Monday, October 29, 2018

कोई तो निकले सड़क पर सच बोलते हुये.....

खलक खुदा का , मुलुक बादश्ह का / हुकुम शहर कोतवाल का / हर खासो-आम को आगाह किया जाता है / कि खबरदार रहें/ और अपने अपने किवाड़ों को अंदर से /कुंडी चढाकर बंद कर लें / गिरा ले खिड़कियो के परदे/  और बच्चों को सड़क पर न भेजें/ क्योंकि, एक बहतर बरस का बूढा आदमी अपनी कमजोर आवाज में  /  सड़कों पर सच बोलता हुआ निकल पड़ा है....44 बरस पहले 1974 में धर्मवीर  भारती ने मुनादी नाम से ये कविता तब लिखी जब सत्ता के घमंड में चुर इदिरा की तानाशाही चरम पर थी और जेपी देश में अलख जगाने निकल पड़े थे। उस वक्त इंदिरा की सत्ता चापलूसों से कुछ इस तरह घिरी हुई थी कि इंदिरा को  भ्रष्टाचार में भी ईमानदारी दिखायी देती थी। दमन करने में राष्ट्रीय भावना। और उस वक्त भी विपक्ष की राजनीति शून्य में समायी हुई थी। तब जेपी खड़े हुये थे। और फिर धीरे धीरे कैसे उनके पीछे छात्र-युवा से लेकर  राजनीतिक कार्यकत्ता जुडते गये और स्वयंसेवकों की टोली भी जुडने लगी, ये अब इतिहास जरुर है लेकिन इतिहास के इन पन्नों को पलटते मौजूदा वक्त जिस तरह की आहट कही ज्यादा क्रूर तरीके से नहीं बल्कि सत्ता की मद में चुर होकर जिस इतिहास को रच रहा है, वह सिर्फ संकेत भर है कि आने वाले वक्त में  हालात और खराब होंगे।  कैसे इमरजेन्सी की बाजी जनता पार्टी ने पलटी और कैसे उसी जनता पार्टी से निकले नायक इमरजेन्सी से भी बुरी बाजी चलने से बाज आ नहीं रहे हैं। तो फिर आने वाले वक्त में सत्ता का कौन सा चेहरा  दिखायी देगा या वह कितना क्रूर होगा ये सिर्फ कल्पना की जा सकती है क्योंकि सत्ता पाने के रास्ते ही सारे दौड़ लगा रहे हैं। और जनता एक  त्रासदी को भोगते हुये दूसरे त्रासदी को भोगने के लिये खुद को तैयार कर रही है। यानी आजाद भारत में सत्ता की उम्र तले सत्ताधारियों की उम्र ढल जाती है और नई पीढी विरासत की सोच संभाले सत्ता पाने के लिये दौड़ती नजर आती है, इसके सिवा और हो क्या रहा है या कहे कहां कुछ हो रहा है। 44 बरस पुराने संघर्ष के नायक आडवाणी आज अकेले अंधेरे में कैद है....  मुरली मनोहर  जोशी खामोशी की तरंगों में खोये हुये हैं। जार्ज फर्नाडिंस डिमेन्शिया बीमारी तले सबकुछ भूल चुके हैं। यशंवत सिन्हा सुनसान सड़क पर हंगामा खड़ा  करने के मकसद को लगातार टटोल रहे हैं। शत्रुघ्न सिन्हा की खलनायकी से  लेकर नायकी भी दांव पर है। कांग्रेसी या क्षत्रपों में इतनी ताकत नहीं नहीं कि सत्ता गंवाने के बाद सत्ता पाने के लिये संघर्ष करते हुये दिखायी  देने के अलावे कुछ कर सकें ।

