Sunday, September 27, 2009

रात के अंधेरे में लालगढ़ से दिल्ली तक माओवादी नज़रिया

-सत्ता बंदूक की गोली से निकलती है और व्यवस्था बंदूक से चलती है
- कोबाड के एनकाउंटर की तैयारी झारखंड में हो चुकी थी

माओवादी कोबाड गांधी को पुलिस एनकाउंटर में मारना चाहती थी। लेकिन मीडिया में कोबाड की गिरफ्तारी की बात आने पर सरकार को कहना पड़ा कि कोबाड गांधी नामक बड़े माओवादी को दिल्ली में पकड़ा गया है, जो सीपीआई माओवादी का पोलित ब्यूरो सदस्य है। यह बात अचानक किसी ने टेलीफोन पर कही। 24 सितंबर की रात के वक्त मोबाइल की घंटी बजी और एक नया नंबर देख कर थोडी हिचकिचाहट हुई कि कौन होगा...रात में किस मुद्दे पर कौन सी खबर की बात कहेगा....यह सोचते सोचते हुये ही मोबाइल का हरा बटन दब गया और दूसरी तरफ से पहली आवाज यही आयी कि मैं आपको यही जानकारी देना चाहता हूं कि सीपीआई माओवादी संगठन के जिस पोलित ब्यूरो सदस्य कोबाड गांधी को पुलिस ने पकड़ा है, उसके एनकाउंटर की तैयारी पुलिस कर रही थी।

लोकिन आप कौन बोल रहे हैं ? मैं लालगढ़ का किशनजी बोल रहा हूं । किशनजी ....यानी सीपीआई माओवादी का पोलितब्यूरो सदस्य कोटेश्वर राव ...यह नाम मेरे दिमाग में आया तो मैंने पूछा, किशनजी अगर इनकाउंटर करना होता तो पुलिस कोबाड को अदालत में पेश नहीं करती।

आप सही कह रहें है लेकिन पहले मेरी पूरी बात सुन लें .....जी कहिये । उन्होंने कहा, हमें कोबाड गांधी के पकडे जाने की जानकारी 22 सितबर की सुबह ही लग गयी थी । इसका मतलब है कोबाड को 22 सितंबर से पहले पकड़ा गया था। हमनें दिल्ली में पुलिस से पूछवाया। लेकिन पुलिस ने जब कोबाड को पकड़ने की खबर को गलत माना तो हमने 22 सितंबर को दोपहर बाद से ही तमाम राष्ट्रीय अखबारो को इसकी जानकारी दी। इसके बाद मीडिया के लगातार पूछने के बाद ही सरकार की तरफ से रात में कोबाड गांधी की गिरफ्तारी की पुष्टि की गयी। अगर मीडिया सामने नहीं आता तो दिल्ली पुलिस झारंखड पुलिस को भरोसे में ले चुकी थी और कोबाड के एनकाउंटर की तैयारी कर रही थी। क्योंकि दिल्ली पुलिस के विशेष सेल ने जब झारखंड पुलिस को कोबाड गांधी के पकड़ने की जानकारी दी तो झारखंड पुलिस ने इतना ही कहा कि कोबाड गांधी को एनकाउटर में मार देना चाहिये। नहीं तो माओवादी झारखंड समेत अपने प्रभावित क्षेत्रो में तबाही मचा देगे। हमारे एक साथी को झारखंड पुलिस ने पकड़ा था और दो महीने पहले ही हमने पांच राज्यो में बंद का ऐलान किया था। झारखंड में हमारी ताकत से सरकार वाकिफ है। इसलिये झारखंड में भी जब हमने पता किया तो यही पता चला कि 21 सितंबर को ही झारखंड पुलिस की तरफ से कोबाड गांधी के एनकाउंटर को हरी झंडी दे दी गयी थी।
लेकिन दिल्ली में एनकाउंटर करना खेल नहीं है। क्योंकि मीडिया है, सरकारी तंत्र है...फिर लोकतंत्र पर इस तरह का दाग सरकार भी लगने नहीं देगी!

