Saturday, October 13, 2018

वोट पर नहीं नोट पर जा टिका है दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र

देश में फिर बहार लौट रही है । पांच राज्यों के चुनाव के एलान के साथ हर कोई 2019 को ताड़ने में भी से लग गया है । कोई राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ को कांग्रेस के लिये सेमीफाइनल मान रहा है तो कोई बीजेपी के सांगठनिक विस्तार की फाइनल परीक्षा के तौर पर देख रहा है। कहीं मायावती को सबसे बडे सौदेबाजी के सौदागर के तौर पर देखा जा रहा तो कोई ये मान कर चल रहा है कि पहली बार मुस्लिम-दलित चुनावी प्रचार के सौदेबाजी से बाहर हो चुके हैं। और बटते समाज में हर तबके ने अपने अपने नुमाइन्दों को तय कर लिया है । यानी वोट किसी सौदे से डिगेगा नहीं। तो दूसरी तरफ इन तमाम अक्स तले ये कोई नहीं जानता कि देश का युवा मन क्या सोच रहा है। 18 से 30 बरस की उम्र के लिये कोई सपने देश के पास नहीं है तो फिर इन युवाओं का रास्ता जायेगा किधर । कोई नहीं जानता पूंजी समेटे कारपोरेट का रुख अब चुनाव को लेकर होगा क्या । यानी पारपंरिक तौर तरीके चूके हैं तो नई इबारत लिखने के लिये नये नये प्रयोग शुरु हो चले हैं। और चाहे अनचाहे सारे प्रयोग उस इकनॉमिक माडल में समा रहे हैं, जहां सिर्फ और सिर्फ पूंजी है । और इस पूंजी तले युवा मन बैचेन हैं। मुस्लिम के भीतर के उबाल ने उसे खामोश कर दिया है । तो दलित के भीतर गुस्सा भरा हुआ है। किसान - मजदूर छोटी छोटी राहतों के लिये चुनाव को ताक रहा है तो छोटे-मझौले व्यापारी अपनी घाटे की कमाई की कमस खा रहे है कि अबकि बार हालात बदल देंगे। मध्यम तबके में जीने का संघर्ष बढ़ा है । वह हालात से दो दो हाथ करने के लिये बैचेन है । तो मध्यम तबके के बच्चो में जीने की जद्दोजहद रोजगार को लेकर
तड़प को बढा रही है । पर इस अंधेरे में उजियारा भरने के लिये सत्ता इतनी पूंजी झोकने के लिये तैयार है कि हर घाव बीजेपी के कारपेट तले छिप जाये । और काग्रेस हर घाव को उभारने के लिये तैयार है चाहे जख्म और छलनी हो जाये । मलहम किसके पास है ये अबूझ पहेली है । फिर भी चुनाव है तो बहार है। और 2019 के लिये बनाये जा रहे इस बहार में कौन क्या क्या झोकने के लिये तैयार है ये भी गरीब देश पर रईस सत्ता के हंटर की ऐसी चोट है जिसकी मार सहने के लिये हर कोई तैयार है । क्योंकि ये कल्पना के परे है कि एक तरफ दुनिया के सबसे ज्यादा युवा जिसदेश में है वह भारत है ।

