Friday, March 19, 2010

खबरदार करते न्यूज चैनलों में खबर कहां है?

संसद के अंदर-बाहर महिला आरक्षण बिल को लेकर हंगामा था। तमाम न्यूज चैनलों में बहस चल रही थी कि आरक्षण बिल पास होगा या नहीं। रिपोर्टरों से लेकर विशेषज्ञ इस मुद्दे पर जूझ रहे थे। अचानक हिन्दी के तीन टॉपमोस्ट राष्ट्रीय न्यूज चैनलो के पर्दैं पर ब्रेकिंग न्यूज आयी-आनंदी को गोली लगी। आनंदी की हालत नाजुक। जगीरा को बचाने में लगी आनंदी को गोली। जा सकती है आनंदी की जान। लगातार आधे घंटे तक ब्रेकिंग न्यूज की ये पट्टियां चलती रहीं। आधे घंटे बाद इन्हीं तीन न्यूज चैनलों में से देश के अव्वल राष्ट्रीय न्यूज चैनल में ब्रेकिंग न्यूज के साथ ही पट्टी लिखी आने लगीं-टीआरपी के लिये बालिका वधू का खेल। इंटरटेनमेंट चैनलों में टीआरपी की जंग। आनंदी को गोली टीआरपी के लिये मारी गयी।

एक झटके में लगा कि महिला आरक्षण को लेकर खबरों की जो संवेदनशीलता हिन्दी न्यूज चैनलों में दिखायी जा रही थी, उसने अपनी टीआरपी के खेल में खबरों की जगह टीआरपी वाले इंटरटेनमेंट चैनलों के सीरियलो की टीआरपी को भी खुद से जोड़ने की नायाब पहल शुरु कर दी है। कुछ इसी तर्ज पर खबरों को कवर करने से लेकर दिखाने का खेल भी न्यूज चैनल खुल्लम खुल्ला अपनाने लगे हैं। कॉमनवेल्थ गेम्स की कवरेज को लेकर दिल्ली में ओलंपिक एसोसिएशन ने न्यूज चैनलों को आमंत्रित किया। कमोवेश हर न्यूज चैनल के संपादक स्तर के पत्रकार कैमरा टीम के साथ इस बैठक में नजर आये। सभी के पास कॉमनवेल्थ गेम्स के कवरेज को लेकर प्लानिंग थी। और सभी सीधे सुरेश कलमाडी से संवाद बनाने में लगे थे।

वहीं माओवादियों के खिलाफ ग्रीन हंट शुरु होने के बाद पहली बार दिल्ली में सरकार के खिलाफ मोर्चाबंदी करते हुये कई लोग एकसाथ मंच पर आये। इसमें जानी मानी लेखिका और एक्टिविस्ट अरुंधति राय, पूर्व आईएएस और नक्सलियों के बीच काम कर रहे बी डी शर्मा से लेकर मेनस्ट्रीम पत्रिका के संपादक सुमित चक्रवर्ती समेत कई क्षेत्रों से जुड़े आधे दर्जन से ज्यादा लोगों ने दिल्ली के फॉरेन प्रेस क्लब में प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में बीबीसी,रायटर्स और सीएनएन जैसे अंतरराष्ट्रीय चैनल और एजेंसियों के पत्रकार मौजूद थे। लेकिन हिन्दी के टॉपमोस्ट पांच न्यूज चैनलों में से कोई पत्रकार वार्ता को कवर करने नहीं पहुंचा। जब देश के तीन सौ से ज्यादा जिलों को रेड कॉरिडोर में मान आंतरिक सुरक्षा का सवाल सरकार खड़ा कर रही है और आतंकवाद की तरह माओवाद को भी मान रही है तो भी किसी न्यूज चैनल के संपादक ने इस प्रेस कॉन्फ्रेंस को दिखाना जरुरी नहीं समझा । जबकि अगले दिन नॉर्थ ब्लॉक से निकलते गृह मंत्री पीं चिदंबरम की एक टिप्पणी, जिसे टेलीविजन की भाषा में बाइट कहा जाता है, को लेने के लिये करीब बीस न्यूज चैनलों के माईक-कैमरे सजे पड़े थे, जिसमें माओवादियों को लेकर बिहार-झारखंड की सरकार के ग्रीन-हंट ऑपरेशन को हरी झंडी देने की बात कही जा रही थी।

