Thursday, September 2, 2010

पीपली लाइव से लुटियन लाइव

12 अगस्त को विदर्भ के तीन किसानों ने खुदकुशी की। 54 साल के नाना ठाकरे यवतमाल जिले के मांडवा गांव में रहते थे। 27 साल का विजय अढे वाशिम जिले के जुनुना गांव का रहने वाला था। 50 साल का मनगा माने बुलढाणा का रहने वाला था। यूं विदर्भ के लिये खुदकुशी करने वाले यह तीन नाम कोई मायने नहीं रखते क्योंकि औसतन हर महीने विदर्भ में 65 किसान खुदकुशी करते ही हैं। लेकिन 12 अगस्त का जिक्र इसलिये जरुरी है क्योंकि इसी दिन मुंबई में आमिर खान फिल्म ‘पीपली लाइव’ का प्रीमियर कर रहे थे, जिसे देखकर अमिताभ बच्चन को अपना गांव याद आ गया और बॉलीवुड के कई कलाकारों को किसानो की दुर्दशा देखकर कुछ करने की इच्छा जागृत हुई।

लेकिन पीपली लाइव के किसान नत्था को किसी नायक की तरह निरीह और अकेलेपन के दर्द में ढाल बनाकर बचा लिया गया। मगर संयोग से विदर्भ के किसानों को बचाने के लिये सरकार की अभी तक कोई योजना काम नहीं आयी है। यह अलग बात है कि साढ़े तीन साल पहले प्रधानमंत्री के राहत पैकेज के बाद खुदकुशी करते किसानों की संख्या प्रति महीने 57 से 64 जा पहुंची। तो किसानों को लेकर सरकार भी पीपली लाइव है या पीपली लाइव को भी सरकार की दृष्टि लगी हुई है....कहा कुछ भी जा सकता है, लेकिन असल में इस सच को जानने के बाद ही पीपली लाइव समझ में आ सकती है। न्यूज चैनलों की दिवालिया मानसिकता में गोता लगाती फिल्म ने चैनलों के उन्हीं मीडिया चरित्रों को पकड़ा है, जिनकी अपनी एक इमेज है। और मीडिया के इन पुरुष और महिला चरित्रों की हैसियत कितनी है, इसका अंदाज इससे भी लगाया जा सकता है कि पुरुष फिल्मी चरित्र अगर हकीकत में अपने असली चरित्र में आ जाये तो लालकृष्ण आडवाणी सबसे पहले इंटरव्यू के लिये किसी टीवी मीडिया पर्सन को चुनेंगे तो वह यही शख्स होगा। वहीं मीडिया चरित्र को जीने वाली महिला भी फिल्मी मीडिया पर्सन की भूमिका छोड़ हकीकत में आ जाये तो यकीन जानिए इस वक्त देश की सर्वेसर्वा....दुनिया की सबसे ताकतवर महिलाओं में से एक सोनिया गांधी भी सबसे पहले इसी टीवी महिला मीडिया पर्सन को इंटरव्यू देना पसंद करेंगी। तो क्या देश की राजनीति के प्रतीक बने नेताओं को लेकर भी अगर कोई लुटियन लाइव बना दी जाये तो न्यूज चैनलों की टीआरपी की तर्ज पर सत्ता बनाने और बचाये रखने के लिये गठबंधन फार्मूला दिखाया जायेगा। जिसमें कभी सीबीआई तो कभी हिन्दुत्व का लेप तो कभी आर्थिक सुधार में घायल होती विचारधारा उभरेगी। और राजनीति के शिखर पर एक खास पहचान बनाकर पहुंचे नेताओं को भी फिल्मी चरित्रों में ढलते ही योजनाओं के ऐलान और उसे लागू कराने की जद्दोजहद में सत्ता की मलाई चखते हुये ही दिखाया जायेगा।