तो दूसरी तरफ देश में लोगों के बदतर सामाजिक हालातों के मद्देनजर सबसे ज्यादा पूंजी चुनाव में ही लुटायी जाती है । अगर 2011 के सेंसस से समझे तो 18 से 35 बरस के युवाओ की तादाद देश में 37 करोड़ 87 लाख 90 हजार 541 थी । जिसमें अब इजाफा ही हुआ है । और 2014 के चुनाव में 1352 करोड रुपये चुनाव प्रचार में स्वाहा हुये । जिसमें बीजेपी ने 781 करोड तो काग्रेस ने 571 करोड रुपये प्रचार में फूंके । तो 2019 में चुनाव प्रचार में और कितना इजाफा होगा ये सिर्फ इससे समझा जा सकता है कि 2004 से 2012 तक कारपोरेट ने राजनीतिक दलो को 460 करोड 83 लाख रुपये की फंडिग की थी । लेकिन 2013 में जब बीजेपी ने वाईब्रेंट गुजरात को जन्म देने वाले नरेन्द्र मोदी को पीएम उम्मीदवार बनाया तो 2013 से 2016 के बीच कारपोरेट ने राजनीतिक दलो को 956 करोड 77 लाख रुपये की फंडिग की । और इसमें से 75 फिसदी से ज्यादा फंडिंग बीजेपी को हुई । बीजेपी को 705 करोड 81 लाख रुपये मिल गये । जबकि कांग्रेस के हिस्से में 198 करोड रुपये ही आये । इतनी रकम भी कांग्रेस को इसलिये मिल गई क्योकि 2013 में वह सत्ता में थी । यानी मई 2014 के बाद के देश में कारोपरेट ने जितनी भी पालेटिकल फंडिंग की उसका रास्ता सत्ता को दिये जाने वाले फंडिंग को ही अपनाया । इसके अलावे विदेशी फंडिंग की रकम अब भी अबूझ पहेली है क्योंकि अब तो सत्ता ने भी नियम कायदे बना दिये है कि विदेशी राजनीतिक ड को बताना जरुरी नहीं है । अगर 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद से 22 राज्यों के विधानसभा चुनाव में प्रचार की रकम को समझे तो बीते चार बरस में दो सौ फीसदी तक की बढ़ोतरी 2018 तक हो गई । यानी 2013 में हुये मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान चुनाव जो पांच बरस बाद अब नवंबर दिसंबर में हो रहे है उसके चुनावी प्रचार और उम्मीदवारों के रुपये लुटाने के तौर तरीकों में अब इतना अंतर आ गया है कि चुनावी पंडित सिर्फ कयास लगा रहे है कि प्रचार में खर्चा 6 हजार करोड का होगा या या 60 हजार करोड । यानी पांच बरस में सिर्फ चुनावी प्रचार का खर्चा ही 900 फीसदी तक बढ़ रहा है । और संयोग से इन तीन राज्यों में बेरोजगारी की रफ्तार भी दस फिसदी पार कर चुकी है । किसानों की कमाई में डेढ़ गुना तो दूर लागत से 20 फिसदी कम हो गई है । सरकारों के जरीये तय न्यूनमत मजदूरी भी दिला पाने की स्थिति में कोई सरकार नहीं है । शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा पर तीनो ही राज्य में खर्च देश के खर्च की तुलना मे 15 फिसदी कम है । और ये तब है जब देश में हेल्थ सर्विस पर जीडीपी का महज 1.4 फिसदी ही खर्च किया जाता है । दुनिया के आंकडो के सामानातंर भारत की शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा की लकीर खिचे तो भारत की स्थिति दुनिया की छठी सबसे बडी इक्नामी होने के बावजदूद सौ देशो से नीचे है । यानी असमानता की हर लकीर जब जिन्दगी जीने के दौरान पूरा देश भोग रहा है तो फिर चुनाव प्रचार की रकम ये बताने के लिये काफी है कि 30 से 40 दिनो में चुनाव प्रचार के लिये जितना खर्च राज्यो में या फिर 2019 के चुनाव प्रचार में खर्च होने वाला है और पांच राज्यो के प्रचार में सुरु हो चुका है वह रकम 2014 के नरेन्द्र मोदी के उस भाषण पर भारी पड जायेगी जिसे वापस लाकर हर व्यक्ति को 15 लाख रुपये देने की बात कह दी गई थी । यानी 2019 में 70 अरब रुपये से ज्यादा सिर्फ प्रचार पर खर्च होने वाले है । और लोकतंत्र को जिन्दा रखने के लिये कितने खरब रुपये राजनीति लुटायेगी इसकी सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है ।

