Friday, March 5, 2010

मीडिया को कठघरे में रखती एक कविता, गौर कीजिए...

बंधु....जो हालत और हालात देश के हैं, वैसे में अक्सर हम जैसे बहुत कुछ कहना-लिखना चाहते हैं। लेकिन कभी चंद लाइने हमारे बहुत-कुछ कहे या लिखे से आगे की बात कह जाती हैं। कभी मेरी सहयोगी रही ऋचा साकले ने मुझे यह कविता भेजी...तो मुझे लगा यह तो हम सभी को पढ़नी चाहिये.......खासकर कलमगिरी करने वालों को....जरा पढ़ें फिर गौर करें।

उनवान- सहाफ़ी से (शीर्षक- पत्रकार से)

क़ौम की बेहतरी का छोड़ ख़याल, (देश की उन्नति का विचार छोड़ दे)

फिक्र-ए-तामीर-ए-मुल्क दिल से निकाल, (राष्ट्र निर्माण की चिन्ता छोड़ दे)

तेरा परचम है तेरा दस्त-ए-सवाल, (तेरे बैनर पर ही प्रश्न चिन्ह है)

बेज़मीरी का और क्या हो मआल (गिरने की क़ीमत क्या होनी चाहिए)

अब क़लम से इज़ारबंद ही डाल (अपनी लेखनी से बस नाड़े ही पिरो)

तंग कर दे ग़रीब पे ये ज़मीन, (निर्धनों पर अत्याचार में हाथ बंटा)

ख़म ही रख आस्तान-ए-ज़र पे जबीं, (धनपशुओं के आगे नमन करता रह)

ऐब का दौर है हुनर का नहीं, (ये समय बुराइयों का है योग्यता का नहीं)

आज हुस्न-ए-कमाल को है जवाल (तेरी यही योग्यता साबित करने का समय है)

अब क़लम से इज़ारबंद ही डाल

क्यों यहाँ सुब्ह-ए-नौ की बात चले, (किसलिए नई भोर की बात करोगे)

क्यों सितम की सियाह रात ढले, (क्यों तुम अत्याचार की रात की बात करोगे)

सब बराबर हैं आसमान के तले, (तुमने मान लिया है कि सब अच्छा है)

सबको रज़ाअत पसंद कह के टाल (सबको एडजस्ट करने वाला कहता रह)

अब क़लम से इज़ारबंद ही डाल

नाम से पेशतर लगाके अमीर, (अपने काम के बजाय अपनी औक़ात को धार दे)

हर मुसलमान को बना के फ़क़ीर, (हर ईमानदार को कमज़ोर बनाकर)

क़स्र-ओ-दीवान हो क़याम पज़ीर, (हर हाल में महल और पद हासिल कर ले)

और ख़ुत्बों में दे उमर की मिसाल (और सिर्फ़ बयान में ख़लीफ़ा उमर फ़ारूक़ की मिसाल दे)

अब क़लम से इज़ारबंद ही डाल

आदमीयत की हमनवाई में, (मानवता का साथ देने के ढोंग में)

तेरा हमसर नहीं ख़ुदाई में, (कोई तुझसा नहीं भगवान का दावा करने में)

बादशाहों की रहनुमाई में, (सत्ताधारियों के तलवे चाटने में)

रोज़ इस्लाम का जुलूस निकाल (रोज़ धर्म का नाटक रच)

अब कलम से इज़ारबंद ही डाल

लाख होंठों पे दम हमारा हो, (फिर भी बात अवाम की ही करना)

और दिल सुबह का सितारा हो, (ये दिखाना के जिस सुबह की तू बात करता है वो आएगी)

सामने मौत का नज़ारा हो, (सम्मुख मौत बंट रही हो तब भी)

लिख यही ठीक है मरीज़ का हाल (यही कहना मानवता सुरक्षित है)

अब कलम से इज़ारबंद ही डाल (अपनी लेखनी से बस नाड़े ही पिरो)

- हबीब जालिब, पाकिस्तान

(1928- 1993)

14 comments:

पी.सी.गोदियाल said...

बहुद बढ़िया कविता, मगर साथ में लगाया गया अनुवाद अर्थ का अनर्थ कर रहा है, क्योंकि कविता खुद व् खुद एक करारी चोट कर रही है समझदारों के सिर पर !!

