Monday, September 27, 2010

भाजपा का अनूठा सच

नरेन्द्र मोदी भाजपा के स्टार प्रचारक हैं। नरेन्द्र मोदी भाजपा के सबसे कद्दावर नेता हैं। नरेन्द्र मोदी भाजपा शासित राज्यों में सबसे अव्वल मुख्यमंत्री हैं। नरेन्द्र मोदी विकास की लकीर खींचने में माहिर हैं। नरेन्द्र मोदी के हिन्दुत्व प्रयोग के आगे तो संघ परिवार भी नतमस्तक है। नरेन्द्र मोदी के नाम के साथ यह ऐसे अंलकार हैं, जो भाजपा और आरएसएस में बीते नौ सालो से लगातार सुने जाते रहे हैं। लेकिन नरेन्द्र मोदी बिहार में चुनाव प्रचार करने नहीं जा सकते। नरेन्द्र मोदी बिहार गये तो भाजपा-जेडीयू गठबंधन का चुनावी भट्टा बैठ सकता है। नरेन्द्र मोदी अगर बिहार गये तो नीतीश गठबंधन ही तोड़ सकते हैं। यानी एक ही व्यक्ति को लेकर एक ही वक्त दो बातें कैसे कहीं जा सकती हैं। असल में नरेन्द्र मोदी बिहार चुनाव प्रचार के मद्देनजर वजीर से सिर्फ राजनीतिक प्यादा ही नहीं बने हैं बल्कि भाजपा के भीतर राजनीतिक रस्साकसी में उस रस्सी में तब्दील किये जा रहे हैं, जिसमें जीत-हार रस्सी खींचने वालों की होगी और मोदी के हक सिर्फ इस या उस खेमे के हिस्से में जाना ही बचेगा।

अगर भाजपा की इस राजनीति का पोस्ट्मार्टम करें तो पहली नजर में यही लगेगा कि आखिर नरेन्द्र मोदी को लेकर नीतीश कुमार भाजपा पर क्यों दबाव बना रहे हैं। जबकि राजनीतिक मंत्र तो यही कहता है कि नरेन्द्र मोदी पर निर्णय तो भाजपा को करना है। तो क्या जानबुझकर भाजपा के भीतर से एक खेमा नीतिश कुमार को उकसा रहा है कि वह नरेन्द्र मोदी को बिहार जाने से रोकने के लिये कुछ इस तरह अपनी बात रखे जिससे मुस्लिम समुदाय को यही संकेत जाये कि नीतीश ने उस मोदी से टक्कर ली है, जिसके आगे भाजपा भी नतमस्तक है। या फिर नरेन्द्र मोदी पर इतनी कालिख पोत दी जाये कि भाजपा बिना नरेन्द्र मोदी के मॉडरेट लगे। यानी भाजपा की वह चौकडी जो दिल्ली में ही रहकर ना सिर्फ खुद सबसे ताकतवर जतलाना चाहती है, बल्कि दिल्ली से ही पार्टी को अपनी अंगुलियो पर नचाते हुये बागडोर को संभालना चाहती है। और भाजपा अध्यक्ष बनने के दौरान रिंग से ही बाहर किये जाने का खार अब भी आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत से खाये हुये है।

असल में भाजपा की राजनीतिक रस्साकस्सी की नयी कहानी यहीं से शुरु हुई लेकिन पहली बार इस चौकडी के मंसूबे भी अलग अलग राह पकड़े हुये हैं और पार्टी अध्यक्ष नीतिन गडकरी को हाशिये पर ढकेल नरेन्द्र मोदी के कद को भी बौना साबित करने की जुगत में लगे हैं। इसलिये राजनीतिक रस्साकस्सी की इस कहानी में हर उस मुद्दे को देखने का नजरिया भी न देखने वाला हो चला है, जो कभी भाजपा के लिये ऑक्सीजन का काम करती। खासकर तीन मुद्दे किसान-आदिवासी, खेती की जमीन-खनन, अयोध्या-राममंदिर। उन मुद्दो पर आएं, उससे पहले नरेन्द्र मोदी की मुश्किलो को समझ लें।

