Sunday, November 16, 2008

मस्त लोगों के मरे हुये मन

नोट-आज 16 नवंबर, प्रेस दिवस है। ये लेख उसी उपलक्ष्य में लिखा गया है।

6 जून 1981 को बिहार की बागमती नदी में समस्तीपुर-वनमंखी पैसेंजर गाड़ी के सात डिब्बे टूट कर गिर गये । उस समय दिनमान के संपादक रघुवीर सहाय ने अपने संपादकीय में लिखा-
" रेल दुर्घटना की खबर ने उन्हे छोड़, जिन के अपने सगे उस गाडी में थे, किसी को विचलित नहीं किया।" संपादक के नाम एक ऐसे पत्र को दिनमान की कवर स्टोरी का हिस्सा बनाया, जिसमें इस घटना को एक भयानक राष्ट्रीय विपत्ति बताया गया था। यह वाकया इसलिये याद आ गया दो महीने पहले बिहार में ही कोसी नदी ने जब अपनी धारा बदली तो सात जिलो के दो लाख लोगो को लील लिया। लेकिन किसी अखबार-पत्रिका या न्यूज चैनल की कवर या मुख्य स्टोरी यह तब तक नहीं बन पायी जब तक प्रधानमंत्री ने इसे राष्ट्रीय विपदा नही बताया।

दिल्ली के किसी समाचार-पत्र को पढ़ कर बिहार के हालात की जानकारी किसी को नही मिल सकती थी । न्यूज चैनलों ने भी एक हफ्ते तक प्राइम टाइम में इस खबर को छूने की हिम्मत नही दिखायी। उन्हें इसकी टीआरपी न मिलने का डर था। यानी 1981 के बाद देश के विकास और मीडिया के आधुनिकीकरण में लगे 27 सालो में हर शख्स अकेला ही होता जा रहा है। 27 साल पहले हजारों अकेले आदमियों की मौत हुई थी और 2008 में लाखों अकेले आदमी मरे नहीं लेकिन इस या उस दौर में सरोकार का मीडिया, मुनाफे के मीडिया में बदल गया।

दरअसल खुले बाजार ने महज मुनाफे की थ्योरी को समाज और आर्थिक तौर पर ही नही परोसा बल्कि राजनीति और मीडिया को एक साथ सरोकार की भाषा छुड़वाने की स्थितियां बना दीं। इस दौरान मीडिया सबसे रईस होकर उभरा तो उसके भीतर सत्ता के करीब होने की ललक बढ़ी। लेकिन बाजार व्यवस्था का प्रभाव महज बिजनेस के रुप में मीडिया पर पड़ा, ऐसा भी नही है । लोकतंत्र का जो पाठ संसदीय राजनीति ने नीतियों के जरीये देश के सामने रखा, उसमें निजी शब्द हावी होता चला गया। खासकर निजी का मुनाफा ही निजी की सुरक्षा हो गयी । सत्ता के सामने अपने हक की लड़ाई के मायने तक बदलने लगे। जब आम आदमी का विकास एक दूसरे के हक को छीनकर परिभाषित होने लगा तो जिसका पेट भरा था या जो मुनाफे की पायदान पर सबसे ऊपर खड़ा था, उसने अपने आपको लोगो से काटकर सत्ता के अनुकुल करना ही बेहतर समझा। हकीकत मे लोकतंत्र की यह परिभाषा राज्य ने ही गढ़ी जिसने अपनी भूमिका एजेंट भर की रखी तो मीडिया भी इससे हटकर नही सोच पाया ।

1991 से लेकर 2008 तक के दौरान आर्थिक सुधार को लेकर जो भी नीतियां राज्य ने अलग अलग सरकारों के दौर में रखीं, उसे बिजनेस मीडिया {आर्थिक अखबार-बिजेनेस चैनल } ने कभी खारिज नही किया । मीडिया भी नीतिगत तौर पर सत्ता के करीब ही हुआ क्योंकि लोकतंत्र की परिभाषा बदली थी तो चौथे स्तभं को लेकर भी नयी व्याख्या सरकार के नजरिये से नजर मिला कर चलने की ज्यादा हो गयी। मीडिया को आर्थिक तौर पर चलाते हुये मुनाफा बनाना पूरी तरह सत्ता पर टिका क्योंकि मीडिया इस डेढ़ दशक में सरोकार के सूचना तंत्र से ज्यादा सूचना तंत्र का बिजनेस बन गया ।