हो कुछ भी सकता है और आश्चर्य किसी को नहीं होगा, बल्कि इसके उलट लोग ठहाका लगाते हुये फिल्म देखेंगे। हो सकता है लुटियन लाइव का प्रीमियर संसद के सेन्ट्रल हॉल में हो और सांसद उसी तरह ठहाका लगाएं जैसे एक राष्ट्रीय न्यूज चैनल में जब पीपली लाइव दिखायी गयी तो टिप्पणी और फुसफुसाहट यही उभरी की फिल्म ने नब्ज पकड़ी तो है लेकिन धड़कन छूट गयी। हो सकता है लुटियन लाइव में यह फुसफुसाहट नेताओं से निकले। लेकिन सच इतना खतरनाक हो जायेगा कि उस पर फिल्मी पटकथा कमजोर लगेगी और सच को पर्दे पर उकेरने वाले गंभीर कलाकार सिनेमायी पर्दे पर कमजोर लगेंगे और राजनीति के शिखर पर बैठे नेता फिल्मी पर्दे सरीखे हो जायेंगे, यह भी किसने सोचा होगा।

पीपली लाइव की सबसे कमजोर कड़ी बॉलीवुड का सबसे दमदार कलाकार नसीरुद्दीन शाह है। जो फिल्म में देश का कृषि मंत्री बना है। चूंकि इस दौर में सिल्वर स्क्रीन से इतर हकीकत में देश के कृषि मंत्री शरद पवार की भूमिका नसीर के हर डायलॉग से भारी है...इसलिये नसीर का घाघ नेता बनना भी कमजोर लगता है और सिनेमायी पर्दें पर यह संवाद कायम नहीं कर पाता की नसीर ने शानदार एक्टिंग की। पीपली लाइव के कृषि मंत्री की समूची सौदेबाजी मोनसेंटो बीज के संकेत पर बना सोनसेंटो बीज और खाद के कमीशन में ही खो जाती है। लेकिन देश का सच यह है कि कृषि मंत्री शरद पवार पर संसद में आरोप लगते हैं कि शुगर लॉबी को लाभ पहुंचाने के लिये उन्होंने चीनी की कीमत का कंट्रोल भी लॉबी के हाथ में ही दे दिया। चावल की कालाबाजारी और जमाखोरों को राहत देने के लिये कीमतों में बढ़ोत्तरी के संकेत पहले दे दिये। महंगाई की जिम्मेदारी से खुद को हमेशा मुक्त रखा और खुदकुशी करते किसानों की जिम्मेदारी राज्यों पर मढ़ कर अपनी राजनीतिक पूंजी बनायी रखी जो उन्हीं लॉबियों से आती है, जिनके लिये पवार कृषि मंत्री हैं।

संसद के भीतर लगे ऐसे आरोपों के सामने नसीर की एक्टिंग क्या मायने रख पायेगी और नसीर सरीखा संजीदा कलाकार कितना बौना है इस राजनीति के इस सच के सामने...और यह सच कितना खतरनाक है जो नौकरशाही के नियम कायदों में देश के लोकतंत्र को संविधान से बांधता चला जाता है। अगर सिल्वर स्क्रीन की पटकथा को देखें तो किसानों की मौत में भी नौकरशाही अदालत के निर्देशों का इंतजार करती है या फिर कानून मंत्रालय से नियमों की जानकारी मांग कर खामोश रहती है। वहीं हकीकत में किसान-आदिवासियों के जंगल-जमीन का मामला जब आता है, गृहमंत्रालय के सबसे बड़े नौकरशाह को संविधान की वह धारायें याद नहीं आतीं, जिसमें आदिवासियों के हक के सवाल पर विकास की सारी लकीर असंवैधानिक करार दी गयी हैं। उल्टे नौकरशाही संविधान को अंगूठा दिखाकर लोकतंत्र का अनूठा पाठ यह कह कर पढ़ाती है कि विकास के विरोध का मतलब आतंकवादी होना है और इसके लिये बकायदा कानून अपना काम करेगा। रायपुर, कांकेर, बिलासपुर, बस्तर, नागपुर, चन्द्रपुर, सरीखे दो दर्जन से ज्यादा शहरों में इसी कानून का खौफ दिखाकर साढ़े तीन सौ से ज्यादा लोग जेलों में बंद हैं। अगर शहर छोड़ गांव की तरफ कदम बढ़ाएं तो विरोध के लिये कदम बढ़ाते कमोवेश पांच राज्यों के तीन सौ से ज्यादा गांव के साढ़े सात सौ लोगों के खिलाफ अलग अलग धारायें लगी हुई हैं। जबकि इनके खिलाफ किसी ने कोई शिकायत नहीं की बल्कि पुलिस को लगा और उसने अपनी सफलता का तमगा बड़े अधिकारियों से यह कह कर पा लिया कि अब बड़े अफसरों की सरकारी रिपोर्ट भी माओवादियों पर नकेल कसने के नाम पर ग्रामीण-मासूमों के नामों को लिखकर मजबूत की जा सकती है । यानी लगेगा कुछ काम पुलिस प्रशासन कर रहा है। इसलिये सिल्वर स्क्रीन का सिपाही भी पीपली लाइव में कमजोर लगता है क्योंकि वह नत्था की सुरक्षा में लग उसके सुबह खेत में निवृत होने पर नजर रखने से लेकर नत्था का अपहरण गांव के जमींदार के लिये करता है या फिर सो कर ड्यूटी बजाता है।

