Monday, November 5, 2018

मोदी और योगी माडल में फंसी है संघ के राम मंदिर की बिसात ----------------------------------------------------------------------------------




योगी आदित्यनाथ दीपावली के दिन राम मंदिर को लेकर कौन सा एलान करने वाले है । दिल्ली में दो दिन तक अखिल भारतीय संत समिति को बैठक करने की जरुरत क्यों पडी । और दशहरा के दिन अचानक  नागपुर में सरसंघचालक मोहन भागवत की जुबान पर राम मंदिर निर्माण कैसे आ गया । इस बीच आखिर क्यों सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई जनवरी तक टाली तो संघ से लेकर संत और बीजेपी सांसदो से लेकर विहिप तक सुप्रीम कोर्ट को ही देरी के लिये कटघरे में खडा क्यो करने लगा । जाहिर है ये ऐसे सवाल है जिनके तार राजनीति से जोडियेगा तो एक ही जवाब आयेगा , कुछ होगा नहीं सिर्फ समाज और देश में राम मंदिर के नाम पर उबाल पैदा करने की कोशिश की जा रही है । तो अगला सवाल ये भी हो सकता है कि क्या इस राजनीतिक उबाल से 2019 में मोदी सत्ता बरकरार रह जायेगी । असल उलझन यही है कि निशाने पर हर किसी के 2019 है लेकिन अलग अलग खेमो के लिये रास्ते इतने अलग हो चुके है कि राममंदिर का जाप करने वाले और राममंदिर के निर्माण में फैसला लेने में अहम भूमिका निभाने वाले  ही आपस में लड रहे है । और यही से नया सवाल निकल रहा है कि जब राहुल गांधी की काग्रेस मंदिरमय हो चुकी है । मुसलमान खामोशी से 2019 की तरफ देख रहा है । बीजेपी की सोशल इंजिनियरिंग खुल्मखुल्ला जातिय राजनीति को उभार चुकी है । विकास का नारा पंचर हो रहा है । इक्नामिक माडल सत्ता और सत्ता से सटे दायरो को भ्रष्ट्र कर चुका है । तो फिर वह कौन सा रास्ता है जो 2019 में जीत दिला दें । जाहिर है लोकतंत्र कभी फैसला नहीं चाहता वह सिर्फ फैसले से पहले सियासी उबाल चाहता है जिससे वोटर इस भ्रम में फंसा रह जाये कि सत्ता बदलती है तो क्या होगा । या सत्ता बरकरार रहेगी तो ये ये हो जायेगा । तो फिर लौटिये राम मंदिर के उबाल पर ।
माना जा रहा है कि संघ परिवार ही अब अपने सियासी डिजाइन को लागू कराने में लग गया है । इसीलिये दिल्ली में जब अखिल भारतीय संत समीति मे राम मंदिर निर्माण के लिये धर्म सभा शुर की तो उसके पीछे संघ खडा हो गया । यानी जो संत समीति के रिश्ते संघ या विहिप से अच्छे नहीं है । उस संत समिति की दो दिनो की धर्म सभा में संघ के बेहद करीबी दो शख्स पहुंचे । पहले, प्रयाग के वासुदेवानंद सरस्वती और दूसरे पुणे के गोविंददेव गिरी । दोनो ही इस आशय से आये कि धर्म सभा अखिर में ये मान जाये कि बीजेपी की सत्ता 2019 में बनी रहनी चाहिये । और ध्यान दिजिये तो दूसरे दिन धर्म सभा ये कहने से नहीं हिचकी कि , " अगर जीवित रहना है, मठ-मंदिर बचाना है, बहन-बेटी बचानी है, संस्कृति और संस्कार बचाने है तो इस सरकार को दुबारा ले आना है ।  " तो कही नरेन्द्र मोदी का नाम नहीं लिया गया । लेकिन बीजेपी सरकार बनी रहनी चाहिये तो दो सवाल उठ सकते है । पहला, बिना मोदी इस सरकार की बात हो नहीं सकती और दूसरा बीजेपी की सत्ता बरकरार रहे चाहे माइनस मोदी सोचना पडे । तो अगला सवाल होगा क्या वाकई संघ 2019 की राजनीति को डिजाइन इस रुप में कर रही है ।और इसका जवाब संघ की नई रणनीति से समझा जा सकता है । क्योकि 1984 से 2014 तक कभी संघ ने राम मंदिर निर्माण के लिये अदालत के फैसले का जिक्र नहीं किया । यानी अदालत फैसला देगी तो भी राम मंदिर की तरफ बढेगे ऐसा ना तो 1984 में विहिप के आंदोलन शुरु करने में उभरा । ना ही 1990 में लालकृष्ण आडवाणी जब सोमनाथ से अयोध्या के लिये रथयात्रा लेकर निकले तब सोचा या कहा गया । बात तो यही होती रही कि राम मंदिर हिन्दुओ की भावनाओ से जुडा है और सरकार को आर्डिनेंस लाना चाहिये । लेकिन झटके में 2014 में नरेन्द्र मोदी ने विकास शब्द सियासी तौर पर इस तरह क्वाइन किया कि राम मंदिर शब्द ही लापता हो गया । और मोदी सत्ता के साढे चार बरस बीतने के बाद झटके में उसे उभारा गया । तो सवाल फिर दो है । संघ साढे चार बरस खामोश क्यो रही और साढे चार बरस बाद भी मोदी खामोश क्यो है और योगी राम मंदिर पर किसी बडे एलान की बात क्यो करने लगे है ।