मै कब कह रहा हूं कि एनकाउंटर दिल्ली में होना था । झारखंड पुलिस चाहती थी कि 22 सितंबर की रात ही कोबाड गांधी को डाल्टेनगंज ले जाया जाये । वहां डाल्टेनगंज और चतरा के बीच पांकी इलाके में पहुंचाया जाये और एनकाउंटर में मारने का ऐलान अगले ही दिन 23 सितंबर को कर दिया जाये। माओवादी नेता कोटेश्ववर राव की मानें तो कोबाड गांधी के एनकाउंटर के जरीये झारखंड पुलिस के आईजी रैंक के एक अधिकारी इसके जरिए मेडल और बडा ओहदा भी चाहते थे, जो उन्हें इसके बाद गृह मंत्रालय की सिफारिश पर मिल भी जाता। मुझे लगा माओवादी पूरे मामले को सनसनीखेज बनाकर सरकार की क्रूर छवि को ही उभारना चाहते है। मैंने बात मोड़ते हूये पूछा, कोबाड गांधी की गिरफ्तारी का असर माओवाद के विस्तार कार्यक्रम पर कितना पड़ेगा ? करीब दो-तीन महीने तक संगठन का काम रुकेगा, जबतक दूसरे सदस्य कोबाड का काम नहीं संभाल लेते। मैंने देखा, रात के करीब साढे बारह बज रहे है..तो सोचा लालगढ के बार में भी माओवादियो की पहल और सोच क्या चल रही है, जरा इसे जान लेना भी अच्छा है, यह सोच मैने जैसे ही कहा, लालगढ़ मे तो आपको फोर्स ने घेर लिया है तो पल में जवाब आया, बिलकुल नहीं...आप यह जरुर कह सकते है कि लालगढ के जरीये पहली बार बंगाल में माओवादी कैडर और सीपीएम के हथियारबंद दस्ते आमने सामने आ खडे हुये हैं। प्रभावित इलाको के तीन ब्लाक मिदनापुर, सेलबनी और वाल्तोर में बीते तीन महिने की हिंसक झडपो में सीपीएम के सौ से ज्यादा हथियार बंद कैडर मारे जा चुके है । अभी तक इन क्षेत्रो में सीपीएम के चार सौ से ज्यादा हथियारबंद कैडर को जमीन छोड़नी पडी है जो कि 12 कैंपो में मौजूद थे।

कैंप का मतलब...क्या सेना का कैंप ? जी नहीं. सीपीएम का कैंप, जहां उनके हथियारबंद कैडर रहते हैं। सबसे बड़ा कैप तो सीपीएम नेता अनिल विश्वास के घर पर ही था, जहां सीपीएम के 35 कैडर मारे गये। इसी के बाद सीपीएम के एक दूसरे बडे नेता सुशांतो घोष ने सार्वजनिक सभा में ऐलान किया कि "नंदीग्राम की तरह लालगढ़ पर हमला कर जीत लेगें।" तो इसका असर लोगो में किस तरह हुआ यह बेकरा गांव की सभी में देखने को मिला, जहां के गांववालों ने सुशांतो घोष की सभा नहीं होने दी । जब वह सभा को संबोधित करने पहुंचे तो गांववालो ने उन्हें खदेड़ दिया। गांववालों में सीपीएम को लेकर कितना आक्रोष है, इसका नजारा मिदनापुर में हमनें देखा । मिदनापुर में इनायतपुर के पोलकिया गांव में 21 सितंबर की रात सीपीएम के पांच लोग मारे गये। दस घायल हुये । यहां की तीन आदिवासी महिलाओ के साथ सीपीएम के हथियार बंद कैडर ने बदसलूकी की थी । जिसके बाद गांववालो में आक्रोष आ गया । गांववालो ने सीपीएम की शिकायत यहां तैनात ज्वाइंट फोर्स से की । लेकिन गांववालो की मदद ज्वाइंट फोर्स ने नहीं की । माओवादियो से गांववालो ने मदद मांगी । 10 घंटे तक फायरिंग हुई । जिसके बाद सीपीएम के पांच लोग मारे गये । इसी तरह सोनाचूरा में 8 सीपीएम कैडर मारे गये । सीपीएम को लेकर लोगो में आक्रोष है । यही हमें ताकत भी दे रहा है और हम उसी जनता के भरोसे संघर्ष भी कर रहे है।