जबकि सिल्वर स्क्रीन से परे उड़ीसा के पास्को में बकायदा सरकार की जांच समिति वेदांता पर फॉरेस्ट कंसरवेशन एक्ट, फॉरेस्ट राइट एक्ट, इन्वायरमेंट प्रोटेक्शन एक्ट और पंचायत कानून के उल्लंघन का आरोप लगाती है और उड़ीसा सरकार या वेदांता के किसी अदने से अधिकारी को पुलिस-प्रशासन छू नही पाता। जबकि इन चारों कानून के उल्लंघन करने पर सिर्फ उड़ीसा में ढाई हजार से ज्यादा ग्रामीण आदिवासी जेल में बंद हैं। और महाराष्ट्र-छत्तीसगढ़ में तो सबसे ज्यादा नौ हजार ग्रामीण आदिवासियों पर पर्यावरण और वन कानून तोड़ने की अलग अलग धारायें लगी हुई हैं। जिसमें बस्तर से लेकर चन्द्रपुर तक के सैकड़ों आदिवासियों का तो चालान काट कर आज भी 50 से सौ रुपये फॉरेस्ट वाले इस बिनाह पर वसूलते हैं कि उन्होंने संरक्षित इलाके में पेड़ काटा या टहनी तोड़ी।

हो सकता है कि लुटियन लाइव में यह सारे चरित्र खुलकर अपनी अदा दिखायें। लेकिन नत्था की लाइव खुदकुशी अगर न्यूज चैनलों को टीआरपी दे सकती है तो फिर नत्था को बचाने के चक्कर में ग्रामीण पत्रकार की मौत भी इसी मीडिया को क्रेडेबल यानी विश्वसनीय बनाती है, इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता। खबरों को लेकर मीडिया की विश्वसनीयता इस मायने में ज्यादा है कि वह नेताओं से ज्यादा तीक्ष्ण दृष्ठी रखती है और पिछड़े इलाकों की हर खबर को भी आपके ड्राइंग-बेड रुम तक पहुंचा देते हैं। लेकिन इसमें भी उसी मीडिया पर्सन का नाम हो जाता है जो पीपली लाइव में लाइव करते हैं और हकीकत में कद्दावर नेताओ को लाइव बैठाते हैं। लुटियन की दिल्ली में रहते हुये न्यूज चैनलों के नामी मीडिया पर्सन अगर वाकई छोटे शहरों की खबरों को अपने औरा तले खपा कर स्ट्रिंगरों या रिपोर्टरों के पेट भरने का इंतजाम नौकरी या रिपोर्ट चलवाकर दिला देते है तो फिर यह पीपली लाइव से ज्यादा लुटियन लाइव के करीब हैं। क्योंकि मनमोहन सिंह की इक्नामिक्स में योजनाओं के तहत पंचायत तक पहुंचने वाला पैसा रुपये में दस पैसे से ज्यादा होता नहीं है और बीच में गायब हुये नब्बे पैसे के जरीये ही राजनीतिक दल अपने कार्यकर्ता या कैडर को पालते-पोसते हैं। यानी लुटियन की दिल्ली में टिके रहने के लिये मीडिया और राजनीति के गुर अगर अपने अपने घेरे में एक सरीखे हैं तो फिर मनमोहनमिक्स को ही विकास का आखिरी इक्नामिक्स क्यों ना मान लिया जाये। जहां किसानों की खुदकुशी के दर्द में मलहम शहरों में चकाचौंघ के लिये क्रंक्रीट के जंगलों को बनाने में गांव से भाग आये नत्था सरीखे मजदूर होते हैं। और