इस फेहरिस्त में नीतीश कुमार नतमस्तक हैं। पासवान अपनी विरासत को अपनी ही पीढियों के बंदोबस्त में डूबे हुये हैं।  राजनाथ सिंह से लेकर रविशंकर प्रसाद और अखिलेश यादव से लेकर ममता बनर्जी में राजनीतिक नैरेटिव सिर्फ अपनी सफलता दिखाने या सत्ता पाने के हर तरीके को अपनाने के आगे जाती नहीं। लकीर महीन पर ये समझने की जरुरत है कि आखिर क्यों किसी नेता में नैतिक बल नहीं है कि वह सड़क पर इस मुनादी के साथ  निकल पड़े कि अब राजनीतिक व्यवस्था को बदलने की जरुरत है। यानी 72 की उम्र पार कर चुके पूर्व के नायको में इतनी जिन्दगी नहीं कि वह कुछ बोल भी  सके । और आजादी के बाद जन्म लेने वाली पीढी सत्ता संभाले हुये या सत्ता पाने की होड में मान कर चल रही है कि उसके हाथों नये भारत का सपना जन्म ले  ही लेगा। और सत्ता का घमंड इतनी तीक्ष्ण है कि अमित शाह कहने से नहीं चुकते अदालतों को मर्यादा में रहकर फैसले देने चाहिये। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल को गठबंधन की सत्ता देश को कमजोर करने वाली और बहुमत की मोदी सत्ता ताकतवर होकर देश को ताकतवर बनाने वाली नजर आती है । तो वित्त मंत्री अरुण जेटली तो चुनी हुये सत्ता को ही देश मान लेते हैं। और इस बोल के पीछे के सच को समझे तो देश के हर संस्था हर संवैधानिक संस्थान । हर अधिकारी। हर कारोबारी और हर प्रभावी व्यक्ति को सत्ता के पक्ष में खडे होने की तमीज होनी चाहिये, समूची व्यवस्था यही बनाने की कोशिश हो रही है। यानी बहस-चर्चा या फिर सवाल उठने नहीं चाहिये। और जनता ने पांच बरस के लिये चुना है तो सत्ता के ही ऐसे किसी फैसले या निर्णय पर अंगुली उठाने का अधिकार किसी को होना नहीं चाहिये चाहे सत्ता के वो निर्णय संविधान की ही घज्जियां क्यों ना उड़ाता हो । तो असल सवाल यहीं से शुरु होता है कि आखिर इस देश में सडक पर नंगे पांव जेपी की तर्ज पर निकलने वाले भी खत्म क्यों हो गये। युवा तबके का संघर्ष सत्ताधारियों या सत्ता पाने के लिये नारे लगाने में गुम क्यों हो जा रहा है। और किसी भी मुद्दे पर देश  एकजूट होकर ये फैसला देने की स्थिति में क्यो नहीं आ पा रहा है कि भविष्य के बेहतर भारत के लिये ही सही पर चंद दिनों तक रोजी-रोटी छोड कर सड़क पर ही
निकल जाये और पटरी से उतर चुकी राजनीतिक व्यवस्था को वापस पटरी पर लाया जाये। यानी समाज के भीतर की एकजूटता खत्म कैसे हो गई। किसने कर दी। सारे सवाल सूचना तंत्र के बंटे हुये मंत्रो के आसरे गूंजते तो हैं पर असरकारक क्यों नहीं हो पा रहे हैं। और सारी बहस इसी पर क्यों आ टिकती है कि 2019 में तो आजादी मिल ही जायेगी तो उसी में लग जाया जाये। यानी आजादी ने 71 बरस बाद के हालातों को समझे । लोकतंत्र का मतलब सत्ता परिवर्तन से सत्ता हस्तांतरण और एक वोट से एकमुश्त वोट से आगे बढ़ नहीं पाया। और बढ़ा भी तो अंग्रेजों की गुलामी के वातावरण को ही सत्ता के आत्मसात करने वाले हालात विकसित हो गये। यानी कानून सिर्फ आम जनता के लिये और कानून पर राज सत्ता का। यानी संविधान और कानून के राज को ही गुलाम बनाकर लोकतंत्र को जीने का भाव इसलिये विकसित होते चला गया क्योंकि चुनाव जिस तंत्र तले आ खड़ा हो गया वह दबंगई चले बूथ लूट से निकला जरुर। पर धीरे् धीरे वोट को खरीदने और वोटरो को बांटने के सामानांतर सत्ता के ही अपराधी होने पर जा टिका। और सत्ता के लिये अपराधी होने का मतलब यही हो गया कि कानून की नजर में जो भी जायज नहीं है, वह सत्ता के लिये होने वाले चुनाव में जायज होगा ।