मोदी सोहराबुद्दीन फर्जी इनकाउंटर से ज्यादा संजय जोशी फर्जी सैक्स सीडी को लेकर फंसे हैं। एनकाउंटर मामले में फंसे गुजरात के अधिकारी अब यह बताने लगे है कि सीडी कैसे फर्जी बनी। उसे कैसे मुंबई अधिवेशन के वक्त बंटवाया गया। और यह जानकारी अब आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत के पास भी तथ्यों के साथ पहुंच चुकी है। और इसी के बाद भागवत ने भाजपा अध्यक्ष गडकरी से कहा कि संजय जोशी को भी भाजपा के सांगठनिक काम में लगायें। गडकरी जब भाजपा कार्यकारिणी बना रहे थे, जब संजय जोशी के नाम को लेकर नरेन्द्र मोदी का वीटो चला था और दिल्ली की चौकडी के एक नेता ने गडकरी को संकेत की भाषा में चेताया भी कि उस रास्ते ना जाएं, जहां टकराव से शुरुआत हो।

लेकिन इस दौर में मोदी के गृहराज्यमंत्री ही जब सीबीआई के फंदे में आये और राज्य के 60 से 70 पुलिस-प्रशानिक अधिकारियो पर मोदी का एंजेडा चलाने पर कार्रवाई के संकेत कानूनी तौर पर मिल रहे हैं तो दिल्ली की चौकडी के नेताओ को यह महसूस भी होने लगा है कि इससे बेहतर मौका फिर नहीं मिलेगा, जब वह अपना कद मोदी से बडा कर लें। या फिर नरेन्द्र मोदी का कद छोटा कर दें। मनमोहन सरकार के साथ पहली बार कई मुद्दों पर जिस तरह भाजपा ने गलबईयां डालीं और बावजूद उसके मोदी को राहत दिलाने की पहल से ज्यादा सरकार चलाने को अहमियत दी, उसने भी भाजपा के भीतर एक नया सवाल खड़ा किया कि पहले दिन जब सीबीआई ने गुजरात के गृहराज्य.मंत्री और मोदी के सबसे करीबी नेता पर हाथ डाला तो प्रधानमंत्री का लंच भी आडवाणी-सुषमा स्वराज -जेटली ने खारिज कर दिया। लेकिन उसके बाद कभी मोदी के राहत का सौदा इन नेताओ ने नहीं किया। जबकि न्यूक्लियर बिल पर मनमोहन सिंह और हाल में कश्मीर मुददे को लेकर चिदबंरम बकायदा भाजपा नेताओ से मिले और एक लिहाज से नतमस्तक मुद्रा में रहे।

भाजपा ने सरकार को संकट से उबारा भी। लेकिन मोदी को संकट में अकेले छोड़ा गया। यानी लगातार यह संकेत गया कि संसद में सरकार के सुर में सुर भाजपा भी मिला रही है। लेकिन दूसरी तरफ आरएसएस के संकेत के बाद गडकरी ने संजय जोशी को बिहार चुनाव के सर्वे में लगाया और पिछले हप्ते जब दिल्ली में भाजपा के मीडिया मैनेजमेंट की क्लास हुई, जिसमें देश भर से मीडिया से रुबरु होने वाले भाजपा कार्यकर्ता दिल्ली पहुंचे तो उन्हें संबोधित करते हुये लालकृष्ण आडवाणी समेत चौकडी की मौजूदगी में नीतिन गडकरी सीधे यह कह गये कि
, " एक बार जब पार्टी में कोई फैसला हो जाये , तो उस पर अलग अलग राय मीडिया के सामने नहीं जानी चाहिये ।"

जाहिर है गडकरी के इस कथन को झारखंड में सरकार बनाने पर मचे घमासान से जोड़कर देखा जा सकता है लेकिन संघ परिवार के यह संकेत अयोध्या में राम मंदिर और टप्पल में किसान संघर्ष को लेकर गडकरी को दिये गये। आरएसएस में इस बात को लेकर बैचेनी है कि टप्पल में जिस वक्त किसान संघर्ष पूरे उभार पर था, उस वक्त किसान संघ दिल्ली के भाजपा हेडक्वार्टर में बैठक कर अपनी क्षमता और रणनीति बनाने के लिये बैठक कर रहा था। इसी तरह जब उडीसा के नियामगिरी के आदिवासियो का मसला आया तो संघ का आदिवासी कल्य़ाण सेवा मंडल अपने कार्यक्रमो की समीक्षा करते हुये राजनीतिक तौर पर भाजपा से मदद की सोच रहा था। और भाजपा जो एक वक्त उडीसा में बीजू सरकार के साथ थी उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसकी रणनीति ऐसे मौके पर किस राह चलनी चाहिये। भूमि अधिग्रहण को लेकर भी भाजपा की नीतियां सरकार की पिछलग्गू वाली ही हैं। हालांकि संघ का मानना है कि भूमि अधिग्रहण को लेकर मुआवजा सुधार के बदले भूमि सुधार जरुरी हैं। यानी इन मुद्दो के आसरे पहली बार संघ जहां यह मान रहा है कि अटल बिहारी वाजपेयी के बाद अब भाजपा में कोई नेता नहीं है जो मुद्दो को अपने तरीके से उठा सके और राजनीति को मुद्दो के सहारे उठा सके।