नत्था को खोजने का काम मीडिया करता है। उसे शहर लाकर मजदूर बनाने का काम विकास की राजनीति। और विकास दर का आंकड़ा बताता है कि दो-तीन दशक पहले से किसान आज ज्यादा पाता है और देश के मजदूर की न्यूनतम मजदूरी में सौ फिसदी तक की बढोतरी हुई है। उन सब लोगों में खरीदने की क्षमता बढी है, जिससे देश में अनाज का संकट आ गया है। इसलिये गांव में खुदकुशी करने के वादे से मुड़ कर भाग कर शहर आया नत्था मजदूर बन कर गांव से बेहतर जिन्दगी जीता है। क्या यह मंत्र भारत जैसे बृहद देश में विकास के तौर पर नहीं देखा जा सकता। क्योंकि खुदकुशी रोकने के लिये और मीडिया से लेकर पुलिस प्रशासन और पंचायत से लेकर संसद के राजनेताओं की सौदेबाजी का तोड़ भी यही है। हो सकता है लुटियन लाइव में यह और ज्यादा खुलकर उभरे। लेकिन लुटियन लाइव का अंत वाकई सच को पर्दे पर उभारेगा। क्योंकि वह पीपली लाइव के नत्था की जगह पीएम होंगे। जो गांव से शहर नहीं इंडिया से वर्ल्ड पर राज करेंगे और दुनिया के सबसे बेहतर पीएम माने जायेंगे। और उनकी शेरवानी, उनकी मुस्कुराहट,उनके हाथ उठाने के अंदाज से लेकर हर मुद्दे पर देर तक खामोशी के बीच शोले में ए के हंगल का वह डायलॉग उभरेगा, यहां इतना सन्नाटा क्यों है भाई।

7 comments:

सम्वेदना के स्वर said...

बेहतरीन प्रसून भाई!
इस फिल्म ने हमें अन्दर तक हिला दिया था, अपने हंसनें पर देर तक हम रोते भी रहे!

पहली बार आपने प्रख्यात पत्रकारों को घेरा है, बहुत ज़रुरी है ये, याद आता है कि एक बार अरुण शोरी नें इस तरह की बात की थी, कि जब तक पत्रकार स्वंम आकर अपने पेशे पर लगातार लग रहे दाग नहीं धोयेंगे कुछ नहीं होने वाला, कुछ साथीयों को बेनाकाब करना होगा.

लोकसभा चुनावों के बाद अरुण शोरी ने ही किन्ही 8 पत्रकारों की चर्चा भी की थी जिनका इस्तेमाल चुनावों में हुआ था,पर वो खबर चैनलों की स्क्रोल लाइन में चली फिर गायब हो गयी. आम आदमी, बहुत मगज़मारी के बाद भी आपकी इस "पर्सुएशान इंडस्ट्री" के बारे में कितना जान सकता है?

सही कहा आपने असल ज़िन्दगी में "लुटियन लाइव" पीपली लाइव पर बहुत भारी है!

सम्वेदना के स्वर said...

इंडिया मे रहने वाले हम सब भारत की बात करते तो ज़रुर हैं परंतु, भारत के लिये "बात" से इतर यदि हम कुछ नहीं कर सकते तो ऐसे लोगों को हमारे एक मित्र "भंडिया के भाडं"(यानि इंडिया के सुविधाभोगी तंत्र में रह कर, भारत की बात करने वाले) कहते हैं! हम भी शायद इसी श्रेणी में तो नहीं आते? (इच्छा जागे कभी तो देखें,यह आलेख भी, "सम्वेदना के स्वर" पर!)