लेकिन लोकतंत्र का कवच बरकरार रखना है तो फिर नागरिक और उसके वोट की ताकत को महत्व देना जारी रखा गया। तो सुधार से पहले हालात को समझ लें। अपराधी होना पहले सत्ता से सौदेबाजी करने की ताकत देता है फिर सत्ताधारी बना देता है । भ्रष्ट या लूट के आसरे कालाधान या बेशूमार धन को समेटे व्यक्ति से पहले राउंड में सत्ता सौदेबाजी करती है फिर अपने साथ खडा कर लेती है । मुनाफे के इस केल में जाति भी इसी बिसात को बिछाती है और धर्म भी सियासी बिसात के लिये प्यादा बन जाती है । तो बदलाव लाये कौन और पहल हो कहा से । जबकि किसान के नाम पर आंदोलन । महिला सुरक्षा को लेकर गुस्सा । बेरोजगारी को लेकर आक्रोष । छोटे व्यवसायियो के संकट के नाम पर विरोध । तो संकट में सभी है लेकिन सभी मिलकर तय ही नहीं कर पा रहे है कि सत्ता की राजनीति करने वालो को घूल कैसे चटायी जाये । तो संघर्ष का पैमाना सत्ता को हराने वाले के साथ अलग अलग तरीके से जुडने के अलावे कुछ बच नहीं रहा है । यानी मोदी से आजाद होकर गठबंधन की गुलामी का सुकुन हर कोई पाले हुये है । और लगातार बदलते संभलते हालात संकेत भी दे रहे है कि सत्ता का घमड को चूर चूर करने की तैयारी में हर तबका है । पर वह खामोश है । और खामोशी के परिणाम बेहद प्रभावी होते है ये इंदिरा समझ नहीं पायी तो मोदी भी कैसे समझेगे । लेकिन लोकतंत्र को ही अगर राजनीतिक इकनामिक माडल में बदला जा चुका है तो इसका दूसरा पहलू यही है कि 2019 के बाद कुछ नये चेहरे होंगे। कुछ नये मोहरे होंगे। कुछ नये रईस होंगे। कुछ नये तबके होंगे। कुछ नये समुदाय होंगे। और अभी की भगवा ब्रिग्रेड को सजा तब जरुर मिलेगी । क्योंकि लोकतंत्र हमेशा खुद को विस्तार देता है तो मोदी का पाठ राहुल गांधी ने पढ लिया है । संघ का मोदी राग भी काग्रेस समझ चुकी है । यानी सत्ता बदल रही है पर इस बदलती सत्ता में जनता कहा है और आने वाले वक्त में देश का आम नागरिक कहा होगा । ये सवाल क्यो गायब है । या फिर कैसे 2013-2014 में जो मनमोहन सिंह खलनायक लगते थे । और जो मोदी नायक लग रहे थे । 2018 में वही मोदी खलनायक लगने लगे है । और फिर पीएम मनमोहन बनेगें नहीं लेकिन देश की र्थिक नीतियो को लेकर वह नायक लगने लगे है ।

दरअसल यही से सवाल उठता है कि हमे क्यो नहीं पता है कि हमारी आर्थिक नीतिया कैसी होनी चाहिये । हम क्यों तक्षशिला और नालंदा यूनिवर्सिटी के गौरवमयी अतित को भूल चुके है । क्यों गांव पर टिका भारत हम भूलाते जा रहे है और गांव खत्म कर स्मार्ट सिटी बनाने की दिशा में बढ चुके है । क्यों भारत में शारीरिक श्रम को
महत्व नहीं और शिक्षा महत्वहीन हो चली है। क्यों परिवार खत्म हो रहे हैं और क्यों सरोकार खत्म कर तकनीक के आसरे देश चलाने की दिशा में देश बढ़ चला है। क्यों रुस का साथ छूटा और अमेरिका के मुरीद हो गये। क्यों चीन के सामने भारत नतमस्तक दिखायी दे रहा है। क्यों हर मुद्दे के पीछे पाकिस्तान को देखकर भावनाओं को उभारा जा रहा है और क्यों सत्ता हिन्दु मुस्लमान में अटक जाती है। क्यों सार्क देशो को 2014 में शपथग्रहण में बुलाकार दोस्ती के विस्तार की बात होती है और 2019 से पहले ही नेपाल, मालदीव, भूटान, श्रीलंका तक भारत से दोस्ती छोड चीन के कठघरे में खड़े नजर आते हैं। समझना जरुरी है अगर सत्ता सिर्फ सत्ता बनाये रखने के लिये है और राजनीतिक सत्ता की हथेली पर ही देश को नचाने की सोच है तो फिर हर कोई हर दूसरे को अपनी हथेली पर नचाने की निकलेगा। तो फिर लोकतंत्र का हर पिलर तो यही काम करेगा । और चौथा स्तम्भ मीडिया भी तो नचायेगा ही ...तो फिर फिर सडक पर कौन सच बोलते हुये निकलेगा । और कैसे विकल्प बनेगा और जो सवाल जीरो बजट की राजनीति का है वह कैसा होगा, ये अगले लेख में।