लेकिन अब केन्द्र सरकार भी माओवादियो को चारो तरफ से घेरने की तैयारी कर रही है। कैसे सामना करेंगे ? सवाल हमारा सामने करने का नहीं है । हम जानते है कि अबूझमाड यानी माओवादी प्रभावित क्षेत्र में घुसने के लिये 8 हैलीपैड बनाये गये है । आंध्र प्रदेश से सीमावर्ती चित्तूर , भद्राचलम से लेकर छत्तीसगढ के बीजापुर तक में अर्धसैनिक बलो को तैनात किया जा रहा है । लेकिन इसमें जितना नुकसान हमारा है, उतना ही सरकार का भी होगा। इसका एक चेहरा छत्तीसगढ के दंत्तेवाडा के पालाचेलिना गांव में सामने भी आया, जहां कोबरा फोर्स को पीछे हटना पड़ा। तो क्या यह चलता रहेगा। यह सरकार पर है। क्योंकि यहां के आदिवासी ग्रामीणो में गुस्सा है। वह हमसे कहते हैं मिलकर लडेगें, मिलकर मरेंगे। यह सरकार का काम है कि उनकी जरुरतो को उनके अनुसार समाधान करे। नहीं तो हम भी उन्हीं के साथ मिलकर लडेंगे, मिलकर मरेंगे ।

तो क्या सरकार समझती है कि गांववालो की जरुरत क्या है ? देखिये , सवाल समझने का नहीं है । जिन पांच राज्यो को लेकर सरकार परेशान है। उनमें झारंखंड, छत्तीसगढ और उड़ीसा में सबसे ज्यादा खनिज संसाधन है। खनिज संसाधन की लूट के लिये तब तक रास्ता नहीं खुल सकता है, जब तक यहां के ग्रामीण आंदोलन कर रहे है और हम उनके साथ खड़े हैं। लेकिन सरकार विकास के रास्ते भी खनिज संपदा का उपयोग कर सकती है ? सही कह रहे हैं आप लेकिन आंध्रप्रदेश से लेकर बंगाल तक के रेड कारिडोर पर पहली बार अमेरिका की नजर है । उसे भारत का यह खनिज औने पौने दाम में मल्टीनेशनल कंपनियो को दिलाने का रास्ता खोलना है। हाल ही में गृह मंत्री चिदबंरम साहब पेंटागन गये थे। वहीं उन्हें ब्लू प्रिट दिया गया कि कैसे माओवादियो को इन इलाको से खत्म करना है। इसी लिये कश्मीर से फौज हटायी जा रही है, जिसे माओवादी प्रभावित इलाको में हमारे खिलाफ लगाया जा रहा है। लेकिन यह समझ भारत की नही, अमेरिका की है । अमेरिका समझ रहा है कि विश्व बाजार जब तक पहले की तरह चालू नहीं हो जाता तब तक मंदी का असर बरकरार रहेगा। इन इलाको के खनिज संसाधन अगर विश्वबाजार में पहुंच जायें तो दुनिया के सामने करीब पचास लाख करोड़ से ज्यादा का व्यापार आयेगा, जो झटके में मुर्दा पडी दुनिया की दर्जनों बड़ी कंपनियो में जान फूंक देगा। आप यही देखो की एस्सार का 15 हजार करोड का प्रोजेक्ट इसी दिशा में काम कर रहा है । बैलेडिला से लेकर बंदरगाह तक पाइप लाइन का उसका प्रोजेक्ट शुरु हुआ है । यानी यहां की खनिज संपदा कैसे बाहर भेजी इस दिशा में पहल शुरु हो चुकी है।

