Wednesday, November 5, 2008

आम्बेडकर से मायावती और लूथर किंग से ओबामा का सपना

अमेरिका में बराक ओबामा की जीत एक ऐसा इतिहास रचने को तैयार है, जिसका सपना कभी मार्टिन लूथर किंग ने देखा था। अप्रैल 1963 में जब ओबामा की उम्र दो साल रही होगी, उस वक्त मार्टिन लूथर किंग ने वाशिंगटन में करीब ढाई लाख लोगों की मौजूदगी में हक और बराबरी का सवाल खड़ा किया। अपने सोलह मिनट के भाषण में मार्टिन लूथर ने श्वेत-अश्वेत के बीच खिंची लकीर को मिटाने से लेकर दुनियाभर में चल रहे मानवाधिकार संघर्ष को एक ऐसी आवाज दी, जिसे पहली बार अमेरिका समेत समूची दुनिया ने महसूस किया कि लूथर एक ऐसा सपना दिखा रहे हैं जिसे हकीकत में बदलना चाहिए। मगर यह सपना ही है क्योंकि यह आवाज उस ताकतवर देश से उठी है जो खुद कई लकीर समूची दुनिया में खींचे हुए है।

लेकिन बीसवीं सदी में हाशिये पर पड़े इस सपने को इक्कीसवीं सदी में कोई मुख्यधारा में ले आयेगा, यह लूथर किंग ने भी नही सोचा होगा। अमेरिकी अश्वेतों को सपना दिखाने के महज 45 साल बाद बराक ओबामा उसी सपने को पूरा कर इतिहास रचने को तैयार हैं। दरअसल जिस दौर में मार्टिन लूथर किंग ने बराबरी का सपना देखा था, उस दौर में भारत में बाबा साहेब आंबेडकर ने सपना देखा। लूथर किंग के ऐतिहासिक भाषण से सात साल पहले अक्तूबर 1956 में आंबेडकर ने नागुर में करीब दस लाख लोगों की मौजूदगी में धम्मचक्र परिवर्तन को लेकर जो कहा, वह भारतीय समाज में बराबरी के सपने से आगे खुद को संघर्ष के लिये तैयार करने का सपना था। जातीय आधार पर बंटे समाज और धर्म के आसरे भारत का नागरिक होने का जो गर्व हिन्दू अपनी छाती पर तमगे की तरह गाढ़े हुए था, उसे बाबा साहेब आंबेडकर ने चुनौती दी। चुनौती ही नहीं, बल्कि उसके सामानातंर दलित समाज को अपनी अस्मिता, अपनी पहचान को बिना गिरवी रखे हक और बराबरी का जो बिगुल बजाया उसने हिन्दुस्तान की राजनीति में एक ऐसा बीज बो दिया जो कालातंर में पनपा तो राष्ट्रीय राजनीतिक दलों को सुरसा की तरह निगलता गया।

कमोबेश श्वेत-अश्वेत को लेकर संघर्ष का जो चेहरा लूथर किंग की 1969 में हत्या के दौर में था, उसने अमेरिकी समाज को लूथर के सपनो के आसरे पूरी तरह बदल भी दिया। लेकिन अमेरिका में किसे पता था कि ओबामा जब लूथर के सपनों को मुख्यधारा में लाएंगे तो वह विचारधारा सपनों में बदलते दिखेगी, जिसपर अमेरिकी समाज ने अपनी जीत कई दशकों पर दर्ज कर ली थी। विलासिता के आसरे विचारधारा रख कर नई विश्व व्यवस्था का सपना संजोए अमेरिका में रोटी-कपड़ा और मकान को पूरा करने की थ्योरी मुंह बाए खड़ी होगी, किसने सोचा होगा! बुश की सोच को आगे बढ़ाने के लिए तैयार रिपब्लिकन मैककेन का नारा यही है, पहले देश। जिसमें सुधार-खुशहाली-शांति की बात है। यह नारा उस वक्त लगाया जा रहा है, जब अर्थव्यवस्था के ढहने से अमेरिकी खुशहाली बदहाल हो चली है। सुधार की बाजार व्यवस्था को संभालने के लिये सरकार को जनता के पैसे का सहारा लेना पड़ रहा है। और आंतकवाद के खिलाफ अमेरिकी कार्रवाईयों ने अमेरिका की ही शांति में सेंध लगा दी है। वहीं आंबेडकर जब बराबरी और हक का सपना संजोये थे और नागपुर में धम्म परिवर्तन कर रहे थे उस दौर में मायावती की उम्र महज नौ महीने की थी। कांग्रेस के बार बार हाशिए पर ढकेले जाने के दौर में अंबेडकर ने पहले कांग्रेस को पहले जलता हुआ घर करार दिया और फिर दलितों को यह सपना दिखाया कि उनके हाथ में सत्ता हो। शिक्षा और रोजगार को दलित की अस्मिता से जोड़कर आंबेडकर ने जाति और धर्म की उस दीवार को तोड़ना चाहा, जिसके अंदर घुट-घुट कर दलित की मौत हो जाती है। आंबेडकर का सपना दलित को उस मुख्यधारा से जोड़ना था, जहाँ से दलित-नीति बनने का सवाल सत्ता खड़ा करती है। आंबेडकर का मानना थी कि बराबरी का तरीका बदलना होगा और मापदंड भी, क्योंकि कोई दलित होकर ही दलितों की मानसिकता को समझ सकता है। इसलिये संविधान में आरक्षण का सवाल जोड़ा गया, जिससे एक ही देश में दो परिस्थितियो में पनप रहे दो समाजों में तालमेल हो सके।