19 comments:

Shashank Mishra said...

Sir aapko hum news par kab dekhenge

Shashank Mishra said...
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Abhishek Gupta said...

Sir aap अपना खुद का news चेनल start किजिये हम उसमे जो भी help कर सकेगे जरूर करेगे बस आप खड़े रहो हम आप के साथ है.

Unknown said...

Sir ap mainstream media me kb tk aoge.

Unknown said...

Wo apna news chanell kholna chahte the pr 20 cr kha se layenge jo jarurat hoti h news chanell kholne k liye.

Mohammed Harun said...

नया दौर आने वाला ह

Sabaullah Dhamwaarbi said...

बात बिल्कुल सही कह रहे है पर आप के बेगैर कोई भी चैनल अधूरा है जब से आप गए तब से टीवी देखता भी नहीं आप की जरूरत है इस दौर मै सर कोई भी चैनल जल्दी ज्वाइन करे।।

Vinod Tiwari said...

Enter your comment... हम आपको न्यूज चैनल पर दिखने की/ खुद का न्यूज चैनल शुरु करने की अपेक्षा/सुझाव की भी जिद!/जद्दोजहद को अनुकूल नही जानता/ मानता/ समझता हूँ परन्तु किसी से किसी को अपेक्षा नही करने चाहिए ये मेरा निजि अनुभव है क्यूँकि अपेक्षा/उपेक्षा एक ही सिक्के के दो पहलू हैँ इसलिए अब जो भी करना हो स्वयम करना होगा ।
भारत की विविधिता मेँ एकता के तथाकथित अनुयाई/नेतृत्व आज खुद "डिवाइड एण्ड रुल" पालिसी से संवर्धित होने के कारण उसी राह पर चलने को बाध्य/लाचार/मजबूर है जिसमें सारे अपने ही गिरफ्त मेँ हैँ जिन्हे मुक्त करने हेतु अबतक के इतिहास और उसके तथाकथित नायकों/ खलनायकों/ महानायको एवम महापुरुषोँ को मैँ स्क्रैप(कचरा) मानता हूँ जिसको ढोने की जरुरत नही पडेगी।
भारत का वर्तमान अतीतोन्मुखी है जिसे भविष्योन्मुखी बनाने हेतु अध्यात्मिक/ धार्मिक/ आर्थिक/ राजनीतिक/ समाजिक स्क्रैप(कचरा) को जलाकर नष्ट करना होगा जिसकी चुनौती मैने नरेन्द्रजी! (एकस्वयमसेवक) को दी थी जब उन्होने देश से 60वर्ष बनाम 60मास माँगे थे ऐज ए पीएम नही ऐज ए चौकीदार तब मैने कहा था कि- (नरेन्द्रजी! आज देश को पीएम पद पर चौकीदार की नही अपितु स्वीपर की आवश्यकता है जो अध्यात्मिक/ धार्मिक/ आर्थिक/ राजनीतिक/ समाजिक सत्ता प्रतिष्ठानोँ का समस्त प्रकार का कचरा साफकर सकेँ।) तो मेरे प्रस्ताव के बाद मेँ प्रधानसेवक! बन गए झाडू/ फावडा/ पलवा/ कन्नी/ बसुली थाम ली और निकल पड" स्वच्छभारत" के मिशन पर जो "देवालय से पहले शौचालय की रणनीति/परिणति बन गई और 2014की भारतसरकार तथाकथित मोदीसरकार आज एक सैकडा से अधिक सँविधान सँशोधन के उपरान्त/ एकसैकडा योजनाओँ/परियोजनाओँ की लान्चिगँ के बावजूद शौचालय पर आ खडी हूई है परिणाम/प्रमाण देश के समक्ष है कि ग्रामसभा से लोकसभा तक सिर्फ भ्रष्ट्राचार की गूँज है क्यूँकि लार्ड मैकाले का विधान है जिसके तथाकथित लोकतन्त्र/लूटतन्त्र गणतन्त्र नही मुट्ठीभर लोगोँ के तन्त्र के तथाकथित चारो स्तम्भ विधायिका/ न्यायपालिका/ कार्यपालिका/ मीडिया भ्रष्ट्राचार की जद मेँ लगभग ढह चुके हैँ तो शेष/अवशेष मे देश की दिशा व दशा बदलने हेतु अब क्रान्ति ही अन्तिम विकल्प है जिसका सफल चक्रव्यूह सिर्फ मेरे पास ही है जिसमे वजीर(नमो) और फकीर(रामदेव) की बहुत बडी भूमिका अपेक्षित है लेकिन दु:ख और दुर्भाग्य ये है कि अबतक भयँकर उपेक्षित है परन्तु क्यूँ?-जयहिन्द!