लेकिन संघ का अंदरुनी सच यह भी है कि वह भी भाजपा से कोई चुनौती किसी मुद्दे पर नहीं चाहता है। इसलिये भाजपा नेतृत्व जितना कमजोर रहे उतना ही उसके अनुकूल है। क्योंकि मुद्दो के सहारे संघ के संगठनों को एक गांठ में पिरोना भी उसकी पहली प्राथमिकता है। इसका असर अयोध्या मसले पर अदालत के फैसले को लेकर भाजपा की संसदीय राजनीति में अगुवाई करने वाले नेताओ का पहल और आरएसएस की पहल से भी समझा जा सकता है। भाजपा का कोई वैसा नेता अयोध्या को लेकर मुखर नहीं है, जिसका कद संसद या दिल्ली की राजनीति में हैसियत ऱखता हो। आरएसएस भी नब्बे के दशक से इतर अपनी रणनीति बदलते हुये कानून और संविधान के दायरे में मंदिर के लिये सहमति का सवाल खडा कर अपनी लक्ष्मण रेखा खुद खींच रही है। यानी पहली बार अयोद्या को लेकर कोई चेहरा अभी तक पूरे संघ परिवार के भीतर से नहीं उभरा है, जो सामाजिक तौर पर या राजनीतिर तौर पर असर डाल सके।

इसमें एक नाम नरेन्द्र मोदी का लिया जा सकता है। लेकिन उन्हें विहिप पसंद नहीं करता और आरएसएस घबराता है तो दिल्ली की राजनीति में कद बढ़ा कर बैठे नेता अपने लिये खतरा मानते है। इसलिये मोदी को गुजरात में ही बंद किया गया है। और संघ इस परिस्थिति को अपने अनुकूल मान रहा है कि इस बार अयोध्या को लेकर सबकुछ सिर्फ विहिप पर भी नहीं टिका है और कोई राजनीतिक आंदोलन भी इसकी दिशा तय नहीं कर रहा है। लेकिन अंदरुनी तौर पर संघ को इसका भी एहसास है कि अयोध्या में राम मंदिर के हक में स्थिति ना बनी तो जो परिस्थितियां बनेंगी उस पर लगाम लगाने की हैसियत उसकी भी नही है। यानी नब्बे के दशक में राम मंदिर को लेकर जो राह संघ परिवार या भाजपा राजनीतिक तौर पर खींच रहे थे, अब वह उभरने वाली परिस्थितियों का इंतजार कर रहे हैं। इसलिये दिल्ली के संघ मुख्यालय में प्रांत प्रचारको के साथ मंथन में गडकरी तो शामिल होते है लेकिन आडवाणी, सुषमा, जेटली शामिल नहीं होते। हालांकि आरएसएस की तान को अपनी ताकत मानने वाले मुरली मनोहर जोशी और संघ मुख्यालय को दडंवत कर ठाकुरवाद को बल देने वाले राजनाथ सिंह जरुर अयोध्या के चिंतन में शामिल होते हैं लेकिन इनकी मौजूदगी महज मौजूदगी वाली ही रहती है। यानी भाजपा के इस राजनीतिक घटाटोप में पार्टी में कोई ऐसा नेता नहीं है जिसकी नजर बिहार या उत्तर प्रदेश चुनाव या फिर बीच में पड़ने वाले बंगाल चुनाव को लेकर तीक्ष्ण हो। या फिर यह सोच रहा हो कि कर्नाटक, मध्य प्रदेश या छत्तीसगढ में अगर भष्ट्राचार से लेकर आदिवासी-किसान और नक्सली संकट आने वाले दौर में मद्दा बना तो भाजपा की सत्ता वहा बचेगी कैसे और भविष्य में क्या झारखंड जैसे प्रयोग के जरीये पार्टी फंड बढाने की बात होगी। और उसमें भी नेताओ का कद सत्ता की जोड़तोड़ तले ही मापा जायेगा कि कौन सत्ता दिला पाने में सक्षम है। यानी एक वक्त के प्रमोद महाजन की सोच ही पार्टी का रुप ले लेगी, यह किसने सोचा होगा । और यह सोच दिल्ली की चौकड़ी को इस एहसास में डूबा दें 2014 के आम चुनाव के वक्त उसका निजी कद इतना बढ़ जायेगा कि वह पीएम पद का उम्मीदवार हो जाये...