मार्टिन लूथर किंग की तरह आंबेडकर ने भी नहीं सोचा था कि बीसवीं सदी के उनके सपने सत्ता की मुख्यधारा में तो इक्कीसवीं सदी तक आ ही जाएंगे, लेकिन जिन परिस्थियों में देश जवान हो रहा है वही स्तम्भ ढहने लगेगा। अमेरिकी राजनीति में यह पहली बार है कि कोई शख्स राष्ट्रपति पद की दावेदारी में अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अपनी राजनीतिक शुरु कर रहा है। अभी तक राष्ट्रपति पद आखिरी पद माना जाता था। इसलिये ओबामा को लेकर अमेरिका में ही नहीं, समूची दुनिया में एक नये सपने को रचने की बात भी हो रही है। क्योकि संयोग से अमेरिका पहली बार उस दोराहे पर खड़ा है, जहाँ उसकी बनायी दुनिया पर ही संकट के बादल हैं। और वह विचारधारा मटियामेट हो रही है जिसके कंधो के आसरे हर अमेरिकी गर्व कर विकसित और विकासशील देशों की टोली को अपनी ओर लालायित करता था। साथ ही दुनिया के हर पूंजीवादी संस्थान पर उसकी पैठ रहती थी। ऐसे वक्त ओबामा के सामने भी लूथर किंग के देखे गये सपनों से कहीं बड़ा सपना देखने और पूरा करने का भार है। क्योंकि ओबामा को कुछ ऐसा रचना है जो अभी तक सोचा नहीं गया है। हालाँकि अमेरिकी चुनाव में 80 साल बाद पहला मौका आया है जब राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति पद के सभी उम्मीदवार नये हैं। लेकिन ओबामा के जरिये जिस स्क्रिप्ट का इंतजार दुनिया को है, वह श्वेत-अश्वेत से कहीं आगे है। आंबेडकर के सपनों को लेकर, उनकी मौत के बाद कई दशकों से यह सवाल भारत में भी गूंजता रहा कि आंबेडकर के सपने भारतीय राजनीति की मुख्यधारा का हिस्सा कब और कैसे बनेंगे? आंबेडकर की सोच और कांशीराम के सांगठनिक समझ के कंधो पर चढ़कर मायावती ने आंबेडकर के सपनो को मुख्यधारा में ला तो खड़ा किया, लेकिन जब बात सपनों को पूरा करने की आयी तो वह राजनीति ही भरभराकर गिरती जा रही है जिसके आसरे आंबेडकर ने सपना देखा था। बीसवीं सदी में देखा गया आंबेडकर का सपना इक्कीसवीं सदी में जब पूरा होने को आया तो उस राजनीति को संभालना ही सबसे बड़ा सपना हो गया. जिसे आंबेडकर ने मजबूत मान लिया था। ठीक उसी तरह जैसे लूथर किंग ने अमेरिकी व्यवस्था को मजबूत मान लिया था। लेकिन ओबामा और मायावती का सच उस व्यवस्था की पूरी होती उम्र का भी प्रतीक है जिसने दोनो को कभी हाशिये पर रखा। अमेरिका के राजनीतिक इतिहास में पहला मौका आया जब किसी राजनीतिक दल ने एक अश्वेत को उम्मीदवार बनाया। भारत में पहला मौका आया जब अपने बूते कोई दलित बहुल पार्टी किसी राज्य में सत्ता बना बैठी और उसकी अगुवाई भी दलित ने ही की। अमेरिका में इससे पहले अश्वेतों को लेकर नीतियाँ बनती थीं। हर राष्ट्रपति पद का दावेदार समाज में भागीदारी या सुविधा-असुविधा को लेकर कोई-न-कोई प्रस्ताव ले कर आता ही था। लेकिन पहला मौका है कि श्वेत-अश्वेत की बहस अमेरिकी समाज में बेमानी लगने लगी है। राजनीतिक तौर पर वोट का बंटवारा नस्लीय आधार पर पिछड़ा होने का प्रतीक माना जाने लगा है। ओबामा को समाज ही नहीं, देश पाटने वाला शख्स भी माना जा रहा है।