इसकी सुरक्षा मीडिया को मुनाफे के तौर पर मिली यह भी सच है। यह समझ ठीक उसी तरह विकसित हुई, जैसे थोड़ी से भी सुरक्षा पाते ही एक भारतीय आदमी अपने को इतना अधिक सत्ता के नजदीक समझने लगा है कि उसका सोचने का ढंग उसी तरह मानव विरोधी और निर्मम हो जाता है, जैसा शासक वर्ग का है। इस के पीछे कही ना कही यह विचारधारा भी काम कर रही है कि देश की सामाजिक व्यवस्था को न्याय के पक्ष में बदलने में आम नागरिको का कोई हाथ हो नही सकता । वह तो केवल सत्ता के शीर्ष स्थानों पर बैठे लोगो द्रारा बदली जायेगी। जो लोग समाज को बनाने में अपने मौलिक अधिकारो को छोड़ चुके हैं, वे सह्हदय भी नही हो सकते । यही होंगे तो केवल अपनी इकाइयों के साझीदार के लिये, जाति के लिये, संप्रदाय के लिये या परिवार के लिये होगे।

मीडिया इस समझ से अछूता है ऐसा भी नही है। इसलिये इस दौर में जिस तरह की खबरों को परोसा जा रहा है या जिस तरह से परोसा जा रहा है वह निजी मुनाफे और सत्तानूकुल बने रहने के सच से हटकर कतई नहीं है। इसका दूसरा पहलू यह भी है कि राष्ट्र की संपत्ति से लेकर औघोगिक और सामरिक समृद्दि तक में देश के लोगों की और संस्थाओ की भागेदारी गायब हो रही है। वह खुले बाजार की तरह सीमापार की करेंसी तक पर जा टिकी है। मीडिया भी इससे अछूता नही है। एफडीआई का कितना फीसदी मीडिया के विस्तार में लगाया जा सकता है, यह सरकार और मीडिया के बीच समझौते का नया पहलू है।

शायद इसीलिये किसानों की आत्महत्या से लेकर आंतकवाद छाया और उस पर सांप्रदायिक राजनीति के आसरे सत्ता चमकाने के तथ्यों को नजरअंदाज कर बाजार की शानोशौकत से लेकर हंसी ठठा का खेल अखबारों से लेकर न्यूज चैनलो में नजर आता है। उसमे यह कहने से गुरेज नही किया जा सकता कि मीडिया के मन में समाज और राष्ट्र की वह कल्पना मर चुकी है, जिसमें यह संभव हो की सत्ता के संवेदनहीन होने पर मीडिया की खबर समूचे देश को सचेत कर दे।

21 comments:

विवेक सिंह said...

शुक्रिया मुझे पता नहीं था आज प्रेस दिवस है . मेरा जन्मदिवस भी है आज . अब मुझे प्रेस दिवस भी याद रहेगा.

सतीश पंचम said...

पत्रकारिता के इस मर्ज को आप भी समझ रहे हैं और जो पत्रकार नहीं हैं वह जनता भी, लेकिन विडंबना यह है कि इस मर्ज की दवा कोई नहीं करना चाहता क्योंकि मर्ज बने रहने में अब शायद लोगों को मजा आने लगा है।
प्रेसदिवस पर ऐसी ही किसी पोस्ट की उम्मीद थी।

indrajeet said...

प्रसून जी, मैं आपका बहुत बड़ा प्रशंसक रहा हूँ. आज आप ने जो भी लिखा है, वह असलियत के बेहद क़रीब है. समाज में आम लोगों की मानसिकता में आज बहुत बड़ा बदलाव आया है. एक असुरक्षा की भावना आई है. उद्दंडता आई है. लोग एक दूसरे से 'देख लूँगा' के अंदाज में बात करने लगे है. जैसा कि आपने कहा कि आर्थिक रूप से सुरक्षित होते ही लोग सत्ता के नजदीक होने लगते हैं. आम लोगों को वो अलग नजरों से देखने लगते है. यह सत्ता के शीर्ष पदों पर बैठे शासक वर्ग की सोच को दर्शाता है. यह सच ही है, कि अगर सुरक्षा कही है, तो वो सत्ता के करीब होने में ही है. विभिन्न राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओ की सोच देखिये - जब वे अपने दल के लिए चुनाव प्रचार कर रहे होते हैं, वे आम आदमियों को रोंदते हुए चलते हैं. आम आदमियों के लिए असभ्य भाषा का प्रयोग करते हैं. ये जानते हुए भी कि यही आम आदमी उसे वोट देगा. वह ऐसा इसलिए करता है क्योकि उसे पता है कि वे कुछ भी बोल लें, कैसा भी व्यवहार कर लें, उनका कोई कुछ नही बिगाड़ सकता. और वोट तो उनको मिलेंगी ही. क्योंकि आम आदमी कुछ भी बनना पसंद करेगा पर पप्पू बनना पसंद नही करेगा(वैसे वो पप्पू ही है).