Nishikanta Mohapatra said...

You are one of the finest journalist India has ever got. Proud of you.

Vinod Tiwari said...

Enter your comment... पुण्यप्रसूनबाजपेईजी!
आज देश मेँ तथाकथित एकवजीर(नमो) एवम एकफकीर(रामदेव) की इस तथाकथित अप्रत्यासित सफलता के पीछे मेरे सँकल्प का आँशिक प्रयोग/सुझाव है जिसका महाविकल्प का आँशिक मेरा मेरे समर्पण का शपथ-पत्र पीएमओ की टेबल पर विचाराधीन है जिसमेँ भारतसरकार फँश चुकी है तभी एक्सेप्ट/रिजेक्ट करने की सामर्थ्य नही है परन्तु देशी कहावत मेँ साँप/छछून्दर की गति है उगलत/लीलत दोना दशा मृत्युकारक है परन्तु इनकी नही लार्ड मैकाले के विधान की मृत्यु निश्चित है जो अवश्यम्भावी है तो वजीर और फकीर को मैँ अबतक मूर्ख नही महामूर्ख समझता हूँ कि एकभारत/ श्रेष्ठभारत/ समृद्धभारत/ युवाभारत/ अखण्डभारत हेतु 2019 मे वजीर/फकीर दोनो सँयुक्तरुप से "राजीवभाईदीक्षित" के सपनोँ का भारत! आत्मसात करने हेतु मेरे शपथपत्र का अनुमोदन/अनुपालन करते हुए स्वयम को माँ भारती के श्रीचरणोँ मे बलिदान कर देँ तभी इनकी निष्ठा/ प्रतीष्ठा/ यश/ कीर्ति/ कलँक से बच सकते हैँ और युग/युगान्तर मेँ अमर हो जाएगेँ क्यूँकि ऐसा होने से "वसुधैवकुटुम्बकम" की परिकल्पना सार्थक सिद्ध हो जाएगी।
वजीर/फकीर दोनो गुरुसत्ता/राजसत्ता का प्रतिनिधित्व करते हैँ तो आज अहम/वहम/भ्रम को त्यागकर देखे कि मेरा शिफर से शिखर के मध्य स्थापित सँवाद की इतनी बडी कथा की ब्यथा ये है कि इस महागाथा का महानायक बेशक "राजीवभाईदीक्षित" है लेकिन इसका असल नायक एकलव्य? क्यूँ है? क्यूँ कि ये आनलाइन "THE TRUTH INSIDE STORY OF INDIA" लगभग 10,000 मैसेज फेसबुक/ ट्विटर/जीमेल से प्रेषित एक साधारण कीपैड मोबाइल Nokia 2700 classic मेँ मात्र अँगूठा से लिखे गए हैँ यह भी विडम्बना है लेकिन एकलव्य? की लग्न अँगूठा छल से छीन जाने के बावजूद बेशर्म गुरुसत्ता/राजसत्ता जब मैने अपना शीष माँ भारती के श्रीचरणोँ मेँ भेँट कर दिया फिर भी खामोश है अब भी उत्तरदायित्व नहीँ सँभलता तो चुल्लूभर पानी मेँ कहीँ डूब मरो वर्ना मुझे और विवश मत करो वजूद मिट जाएगा आज भारत की महाभारत मेँ माँ गँगा के बेटे नमो(वजीर) और पतँजलियोगपीठाधीश्वर द्रोणाचार्य रामदेव(फकीर) से मेरा बारम्बार अनुरोध है कि तन्त्र ठीक है/ मन्त्र ठीक है/ यन्त्र भी ठीक है किन्तु षणयन्त्र ठीक नही है। अत: सर्वप्रथम मीडिया की नैतिक जिम्मेवारी सत्य की बुनियाद पर पूर्ण स्वतन्त्रता सुनिश्चित करते हुए "एक्चुअल फेस आफ मीडिया" पुण्यप्रसूनबाजपेईजी! की ABP मेँ #मास्टरस्ट्रोक के जरिए सीघ्र घरवापसी हो नही तो मै वजीर और फकीर का वजूद मिटाकर 2019 मेँ दलोँ का दलदल खत्मकर @ppbajpai जी को देश का अगला पीएम बना दूँगा ये मेरी चुनौती नही चेतावनी है क्यूँकि वजीर और फकीर मेरे चक्रव्यूह मेँ फँश चुके हैं जहाँ अब वजीर और फकीर एक दूसरे बचा सकते है न खुद बच सकते हैँ जिसका एहसास आप दोनो को भलीभाँति है।-जयहिन्द!