पार्टी लाइन पर चलते हुये सभी को साथ लेकर चलने वाला डेमोक्रेट ओबामा को माना जाता है। उसके अपने वोट बैंक में सेंध लगाने की ना तो मैक्कन ने सोचा, ना ही रिपब्लिकन ने सोचा। वहीं भारत में मुख्यधारा की राजनीति में दखल के बाद मायावती की दलित राजनीति में सेंध लगाने की किसी राजनीतिक ने नहीं सोची। बल्कि मायावती के साथ हर राजनीतिक दल ने तालमेल किया। कांग्रेस-बीजेपी-सपा तीनों दलों ने अपने-अपने मौके ताड़कर मायावती का साथ लिया। और ऐसे वक्त जब केन्द्र में ही नहीं बल्कि राज्यों की राजनीति भी गठबंधन के सहारे सत्ता पाने की जोड़तोड़ में आ चुकी है, तब देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में अपने बूते सत्ता पाना आंबेडकर के सपने का सच होना नहीं है बल्कि उस राजनीति में ही सेंध लगना है जो आमजन के भरोसे पर लोकतंत्र का एहसास करा रही थी। इसीलिये भारतीय राजनीति में मायावती को लेकर यह सवाल बार-बार उठता है कि केन्द्र की सत्ता अगर मायावती के पास आ गयी तो कम-से-कम कोई सपना तो उसकी आंखो में है, जो किसी दूसरे राजनेता के पास नहीं है। ठीक उसी तरह जैसे बुश या मैक्कन के पास अमेरिका को लेकर कोई सपना होगा, सोचना भी मुश्किल है। लेकिन ओबामा की आँखो में सपना है। और शायद अब की दुनिया में इंतजार मरते हुये सपनों को जिलाने का ही है।

12 comments:

Amalendu Upadhyaya said...

Puny ji, na to martin luthar se Obama ka sapna poora ho raha hai aur na Mayavati se Ambedkar ka.Yeh bidambna hai ya trasdi ki Obama ko hileri klinten ka sahyog lena pad rah hai aur mayavati ki jeet Satish Mishra ke bina adhoori hai.Doosra Ambedkar Congress ke sadasy kab rahe? zara gyanvardhan karen.Ambedkar ki tulna Martin luthar se karna Martin lutar ki charitr hatya hai.Ambedkar to southbero commitee se lekar 15 august 1947 tak british hukumat se hindustan me bane rahne ki apeal kar rahe the.

डॉ .अनुराग said...

मार्टिन लूथर किंग से ओबामा की तुलना करना उतना ही ग़लत है जितना आंबेडकर से मायावती की ....सिद्धांत ,आदर्श ओर चरित्र तब राजनीती इन्ही कारणों से पहचानी जाती थी ओर लीडर का सम्मान हर इन्सान भीतर से करता था ,यहाँ तक की विपक्ष के लोग भी उनकी गुणवत्ता के कायल होते थे अब .......आप लगता है ज्यादा उत्साहित हो गए है या आशावादी ...इंतज़ार कीजिये .समय से बड़ा आइना कोई नही

रंजीत said...

Samajik udvikas ke lihaz se aapke is vishleshan se main bhee sahmat hun. Aapne Obama aur Mayawatee ko Luthur aur baba saheb ke sapne ka extenson kahkar inmen fark kar diya hi, isliye Mayawatee se baba saheb ar Luthur se Obama ke Vyaktitwa kee tulna ka sawal hi paida nahin hota.
Lekin Prasoon jee, kya sattawadee shaktiyon ke ubhar se Samajik udvikas ka ab koi rista rah gaya hi ? Mere khyaal se ab is par vichar kee awashyakta hi.

swapnila said...