AAINA said...

Ise padhne se kya hasil hoga? Ise padhne ke baad bhi koi khud se baat nahi karega aur sabkuchh suny mankar sise ke samne khade hokar apni aakho se aakhe milayega, aur kahega ki sabkuch thik hai, kahe ki sharm.Bataiye koi kya gaur karega?

उम्दा सोच said...

मीडिया लोकतन्त्र का चौथा स्तम्भ कहा जाता है, ज़िम्मेदारी बहौत बडी है और कुछ लोगो की लापरवाहियों से सबको जवाबदार होना पडता है!

सर्वग्यात सच है भारतीय मीडिया मे निस्पक्षता का आभाव है !

प्रभु चावला जी जो एक अति महत्वपूर्ण ओह्दा रखते है उनके बयान " हमने ठेका थोडे न ले रक्खा है समाजसेवा का" लोकतन्त्र के स्तम्भ का खोखलापन दर्शाता है !!!

BIRENDRA said...

कविता बढ़िया है. आप अनुवाद काहे लिखने गए, बाजपेयी जी? टीवी पर ज्यादा बोलते-बोलते आदत खराब हो गई है पत्रकारों की. आपको क्या लगा? जिस कविता को आप समझ गए हैं वही कविता बाकी पाठकों की समझ में नहीं आयेगी? किस दुनियाँ में रहते हैं आपलोग, भाई? अर्थ लगाकर अच्छी-भली कविता की ऐसी-तैसी कर डाली आपने.

ऐसा एक पत्रकार ही कर सकता है. धन्य हैं आप.

सागर said...
This comment has been removed by the author.
सागर said...

कविता वाकई बहुत अच्छी है .और हालत पर नज़र डालती है ऐसे में प्रासंगिक तो होगा ही. आपका शुक्रिया.

Ramesh Maurya said...

बहुत अच्छी कविता है ....... देश रो रहा है और उसको चलने वाले सो रहे हैं.


मेरे ब्लॉग पर भी आइये आप लोगो से सीख के मैं भी थोडा बहुत लिखने का प्रयास करता हू - www.vicharonkadarpan.blogspot.com

रवीन्द्र प्रभात said...

कविता प्रासंगिक है,भारतीय मीडिया के खोखलापन दर्शाता है !

शहरोज़ said...

वाकई कविता अच्छी है और प्रासंगिक. .

राकेश पाठक said...

कलम बुझ रही है
नहीं, कलम बिक रही है
कलम ज़िंदा नहीं अब
हरारत होती जो जिस्म में...
तो लिखती, बोलती, उधेड़ती

नहीं, कलम ज़िंदा है पर टूट गई है...
तस्वीरें ज्यादा बोलती हैं
तस्वीरें जो अच्छी लगे
कलम ने एक समझौता किया है
उससे, जिसने उसे ज़िंदा रहने का मौका दिया है
सांसे चल रही हैं 'वेंटिलेटर' पर...

कलम चीख नहीं सकती
कलम अवसाद ओढ़े है
कलम लिखे तो खून रिसता है
कलम ज़ुबां ढूंढ़ती है
सुना है कलम ने ज़िंदगी को गिरवी रख
सांसे खरीदी हैं

नहीं, कलम नहीं मरी
अब वो हाथ नहीं हैं
जिनमें ज़िंदगी की जुंबिश थी
हर आदमी के दर्द की खलिश थी

दरअसल मरा वो आदमी है
जिसके साथ उसने बना लिया था
एक मरासिम...
कलम बुझेगी नहीं
वो लौटेगी...
गर वो आदमी लौटेगा

Ashish said...

Sir,
We can say its a realty check for all of us, who claims themselves as a jpurnalist.

harendra said...

wakai ab patrakaron ke kalam ka kaam sirf ijarband daalne ka hi reh gaya hai, nahi to ek zamana tha ki kalam talwar se bhi tez hua karti thi, gardan udane ke liye talwar k dhar ki nahi bulki ek majboot aur sashakt lekhni ki zarurat hoti thi, ab to aisa lagta ki jaise ki na wo panne rahe na wo rosnai rahi.

हर्षिता said...

अच्छा व्यंग है,धन्यवाद।

HTF said...

मिडीया देशविरोधी सेकुलर गिरोह का पहला सतम्भ बन चुका है ।