लेकिन माना जाता है कि आप लोगो को राजनीतिक मदद भी है । आप लोगो को ममता बनर्जी की मदद मिल रही है। ऐसे मुद्दो को आप संसदीय राजनीति के जरीये उठा सकते है । इसके लिये हथियार उठाने की क्या जरुरत है ? आप ममता की क्या बात कर रहे हैं। वह तो खुद सौ फीसदी प्राइवेटाइजेशन की वकालत कर रही है । मैं आपको एक केस बताता हू ....आप खुद जांच लें । कोलकत्ता हवाइअड्डा से जब आप शहर की तरफ आते है तो रास्ते में राजारहाट पडता है । यहां उपनगरी तैयार की जा रही है । जहां अत्याधुनिक सबकुछ होगा । किसानों की जमीन हथियायी जा रही है । विप्रो और इन्फोसिस को दुबारा मनाकर लाया जा रहा है । लेकिन किस तरह राजनीति यहां एकजुट है, जरा इसका नजारा देखिये। यहां जो सक्रिय हैं, उनमें सीपीएम के पोलित ब्यूरो सदस्य गौतम देव, ज्योति बसु के बेटे चंदन बसु, तृणमूल कांग्रेस के स्थानीय विधायक शामिल हैं। उसके अलावा बिल्डिग माफिया कमल नामक शख्स भी साथ है। सैन्ट्रल बैक आफ इंडिया इनका प्रमोटर है । और राजारहाट में अभी तक 600 किसान जमीन गंवा चुके है । जिसमें से 60 किसान मारे भी गये है । 100 से ज्यादा घायल होकर घर में भी पड़े हैं। लेकिन इन किसानो को राजनीतिक हिंसा का शिकार बता दिया गया । यानी किसान को भी राजनीतिक दल से जोडकर उपनगरी के मुनाफे में बंदरबांट सीपीएम और तृणमूल दोनो कर रही हैं ।

तो क्या इसे जनता समझ नहीं रही है ? समझ क्यों नहीं रही है। ईद के दिन ही यानी 21 सिंतबर को ही तृणमूल का एक नेता निशिकांत मंडल मारा गया । निशिकांत सोनाचूरा ग्राम पंचायत का प्रधान था । तृणमूल नेता को क्या ग्रामीणों ने मारा ? आप कह सकते हैं कि ग्रामीण आदिवासियो की सहमति के बगैर इस तरह की पंचायत के प्रधान की हत्या हो ही नहीं सकती है । निशिकांत पहले सीपीएम में था। फिर तृणमूल में आ गया । ऐसे बहुत सारे सीपीएम के नेता है तो पंचायत स्तर पर अब ममता बनर्जी के साथ आ गये है । एसे में गांववाले मान रहे हैं कि ममता नयी सीपीएम हो गयी हैं। जबकि यह लड़ाई सीपीएम की नीतियो के खिलाफ और उसके कैडर की तानाशाही के खिलाफ शुरु हुई थी। वहीं स्थिति अब ममता की बन रही है। इसलिये अब देखिए निशिकांत की हत्या नंदीग्राम में हुई, जहां से ममता बनर्जी को राजनीतिक पहचान और लाभ मिला।