indrajeet said...

प्रसून जी, मैं आपका बहुत बड़ा प्रशंसक रहा हूँ. आज आप ने जो भी लिखा है, वह असलियत के बेहद क़रीब है. समाज में आम लोगों की मानसिकता में आज बहुत बड़ा बदलाव आया है. एक असुरक्षा की भावना आई है. उद्दंडता आई है. लोग एक दूसरे से 'देख लूँगा' के अंदाज में बात करने लगे है. जैसा कि आपने कहा कि आर्थिक रूप से सुरक्षित होते ही लोग सत्ता के नजदीक होने लगते हैं. आम लोगों को वो अलग नजरों से देखने लगते है. यह सत्ता के शीर्ष पदों पर बैठे शासक वर्ग की सोच को दर्शाता है. यह सच ही है, कि अगर सुरक्षा कही है, तो वो सत्ता के करीब होने में ही है. विभिन्न राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओ की सोच देखिये - जब वे अपने दल के लिए चुनाव प्रचार कर रहे होते हैं, वे आम आदमियों को रोंदते हुए चलते हैं. आम आदमियों के लिए असभ्य भाषा का प्रयोग करते हैं. ये जानते हुए भी कि यही आम आदमी उसे वोट देगा. वह ऐसा इसलिए करता है क्योकि उसे पता है कि वे कुछ भी बोल लें, कैसा भी व्यवहार कर लें, उनका कोई कुछ नही बिगाड़ सकता. और वोट तो उनको मिलेंगी ही. क्योंकि आम आदमी कुछ भी बनना पसंद करेगा पर पप्पू बनना पसंद नही करेगा(वैसे वो पप्पू ही है).

prabhat gopal said...

सर. आज आपने काफी गंभीर बात कही है। जो व्यक्ति जिस क्षेत्र का होता है, उसकी कमजोरी और मजबूती को ज्यादा गहरे तौर पर जान पाता है। आज का मीडिया पूरी तरह मुनाफे पर केंद्रित होकर रह गया है। मुनाफे की दृष्टि से भी यह वैसा ही उत्पाद देता है, जैसे उसे खरीदनेवाले चाहते हैं। खरीदनेवाले गरीब नहीं, बल्कि अमीर ही हैं। इसलिए मीडिया भी जनसरोकारों से दूर हो गया है। उसे आम आदमी के जीवन में घट रही गतिविधियों से ज्यादा बिजनेस, सत्ता और सेंसेक्स की खबरों में रुचि रह गयी है। खबरों का दायरा बढ़ा है। लेकिन सामाजिक ढांचे में शीषॆ स्थान पर बैठे लोगों की खबरों को प्राथमिकता ही आज-कल दी जा रही है। जरूरत मीडियावालों को ही माइंडसेट बदलने की है। अगर मीडियावाले थोड़ी पहल करें, तो परिस्थिति में कुछ बदलाव आ सकता है।

डॉ .अनुराग said...

दरअसल इस वक़्त ये पूरे सामाज का एक नैतिक समझौता है...घटनाओं को अपने अपने नजरिये से देखने का ओर उनके निष्कर्ष निकालने का......ओर ..मीडिया समाज का ही हिस्सा है....जरुरत उन सामाजिक मूल्यों ओर सवेदनाओ की ओर वापस लौटने की है जो हमसे खोती जा रही है.....जरुरत उन्हें थामे रखने की है.....जिम्मेदारी भागीदारी ..ओर सामाजिक सरोकार सिर्फ़ मीडिया की जिम्मेदारी नही है ....हम सब की है....बस उन पर अतिरिक्त है.

sunil manthan sharma said...