और इस परिप्रेक्ष्य में देश जा किस दिशा में रहा है ये सिर्फ इससे समझा जा सकता है कि बीजेपी के पास फिलहाल देश भर में 6 करोड युवा बेरोजगारों की फौज कार्यकत्ता के तौर पर है । और देशभर में विधानसभा और लोकसभा चुनाव के प्रचार के लिये करीब 10 करोड युवा चुनाव प्रचार के दौरान रोजगार पा जाते है । कोई बतौर कार्यकत्ता तो कोई नारे लगाने के लिये जुटता है ।यानी चुनाव की डुगडगी बजते ही कैसे देश में बहार आ जाती है ये इससे भी समझा जा सकता है कि सबसे ज्यादा काला धन ही इस दौर में बाहर नहीं निकलता है बल्कि हर तबके के भीतर एक उम्मीद जागती है और हर तबके को उस राजनीतिक सौदेबाजी की दिशा में ले ही जाती है जहा सत्ता पैसा बांटती है या फिर सत्ता में आने के लिये हर विपक्ष को अरबों रुपया लुटाना ही पडता है । और अगर इलेक्शन वाच या ए़डीआर की रिपोर्ट के आंकड़ों को समझे तो चुनावी वक्त में देश में कोई गरीबी रेखा से नीचे नहीं होता बशर्ते उसे वोटर होना चाहिये । क्योंकि देश में तीस करोड़ लोग 28 से 33 रुपये रोज पर जीते हैं, जिन्हें बीपीएल कहा जाता है । और चुनावी प्रचार के 30 से 45 दिनों के दौर में हर वोटर के नाम पर हर दिन औसतन पांच सौ रुपये लुटाये जाते हैं। यानी देश की पूंजी को ही कैसे राजनीति ने हड़प लिया है और देश के अंधियारे को दूर करने के लिये राजनीति ही कैसे सबसे चमकता हुआ बल्ब है ये चाहे अनचाहे राजनीतिक लोकतंत्र ने देश के सामने रख तो दिया ही है ।

30 comments:

Unknown said...

Very nice sir

Rajiv Ranjan Prakash said...

बिल्कुल ठीक कहा प्रसून जी लेकिन आपने इस बारे में डिप्लोमैटिक रूख रखते हुए सिर्फ आधिकारिक आंकड़े ही पेश किए गए। हालांकि हिंट तो दे ही दिया कि 6हज़ार या 60 हज़ार करोड़ ख़र्च होंगे। यहां सिर्फ एक सवाल है कि मोदी जी की सिर्फ एक रैली के करोड़ की होती है। इसमें छुटभैये नेताओं द्वारा खर्च पैसे शामिल नही जो वो अपने आकाओं को प्रसन्न करने के लिए पानी की तरह पैसे बहते हैं।अब सिर्फ रैलियों को गईं लीजिये।अब बारी है विज्ञापन की अखबारर,टीवी,दीवार,होर्डिंग,हर जगह बीजेपी ही नज़र आता है।उनका अलग अलग खर्च जोड़ लें।तो कितना हो जाता है इसमें उम्मीदवार द्वारा किया गया खर्च शामिल नही।इसके अलावा मोदी जी सरकारी कार्यक्रमों को भी चुनावी सभा में परिणत करने में माहिर है जिसमें सरकारी कंपनियों का करोड़ों खर्च होता है इसका कोई हिसाब खान मिलता है। सिर्फ इसे ही जोडें तो कई हज़ार करोड़ हो जाते हैं।अब सरकारी विभागों का मोदी जी की बड़ी बड़ी फोटों वाले विज्ञापन जिसकी बाढ़ तो हमेशा आई रहती हैं।अब इसका क्रम और बढ़ने वाली है।हालांकि डीएवीपी विज्ञापन दर सामान्य विज्ञापन से कई गुना कम होता हैं फिर भी इसमें कई सौ करोड़ खर्च होतें हैं।
कितना कहुँ हज़ारों करोड़ तो हो गए। और आप कई सौ पैड ही अटकें हैं। यह भारत्तीय लोकतंत्र है।यहां सबकुछ होता है क्योंकि यहां किसी का कुछ नही बिगड़ सकता।
अम्बानी अडानी जैसे उद्योगपति कुछ हज़ार करोड़ खर्च करते हैं चुनाव में तभी तो चुनाव के बाद कुछ पॉलिसी बदलती है है और चार साल में उनकी संपत्ति के गुना बढ़ जाती है और सरकारी कंपनियां जिनके पास हज़ारों करोड़ का अतिरिक्त नकदी पड़ी होती है अचानक बीमार कंपनी बनकर बिकने के लिए तैयार हो जाती है। रक्षामंत्री कहती है कि एचएएल को इसलिए ठेका नही मिला क्योंकि इसमें क्षमता नही थी और रिलायंस डिफेंस जिसका खुद का की ठिकाना नही उसे हज़ारों करोड़ का ठेका मिल जाता है और फिर देश की सुरक्षा के नाम पर चुप्पी साध ली जाती है।
क्या इसे चुनावी खर्च या अहसान चुकाने से नही जोड़ा जाना चाहिए?
इसमें बीजेपी या कांग्रेस का कोई दोष नही चुनाव की पूरी प्रक्रिया ही दोषपूर्ण है इसे भी ठीक किये जाने जी जरूरत है। कृपया इन मुद्दों को भी चर्चा योग्य बनाएं तभी देश का भला होगा। वरना मज़बूत लोकतंत्र के नाम पर देश यूं ही कमज़ोर होता चला जायेगा।