यह टीआरपी की अगली कडी है। जिसमें खबरों को कवर करना या ना करना भी सीधे धंधे से मुनाफा बनाना है। सुरेश कलमाडी आज की तारीख में किसी भी न्यूज चैनल के संपादक के लिये सबसे बड़े व्यक्ति हैं। क्योंकि कॉमनवेल्थ के प्रचार प्रसार में मीडिया के हिस्से में करीब पाच सौ करोड़ का विज्ञापन है। और इस पूंजी को पाने के लिये कोई भी न्यूज चैनल अब यह खबर नहीं दिखा सकता है कि कॉमनवेल्थ की तैयारी कमजोर है। य़ा फिर दिल्ली में यमुना की जमीन से लेकर कॉमनवेल्थ के लिये दिल्ली में हजारों हजार पेड़ काटे जा चुके हैं और सिलसिला लगातार जारी भी है। यमुना की जमीन पर जिस तरह कॉमनवेल्थ के लिये कंक्रीट का जंगल खडा किया गया है, उससे सौ साल में सबसे ज्यादा पर्यावरण गर्म होने की स्थिति दिल्ली की है। लेकिन अब मीडिया की नजर कॉमनवेल्थ के धंधे से मुनाफा बनाने की है तो पर्यावरण तो दूर की बात है, खिलाड़ियों की बदहाली से जुडी खबरें भी गायब हो चुकी हैं। यानी कॉमनवेल्थ में सोने के तमगे का जुगाड़ होगा कैसे और खिलाड़ी जिन्हें कॉमनवेल्थ में देश का नाम रोशन करना है, वह खुद कितने अंधेरे में हैं, इस पर भी कोई खबर दिखाना नहीं चाहता क्योंकि उसे डर है कि कहीं कॉमनवेल्थ के प्रचार-प्रसार का विज्ञापन उसकी झोली से ना खिसक जाये। साथ ही वह तमाम कॉरपोरेट कंपनियां, जिनका जुडाव कॉमनवेल्थ गेम्स से है उनको लेकर भी कमाल का प्रेम मीडिया ने दिखाना शुरु कर दिया है। क्योंकि निजी विज्ञापन भी करीब हजार करोड से ज्यादा का है, जिसका इंतजार मीडिया कर रहा है। मीडिया की पूरी नजर इस वक्त करोड़ों रुपए के इन विज्ञापनों पर ऐसी टिकी है कि उसे इसके अलावा कुछ दिखायी नहीं दे रहा।

ऐसे में सरकार और माओवाद के टकराव में देश के दो करोड़ से ज्यादा आदिवासी-ग्रामीणों का हाल कितना बदहाल है, इस पर देश के बुद्दिजिवियों को कोई न्यूज चैनल क्यों कवर करेगा। वहीं सरकार से करीबी धंधा करते न्यूज चैनलों को खबरनवीस भी माने रखगी तो फिर माओवाद हो या देश की कोई भी समस्या सिर्फ सरकार की परिभाषा के अलावे कुछ भी दिखाने का कोई मतलब है ही क्या। असल में खबर की जगह पूंजी का मुनाफा किस रुप में अपनाया जा चुका है, इसका एहसास हॉकी से लेकर आईपीएल के जरीये भी जाना जा सकता है। हॉकी को लेकर न्यूज चैनलों की बेरुखी तबतक रही जबतक प्रयोजक के तौर पर हीरो-होंडा और सेल सामने नहीं आये। जैसे ही विज्ञापनो का पैसा मीडिया में पंप हुआ और ओलंपिक एसोसिएशन ने पहल की तो तुरत-फुरत में राष्ट्रीय खेल को लेकर राष्ट्रीय भावना जाग गयी और औसतन प्रति दिन तीस से पच्चतर मिनट तक के कार्यक्रम हॉकी को लेकर दिखाये जाने लगे। जबकि उससे पहले डेढ़ मिनट से लेकर सात मिनट तक के प्रोग्राम ही न्यूज चैनलो पर चलते रहे थे। और उसमें भी आधे से ज्यादा हॉकी पर मंडराते आतंकवाद को लेकर रहते थे। आईपीएल को लेकर भी मीडिया की खुमारी तब टूटी जब उसके विज्ञापनो की बौछार हुई और विजुअल को दिखाने की इजाजत मिली।