Unknown said...

परिस्थितियों का मार्मिक चित्रण किया है अपने,एक
कड़वा सच बोलकर आपने पूरा परिदृश्य रेखांकित
उम्मीद करते है कि हमारा बौद्धिक समाज इसे
समझेगा। परिस्थियों को किस रास्ते चलकर बदला
जाय यह तय करने की जम्मेदारी अब हमारी है।

अमित श्रीवास्‍तव said...

कुछ ही लोग बचें हैं।। सलूट।।

Unknown said...

पुण्यप्रसूनबाजपेईजी!
हरियाणा में 16 अक्टूबर 2018 से जिस तरह से निजिकरण के विरोध में हडताल पर चल रहे रोडवेज कर्मचारियों को सभी कर्मचारी संगठनों के साथ-साथ खापों,पंचायतों एवं जनता के समर्थन के बावजूद सरकार अपने फैसले पर अटल है मैं ग्रामीणांचल से एक छोटा सा किसान हूं और मुझे लग रहा है कि लोकतांत्रिक सरकार के नाम पर सता पर काबिज लोग सीधे-सीधे समाज को संदेश हैं कि देश सैंविधानिक एवं लोकतंत्र के नियमों से नही बल्कि हमारी मर्जी से चलेगा और आपने सता पर काबिज लोगों के इस चलन के प्रति देश को हमेशा सजग किया है और आशा करता हूं कि वर्तमान में हरियाणा में रोडवेज कर्मचारियों की निजिकरण के विरोध में चल रही हडताल पर सता की हठधर्मिता क्या आपकी नजर में वही संदेश दे रही जो मैं समझ रहा हूं अपने ब्लाग में अवश्य लिखें!
जे0प0 नहरा

Unknown said...

क्रांतिकारी पुण्य प्रसुन वाजपेयीजी, जब तक जनता---मुर्ख रहेगी धुर्त लोग मुर्ख बनाते रहेंगे,लोभ में रहेगी तो लाभ उठाते रहेगे, व्यक्ति में अास्था रखेंगे तो अन्धविसवास कि नइ कहानियाँ गढकर मुर्ख बनाते रहेगी। क्या जनता को पता नहीं है कि--- दर्जनों दूसरे देशों को हम ४०₹/लिटर पेट्रोलियम बेच रहे हैं और अपनों को ८०₹/लिटर, कि गाय हर जगह माता है और गोवा,अासाम,मणिपुर में ? कि एक प्रधान पुरे पन्चायत को अादर्श बनाता है लेकिन एक सान्सद पान्च साल में एक भी गाँव को नहीं, कि किसी को १५ लाख नहीं मिल सकता, कि ५० दिन क्या ५० साल में भी नोटबन्दि का असर ठिक नहीं हुआ तो किसी को चौराहे पर खडाकरके गोली नहीं मारा जा सकती, कि चाय बेचना,पान बेचना,गन्दे नाले के गेेस से पकोड़ा तलकर बेचना रोजगार नहीं है, लोगों की गरीबी पर हन्सि उड़ाना है, कि अभी अभी ५ दिन पहले किस सान्सद ने बोला है कि अब दिल्ली से भी बिहार यु पि बाले को भगाना चाहिए, कि नितिश कुमार का डि एन ए खराब था, कि वही लोग दिल्ली में महिलाओं को तलाक से अाजाद कराना चाहते हैं और सबरिमाला मन्दिर में जाने पर इट से इट बजाने की धमकी देकर बिरोधियो के साथ चट्टान की तरह खड़े रहते हैं।
कि उनके द्वारा कही गई हर बात जुमला होता है।


Anil Saraswat said...