The Pallazio said...

समाज में बदलाव क्यों नहीं आता?
क्योंकि गरीब में हिम्मत नहीं हैं, मध्यम वर्ग को फुर्सत नहीं है और अमीर को जरूरत नहीं है।
सन्तोष कुमार तिवारी
लखनऊ से

Unknown said...

It truly said that MP,MLA are provided with lot of salary and Facilities so their behaviour has become like selfish Ness.Just they of their own Process by using people tax and they never support the humanities because they are Boss of country And feel sad for what politician we choose.

Unknown said...

Great sir
मुझे लगता है ये नारा सभी को बोलना चाहिए कि

गली गली में शोर है
सारे नेता चोर है

Unknown said...

Sir ji #MeToo ki trha Rishwat khori k wajah se jis naukri k haqdar ko naukri nhi mili uske liye bhi campaining honi chahiye 10Lakh 20LAKH balke isse bahot zyada lekar jisme kabliyat nhi usko job naukri offer hoti hy aur jisme kabliyat hy woh gareeb hone ki wajah se mara mara phir raha hy . Ye sab kab tak sir ji.

Rahul Sharma said...

Yva ki bat keval vote tak simit h.
Koi new industry ya company nhi ayi h .
Make in India puri trh flop hua h.
Aaj ka uva ek sath do job kr rha h ek se education loan chuka rha h jo 12-13% h.
Ek se apna jivan chla rha h aage ka kuch pta nhi h abhi.
Log jyda h govt vacancy bahut km h.
Ese m khud ka business krne ki sochte h to utna pesa hath m nhi h.
Loan k liye kuch to garranty lgti hi h vo h hi nhi.
Aaj ka yva cahta h education se leke job market tak sabhi policy chang ho
Aaj k tim k anusar education start ho.
Aaj hmri koi book utha k dekho even engineering college ki bhi abhi bhi 1990 ki books h vha.
New books syllabus h hi nhi course m.

Tabrej Alam said...

Excellent sir...

Jay Prasad Jha said...

गरीब हुए बैहाल तो बिचौलिए हुए मालामाल-

कॉलम- 'जय प्रसाद झा' दरभंगा बिहार

#मनरेगा मैं गरीबों से अवैध उगाही-
#शौचालय के नाम पर अवैध उगाही-
#प्रधानमंत्री आवास के नाम पर अवैध उगाही-
#विकलांग सर्टिफिकेट एवं विकलांगता पेंशन #दिलाने के नाम पर अवैध उगाही-
#जन्म प्रमाण पत्र से लेकर मृत्यु प्रमाण पत्र बनाने मे गरीबों से अवैध उगाही-
#बृद्धा पेंशन देने के नाम पर अवैध उगाही-
#कन्या विवाह योजना के नाम पर अवैध उगाही-
#कबीर अंत्येष्टि के नाम पर अवैध उगाही-