जाहिर है खबरो को दिखाने के लिये सरकार से लाइसेंस ले कर खड़े हुये न्यूज चैनलो की समूची कतार ही जब खबरों को परिभाषित करने से पहले अपना मुनाफा और मुनाफे पर टिके धंधे को ही देख रही हो तब न्यूज को परिभाषित करने का तरीका भी बदलेगा और देश के हालात पर भी वही नजरिया सर्वमान्य करने की कोशिश होगी जो सरकार की नीति में फिट बैठे। ऐसे में अगर किसी न्यूज चैनल में किसी दुर्घटना या आतंकवादी हमला या फिर ब्लास्ट से इतर कोई भी खबर दिखायी दे जाये तो एक बार उसकी तह में जाकर जरुर देखना चाहिये क्योंकि बिना मुनाफे के कोई खबर खबर बन ही नहीं सकती। क्योकि अब सवाल है कि महिला आरक्षण बिल हो या आनंदी को गोली लगना या फिर महंगाई से त्रस्त देश के सत्तर करोड़ से ज्यादा लोगो का दर्द या कॉमनवेल्थ गेम्स को लेकर दिल्ली को रंगीन बनाने का खेल। न्यूज चैनलों के आईने में सभी ब्रेकिंग न्यूज हैं और सभी एक सरीखी खबर हैं। तो कौन माई का लाल कहेगा कि न्यूज चैनल खबर नहीं नाच-गाना दिखाते हैं ।

16 comments:

Rangnath Singh said...

दुखती रग पर हाथ धरा है आपने।

nilesh mathur said...

बाजपेई जी, नमस्कार,
न्यूज़ चैनल से जुड़े रहकर भी ऐसे बेबाक लेखन के लिए धन्यवाद् !

अरूण साथी said...

नंग सच

मिहिरभोज said...

संवेदन शीलता औऱ न्यूज चैनल मैं....काहे मजाक कर रहें हैं भाई दिन दहाङे......

AlbelaKhatri.com said...

यही तो हर दर्शक सोच रहा है कि

खबर कहाँ है ?

बी एस पाबला said...

सच्चाई यही है कि
बिना मुनाफे के कोई खबर, खबर बन ही नहीं सकती।

बी एस पाबला

Alok Nandan said...

न्यूज चैनेल्स अपने आप को लाख न्यूज चैनेल्स बोले आम जनता अब उन्हें न्यूज चैनेल्स नहीं मानती है, उनकी विश्वसनीयता समाप्त होती जा रही है, और इसके लिए वे खुद जिम्मेदार हैं। न्यूज वालों को लोग मदारी और जोकर की केटेगरी में रखने लगे हैं, और खुलकर बोल भी रहे हैं। आम व्यूअर भी समझने लगा है कि न्यूज चैनेल्स बाइस्कोप से ज्यादा कुछ नहीं है। यदि न्यूज चैनेल्स को केंद्र में रखकर आम व्यूअर को लेकर एक साइंटिफिक रिसर्च किया जाये तो तथ्य के साथ यह स्पष्ट हो जाएगा कि न्यूज चैनेल्सों की औकात मदारी के बंदर या भालू से ज्याद नहीं है। लोगों ने इनको गंभीरता से लेना ही छोड़ दिया है...और मजे की बात यह है कि न्यूज चैनल्स के संचालक भाई लोग अभी तक यह नहीं समझ पा रहे हैं उनकी जमीन कहां खिसक रही है...वाजपेयी जी आपने आलेखों में विश्लेषण तो जानदार तरीके से होता है, लेकिन निदान नहीं होता है....पता नहीं आप पत्रकारिता के पारंपरिक घेरे को पार करने से क्यों कतराते हुये नजर आते हैं...मार्क्स ने एक बात कही थी....सवाल दुनिया की व्य़ाख्या का नहीं है, बल्कि उसको बदलने का है। इस आलेख में जो सच्चाई आप बयान कर रहे हैं, उसे घर बैठा एक लेजी व्यूअर भी सिद्दत से महसूस कर रहा है..और न्यूज चैनलों पर नजर रखने वाले तथाकथित हतास और निराश आलोचक भाई लोग इसके बारे में जोर लगा के लिख -बोल भी रहे हैं...लेकिन बात वहीं पर आकर अटक रही है....कि इसका निदान क्या है...यदि समय रहते सही निदान नहीं दिया गया तो न्यूज चैनल्सों की विश्वसनीयता का पूरी तरह से धराशायी होना यकीनी है...

राहुल प्रताप सिंह राठौड़ said...

मैं तो इन्हें "न्यूज चैनल" मानता ही नहीं हूँ |
और क्यूँ मानूं?