सही कहा, सरोकार का मीडिया, मुनाफे के मीडिया में बदल गया है.

सुरेन्द्र Verma said...

Prashun Ji
Mujhe to lagata tha ki media mein rahate media ki khas weakness ko koi ujagar nahi karega kintu apne sahas to kiya. Apake is prayas ke liye apko kotishah DHANYABAD.
Bihar mein mujhe yaad hai jab lalu ji CM the to roj din unki taswir akhwaron mein chhapti thi-ek din mujhse raha nahi gaya maine asthaniye sampadak se kaha- "Aplog lalu ji ka taswir shouchalay jate ya karate logon ko dikhayen" jawab mila mila -Agar sampadak nahi hota to main bhi inka wirodh karata.
Matlab saaf hai ki log Satta ke nikat rahana pasand karate. Mere samajh se aise log apni lekhani ko viram de rahe hai...........

savita verma said...

media me abhi bhi kuch bacha hua hai khasker print aur web me.yeh khatam bhi nahi hone vala.jansatta udaharan hai.

हिमांशु शेखर said...

par aham sawal ye hai ki aakhir ye sab kab tak chalta rahega? Aakhir kabhi na kabhi aur kisi na kisi ko to aagaaz karna hi hoga.

SAROKAR said...

शुक्र है कि यहां TRP का लोचा नहीं है............... वरना यह लेख भी पढ़ने को नहीं मिलती।

Vidhu said...

इसीलिए आम आदमी मैं भ्रष्टताकतों के खिलाफ लड़ने की क्षमता का विकास गहरे से नही हो पाटा मीडिया की अपनी कमजोरियां हैं ढेरों सवालों के बीच आदमी की छोटी जरूरतों और उनके हल लगातार बडी और मुश्किल होतें जा रही है

swapnila said...

KISE FURSAT KI KOI RUK KAR DES KE BARE ME SOCHE...CHAUTHA STAMBH..JO MATR PRTIK BAN KAR RAH GAYA HAI..AAP USI MEDIA KA HISSA HAI..PAR KASMKAS AAPKE BHITAR PAHLE JAISI HI HAI....AAP KYA KUCH BADAL SAKTE HAI..?KABHI GAUR SE AAJ KI GENERATION KO DEKHA HAI..JANTE TO AAP JAROOR HONGE..27 SAL..THIK KAHA..SAVENDEHINTA KA WO DAUR AAJ APNE SABAB PAR HAI ....KALAM ME BAHUT TAKAT HOTI HAI..AUR AAPKI BAT KI JAYE TO AAP JAISA SIDHA SANWAD KOI ISTHAPIT NAHI KAR PATA....AKHBAR KO BHI AAPKI JAROORAT HAI..JISKI MAHAK AAJ BHI AAP MAHSOOS KARTE HAI..

akhil said...

sahi likha hai ap ne prasun sir ab media bus kahne bhar ke liye hi Loktantra ka chautha stambh hai....

Kapil said...

लाखों रूपये के पैकेज और सत्‍ता से नजदीकी के बावजूद जनसरोकारों के मीडिया के खत्‍म होने का अहसास होना सुखद होते हुए भी काफी नहीं है। सवाल यह है कि जनसरोकारों का मीडिया पैदा कैसे होगा। जाहिरा तौर पर आज के मुख्‍यधारा के मीडिया के वर्गचरित्र को भूलकर कुछ भी सोचा नहीं जा सकता। इतिहास में जनसरोकारों का मीडिया बदलाव का ध्‍वजवाहक रहा है। गणेशशंकर विद्यार्थी का प्रताप इसका उदाहरण है। आपने समस्‍या की तरफ इशारा तो सही किया है, लेकिन समाधान की ओर भी इंगित करना चाहिए।

vipin dev tyagi said...