उपरोक्त सभी चीजों के नाम पर गरीबों से अवैध वसूली किया जाता है जिसमें अधिकारी की भी संलिप्तता होती है। यह है बिहार की पहचान। काश इस पहचान को सरकार और सिस्टम मिल कर खत्म कर दे तो,बिहारियों को गुजरात जाकर मार खाना नहीं पड़ेगा।

भारत में सबसे ज्यादा लोग आज भी गांव में ही रहते हैं परंतु सबसे ज्यादा घोटाला गांव के लोगों से ही किया जाता है,अर्थात गांव के लोगों से ही अवैध वसूली किया जाता है अधिकारी से लेकर पदाधिकारी तक इसमें शामिल होते हैं। लाख कोशिश कर ले सरकार गरीबों के उत्थान के लिए परंतु यह भ्रष्ट अधिकारी पदाधिकारी राजनेता गरीबों को ऊपर उठने नहीं देंगे। क्योंकि इनकी रोजी रोटी गरीबों को ठग कर और गरीबों को झांसा देकर ही चलता है।

बिहार के किसी एक पंचायत की घटना नहीं है प्राय सभी पंचायत का हाल यही है अर्थात बेहाल है। सरकारी तंत्र इतना कमजोर हो गया कि बिचौलियों को पकड़ने अथवा बिचौलियों पर कार्रवाई करने के नाम से ही कांप उठते हैं। तभी तो आए दिन राजनेताओं को कभी काला झंडा तो कभी चप्पलो से स्वागत बेरोजगार युवाओं के द्वारा किया जाता है।

बिहार के सुशासन बाबू अर्थात नीतीश कुमार बिहार से पलायन कर रहे युवाओं के बारे में ना सोचते हैं ना ही कुछ विचारते हैं। सिर्फ और सिर्फ अपनी कुर्सी बचाने के लिए कभी महागठबंधन तो कभी भजपा के साथ मिलकर हमेशा हमेशा के लिए सत्ता का आनंद लेने में व्यस्त रहते हैं। जबकि आए दिन बिहार में अपराध व अपराधिक तत्वों मैं काफी इजाफा हुआ है, सरकार और सिस्टम की चल चरित्र और चेहरा उजागर हुआ है। आये दिन एके-47,शराब की अवैध बिक्री, चोरी,हत्या इत्यादि में इजाफा हुआ है।

Unknown said...

बहुत शानदार

Unknown said...

इस देश में राजीव दीक्षित विचार बहुत सटीक बैठता है। सभी नेता चोर है पर मीडिया जन विरोधी है।

Unknown said...

Right sir

Unknown said...

Very analytical report sir , you write always to aware of democracy

Rajiv Ranjan Prakash said...

जय प्रसाद जी,बिचौलिए बोलकर उनका महिमामंडन न कीजिये उन्हें दलाल बोलिए।और ये भी में लीजिए कि यह देश है वीर दलालों का,.......

Rajiv Ranjan Prakash said...

जय प्रसाद जी,बिचौलिए बोलकर उनका महिमामंडन न कीजिये उन्हें दलाल बोलिए।और ये भी में लीजिए कि यह देश है वीर दलालों का,.......

Unknown said...

Right sir, but a question arises here how can it be stopped? Our youth especially educated youth distances themselves from politics as they want a peaceful life, which they consider a reward for his study.owing to this corrupt people take the advantage of this kind of mentality of educated people and come to rule them.

hadi said...

Desh ko GARDAABAAD bana diya .Aur Garibo ko 2 waqt ki roti ko muhaal kar diya, AMBANI ko Raifelde diye , Maro aur looto

Deepak Kumar said...

हम बचाते रह गए
दीमक से अपना घर

कुर्सियों के चन्द कीड़े
सारा मुल्क खा गए

Unknown said...

बहुत सुन्दर,,,केवल नोटा का सोटा

My Opinion ! said...

https://myopinionkk.blogspot.com/2018/10/in-india-post-of-president-is-highest.html?m=1

My Opinion ! said...

https://myopinionkk.blogspot.com/2018/10/in-india-post-of-president-is-highest.html?m=1

Unknown said...

Very nice

Success4you said...