तो यहा भी दो तथ्यो पर गौर करना जरुरी है । पहला योगी आदित्यनाथ संघ परिवार के सदस्य नहीं रहे है बल्कि सावरकर के हिन्दु महासभा से जुडे रहे है । और दूसरा संघ ने हमेशा खुद के विस्तार को ही लक्षाय माना है जिससे भारत में घटने वाली हर घटना के साथ वह जुडे या बिना उसके कोई घटना परिणाम तक पहुंचे ही नहीं । यहा कह सकते है कि राम मंदिर भी संघ परिवार के लिये एक औजार की तरह रहा है । और सत्ता भी संघ के लिये एक हथियार भर है । पर दूसरी तरफ हिन्दु महासभा पूरी तरह हिन्दुत्व का नगाडा पीटते हुये उग्र हिन्दुत्व की सोच को हमेशा ही पाले रहा है । और 2013 में जब गोरखपुर में गोरक्षा पीठ में संघ की बैठक हुई तो योगी आदित्यनाथ के तेवर राम मंदिर को लेकर तबभी उग्र थे । और संघ के लिये ये बेहतरीन माडल था कि दिल्ली में मोदी माडल काम करे और अयोध्या की जमीन यानी यूपी में योगी माडल काम करें । लेकिन अब जब 2019 धीरे धीरे नजदीक आ रहा है और जोड-धटाव मोदी सरकार को लेकर संघ भी करने लगा है तो उसकी सबसे बडी चिंता यही है कि सत्ता अगर गंवा दी तो संघ ने बीते साढे चार बरस के दौर में सत्ता से सटकर जो जो किया उसका कच्चा - चिट्टा भी खुलेगा । और अगर सत्ता गंवाने के बदले बीजेपी माइनस मोदी की सोच के सामानातंर योगी माडल उभरा जाये तो फिर 2019 में हार बीजेपी या संघ परिवार या साधु संतो की नहीं होगी बल्कि ठीकरा नरेन्द्र मोदी पर फोडा जा सकता है । जाहिर है आज की तारिख में संघ के भीतर इतनी हिम्मत किसी की नहीं है कि वह नरेन्द्र मोदी से टकराये तो दूर जवाब भी देने की स्थिति में हो । तो संघ की बिसात पर योगी माडल वजीर के तौर पर दो दृश्टी से रखा जा सकता है । पहला तो मोदी माडल के सामने हिन्दुत्व का चोगा पहने राहुल गांधी खडे नजर ना आये । दूसरा योगी माडल समाज में उबाल पैदा कर सकता है क्योकि वह कल्याण सिंह की तरह देश के सबसे बडे सूबे के सीएम है जहा भगवा बिग्रेड के इशारे तले कानून का राज रेंग सकता है । और उबाल का मतलब यही होगा कि योगी आदित्यनाथ झटके में दीपावली के दिन एलान कर दें कि वह अयोध्या की गैर विवादास्पद जमीन पर मंदिर निर्माण शुरु कर देगें । यानी देश में मैसेज यही जाये कि सुप्रीम कोर्ट को तो फैसला विवादास्पद जमीन पर देना है । पर गैर विवादास्पद जमीन पर मंदिर निर्माण का एलान करने में कोई परेशानी नहीं हो । और इसके बाद अयोध्या से दूर मोदी माडल और अयोध्या को दिल में बसाये योगी माडल बराबर काम करने लगेगें । और योगी के माडल के पीछे हंगामा करते स्वयसेवको की टोली भी नजर आने लगेगी । और तब ये सवाल कोई पूछेगा नगीं कि विवादास्पद जमीन पर जब तक फैसला नहीं आता है तबतक 67 एकड जमीन जो विवाददास्पद जमीन से सटी हुई है और पीवी नरसिंह राव के दौर में इसपर कब्जा किया गया था , दरअसल उस पर भी मंदिर निर्माण तहतक किया नहीं जा सकता है जब तक विवादास्पद जमीन पर फैसला ना आ जाये । यानी शोर-हंगामा तत्काल की जरुत है क्यकि आर्डिनेंस लाने के पक्ष में मोदी सरकार नहीं है । और इसके पीछे का वह सच है जो 1992 में बाबारी विध्यवस के बाद 1996 के चुनाव में फभर कर आ गया था । यानी तब हिन्दुत्व का उबाल पूरे यौवन पर था लेकिन तब भी बीजेपी की सरकार बन कर चल नहीं पायी । यानी जोड-तोड कर वाजपेयी ने सरकार तो बनायी लेकिन बहुमत फिर बी कम पडा तो 13 दिनो में सकतार गिर गई । पर मौजूदा वक्त में बहुमत से ज्यादा जीत मोदी सत्ता के पास है लेकिन वह मंदिर के हवन में हाथ जवाने को तैयार नहीं है । यानी संघ की जरुरत है राम मंदिर के नाम पर समाज में उबाल कुछ ऐसा पैदा हो जिसेस मोदी-योगी माडल दोनो ही चले । और ना चले तो फिर हेडगेवार को पूर्व काग्रेसी और स्वतंत्रता सेनानी बताते हुये प्रणव मुखर्जी तक को नागपुर आमंभित किया ही जा चुका है यानी सत्ता पर काबिज रहने की जोड-तोड 2019 तक चलती रहेगी यह मान कर चलिये । 

