की ! आज वक्त आ गया है कि इन नक्सलियों के खिलाफ एक समग्र युद्घ छेडा जाए और वह परिणाम तक पहुंचे, अन्यथा बहुत देर हो चुकी होगी !

सागर said...

आजकल मैं आपकी किताब 'ब्रेकिंग न्यूज़' पढ़ रहा हूँ... जानकार अच्छा लगा पटना में पढ़े हैं... मैं भी वहीँ का हूँ... आप जितनी अच्छे तरीके से इस विषय को समझा है... वो काबिल-ए-तारीफ़ है... शुभकामनाएँ...

abhishek said...

chaliye acha lga manmohan singh singh ji ke sath sath media ko bhi 40 sal bad problem samajh me a gyi per unka kya jo 40 sal se shahid ho rhe hai aur kb tak hoge pta nhi likhte rhiye ek din janta jarur jagegi