तो क्या यह माना जाये कि 2011 के चुनाव में ममता नहीं जीत पायेगी ? यह तो हम नहीं कह सकते है कि चुनाव कौन जीतेगा या कौन हारेगा लेकिन अब ग्रामीण आदिवासी मानने लगे है कि ममता बनर्जी भी उसी रास्ते पर है, जिस पर सीपीएम थी । यानी ममता का मतलब एक नयी सीपीएम है । बाचतीत करते रात के डेढ़ बज चुके थे मैने फोन काटने के ख्याल से कहा कि .....चलिये इस पर फिर बात होगी। क्या आपके इस मोबाइल पर फोन करने पर आप फिर मिल जायेगे ? नहीं... फोन आप मत करिये। जब हमें बात करनी होगी तो हमीं फोन करेगे । बातचीत खत्म हुई तो मुझे यही लगा कि माओवादियो को लेकर सरकार का जो नजरिया है, उसके ठीक विपरित माओवादियो का नजरिया व्यवस्था और सरकार को लेकर है...यह रास्ता बंदूक के जरिये कैसे एक हो सकता है, चाहे वह बंदूक किसी भी तरफ से उठायी गयी हो।

17 comments:

Ulook said...

क्या क्या हो सकता है इस देश में !!!

Ratan Singh Shekhawat said...

मुझे यही लगा कि माओवादियो को लेकर सरकार का जो नजरिया है, उसके ठीक विपरित माओवादियो का नजरिया व्यवस्था और सरकार को लेकर है...यह रास्ता बंदूक के जरिये कैसे एक हो सकता है, चाहे वह बंदूक किसी भी तरफ से उठायी गयी हो।

आप सही सोच रहे है बल पूर्वक कोई मसला हल नहीं किया जा सकता जबकि माओवादी बन्दूक के जरिए सब कुछ हासिल करना चाहते है | इन्हें तो पुलिस द्वारा हर हाल में सलटा ही देना चाहिए चाहे मुटभेड फर्जी हो असली | ये भी तो निरीह लोगों को मारने में लगे है अतः ऐसों के लिए क्या कानून और क्या मानवाधिकार ?

ਵੀਲ੍ਹਾ ਤੇਜਾ said...

union minister presence at naxalite affacted area and main stream media's propeganda indicates that a big massacre is going to take place ....visthatpan virodhi comette cheif MAHTO and kobbad's aresst a step ahed to this action . u can't avert it but what happen there should be known to the world. u can do this work.
TEJA

Yogesh Gulati said...

शानदार पोस्ट ! इस सनसनीखेज़ खुलासा के बाद सरकार को अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना होगा! अब ये देखना दिलचस्प होगा कि सरकार का अगला कदम क्या होगा? इसके साथ ही सारा देश आने वाले दिनो मे नक्सलियों की ताकत का नज़ारा भी देखेगा! नक्सलवाद को हमारे नेताओं ने बहुत हल्के ढंग से लिया और कइँ राजनीतिक दलोँ ने तो इसपर अपनी रोटियाँ भी सेँकी! जो आज भी जारी है! ये समस्या सत्तर के दशक मेँ ही बातचीत के ज़रिया सुलझाइ जा सकती थी! लेकिन अपने निहित राजनैतिक स्वार्थ की पूर्ति के लिये हमारे नेताओं ने ऐसा नहीं किया! और नक्सलवाद को पनपने मेँ सहयोग दिया! नक्सलवाद देश के लिये आतकँवाद से भी ज्यादा खतरनाक है ! इन दिनोँ नक्सली-आतँकी गठजोड के भी सँकेत मिल रहे हैँ! यानि चुनौतियाँ अभी और भी हैँ! ऐसे मेँ फर्ज़ी मुठभेड से क्या हासिल होगा? ये सवाल उन आला अफसरोँ से पूछना चाहिये जो अपना कद बढवाने के लिये इस तरह के हथकँडे अपना रहे हैँ!
कल दशहरा है और कल फिर हम सब मिल कर रावण जलायेँगे! हम हज़ारोँ सालोँ से ऐसा करते आ रहे हैँ! तो क्या सच मेँ रावण मर गया? नहीँ वो तो आज भी ज़िँदा है!
ऐसे फर्ज़ी एनकाउँटरोँ से किसका भला होगा? गुजरात मेँ हुए फर्ज़ी एनकाउँटरोँ ने क्या देश की छबि पहले ही कम धूमिल की है? कि अब दिल्ली और झारखँड के सीने पर भी ये दाग लगाने की तैयारियाँ की जा रही हैँ! जितना पैसा सरकार नक्सलवाद को दबाने मेँ खर्च कर रही है.....उतना पैसा आदिवासी इलाकोँ मेँ विकास कार्योँ पर लगाया जाता तो नक्सलवाद जड से समाप्त हो चुका होता! क्योँकि, “भूखे पेट को देश भक्ति नहीँ सिखाइ जा सकती!”
एक बार फिर इस खुलासे के लिये आपको बधाइ! क्योँकि आपकी हर पोस्ट कुछ सोचने पर मजबूर करती है!