7 comments:

Abhishek Gupta said...

बिलकुल सही सत्ता के लिए तो किसी हद तक भी जा सकते है ..

HARSHVARDHAN said...

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन धन्वन्तरि दिवस, धनतेरस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

Unknown said...

बिल्कुल सटीक विश्लेषण किंतु यथा वादियों नियत को नियती मानने वालों को जानें होश कब आएगा?

ROHIT RAI said...


मोदी ने आडवाणी की गलतियों से सबक लेते हुए और कांग्रेस पार्टी का मुस्लिमो के प्रति झुकाव का फायदा उठाते हुए अनेक हिंदूवादी भाषण दिए जिनमे कुत्ते से लेकर कुछ भाषण अत्यंत विवादित भी हुए। हिन्दुओ को मोदी में एक ऐसे नेता की छवि दिखाई दी जो स्पष्ट रूप से उनका हिमायती था इस कारण अपेक्षा की गई की सरकार बनने के बाद जल्द ही राम मंदिर मुद्दे को सुलझा लिया जायेगा।

लेकिन कहते है की दूर के ढोल सुहावने होते है। मोदी सरकार बनने के बाद मंदिर मुद्दे को कोर्ट के पाले में डाल दिया गया और अन्य मुद्दों की तरह इसको उचित समय पर इस्तेमाल करने के लिए छोड़ दिया गया ।
अब आम जनता जब सरकार से उसके चार सालो के कार्यो का लेखा जोखा मांग रही तब इस मुद्दें को एक बार फिर हवा देने की कोशिश की जा रही है यही वजह है की गिरिराज सिंह जैसे नेताओं के बयान आना शुरू हो चुके है।
अभी बयान में आगे रहने वाले नेताओ द्वारा जनता को उकसाना जारी रहेगा । कुछ फिल्मे आएँगी इस मुद्दे पर , कुछ पेड उलेमाओ के भी बयान आएंगे , कुछ प्रवक्ता न्यूज़ चैनलों पर मंदिर बनाते दिखेंगे , परन्तु उनके द्वारा सरकार से नहीं पूछा जायेगा की मंदिर कब बनेगा ? और सरकार कभी कोर्ट तो कभी सत्ता की दुहाई देती रहेगी और रामलला को उनके बनाये संसार में सिर्फ तारीख पे तारीख ही मिलती रहेगी पर अपना घर नहीं।

Anil Saraswat said...