सबसे बढ़िया तो हमारा "बीबीसी हिंदी रेडियो" है|
या डीडी न्यूज |

राकेश पाठक said...

सिक्के गिन गिन के हाथ मेरा खुरदुरा हुआ
जाती रही लम्स की नर्मी, बड़ा बुरा हुआ

AAINA said...

TRP jin jin khabro se badhti hai un sabhi chizo ko focus kiaa jata hai.Mamla Uttar Bhartio ka bhi bahut uchala jata hai lekin dekhne wali baat hai ki in tamam khabro me hinsa ka warchsw har jagah hai aur bahut aasani se Media khalnayak bhi tay kar deti hai. Chahe raj thakre ho, shivsainik ho ya phir Ulfa ho par kya kisi ne bhi sangyan me liya hai ki ASAM NYAPALIKA ne apne hindi bhashi abhyarthiyo(FOR CIVIL JUDGE CANDIDATES) ke sath kya kiaa. Muskil hai,ye aisi isthi hai ki Dard ko bahar rakha jaayega to bhi ye abhyarti khud ko hi lahooluhan kar lege. Kaha hai media? Pure 1 sal jaha samjhne me lag gaye ki asamia bhasha kya hai aur jawab me waha ki Nyaypalika ne kya kiaa.Loktantr ka jab ye hissa bhasa ke nam par aisa khel khel raha hai to kya bisad shivsainiko ki aur MNS ki?Yaha kisi ka khun nahi baha lekin un 14 logo ke sath jo kia gaya wo kisi jaghny apradh se kam nahi par media me ye khabar banane ke layak nahi thi.

jai said...

aapne bahut hi aacha likha hai lakin kya aap jaise bade patrakar aisa chanel nahi khol sakte jo aapki soch ko aage rakhe aur desh hit bhi kare.

सुशीला पुरी said...

समाचार देखें तो क्या देखें ?

हर्षवर्धन said...

prasun ji
media ke sabse takatwar madyam ka ye haal isiliye ho raha hai. tv ki jo takat thi usko swanamdhany sampadakon ne trp ke khel men phansakar aisa patka hai ki ye madhyam hi bap-bap chillane laga hai. ab iski cheekh se tv men 4-6 saal kam karne ke bad log bhale vimukh hon. ek puri zamat isi anandi wali tv patrakarita ke liye lakhon ki fees dekar katar men khadi hai.

राकेश पाठक said...

पुण्य जी,
कानू बाबू पर कुछ लिखिए। आखिर एक ऐसा शख्स जिसने अपना पूरा जीवन वंचितों के लिए संघर्ष और उनकी लड़ाई में लगा दिया वो इस तरह का हारा हुआ कदम कैसे उठा सकता है। खबर सुनने के बाद से ही मन खिन्न है।

गुस्ताख़ मंजीत said...

पुण्य जी, कोलकाता में आपकी सहक्रमी रह चुकी एक पत्रकार ने आपकी बहुत तारीफ की। हम भी करते हैं लेकिन कहीं इसे अन्यथा न लें लें आप इसी से झिझकते हैं..बहरहाल, समाचार में मैन्युपुलेशन कितना होता है यह तो आपको पता ही होगा। आप तो सर्वश्रेष्ठ और सबसे तेज़ चैनल में भी बड़े ओहदे पर रहे हैं, और आपके मास्टर स्ट्रोक के भी हम कायल रहे हैं..न्यूज़ अभी न्यूड ही है। उसे कपड़े पिन्हा कर परिपक्व बनाने की जिम्मेदारी हमारी ही है। टीआरपी की चूहा दौड़ पर लगाम लगाकर ही न्यूज़ चैनलों में समाचारों की वापसी की राह मुमकिन हो पाएगी। वरना सीधे खबर दिखाने वाले हैं ही कितने। एक एनडीटीवी बचा था उसे भी बाजार ने लील लिया है। मैं बुलेटिन की बात कर रहा हूं। बाकी लोग तो आनंदी के घायल होने और अब उसकी वापसी की खबर दिखाने में जुटे हैं। एक हम हैं, डीडी वाले...अव्वल तो हमारी सीमाओं से वाकिफ ही होंगे आप, लेकिन सच भी यही है कि इस अराजक दौर में खबरों का मुहावरा सिर्फ डीडी के पास बचा है।

aloktbsm said...

Sir, Aaj ke daur me aap jaisi himmat kam hi log dikha pate hain. aapne media ke chamakdar chehre ke peeche chupe sach ko bayan kiya hai