बस इंतजार संघ परिवार की हरी झंडी है, तो समझा जा सकता है कि देश की सबसे पुरानी पार्टी और संसदीय राजनीति के अटूट गांधी परिवार से यह टक्कर कैसे लेंगे और "पार्टी विथ डिफरेन्स " का सपना किसे दिखायेंगे।

7 comments:

DEEPAK BABA said...

जब तक मुस्लिम तुस्टीकरण की नीति ये तथा कथित धर्मनिरपेक्ष दल चलते रहेंगे - तो ऐसी बातें आप उठती आयी हैं और उठती रहेंगी.


एक इंदिरा जी के मरने पर दिल्ली में इतना कत्लोगारत हो गया था - पर गोधरा में तो दसियों हिंदुओं को जलाया गया था.

इतने दंगो-फसाद के बाद कांग्रेस फिर भी धर्मनिरपेक्ष है और सभी दलों को स्वीकार्य है. पर भाजपा आज तक गोधरा को ढो रही है.


इन सब के लिए कोई नहीं - बस ये तथाकथित २०-२५ धर्मनिरपेक्ष दल जिम्मेवार हैं - जो कि अपने मोहल्ला टाइप राजनीति के चक्कर में उपर कि राजनीति को दबाने कि कोशिश करते हैं.

एक मित्र का कथन ध्यान आ रहा है - अरे भाई हमको का मतलब है केन्द्र में अटल बिहार वाजपई से - हमारा गुजारा तो उडीसा में राज्य सरकार से है -अत: नवीन पटनायक जिंदाबाद.

उसका कथन सही लगता है. इंतनी विवधता से भरे देश में ये २०-२५ दल आज हर राष्ट्रीय पार्टी कि मजबूरी है. और ये राष्ट्रीय पार्टियां इनके इशारे पर नाचने के लिए मजबूर हैं.

राम राम.

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

अच्छा लिखा आपने . भाजपा का नंगा सच भी आपको लिखना चाहिये . भाजपा छोटे दिल के बडे नेताओ की पार्टी है . कोई अपने से ज्यादा महान ना हो जाये यह परम्परा अटल युग से ही चालू है .

शिवम् मिश्रा said...


बेहतरीन पोस्ट लेखन के बधाई !

आशा है कि अपने सार्थक लेखन से,आप इसी तरह, ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है-पधारें

shrawan mavai said...

bjp ki yahi ranniti hai aapne us saach ko desh ke laya aapko danyebaad

S B Tamare said...

dear sir
you written very well but keep ignoring on the other side is not good as you are seeming not to up date your english blog.
i think you should pay a little bit attention towards it also.
thanks.

राकेश पाठक said...

प्रसून जी
कल दिन भर आपको देखता रहा। आप आने वाले फैसले और छन-छन कर आती खबरों के बीच कुछ ढूंढ़ते से दिखे। और अंत में वो मिला भी...आपकी आंखों में चमक सी आ गई...मैने देखा आप बार-बार कुरेद रहे थे पूर्व जस्टिसों से लेकर राजीव तक को लखनऊ में...मंदिर का उल्लेख फैसले में किया नहीं गया फिर मंदिर निर्माण की बात कहां से आ गई...भाजपा नेता रविशंकर प्रसाद या फिर आडवाणी ने कहा था कि मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो गया है...आपने दाढ़ी के पीछे से मुस्कुराते हुए से इस मुद्दे को बार बार उठाया...खैर...इस फैसले को लेकर राजनीति की संभावनाएं कितनी और किस रूप में हो सकती थीं वो समझ रहे थे शायद आप। खबर सर संघचालक भागवत के जानिब से आनेवाली थी...या फिर मोदी या आडवाणी के जानिब से...लेकिन आई नहीं।
लेकिन जो आनेवाला था वो मुलायन ने दे दिया...'धर्मनिरपेक्ष मुलायम' ने कहा कि फैसला कानून के तहत नहीं विश्वास के तहत लिया गया है। मुसलमानों को ठगा गया है क्या मैं उम्मीद करूं की मुलायम की इस घटिया राजनीति का खुलासा करते आप नज़र आएंगे चलिए चैनल पर नहीं तो ब्लॉग पर ही सही...या फिर मीडिया भी तुष्टिकरण का शिकार हो जाएगा कहीं...

Kranti said...

Vajpayee ji .I think you want to take some personal advantage from narendra modi that is why you are allegating him for sanjay joshi scandal.If you have appropriate proof for this, then please come up with those otherwise the truth has seen by everybody