AAINA said...

BLOG PAR AANE SE PAHLE YE KAHI AUR AA CHUKA HAI PAR US LEKH ME SAB KUCHH NAHI THA JO ISME HAI..AGAR SAWAL KIAA JAY KI KYO PAHLE PATRIKA ME..AAKHIR BLOG PAR KYO NAHI?AISA NAHI KI FILM DEKHKAR MAINE THAHAKE NAHI LAGAYE PAR HAR BAAR YAHI SAWAL KI YE HASI FILM KI PRASTUTI PAR HAI YA PHIR APNE DES KI BECHARGI PAR.DEKHANE WALE BHUDHIJIWIYO KI TARAH TIPPADI KAR RAHE THE KI KAY FILM BANAI HAI BILKUL GAW NAJAR AA RAHA HAI.JIS PAR THAHAKA LAGAYA JA RAHA THA AGAR 5 MINUTE BHI US ISTHTI KO BHUGTNA PADE TO INHI THAHAKA LAGANE WALO ME N JANE KITNE AWSAAD ME CHALE JAAYEGE.POSCO KI DEPUTY MANAGER KORIEN HAI AUR USKA HAR BAAR YAHI SAWAL HOTA HAI KI IN AADIWASO KO KYA PROBLEM HAI AUR IS SAWAL PAR UDISA KA HI AIK SHAKSH JO PURCHASE OFFICER HAI(POSCO-BAWAL), MUSKURA KAR JAWAB DETA HAI KI ..MADAM, IN LOGO KO SAMJH HI NAHI HAI.SIRF UDISA KI SARKAR NAHI JHUK RAHI HAI BALKI WO SABHI JINHE IS BAAT KA ILM HAI KI YADI POSCO KO HARI JHANDI MIL JAAYE TO HAR SAL KARORO KE WARE NAYRE TAY HAI, ISILIYE ,DES KI SABSE BADI TOOLING INDUSTRY NE PICHLE DINO KOREA ME APNI DASTAK DI. JAB MAHATMA GANDHI DIKHTE HAI TO FARK NAHI PADTA KI AC 16 PAR JAAYE AUR TAB BHI AAPK0 PASINA AAYE.

boletobindas said...

जिस समय देश में 50 रुपये किलो तक चीनी चली गई थी उस समय देश के बंदरगाहों से आप तक पहुंचाने वाले 32 रुपए किलो की दर से बाजार में देने को तैयार थे। क्योंकि उनकी आयतीत चीनी के खरीदारों ने आर्डर अगले महीने तक खिसका दिए थे,,किसके इशारे पर इसे इसी से समझा जा सकता है कि अगले तीन महीने तक में चीनी गिरकर 35 पहुंच गई थी। इन तीन महीनों में कितनी चांदी किसने काटी ये बताने की जरुरत नहीं है।

NEERAJ PAL said...

लेकिन लुटियन लाइव का अंत वाकई सच को पर्दे पर उभारेगा। क्योंकि वह पीपली लाइव के नत्था की जगह पीएम होंगे। जो गांव से शहर नहीं इंडिया से वर्ल्ड पर राज करेंगे और दुनिया के सबसे बेहतर पीएम माने जायेंगे। और उनकी शेरवानी, उनकी मुस्कुराहट,उनके हाथ उठाने के अंदाज से लेकर हर मुद्दे पर देर तक खामोशी के बीच शोले में ए के हंगल का वह डायलॉग उभरेगा, यहां इतना सन्नाटा क्यों है भाई।.............

बहुत अच्छी लगी आपकी लुटियन लाइव

प्रवीण पाण्डेय said...

चिन्तनीय स्थिति, सटीक लेख। पता नहीं सत्य ता इतना विद्रूप चित्रण होने के बाद भी आँख खुलेगी व नहीं?

Bhoopendra a media man said...

ashambhav kuch nahee hai. paise vale paisa bamnate rahenge kuch badlne vala nahee hai jab tak yah byavstha nahee badlegi.