ये सच है कि मौजूदा दौर में मीडिया खासतौर पर टीवी न्य़ूज चैनलों को आम आदमी की सिसकियों से ज्यादा सिक्कों की खनक सुनायी देती है..उसूल,सच,मान्यताएं...टीआरपी की सूईं पर आकर अटक जाती हैं..आम आदमी का दर्द,तकलीफ न्यूज चैनलों पर कम ही आता है....बोरवेल में गिरे बच्चे इनदिनों टीवी पर जरूर आते हैं..टीआरपी लिस्ट में इनका गिरना और दर्शकों का देखना शामिल हो गया है..चनावी माहौल में न्यूज चैनल दिखाते हैं..मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार नाश्ते में क्या-क्या खाते हैं,प्रोटिन,विटामिन कितनी मात्रा में लेते हैं..भले ही देश की बीस फीसदी से ज्यादा आबादी अब भी भूखी सोती है,दो जून की रोटी का जुगाड़ नहीं हो पाता..लेकिन दर्शकों को क्या मालूम नेताजी के नाश्ते के पीछे..किस तरह के नाश्ते का इंजताम हो सकता,हुआ होगा..लेकिन ऐसा नहीं कि न्यूज चैनल सिर्फ जो दिखता है वो बिकता है,वाली खबरें दिखाते हैं..जेसिकालाल,प्रियदर्शनी मट्टू,नीतिश कटारा हत्यकांड,बीएमडब्ल्यू कांड में सरकारी और आरोपी के वकील के बीच सेटिंग,घूसमहल इंकटम टैक्स ऑफिस,सवाल के बदले नोट,सासंद निधी का सौदा करते सांसद,सहित दर्जनों ऐसे मामले हैं..जिनमें न्यूज चैनलों ने सच दिखाने में सच के लिये लड़न मे अहम भूमिका निभायी.सच के लिये आवाज उठायी..इंसाफ दिलाया...न्यूज चैनलो में सेवा के बदले मेवा काफी मोटा मिलने लगा है..बहुत सारे लोगों को महीने की तनख्वाह लाखों में मिलती है..मैनेजमेंट को इतनी बड़ी सैलरी के लिये कही बार,कई जगहों पर समझौते करने पड़ते हैं..मार्केटिंग वालों के हिसाब से खबर लेनी और चलानी पड़ती है...टीआरपी भगवान के सामने झुकना पड़ जाता है...आम आदमी फ्रेम से बाहर चला जाता है..लेकिन तमाम खामियों और समस्याओं के बावजूद कई न्यूज चैनल(टीवी की बात इसलिये क्योंकि थोडे ही समय से सही टीवी पत्रकारिता में हूं),उनके प्रोडयूसर,रिपोर्टर,संपादक,अच्छी खबरें और प्रोग्राम दिखा रहे हैं..सच दिखा रहे हैं..आम आदमी की आवाज और चेहरे उनकी खबरों में शामिल है..आगे और बेहतर तरीके से होगें..

रंजीत said...

samasya to samajh me aatee hi lekin samadhan kee koi tasveer najar nahin aattee. aj kosi me kya ho raha aap aur ham koi nahin jaan sakte, aaj kee patrakarita aisee hi hai,kal kee kasee hogee ? agar andar se badlaw nahin aaya to bahar se unhen badalne ke liye majboor kiya jayega, wah drishya shayad vibhatsa hoga.
ek correction- 1981 me Dhamara pul se wah railgadee KOSI me giri thee na ki Bagmati me.

murar said...

प्रसून जी,कड़वी लगने लगी पत्रकारिता की पत्ती- पत्ती,
लगता है हर एक पत्रकार सांप का डसा हुआ है.
कमल का जाने कैसा आकर्षण है ,
हर सूरज सिर, तक कीचड़ में धंसा हुआ है

गिरीश बिल्लोरे said...

वाह
प्रेम दिवस पर सार्थक पोस्ट
1. ब्लाग4वार्ता :83 लिंक्स
2. मिसफ़िट पर बेडरूम
लिंक न खुलें तो सूचना पर अंकित ब्लाग के नाम पर क्लिक कीजिये

ZEAL said...

.

जानकार प्रस्संनता हुई की कुछ लोगों में संवेदनशीलता अभी बची हुई है। निस्वार्थ होकर अपने कर्तव्यों में लगना चाहिए मीडिया कर्मी को भी । सिर्फ चटपटी खबरें , कुछ अटपटी लगती हैं। आज का प्रबुद्ध समुदाय बिना गरिमा की पामेला ,सारा, अली , खली में रूचि नहीं रखता।

एक सार्थक लेख के लिए बधाई।

.

murar said...

!! मीडिया जब व्यापार है तो व्यापार का आचरण और बाज़ार का व्याकरण. जो बिके वह समाचार तो जो बेचे यानी समाचार का दूकानदार ही होगा पत्रकार