YE TO SAMARTHAN KARNE JAISA HAI......AAKHIR AAP SAHMATI KIS BAT PAR DIKHA RAHE HAI? SAHI THA HI KAUN....AUR AB BHI KAUN SAHI HAI......NA NA.....YE UCHIT NAHI..HO SAKTA HAI AAPNE KAI PAHLWOO PAR VICHAR KIA HO PAR PHIR BHI APNI JANKARI KE MUTABIK MAI ITTEFAK NAHI RAKHTI....AGAR AAP APNE HI PROGRAMME BARI KHABAR KO GAWAH BANAYE TO AAP SWAYAM APNE VICHARO ME ANTARVIRODH PAYEGE...HO SAKTA HAI KI JANKARI KE ABHAW ME MAI HI NADANI KAR RAHI HU....NA HI MAYAWATI..NA HI AMBEDKAR....AUR OBAMA....MERE KHAYAL SE SAMNE KOI HAI NAHI..ISLIYE JO HO RAHA HAI WO ITIHAS BANEGE..YE JAROOR HAI KI JARIYA OBAMA HOGE..PHIR WO BHI MARTIN JAISE YAD KIYE JAYEGE.....HAI N?

vaishali said...

प्रसून भाई आपने काफी नजदीक से देखा है की मायाबती ने अम्बेडकर साहब का सपना किस हद तक साकार किया । लेकिन दुनिया को ये जरूर देखना है की मार्टिन लूथर किंग का सपना बराक ओबामा साकार कर भी पाते है या नही ? क्युकी ओबामा के सामने चुनौतिया कई है । अब ये तो समय तय करेगा की बराक ओबामा मार्टिन लूथर किंग के सपने को कहा तक अंजाम दे पाते है ।

मिहिरभोज said...

मायावती और अंबेडकर ....कुछ समझ नहीं आया

kumar Dheeraj said...

सचमुच लूथर ओर अंबेडकर के सपने सच हो चले है आपने जो कहा है सच कहा है । काश लूथर जिंदा होते ओऱ अपने सपने को साकार होते दिखते । लेकिन ओबामा में वो कर दिखाया है जो अमेरिका के २१९ साल के इतिहास में नही हो पाया था । आपने सच को उजागर किया है ।

anand said...

1963 se 2008 martin loother se baraak obama. itne kum samay me itihaas nahi bante, lekin obama ne kar dikhaya. koi jara jameen par utar kar dekhe aur thori der ke liye kalpna me kho jai ki ek ashwet ameriki president! kalpana hi to hai.ab bhi sahaj yakin nahi hita ki obama sarvsaktiman ho gaya hai.logo ko martin loothar se obama ki tulna bewajah lug sakti hai, lekin mujhe nahi lagi.wakt wakt ki baat hai aur hame hamesha beeta hua kal adhik gauravshaali lagta hai. present agar past se adhik garv pradan kar raha hai to ise swikaar karne me harj kaisa.itihaas banaane se banta hai.tab loother mahan thhe aur aaj bhi mahaan hain.lekin present paristhitiyon me ek ashwet ka sarvsaktimaan chuna jana, obama ka amerika president chuna jana,loother ki baat ko aage badhana hai.aiase me loother ki tulna obama se karna behtar laga,bahut behtar-
anandvardhan priyavatsalam

anil yadav said...

अंबेडकर और मार्टिन लूथर किंग के सपने सिर्फ इस मायने में सच हुए हैं कि वो सत्ता दलितों औऱ अश्वेतों के हाथों में देखना चाहते थें.....लेकिन मायावती ने अंबेडकर के सपनों की जिस तरह से हत्या की है....उसे देखकर स्वर्ग में आज अंबेडकर भी आंसू बहा रहे होंगे.....औऱ रही बात ओबामा की ....तो हुजुर देसी कहावत है कि.....नाऊ-नाऊ कितने बाल ....जजमान अभी सामने आये जाते हैं....

vipin dev tyagi said...