Good job sir...
I am waiting you sir plz come back Television...
Love u sir.

Rajiv Ranjan Prakash said...

काफी दिनों से कुछ लिखा नही आपने प्रसून जी।लगता है कि बीजेपी ने अंततः आपको भी ठिकाने लगा दिया।
रवीश कुमार और एनडीटीवी पर तो 4000 करोड़ रुपये फेरा फेमा जैसे कई मामले में जांच शुरू हो ही गई है।
अनिल अम्बानी ने 10000 करोड़ का मानहानि का मुकदमा ठोक दिया है।
उधर 2014 में मोदी जी की हवा बनाने के लिए बड़े भाई मुकेश अम्बानी ने पहले तव 18 पर कब्ज़ा किया।अब डेन और हाथवे केबल पर नियंत्रण करने के लिए उन्हें खरीद लिया है।
अब टीवी चैनल पर क्या दिखाना है उसका फैसला वही करेंगे।और किस चैनल को ऑफ़ और करना है उसके लिए चुनाव से ठीक पूर्व एक साथ दो दो केबल कंपनियों पर भी कब्जा कर लिया गया है। इसबार एनडीटीवी टीवी तो गया। देखते हैं आप कब तक टिक पाते हैं।

Rajiv Ranjan Prakash said...

काफी दिनों से कुछ लिखा नही आपने प्रसून जी।लगता है कि बीजेपी ने अंततः आपको भी ठिकाने लगा दिया।
रवीश कुमार और एनडीटीवी पर तो 4000 करोड़ रुपये फेरा फेमा जैसे कई मामले में जांच शुरू हो ही गई है।
अनिल अम्बानी ने 10000 करोड़ का मानहानि का मुकदमा ठोक दिया है।
उधर 2014 में मोदी जी की हवा बनाने के लिए बड़े भाई मुकेश अम्बानी ने पहले तव 18 पर कब्ज़ा किया।अब डेन और हाथवे केबल पर नियंत्रण करने के लिए उन्हें खरीद लिया है।
अब टीवी चैनल पर क्या दिखाना है उसका फैसला वही करेंगे।और किस चैनल को ऑफ़ और करना है उसके लिए चुनाव से ठीक पूर्व एक साथ दो दो केबल कंपनियों पर भी कब्जा कर लिया गया है। इसबार एनडीटीवी टीवी तो गया। देखते हैं आप कब तक टिक पाते हैं।

Rajiv Ranjan Prakash said...

काफी दिनों से कुछ लिखा नही आपने प्रसून जी।लगता है कि बीजेपी ने अंततः आपको भी ठिकाने लगा दिया।
रवीश कुमार और एनडीटीवी पर तो 4000 करोड़ रुपये फेरा फेमा जैसे कई मामले में जांच शुरू हो ही गई है।
अनिल अम्बानी ने 10000 करोड़ का मानहानि का मुकदमा ठोक दिया है।
उधर 2014 में मोदी जी की हवा बनाने के लिए बड़े भाई मुकेश अम्बानी ने पहले तव 18 पर कब्ज़ा किया।अब डेन और हाथवे केबल पर नियंत्रण करने के लिए उन्हें खरीद लिया है।
अब टीवी चैनल पर क्या दिखाना है उसका फैसला वही करेंगे।और किस चैनल को ऑफ़ और करना है उसके लिए चुनाव से ठीक पूर्व एक साथ दो दो केबल कंपनियों पर भी कब्जा कर लिया गया है। इसबार एनडीटीवी टीवी तो गया। देखते हैं आप कब तक टिक पाते हैं।

Prince Rao said...
This comment has been removed by the author.
HARSHVARDHAN said...

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन विश्व पोलियो दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

MULTANI RM said...
This comment has been removed by the author.
ghanshyam rajora said...

,क्या बात है सर जी,,धन्य हो आप,,कुल मिलाकर किसी चेनल पर आप के नही टिकने कारण यही रहा होगा,,99वे मंदबुद्धि भक्तो में आप जैसे नेक ओर एक शख्स के लिए ,वो अंधभक्ति का माहौल ठीक नही था