राम मंदिर का मुद्दा नया तो कतई नहीं है। नया किया भाजपा ने। जो भी संगठन हिन्दू वर्ग के हैं, वह भाजपा को सत्ता में लाने के लिए "राम मंदिर" को जनमानस के सामने चुनाव के समय ही लाते हैं। भाजपा ने 2014 में सत्ता हासिल की। 2014 के चुनाव में भी "राम मंदिर" बनाने का जिक्र घोषणा पत्र के साथ मोदी ने हर सभा में किया। सत्ता का सुख साढ़े चार साल तक भोगने के बाद जब चुनाव फिर सामने आये तो हिन्दू वर्ग के संगठन को फिर से उकसा दिया, आगे कर दिया। इन साढ़े चार वर्षों में भाजपा सरकार और संगठन न्यायालय के फैसला आने के बाद ही मंदिर निर्माण की पैरोकारी करते रहे। न्यायालय के फैसले के बाद मंदिर बने इसे देश का कौन सा राजनीतिक दल स्वीकार नहीं करता। कांग्रेस का कहना भी यही है कि न्यायालय के फैसले के बाद राम मंदिर बनाया जायेगा। सत्ता पाने के बाद भाजपा भी यही कहती है। प्रश्न यह उठाता है कि भाजपा, कांग्रेस के इतर कौन सी नई बात कह रही है। भाजपा राम मंदिर के नाम से देश के हिन्दू वर्ग को उकसाती है। कांग्रेस या अन्य राजनीतिक दल ऐसा नहीं करते। भाजपा झूठ का सहारा लेती है, जबकि अन्य दल देश की जनता से झूठ नहीं बोलना चाहती।
1914 में देश के मतदाता ने भाजपा को भरपूर समर्थन दिया। यहाँ तक कि 20 वर्ष में पूर्ण बहुमत की सरकार नहीं बनी थी। मोदी ने समूचे देश में विकास का नारा देकर आमजन को ठगा। मोदी सरकार ने देश में विकास तो किया ही नहीं बल्कि आमजन को गलत नीतियां लागू कर हर तरह से परेशान कर दिया। अब 2019 के चुनाव में भाजपा विकास व सुविधाओं के आधार पर जीत नहीं सकती लिहाजा फिर राम मंदिर का मुद्दा समर्थक दलों से सामने खड़ा कर दिया। भाजपा समर्थक व्यक्ति तो यह कह रहा है कि 2019 में मोदी की सरकार ही बननी चाहिए। तब ही मंदिर निर्माण होगा। अर्थात भाजपा की सरकार नहीं मोदी की सरकार चाहिए। राहुल गाँधी मंदिर जाते है तो भाजपा और समर्थक दलों को तकलीफ होती है। उसे मुसलमान सिद्ध करने पर पूरी ताकत से भाजपा और सहयोगी दल तुल जाते हैं। मंदिर जाने के लिए क्या भाजपा और समर्थक दलों की अनुमति लेना जरुरी है। भाजपा और सहयोगी दल को हिन्दू धर्म का ठेका किसने दे दिया? यह कब से और किस आधार पर हिन्दू धर्म के पैरोकार हो गए। यह तो सर्वोत्तम कार्य है कि एक इंसान और हिन्दू धर्म से जुड़कर मंदिर जाने लगा। बेतरीन से बेहतरीन यह है कि "अन्य मजहब के व्यक्ति भी मंदिर जाएं।"
यह सिला लेख है कि जितनी सीटें 2014 के चुनाव में भाजपा को मिलीं थीं, उतनी सीटें 2019 के चुनाव में कितने भी जतन करने के बाद नहीं मिलने वालीं हैं। राम मंदिर के नाम से कितना भी उन्माद खड़ा किया जाये। यह जुड़ा तथ्य है कि योगी विवादित जमीन से हटकर कहीं और मंदिर बना लें। जब रामलला जी का मंदिर जन्म स्थान पर नहीं बनेगा तो वह वर्ग कैसे मानेगा कि राम मंदिर का निर्माण हो गया। अंजाम देखिये जितने भी संगठन मंदिर बनाने के लिए उतारू हैं सभी में मतभेद है, मंदिर निर्माण को लेकर। उल्लेखनीय तो यह है कि बाबरी मस्जिद का ढांचा गिराने की घटना में निर्दोष आमजन ही मारा गया था। जितने भी तथाकतिथ नेता थे एक को भी खरोंच तक नहीं आई थी। इस बार फिर उन्माद का वातावरण बना तो आमजन ही शिकार होगा। एक भी नेता को खरोंच नहीं लगेगी। कहावत है कि "शहीद तो हों पर पड़ौसी के घर से।" यही कहावत लागू होती है रामजी के मंदिर पर उन्माद फैलने वालों पर।

Tabrej Alam said...

Good job.

Mantosh Mahakal said...

Thanks