समाजिक परिवर्तन...व्यक्तियों, उनके चरित्र और सिर्फ कार्यों पर निर्भर नहीं करता..समय,परिस्तिथियां,माहौल,समाज का स्वरूप भी लोगों के महान बनने या नहीं बननें में अहम भूमिका निभाता है..मार्टिन का आई हेव एक ड्रीम,1960 के समय में इसलिये पूरा नहीं हो पाया क्य़ोंकि जिस परिवर्तन,अश्वेत और श्लवेतों को बराबर और समानता के हक की बात मार्टिन लूथन कर रहे थे.सोच रहे थे..उसके लिये बाकि अमेरिका और खुद अश्वेतों का एक बड़ा वर्ग मानसिक रूप से तैयार नहीं था,उसमें ताकत नहीं थी..ठीक उसी तरह अंबेडकर ने दलितों के राजनीति में आगे से नेतृत्व करने की जो बात कही..(दुखी होकर धर्म परिवर्तन किया)...उस समय उनकी बात कितने कानों तक पहुंच रही थी.. मायवती के अपने दम पर मुख्यमंत्री बनने के बाद उनका जो सपना सच हुआ है..उसमें यूपी के वोटरों को वो हिस्सा,तबका भी शामिल है..जो ऊंची जाति के होने के बावजूद मायावती को इसलिये वोट किया क्योंकि तमाम कमियों के बावजूद मायावती के शासन में कानून- व्यवस्था चुस्त-दूरूस्त रहती,नौकरशाहों पर लगाग रहती है..सिर्फ सोशल इंजीनियरिंग या सियासी कैमेस्ट्री के लिये दलित वर्ग की एक महिला को सत्ता की कुर्सी तक नहीं पहुंचाया गया...आज के युवा वर्ग.. का एक बड़ा तबका भले ही आज भी शादी के लिये अपनी जाति कि मां-बाप की ढूंढी लड़की से शादी करना ज्यादा पसंद करता हो..लेकिन एक दलित वर्ग या दूसरे महजब के लड़के-लड़की से दोस्ती साथ खाने और हॉस्टल में साथ रहने से उसे कोई परहेज नहीं है..बदलाव समय लाता है..चीजें समय के हिसाब से अपने आप भी बदलती हैं..ओबामा और मायावती जैसे और लोगों को ङी आगे छाने के लिये मौका मिलता है..आगे भी मिलता रहेगा.

S.P.Singh said...

Dear Punya,
Analysis of two diverse worlds in a vast time frame is undoubtedly an interesting subject. But the combinations are not what they are being projected as. I do not doubt the greatness of Marting Luther King. But Barrack Obama has yet to prove himself. How much and to what extent the U.S. has changed for the coloured people we will know soon enough. But what trully disturbed me was your drawing parellel between Ambedker and Mayawati.

To begin with, none of the two are saints. Ambedker rose to become a legend less because of what he said or did, and more because he was useful as a mascot of dalits in the new emerging political order of the country, almost just the way Maulana Azad represented the muslim community. I cannot recall any great deeds of Ambedker. The constitution which is credited to him was co-authored by several others with him and was largely lifted from other world constitutions. His demand of seperate electorate for dalits was wisely opposed by Gandhiji, but for petty electoral gains, it gained grounds within our constitution itself and it forms a big divide in our society. Clad in spotlessly clean tie & suit he never rendered services to the dalits as Gandhiji did - let alone some lip service. And how patriotic he was is evidently clear from the fact that he openly opposed India's freedom. No wonder Arun Shourie had to author "Worshipping false Gods".
As for Mayawati, less we talk is better. The way you have written, it suggests as if she is on a divine mission as a child of fate to restore the glory of dalits. Nothing can be further from truth. If anybody trully exploited the dalit sentiments to the fullest, it's Mayawati. Please avoid raising the image of such leaders who are not fit to lead and epitomises corruption, crime, manipulations, caste division and power-politics.

smart said...

मुझे आप की पोस्ट पढ़ कर बड़ा दुःख हुआ की आप जैस सुलझा हुआ व्यक्ति इस तरह की बात कह रहा है लूथर किंग और ओबामा की तो छोडो लेकिन दलितों को बेवकूफ बना कर मायावती ने सत्ता हासिल की और घोटालों और मूर्तियों की राजनीति शुरु कर दी, जिस पैसे से मूर्तियों का निर्माण हुआ उससे न जाने कितनी दलित बस्तियों में बिजली और साफ़ पीने का पानी पहुँच जाता ...कभी कभी तो ऐसा जी जलता है की यदि कोई मुझे ''तालिबान" और मायावती के शासन में से कोई एक को चुनने की बात कहे तो मै 'तालिबान" को चुनुगा.......चलो अच्छा है हो सकता है इस बड़ाई से आप को भी कोई फायदा हो जाये ...