दरअसल देश तो बदल रहा है अर्थात पीढ़ी बदल रही है, जब पीढ़ी बदल रही है तो सोच भी बदल रही है। देश का युवा देश की खुशहाली के लिए सोच रहा है, देशवासियों की तरक्की के लिए भी तैयार है। सवाल तो यह है कि युवा को वह जमीन तो मिले जिससे देश में खुशहाली और देशवासियों की तरक्की के लिए वह आगे बढ़ सके। देश के नेता जो सत्ताधारी बन जाते है, उनकी सोच में भी तो बदलाव आए। वही घिसी-पीती नीतियां। वही सत्ता पाने का तरीका। फिर सत्ता पाने के बाद मद मस्त हो जाना। चुनाव लड़ने की वही विचारधारा कि कैसे भी मिले मिलना चाहिए। इसके लिए झूठ बोलना पड़े, धोखा देना पड़े। आज का युवा राजनीती में लगाव नहीं रखता वह झूठ, झाँसे का समर्थक नहीं है। वह सीधी और सच्ची वास्तविकता समर्थक है। थोड़ा सा सोचा जाये तो आज का 99 % युवा राजनीति में आना पसंद करता। जाहिर है कि राजनीति को वह गंदी विधा मानता है। राजनीति में जो भी युवा आये हैं वह प्राचीन नेताओं की विचारधारा के समर्थक कतई नहीं है। प्राचीन विचारधारा वाले नेता जब तक अस्त नहीं हो जाते तबतक राजनीति शुद्ध नहीं होगी। आमजन का भला नहीं होगा। देश में कुटिलता के समर्थक जब तक सत्ता में रहेंगे तबतक देश का यही हाल होगा। ऐसा भी नहीं है कि देश की राजनीति में शुचिता आएगी, किन्तु इसके लिए इन्जार करना होगा। हमें अपनी विचारधारा को आशावादी बनाना होगा। 2019 में होने वाले चुनाव क्या बदलाव लाते हैं यह ही देश की दिशा और दिशा तय करेंगे। सत्ता युवा के हाथ में आने पर देश की सभी व्यवस्थाएं आदर्श की ओर जाएँगी ऐसा मेरा विश्वास है। में आशावादी रहना अधिक पसंद करता हूँ। फिर विकल्प तो निकलते हैं यह इतिहास भी कहता है। हमेशा अँधेरा ही नहीं रहता, सूरज की किरण जरूर निकलती है।

Unknown said...

नाम पार्टी पद बताये!
किसने कहा कि अब दिल्ली से भी बिहार,यु पि वाले को भगाना ?
किसने कहा कि हम शहीद भगत सिंह से भी अच्छा काम कर रहे हैं?
किसने कहा कि जो भी लड़की तुम्हें पसंद है नाम पता बताअो उठाकर मैं लाउन्गा।

mgm said...

You are brilliant mr. Bajpai god will definitely help you . But today politician are just like mud . They never want to cleanup the system

Unknown said...

Fantastic news sir

Deepak Kumar said...

ॐ...
नारियल में छोटा-सा छेद करके उसमें गोबर के कंडे के बारीक कण भर दें। फिर अमावस्या को आधी रात के समय पीपल के पेड़ के नीचे रख दें।

नारियल को पीपल के नीचे जमीन पर इस प्रकार गाड़ें कि छेद वाला भाग ऊपर की तरफ रहे...

पीपल की तीन उलटी परिक्रमा लगाएं और वापिस आ जाएं।

वापिस लौटते समय पीछे मुड़कर न देखें।

यह उपाय 11 दिन लगातार करने से यह वहम दूर हो जाएगा कि 2019 में #कमल/ #बीजेपी सत्ता में आएगी...