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

माओवाद और नक्सलवाद मूल झगड़ा नहीं है। मूल झगड़ा है। देश की संपन्नता का जनता में बंटवारा। यदि सामाजिक, आर्थिक न्याय और जनतंत्र देश में मौजूद रहे तो माओवाद और नक्सलवाद की आवश्यकता ही नहीं है। लेकिन जब जनता की जरूरतों और मांगों को लगातार कुचला जाए और कानून को ताक पर रख दिया जाए। ऐसे में जो भी ताकतें जनता को अपनी लगेंगी जनता उन के साथ हो लेगी, चाहे वे माओवादी हों या फिर नक्सलवादी।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

माओवाद और नक्सलवाद मूल झगड़ा नहीं है। मूल झगड़ा है। देश की संपन्नता का जनता में बंटवारा। यदि सामाजिक, आर्थिक न्याय और जनतंत्र देश में मौजूद रहे तो माओवाद और नक्सलवाद की आवश्यकता ही नहीं है। लेकिन जब जनता की जरूरतों और मांगों को लगातार कुचला जाए और कानून को ताक पर रख दिया जाए। ऐसे में जो भी ताकतें जनता को अपनी लगेंगी जनता उन के साथ हो लेगी, चाहे वे माओवादी हों या फिर नक्सलवादी।

विकास said...

ek baar phir ek shandar aur nai jankarion se bhada post.....shukriya

Dhamender said...

(आंध्रप्रदेश से लेकर बंगाल तक के रेड कारिडोर पर पहली बार अमेरिका की नजर है । उसे भारत का यह खनिज औने पौने दाम में मल्टीनेशनल कंपनियो को दिलाने का रास्ता खोलना है। हाल ही में गृह मंत्री चिदबंरम साहब पेंटागन गये थे। वहीं उन्हें ब्लू प्रिट दिया गया कि कैसे माओवादियो को इन इलाको से खत्म करना है। इसी लिये कश्मीर से फौज हटायी जा रही है, जिसे माओवादी प्रभावित इलाको में हमारे खिलाफ लगाया जा रहा है। लेकिन यह समझ भारत की नही, अमेरिका की है । अमेरिका समझ रहा है कि विश्व बाजार जब तक पहले की तरह चालू नहीं हो जाता तब तक मंदी का असर बरकरार रहेगा। इन इलाको के खनिज संसाधन अगर विश्वबाजार में पहुंच जायें तो दुनिया के सामने करीब पचास लाख करोड़ से ज्यादा का व्यापार आयेगा, जो झटके में मुर्दा पडी दुनिया की दर्जनों बड़ी कंपनियो में जान फूंक देगा। आप यही देखो की एस्सार का 15 हजार करोड का प्रोजेक्ट इसी दिशा में काम कर रहा है । बैलेडिला से लेकर बंदरगाह तक पाइप लाइन का उसका प्रोजेक्ट शुरु हुआ है । यानी यहां की खनिज संपदा कैसे बाहर भेजी इस दिशा में पहल शुरु हो चुकी है।)

पुण्ये जी आप ने लिख दिया हमने पढ़ लिया अब ये सोचने और करने की जरुरत है की खनिज सम्पदा कैसे बहार जाने से रुकेगी कोई इस का तरीका भी बताये

yadavdharmender17@yahoo.com

Dhamender said...

वेसे इस लेख का एक और भी मतलब है की अब सुरक्षा कर्मी मारे जाये या फिर माओवादि फायदा तो अमेरिका को ही होने वाला है

धरमेंदर यादव फरीदाबाद

Manoj Bharti said...

अच्छी रपट है ।

माओवादी और सरकार के नजरिये में कोई फर्क नहीं रह जाएगा यदि दोनों ओर से बंदूक से हल ढ़ूँढ़ा जाएगा ।

http://www.gunjanugunj.blogspot.com

बेरोजगार said...

एक अच्छी पोस्ट है. कहीं तो व्यवस्था दोषी है ही.

appaliwal said...

Prasoon ji you should have at least written just a line about the dark and shady side of naxalite leaders they are nothing but meciless killers.

विष्णु राजगढ़िया said...

बंगाल पुलिस ने मीडिया के नाम पर विश्वासघात किया
आनलाइन हस्ताक्षर द्वारा विरोध अवश्य करें
पश्चिम बंगाल की सीआइडी पुलिस ने मीडिया के नाम पर विश्वासघात किया है। लालगढ़ आंदोलन के चर्चित नेता छत्रधर महतो को पकड़ने के लिए पुलिस ने पत्रकार का वेश बनाकर 26 सितंबर को ऐसा किया।
यह मीडिया के प्रति लोगों के भरोसे की हत्या है। यह मीडिया की स्वायत्तता का अतिक्रमण है। यह बेहद शर्मनाक, आपत्तिजनक एवं अक्षम्य अपराध है। इसका पुरजोर विरोध होना चाहिए। इस संबंध में तत्काल एक स्पष्ट कानून बनना चाहिए।
कृपया अपना विरोध दर्ज कराने के लिए यहां क्लिक करके प्रधानमंत्री के नाम पत्र पर आनलाइन हस्ताक्षर करें
http://www.petitiononline.com/wbmisuse/petition.html
पूरी स्टोरी
http://bhadas4media.com/index.php?option=com_content&view=article&id=2666:vishnu-rajgadia&catid=27:latest-news&Itemid=29

विष्णु राजगढ़िया said...

To protest the misuse of Media's credibility by Bengal police, Pls send your comment on
vranchi@gmail.com

raakesh said...

पुण्य जी प्रणाम,

हर बार कुछ नया पता चलेला
लेकिन बहुत भईल राग माओ अब त रउवा बंद करीं
नाहीं त गीत गावे के पड़ी ये लाल रंग कब तुम्हे छोड़ेगा....

फिर भी राउर लेख खाली लेख नईखे...एक शोध बा...अ ई बताईं कोटेश्वर जी रिलाएंस से रिलाएंस फ्री में बात करे लें की....वोडाफोन के 75 पइसा पर मिनट वाला गणित बा...राउर एगो फैन...

Pramode Mallik said...

Please accept my heartfelt congratulations Punyajee! It's great revelation. I could not watch your channel on that day and the day following, I do not know whether you have carried this story. But it should have been aired at any cost.

I have spent my whole life in Calcutta and worked for Jansatta for almost 12 years. I can understand why the likes of Buddha and Biman are upset with the rise of Naxals.
They have not yet become a Raman Singh of Chchattisgarh, but believe me, soon they will discard the garb of left politics. They will soon launch Salwa Judum in a different form and name. The CPIM has already started attacking the Naxals.
Kobad Ghandhi was not killed due to alacrity the Naxlas shown in spilling beans. But may more Reds are being killed in different parts, including the red bastion of West Bengal.

Kaushal Sah said...

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